क्या? वीर सावरकर को “भारत-रत्न”?? तू साम्प्रदायिक संघी है…… Bharat Ratna, Civil Awards of India

प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी पद्म पुरस्कारों की घोषणा की रस्म निभाई गई। जिस प्रकार पुराने जमाने में राजा-बादशाह खुश होकर अपनी रियासत के कलाकारों, राजा की तारीफ़ में कसीदे काढ़ने वाले भाण्डों और चारण-भाट को पुरस्कार, सोने के सिक्के, हार आदि बाँटा करते थे, वही परम्परा लोकतन्त्र के साठ साल (यानी परिपक्व ? लोकतन्त्र हो जाने) के बावजूद जारी है।

जैसा कि सभी जानते हैं “भारत रत्न” भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, फ़िर आता है पद्म विभूषण, पद्मभूषण और पद्मश्री आदि। अब तक कुल 41 लोगों को भारत रत्न का सम्मान दिया जा चुका है (यह संख्या 42 भी हो सकती थी, यदि “तकनीकी आधार”(??) पर खारिज किया गया सुभाषचन्द्र बोस का सम्मान भी गिन लिया जाता)। भारत रत्न प्रदान करने के लिये बाकायदा एक विशेषज्ञ समिति होती है जो यह तय करती है कि किसे यह सम्मान दिया जाना चाहिये और यह अनुशंसा राष्ट्रपति को भेजी जाती है, जिस पर वे अपनी सहमति देते हैं। इतनी भारी-भरकम समिति और उसमें तमाम पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी और इतिहासविद उपस्थित होने के बावजूद यदि भारत रत्न प्राप्त लोगों की लिस्ट देखी जाये तो कई अति-प्रतिष्ठित नाम उसमें नहीं मिलेंगे, जबकि कुछ “बेहद साधारण” किस्म के नाम भी इसमें देखे जा सकते हैं। चूंकि गाँधी को तो “राष्ट्रपिता” का दर्जा मिला हुआ है, इसलिये इस नाम को छोड़ भी दें, तो अंधे को भी साफ़ दिखाई दे सकता है कि भारत रत्न सम्मान प्राप्त करने के लिये सिर्फ़ निस्वार्थ भाव से देश की सेवा करना जरूरी नहीं है, इसके लिये सबसे पहली शर्त है नेहरु-गाँधी परिवार की चमचागिरी, दूसरी शर्त है “सेकुलरिज़्म का लबादा” और तीसरी तो यह कि या तो वह कलाकार इतने ऊँचे स्तर का हो कि कोई भी समिति उसका विरोध कर ही न सके, जैसे कि लता मंगेशकर, रविशंकर या पण्डित भीमसेन जोशी।

खिलाड़ियों, कलाकारों को छोड़ दिया जाये, तो जब राजनीति और समाजसेवा से जुड़े लोगों को ये नागरिक सम्मान दिये जाते हैं तब इनमें पहली और दूसरी शर्त सबसे महत्वपूर्ण होती है। यहाँ तक कि खिलाड़ियों और कलाकारों के सम्बन्ध में भी एक अदृश्य शर्त तो यह होती ही है कि उसने कभी भी “हिन्दुत्व” के सम्बन्ध में कोई खुल्लमखुल्ला बयान न दिया हो, कभी संघ-भाजपा के कार्यक्रम में न गया हो (क्योंकि ये अछूत हैं)…और सबसे बड़ी बात, कि गाँधी परिवार का कभी खुला विरोध न किया हो। मैं जानता हूं कि इन सम्मानों में क्षेत्रवाद, जातिवाद, सेकुलरवाद आदि की बातें करने से कुछ “कथित बुद्धिजीवियों” की भौंहें तन सकती हैं, लेकिन कुछ बिन्दु आपके सामने रख रहा हूं जिससे पूरी तरह से खुलासा हो जायेगा कि ये सम्मान निहायत ही पक्षपाती, राजनीति से प्रेरित और एक खास परिवार या विचारधारा के लोगों के लिये आरक्षित हैं –

1) देश की आज़ादी के आंदोलन को सबसे महत्वपूर्ण आहुति देने वाले, अंग्रेजों के साथ-साथ कांग्रेस का खुला विरोध करने वाले वीर दामोदर सावरकर को अभी तक यह पुरस्कार नहीं दिया गया है, बल्कि मणिशंकर अय्यर जैसे लोग तो अंडमान में भी इनकी समाधि की उपस्थिति बर्दाश्त नहीं कर पाते – कारण सिर्फ़ एक, उनके “हिन्दुत्ववादी विचार”, लेकिन इससे उनके अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ी गई लड़ाई का महत्व कम नहीं हो जाता।

