>गुटबाजी क्यों नहीं है ? क्या एक ,एक गुट का नाम गिनाया जाए……..–जनोक्ति

>ब्लॉग्गिंग  में गुटबंदी और विचारधारा के मतभेदों को लेकर संवाद अभी जारी है.  इस पर अभी मुझे कुछ कहना है लेकिन मैं अपनी बात करूँगा बाद में. पहले बात एक टिप्पणी की जो किसी वजह से वहां नजर नहीं आ सकी. मुझे इसका कारण तकनीकी गडबडी बताया गया है. जनोक्ति की तरफ से प्राप्त हुयी इस टिप्पणी को उसी  रूप में यहाँ पोस्ट किया जा रहा है तां की संवाद और आगे बढ़ सके. तकनीकी गडबडी की वजह से ही यह टिप्पणी मुझे मेल से भेजी गयी है. वास्तव में  इस संवाद की शुरुआत ही इस लिए की गयी है कि कोई भी कलमकार मन की बात खुल कर कह सके.  तो लीजिये अब आप पढ़िये टिप्पणी ज्यूँ कि त्यूं केवल कुछ नाम काट दिए गए हैं ; मेरी बात होगी बाद में अगली पोस्ट में :                                                                                                                     –रैक्टर कथूरिया

दरअसल, कमिओं को ढंकें नहीं उसे स्वीकार करें .. गुटबाजी क्यों नहीं है ? क्या एक ,एक गुट का नाम गिनाया जाए आप लोगों को ?
वामपंथियों , दक्षिणपंथियों , कांग्रेस्सियों , हिंदुवादियों , इसलामिक कट्टरपंथियों आदि ;;;;; सभी के गुट बटे हुए है .…अनेक मंच हैं जहाँ गुटबाजी होती है और अपने विपरीत बात करने वालों से दूरी बनाये रखा जाता है ………
कुछ दिनों पहले तक एक तथाकथित कबाड़ी भाई जो उदय प्रकाश मामले में चर्चित रहे , यहाँ आया करते थे और वैचारिक असहमति के बावजूद अपनी प्रतिक्रियाओं में तार्किक ढंग से अपनी बात रखते थे ….. आज कल उनके साथियों ने उनको भी लताड़ा है शायद ! श्रीमान गायब है …… क्या वैचारिक मतभेद को मनभेद बनाकर चलना चाहिए ?
नेताओं की भांति बुद्धिजीवी कहलाने वाले लेखन कर्म से जुड़े लोगों की तो कोई मजबूरी नहीं होनी चाहिए की हम एक मंच पर संवाद करते न दिखें .. विचारधारा को भी धर्म की तरह नितांत निजी समझा जाये तभी कल्याण है ……..
मैं किसी भी विचारधारा का हूँ इससे क्या फर्क पड़ता है देश और समाज के भले में जो सच है उसे जरुर कहना चाहिए ……………
                   आज हिंदी चिट्ठाकारी कच्चे बांस की तरह है जिसे झुका कर जो चाहे बनाया जा सकता है … तो यही मौका है जब मुख्यधारा की मीडिया के वर्तमान चरित्र से इसे बचाकर एक नए आयाम को जन्म दिया जाए …… हिंदी ब्लॉग जगत को ऐसा उदाहरण बना कर पेश किया जाए जहाँ विभिन वादों /विचारों /मानसिकताओं के लोग एक साथ एक -दुसरे को पढ़ते ,समझते ,बहस करते ,और एक -दुसरे से अच्छाई की सिख लेते हैं ….. इस मंच को सामुदायिक बनाने के पीछे हमारा यही उद्देश्य रहा है ……. हालाँकि कुछ डरपोक लोग जो आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं वो यहाँ आये और फिर चले गये .…. मंच को साम्प्रदायिक बता कर खूब गालियाँ भी लिखी अपने ब्लॉग पर ! खैर , अब ऐसों को कौन समझाए कि सामुदायिक ब्लॉग की किसी एक पोस्ट पढ़कर उस ब्लॉग की विचारधारा का फैसला करना मुर्खता है !

संगीता जी ,थोडा असहमत विवाद को संवाद कहें तो ज्यादा सकारात्मक होगा .

परहेज तो नहीं हो इसलिए तो हमने यहाँ घोषणा कर रखी है विचारधारा की बाध्यता के बगैर सभी लोग जनोक्ति :संवाद का मंच की सदस्यता ले सकते हैं.                                          –-जनोक्ति

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