महाराष्ट्र की लावणी/तमाशा परम्परा को जीवित करती और “जेण्डर बायस” की त्रासदी दर्शाती नई मराठी फ़िल्म “नटरंग”… Natrang, Atul Kulkarni, Marathi Movies, Tamasha

महाराष्ट्र की ग्रामीण लोक-परम्परा में “लावणी” और “तमाशा” का एक विशिष्ट स्थान हमेशा से रहा है। यह लोकनृत्य और इसमें प्रयुक्त किये जाने वाले गीत-संगीत-हावभाव आदि का मराठी फ़िल्मों में हमेशा से प्रमुख स्थान रहा है। बीते कुछ वर्षों में हिन्दी फ़िल्मों के बढ़ते प्रभाव, फ़िल्मों के कथानक का “कमाई” के अनुसार बाज़ारीकरण, तथा मराठी फ़िल्मों में भी पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते असर की वजह से अव्वल तो ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनने वाली फ़िल्में ही कम हो गईं और उसमें भी लावणी और तमाशा के गीत तथा दृश्य मृतप्राय हो गये थे।

महाराष्ट्र के लोगों में नाटक-कला-संस्कृति-फ़िल्में-गायन-वादन-खेल आदि की परम्परा सदा से ही पुष्ट रही है। इसमें भी “नाटक” और “गायन” प्रत्येक मराठी के दिल में बसता है, और यदि संगीत-नाटक (जिसमें कहानी के साथ गीत भी शामिल होते हैं) हो तो क्या कहने। बदलते आधुनिक युग के साथ महाराष्ट्र के ग्रामीण भागों में भी लावणी-तमाशा की परम्परा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। अलबत्ता मुम्बई जैसे महानगर अथवा नासिक, पुणे, औरंगाबाद, सोलापुर, कोल्हापुर आदि शहरों में अच्छे नाटकों के शो आज भी हाउसफ़ुल जाते हैं।

1 जनवरी 2010 को महाराष्ट्र की इस विशिष्ट परम्परा को पुनर्जीवित करने का प्रयास करते हुए एक फ़िल्म प्रदर्शित हुई है, नाम है “नटरंग”, रिलीज़ होने से पहले ही इसका संगीत बेहद लोकप्रिय हो चुका था और रिलीज़ होने के बाद इस फ़िल्म ने पूरे महाराष्ट्र में धूम मचा रखी है। जी टॉकीज़ द्वारा निर्मित यह फ़िल्म प्रख्यात मराठी लेखक और महाराष्ट्र साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष आनन्द यादव के उपन्यास पर आधारित है और इसमें मुख्य भूमिका निभाई है “अतुल कुलकर्णी” ने। अतुल कुलकर्णी को हिन्दी के दर्शक, – हे-राम, पेज 3, चांदनी बार, रंग दे बसन्ती, ये है इंडिया, जेल आदि फ़िल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में देख चुके हैं।

 दो साल पहले जब इस फ़िल्म के उपन्यास पर आधारित पटकथा जी टॉकीज़ वालों को सुनाई गई थी, उस समय इसकी कहानी के फ़िल्म बनने पर “कमाऊ” होने में निश्चित रूप से संशय था, क्योंकि लावणी-तमाशे की मुख्य पृष्ठभूमि पर आधारित ग्रामीण कहानी पर फ़िल्म बनाना एक बड़ा जोखिम था, लेकिन जी टॉकीज़ वालों ने निर्देशक की मदद की और यह बेहतरीन फ़िल्म परदे पर उतरी। रही-सही कसर अतुल कुलकर्णी जैसे “प्रोफ़ेशन” के प्रति समर्पित उम्दा कलाकार ने पूरी कर दी।