2) आज़ादी के बाद सभी रियासतों को अपने बल, बुद्धि और चातुर्य के बल पर भारत संघ में मिलाने वाले सरदार वल्लभाई पटेल को भारत रत्न दिया गया 1991 में। इंदिरा गाँधी, मदर टेरेसा और एमजीआर के बहुत बाद। कारण सिर्फ़ एक – उनकी विचारधारा कभी भी गाँधी परिवार से मेल नहीं खाई, नेहरु की उन्होंने कई बार (चीन के साथ एकतरफ़ा मधुर सम्बन्धों तथा हज सबसिडी की) खुलकर आलोचना भी की।

3) संविधान के निर्माता के रूप में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अम्बेडकर को यह पुरस्कार मिला 1990 में, वह भी इसलिये कि तब तक देश में “दलित आंदोलन” एक मजबूत वोट बैंक का रूप ले चुका था, वरना तब भी नहीं मिलता, क्योंकि ये महानुभाव भी देश की वर्तमान परिस्थिति के लिये नेहरुवादी नीतियों को जिम्मेदार मानते थे, तथा देश में ब्राह्मणवाद फ़ैलाने के लिये कांग्रेस की आलोचना करते थे।

4) मौलाना आज़ाद ने खुद ही भारत रत्न लेने से इसलिये मना कर दिया क्योंकि उनके अनुसार सरकार में मौजूद प्रभावशाली लोगों तथा समिति के सदस्य होने के नाते यह उनका नैतिक अधिकार नहीं था, जबकि नेहरु ने 1955 में ही भारत रत्न “हथिया” लिया। उनकी बेटी ने भी इसी परम्परा को जारी रखा और 1971 में (पाकिस्तान के 90000 सैनिकों को मुफ़्त में छोड़ने और बकवास टाइप शिमला समझौता करने के बावजूद) खुद ही भारत रत्न ले लिया, और पायलटी करते-करते “उड़कर” प्रधानमंत्री बने, इनके बेटे को भी मौत के बाद सहानुभूति के चलते 1991 में फ़ोकट में ही (“जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है” जैसे बयान और शाहबानो मामले में वोटबैंक जुगाड़ू, ढीलाढाला और देशघाती रवैया अपनाने तथा अपनी मूर्खतापूर्ण विदेशनीति के चलते श्रीलंका में शान्ति सेना के नाम पर हजारों भारतीय सैनिक मरवाने के बावजूद) भारत रत्न दे दिया गया।

5) जयप्रकाश नारायण, जिन्होंने कांग्रेस की चूलें पूरे देश से हिलाने में बड़ी भूमिका निभाई, उन्हें 1999 में यह सम्मान मिला, जबकि सिर्फ़ तमिलनाडु के लिये आजीवन काम करने वाले एमजी रामचन्द्रन को 1988 में ही मिल गया था, क्योंकि उस समय कांग्रेस को तमिल वोटों को लुभाना था।

ये थे चन्द उदाहरण, कि सन् 1980-85 तक तो भारत रत्न उसे ही मिल सकता था, जो या तो कांग्रेस का सदस्य हो, या गाँधी परिवार का चमचा हो या फ़िर अपवाद स्वरूप कोई बहुत बड़ा कलाकार अथवा नोबल विजेता। लेकिन जिस किसी व्यक्ति ने कांग्रेस का विरोध किया अथवा कोई जन-आंदोलन चलाया उसे अपने जीवनकाल में भारत रत्न तो नहीं मिलने दिया गया, मरणोपरांत ही मिला। कश्मीर में अपनी जान लड़ाने वाले (बल्कि जान गंवाने वाले) डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी, जिन्होंने शेख अब्दुल्ला को कश्मीर हथियाने से रोका, विभिन्न विवादास्पद कानूनों का विरोध किया उन्हें भारत रत्न देना तो दूर, संदेहास्पद स्थितियों में हुई उनकी मौत की नेहरु ने विधिवत जाँच तक नहीं करवाई। जबकि जिस तरह से “भड़ैती मीडिया” सोनिया मैडम के “त्याग और बलिदान” के किस्से गढ़ रहा है, जल्दी ही उन्हें भी भारत रत्न देने की नौबत आ जायेगी, पीछे-पीछे देश के “कथित युवा भविष्य” राहुल गाँधी हैं ही, एक उनके लिये भी…।

