>इस बार कुंभ में ही होगा नेता लोगो का उद्धार?

>कुंभ का मेला लग गया है ,लगभग तीन महीनो तक चलेगा |हर कोई सोच रहा है की इस बार हरिद्वार जाकर पवित्र गंगा नदी में डूबकी लगा ही आये |बात भी सही है बहुत दिनों बाद ऐसे मौका मिला है और हरिद्वार तो हरि का द्वार है ,मनोकामना पूर्ण हो सकती है |बात अगर कुंभ की हो और राजनेता लोगो को खबर न हो तो एक अटपटा सा लगता है|लेकिन इस बार तो हर कोई हरिद्वार जाने की बात कर रहे हैं |हमारे दो प्रसिद्द नेता जिनकी 2009 चुनाव में कुछ स्थिति ठीक नहीं रही कुंभ में डूबकी लगाने की बात कुछ इस तरह कर रहे है आजकल |पहले बड़े नेता जी कहते है की ससुरा अब तो जनता समझ चूकी है वोट ही नहीं करती हैं ,तो दूसरा फटाक से जबाब देता है हाँ नेताजी पिछले लोकसभा चुनाव में सारा प्रयास ही बेकार हो गया |पहले ने कहा सिर्फ माल कमाने में रहोगे ,जनता के उपर कुछ ध्यान ही नहीं दोगे तो होगा क्या ?दूसरे नेता महोदय कहते है हाँ मुझे भी लगता है की जनता तो नाखुश है ही लगता है भगवान भी मुझसे नाराज़ चल रहे है |देखिये न इस बार तो हम सांसद भी नहीं बन पाए ,पार्टी भी शून्य पर बोल्ड हो गयी |पहले जब मंत्रालय था तो बहुत बड़ा बंगलो मिला था अब तो पहले उसमे आग लगी और अब उससे हाथ धोना पड़ा |लगता है मुझे कुछ करना ही होगा ,पहले नेताजी अब अपना राग अलापना शुरू करते है |कहते है की मेरा भी कुछ इसी तरह का समाचार है पहले जनता ने साथ छोड़ा अब लगता है ऊपर वाला भी छोड़ रहा हैं |देखिये न इस बार पार्टी आसमान से जमीन पर आ गयी ,पिछले बार मंत्री पद मिला था तो देश- विदेश में कुछ नाम भी कमा लिए थे अब तो कुछ भी नहीं हो पा रहा है |अब तो नयी मंत्री साहिबा कौन – कौन काला उजला पत्र लाने की बात कर रहीं हैं |दोनों अपनी अपनी चिंता व्यक्त कर रहे थे ,तभी एक तीसरा भी आ गया उन्होंने कहा की देखिये पहले तो हमलोगों की नयी रणनीति का मिटटी पलीत हो गया अब अपना पुराना यार भी मुझे छोड़ कर नया सुर अलाप रहा है |तीनो महोदय अपनी -अपनी चिंता कर रहे थे तभी अचानक एक साधू महाराज वहां से गुजर रहे थे तीनो को देख कर कहा वत्स क्या बात है |तीनो ने साथ में कहा लगता है महाराज हमारी राजनीती का ढलान आ गया है ,सब कुछ उल्टा हो रहा है ,कहीं भी सफलता हाथ नहीं लग रही है |कभी जो सीट अपनी पुस्तैनी हुआ करती थी वो भी इस बार निकल गयी |पहले वाले दोनों नेताओ न भी कुछ इसी तरह की मुसीबतों के बारे में महाराज को बताया |महाराज ने कुछ सोचा फिर कहा की ऐसे करो तुम्हारे भाग्य फल के अनुसार तुमलोगों का समय कुछ ठीक नहीं चल रहा है |तीनो ने टपक से कहा की महाराज हमारे राज्य में कुछ दिनों में चुनाव होने वाले है हमलोगों का क्या होगा ,कुछ उपाय कीजिये |महाराज ने कहा अब तो एक ही उपाय है की जाओ और अपने पुराने पापो का प्राश्चित करो |तीनो ने पूछा वो कैसे होगा महाराज ,महाराज ने कहा जाओ और हरिद्वार के कुंभ में डूबकी लगाओ और प्राण करो की सब कुछ नहीं लूटेंगे बस थोडा थोडा ही |तीनो को यह उचित लगा और तीनो चल पड़े हरिद्वार के द्वार |

>अब तू वापस नहीं आयेगा ?

>तू चला गया ,अब वापस नहीं आएगा

हमें याद तेरी आएगी ,

पर अब शायद तू नहीं आएगा ,

तूने हमें सिखाया ,

कैसे जीते है

कैसे गमों में भी मुस्कुराते है ,

कैसे हर मुसीबत को हँस कर टाल देते हैं ,

दुश्मनो को भी कैसे

दोस्त बनाते हैं ,

हर मोड़ पर कैसे अपनों का साथ निभाते है ,

पर अब तो तू ही छोड़ गया

हमें इस मझधार में

अब कैसे पार होगी हमारी

नैया इस भंवर से ,

कौन दिखाएगा हमें रास्ता

कैसे जायेंगे हम सही राह पर

कौन बताएगा हमें इस

दुनिया की रीति ,

कैसे समझ पाएंगे हम

कठिन से कठिन नीति .