हिन्दी के दर्शक अतुल के बारे में अधिक नहीं जानते होंगे, लेकिन मराठी से आये हुए अधिकतर कलाकार चाहे वह रीमा लागू हों, डॉ श्रीराम लागू हों, नाना पाटेकर, अमोल पालेकर, मधुर भण्डारकर या महेश मांजरेकर कोई भी हों… सामान्यतः नाटक और मंच की परम्परा के जरिये ही आते हैं इसलिये फ़िल्म निर्देशक का काम वैसे ही आसान हो जाता है। हिन्दी में भी परेश रावल, सतीश शाह, पंकज कपूर, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी आदि मंजे हुए कलाकार नाटक मंच के जरिये ही आये हैं। बात हो रही थी अतुल कुलकर्णी की, इस फ़िल्म की पटकथा और कहानी से वे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने सात महीने की एकमुश्त डेट्स निर्देशक को दे दीं, तथा इस बीच अपने रोल के साथ पूरा न्याय करने के लिये उन्होंने मणिरत्नम, विशाल भारद्वाज और रामगोपाल वर्मा जैसे दिग्गजों को नई कहानी या पटकथा सुनाने-सुनने से मना कर दिया।

इस फ़िल्म में अतुल कुलकर्णी का रोल इंटरवल के पहले एक पहलवान का है, जबकि इंटरवल के बाद तमाशा में नृत्य करने वाले एक हिजड़ानुमा स्त्री पात्र का है, जिसे “तमाशा” में मुख्य स्त्री पात्र का सहायक अथवा “नाच्या” कहा जाता है। फ़िल्म में पहलवान दिखने के लिये पहले दुबले-पतले अतुल कुलकर्णी ने अपना वज़न बढ़ाकर 85 किलो किया और जिम में जमकर पसीना बहाया। फ़िर दो माह के भीतर ही भूमिका की मांग के अनुसार इंटरवल के बाद “स्त्री रूपी हिजड़ा” बनने के लिये अपना वज़न 20 किलो घटाया। सिर्फ़ तीन माह के अन्तराल में अपने शरीर के साथ इस तरह का खतरनाक खिलवाड़ निश्चित रूप से उनके लिये जानलेवा साबित हो सकता था, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फ़िजिकल ट्रेनर शैलेष परुलेकर की मदद से यह कठिन काम भी उन्होंने पूरा कर दिखाया।

अतुल कुलकर्णी ने 30 वर्ष की आयु में 1995 में नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से कोर्स पूरा किया, उसी के बाद उन्होंने अभिनय को अपना प्रोफ़ेशन बनाना निश्चित कर लिया। अतुल कुलकर्णी ने अब तक 4 भाषाओं में आठ नाटक, 6 भाषाओं में छब्बीस फ़िल्में की हैं तथा उन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। उनका कहना है कि फ़िल्म की भाषा क्या है, अथवा निर्देशक कौन है इसकी बजाय कहानी और पटकथा के आधार पर ही वे फ़िल्म करना है या नहीं यह निश्चित करते हैं, मुझे अधिक फ़िल्में करने में कोई रुचि नहीं है, अच्छी फ़िल्में और रोल मिलते रहें बस… बाकी रोजी-रोटी के लिये नाटक तो है ही…”।

