>जामिया में होली खेलने पर छात्रों के परिचयपत्र छीने गये

>कल की सबसे आश्चर्यजनक और तानाशाही वाली एक खबर है जामिया मिल्लिया इस्लामिया से जहाँ हिंदी विभाग के छात्रों को परिसर में होली खेलने के कारण प्रोक्टर ने तलब किया है . छात्र -छात्राएं होली के पहले आखिरी क्लास के बाद आपस में रंग-गुलाल लगा रहे थे . इसी बात से नाराज सुरक्षाकर्मियों ने उनके परिचय-पत्र छीन लिए और प्रोक्टर ऑफिस आकर ले जाने की बात कही . छात्र  स्तब्ध रह गये कि आखिर उन्होंने क्या जुर्म किया है ? क्या होली खेलना गुनाह है ? एक छात्र ने दुखी मन से कहा , घर-परिवार ,दोस्तों से दूर सहपाठी हीं तो हमारे सबकुछ हैं . अब उनके साथ होली नहीं खेल सकते , तो परिसर में नहीं खेल सकते जबकि इसी परिसर में हमलोग बैठकर इफ्तार करते हैं . क्या यह भेद-भाव नहीं है हमारे साथ ?

बात सही है . यदि कोई बाहर का छात्र होता तो बात अलग थी हो सकता है जामिया का सांप्रदायिक सद्भाव नष्ट हो सकता था लेकिन जो छात्र सालों भर वहीँ पढ़ते हैं उनसे क्या खतरा था . उनके होली खेलने  से कौन सी आफत आने वाली थी ? और यदि ऐसा था तो क्यों नहीं पहले हर जगह नोटिस लगाई गयी ? यदि उन बच्चों ने रंग -गुलाल लगया तो बदले में उनके साथ ऐसा सलूक किया जायेगा ? क्या यह विश्वविद्यालय प्रशासन का भेदभाव और तानाशाही का रवैया  नहीं है ?

हिन्दी ब्लॉगिंग, सचिन तेंडुलकर से प्रेरणा और उनके टिप्स… … Hindi Blogging and Sachin Tendulkar

किसी भी खेल में 20 वर्ष गुज़ारना और लगातार अच्छा प्रदर्शन करना किसी भी खिलाड़ी के लिये एक स्वप्न के समान ही है। हाल ही में मेरे (और पूरे विश्व के) सबसे प्रिय सचिन तेण्डुलकर ने अपने क्रिकेटीय जीवन के 20 साल पूरे किये। रिकॉर्ड्स की बात करना तो बेकार ही है, क्योंकि उनके कुछ रिकॉर्ड तो शायद अब कभी नहीं टूटने वाले… कल ग्वालियर में उन्होंने वन-डे में 200 रन बनाकर एक और शिखर छू लिया…। कोई सम्मान या कोई पुरस्कार अब सचिन के सामने बौना है, भारत रत्न को छोड़कर।

अब आप सोचेंगे कि सचिन का हिन्दी ब्लॉगिंग और ब्लॉग से क्या लेना-देना? असल में सचिन तेंडुलकर ने समय-समय पर जो टिप्स अपने साथी खिलाड़ियों को दिये हैं और अपने पूरे खेल जीवन में जैसा “कर्म”, “चरित्र” और “नम्रता” दिखाई, वह मुझ सहित सभी ब्लॉगरों के लिये एक प्रेरणास्रोत है…

1) खेल के प्रति समर्पण, लगन और मेहनत –

ब्लॉगिंग और ब्लॉग के प्रति समर्पण, लगन रखना और मेहनत करना बेहद जरूरी है, खासकर “विचारधारा” आधारित ब्लॉग लिखते समय। तेंडुलकर ने अपने कैरियर की शुरुआत से जिस तरह क्रिकेट के प्रति अपना जुनून बरकरार रखा है, वैसा ही जुनून ब्लॉगिंग करते समय लगातार बनाये रखें…

