टाइम्स ऑफ़ इंडिया और जंग द्वारा “अमन की आशा” क्या है? – धंधेबाजी, मूर्खता या शतुरमुर्गी रवैया?… Aman ki Asha, Times of India, Jung, India-Pakistan

अंग्रेजों के नववर्ष के दिन अर्थात 1 जनवरी 2010 से भारत के टाइम्स समूह तथा पाकिस्तान के अखबार “जंग” ने एक तथाकथित शांति मुहिम की शुरुआत के तहत “अमन की आशा” के नाम से एक अभियान छेड़ा है। इसके उद्देश्यों की फ़ेहरिस्त में, भारत और पाकिस्तान के बीच मैत्रीपूर्ण एकता स्थापित करना, दोनों देशों की जनता के बीच मधुर सम्बन्ध बनाना तथा आतंकवाद का मिलजुलकर मुकाबला करने जैसी “महान रोमांटिक” किस्म की लफ़्फ़ाजियाँ शामिल हैं। इन अखबारों के इस “पुरस्कार-जुगाड़ू” काम में इनकी मदद करने के लिये कुछ सेलेब्रिटी (बल्कि इन्हें “नॉस्टैल्जिक” कहना ज्यादा उचित है) नाम भी सदा की तरह शामिल हैं, जैसे कुलदीप नैयर, अमिताभ बच्चन, महेश भट्ट, सलमान हैदर तथा गुलज़ार आदि… और हाँ… यासीन मलिक जैसे सेकुलरों के “कृपापात्र” आतंकवादी भी

पाकिस्तान में जो हैसियत, इज़्ज़त और छवि कराची से निकलने वाले “डॉन” अखबार की है उसके मुकाबले टाइम्स समूह ने “जंग” जैसे अखबार से हाथ मिलाने का फ़ैसला क्यों किया, सबसे पहला सवाल तो यही उठाया जा रहा है। संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि जंग अखबार के मालिकान की विवादास्पद भूमिका और उनके धनलोलुप होने की वजह से ही इस गठबंधन ने आकार लिया है और “धंधेबाजी” का शक यहीं से गहराना शुरु हो जाता है, क्योंकि इस अभियान की शुरुआत ही इस बात से हुई है कि भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापार की क्या संभावनाएं हैं, इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है, इसमें और किन क्षेत्रों को शामिल किया जा सकता है… आदि-आदि।

ऊपर नामित महान नॉस्टेल्जिक लोगों और टाइम्स ने कभी इस मामूली बात पर गौर किया है कि 1947 में एक साथ आज़ाद होने के बावजूद आज पाकिस्तान कहाँ रह गया और भारत कहाँ पहुँच गया है, तो उसका कारण क्या है? कारण साफ़ है कि पाकिस्तान का गठन इस्लाम के नाम पर हुआ है और वहाँ कभी लोकतन्त्र नहीं पनप सका, लेकिन सावन के अंधों को अब भी हरा ही हरा सूझ रहा है और ये लोग इस उम्मीद में अपना सिर पत्थर से फ़ोड़ रहे हैं कि शायद पत्थर टूट जाये। क्या कभी इन्होंने सोचा है कि विश्व भर के तमाम आतंकवादी अपनी सबसे सुरक्षित पनाहगाह पाकिस्तान को क्यों मानते हैं? क्योंकि उन आतंकवादियों जैसी मानसिकता वाले लाखों लोग वहाँ उन्हें “पारिवारिक” वातावरण मुहैया करवाते हैं, क्योंकि पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था में ही दो-दो पीढ़ियों में “भारत से घृणा करो” का भाव फ़ैलाया गया है, क्या ऐसे लोगों से स्वस्थ दोस्ती सम्भव हो सकती है? कभी नहीं। लेकिन ये आसान सी बात स्वप्नदर्शियों को समझाये कौन?

