>२६/११ की गौरवपूर्ण घटना और चूतिया नंद की कथा

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कल २६/११ की बरसी को भारतवर्ष के चुनिन्दा शहरों में चुनिन्दा टीवी चैनलों और टेलीकोम कंपनियों के माध्यम से सवेदनशील जुझारू देशभक्तों ने , जो राष्ट्र की रक्षा के लिए कर्मठता पूर्वक मोमबत्ती और मोबाइल थामे खड़े रहे , बड़े हीं धूमधाम और हर्षौल्लास के संग मनाया ! असीम गौरव के इस राष्ट्रीय गर्व के पर्व को हर साल मनाया जाएगा ऐसी उम्मीद करता हूँ ! २६/११ की गौरवपूर्ण घटना के दौरान प्रशांत प्रियदर्शी द्वारा लिखे गये एक पोस्ट को आप दुबारा पढ़िए जो नीचे पुनः पोस्ट कर रहा हूँ ………….

अथ चूतिया नंद कथा

ये कथा है एक ऐसे महानुभाव कि जिन्होंने एक ऐसे शहीद और कर्तव्यनिष्ठ जवान पर अंगुली उठाई है जिसका कर्जदार यह समूचा देश सदियों तक रहेगा.. मैं हमारे पूर्वजों को धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने चूतिया कह कर किसी प्राणी को पुकारा नहीं, नहीं तो यह उस जीव के अधिकारों का हनन होता.. कुत्ते अपने आप में वफादार होते हैं और सूअर भी गंदगी साफ करने में सहायता ही करते हैं.. इन्हें यह नाम देकर मैं इन जानवरों को गालियां नहीं देना चाहता हूं..

वैसे इस श्रेणी में कुछ पत्रकार नाम के ह्रिंस पशु भी हैं जो अभी भी लाल सलाम को सलामी देकर इसे प्रमुखता ना देकर इधर-उधर कि ज्यादा खबरें देकर अपना टीआरपी बटोरना चाह रहे हैं.. कारण साफ है, आखिर संत चुतिया नंद भी लाल सलामी देने वालों के अगुवा जो ठहरे.. ये तथाकथित बुद्धीजीवियों का बस चले तो लगे हाथों पूरे भारत को चीन के हवाले करके सलामी पे सलामी देते रहें..

जहां तक स्वर्गीय मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की बात है तो वो जब जीते थे तब भी भारत कि एकता के मिशाल थे और शहीद होने के बाद उनकी कहानी बच्चे-बच्चे तक पहूंच गई.. कारण साफ है.. वो रहने वाले थे केरल के.. पदस्थापित थे बिहार के दानापुर में बिहार रेजिमेंट में.. आतंकियों से मुकाबला करने को उड़ान भरी दिल्ली से.. शहीद हुये मुंबई में.. और अंत्येष्टी हुआ कर्नाटक में.. अब इससे बड़ी और क्या मिशाल दिया जाये उनकी और भारतीय एकता की?

मैं सलाम करता हूं उस मुसलिम भाई को भी जो परदे के पीछे रह कर नरीमन हाऊस मामले में हमारे जांबाज कमांडो कि मदद अपने जान पर खेल कर दी.. जिसने पूरे नरीमन हाऊस का नक्सा बना कर हमारे कमांडो को दिया और पूरे 59 घंटे तक कमांडो कार्यवाही में कमांडो के साथ रहा.. कुछ इस तरह गुमनामी में रहकर उन्होंने यह काम किया कि मुझे उनका नाम भी याद नहीं आ रहा है.. भला हो अगर कोई मुझे उनका नाम याद दिला दे, आगे से नहीं भूलूंगा.. मैं सलाम करता हूं उन मुल्लाओं को भी जिन्होंने मारे गये आतंकवादियों को भारत में दफनाने के लिये जगह ना देने कि घोषणा भी कि..

इधर एक और लाशों के खिलाड़ी चुनाव सामने देखकर केरल कि गलती के लिये माफी मांग रहे हैं, पता जो है उन्हें कि चुनाव सामने ही है.. जिस जगह से माफीनामा आया है आखिर आज वहां चुनाव प्रचार का आखिरी दिन जो है..

अंत में – मेरा अपना यह मानना है कि जहां तर्क कि सीमा खत्म होती है वहां से गालियों कि सीमा शुरू होती है॥ और मैं यह स्वीकार करता हूं कि मेरी नजर में ऐसे खूंखार नमक हरामों और आतंकवादियों को बिना किसी तर्क और सबूतों के गोली से उड़ा देना चाहिये.. मगर यह भी जानता हूं कि ऐसा नहीं होने वाला है.. फिलहाल तो मेरी तर्क कि सीमा खत्म होती है और मुझे अपने द्वारा किये गये इस तरह कि गंदी भाषा प्रयोग पर कोई दुख नहीं है..

साभार : मेरी छोटी सी दुनिया

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