अब थोड़ा सा इस अदभुत फ़िल्म की कहानी के बारे में…

फ़िल्म का मुख्य पात्र गुणा कागलकर अर्थात अतुल एक ग्रामीण खेत मजदूर हैं। गुणाजी को सिर्फ़ दो ही शौक हैं, पहलवानी करना और तमाशा-लावणी देखना, उसके मन में एक दबी हुई इच्छा भी है कि वह अपनी खुद की नाटक-तमाशा कम्पनी शुरु करे, उसमें स्वयं एक राजा की भूमिका करे तथा विलुप्त होती जा रही लावणी कला को उसके शिखर पर स्थापित करे। ग्रामीण पृष्ठभूमि और सुविधाओं के अभाव में उसका संघर्ष जारी रहता है, वह धीरे-धीरे गाँव के कुछ अन्य नाटकप्रेमी लोगों को एकत्रित करके एक ग्रुप बनाता है जिसमें लावणी नृत्य पेश किया जाना है। उसे हीरोइन भी मिल जाती है, जो उसे भी नृत्य सिखाती है। इन सबके बीच समस्या तब आन खड़ी होती है, जब “नाच्या” (स्त्री रूपी मजाकिया हिजड़े) की भूमिका के लिये कोई कलाकार ही नहीं मिलता, लेकिन गुणाजी पर नाटक कम्पनी खड़ी करने और अपनी कला प्रदर्शित करने का जुनून कुछ ऐसा होता है कि वह मजबूरी में खुद ही “नाच्या” बनने को तैयार हो जाता है। उसके इस निर्णय से उसकी पत्नी बेहद खफ़ा होती है और उनमें विवाद शुरु हो जाते हैं, उस पर गाँव की भीतरी राजनीति में नाटक की हीरोइन तो “जेण्डर बायस” की शिकार होती है साथ ही साथ हिजड़े की भूमिका निभाने के लिये गुणाजी को भी गाँव में हँसी का पात्र बनना पड़ता है। कहाँ तो गुणाजी अपने तमाशे में एक “विशालकाय मजबूत राजा” का किरदार निभाना चाहता है, लेकिन बदकिस्मती से उसे साड़ी-बिन्दी लगाकर एक नचैया की भूमिका करना पड़ती है…नाटक के अपने शौक और अपनी लावणी कम्पनी शुरु करने की खातिर वह ऐसा भी करता है। बहरहाल तमाम संघर्षों, पक्षपात, खिल्ली, धनाभाव, अपने परिवार की टूट के बावजूद गुणाजी अन्ततः अपने उद्देश्य में सफ़ल होता है और उसकी नाटक कम्पनी सफ़लता से शुरु हो जाती है, लेकिन उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली जाती है। (अतुल कुलकर्णी की हिजड़ानुमा औरत वाली भूमिका की तस्वीर जानबूझकर नहीं दे रहा हूं, क्योंकि वह देखने और अनुभव करने की बात है)

मराठी नाटकों की सौ वर्ष से भी पुरानी समृद्ध नाट्य परम्परा में लावणी-तमाशा में “नाच्या” की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यह नाच्या कभी कहानी को आगे बढ़ाने के काम आता है, कभी सूत्रधार, कभी विदूषक तो कभी नर्तक बन जाता है। इस तरह नृत्य करने वाली मुख्य नृत्यांगना के साथ ही इसका रोल भी जरूरी होता है, लेकिन जैसा कि हमारे समाज में होता आया है, “थर्ड जेण्डर” अर्थात हिजड़ों के साथ अन्याय, उपेक्षा और हँसी उड़ाने का भाव सदा मौजूद होता है, वैसा नाच्या के साथ भी जेण्डर बायस किया जाता है, जबकि अधिकतर तमाशों में यह भूमिका पुरुष ही निभाते आये हैं। मराठी नाटकों में पुरुषों द्वारा स्त्री की भूमिका बाळ गन्धर्व के ज़माने से चली आ रही है, कई-कई नाटकों में पुरुषों ने स्त्री की भूमिका बगैर किसी फ़ूहड़पन के इतने उम्दा तरीके से निभाई है कि नाटक देखते वक्त कोई जान नहीं सकता कि वह कलाकार पुरुष है। ऐसे ही एक महान मराठी कलाकार थे गणपत पाटील, जिन्होंने बहुत सारी फ़िल्मों में “नाच्या” की भूमिका अदा की, और उनके अभिनय में इतना दम था तथा उनकी भूमिकाएं इतनी जोरदार थीं कि नाटक-फ़िल्मों के बाहर की दुनिया में भी उनके बच्चों को भी लोग उनका बच्चा मानने को तैयार नहीं होते थे, अर्थात जैसी छवि हिन्दी फ़िल्मों में प्राण अथवा रंजीत की है कि ये लोग बुरे व्यक्ति ही हैं, ठीक वैसी ही छवि गणपत पाटील की हिजड़े के रूप में तथा निळू फ़ुले की “खराब आदमी” के रूप में मराठी में प्रचलित है।