यह तो हुई भारत रत्न की बात, जो कि देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है और जिसे विदेशों में भी अच्छी निगाह से देखा जाता है, कम से कम इसमें तो राजनीति नहीं होना चाहिये, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और कांग्रेसी घिनौनी चालें सतत चलती रहीं। पद्म विभूषण हों, पद्मभूषण अथवा पद्मश्री, सारे पुरस्कार मनमर्जी से “बादशाहों” की तर्ज पर बाँटे गये हैं। प्रणब मुखर्जी को सिर्फ़ “सोनिया भक्ति” की वजह से 2008 में पद्मविभूषण, पत्रकार रामचन्द्र गुहा को सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा-संघ विरोध की वजह से और इसी तर्ज पर राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त या महेश भट्ट-शबाना आज़मी को “सेकुलर” वजहों से खैरात बाँटी गई हैं, और ऐसे नाम सैकड़ों की संख्या में हैं।

अपने पाँच वर्षीय कार्यकाल के दौरान वाजपेयी चाहते तो श्यामाप्रसाद मुखर्जी, सावरकर, दीनदयाल उपाध्याय, कुशाभाऊ ठाकरे आदि को पुरस्कृत कर सकते थे, लेकिन वे सदाशयता के नाते चाहते थे कि इस सर्वोच्च सम्मान में राजनीति नहीं होना चाहिये और कोई भाजपा सरकार पर उंगली न उठाये, लेकिन उनके इस रवैये की फ़िर भी कोई तारीफ़ मीडिया ने नहीं की। आज की तारीख में अटलबिहारी वाजपेयी का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा, कभी भी कुछ भी हो सकता है ऐसे में वे “सही अर्थों में भारत के प्रथम गैर-कांग्रेसी” प्रधानमंत्री और राजनीति में बेदाग 50 वर्ष पूर्ण करने के नाते भारत रत्न के एकमात्र जीवित हकदार हैं, लेकिन उन्हें यह मिलेगा नहीं (कम से कम जीवित रहते)। पिछले तीनों भारत रत्न कलाकारों को ही मिले हैं (क्योंकि अब यही लोग थोड़े गैर-विवादास्पद बचे हैं)… और मान लिया जाये कि यदि किसी राजनैतिक व्यक्ति को यह सम्मान मिलने की बारी आई भी, तब भी ज्योति बसु का नम्बर पहले लग जायेगा (भले ही वे कभी बंगाल से बाहर चुनाव नहीं लड़े हों या सिर्फ़ एक राज्य के मुख्यमंत्री भर रहे हों), लेकिन वाजपेयी को भारत रत्न तो कतई नहीं। खैर… संघ-भाजपा से सम्बन्ध रखने वालों को “अछूत” बनाये रखने की यह परम्परा कई वर्षों से चली आ रही है, अब इसमें आश्चर्य नहीं होता

आश्चर्य तो इस बात का है कि इस वर्ष के पुरस्कारों में “संगीत के बेताज बादशाह” इलैया राजा को एआर रहमान के समकक्ष रखा गया है, जबकि देखा जाये तो रहमान उनके सामने “शब्दशः” बच्चे हैं और इलैया राजा के महान योगदान के सामने कुछ भी नहीं (शायद रहमान को “झोंपड़पट्टी वाला करोड़पति कुत्ता” फ़िल्म में पश्चिम द्वारा मिली तारीफ़ की वजह से दिया होगा), जबकि हिरण मारने वाले सैफ़ अली को वरिष्ठ अभिनेता धर्मेन्द्र और सनी देओल पर भी तरजीह दे दी गई (क्योंकि धर्मेन्द्र भाजपा सांसद रहे)।

आश्चर्य तो इस साल घोषित सम्मानों की लिस्ट में अमेरिकी NRI होटल व्यवसायी चटवाल का नाम  देखकर भी हुआ है। जिस व्यक्ति पर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के करोड़ों रुपये के गबन और हेराफ़ेरी का मामला चल चुका हो, जो व्यक्ति एक बार गिरफ़्तार भी हो चुका हो, पता नहीं उसे किस आधार पर पद्म पुरस्कार के लायक समझा गया है (शायद अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में अच्छा चन्दा दिया होगा, या मनमोहन-चिदम्बरम की उम्दा खातिरदारी की होगी इसने)। खैर, कांग्रेस द्वारा “भ्रष्टों को संरक्षण” देने की परम्परा तो शुरु से रही है, चाहे जस्टिस रामास्वामी का महाभियोग मामला हो या जस्टिस दिनाकरन के महाभियोग प्रस्ताव में कांग्रेसी सांसदों का दस्तखत न करना रहा हो।