2) कप्तान कोई भी रहे, प्रदर्शन एक जैसा होना चाहिये –

जिस तरह तेंडुलकर ने अज़हरुद्दीन से लेकर महेन्द्रसिंह धोनी तक की कप्तानी में अपना नैसर्गिक खेल दिखाया, किसी कप्तान से कभी उनकी खटपट नहीं हुई, वे खुद भी कप्तान रहे लेकिन विवादों और मनमुटाव से हमेशा दूर रहे और अपने प्रदर्शन में गिरावट नहीं आने दी। हिन्दी ब्लॉगिंग जगत में भी प्रत्येक ब्लॉगर को गुटबाजी, व्यक्ति निंदा और आत्मप्रशंसा से दूर रहना चाहिये और चुपचाप अपना प्रदर्शन करते रहना चाहिये।

3) लोगों को खुश करने के लिये मत खेलो, लक्ष्य के प्रति समर्पित रहो –

तेंडुलकर ने युवराज सिंह को यह महत्वपूर्ण सलाह दी है कि “लोगों को खुश करने के लिये मत खेलो, बल्कि अपने लक्ष्य पर निगाह रखो… लोग अपने आप खुश हो जायेंगे”। यह फ़ण्डा भी ब्लॉगर पर पूरी तरह लागू होता है। एक सीधा सा नियम है कि “आप सभी को हर समय खुश नहीं कर सकते…” इसलिये ब्लॉग लिखते समय अपने विचारों पर दृढ रहो, अपने विचार मजबूती से पेश करो, कोई जरूरी नहीं कि सभी लोग तुमसे सहमत हों, इसलिये सबको खुश करने के चक्कर में न पड़ो, अपना लिखो, मौलिक लिखो, बेधड़क लिखो… यदि किसी को पसन्द नहीं आता तो यह उसकी समस्या है, लेकिन तुम अपना लक्ष्य मत भूलो और उसे दिमाग में रखकर ही लिखो…

4) रनों की भूख कम न हो और ऊर्जा बरकरार रहे –

20 साल लगातार खेलने के बाद भी तेंडुलकर की रनों की भूख कम नहीं हुई है, इसी तरह ब्लॉगरों को अपनी जानकारी की भूख, लिखने की तड़प को बरकरार रखना चाहिये… अपनी ऊर्जा को भी बनाये रखें… जब लगे कि थक गये हैं बीच में कुछ दिन विश्राम लें और फ़िर ऊर्जा एकत्रित करके दोबारा लिखना शुरु करें, तभी लम्बे समय टिक पायेंगे।

मैं स्वयं भी अपनी ब्लॉगिंग में तेंडुलकर “सर” से ऐसे ही कुछ टिप्स लेता हूं।

1) कोशिश रहती है कि विचारधारा के प्रति पूरे समर्पण, लगन और मेहनत से लिखूं।

2) बगैर किसी गुटबाजी में शामिल हुए अपने विचार के प्रति दृढ रहने की कोशिश करता हूं,

3) अपना कप्तान एक ही है “विचारधारा”, उसका प्रदर्शन जारी रहना चाहिये, कोई कितने भी गुट (कप्तान) बना ले, जब तक कप्तान “विचारधारा” है तब तक मैं उसके साथ हूं… चाहे वह उम्र और अनुभव में मुझसे कितना भी छोटा हो… कोई इसे भी गुटबाजी समझता हो तो समझा करे…

4) किसी को खुश करने के लिये नहीं लिखता, सभी को खुश करना लगभग असम्भव है, इसलिये लोगों की फ़िक्र किये बिना “सर” की तरह अपना नैसर्गिक खेल खेलता हूं…

5) मेरी ब्लॉगिंग यात्रा उम्र के 42वें वर्ष से शुरु हुई है, हालांकि अभी तो मुझे भी ब्लॉगिंग में सिर्फ़ 3 साल ही हुए हैं, “रनों” की भूख तो अभी है ही। तेंडुलकर की तरह बीस साल गुज़ारने में अभी लम्बा समय है, जब 62 वर्ष का होऊंगा तब हिसाब लगाऊंगा कि 20 साल की ब्लॉगिंग के बाद भी क्या मुझमें ऊर्जा बची है?