मराठी नाटकों की समृद्ध परम्परा की बात निकली है तो एक उल्लेख करना चाहूंगा कि मराठी फ़िल्मों के स्टार प्रशांत दामले 1983 से अब तक नाटकों के 8000 “व्यावसायिक” शो कर चुके हैं तथा एक ही दिन में 3 विभिन्न नाटकों के 5 शो हाउसफ़ुल करने के लिये लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में उनका नाम  दर्ज है…।

चलते-चलते :-

उज्जैन में प्रतिवर्ष सरकारी खर्च और प्रचार पर कालिदास समारोह आयोजित किया जाता है, जिसमें संस्कृत और हिन्दी के नाटक खेले जाते हैं, लेकिन सारे तामझाम के बावजूद कई बार 100 दर्शक भी नहीं जुट पाते, जो दर्शक इन हिन्दी नाटकों में पाये जाते हैं, उनमें से कुछ सरकारी अधिकारी होते हैं जिनकी वहां उपस्थिति “ड्यूटी” का एक भाग है, कुछ अखबारों के कथित समीक्षक, तथा कुछ आसपास घूमने वाले अथवा टेण्ट हाउस वाले दिखाई देते हैं। जबकि इसी उज्जैन में जब महाराष्ट्र समाज द्वारा मराठी नाटक मुम्बई अथवा इन्दौर से बुलवाया जाता है, तब बाकायदा “टिकिट लेकर” देखने वाले 500 लोग भी आराम से मिल जाते हैं।

फ़िल्म रिलीज़ के मौके पर मंच पर प्रस्तुत इस फ़िल्म का एक गीत यहाँ देखा जा सकता है…

http://www.youtube.com/watch?v=79xzHDM11eQ

तथा “नटरंग” फ़िल्म का ट्रेलर यहाँ देखा जा सकता है…

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26 Comments

  1. January 13, 2010 at 7:33 am

    बहुत ही अच्छी जानकारी दी है आपने सुरेश जी!"लावणी" और "तमाशा" के महाराष्ट्र तक ही सीमित होने के कारण बहुत कम लोग ही इनके विषय में जानत हैं। मराठी नाट्यमंच हमेशा से ही समृद्ध रही है।पता नहीं क्यों हिन्दीभाषी लोगों का झुकाव नाटक में बहुत ही कम है। बहुत ही खेद की बात है कि यदि किसी नाटक का मंचन होता भी है तो दर्शक नहीं मिल पाते। मुझे याद है कि सन् 1973-74 में अमोल पालेकर जी के विवादित नाटक "वासनाकांड" ने अनेक स्थानों में सराहना पाई थी किन्तु रायपुर में उसी नाटक को पर्याप्त दर्शक नहीं मिल पाये थै।रायपुर में तो नाट्यों का मंचन बहुत ही कम होता है और होता है तो प्रायः महाराष्ट्र मंडल के द्वारा ही होता है।

  2. January 13, 2010 at 7:49 am

    वाकई अद्भुत !!शायद अतुल जैसे समर्पित लोगों के ही कारण मराठी नाट्यकला आज सम्रद्ध है. ..वरना हिंदी नाटकों की दशा तो जगजाहिर है!!!

  3. January 13, 2010 at 7:52 am

    वाह! जी वाह. एक सुन्दर पोस्ट. लगता है मराठी फिल्म देखनी पड़ेगी. समझ कितनी आएगी यह अलग बात है.