धीरे-धीरे हमें ऐसे पुरस्कारों की भी आदत डाल लेना चाहिये, क्योंकि जब राठौर और आरके शर्मा जैसे “महादागी” पुलिस अफ़सर भी राष्ट्रपति पदक “जुगाड़” सकते हैं, तो पप्पू यादव, शहाबुद्दीन, अरुण गवली, दाऊद इब्राहीम आदि को भी किसी दिन “पद्मश्री” मिल सकता है… लेकिन वीर सावरकर, तिलक, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, अटलबिहारी वाजपेयी को कभी नहीं… क्योंकि इन लोगों का “जुर्म” अधिक बड़ा है… इन्होंने कांग्रेस-नेहरु-गाँधी परिवार का विरोध और हिन्दुत्व का समर्थन किया है… जो इस देश में “बहुत बड़ा और अक्षम्य अपराध” है… जय हो।

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38 Comments

  1. सुमो said,

    January 28, 2010 at 10:02 am

    इस साल राठौर को पद्मश्री क्यौं नहीं दी गई?ये भी तो नेहरू को फोलो करने वाला पुलसिया था

  2. January 28, 2010 at 10:07 am

    क्या राष्ट्रवाद ही हिन्दुत्त्ववाद है. आपने जिन लोगों के लिए हिन्दुत्त्ववादी कहा है, वे सभी प्रखर राष्ट्रवादी थे. काले अंग्रेज उन्हे किसी भी रूप में गाली दे सकते है, पुरस्कार नहीं. राज उनका है जो हमारे हीरों को आतंकवादी कहते है और देशद्रोहियों कि चाकरी करते है.

  3. rahul said,

    January 28, 2010 at 10:29 am

    चिंत्ता ने करें हमारे वीर सावरकर को देर सवेर मिल जायेगा, क्‍यूंकि यह अग्रेजों का मित्र था, गांधी का कातिल कहा जाता था या था

  4. January 28, 2010 at 10:30 am

    अंधा बाँटे रेवड़ी …

  5. January 28, 2010 at 10:33 am

    प्रिय सुरेश, लिखते रहो!! हर आलेख देश के लिये जरूरी विषयों से लोगों को परिचित करवाता है.वीर सावरकर, तिलक, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, अटलबिहारी वाजपेयी को अभी तक भारत रत्न घोषित नहीं किया यह दुख की बात है.सस्नेह — शास्त्रीहिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती हैhttp://www.IndianCoins.Org

  6. January 28, 2010 at 10:48 am

    आपने एक गम्‍भीर मुद्दे पर प्रश्‍न उठाया है, राष्‍ट्रीय बहस होनी चाहिये।

  7. rohit said,

    January 28, 2010 at 11:27 am

    let me ask you one question- how did nelson mandela manage to recieve bharat ratna. as par my knowledge he is not an indian. and he had done nothing for india or indian.waiting for answer.

  8. January 28, 2010 at 12:43 pm

    वीर सावरकर को तो भारत रत्‍न तभी मिल गया था जब उन्‍हें गाँधी की हत्‍या का दोषी बताया गया। उनपर प्रतिबंध लगा। यह देश केवल नेहरु खानदान के लिए है शेष तो सब गुलाम हैं। वैसे भी पुरस्‍कार चारण भाटों को ही दिए जाते हैं तो परम्‍परा जारी है।

  9. January 28, 2010 at 1:11 pm

    भाई राहुल यह आपने सही बात कह दी. अंग्रेज अपने दोस्त को काले पानी की सजा देते थे और कोल्हु के बैल की तरह उससे तेल निकलवाते थे. सच्चे देशभक्त वे है जो क्रांति कारियों को आतंकवादी कहते थे, उन्हे जल्दी से जल्दी फाँसी दे देने को कहते थे. देश का विभाजन मंजूर करते थे. ज्यादा लिखूं या इतना ही काफी है?