ऐसे में शक होना स्वाभाविक है कि टाइम्स और जंग द्वारा “भारत-पाक भाई-भाई” (http://timesofindia.indiatimes.com/amankiasha.cms) का रोमांटिक नारा लगाने के पीछे आखिर कौन सी चाल है? शान्ति के पक्ष में जैसे कसीदे टाइम्स ने भारत की तरफ़ से काढ़े हैं, वैसे ही कसीदे जंग ने उधर पाकिस्तान में क्यों नहीं काढ़े? क्या यहाँ भी बांग्लादेशी भिखारियों को 4500 करोड़ का अनुदान देने जैसा एकतरफ़ा “संतत्व” का भाव है… या कश्मीर के मामले पर अन्दर ही अन्दर कोई खिचड़ी पक रही है, जिसकी परिणति शर्म-अल-शेख जैसे किसी शर्मनाक हाथ मिलाने के रूप में होगी? या फ़िर दोनों अखबार मिलकर, कहीं से किसी अन्तर्राष्ट्रीय “फ़ण्ड” या पुरस्कार की व्यवस्था में तो नहीं लगे हैं? पान, चावल, शकर और आलू निर्यात व्यापारियों की लॉबी तो इसमें प्रमुख भूमिका नहीं निभा रही? फ़िल्म वालों के जुड़ने की वजह से यह बॉलीवुड इंडस्ट्री द्वारा अपना व्यवसाय पाकिस्तान में मजबूत करने की भी जुगाड़ नज़र आती है…। यह सारी शंकाएं-कुशंकाएं इसीलिये हैं कि भारतीय हो या पाकिस्तानी, जब फ़ायदा, धंधा, लाभ, पैसे का गणित जैसी बात सामने आती है तब राष्ट्र-गौरव, स्वाभिमान जैसी बातें (जो कभीकभार 15 अगस्त वगैरह को झाड़-पोंछकर बाहर निकाली जाती हैं), तुरन्त “पैरपोंछ” के नीचे सरका दी जाती हैं, और हें-हें-हें-हें करते हुए दाँत निपोरकर पाकिस्तान तो क्या, ये लोग लादेन से भी हाथ मिलाने में संकोच नहीं करेंगे, इसलिये इन दोनों अखबारों की गतिविधियों पर बारीक नज़र रखने की जरूरत तो है ही, “तथाकथित शान्ति” के इस “बड़े खेल” में परदे के पीछे से इन दोनों के कान में फ़ुसफ़ुसाने वाली “ताकत” कौन सी है, यह अभी पहचानना बाकी है। अधिक अफ़सोसनाक इसलिये भी है कि यह तमाशा तब हो रहा है जब कश्मीरी पंडितों को “घाटी से निकल जाओ और अपनी औरतों को यहीं छोड़ जाओ” का फ़रमान सुनाने के बीस वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन चूंकि कश्मीरी पंडित कोई “फ़िलीस्तीनी मुसलमान” तो हैं नहीं इसलिये इस महान “सेकुलर” देश में ही पराये हैं।

शक का आधार मजबूत है, क्योंकि यह एक नितांत हवाई कवायद है, इसमें फ़िलहाल भारत सरकार और इसके आधिकारिक संगठन खुले रूप में कहीं भी तस्वीर में नहीं हैं। पाकिस्तान, उसके इतिहास और वहाँ की सरकारों द्वारा किये वादों से मुकरने का एक कटु अनुभव हमारे साथ है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया वाले पाकिस्तान से यह पुरानी बात क्यों नहीं पूछते कि विभाजन के समय जो करोड़ों का ॠण (अब ब्याज मिलाकर अरबों का हो गया है) वह पाकिस्तान कब लौटाने वाला है? या फ़िर एकदम ताजी बात, कि 26/11 के हमले के बाद पाकिस्तान ने कोई ठोस कदम उठाकर किसी आतंकवादी को गिरफ़्तार क्यों नहीं किया? लेकिन मेहमानों से असुविधाजनक सवाल पूछने की परम्परा हमारे यहाँ कभी रही नहीं, उन्हें बिरयानी-मटन खिलाने की जरूर रही है। अब भारत के “गीली मिट्टी” के मंत्री, हवाई जहाज के अपहरण करने पर मौत की सजा के प्रावधान की दिखावटी और भोंदू किस्म की बातें कर रहे हैं, जबकि जिसे सुप्रीम कोर्ट मौत की सजा दे चुका है उसे तो फ़ाँसी देने की हिम्मत हो नहीं रही… (अब तो कसाब को बचाने के लिये भी कुछ “कुख्यात बुद्धिजीवी” आगे आने लगे हैं), उधर ये दोनों धंधेबाज अखबार उपदेश झाड़ने, एकता के गीत गाने और नॉस्टेल्जिक लोगों के सहारे बासी कढ़ी में उबाल लाने की कोशिशों में लगे हैं। वे बतायें कि पिछले एक साल में पाकिस्तान की मानसिकता में ऐसा क्या बदलाव आ गया है जो हम हाथ बढ़ाने के लिये मरे जायें।

अमन की आशा कम से कम भारत में तो काफ़ी लोगों को सदा से रही है, पाकिस्तान के लोगों से अच्छे सम्बन्ध बनें इसकी भी चाहत है, लेकिन यदि पिछले 60 साल में गंगा और चिनाब में बहे पानी को भूल भी जायें तब भी पिछले एकाध-दो साल में ही इतना कुछ हो चुका है कि भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की बात करना लगभग “थूक कर चाटने” जैसा मामला बन चुका है।