  4. January 13, 2010 at 8:04 am

    बेंगाणी जी, अवश्य देखिये… मराठी समझना बेहद आसान है… गुजराती,पंजाबी, भोजपुरी, मैथिली अथवा हरियाणवी की तरह 🙂 🙂 दिक्कत सिर्फ़ दक्षिण की चारों द्रविड भाषाएं समझने में होती है…

  5. SANJAY KUMAR said,

    January 13, 2010 at 8:47 am

    DIKKAT TO DRAVID BHASHAON KO BHI SIKHANE MEIN NAHI HAI.SIKHANE KI NEEYAT HONI CHAHIYE

  6. January 13, 2010 at 9:04 am

    अतुल जी को कई फिल्‍मो मे काम करते देख है, अच्‍छा अभिनय है जैसा कि आपने इस पोस्‍ट मे लिखा है इस फिल्‍म को देखने की इच्‍छा है, पता नही उत्तर भारत मे इसकी प्रति उपलब्‍घ होगी भी कि नही? समझने मे थोड़ी दिक्‍कत आयेगी, पर अम्‍मा जी की मदद काम कर जायेगी।

  7. SHASHI SINGH said,

    January 13, 2010 at 9:22 am

    बहुत खूब… इस सप्ताहांत जरूर देखी जायेगी।

  8. January 13, 2010 at 9:44 am

    संजय कुमारजी से सहमत. जब दक्षिण की भाषाएं सुनता हूँ तो लगता है वे संस्कृत के कितने निकट है, हिन्दी भ्रष्ट हुई जान पड़ती है.

  9. rohit said,

    January 13, 2010 at 10:04 am

    आपने फिर एक अनछुए विषय को चुना है . तमाशा हो या लावणी या उत्तर भारत की नौटंकी इन सभी को देखने को जो मजा आता है उसका आप शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते . मैंने आल्हा भी सुना है जिसमे वीर रस का आप सचमुच अनुभव करते है 'आल्हा उदल बड़े लडिया इनकी मार सही ना जाए ' मल्हा मराठी माहेती. शायद ज्यादा नहीं पर थोडा थोडा जनता हूँ कन्नड़ भी जानता हूँ थोड़ी थोड़ी. और यार सही बात तो यह है की मैं किसी भी भाषा की फिल्म देखा सकता हूँ अगर वोह अच्छी है तो. यह फिल्म अगर मिली तो जरुर देखि जाएगी . वैसे जाणता राजा भी देखा है

  10. January 13, 2010 at 11:20 am

    वाह! बहुत सुंदर पोस्ट…..

  11. January 13, 2010 at 12:43 pm

    बहुत खूब.. क्या सुन्दर पोस्ट लगाई है आपने। बधाई।यूट्यूब पर थोड़ा समय बिताया जाये तो मराठी नाट्य संगीत के एक से एक मधुर गीत देखे-सुने जा सकते हैं। अभी कुछ ही दिनों पहले मैने गीतों की महफिल में मराठी नाट्य संगीत का एक बहुत ही सुन्दर गीत पोस्ट किया था। यह अलग बात है ज्यादातर लोगों ने उस पोस्ट को देखा ही नहीं। उस दिन बड़ी निराशा हुई थी। खैर… मैं आज उस पोस्ट के लिंक को यहाँ फिर से लगा देता हूं, शायद कोई मित्र सुनने से रह गया हो तो। उगवला चंद्र पुनवेचा: मराठी नाट्य संगीत का एक दुर्लभ गीत