तुम थे तो सब आसान लगता था ,

अब तो तुम ही नहीं हो ,

अब हर कुछ एक बोझ सा लगने लगा है ,

पर अब इनसब बातो का मतलब ही क्या ?

अब तो तू ही चला गया ,हमें छोड़ के

अब तू वापस नहीं आएगा

वापस नहीं आएगा |

>एक गज़ल : आंधियों से न कोई गिला कीजिए …

>आँधियों से न कोई गिला कीजिए
लौ दिए की बढ़ाते रहा कीजिए

सर्द रिश्ते भी इक दिन पिघल जाएगी
गुफ़्तगू का कोई सिलसिला कीजिए

दर्द-ए-जानां भी है,रंज-ए-दौरां भी है
क्या ज़रूरी है ख़ुद फ़ैसला कीजिए

मैं वफ़ा की दुहाई तो देता नहीं
आप जितनी भी चाहे जफ़ा कीजिए

हमवतन आप हैं ,हमज़बां आप हैं
दो दिलों में न यूँ फ़ासला कीजिए

आप गै़रों से इतने जो मस्रूफ़ हैं
काश !’आनन्द’ से भी मिला कीजिए

-आनन्द.पाठक

मस्रूफ़ = व्यस्त

सुप्रीम कोर्ट : हुबली का ईदगाह मैदान सार्वजनिक उपयोग के लिये – उमा भारती की नैतिक जीत… Hubli Idgah Land Issue, Supreme Court, Anjuman-BJP

हुबली (कर्नाटक) में कई वर्षों से चल रहे ईदगाह मैदान के बारे में अन्ततः सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि ईदगाह का यह मैदान हुबली-धारवाड़ नगरपालिका निगम के स्वामित्व का माना जायेगा, तथा किसी भी अन्य संगठन को इस सम्पत्ति पर दावा प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं है।

कुछ लोग भूल गये होंगे इसलिये आईये पूरे मामले पर फ़िर से एक निगाह डालते हैं –

हुबली के ईदगाह के मैदान का भूमि विवाद सन् 1921 से चल रहा है, जब हुबली नगरपालिका ने स्थानीय अंजुमन-ए-इस्लाम को इस मैदान का 1.5 एकड़ हिस्सा नमाज के लिये कुछ शर्तों पर दिया था। शुरु से ही शर्तों का उल्लंघन होता रहा, प्रशासन, सरकारें आँखें मूंदे बैठे रहे। जब हिन्दूवादी संगठनों ने इस पर आपत्ति उठाना शुरु किया तब हलचल मची, इस बीच 1990 में अंजुमन ने इस भूमि पर पक्का निर्माण कार्य लिया, जिसने आग में घी डालने का काम कर दिया, और जब सरकार ने इस निर्माण कार्य को अतिक्रमण कहकर तोड़ने की कोशिश की तब मामला न्यायालय में चला गया, फ़िर जैसा कि होता आया है हमारे देश के न्यायालय न्याय कम देते हैं “स्टे ऑर्डर” अधिक देते हैं, मामला टलता गया, गरमाता गया, साम्प्रदायिक रूप लेता गया। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती ने इस मैदान पर जब तिरंगा फ़हराने की कोशिश की थी, तब “स्वार्थी तत्वों” दंगे भड़काये गये थे और पुलिस गोलीबारी मे 9 लोग मारे गये थे, उमा भारती के खिलाफ़ स्थानीय न्यायालय ने गैर-ज़मानती वारंट जारी किया था और उन्हें संवैधानिक बाध्यताओं के चलते अपना मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 8 जून 1992 के अपने निर्णय में स्पष्ट कहा है कि –

1) ईदगाह मैदान अंजुमन-ए-इस्लाम की निजी सम्पत्ति नहीं है यह हुबली-धारवाड़ नगरपालिक निगम की सम्पत्ति है।

2) मैदान का कुछ हिस्सा, अंजुमन को वर्ष में “सिर्फ़ दो दिन” अर्थात बकरीद और रमज़ान के दिन नमाज़ अदा करने के लिये दिया गया है।

3) अंजुमन द्वारा जो स्थाई निर्माण किया गया है उसे 45 दिनों के अन्दर हटा लिया जाये।

4) अंजुमन इस ज़मीन का उपयोग किसी भी व्यावसायिक अथवा शैक्षणिक गतिविधियों के लिये नहीं कर सकता।

इस निर्णय के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी, जिस पर न्यायालय ने “स्टे” दिया था। संघ परिवार(?) ने भी सुप्रीम कोर्ट में दस्तावेज़ जमा करके 19 अप्रैल 1993 को उच्चतम न्यायालय में इस मैदान को सार्वजनिक सम्पत्ति घोषित करने की मांग की थी।

शुरुआत में स्थानीय नागरिकों ने इस सार्वजनिक मैदान के नमाज़ हेतु उपयोग तथा पक्के निर्माण पर आपत्ति ली थी, फ़िर एक संगठन ने 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन यहाँ तिरंगा फ़हराने की अनुमति मांगी, जिसका अंजुमन ने विरोध किया और तभी से मामला उलझ गया। असल में अंजुमन का इरादा यहाँ एक व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बनाकर नीचे दुकानें और ऊपर धार्मिक गतिविधि के लिये पक्का निर्माण करके समूचे मैदान पर धीरे-धीरे कब्जा जमाने का था (बांग्लादेशी भी ऐसा ही करते हैं), लेकिन भाजपा और अन्य हिन्दू संगठनों के बीच में कूदने के कारण उनका खेल बिगड़ गया। फ़िर भी जो स्थाई निर्माण इतने साल तक रहा और उसकी वजह से अंजुमन को जो भी आर्थिक फ़ायदा हुआ होगा, कायदे से वह भी सुप्रीम कोर्ट को उनसे वसूल करना चाहिये।