हमारी पिलपिलाई हुई विदेश नीति तो ऐसी है कि मुम्बई हमले के बाद, 40 आतंकवादियों की लिस्ट से शुरु करके धीरे से 20 पर आ गये, फ़िर “सैम अंकल” के कहने पर सिर्फ़ एक लखवी पर आ गये और अब तो अमेरिका की शह पर पाकिस्तान खुलेआम कह रहा है कि किसी को भारत को सौंपने का सवाल ही नहीं है… सोच-सोचकर हैरत होती है कि वे लोग कितने मूर्ख होंगे जो यह सोचते हैं कि पाकिस्तान कभी भारत का दोस्त भी बन सकता है। जिस देश का विभाजन/गठन ही धार्मिक आधार पर हुआ, जिसके मदरसों में कट्टर इस्लामिक शिक्षा दी जाती हो, जो देश भारत के हाथों चार-चार बार पिट चुका हो, जिसके दो टुकड़े हमने किये हों… क्या ऐसा देश कभी हमारा दोस्त हो सकता है? दोनों जर्मनी एकत्रित हो सकते हैं, दोनो कोरिया आपस में दोस्त बन सकते हैं, लेकिन हमसे बार-बार पिटा हुआ एक ऐसा देश जिसकी बुनियाद इस्लाम के नाम पर रखी गई है… वह कभी भी “मूर्तिपूजकों के देश” का सच्चा दोस्त नहीं बन सकता, कभी न कभी पीठ में छुरा घोंपेगा जरूर…। लेकिन इतनी सी बात भी उच्च स्तर पर बैठे लोगों को समझ में नहीं आती?… तरस आता है…

चलते-चलते इस लिंक पर एक निगाह अवश्य डालियेगा http://www.indianexpress.com/news/man-moves-hc-to-get-back-wife/563838/ जो साफ़ तौर पर रजनीश-अमीना यूसुफ़ जैसा ही मामला नज़र आ रहा है… टाइम्स वाले बतायें कि ऐसी मानसिकता वाले लोगों से आप “अमन की आशा” की उम्मीद रखे हुए हैं? रिज़वान मामले पर रो-रोकर अपने कपड़े फ़ाड़ने वाले देश के नामचीन “सेकुलर पत्रकार”(?) रजनीश मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं, यदि वाकई मर्द हैं तो अमन की आशा के अलावा कभी “आशीष की आयशा” जैसा नारा भी लगाकर तो दिखायें…, कश्मीर की असली “मानसिकता” को समझें और पाकिस्तान नामक “खजेले कुत्ते” से दोस्ती का ढोंग-ढकोसला छोड़ें…”धंधा” ही करना है तो उसके लिये सारी दुनिया पड़ी है… कभी स्वाभिमान भी तो दिखाओ।

विषय से सम्बन्धित कुछ लेख अवश्य देखें ताकि आपको पाकिस्तान (और वहाँ की मानसिकता) की सही जानकारी मिल सके…

1) http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/06/jamat-e-islami-pakistan-talibani-plans_09.html

2) http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/03/pakistan-education-system-indian_17.html

3) http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/08/secular-intellectuals-terrorism-nation.html

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40 Comments

  1. January 20, 2010 at 7:05 am

    टाइम्स ऑफ़ इंडिया इस तरह की लफ्फाजियां आये दिन करता रहता है. इसमें कुछ भी नया नहीं है. नेता बनाने की एक कवायद शुरू की थी. अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन उसमें भी शामिल थे. उनसे विज्ञापन करवाया गया. गुलज़ार साहब से गीत लिखवाया गया. उन्होंने लिखा भी कि; "भारत उम्मीद से है." उम्मीद-सुम्मीद पता नहीं कहाँ चली गई. उसके बाद इस अखबार ने बच्चों को पढ़ाने का ढोल बजाना शुरू किया. उसके बाद अब 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' को फिर से पेश करने का धंधा शुरू किया है. अब अमन की आशा का ढोल बजा रहे हैं. कुछ नहीं होना-जाना इस तरह की लफ्फाजियों से. ऐसा पहले भी हो चुका है. तब आसमा जहाँगीर, खुशवंत सिंह और जावेद अख्तर रोज टीवी पर दिखाई देते थे. ये सब न्यूज़ में बने रहने का तरीका है. जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि इस अखबार समूह से बड़ा देशभक्त और अमन-परस्त कोई और नहीं है.चार दिन ढोल बजायेंगे. पैसे कमाएंगे. फिर सब भूल जायेंगे. इन्हें व्यावहारिक सोच रखने वाला भारतीय कभी सीरियसली नहीं लेता. ज़रुरत भी नहीं है.

  2. January 20, 2010 at 7:09 am

    यह राग अगले कसाब के लिए भारत में घुसने का रास्ता बनने तक चलेगा. चूंकि कश्मीरी पंडित कोई “फ़िलीस्तीनी मुसलमान” तो हैं नहीं. उन्हें इजराईली बनने से किसने रोका है? इसके लिए जिगर चाहिए सा'ब.

