>तुम्हारे पूर्वजो नें जजिया कर वसूला , अब तुम "हाजिया " कर दो,

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इसीलिए अब भी आनंद पाठक की एक कविता : श्वेत-पत्र पर खून के छींटे ……. के ऊपर चल रहे विमर्श को देख कर टिप्पणी करने बैठा तो एक लम्बी पोस्ट बन गयी तो सोचा क्यों ना इसे पोस्ट हीं कर दिया जाए :-

बहुत ही सहज शब्दों में कहना चाहूँगा कि किसी व्यक्ति का किसी कालखंड में मौजूद होना उसके भावनाओं को प्रवाहित करने का हेतु बने , ऐसा कहना मूढ़ता होगी. मैं अपने परदादा के वक्त जिन्दा नहीं था, तो क्या उनके अस्तित्व और भूमिका पर कोई भावना नहीं जगेगी. मेरे दादाजी का होने का अर्थ है कि परदादा हुए थे ! बाबरी विध्वंश की घटना को आपको भी गजनी और औरंगजेब के दुराचारों से जोड़कर देखना होगा. यदि आप तथाकथित बाबरी मस्जिद के बाद हुए, तमाम आतंकी घटनाओं और दंगो को तथाकथित बाबरी मस्जिद के उस विवादित ढांचे से जोड़कर देखतें हैं .

तथाकथित बाबरी मस्जिद( राम जन्म भूमि ) के सन्दर्भ में कलंकित भारतीय अतीत को साफ़ साफ और निष्पक्ष रूप में समझने के लिए यह काफी नहीं कि एक मस्जिद, जिसका ढांचा कहीं से भी मस्जिद का नहीं था. जिस तथाकथित मस्जिद के अन्दर रामलल्ला कि मूर्ति विराजमान थी, जिसकी पूजा ताला लगे होने के वावजूद हिन्दू धर्मावलम्बी करते रहे थे. तथाकथित ढांचे के चारों ओर सात कोस तथा चौदह कोस की परिक्रमा की जाती थी जो अब तक जारी है.

आपका यह कहना की आप उस वक़्त नहीं थे , उनलोगों को बेवकूफ बताना है जो आपके पूर्वज हैं. और उनको अँधा जो तथाकथित बाबरी मस्जिद के विध्वंश के बाद आये.आप अपने हिस्से की नासमझी पूरे समाज पर कैसे थोप सकते है?
आपका सत्य , सबका सत्य कैसे हो सकता है ?

भारत में एक परंपरा सी चल पड़ी है कि कि वर्तमान घटनाओं के लिए इतिहास को दोषी ठहराने की . ऊपर मैंने जो कुछ लिखा वह उसी का उदहारण था ताकि आप जैसों को आपकी भाषा में समझाया जा सके . जिस प्रकार से दलित विमर्श के धुरंधर यह कहते फिरते हैं कि अतीत में किये गए सामाजिक भेद भाव के लिए वर्तमान के सवर्णों को पश्चाताप करना चाहिए.
यह तो वही बात हो गयी कि ” लंका पर हमला करो , रावन यहीं रहता था “. ठीक इसी तथ्य को हिन्दू अगर मुसलमानों के ऊपर लागू करें कि तुम्हारे पूर्वजो नें जजिया कर वसूला , अब तुम “हाजिया ” कर दो, तो कैसा रहेगा ! लेकिन तब आप सांप्रदायिक घोषित कर दिए जायेंगे.

अभी कल हीं एक घोषित सांप्रदायिक लेखक सुरेश चिपलूनकर का आलेख पढ़ रहा था जिसमे उन्होंने बताया कि नेपाल में एक धार्मिक अनुष्ठान के दौरान दो लाख बकरों की बलि दी जाती है जिसपर एक अमेरिकी अखबार ने हिन्दुओं को बर्बर बताते हुए लम्बी रपट छापी है http://www.nytimes.com/2009/11/25/world/asia/25briefs-Nepal.html?_r=2
आगे लिखते हैं – * अमेरिका में एक त्योहार होता है “थैंक्स गिविंग डे”, इस अवसर पर लगभग प्रत्येक अमेरिकी परिवार में टर्की (एक प्रकार का पक्षी) पकाया जाता है और उसकी पार्टी होती है।
कम से कम 5 करोड़ टर्कियों को इस दिन मारकर खाया जाता है…
* ऐसा ही एक त्योहार है बकरीद, जिसमें “कुर्बानी”(किसकी?) के नाम पर निरीह बकरों को काटा जाता है। मान लें कि समूचे विश्व में 2 अरब मुसलमान रहते हैं, जिनमें से लगभग सभी बकरीद अवश्य मनाते होंगे। यदि औसतन एक परिवार में 10 सदस्य हों, और एक परिवार मात्र आधा बकरा खाता हो तब भी तकरीबन 100 करोड़ बकरों की बलि मात्र एक दिन में दी जाती है.