  10. January 28, 2010 at 1:18 pm

    vaah, bahut badia suresh ji,ye puruskar to keval talve chaatne valo ko hi milte hai, fir vo international level par ho ya national level par ya state level ya district level. kahi bhi dekh lo aur jo log jo puruskar paane walo ke naam dete hai vo to shayad bhagwaan hi hote honge. kyoki unse poochna ki kyo is vyakti ko puruskar diyaa gaya kisi ke bas ki baat nahi hai.vaise hamaara samvidhan hame ye adhikar deta hai.———————————Note:-ye comment hindi uplabdh na hone ke karan roman me likhi hai Sorry for that.

  11. January 28, 2010 at 1:29 pm

    सुरेश जी अब ये क्या सम्मान भी रह गए हैं ?अच्छा है की अच्छे लोग इससे वंचित रहें

  12. January 28, 2010 at 2:11 pm

    KYA KAHA JAAY….

  13. January 28, 2010 at 2:13 pm

    सुरेश जी,बहुत ही सुंदर। काश कोई तो आंखें खोले।

  14. Pranay said,

    January 28, 2010 at 2:26 pm

    Lage Raho……………स्वदेश के प्रति बलिदान की भावना जब जागे तब प्राणों के पुष्प माँ के चरणों में चढ़ाकर धन्यता का अनुभव करने का विचार मेरे और आपके मन में जब जागेगा तब फिर से यह भारत एक बार नहीं अनेक बार अनेक देशों के द्वारा जगदगुरु के रूप में वन्दित होगा और लोग यहाँ से प्रेरणा प्राप्त करने का प्रयत्न करेंगे :- स्वामी सत्यमित्रानंद .

  15. January 28, 2010 at 3:51 pm

    यह दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि आज भी लोग वीर सावरकर को गांधीजी क हत्यारा मानते हैं, जबकि खुद नाथूराम गोडसे अपनी पुस्तक "गांधीवध क्यों" में इस बात का खुलासा कर चुके हैं कि उनका सावरकर जी से कोई लेना देना नहीं था। यहां तक कि कई जगहों पर वीर सावरकर की नीतियों कि भी उन्होने ( नाथूराम गोडसे ने) कड़े शब्दों में आलोचना की है। भई; सावरकर जी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अटलजी जैसों को वैसे भी इस सम्मान की जरूरत नहीं है, वे वैसे ही लोगों के दिलों में राज करते हैं। और ये सम्मान किसी पुरस्कार्से कहीं बड़ा है।

  16. January 28, 2010 at 4:45 pm

    ४७. मैने यह सब विस्तार से इसलिए बताया है कि मुझ पर दोष लगाते हुए कहा गया है कि मैने सब सावरकर के इशारे पर किया, स्वयं अपनी अच्छा से नहीं। ऐसा कहना कि मैं सावरकर जी पर निर्भर था, मेरे व्यक्‍तित्व का, मेरे कार्य का और निर्णय की क्षमता का अपमान है। यह सब मैं इसलिये कह रहा हूं कि मेरे विषय में जो भ्रान्त धारणाएं हों, वे दूर हो जाये। मैं इस बात को दोहराता हूँ कि वीर सावरकर को मेरे कार्यक्रम का तनिक भी पता नहीं था जिस पर चलकर मैने गांधीजी का वध किया। मैं इस बात को भी दोहराता हूँ यह निरा झूठ है कि आप्टे ने मेरे सामने या मैने स्वयं बड़गे को कहा कि हमें कि सावरकर जी ने गांधी, नेहरू और सुहरावर्दी को मारने की आज्ञा दी है। यह भी सच नहीं है कि हम ऐसी किसी योजना या षड़यन्त्र के बारे में श्री बड़गे के साथ सावरकर जी के अन्तिम दर्शन करने गए हों और उन्होने हमें आशीर्वाद के ये शब्द कहें हों- "सफल हो और वापस लौटो-यशस्वी हों!" यह असत्य है कि आपटे या मैने बड़गे को कहा कि सावरकर ने हमें कहा है कि गांधीजी के सौ बरस पूर्ण हो चुके हैं इसलिए तुम अवश्य सफल हो आओगे। मैं न तो इतना अंधश्रद्ध था कि सावरकर की भविष्यवाणी के आधार पर कार्य करता और ना इतना मूर्ख था कि ऐसे भविष्य-कथन पर भरोसा करता।नथूराम गोडसे की पुस्तक "गांधीवध क्यों के परिशिष्ट "नथूराम का निवेदन: भाग-१" पृष्ठ संख्या ६० से उधृत पंक्तियां