  3. January 20, 2010 at 7:41 am

    मुगेरियों को तो सपने देखने की आदत होती हैं। वो तो दिन में रात मे सपने ही देखते है, भारतीय मीडिया के दिमाग का दिवाला निकला पडा है, इस का प्रत्यक्ष उद्धाहरण हम और आप गुजरात दंगों से लेकर प्रज्ञा ठाकुर के तक हम और आप रोज ही देखते सुनते हैं। भारत को आजादी के बाद से अब तक 15-20 प्रतिशत मुसमान ने तबाह कर रखा है जो लोग पकिस्तान को फिर से भारत मे मिलाने की बात कर रहे है वो शायद भारत से हिन्दूओ को समूल नष्ट करने की योजना रखते है। 15-20 करोड मुसलमान भारत के 25-30 करोड पाकिस्तान के जिस दिन मिला दिये जायेंगे हिन्दूओं का क्या हाल होगा यह अनुमान आसानी से लगाया सकता है, क्योंकि उनका साथ देने को लाल पिछवाडे वाले वामपंथी, कांग्रेसी, सेकुलरवादी, मनवाधिकार वादी, अपनी माँ का भड्वा भारतीय मीडिया आदि सभी देंगे।

  4. January 20, 2010 at 7:44 am

    टाइम्स वाले बतायें कि ऐसी मानसिकता वाले लोगों से आप "अमन की आशा" की उम्मीद रखे हुए हैं? रिज़वान मामले पर रो-रोकर अपने कपड़े फ़ाड़ने वाले देश के नामचीन "सेकुलर पत्रकार"(?) रजनीश मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं, यदि वाकई मर्द हैं तो अमन की आशा के अलावा कभी "आशीष की आयशा" जैसा नारा भी लगाकर तो दिखायें…, कश्मीर की असली "मानसिकता" को समझें और पाकिस्तान नामक "खजेले कुत्ते" से दोस्ती का ढोंग-ढकोसला छोड़ें…"धंधा" ही करना है तो उसके लिये सारी दुनिया पड़ी है… कभी स्वाभिमान भी तो दिखाओ।बहुत सटीक !

  5. January 20, 2010 at 7:46 am

    पाकिस्तान से दोस्ती कैसे हो जब उनकी पूरी अवाम में जेहाद और मजहब के नाम पर जहर भर दिया गया है. उस देश में ज्यादातर लोगों को विश्वास है कि तालिबानियों से ज्यादा शुद्ध कोई नहीं और वही कौम के असली रखवाले हैं. बाकी सारे विश्व को यह शक की निगाह से देखते हैं. इनकी घृणित सरकारों ने इस देश को मजहब का लालिपाप थमाकर उनसे आत्मसम्मान तक छीन लिया. इनके नौजवान धर्म के लिये जान ले लेते हैं, लेकिन देश के लिये और अपने समाज के लिये मेहनत नहीं कर सकते.जब ताक पाकिस्तान में यह माहौल रहेगा तब तक अमन की 'आशा' एक मजाक है. वैसे टाइम्स आफ इंडिया तो पूरा ही एक मजाक है.

  6. January 20, 2010 at 8:09 am

    हाँ यह प्रयास अपने बाजपेयी जी भी कर चुके हैं फिर उनकी नक़ल अलग अलग चैनल ने भी किया गाने बजाने से लेकर हँसने हँसानेतक .बाजपेयी जी के शान्ति प्रयास और वार्ता के बाद भारत कितनीबार पिटाता रहा ये आप नहीं गिन रहे .हाँ आपसे सहमत हूँ कि ये सारे प्रयास कोरा बकवास हैमहर्षि अरविन्द का मानना था कि शक्ति के साथ जो वार्ता हो वही सफलहोगी . बकरी की तरह मिमियाने से काम चलने से रहा. हमारी वर्तमान और पूर्व की सरकार स्थायी दवाब बनाने से चुकती रही . हम स्कूली बच्चों की तरह ''टीचर मुझे आज फिर से पाकिस्तान ने मारा है " कहते रहे .

  7. January 20, 2010 at 8:24 am

    यदि आप दुनिया के सबसे बड़े काहिल, डरपोक,स्वार्थी,लतखोर(रोज लात खाने के आदी),ढोंगी,बेशर्म,बेहूदा,बदचलन और बेअकल है और भारत में रहने वाले सनातन है तथा आप कितने भी अधम हो और उपरोक्त दुर्गुण होते हुए भी निर्बोध बनना चाहते है तो कह दीजिये " मै तो सेकुलर हूँ " और कुत्तापन धुल जाएगा !!!भाईसाहब दूसरो को क्या दोष दे अपनी तो जैचंदो से ही मुक्ति नहीं है! लगता है नरेन्द्र मोदी से मिलना पडेगा !!!

  8. Ghost Buster said,

    January 20, 2010 at 9:17 am

    TOI ने इस नौटंकी में पाकी सहयोगी भी ढूंढा तो कैसा, जिसके नाम ही ’जंग’ है, यानि जिसकी बुनियाद ही युद्ध मनोदशा (War mentality) पर आधारित है.

  9. January 20, 2010 at 9:19 am

    @उम्दा सोच,नरेन्द्र मोदी से मिश्नरियों और जेहादियों में भारी बेचैनी दिख रही है. उनके दलालों ने कानूनी दाँवपैच में फँसाने का जाल धीरे धीरे बूनना जारी रखा है. परिणाम जल्द दिखेंगे. देखना होगा तब कितने प्रसंशक उनके साथ होते है. जय हो!….क्योंकि जय हिन्द अब साम्प्रदायिक है भई.

