>मंदिर-मस्ज़िद के बहाने क़त्लेआम का जवाब लो

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आज 6 दिसम्बर है, बाबरी मस्ज़िद के ध्वंस की १७ वी वर्षगांठ। आज ही के दिन कुछ धार्मिक उन्मादियों ने अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद को ढहाकर देश में हिन्दु-मुस्लिम नफरत के एक और अध्याय की शुरूआत की थी। हिन्दुओं ने पाँच हज़ार वर्ष पूर्व के एक राजघराने के राजा रामचंद्र की तथाकथित जन्मभूमि पर, मंदिर निर्माण के मुद्दे को और मुसलमानों ने एक अज्ञात-अंजानी शक्ति ‘अल्लाह’ की इबादतगाह की रक्षा को अपनी-अपनी अस्मिता के प्रश्न से जोड़कर जी भरकर मानवता का खून बहाया है।
इस नाजुक मौके पर कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा की जाना गैरवाजिब नहीं होगा। हो सकता है ये बातें कुछ लोगों को बुरी लगे परन्तु मनुष्य मात्र के भले के लिए इसे बहस का मुद्दा बनाया जाना ज़रूरी है।
यदि उनका अस्तित्व था भी तो, पाँच हज़ार वर्ष पूर्व के एक राजा की स्तुति-अंधभक्ति का आज इक्कीसवी शताब्दी में क्या औचित्य है यह समझ से परे है, जबकि सामंती युग को तिरोहित हुए अर्सा हो गया है। उस युग की सामंती परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यबोधों का वर्तमान प्रजातांत्रिक परिवेश में कोई महत्व ना होने के बावजूद हम क्यों आस्था के बहाने उस एक नाम को ढोते चले जा रहे हैं ? इतना ही नहीं आज जबकि आधुनिक युग के सामाजिक मूल्यबोधों, धर्मनिरपेक्षता पर आधारित स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे के सिद्धांतों की रक्षा की सख़्त आवश्यकता है, हम क्यों मंदिर-मस्ज़िद के नाम पर इन मूल्यों का तिरस्कार करते चले आ रहे हैं।
मुसलमानों के सामने भी यह प्रश्न रखा जाना ज़रूरी है कि क्या सैंकड़ों साल पहले अस्तित्व में आए इस्लामिक सोच-विचार, मूल्यबोधों को आधुनिक समाज की रोशनी में दफ्न नहीं हो जाना चाहिए था। क्या एक ऐसी शक्ति जिसके अस्तित्व का कोई प्रमाण दुनिया में नहीं है के नाम पर वे हमेशा अपने आप को दकियानूसी बनाए रखेंगे, क्या वे शरीयत के नाम पर हमेशा व्यापक सामाजिक हितों एवं प्रजातांत्रिक मूल्यों से दूरी बनाए रखेंगे। क्या उनका धार्मिक कठमुल्लापन वर्तमान सामाजिक प्रतिबद्धताओं से उन्हें विमुख नहीं करता, जबकि एक देश का अभिन्न हिस्सा होने के कारण उन्हें भी व्यापक समाज के एक अभिन्न अंग की तरह पेश आना चाहिए!
सभी जाति, धर्म, सम्प्रदाय के लोगों के सम्मुख यह प्रश्न उठाया जाना चाहिए कि एक राष्ट्र के अभिन्न अंग के तौर पर समाज वे अपनी क्या भूमिका आंकते हैं। चाहे हिन्दु हों या मुसलमान या और कोई बिरादरी, आधुनिक प्रजातांत्रिक मूल्यबोधों का तकाज़ा है कि हम अपने व्यक्तिगत धार्मिक पूर्वाग्रहों को ताक पर रखकर मानव के रूप में अपने समय में जीना सीखें। बेशक एक बेहतर आज के लिए कल से सबक लिया जाना जरूरी है मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि पुरातन की अर्थी अपने कांधों पर रखकर अपने वर्तमान के सच को पैरों तले रोंदा जाए। हिन्दुओं-मुसलमानों और सभी धर्म सम्प्रदाय, जाति, भाषा, के लोगों को यह समझना जरूरी है कि परम्परा के नाम पर उनके ऊपर लादकर रखे गए ये लबादे उनकी मनुष्य के रूप में पहचान पर हावी होते जा रहे हैं। वे अपनी मानवीय विशेषताओं से नीचे गिरकर पशुवत होते चले जा रहे हैं।
यह नष्ट-भ्रष्ट हो चुका पूँजीवादी समाज है। मोहम्मद हो या राम, या और कोई पैगम्बर या अवतार, कोई भी इस पूँजीवादी समाज की बुराइयों, विडंबनाओं से निबटने में इन्सान की मदद नहीं कर सकता। चूक चुके मूल्यों के आधार पर आधुनिक चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता। हम शोषण पर आधारित मानव संबंधों की सामाजिक संरचना का शोषित-पीड़ित हिस्सा हैं। हमारी एकता शोषक शासक वर्ग के लिए खतरनाक होती आई है और आगे भी रहेगी, इसलिए हम हिन्दु या मुसलमान या अन्य कुछ बनाकर रखे जाते हैं। इसलिए हम परम्परा और संस्कृति के नाम पर राम या पैगम्बर मोहम्मद के अनुयाई के रूप में प्रचारित किये जाते हैं। यह शोषक-शासक वर्ग हमें जात-पात-धर्म सम्प्रदाय की बेड़ियों में जकडे़ रखकर, हमारे बीच आपसी संघर्ष को भड़काकर, उसे पाल-पोसकर हमें आपस में उलझाए रखता है। यह वह ताकत है जो नहीं चाहती कि इन्सान धर्मनिरपेक्षता आधारित स्वतंत्रता, समानता भाईचारे के मूल्यों को सही मायने में समझ पाएँ जिन्हें एक दिन धर्म की सत्ता को नेस्तोनाबूद कर हासिल किया गया था।
आज के दिन के लिए इससे बड़ा सबक दूसरा कोई हो नहीं सकता कि हम अपने अस्तित्व की धार्मिक, जातीय, साम्प्रदायिक, भाषाई पहचान को अपने अन्दर दफ्न कर उस व्याधि से मुक्ति पाएँ जो एक मनुष्य के रूप में हमारी एकता में बाधक है और एक व्यापक सामाजिक प्रतिबद्धता में बंधकर एक राष्ट्र में तब्दील होने के संघर्ष में उतरें और क़ातिलों से, चाहे वे हिन्दु हो या मुसलमान, मंदिर-मस्ज़िद के बहाने हजारों बेगुनाहों के क़त्लेआम का जवाब माँगें।

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