अब देखना यह है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद उस जगह से अंजुमन का अतिक्रमण हटाने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं (क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों को लतियाने की परम्परा रही है इस देश में)। वैसे तो यह पूरी तरह से एक भूमि विवाद था जिसे अतिक्रमणकर्ताओं ने “साम्प्रदायिक” रूप दे दिया, लेकिन फ़िर भी उमा भारती के लिये व्यक्तिगत रूप से यह एक नैतिक विजय कही जा सकती है।

इसलिये ऐ, “सेकुलर रुदालियों,” उठो, चलो काम पर लगो… कर्नाटक में भाजपा की सरकार है… अपने पालतू भाण्ड चैनलों को ले जाओ, कुछ मानवाधिकार संगठनों को पकड़ो, एकाध महेश भट्टनुमा सेलेब्रिटी(?) को पढ़ने के लिये स्क्रिप्ट वगैरह दो… कहीं ऐसा न हो कि येदियुरप्पा “अल्पसंख्यकों” पर “भारी अत्याचार” कर दें…

http://news.rediff.com/interview/2010/jan/14/hubli-idgah-maidan-is-for-public-use.htm

>जिन्दगी तो ऐसी है

>

ज़िन्दगी-जिन्दगी जिन्दगी तो ऐसी है (ऐसी है-२)
पूछो न पर कैसी है, (कैसी है-२)
कभी ये हसाएंकभी ये रुलाए-२
आंखों से न कहकर
ये आंसुओं से कहती है
ज़िन्दगी-जिन्दगी जिन्दगी तो ऐसी है (ऐसी है-२)
कोई है अकेलाकोई अलबेला है
कोई मस्तमौलाकही दुख का रेला है
ये हसेंवो रोयेंवो खोएं ये पाएं
ये तो दुनिया में 
हर घर झमेला है
ज़िन्दगी-जिन्दगी जिन्दगी तो ऐसी है (ऐसी है-२)
राजनेता लड़ाता धर्म के नाम पर,
सब कुछ वो बांट खाता,
मजहब के नाम पर
आम आदमी आम रह जाता है
मिल बांटकर वो कंकर ही खाता है
पर कौआ जो खाये मोती
अरे हंस चुगे दाना,
कलयुग में बन गया है,
देखो अब यही फसाना।
ज़िन्दगी-जिन्दगी जिन्दगी तो ऐसी है (ऐसी है-२)
🙂 नरेन्द्र निर्मल 


>सर्वशक्तिमान ईश्वर की झूठी अवधारणा को ध्वस्त करने के लिए खगोलशास्त्र एवं खगोलीय घटनाओं का वैज्ञानिक विष्लेषण आज की महती आवश्यकता है