  10. sahespuriya said,

    January 20, 2010 at 10:13 am

    शाबाश, इसी तरह आतंकवाद ,पाकिस्तान का होवा दिखाकर बनाते रहिए लोगो को, कभी किस अच्छी बात का समर्थन मत करना, बस कीड़े निकालते रहना. यही ज़हर तो भरा है संघ ने… तूने दीवार मैं खुद ही किया है सूराख अब कोई झाँक रहा है तो शिकायत कैसी

  11. Alok Nandan said,

    January 20, 2010 at 10:17 am

    दोस्ती की हवा अब नहीं बहेगी…टाइम्स और जंग वाले चाहे जितना अभियान चला ले…लत्तम जूत्तम भी हो सकता है इस बार इनके साथ…बकवास करने की भी हद होती है…

  12. January 20, 2010 at 10:31 am

    "वह कभी भी “मूर्तिपूजकों के देश” का सच्चा दोस्त नहीं बन सकता, कभी न कभी पीठ में छुरा घोंपेगा जरूर…। लेकिन इतनी सी बात भी उच्च स्तर पर बैठे लोगों को समझ में नहीं आती?… तरस आता है…"लाख टके की बातप्रणाम स्वीकार करें

  13. January 20, 2010 at 11:28 am

    सुरेशजी अच्छी बात का समर्थन मत करना, बस कीड़े निकालते रहना. यही ज़हर तो भरा है संघ ने… स्वतंत्र होने से पहले ही संघ ने कहा पाकिस्तान अलग करो और देश टूट गया. फिर संघ ने कहा कश्मीर पाकिस्तान को दे दो और पाकिस्तान ने एक हिस्सा ले लिया. फिर संघ ने दो बार कहा पाकिस्तान पर हमला करो और दो दो जंग संघ के कारण लड़नी पड़ी.फिर संघ ने तमाम दंगे करवाये. पाकिस्तान से कहा हिन्दुओं को साफ कर दो, तो पाकिस्तान की अमन पसन्द जनता को मजबुरन हिन्दुओं का सफाया करना पड़ा.फिर संघ ने कहा भई अमन के संदेश वाहक जेहादियों को भेजो, तो उन्होने बहुत भेजे. हर महिने दीपावली मनाने आ जाते.फिर संघ ने कहा कसाब को भेजो….यार अमन पसन्द पाकिस्तान से आप प्रेम क्यों नहीं करते. वे अपनी जान न्यौछावर करने भारत आते है और आप पकड़ लेते हो. प्यार भी नहीं करते.

  14. January 20, 2010 at 11:47 am

    बहुत खूब संजय बेंगाणी साहब, कम से कम शब्दों में आपने sahespuriya को चुप करवा दिया…। अब किस मुंह से बोलेगा बेचारा… कोई जवाब ही नहीं सूझ रहा होगा…। इतना करारा जवाब नहीं देना चाहिये बेंगाणी जी पहली ही बार में… 🙂 🙂

  15. January 20, 2010 at 12:33 pm

    saheshpuria ji- पाकिस्तान जाकर अल्पसंख्यकों के लिये कुछ करो या यहीं बैठकर धर्मनिरपेक्षता जाया करोगे. जाओ भई जाओ अगला नोबेल आपको.

  16. January 20, 2010 at 12:46 pm

    गंदा है पर धंधा है. लोग तूल नहीं देंगे तो अपनी मौत मर जाएगी यह अमन की आशा.

  17. vikas mehta said,

    January 20, 2010 at 12:47 pm

    pakistan murkh hai use samjhana bhans ke age been bjana use samjhana kisi bandr ko adrk ka swad btana chnkya niti kahti hai agr kisi ko koi gyan nhi use samjhaya ja sakta hai agr koi murkh hai use nhi smjhaya ja sakta

  18. सुमो said,

    January 20, 2010 at 12:51 pm

    आंखें खोल देने वाला लेख

  19. ajai said,

    January 20, 2010 at 12:53 pm

    ’हम को है उनसे वफ़ा की उम्मीद ,जो नही जानते वफ़ा क्या है ?’महेश भट्ट जी तो पाकिस्तानी कलाकारों को काम देते ही रहते हैं । हमारे कलाकार वहां नही जा सकते , कुछ दिनों पहले जावेद अख्तर साहब को वीजा नही दिया गया था । अभी हाल ही में महेश जी ने मकान खरीद फरोख्त के मामले को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश भी की थी ।

