>भोपाल गैस त्रासदी-गैस पीड़ितों के साथ विश्वासघात

>2-3 दिसम्बर 2009 को विश्व के भीषणतम औद्योगिक नरसंहार भोपाल गैस कांड की पच्चीसवी बरसी मनाई जा रही है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि पिछले पच्चीस सालों में गैस पीड़ितों की समस्याएँ जस की तस होने के कारण हर साल की तरह इस साल भी भोपाल के लाखों गैस पीड़ितों के ज़ख्म ही ताज़ा होंगे, फर्क सिर्फ यह होगा कि इस साल मौत के उस तांडव का रजत वर्ष होने के कारण देश विदेश के सैकड़ों लोग गैस पीड़ितों के ज़ख्मों पर मरहम लगाने भोपाल आएँगे, उनमें से कुछ ऐसे भी होंगे जो उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़कने के अलावा कुछ भी नहीं करेंगे।

जन-साधारण के साथ सरकारों के विश्वासघात के हज़ारों उदाहरण देश-दुनिया में देखने को मिलते रहते हैं परन्तु भोपाल गैस कांड को लेकर जिस तरह का विश्वासघात देश की केन्द्र सरकारों और मध्यप्रदेश की राज्य सरकारों ने, (चाहे वे किसी भी पार्टी की रहीं हों) गैस पीड़ितों के साथ किया है, वैसा उदाहरण दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलता।

भोपाल गैस त्रासदी तो फिर भी विश्व की अन्यतम औद्योगिक दुर्घटनाओं में शामिल है, जिससे हुए शारीरिक आर्थिक नुकसान का दूर बैठकर अन्दाज़ा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। अमरीका अथवा पश्चिम के किसी भी देश में किसी छोटी-मोटी औद्योगिक दुर्घटना तक में लापरवाही बरतने एवं श्रमिकों, जनसाधारण के हताहत होने पर सज़ा एवं मुआवजे़ के जो कठोर प्रावधान हैं उनके आधार पर भोपाल गैस पीड़ितों के मामले में जिम्मेदार लोगों को सख़्त सज़ा के साथ-साथ कंपनी को जो आर्थिक मुआवज़ा भुगतना पड़ता उससे यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन को अपने आपको दिवालिया घोषित करना पड़ सकता। परन्तु गैस कांड के तुरंत बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने गैस पीड़ितों के हितों के नाम पर समस्त कानूनी कार्यवाही का अधिकार अपने हाथ में लेकर गैस पीड़ितों के हाथ तो काट ही दिए बल्कि गैस पीड़ितों की लड़ाई को इतने कमज़ोर तरीके से लड़ा कि ना इस नरंसहार के लिए यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन की जिम्मेदारी तय हो पाई और ना ही पश्चिमी कानूनों मुताबिक भोपाल गैस पीड़ितों को पर्याप्त मुआवज़ा ही मिल पाया। बड़े शर्म की बात है कि आज जब मामूली सी दुघर्टनाओं में हताहतों को इफरात मुआवज़ा मिल जाता है, भोपाल गैस पीड़ितों को इतना कम मुआवज़ा मिला है कि उसे भीख़ कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है। दिल्ली में हुए उपहार अग्निकांड तक में पीड़ितों को लाखों रूपए मुआवज़ा मिला है जबकि भोपाल के गैस प्रभावितों को जिनकी पीढ़ियाँ तक विषैली गैस से विकृति की शिकार पाई जाने का अंदेशा है, नाम मात्र का मुआवज़ा देकर, (जिसमें से काफी कुछ दलाल और सरकारी मशीनरी खा गई) मरने के लिए छोड़ दिया गया है।