6) तेंडुलकर से नम्रता भी सीखने की कोशिश करता हूं… कोशिश रहती है कि प्राप्त टिप्पणियों पर उत्तेजित न होऊं, प्रतिकूल विचारधारा वाला लेख दिखाई देने पर शान्ति से पढ़कर यदि आवश्यक हो तो ही टिप्पणी करूं, जहाँ तक हो सके दूसरे ब्लॉगरों के नाम के आगे “जी” लगाने की कोशिश करूं, टिप्पणी अथवा लेख का जवाबी लेख तैयार करते समय भी भाषा मर्यादित और संयमित रहे, तेंडुलकर की तरह। ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी कितना भी उकसायें, “सर” उनका जवाब अपने बल्ले से ही देते हैं, उसी तरह विपरीत विचारधारा वाले लोग चाहे कितना भी उकसायें, अपना जवाब अपने ब्लॉग पर लेख में अपने तरीके से देने की कोशिश कर रहा हूं…

कुल मिलाकर तात्पर्य यह है कि अभी तो हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में मेरे सीखने के दिन हैं, मुझे समीर लाल जी से सीखना है कि कैसे सबके प्रिय बने रहें… मुझे शिवकुमार जी से सीखना है कि व्यंग्य कैसे लिखा जाता है… मुझे रवि रतलामी जी से सीखना है कि निर्लिप्त और निर्विवाद रहकर चुपचाप अपना काम कैसे किया जाता है… मुझे बेंगानी बन्धुओं से सीखना है कि ब्लॉग और बिजनेस दोनों को एक साथ सफ़ल कैसे किया जाये… सीखने की कोई उम्र नहीं होती… आज भले ही मैं 45 वर्ष का हूं, लेकिन हिन्दी ब्लॉगिंग में तो अभी ठीक से खड़ा होना ही सीखा है, रास्ता बहुत लम्बा है, भगवान की कृपा रही तो अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुँचेंगे, और ऐसे में “तेण्डुलकर सर” के ये टिप्स मेरे और आपके सदा काम आयेंगे…।

सभी मित्रों, पाठकों, स्नेहियों, शुभचिन्तकों को रंगों के त्यौहार होली की हार्दिक शुभकामनाएं… देश का माहौल और परिस्थिति कैसी भी हो, चटख रंगों की तरह अपना उल्लास बनाये रखें… लिखते रहें, पढ़ते रहें, सीखते रहें… छद्म-सेकुलरिज़्म का अन्त होना ही है, और भारत को एक दिन “असली” शक्ति बनना ही है…

अब अगला लेख मंगलवार को (होली का खुमार उतरने के बाद), तब तक तेण्डुलकर सर की जय हो… होली है भई होली है…

>हमने तो ब्लोगर मीट का विरोध नहीं किया है

>लगता होली में सभी बौरा गये हैं ! संगठन बनाने के विरोध में एक पोस्ट हमने भी लिखी थी . लेकिन उसमें फायदे नुकसान और विकल्प भी सुझाये गये थे . एक बार फ़िर कह रहा हूँ ब्लॉगजगत अपने आप में एक संगठन है और ब्लोगर मीट उसका औजार ( हमने तो ब्लोगर मीट का विरोध नहीं किया है ) . ब्लॉगजगत को किसी अन्य संगठन की जरुरत नहीं है दिल्ली को छोडिये अन्य जगहों पर भी ब्लोगर लोग बगैर किसी खास संगठन के ब्लॉगजगत को हीं संगठन मान कर आपस में मिलते हैं और तमाम मुद्दों पर चर्चा करते हैं . दिल्ली का आलम तो यह है की एकाध सम्मलेन हुआ नहीं की संगठन बनाने की कोशिश में जुट गये . आप पत्रकारों संघ की बात करते हैं , तो कभी प्रेस क्लब , दिल्ली पत्रकार संघ आदि में जाकर देखिये क्या हश्र है ! और यहाँ जो लोग आये हैं ब्लोगिंग में वो उसी से छुटकारा पाने यह सोच कर आये हैं की यहाँ किसी तरह की मठाधीशी करने वाला कोई नहीं है . लोग कहते हैं हम कोई मठाधीश नहीं , अरे साहब , मठाधीशी हीं तो है महज कुछ लोगों के मिलन को दिल्ली ब्लोगर मीट कहना जबकि उसमें से कई लोग आयात किये गये हों . अगर किसी को अनुमान हो तो जरा पता लगायें कि दिल्ली में रहने वाले हिंदी ब्लोगरों की संख्या ? फ़िर , अपनी मठाधीशी को कोसें !