  20. सुमो said,

    January 20, 2010 at 1:01 pm

    आप टाइम्स आफ इंडिया पढते हैं?ये तो सेमी पोर्न अखबार है

  21. sahespuriya said,

    January 20, 2010 at 1:14 pm

    सुरेश साहब, चुप ही तो है इसीलिए तो आपकी इतनी हिम्मत हो रही है, जिस सवाल का जवाब आप के पास नही है वोही सवाल मैने किया था, क्यों मिर्चे लग गयी? आपने जब छेड़ दिया है तो ज़रा ये बताएँ रिज़वान के मामले मैं आप कितना बोले थे जो अब आप आशा कर रहे है रजनीश के लिए? इंसाफ़ सब के लिए बराबर होना चाहिए रिज़वान या रजनीश का भेदभाव क्यों ? क्यों आप हर बात मैं हिंदू मुस्लिम तलाशते हैं, आप राज ठाकरे के बारे कितना बोले थे? क्यों जय हिंद से पहले जय महाराष्ट्र का नारा लगता है? समझते हम भी हैं चुप है किसी सबब तो तू पत्थर हमें ना जान दिल पर असर हुआ है तेरी बात बात का और सब से ज़रूरी बात, थोड़ा तमीज़ भी सीख लीजिए, ज़रा संबोधन की भाषा सही कीजिए. मैरी आप से कोई ज़ाती दुश्मनी नही है इस लिए अदब का दामन पकड़ के रहिए. आप से मैने request की थी की आप सुषमा स्वराज और अटल बिहारी की प्रेम गाथा पर भी कुछ लिखिए. लगता है मेटीरियल नही मिला. जवाब आप दे तो अच्छा चम्चो से सावधान बाक़ी फिर कभी

  22. sahespuriya said,

    January 20, 2010 at 1:28 pm

    @ indian citizen (?)आप पहले अपने घर की खबर ले लें तो अच्छा होगा, भलाई की शुरुआत हमेशा घर से होती है तो आप ने कितना ख़याल रखा अपने घर वालो का. समझ तो गये ही होंगे. मैं आप से बड़ा देशभक्त हूँ क्योंकि मैने अपने जीवन मैं कभी कोई ऐसा काम नही किया जिससे मेरे मुल्क पर आँच आए. मुझे किया ज़रूरत पड़ी है की मैं दूसरे मुल्क के लोगो के दुख दूर करने जाउ. पहले अपना घर तो ठीक कर ले

  23. January 20, 2010 at 1:31 pm

    @ Sahespuriya – 1) अव्वल तो मैं आपसे सम्बोधित ही नहीं हूं, न ही ऐसी कोई ख्वाहिश है, मैंने तो बेंगाणी जी को सम्बोधित किया था… और उस टिप्पणी में भी मैंने कोई आपको गाली वगैरह दी हो ऐसा तो नहीं लगता मुझे…। बहरहाल आपने ही बेंगाणी जी की बात का जवाब नहीं दिया कि पाकिस्तान की नापाक हरकतों में संघ कैसे जिम्मेदार हो गया? 2) सुषमा और वाजपेयी जी के बारे में जो आप कह रहे हैं तो आप ही लिखिये ना अपने ब्लाग पर… लिंक दीजिये, रेफ़रेंस दीजिये, पुस्तक कोट कीजिये… हम भी पढ़ेंगे…। नेहरु, नारायणदत्त तिवारी आदि के बारे में तो नेट पर पन्ने के पन्ने रंगे पड़े हैं…। 3) आपने कहा कि "इंसाफ़ सबके लिये बराबर होना चाहिये…" लेकिन क्या ऐसा होता है? या हुआ है रजनीश के मामले में? या कश्मीरी पंडितों के मामले में? धर्मग्रन्थों का हवाला देकर ऊंची-ऊंची बातें करना आसान है, लेकिन असल में क्या होता है यह सभी जानते हैं। 4) मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करने वालों को "चमचा" कहकर उनका अपमान तो कर ही रहे हैं साथ ही खुद की भाषा का स्तर भी कोई बहुत ऊंचा नहीं उठा रहे… मैं खुद आपके ब्लाग पर सुषमा-वाजपेयी के सम्बन्ध में आपकी राय से सम्बन्धित लेख पढ़ने को उत्सुक हूं… और हां… बेंगाणी जी की बात (बातों) का जवाब जल्दी दीजियेगा… 🙂

  24. January 20, 2010 at 2:16 pm

    …आदरणीय सुरेश जी,सही कहा आपने,समय आ गया है कि हमारे सारे देशवासी (सभी धर्मों के) और खासकर हमारे नीति निर्धारक व राय निर्धारक (Policy & Opinion Leaders) यह समझ लें कि पाकिस्तान हमारा शत्रु देश है, भारत विरोध की भावना ही है जो पाकिस्तानियों को एक करती है वरना अपने अंतर्विरोधों के चलते कभी के अनेकों टुकड़े हो गये होते इस देश के… पाकिस्तान के साथ अमन या साझीदारी की आशा बेकार है।यदि अपने इस मिथ्या मोह व Impractical भटकाव से दूर होकर पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते को हम शत्रु के साथ रिश्ता मानें तथा उसी तरह का बर्ताव करें जैसा कि अपने ज्ञात शत्रु के साथ किया जाता हैं तो हम सुरक्षित भी रहेंगे और धोखा भी नहीं खायेंगे।