>

सहस्त्राब्दि का सबसे लम्बा सूर्यग्रहण सम्पन्न हुआ । एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के हम प्रत्यक्षदर्शी बने मगर इसके साथ ही साथ बड़े पैमाने पर तर्कविहीन, रूढ़ीवादी, अवैज्ञानिक अंधविश्वास जनित कार्यव्यापार के भी मूक दर्शक बने, जैसे कि हमेशा ही ऐसी घटनाओं के समय बनते आएँ हैं। जब भी कोई इस प्रकार की घटना घटित होती है हमें भारतीय समाज की दुर्दशा का मार्मिक नज़ारा देखने को मिलता है, जब अनपढ़ तो अनपढ़, समाज को आगे ले जाने के लिए जिम्मेदार पढे़-लिखे लोग भी अपनी तर्कशक्ति को ताक पर रखकर बुद्धिहीनों की तरह आचरण करने लगते हैं। हज़ारों-लाखों लोगों के इस प्रकार कठपुतलियों की तरह व्यवहार करते देख उनकी तुलना उन पशु-पक्षियों से करने को मन करता है जो सूर्यग्रहण के अंधकार से भ्रमित होकर अपने नीड़ों को लौटने लगते हैं, या जिस प्रकार गाय-बकरियाँ शाम होने के भ्रम में वापस घर लौटने लगतीं हैं। ज्ञान-विज्ञान के अभाव में उनका यह आचरण आश्चर्य पैदा नहीं करता लेकिन पढ़े लिखे मनुष्यों के पास प्रकृति से संबंधित अंधिकांश ज्ञान उपलब्ध होने के बावजूद ऐसा व्यवहार आश्चर्य के साथ-साथ दुखी भी करता है।
हम उन लोगों की बात कर रहे हैं जिन्होंने ज्ञान-विज्ञान से लैस होने के लिए अपना मूल्यवान समय तो ज़ाया किया है परन्तु उसका उपयोग करने का जज़्बा उनमें पैदा ही नहीं हो सका। ऐसे लाखों लोग हमेशा की तरह सूर्यग्रहण का तथाकथित सूतक शुरू होते ही सारी मानवीय गतिविधियों पर रोक लगाकर घर में दुबक कर बैठ गए। सूर्यग्रहण शुरू होते ही खाना-पीना प्रतिबंधित कर व्रत सा धारण कर लिया और कुछ लोग सभी खाने-पीने के पदार्थों में तुलसी पत्ता डालकर उन्हें किसी अज्ञात दुष्प्रभाव से बचाने की कवायद में लग गए। सूर्यग्रहण समाप्त होने पर तथाकथित मोक्ष की बेला में बीमार कर देने वाले बर्फीले ठंडे नदियों-तालाबों के पानी में उतरकर पवित्र होने के विचित्र भाव से आल्हादित होने लगे। मंदिरों में एकत्रित हो मूर्तियों के सामने नतमस्तक होकर संकट से उबारने के लिए की गुहार लगाने वाले सीधे-साधे अशिक्षित ग्रामीणों की बात अलग है, परन्तु यहीं सब करते हुए जब पढ़े-लिखे लोगों की जमात को देखना पड़ता है तो हमारे समाज के एक दुखद पहलू का सामना करते हुए बरबस आँखों में आँसू आ जाते हैं। पढ़े-लिखों का दयनीय चेहरा तब और सामने आने लगता है जब वे अपने इन तमाम अंधविश्वासी कृत्यों को उचित ठहराने के लिए इस अंधाचरण पर स्वरचित अवैज्ञानिक अवधारणाओं का मुलम्मा चढ़ाने का प्रयास करने लगते हैं।
दरअसल यह पूरी तरह से राज्य का विषय है। ज्ञान-विज्ञान की प्रगति के इस दौर में किसी भी राज्य की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने नागरिकों को अज्ञान के अंधकार से बाहर निकाले। रूढ़ीवाद, अंधविश्वास एवं अंधतापूर्ण आचरण पर अंकुश लगाए, उन्हें वैज्ञानिक विचारधारा से लैस करे, लेकिन देखने में आता है कि इन सब मसलों पर राज्य की भूमिका एकदम निराशाजनक होती है। निराशाजनक शब्द शायद ठीक नहीं है…….राज्य की बागडोर अगर अंधविश्वासी, कूपमंडूक लोगों के हाथों में हो तो क्या उम्मीद की जा सकती है। राज्य के वर्ग चरित्र को देखकर यह कहा जा सकता है कि राज्य जनमानस के बीच अंधविश्वासों, रूढ़ीवाद, अवैज्ञानिक चिंतन को पालने-पोसने बढ़ावा देने में लगा हुआ है, तभी सूर्यग्रहण जैसी महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के बारे में ज्ञानवर्धन की कवायद करने की बजाय किसी अज्ञात भय संकट के वातावरण का सृजन करते हुए स्कूल-कालेजों के बच्चों को छुट्टी दे दी जाती है।
हमारा मानना है कि खगोल विज्ञान वह महत्वपूर्ण विज्ञान है जिसका समुचित और सही-सही ज्ञान मानव समाज को सत्य की खोज की भटकन से मुक्त कर सही दिशा सही रास्ते की ओर उन्मुख करता है जो कि बेहद जरूरी है। विषेशकर इस स्थिति में जब आज भी पृथ्वी को शेषनाग के फन पर रखी होने की गप्प पर विश्वास करने वालों और सूर्यग्रहण को ईश्वरीय प्रकोप मानने वालों की हमारे देश में कोई कमी नहीं है। पृथ्वी, ब्रम्हांड, एवं मानव समाज की समस्त गतिविधियों को संचालित करने वाले सर्वशक्तिमान ईश्वर की झूठी अवधारणा को ध्वस्त करने के लिए खगोलशास्त्र एवं खगोलीय घटनाओं का वैज्ञानिक विष्लेषण आज की महती आवश्यकता है, वर्ना सूर्यग्रहण-चन्द्रगहण पर उपवास कर संकट से मुक्ति की कामना करने वाले पढ़े-लिखों की संख्या बढ़ती ही रहेगी और भारतीय समाज कभी भी अज्ञान के अंधकार से मुक्त नहीं हो पाएगा।

>ये कैसी आजदी

>

जाने क्या हो गया मेरे भारत को , क्या भारत की माताओं ने वीर जनना बंद कर दिया । क्या इस देश में फिर भगत सिंह ,सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गाँधी जैसे लाल पैदा नहीं होंगे । ये एक प्रश्न नहीं ये एक उम्मीद है जो शायद अब टूटती जा रही है, पता नहीं जब से होश संभाला तब से ही लग रहा था की मेरा देश भारत गुलाम है , शायद आप मेरी बात स सहमत न हों । पिछले १० सालों में मै देख रहा हूँ चंद लोग मिलकर पुरे देश के भाग्यविधाता बन बैठे है । ये लोग जब चाहें जैसा चाहें देश को लूट रहे है , सरकार बोझ बन गयी है देश पर । सर नेता लोग आपस में मिल बाँट कर पुरे देश को लूट रहे है , भ्रस्टाचार अपने चरम सीमा पर है , कालाबाजारी अबतक के सबसे उपरी स्तरपर है , महंगाई ने सारे रिकॉर्ड तोर डाले है , नेता लोग अब खुलकर घोटाले करते है, प्रशासन सरेआम रिशवत की लेते और मांगते है , शिक्षा तो अब गरीबों के लिए अभिशाप हो गयी है , सरेआम बलात्कार मामूली बात हो गयी है , १० -२० लोगो के मरने की खबर तो अख़बार बाले भी नहीं छापते है , लूट खसूट की तो बात करना भी बेमानी है , पुलिस से ज्यादा लोग अपराधियों के शरण में जाना पसंद करते है , कानून अब अमीरों गरीबों , उचें , नीचें , छोटे , बड़ें का अंतर खूब जानती है , नेताओं को पता है देश कैसे चलता है समाज कैसे चलता है , रिश्वत कैसे ली जाती है , वोट कैसे और कान्हा बिकता है , देश की संसद अब दूकान हो गयी है , यंहा सांसद भी खरीदे और बेचे जा सकते है । पुलिस में आप का हर काम पैसे से हो सकता है ।