दरअसल देखा जाए तो इस दुर्घटना के राजनैतिक सिग्नीफिकेन्स को दरकिनार रखकर गैस पीड़ितों की पूरी जद्दोजहद मुआवज़े के इर्द-गिर्द ही केन्द्रित रही है जिसे लेकर केन्द्र एवं राज्य सरकार के अलावा गैस पीड़ित संगठनों की भूमिका भी बेहद निराषाजनक रही है। मुआवज़े के नाम पर जो भी रकम सरकार के खाते में आई है उसके युक्तिसंगत प्रबंधन की जगह उसे फुटकर रूप से गैस पीड़ितों में बाँटकर अप्रत्यक्ष रूप से बाज़ार की मुनाफाखोर शक्तियों की जेब में पहुँचा दिया गया है। गैस पीड़ितों ने अपनी शारीरिक हालत की गंभीरता के प्रति अन्जान रहकर मुआवज़े के रूप में मिले उस पैसे को अपने इलाज पर खर्चने की जगह टी.वी. फ्रिज, मोटरसाइकिल और दीगर लक्ज़री आयटम्स की खरीदारी पर खर्च दिया। कुछ शारीरिक ताकत खोकर घर बैठने को मजबूर लोगों ने ज़रूर उस मुआवजे़ से कुछ दिन अपने जीवन की गाड़ी धकाई मगर अब उनके सामने अपने आप को मरते हुए देखने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। गैस पीड़ितों को पहुँचे गंभीर शारीरिक नुकसान के मद्देनज़र उसका बेहतर से बेहतर इलाज कराया जाना सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा जाना चाहिए था और इसके लिए मुआवजे़ की राशि को इस तरह न बाँटकर गैस पीड़ितों के लिए सर्व सुविधा युक्त आधुनिक अस्पतालों का जाल बिछाने के लिए इसका उपयोग किया जाना चाहिए था ताकि उन्हें वैज्ञानिक पद्धति से उपयुक्त एवं सस्ता इलाज मुहैया हो पाता और वे डॉक्टरों की लूटमार से भी बच जाते । मगर अफसोस सरकारों ने इस दिशा में कुछ नहीं किया।

दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा रोज़गार का है। अपनी शारीरिक क्षमता खो चुके गैस पीड़ितों के लिए उपयुक्त रोज़गार और इलाज के साथ-साथ सुचारू जीवन यापन के लिए ऐसे बड़े-बडे़ औद्योगिक संस्थानों की स्थापना किये जाने की आवश्यकता थी जहाँ शारीरिक क्षमता के अनुसार दीर्घकालीन रोज़गार उपलब्ध हो सके। इसी तरह पुनर्वास के मुद्दे पर कुछ बड़े सामुदायिक संस्थान खड़े किये जाने आवश्यक थे। इस तरह के कार्यक्रमों के ज़रिए गैस पीड़ितों के लिए मिले मुआवज़े का समुचित उपयोग संभव होता जिसका लाभ लम्बे समय तक गैस पीड़ितों को मिल सकता था। परन्तु भोपाल में इसके उलट गैस पीड़ितों को सीधे मुआवजे़ की राशि मुहैया कर कज्यूमर प्रोडक्ट कम्पनियों के वारे-न्यारे कर दिए गए। गैस पीड़ितों के पैसों को सरकारी स्तर पर सौंदर्यीकरण इत्यादि दीगर कामों पर भी बड़े पैमाने पर खर्च किया गया जिसका सीधा लाभ गैस पीड़ितों को नहीं मिल पाया। गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाले कई संगठनों ने भी अपने तमाम नेक इरादों के बावजूद इस मामले में बिल्कुल भी दूरअंदेशी का परिचय नहीं दिया।

बहरहाल, एक भयानक पूँजीवादी साम्राज्यवादी षड़यंत्र के तहत भारत जैसे गरीब देश में मचाए गए मौत के इस तांडव के विरुद्ध एक सचेत राजनैतिक आन्दोलन के अभाव में गैस पीड़ितों का जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई की जाना तो आज पच्चीस साल बाद संभव नहीं है लेकिन फिर भी मिथाइल आइसो साइनाइड और अन्य कई रसायनों के दूरगामी परिणामों के कारण गैस पीड़ितों के ऊपर भविष्य में आने वाले संकटों के मद्देनज़र तमाम गैस पीड़ितों एवं उनके लिए काम कर रहे संगठनों को एकजुट होकर एक प्रभावशाली आन्दोलन का निर्माण करना चाहिए, यही 2-3 दिसम्बर 1984 की रात मारे गए बेकसूरों को सम्मानजनक श्रद्धांजलि हो सकती है।

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