  25. सुमो said,

    January 20, 2010 at 2:44 pm

    @ Sahespuriya – जो चोर होता है वही सबसे कहता फिरता है कि मैं ईमानदार हूंजो वतन और अपनी मां का सौदा करने से नहीं हिचकिचाते वही कहते हैं कि मैं दूसरों से बड़ा देशभक्त हूंकौन आपसे पूछ रहा है कि आप देशभक्त हैं? यहां किसी को आपके सार्टीफिकेटों की जरूरत नहीं है

  26. the said,

    January 20, 2010 at 3:11 pm

    इस लेख की मूल बात यह है कि पाकिस्तान का जन्म ही भारत और हिंदुओं से नफ़रत को लेकर हुआ और उसका अस्तित्व भी इसी नफ़रत पर टिका हुआ है. ऐसे में आप उससे दोस्ती और प्यार की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? तो भले ही आप लाख नाक रगड लें या तलवे भी चाट लें, पाकिस्तान ऐसा ही रहेगा. इत्ती सी बात हमारे यहां के तथाकथित बुद्धूजीवियों को समझ में नहीं आती और वे अपनी मूर्खता ज़ाहिर करने पर बार बार तुल जाते हैं. अरे भई, जिस पाकिस्तान में प्राइमरी स्कूल से ही हिंदुओं को लेकर घोर नफ़रत भरी बातें सरकारी तौर पर पढाई जाती हैं, वहां "हिंदुओं के हिंदुस्तान" से दोस्ती कैसे हो सकती है?

  27. January 20, 2010 at 3:24 pm

    @sahespriya-क्या पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की बात करने में कोई बुराई है. यहां तो ऐसी खाद लगी कि बीस प्रतिशत हो गये और वहां ऐसा जहर दिया गया कि पांच भी नहीं रह गये. और फिर ग्लोबल होने में बुराई क्या है? इतनी अच्छी अवधारणा इस्लामी मुल्कों और ईसाई मुल्कों में भी फैलाने में क्या हर्ज है आपको. या तो कहिये कि धर्मनिरपेक्षता से आप सहमत नहीं हैं यदि हैं तो फिर दुनिया के तमाम मुल्कों में क्यों इस अवधारणा का प्रसार नहीं किया जा सकता. अपने घर में तो धर्मनिरपेक्षी बहुत हैं, यहां हिन्दुओं के अल्पसंख्यक बनने तक धर्मनिरपेक्षता को आंच नहीं आने वाली.

  28. January 20, 2010 at 3:49 pm

    @ Indian Citizen – मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि Sahespuriya मुझ पर मिर्ची लगने का आरोप लगा रहे हैं लेकिन ये खुद नहीं बताते कि पाकिस्तान और टाइम्स की आलोचना (बल्कि उनकी असलियत जाहिर करने) पर इन्हें इतना दुख क्यों पहुंचा है? और शायद इन्होंने राज ठाकरे की आलोचना के मेरे लेख और टिप्पणियां भी नहीं पढ़े…

  29. January 20, 2010 at 4:25 pm

    सबसे पहले तो सुरेश चिपलूनकर को धन्यवाद इस ज़बरदस्त आलेख के लिए, फिर खूब खूब अभिनन्दन संजय बेंगाणी की सटीक और पराक्रम पूर्ण टिप्पणियों का । इसके बाद लाहनत उस घटिया और लिजलिजी सोच पर जो इस नाज़ुक और राष्ट्रचिन्तन से जुड़े मसले पर भी ऊँगली करने से बाज़ नहीं आती है ।श्रीमान सहेसपुरिया !चार शे'र याद कर लेने से कोई देशभक्त नहीं बन जाता और देश भक्ति कोई अपने मुँह मियां मिट्ठू बनने की चीज़ नहीं है । देशभक्ति देश का हितचिन्तन करने में है और आप उसमे फ़ोकट ही बाधा बन रहे हैं । हाँ आपके शे'र ढंग के थे, अगली बार अपनी टिप्पणी में सिर्फ शे'र भेज देना, ज्यादा बेहतर होगाजय हिन्द !www.albelakhatri.com

  30. L.R.Gandhi said,

    January 20, 2010 at 4:37 pm

    वाशिंगटन इरबिन- मोहम्मद एक जीवनी में लिखा है।मोहम्मद ने जो घोषणा पत्र मदीने पहुँच कर मुसलामानों के लिए जारी किया में लिखा ….जो आदमी इस्लाम को अंगीकार नहीं करे उसको यमपुरी भेज दो। जो मुसलमान इस्लाम के लिया मारा जाता है वह सदा के लिए मृगनयनी अप्सराओं के साथ आनंद भोगता है। काफिरों को इस्लाम में लाने के लिए तलवार से बढ़ कर दूसरा उपदेश नहीं । मुसलामानों को चाहिए की काफिरों मूर्ति पूजकों को जहाँ कहीं देखें मार डालें … पाक में बंटवारे के वक्त २०% अल्पसंख्यक थे आज २% से भी कम हैं …इसके बारे में तो यह बुद्धिजीवी सेकुलर शैतान कभी कुछ नहीं बोलते । A

  31. Common Hindu said,

    January 20, 2010 at 4:58 pm

    Hello Blogger Friend,Your excellent post has been back-linked inhttp://hinduonline.blogspot.com/– a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu- Hindu Online.