  17. January 28, 2010 at 5:18 pm

    संजय जी आप परेशान ना हों… ये राहुल इस तरह के लोगों में है जिन्हें बचपन से कांग्रेस नाम कि घुट्टी पिलाई गई है.. ऐसे ही लोगों की आज सख्त जरूरत है देश का मटियामेट करने के लिए.. इन्हें ना तो इतिहास पता होता हैऔर ना ही कुछ और बस सोनिया जी जिंदाबाद सिखाया जाता है..और प्रिय रोहित मंडेला में सिर्फ यही खूबी थी भारत से जुड़ी कि वो गाँधी जी के प्रशंसक थे.. कांग्रेस को दिखाना था कि हम उन तक का सम्मान करते हैं जो हमारे बुजुर्गों का करते हैं..जय हिंद…

  18. Jyotsna said,

    January 28, 2010 at 6:43 pm

    सावरकर को बचाने के लिए नाथूराम ने उनको दृश्य से हटा लिया. नाथू के भाई गोपाल ने अपनी पुस्तकों और इन्तार्व्यूज़ में कई बार कहा है की सावरकर को न सिर्फ गांधी को मारने के प्लान का पता था बल्कि उन्होंने पूरे दल को नैतिक और वैचारिक समर्थन भी दिया था.सावरकर ने एक या दो नहीं बल्कि तीन बार ब्रिटिश सरकार को लिखित में माफीनामा दिया और कहा कि माफ़ कर दिए जाने पर वे राजनैतिक जीवन से हट जायेंगे, वे हट भी गए थे. इसके सबूत नेशनल आर्काइव्स और ब्रिस्तिश आर्काइव्स में अभी भी सुरक्षित हैं.वैसे, माफीनामा तो अटल जी ने भी दिया था न?सवाल नेहरु गांधी की पूजा या कांग्रेस की घुट्टी पीने का नहीं है. सच को सच कहने का साहस आप भी करें और सच यह है कि सावरकर ने गांधी को मारने का षड़यंत्र किया और अंग्रेजों से माफीयाँ भी माँगी.

  19. January 28, 2010 at 6:44 pm

    …आदरणीय सुरेश जी,कोई भी 'सम्मान' जिनको कोई चयन समिति बैठक करके या नोमिनेशन माँग कर निर्णय करती है, विवादों को जन्म देते ही हैं क्योंकि वे चयनसमिति के वैचारिक झुकाव से प्रभावित हो ही जाते हैं… अत: यह बहस तो चलती ही रहेगी…पर जिस तरह से इन पुरस्कारों को अपने सेवकों या चारणों को अनुग्रहीत करने की परंपरा सी चल गई है, वह निंदनीय है।कुछ टिप्पणीकार नेल्सन मंडेला को भारतरत्न मिलने पर भी सवाल उठा रहे हैं, जो उनके अज्ञान का द्योतक है…मंडेला वह हस्ती हैं जिनको दिये जाने से इस पुरस्कार का गौरव बड़ा है…सदियों में एकाध पैदा होता है 'मंडेला' सा…

  20. January 28, 2010 at 7:30 pm

    सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखाई देता है, यह एक बड़ी पुरानी कहावत है.हममें से कुछ लोगों को सही और गलत के बीच का भेद ही पता नहीं.जिन लोगों ने गर्दनें कटवा दीं उनके परिजन टापते रह गये.जो जेल में जाकर बैठ गये और बच गये वे इनाम पा गये.सावरकर को अंग्रेजों का मित्र बनाने वाले उसी विद्यालय के पढ़े हैं जिसमें शिवाजी को पहाडी चूहा बताया जाता है. ऐसे व्यक्तियों से और क्या उम्मीद की जा सकती है.

  21. January 28, 2010 at 10:39 pm

    अजी कांग्रेसी जब कांग्रेस के ही महान प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शाश्त्री जी को नहीं पूछते तो गैर कांग्रेसी (वीर सावरकर, भगत सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी) की संभावना कहाँ ?