देश का मामूली आदमी आज त्राहिमाम हो रहा है , गरीबों का जीना दूभर हो गया है , निर्दोषों से पुरे देश का जेल भरा परा है ,और अपराधी संसद में बैठे है , हाय रे मेरे देश का दुर्भाग्य , पढ़े लिखे लोग चपरासी की नौकरी को भी तरसते है और मुर्खाधिश मंत्री बने बैठे है , जाती पाती , धर्मं समाज , प्रान्त भाषा , के नाम पर लोग दंगे फैलाते है और आपना उल्लू सीधा करते है ।
किसी ने सच ही कहा है :-

सोने से तुलने लगे दो कौरी के लोग ।

मूर्खों को सम्मान दे कैसे कैसे लोग।

अंत में हे भारत की माताओं अब फिर से सुभाष और गाँधी को जन्म दो ताकि इस देश को दूसरी आज़ादी मिल सके । इस देश में फिर स अमन हो , शांति हो , लोग एक दुसरे से प्यार करें , देश फिर से सोने की चिरिया नहीं सोने का हांथी बने ,

उम्मीद में ………… प्यारा देश भारत …………..

>नवगीत: गीत का बनकर विषय जाड़ा –संजीव ‘सलिल’

>नवगीत:

संजीव ‘सलिल’

गीत का बनकर

विषय जाड़ा

नियति पर

अभिमान करता है…

कोहरे से

गले मिलते भाव.

निर्मला हैं

बिम्ब के

नव ताव..

शिल्प पर शैदा

हुई रजनी-

रवि विमल

सम्मान करता है…

गीत का बनकर

विषय जाड़ा

नियति पर

अभिमान करता है…

फूल-पत्तों पर

जमी है ओस.

घास पाले को

रही है कोस.

हौसला सज्जन

झुकाए सिर-

मानसी का

मान करता है…

गीत का बनकर

विषय जाड़ा

नियति पर

अभिमान करता है…

नमन पूनम को

करे गिरि-व्योम.

शारदा निर्मल,

निनादित ॐ.

नर्मदा का ओज

देख मनोज-

‘सलिल’ संग

गुणगान करता है…

गीत का बनकर

विषय जाड़ा

खुदी पर

अभिमान करता है…

******

क्या “वन्देमातरम” के बाद अब “जन-गण-मन” भी साम्प्रदायिक बनने जा रहा है? (एक माइक्रो पोस्ट)

यह एक सामान्य सा लेकिन जरूरी सरकारी प्रोटोकॉल है कि उस प्रत्येक शासकीय कार्यक्रम में जिसमें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री तथा राज्यपाल अध्यक्षता कर रहे हों उस कार्यक्रम में “जन-गण-मन” गाया भले न जाये लेकिन उसकी धुन बजाना आवश्यक है। हाल ही में केरल के त्रिवेन्द्रम में 3 जनवरी को 97 वीं भारतीय साइंस कांग्रेस का उदघाटन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया था। इस साइंस कांग्रेस के उदघाटन समारोह में देश-विदेश के बड़े-बड़े भारतीय वैज्ञानिकों ने शिरकत की थी। केरल दौरे पर प्रधानमंत्री ने केरल प्रदेश कांग्रेस के दो अन्य कार्यक्रमों में भी उपस्थिति दर्ज करवाई थी।

लेकिन अत्यन्त खेद के साथ सूचित किया जाता है कि तीनों ही कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत नहीं बजाया गया, बाद वाले दोनों कार्यक्रम भले ही पार्टी स्तर के हों (लेकिन यह पार्टी भी तो अपनी 125 वीं सालगिरह मना रही है, और जन-गण-मन तथा वन्देमातरम की ही रोटी खा रही है अब तक), लेकिन पहला कार्यक्रम एक शासकीय, अन्तर्राष्ट्रीय और बेहद महत्वपूर्ण कार्यक्रम था।

मीडिया के सूत्रों के अनुसार कार्यक्रम आयोजकों को प्रधानमंत्री ऑफ़िस से यह निर्देश मिले थे कि इस कार्यक्रम में जन-गण-मन नहीं बजाया जाये, क्योंकि कई कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत को जो पर्याप्त सम्मान मिलना चाहिये वह नहीं मिल पाता। चकरा गये ना??? यानी कि भारतीय साइंस कांग्रेस के कार्यक्रम को प्रधानमंत्री ऑफ़िस ने एक सिनेमाघर में उपस्थित टपोरी दर्शकों के स्तर के बराबर समझ लिया, जहां राष्ट्रगीत को सम्मान नहीं मिलने वाला? अर्थात जिस अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में देश के बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता, वरिष्ठ नागरिक, सम्माननीय वैज्ञानिक तथा केरल के उच्च प्रशासनिक अधिकारी मौजूद हों, वहाँ राष्ट्रगीत को उचित सम्मान नहीं मिलता??? कैसी अजीब सोच है…

इससे कई सवाल अवश्य उठ खड़े होते हैं, जैसे –

1) इस घटना के लिये किसे जिम्मेदार माना जाये, प्रधानमंत्री कार्यालय को या कार्यक्रम आयोजकों को?