  32. January 21, 2010 at 1:37 am

    अच्छा और सच्चा विश्लेषण किया है आपने इस समाचार का

  33. January 21, 2010 at 1:57 am

    वैसे आपको शायद पता होगा किन्तु फिर भी एक छोटी सी तकनीकी सलाह मैं आपको देना चाहूँगा आप अपने लेख में बाह्य लिंक देते समय उसमें target="_blank" को जोड़ दिया करें ताकि वो लिंक दुसरे विंडो या टैब में खुलेंगे. जिससे पाठक आपके लेख पर भी बना रहेगा और बाह्य स्रोत को दूसरी विंडो या टैब में देख पायेगा.

  34. January 21, 2010 at 3:08 am

    अमन की आशा आतंक के देश से अच्छा मजाक बना रखा है इन लोगों ने।

  35. K. D. Kash said,

    January 21, 2010 at 5:10 am

    @ sahespuriyaमेरी खयाल से आप पाकिस्तान से दोस्ती करना अच्छा समझते है उससे भारत का क्या फायदा होगा बताइये आप अगर ऐसा समझते है के उससे पाक भारत मैं २६/११ जैसे हमले नाही करेगा और भारत का दोस्त बन सकेगा तो उसे ५० साल से किस्ने रोका था जो देश ५० सलोन्मै भारत का विनाश चाहता था आप के केहेनेके मुतबिक भारत का दोस्त बनेगा क्या फँटसी है यार ग्रेट ३ इडियट्स जैसी नई फिल्मनिकालो भारत इडियट्नाही निकलो तो भी चलेगा आखिर पाकिस्तान ए बात हार बार सिद्धा करता है की भारत मैं हमले करो और दोस्तिका नारा लागओ भारत हमेशा तैयर रहेगा

  36. K. D. Kash said,

    January 21, 2010 at 5:18 am

    @ sahespuriyaदुश्मन से दोस्ती क्या मजक है यार ये काम भारत के सिवा कौन करेगा hahahahahahahahahahahahahahahahahahahahahऔर वोह किस लिये दुश्मन के लिये hahahahahahahahahahah

  37. K. D. Kash said,

    January 21, 2010 at 5:26 am

    @ sahespuriyaऔर जो अपने देश वासी दहशद का शिकार हुए है उन्को क्या थेंगा क्या न्याय है boss माना आप को न्याय के बारे मैं बोलने का अधिकार सिर्फ आप को ही है

  38. January 21, 2010 at 7:39 am

    हर बार की तरह पुनश्च समसामयिक, दमदार व तथ्यपरक आलेख लेखन हेतु सुरेश जी का कोटिशः आभार. साथ ही "सहेसपुरिया" के अतिरिक्त सभी टिप्पणीकारों की बातों से भी पूरी तरह सहमत…. मुझे लगता है कि कुछ लोग होते हीं ऐसे है, जिन्हें सहमति के स्थान पर असहमति जताने और असहमति के स्थान पर सहमति जताने का कीड़ा काटा होता है. उनमें से पूर्वोक्त बंधुवर की कोटि शायद यही है.अस्तु, "आंख का अंधा नाम नयनसुख" को चरितार्थ करते हुए "जंग" ने "अमन की आशा" की बात शुरु की है… हा हा हा….

  39. K. D. Kash said,

    January 21, 2010 at 10:59 am

    @ sahespuriya आप ने कहा है """ मैं आप से बड़ा देशभक्त हूँ क्योंकि मैने अपने जीवन मैं कभी कोई ऐसा काम नही किया जिससे मेरे मुल्क पर आँच आए"""सच ये आप का भारत पर काफ़ि बडा एहेसान है जो की आप ने कूच किया नही जिससे भारत पर आंच आये जिसे हं कर्तव्य समझते है उसे आप उपकार समाझते है या तो आप के केहेनेके stylese ऐसा लागता है

  40. January 22, 2010 at 12:58 am

    अमिताभ बच्चन, महेश भट्ट तथा गुलज़ार इनकी ऐसी की तैसी भी पाकिस्तान के द्वारा हो रही है(पाईरेटेड फिल्मों और गानों की सी डी द्वारा) फिर भी इन्हें समझ नहीं आ रही है, सॉरी समझ हमें नहीं आ रही है. ये लोग तो अपने धंधे का बाज़ार देख रहे हैं. पता नहीं क्यों अमिताभ बच्चन से मुझे बहुत चिढ है. परदे की काल्पनिक छवि को हटा के देखो आप को भी हो जाएगी .


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