  22. January 28, 2010 at 10:40 pm

    महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, दलाई लामा, मदर टेरेसा ये कुछ नाम ऐसे हैं जो भारत रत्न तो क्या नोबेल पुरस्कार से भी ऊपर हैं और किसी भी पुरस्कार का उनसे मान ही बढ़ता है जैसे इ तुलसीदास जी के लिखा गया है कि-'कविता कर के तुलसी ना लसे, कविता ही लसी पा तुलसी की कला'लेकिन या तो शायद मेरा सामान्यज्ञान कम है कि मैंने कहीं ये पढ़ा ही नहीं.. कि श्री मंडेला ने भारत के विकास में कुछ योगदान दिया..कोई बहरूपिया ज्योत्स्ना नाम का पर्दा डाल के किस्से सुना रहा है… जरूर कॉन्वेंट का खाना और कांग्रेस का पानी पिए होगा..जय हिंद…

  23. January 28, 2010 at 10:44 pm

    सही कहा राकेश जी.. और यकीन तो नहीं होता लेकिन कहा तो ये भी जाता है कि उन्हें मरवाने में भी इंदिरा गाँधी का हाथ था..

  24. January 28, 2010 at 11:38 pm

    अब तो यकीं के साथ कहा जा सकता है की लाल बहादुर शाश्त्री जी के मृत्यु के पीछे इंदिरा गाँधी का ही हाथ था | यदि ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस की सरकार शास्त्री जी के रहस्यमय मृत्यु सम्बंधित जानकारी को सार्वजनिक जरुर करती | सुचना के आधिकार के तहत जब कांग्रेस की सरकार से शास्त्री जी सम्बंधित जानकारी मांगी गई तो सरकार ने दो देशों के रिश्ते की दुहाई देकर जानकारी नहीं दी ….और जोत्सना के बारे मैं बिलकुल सही कहा है की ये "जरूर कॉन्वेंट का खाना और कांग्रेस का पानी पिए होगा.."

  25. 'अदा' said,

    January 29, 2010 at 2:30 am

    @ Rakesh ki baat se shat pratishat sahmat..

  26. January 29, 2010 at 5:05 am

    …@ रोहित,यहीं तो आपकी और मेरी समझ का फर्क है रोहित भाई…आप भारत रत्न का अर्थ लगा रहे हैं भारत का रत्न।जबकि अर्थ है कि भारत देश आपको सम्मान के योग्य समझता है

  27. rohit said,

    January 29, 2010 at 5:24 am

    @ प्रवीण शाह बंधू भारत रत्न तो सिर्फ एक भारतीय ही हो सकता है रही बात नेल्सन मंडेला की तो उनका भारत से कोई लेना देना नहीं था उनकी महानत की बात करे तो चे ग्वेरा से तो ज्यादा महान नहीं थे ये मेरी राय है . तो फिर चे ग्वेरा को भी भारत रत्न मिलना चाहिए. और फिर अगर महानता की बात की जाये तो मार्टिन लूथर किंग भी इसी लाइन में लगे हुए है और अब्राहिम लिंकन भी तो फिर सिर्फ मंडेला को क्यों चुना गया.उनका भारत के लिए क्या योगदान रहा है कृपया स्पष्ट करे .

  28. January 29, 2010 at 5:31 am

    @कुछ नामी / बेनामी टिप्पणीकर्ताओं से:यहाँ बात उठाई गई है, राष्ट्रवादी व्यक्तियों को शुरू से उपेक्षित किया गया है. और ये काम कांग्रेसी शासन ने खूब किया है.पुरस्कार/सम्मान चाटुकारों को ज्यादा मिला है. अपने देश में यही दुखद है.बहुत सारे विदेशी नाम उच्च दर्जे के हैं, लेकिन भारत रत्न सच्चे भारतीय सपूतों को नहीं दिया गया (जा रहा है). राजनीति में कुछ विशेष दर्जे के परिवार ने इसे अपनी थाती बना ली है. राष्ट्राभिमान, स्वाभिमान कोने में तड़प रहा है. यही दुखद है.हम शर्मिंदा हैं और कुछ नहीं.-सुलभ

  29. January 29, 2010 at 5:43 am

    आज जो इन रत्नों, अवार्डो , पुरुष्कारो की महिमा तुच्छ राजनीति ने अवमुल्यांकित कर दी है , ऐसे में बेहतर है कि सावरकर जैसे देश भक्त को वह ना ही दी जाये !