चलिए लौटते हैं संगठन के बात पर तो हम अकेले नहीं हैं . अधिकांश लोग यह मानते हैं की संगठन बनेगा तो एकलौता नहीं होगा और भांति-भांति के संगठन रियल्टी शो की तरह उभरेंगे और तब जो काचं-कच मचेगा उसका अनुमान शायद लगाना हीं नहीं चाहते ! ब्लॉगजगत का भला-बुरा सोचने वाले लोग पहले यह मान लीजिये की ब्लॉगजगत आपस में एक संगठन है जो हम सबको  आपस में जोड़ने के लिए काफी है .हिंदी ब्लॉगजगत को हीं एक संगठन मानिये और ब्लोगर मीट को इसकी संसद अब इसके बारे में सोचिये कैसे चलाएंगे ? इतने बड़े मंच को क्यों बांटना चाहते हैं ?

>हवा कितनी बदल गयी हे

हवा कितनी बदल गयी हे
कड़वाहट जीवन में घुल गयी हे 
मुस्कराहट में भी अथाह कुटिलता छिपी हे 

टेडी मंदी हे ये राहे जो लगती सीधी हे 

लगे पड़े हे लोग यहाँ वहा भागे

चाहते निकलना किसी और से आगे 
खुशिया अपनों की ही नहीं देख पाते

औरो की तोह क्या करे फिर बाते 
चैन नहीं हे , नींद नहीं हे

और इंसानों की किसे पड़ी हे 
बस नीयत और सीयत बदल गयी हे 
दिखने में तो इंसान अब भी वही हे 
कागजो के लिए बिक रहा हे इंसान 
सब आँखे मीचे हे जल रहा जहान
अच्छाई अत्यंत कठिन हे

स्वार्थ विद्यमान हे सच जटिल हे 
जान की कीमत नहीं हे

ईमान की इज्ज़त गयी हे 
आँखें आंसू को तरस गयी हे

हवा कितनी बदल गयी हे

http://twitter.com/arpitgoliya

>हमें ना खाना महँगी चीनी , ना होना बीमार !

>महंगाई की मार , ऊपर से होली का त्यौहार
हमें ना खाना महँगी चीनी , ना होना बीमार !
जोगीरा……………….सा रा रा राआअ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;
बिन चीनी ,बिन घी- मैदे के मालपुए बनायेंगे ,
आटे को पानी में छनकर वही ख़ुशी से खायेंगे !
जोगीरा……………….सा रा रा राआअ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;
बिन पिचकारी और रंगों के होली खूब मनाएंगे ,
बाल्टी  में पानी भर कर सबको नहलायेंगे !
जोगीरा……………….सा रा रा राआअ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

>अगर आप भी ब्लोगिंग में संगठन बनाने की बात से असहमत हैं तो अपने -अपने ब्लॉग पर एक विरोध का पोस्ट जरुर लिखें !

