>ईमान कहाँ देखा …..!

>ईमान कहाँ देखा…..

ईमान कहाँ देखा ,सत्यवान कहाँ देखा !

मैने देखे शहर कितने इंसान कहाँ देखा !

अबतक जो मिले मुझसे,थे दर्द भरे चेहरे

उपमेय बहुत देखे ,उपमान कहाँ देखा !

गमलों की उपज वाले माटी से कटे थे लोग

थे नाम बहुत ऊँचे,पहचान कहाँ देखा !

अंधी से गली का सफ़र जीवन का सफ़रनामा

फँसने के तरीके थे ,समाधान कहाँ देखा !

हँसने की प्रतीक्षा में क्या क्या न सहे हमने

अभिशाप बहुत ढोए वरदान कहाँ देखा !

पत्थर की तरह चेहरे ,चेहरों पे खिंची रेखा

आँखों में नीरवता ,मुस्कान कहाँ देखा !

अमृत की प्रतिष्ठा में आचरण बहुत देखे

शंकर की तरह लेकिन विषपान कहाँ देखा !

-आनन्द पाठक-

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