अब सवाल उठता है कि यदि 2 लाख प्राणियों को मारना “बर्बरता” और असभ्यता है तो 5 करोड़ टर्की और 10 करोड़ बकरों को मारना क्या है? सिर्फ़ “परम्परा” और “कुर्बानी” की पवित्रता??? सबसे पहले एक बात पर चर्चा जरुर होना चाहिए कि बलिप्रथा का विरोध केवल इसीलिए हो क्योंकि वह धार्मिक कर्मकांड में शामिल है ? आखिर धर्म ,एक जीवन पद्धति जिसके सहारे मानव पिछले 5 हजार सालों से जीवनचर्या चलता आ रहा है उससे इतना परहेज क्यों ? अगर बलिप्रथा को कुरीति मानते हैं तो इसका कारण क्या है ? शायद जीवहत्या को देखकर मानवीयता जाग उठती होगी आपके मन में ! क्यों ठीक कहा ना ? परन्तु गुरुदेव वो मानवता तब कहाँ चली जाती है खाने के नाम पर अरबों -खरबों मुर्गे-मुर्गियों का , बकरों का, गायों , भैंसों का ,सर काट दिया जाता है या हलाल किया जाता है { मेरे लिए बात बराबर है हलाल हो या झटका ,जब मारना ही है दर्द का फर्क देख कर क्या होगा ?} बर्बरता नापने वाले लोग धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान की गयी बलि को हीं क्यों देखते हैं , क्या उनको संसार भर में चल रहे लाखों वैध -अवैध बूचडखाना नहीं दीखता जहाँ की बर्बरता को देख लेने भर से आदमी बर्बर हो जाए ? मैं तो कहता हूँ वर्तमान बाजार प्रधान समाज में धर्म की प्राचीन परम्पराओं के खिलाफ अघोषित युद्ध भी चल रहा है और दूसरी तरफ नए नए बाजार प्रायोजित हथकंडों से धर्म को भी बाजार में शामिल कर लिया गया है और अंधविश्वास व कुरीतियों की नई खेप जो बाज़ार के अनुकूल हो वह पैदा की जारही है .और खास कर हिन्दू धर्म और भारतीय प्रायद्वीप की सनातन संस्कृति इनके निशाने पर है .
अब इसे आप क्या कहेंगे ? इसके लिए कौन दोषी है ? क्या उपरोक्त पोस्ट को लेकर हिन्दू -मुस्लिम और ईसाई बंधू आपस में लड़ें ? क्या अपने बचाव में दूसरों के गलत कामों का सहर लिया जा सकता है ? क्या किसी गलत प्रथा के लिए किसी एक समुदाय को दोषी करार देना चाहिए जबकि वो कुरीतियाँ औरों में भी मौजूद हो ? अब जाति प्रथा को ही लीजिये जिसके लिए केवल हिन्दू समुदाय को पिछड़ा कहकर संबोधित किया जाता है जबकि इस्लाम और ईसाइयत दोनों में भी जातिगत भेदभाव सामान रूप से होता है !

तो अंत में पाठक साहब जैसे तमाम लोगों से यह सवाल है कि आखिरकार कब तक ,कब तक एक तरफ़ा नजरिया लेकर हम लिखते रहेंगे ? क्यों हम निष्पक्ष होकर नहीं सोचते ? क्यों हम धर्म के मुद्दे पर कुत्ता घसीटी में लगे रहते हैं . इस बात को स्वीकारना होगा कि प्रगतिशीलता के नाम पर नक्सली आन्दोलन को समर्थन , धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बाबरी मस्जिद और गुजरात दंगे की रट लगाना एकतरफा नजरिया और दकियानूसी संकीर्ण मानसिकता है . दूसरों की गलती का हवाला देदे कर नएनए कुकारनामे कब तक किये जाते रहेंगे ?

एक ओर विश्व आर्थिक मंदी में घिरा हुआ है . हालत यह है कि अमेरिका चीन के सामने सर झुका रहा है ,पकिस्तान से गलबहियां कर रहा है . भारत के सामने गंभीर आर्थिक और सामरिक संकट मंडरा रहा है . हमारे प्रधानमंत्री बस समय मूर्ति बने चीनपकिस्तानअमेरिका सब की सुनते रहते हैं .अमेरिकी इशारों पर इरान के खिलाफ वोट दिया जाता है . एक ओर हमारी सरकार निकम्मी है दूसरी ओर आप जैसे लोग हैं जो बाबरी मस्जिद टूटने का शोक मना रहे हैं ! तो आप जैसों को सबक सिखाने के लिए ऐसे ही मुहतोड़ पोस्ट लिखने पड़ते हैं . आप जैसों की वजह से ही हिंदी ब्लॉगजगत में इस्लामहिंदुत्वबाबरीगुजरात से बात आगे नहीं बढ़ पाती है …… आगे बढिए और नये ज़माने के सच को स्वीकारिये नहीं तो स्थिति ये बन जाएगी कि खुद हीं हम लोग लिखेंगे और खुद हीं पढेंगे भी !

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