2) क्या इस मामले में राष्ट्रगीत के अपमान का केस दायर किया जा सकता है? यदि हाँ तो किस पर?

3) समाचार पत्र, ब्लॉग में प्रकाशित इस समाचार पर क्या कोई न्यायालय स्वयं संज्ञान लेकर सम्बन्धितों को नोटिस दे सकता है?

4) वन्देमातरम के बाद अब जन-गण-मन को किसके इशारे पर निशाना बनाया जा रहा है?

यदि इसमें कोई साजिश नहीं है तब क्यों इस गलत और आपत्तिजनक निर्णय के लिये अब तक किसी अधिकारी, जूनियर मंत्री, आयोजकों आदि में से किसी को सजा नहीं मिली? राहुल महाजन जैसे छिछोरे और दारुकुट्टे का स्वयंवर दिखाते सबसे तेज चैनल देश के अपमान की इस खबर को क्यों दबा गये?

वन्देमातरम तो “साम्प्रदायिक”(?) बना ही दिया गया है, क्या गोरे साहबों की वन्दना करने वाला यह गीत भी जल्दी ही “साम्प्रदायिक” बनने जा रहा है? सरस्वती वन्दना साम्प्रदायिक है, वन्देमातरम साम्प्रदायिक है, दूरदर्शन का लोगो “सत्यं शिवं सुन्दरम्” भी साम्प्रदायिक है, पाठ्यपुस्तकों में “ग” से गणेश भी साम्प्रदायिक है (उसकी जगह गधा कर दिया गया है), रेल्वे में ई अहमद ने नई ट्रेनों की पूजा पर रोक लगा दी है, इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय कि “गीता” को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित किया जाये, भी साम्प्रदायिक है। क्या एक दिन ऐसा भी आयेगा कि जब “जय हिन्द” और तिरंगा भी साम्प्रदायिक हो जायेगा?

http://www.organiser.org/dynamic/modules.php?name=Content&pa=showpage&pid=327&page=4

महाराष्ट्र की लावणी/तमाशा परम्परा को जीवित करती और “जेण्डर बायस” की त्रासदी दर्शाती नई मराठी फ़िल्म “नटरंग”… Natrang, Atul Kulkarni, Marathi Movies, Tamasha

महाराष्ट्र की ग्रामीण लोक-परम्परा में “लावणी” और “तमाशा” का एक विशिष्ट स्थान हमेशा से रहा है। यह लोकनृत्य और इसमें प्रयुक्त किये जाने वाले गीत-संगीत-हावभाव आदि का मराठी फ़िल्मों में हमेशा से प्रमुख स्थान रहा है। बीते कुछ वर्षों में हिन्दी फ़िल्मों के बढ़ते प्रभाव, फ़िल्मों के कथानक का “कमाई” के अनुसार बाज़ारीकरण, तथा मराठी फ़िल्मों में भी पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते असर की वजह से अव्वल तो ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनने वाली फ़िल्में ही कम हो गईं और उसमें भी लावणी और तमाशा के गीत तथा दृश्य मृतप्राय हो गये थे।

महाराष्ट्र के लोगों में नाटक-कला-संस्कृति-फ़िल्में-गायन-वादन-खेल आदि की परम्परा सदा से ही पुष्ट रही है। इसमें भी “नाटक” और “गायन” प्रत्येक मराठी के दिल में बसता है, और यदि संगीत-नाटक (जिसमें कहानी के साथ गीत भी शामिल होते हैं) हो तो क्या कहने। बदलते आधुनिक युग के साथ महाराष्ट्र के ग्रामीण भागों में भी लावणी-तमाशा की परम्परा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। अलबत्ता मुम्बई जैसे महानगर अथवा नासिक, पुणे, औरंगाबाद, सोलापुर, कोल्हापुर आदि शहरों में अच्छे नाटकों के शो आज भी हाउसफ़ुल जाते हैं।

1 जनवरी 2010 को महाराष्ट्र की इस विशिष्ट परम्परा को पुनर्जीवित करने का प्रयास करते हुए एक फ़िल्म प्रदर्शित हुई है, नाम है “नटरंग”, रिलीज़ होने से पहले ही इसका संगीत बेहद लोकप्रिय हो चुका था और रिलीज़ होने के बाद इस फ़िल्म ने पूरे महाराष्ट्र में धूम मचा रखी है। जी टॉकीज़ द्वारा निर्मित यह फ़िल्म प्रख्यात मराठी लेखक और महाराष्ट्र साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष आनन्द यादव के उपन्यास पर आधारित है और इसमें मुख्य भूमिका निभाई है “अतुल कुलकर्णी” ने। अतुल कुलकर्णी को हिन्दी के दर्शक, – हे-राम, पेज 3, चांदनी बार, रंग दे बसन्ती, ये है इंडिया, जेल आदि फ़िल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में देख चुके हैं।