  30. aarya said,

    January 29, 2010 at 5:47 am

    सादर वन्दे!ये सियासत तवायफ का दुपट्टा है तेरे आसुओं से नम नहीं होगा .रत्नेश त्रिपाठी

  31. rohit said,

    January 29, 2010 at 6:08 am

    i like aarya's comment

  32. January 29, 2010 at 7:50 am

    कुछ और भी महान हस्तियों को मिला पद्म सम्मान जैसे दिवंगत पादरी ग्राहम स्टैंस को मिला शायद धर्मांतरण के लिये….अभी सैफ अली खान को मिला शायद हिरण के शिकार के लिये…या अपने हाथ पर अपनी प्रेमिका का नाम गुदवाने के लिए….धन्य हो

  33. abha said,

    January 29, 2010 at 10:41 am

    अरे ये क्या , ये तो हिन्दू आतंकवाद है | हिम्मत कैसे हुए ये कहने की ? और कौन सावरकर, कौन श्यामा प्रसाद मुख़र्जी ? हम तो बस सोनिया मैडम और राहुल बाबा को जानते है |कुछ नहीं सुरेश जी, चरण वंदना की प्रथा बहुत पुरानी है कांग्रेस में , जो इसमें लगे हुए है हमेशा से ही फायदे में रहे है |

  34. Common Hindu said,

    January 29, 2010 at 4:34 pm

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  35. January 30, 2010 at 10:08 pm

    अब इन सम्मानित महानुभावो के योगदान पर भी गौर करो:आमिर खान: नरेन्द्र मोदी और गुजरात को बदनाम करने, एक बीवी को तलाक देकर दूसरी फंसाने, खुद के भाई को पागल करार देने, सरकार की सरदार सरोवर योजना में टांग अडाने और चेतन भगत की स्क्रिप्ट चुराने के लिए.मल्लिका साराभाई:नरेन्द्र मोदी और गुजरात को बदनाम करने, दूरदर्शन में सेटिंग करके अपनी दर्पण एकेडेमी के नाम पर पैसा बटोरने, डांस से ज्यादा हिन्दू और गुजरात विरोधी राजनीति करने के लिए.सैफ अली खान: 'काले हिरन' (जिन्हें राजस्थान में भगवान् जम्भेश्वर का अवतार माना जाता है और भारतीय क़ानून इसकी ह्त्या को अपराध मानता है) मारने, एक बीवी को तलाक देकर दूसरी को फंसाने, सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष शर्मीला टैगोर का बेटा होने के लिए. ग्राहम स्टेंस: धर्मांतरण का धंधा करने (जो मदम सोनिया का सबसे प्रिय काम है)चटवाल: बैंको के साथ धोखाधड़ी करने (शायद इसके जारी कोंग्रेस को भी फंडिंग की होगी)यही सिलसिला चलता रहा तो एक दिन अफजल गुरु, कसाब और ओसामा बिनलादेन को भी कोंग्रेस द्वारा भारत रत्न दिया जा सकता है.

  36. January 31, 2010 at 7:22 am

    सुरेश चिपलुनकर जी जो पोस्ट मैने लिखी है उसमें लिखी गयी जानकारी मुझे मेरे मेल के ज़रिए प्राप्त हुई थी जिसको मैने संपादित करके सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। जहां तक आपकी पोस्ट का सवाल है मैने उसे अब पढ़ा है । आपकी पोस्ट पढ़ने के बाद मुझे ज्ञात हुआ कि जो लेख मुझे मेरे दोस्त की मेल द्वारा प्राप्त हुआ था दरअसल वो आपका ही था। मै इसके लिये बाकायदा ब्लाग पर भी माफी मांग सकता हूं क्योंकि मुझसे ये गलती अंजाने में हुइ है। मै आपके ब्लाग पर कभी नहीं गया क्योंकि अगर जाता तो मुझे ये पता चल जाता कि दरअसल जो लेख मुझे मेरे मित्र की मेल द्वारा प्राप्त हुआ वो आपका था। चूंकि मुझे उसमें लिखी जानकारी सार्थक लगी इसलिये मैने उसे अपने ब्लाग पर प्रकाशित करना उचित समझा। वैसे भूल सुधार करने के लिये मैने आपके ब्लाग का लिंक अपने ब्लाग पर बाकायदा नाम के साथ प्रकाशित कर दिया। मैने किसी गलत भावना के साथ पोस्ट प्रकाशित नहीं की है। और मुझे आशा है कि आपसे माफी का हकदार हूं।

  37. February 2, 2010 at 4:56 pm

    गणेश परिक्रमा की रीत तो सनातन है , पता नहीं कब जायेगी ?


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