  12. RAJ SINH said,

    January 13, 2010 at 1:27 pm

    भाऊ,खूब खूब आभार !भाग्यशाली हूँ .मराठी सीखी नहीं .होश संभालते खुद को बोलते पाया .पूरबी हिन्दी भाषी परिवार , तो अवधी हिन्दी भी साथ साथ बढीं.आगे चलकर थोडा सा मराठी मंच से और खाश कर लोकमंच से भी कुछ जुड़ा ……..मुंबई से न्यू योर्क टोरंटो तक . गुजराती ,बंगला भी जानी और मंच ,फिल्म का दर्शक भी रहा .यह सब रस आस्वादन भाग्य और आनंद रहा .आप समझ सकते हैं इस चर्चित फिल्म का आनंद और इसी लिए इतनी सजीव और जीवंत समीक्स्छा का रसास्वादन सब पा रहे हैं .एक टिप्पणी में ' आल्हा ' के बारे में लिखा है . उसके मराठी समकक्स लोक विधा ' पोआड़ा ' के बारे में भी हिन्दी पाठकों को बताएं ' ही विनंती ' .सोच सकता हूँ की इस वीर रस विधा पर आपसे बढ़िया कौन भला सुना सकेगा क्योंकि आपकी लेखनी की ' धार ' से वाकिफ हूँ 🙂 .

  13. January 13, 2010 at 4:41 pm

    हम तो बचपन से ही मराठी भाषी मोहल्ले में रहे हैं और अब महाराष्ट्र में रहते हैं इसलिये मराठी को अच्छॆ से समझ पाते हैं। परंतु हाँ बोलना थोड़ा दुश्कर कार्य है हमारे लिये। कालिदास समारोह में १०० दर्शन भी न आना यह नहीं दर्शाता है कि समारोह में दम नहीं है, बल्कि सत्य बात तो यह है कि जो नाटक और नृत्य नाटिकाएँ कालिदास के ऊपर वहाँ अभिनय की जाती हैं वह दर्शकों के ऊपर से निकल जाती हैं, बुद्धिजीवी वर्ग के लिये तो यह कुँभ होता है, आप चाहें तो वहाँ जाकर दर्शक वर्ग को देखकर ही अंदाजा लगा सकते हैं, इसके लिये जरुरी है दर्शक वर्ग के अंदर ऐसी नृत्य नाटिकाओं और नाटकों की चाहत पैदा करना, क्योंकि हमारे दर्शक तो केवल वही देखना चाहते हैं जो कि टीवी पर दिखाया जाता है, या फ़िर जो वे देखना चाहते हैं वही देखते हैं। आप कभी दिल्ली में इन नृत्य नाटिकाओं या नाटक के दर्शकों के देखेंगे तो पायेंगे कि ऑडिटोरियम में बैठने के लिये जगह भी नहीं मिलेगी। यह केवल दर्शकों के ऊपर है, और यह हमारा दुर्भाग्य है कि उज्जैन मॆं ऐसे दर्शकों की कमी है।दर्शकों के कारण ही हमारा उज्जैन का प्रसिद्ध "माच" भी लुप्त होता जा रहा है। और माच कलाकारों को कोई प्रोत्साहन न मिलने के कारण उनकी भी रुचि खत्म होती जा रही है।सुरेश जी, कृप्या माच के बारे में भी कभी लिखें, यह उज्जैन की प्रसिद्ध गायन शैली है, यह तीजनबाई वाली शैली से जुदा है और इसके शायद अब उज्जैन में केवल १० या उससे भी कम कलाकार हैं।

  14. January 13, 2010 at 4:44 pm

    यहाँ मेरी टिप्पणी में मेरा दर्द है क्योंकि मैं कभी कालिदास समारोह और कालिदास अकादमी से आत्मा से जुड़ा था।

  15. SP Dubey said,

    January 13, 2010 at 5:48 pm

    जब जब कला को समर्पित कलाकार मिलते है तब तब कला और कलाकार का मान बढा है और जनसमाज का भी स्तर ऊचा उठा है, इस पोस्ट के द्वारा आपने भी वही कार्य किया है जोकि प्रशंसनीय है और आप उसके पात्र है।धन्यवाद

  16. January 13, 2010 at 6:44 pm

    मस्त पैकी लेख लिहिला आहे तुम्ही.काश , इन्दौर में ये फ़िल्म कब देखने को मिलेगी?