 दो साल पहले जब इस फ़िल्म के उपन्यास पर आधारित पटकथा जी टॉकीज़ वालों को सुनाई गई थी, उस समय इसकी कहानी के फ़िल्म बनने पर “कमाऊ” होने में निश्चित रूप से संशय था, क्योंकि लावणी-तमाशे की मुख्य पृष्ठभूमि पर आधारित ग्रामीण कहानी पर फ़िल्म बनाना एक बड़ा जोखिम था, लेकिन जी टॉकीज़ वालों ने निर्देशक की मदद की और यह बेहतरीन फ़िल्म परदे पर उतरी। रही-सही कसर अतुल कुलकर्णी जैसे “प्रोफ़ेशन” के प्रति समर्पित उम्दा कलाकार ने पूरी कर दी।

हिन्दी के दर्शक अतुल के बारे में अधिक नहीं जानते होंगे, लेकिन मराठी से आये हुए अधिकतर कलाकार चाहे वह रीमा लागू हों, डॉ श्रीराम लागू हों, नाना पाटेकर, अमोल पालेकर, मधुर भण्डारकर या महेश मांजरेकर कोई भी हों… सामान्यतः नाटक और मंच की परम्परा के जरिये ही आते हैं इसलिये फ़िल्म निर्देशक का काम वैसे ही आसान हो जाता है। हिन्दी में भी परेश रावल, सतीश शाह, पंकज कपूर, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी आदि मंजे हुए कलाकार नाटक मंच के जरिये ही आये हैं। बात हो रही थी अतुल कुलकर्णी की, इस फ़िल्म की पटकथा और कहानी से वे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने सात महीने की एकमुश्त डेट्स निर्देशक को दे दीं, तथा इस बीच अपने रोल के साथ पूरा न्याय करने के लिये उन्होंने मणिरत्नम, विशाल भारद्वाज और रामगोपाल वर्मा जैसे दिग्गजों को नई कहानी या पटकथा सुनाने-सुनने से मना कर दिया।

इस फ़िल्म में अतुल कुलकर्णी का रोल इंटरवल के पहले एक पहलवान का है, जबकि इंटरवल के बाद तमाशा में नृत्य करने वाले एक हिजड़ानुमा स्त्री पात्र का है, जिसे “तमाशा” में मुख्य स्त्री पात्र का सहायक अथवा “नाच्या” कहा जाता है। फ़िल्म में पहलवान दिखने के लिये पहले दुबले-पतले अतुल कुलकर्णी ने अपना वज़न बढ़ाकर 85 किलो किया और जिम में जमकर पसीना बहाया। फ़िर दो माह के भीतर ही भूमिका की मांग के अनुसार इंटरवल के बाद “स्त्री रूपी हिजड़ा” बनने के लिये अपना वज़न 20 किलो घटाया। सिर्फ़ तीन माह के अन्तराल में अपने शरीर के साथ इस तरह का खतरनाक खिलवाड़ निश्चित रूप से उनके लिये जानलेवा साबित हो सकता था, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फ़िजिकल ट्रेनर शैलेष परुलेकर की मदद से यह कठिन काम भी उन्होंने पूरा कर दिखाया।

अतुल कुलकर्णी ने 30 वर्ष की आयु में 1995 में नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से कोर्स पूरा किया, उसी के बाद उन्होंने अभिनय को अपना प्रोफ़ेशन बनाना निश्चित कर लिया। अतुल कुलकर्णी ने अब तक 4 भाषाओं में आठ नाटक, 6 भाषाओं में छब्बीस फ़िल्में की हैं तथा उन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। उनका कहना है कि फ़िल्म की भाषा क्या है, अथवा निर्देशक कौन है इसकी बजाय कहानी और पटकथा के आधार पर ही वे फ़िल्म करना है या नहीं यह निश्चित करते हैं, मुझे अधिक फ़िल्में करने में कोई रुचि नहीं है, अच्छी फ़िल्में और रोल मिलते रहें बस… बाकी रोजी-रोटी के लिये नाटक तो है ही…”।