>अभी -अभी ” गप-शप का कोना ” पर प्रभात जी की पोस्ट देखी तो वाकई चिंता हुई . खबर चिंताजनक है कि ब्लॉगजगत को भी मठाधीशों की जरुरत संगठनात्मक रूप में होने लगी है !गौर करने लायक बात यह है कि यहाँ मठाधीश तो पहले से मौजूद रहे हैं लेकिन अब संगठन बना कर अपनी बातें दूसरों पर थोपा जायेगा . अब तक अभिव्यक्ति के इस स्वतंत्र समझे जाने वाले मंच को भी लोग अपनी लॉबिंग का केंद्र बनाने लगे हैं ऐसा अब तो जरुर महसूस होने लगा है . यहाँ भी उन्हीं लोगों की चलेगी जो अपनी गोटियाँ फिट कर पाएंगे और नये आने वालों को साहित्य की दुनिया की तरह हीं पुराने खिलाडियों की चमचागिरी करनी पड़ सकती है .आगे चल कर ऐसा भी हो सकता है कई एक संगठन बन जाए तब कुछ लिखने से पूर्व उनकी ओर लोगों को ताकना पड़ेगा कि किसकी क्या प्रतिक्रिया होगी . पोस्ट से ज्यादा चिंता उस पर आने वाली प्रतिक्रिया की होगी . प्रभात जी की पोस्ट पर एक सज्जन ने लिखा है क्या हम यहाँ राजपूत ब्लॉगर महासभा, ब्राहमण ब्लॉगर समिति, चिकित्सासेवी ब्लॉगर समूह देखना पसँद करेंगे ? कभी नहीं, क्योंकि हम अभिव्यक्ति और मत-विमर्श से इतर राजनीति या गुटनीति करने नहीं आये हैं ।”    जो मार्के की बात है . पूरे बहस में ब्लोगिंग के व्यक्तिगत और सामूहिक होने को लेकर कई प्रश्न उठते हैं . व्यक्तिगत ब्लॉग से हमने भी शुरुआत की थी जिसे बाद में सामूहिक कर दिया गया लेकिन कसी संगठन या खास विचार के नाम पर नहीं बल्कि यहाँ पर लगभग हर तरह के लोग मौजूद हैं और यदि विचारों पर अंकुश लगा कर एक ओर प्रवाहमान किया जाए तो हमारी समझ में इस विधा का दुरूपयोग हीं होगा .और किसी तरह के संगठन  बनने की स्थिति में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वह किसी न किसी खास विचारधारा की ओर अपना झुकाव रखेगा  और  ना चाहते हुए भी जुड़ने वाले लोगों पर एक प्रकार का दबाव बनेगा . अब तक के तरह -तरह संगठनों को देख कर और उनमें काम करके इतना तो कह हीं सकता हूँ आरम्भ बहुत बढ़िया होता है बाद में सारी चीजें वैसी हीं हो जाती है . बेहतर है ब्लोगिंग को बांधने के बजाय स्वच्छंद रहने दिया  जाए साहब , नहीं  तो फ़िर  मीडिया हीं अच्छी है . यहाँ लोग इसीलिए आते हैं कि उन्हें उनकी बात रखने में कोई रोक नहीं सकता . अगर आप भी ब्लोगिंग में संगठन बनाने की बात से असहमत हैं तो अपने -अपने ब्लॉग पर एक विरोध का पोस्ट जरुर लिखें !

इस्लाम की छवि पूरी दुनिया में बुरी क्यों है… शायद ज़ाकिर नाईक जैसों के कारण?…… Zakir Naik, Islamic Propagandist, Indian Muslims & Secularism

एक इस्लामिक विद्वान(?) माने जाते हैं ज़ाकिर नाईक, पूरे भारत भर में घूम-घूम कर विभिन्न मंचों से इस्लाम का प्रचार करते हैं। इनके लाखों फ़ॉलोअर हैं जो इनकी हर बात को मानते हैं, ऐसा कहा जाता है कि ज़ाकिर नाईक जो भी कहते हैं या जो उदाहरण देते हैं वह “कुर-आन” की रोशनी में ही देते हैं। अर्थात इस्लाम के बारे में या इस्लामी धारणाओं-परम्पराओं के बारे में ज़ाकिर नाईक से कोई भी सवाल किया जाये तो वह “कुर-आन” के सन्दर्भ में ही जवाब देंगे। कुछ मूर्ख लोग इन्हें “उदार इस्लामिक” व्यक्ति भी मानते हैं, इन्हें पूरे भारत में खुलेआम कुछ भी कहने का अधिकार प्राप्त है क्योंकि यह सेकुलर देश है, लेकिन नीचे दिये गये दो वीडियो देखिये जिसमें यह आदमी “धर्म परिवर्तन” और “अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार” के सवाल पर इस्लाम की व्याख्या किस तरह कर रहा है…