  17. January 13, 2010 at 8:42 pm

    छाण लिहिले भाऊ अगदी छाण्।

  18. January 13, 2010 at 9:52 pm

    लावणी और मराठी नाट्य परम्परा लोक जीवन से जुडी हैं – लोक जीवन के प्राण हैं ये विधा जैसे गुजरात के हर प्रांत में किया जानेवाला कृषक स्त्रियों का गरबा जिसमे माँ अम्बा की आराधना की जाती है ..सुन्दर रिपोर्ट और नटरंग के बारे में जानकार हर्ष हुआ – लावण्य

  19. January 13, 2010 at 11:24 pm

    जिसने गम से बेरूखी की है , उस ने , तौहीने , जिंदगी की है ! भूख में खा गया ज़हर इंसा , लोग कहते हैं , खुदकुशी की है ! I read this Sher — written by : बुन्दू शाह [ उस्ताद बुनियाद अली ] It is Sung As a लावणी which is an age old Song & Dance Art Form

  20. K. D. Kash said,

    January 14, 2010 at 5:47 am

    आयला पिक्चर तर बघितलाच पाहिजे. पण महाराष्ट्रात इतर भाषिक मित्र सुद्धा हा पिक्चर बघण्याचे प्लॅन करत आहेत. इतक्या वर्षात मराठी सिनेमा बघायला प्रेक्षक मिळत नव्हते पण ह्या २ वर्षातील प्रगती बघता मराठी सिनेमाला चांगले दिवस येत आहेत असे वाटते. लेख उत्तम झाला आहे

  21. January 14, 2010 at 6:02 am

    सुरेश भाऊ, अस वाटतं फक्त प्रादेशिक फ़िल्मा मदीच कला जीवंत आहे.अतुल खूपच पुढ़े जाणार. यांचा समर्पण भाव बरं वाटल,माझी शुभेच्छा

  22. January 14, 2010 at 2:07 pm

    सारी देसी कलायें लुप्त होती जा रही हैं. लोग अपनी जड़ों से दूर हो रहे हैं और जड़ों से दूर होकर कोई कितने दिन जीवित रह सकता है.

  23. the said,

    January 15, 2010 at 9:59 am

    संजय कुमार और बेंगाणी जी से पूरी तरह सहमत हूं. मैंने टीवी पर मलयालम सुनी है और सच तो यह है कि मलयालम में जितने संस्कृत के परिचित शब्द सुनाई देते हैं, उतने तो अब हिंदी में भी नहीं रह गए हैं. "आम बोलचाल" के चक्कर में मीडिया और फ़िल्म वाले भी हिंदी के फ़ारसीकरण में जी-जान से जुटे हैं. यहां मैं फ़ारसी-अरबी के शब्दों पर नहीं, उनकी जो अति हो रही है, उस पर टिप्पणी कर रह हूं. तनिक सोचिए, अपने मूल "संस्कृत" से कटकर हिंदी कितने दिन तक फल-फूल पाएगी? और अगर किसी तरह घिसट भी गई, तो क्या वह सच्चे अर्थों में हिंदी रह जाएगी?

  24. January 15, 2010 at 10:42 am

    Aapne to aise vivechit kiya hai ki film ka naam sarralta se vismrit ho hi nahi payega…Awashy hi prayaas karungi,ise dekhne ki…Atul kulkarni ki to yun bhi main jabardast prashanshak hun…Bahut hi achchi post ….. aabhar aapka…

  25. January 15, 2010 at 11:57 am

    अपनी परंपरा व संस्कृति को अक्षुण्ण रखने में महाराष्ट्र अग्रणी है. आपका आलेख उसे और परिवर्धित कर रहा है…. 🙂

  26. January 18, 2010 at 7:55 pm

    भाऊ छान लिहले..चांगली माहिती..


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