>बिहार की मीडिया नीतीश की रखैल बन गयी है

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पिछले  सप्ताह से बिहार में हूँ . दैनिक हिन्दुस्तान व दैनिक जागरण दोनों का स्थानीय संस्करण पढ़-पढ़ कर बोरियत और मीडिया के चाल -चरित्र का यथार्थ महसूस कर रहा हूँ . मुख्य पृष्ठ से लेकर आर्थिक पन्ने तक सरकार {नीतीश कुमार } की गणेश परिक्रमा में कारे किये जा रहे हैं . मंत्री -मुख्यमंत्री के किसी कार्यक्रम में शिरकत को लीड बना कर छपा जा रहा है . डीएम -एसपी के जनता दरबार , जिसके नतीजे सिफर हीं रहते हैं और न ही जनता की कोई भीड़ , का कवरेज आधे -आधे पन्ने पर छपा जा रहा है . स्थानीय पन्नों पर छोटे-मोटे चोर -उचक्कों की गिरफ़्तारी की खबर ऐसे दी जा रही है जैसे कोई आतंकी या नक्सली सरगना पकड़ा गया हो . सम्पादकीय में लिखा जा रहा  है कि मुख्यमंत्री का यह कथन कि राज्य में रोजि-रोजगार के लिए किसी को नहीं भटकने देने के लिए सरकार प्रयासरत है ,उम्मीद जगती है और यह केवल जुबानी भरोसा नहीं है बल्कि इस दिशा में काम हो रहा है और इसके परिणाम भविष्य में दिखेंगे . पूरे सम्पादकीय में एक भी ऐसा तथ्य नहीं है जो औसत सोच-समझ वाले इंसान को संतुष्ट कर सके .एक ओर नीतीश कुमार का मुखपत्र लगता है तो दूसरी तरफ क्षेत्रवाद की बू आती है जब यह लिखा जाता है कि केंद्र में बिहारी लौबी बननी चाहिए . गाहे -बगाहे हर रोज व्यवसाय के लिए समुचित माहौल का झूठा फीचर प्रकाशित हो रहा है . कुल मिलकर संक्षेप में इतना कहना उचित है कि बिहार की मीडिया सत्ताधीशों के हाथों की कठपुतली है . आज नीतीश हैं कल कोई ओर होगा . और कमोबेश हर प्रदेश में स्थानीय मीडिया का चरित्र ऐसा हीं है .
लैपटॉप की बैटरी जाने वाली है इसलिए मीडिया प्रचारित विकास और उत्थान की पोल खोलना बाकि है . पर बैटरी जाने की बात से आप इतना समझ ही गये होंगे कि यहाँ बिजली की क्या हालत है ! 

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