अब थोड़ा सा इस अदभुत फ़िल्म की कहानी के बारे में…

फ़िल्म का मुख्य पात्र गुणा कागलकर अर्थात अतुल एक ग्रामीण खेत मजदूर हैं। गुणाजी को सिर्फ़ दो ही शौक हैं, पहलवानी करना और तमाशा-लावणी देखना, उसके मन में एक दबी हुई इच्छा भी है कि वह अपनी खुद की नाटक-तमाशा कम्पनी शुरु करे, उसमें स्वयं एक राजा की भूमिका करे तथा विलुप्त होती जा रही लावणी कला को उसके शिखर पर स्थापित करे। ग्रामीण पृष्ठभूमि और सुविधाओं के अभाव में उसका संघर्ष जारी रहता है, वह धीरे-धीरे गाँव के कुछ अन्य नाटकप्रेमी लोगों को एकत्रित करके एक ग्रुप बनाता है जिसमें लावणी नृत्य पेश किया जाना है। उसे हीरोइन भी मिल जाती है, जो उसे भी नृत्य सिखाती है। इन सबके बीच समस्या तब आन खड़ी होती है, जब “नाच्या” (स्त्री रूपी मजाकिया हिजड़े) की भूमिका के लिये कोई कलाकार ही नहीं मिलता, लेकिन गुणाजी पर नाटक कम्पनी खड़ी करने और अपनी कला प्रदर्शित करने का जुनून कुछ ऐसा होता है कि वह मजबूरी में खुद ही “नाच्या” बनने को तैयार हो जाता है। उसके इस निर्णय से उसकी पत्नी बेहद खफ़ा होती है और उनमें विवाद शुरु हो जाते हैं, उस पर गाँव की भीतरी राजनीति में नाटक की हीरोइन तो “जेण्डर बायस” की शिकार होती है साथ ही साथ हिजड़े की भूमिका निभाने के लिये गुणाजी को भी गाँव में हँसी का पात्र बनना पड़ता है। कहाँ तो गुणाजी अपने तमाशे में एक “विशालकाय मजबूत राजा” का किरदार निभाना चाहता है, लेकिन बदकिस्मती से उसे साड़ी-बिन्दी लगाकर एक नचैया की भूमिका करना पड़ती है…नाटक के अपने शौक और अपनी लावणी कम्पनी शुरु करने की खातिर वह ऐसा भी करता है। बहरहाल तमाम संघर्षों, पक्षपात, खिल्ली, धनाभाव, अपने परिवार की टूट के बावजूद गुणाजी अन्ततः अपने उद्देश्य में सफ़ल होता है और उसकी नाटक कम्पनी सफ़लता से शुरु हो जाती है, लेकिन उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली जाती है। (अतुल कुलकर्णी की हिजड़ानुमा औरत वाली भूमिका की तस्वीर जानबूझकर नहीं दे रहा हूं, क्योंकि वह देखने और अनुभव करने की बात है)

मराठी नाटकों की सौ वर्ष से भी पुरानी समृद्ध नाट्य परम्परा में लावणी-तमाशा में “नाच्या” की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यह नाच्या कभी कहानी को आगे बढ़ाने के काम आता है, कभी सूत्रधार, कभी विदूषक तो कभी नर्तक बन जाता है। इस तरह नृत्य करने वाली मुख्य नृत्यांगना के साथ ही इसका रोल भी जरूरी होता है, लेकिन जैसा कि हमारे समाज में होता आया है, “थर्ड जेण्डर” अर्थात हिजड़ों के साथ अन्याय, उपेक्षा और हँसी उड़ाने का भाव सदा मौजूद होता है, वैसा नाच्या के साथ भी जेण्डर बायस किया जाता है, जबकि अधिकतर तमाशों में यह भूमिका पुरुष ही निभाते आये हैं। मराठी नाटकों में पुरुषों द्वारा स्त्री की भूमिका बाळ गन्धर्व के ज़माने से चली आ रही है, कई-कई नाटकों में पुरुषों ने स्त्री की भूमिका बगैर किसी फ़ूहड़पन के इतने उम्दा तरीके से निभाई है कि नाटक देखते वक्त कोई जान नहीं सकता कि वह कलाकार पुरुष है। ऐसे ही एक महान मराठी कलाकार थे गणपत पाटील, जिन्होंने बहुत सारी फ़िल्मों में “नाच्या” की भूमिका अदा की, और उनके अभिनय में इतना दम था तथा उनकी भूमिकाएं इतनी जोरदार थीं कि नाटक-फ़िल्मों के बाहर की दुनिया में भी उनके बच्चों को भी लोग उनका बच्चा मानने को तैयार नहीं होते थे, अर्थात जैसी छवि हिन्दी फ़िल्मों में प्राण अथवा रंजीत की है कि ये लोग बुरे व्यक्ति ही हैं, ठीक वैसी ही छवि गणपत पाटील की हिजड़े के रूप में तथा निळू फ़ुले की “खराब आदमी” के रूप में मराठी में प्रचलित है।

मराठी नाटकों की समृद्ध परम्परा की बात निकली है तो एक उल्लेख करना चाहूंगा कि मराठी फ़िल्मों के स्टार प्रशांत दामले 1983 से अब तक नाटकों के 8000 “व्यावसायिक” शो कर चुके हैं तथा एक ही दिन में 3 विभिन्न नाटकों के 5 शो हाउसफ़ुल करने के लिये लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में उनका नाम  दर्ज है…।

चलते-चलते :-

उज्जैन में प्रतिवर्ष सरकारी खर्च और प्रचार पर कालिदास समारोह आयोजित किया जाता है, जिसमें संस्कृत और हिन्दी के नाटक खेले जाते हैं, लेकिन सारे तामझाम के बावजूद कई बार 100 दर्शक भी नहीं जुट पाते, जो दर्शक इन हिन्दी नाटकों में पाये जाते हैं, उनमें से कुछ सरकारी अधिकारी होते हैं जिनकी वहां उपस्थिति “ड्यूटी” का एक भाग है, कुछ अखबारों के कथित समीक्षक, तथा कुछ आसपास घूमने वाले अथवा टेण्ट हाउस वाले दिखाई देते हैं। जबकि इसी उज्जैन में जब महाराष्ट्र समाज द्वारा मराठी नाटक मुम्बई अथवा इन्दौर से बुलवाया जाता है, तब बाकायदा “टिकिट लेकर” देखने वाले 500 लोग भी आराम से मिल जाते हैं।

फ़िल्म रिलीज़ के मौके पर मंच पर प्रस्तुत इस फ़िल्म का एक गीत यहाँ देखा जा सकता है…

http://www.youtube.com/watch?v=79xzHDM11eQ

तथा “नटरंग” फ़िल्म का ट्रेलर यहाँ देखा जा सकता है…

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