पहले वीडियो में उदारवादी(?) ज़ाकिर नाईक साहब फ़रमाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति मुस्लिम से गैर-मुस्लिम बन जाता है तो उसकी सज़ा मौत है, यहाँ तक कि इस्लाम में आने के बाद वापस जाने की सजा भी मौत है…नाईक साहब फ़रमाते हैं कि चूंकि यह एक प्रकार की “गद्दारी” है इसलिये जैसे किसी देश के किसी व्यक्ति को अपने राज़ दूसरे देश को देने की सजा मौत होती है वही सजा इस्लाम से गैर-इस्लाम अपनाने पर होती है… है न कुतर्क की इन्तेहा… (अब ज़ाहिर है कि ज़ाकिर नाईक वेदों और कुर-आन के तथाकथित ज्ञाता हैं इसका मतलब कुर-आन में भी ऐसा ही लिखा होगा)। इसका एक मतलब यह भी है कि इस्लाम में “आना” वन-वे ट्रैफ़िक है, कोई इस्लाम में आ तो सकता है, लेकिन जा नहीं सकता (इसी से मिलता-जुलता कथन फ़िल्मों में मुम्बई का अण्डरवर्ल्ड माफ़िया भी दोहराता है), तो इससे क्या समझा जाये? सोचिये कि इस कथन और व्याख्या से कोई गैर-इस्लामी व्यक्ति क्या समझे? और जब कुर-आन की ऐसी व्याख्या मदरसे में पढ़ा(?) कोई मंदबुद्धि व्यक्ति सुनेगा तो वह कैसे “रिएक्ट” करेगा?

http://www.youtube.com/watch?v=ZMAZR8YIhxI&feature=related

अब इसे कश्मीर के रजनीश मामले और कोलकाता के रिज़वान मामले से जोड़कर देखिये… दिमाग हिल जायेगा, क्योंकि ऐसा संदेह भी व्यक्त किया जा रहा है कि लक्स कोज़ी वाले अशोक तोड़ी ने रिज़वान को इस्लाम छोड़ने के लिये लगभग राजी कर लिया था, फ़िर संदेहास्पद तरीके से उसकी लाश पटरियों पर पाई गई और अब मामला न्यायालय में है, इसी तरह कश्मीर में रजनीश की थाने में हत्या कर दी गई, उसके द्वारा शादी करके लाई गई मुस्लिम लड़की अमीना को उसके घरवाले जम्मू से अपहरण करके श्रीनगर ले जा चुके… और उमर अब्दुल्ला जाँच का आश्वासन दे रहे हैं। यानी कि शरीयत के मुताबिक नाबालिग हिन्दू लड़की भी भगाई जा सकती है, लेकिन पढ़ी-लिखी वयस्क मुस्लिम लड़की किसी हिन्दू से शादी नहीं कर सकती। तात्पर्य यह है कि जब इस्लाम के तथाकथित विद्वान ज़ाकिर नाईक जब कुतर्कों के सहारे कुर-आन की मनमानी व्याख्या करते फ़िरते हैं तब “सेकुलर” सरकारें सोती क्यों रहती हैं? वामपंथी बगलें क्यों झाँकते रहते हैं? अब एक दूसरा वीडियो भी देखिये…

http://www.youtube.com/watch?v=6jYUL7eBdHg&feature=related

इस वीडियो में ज़ाकिर नाईक साहब फ़रमाते हैं कि मुस्लिम देशों में किसी अन्य धर्मांवलम्बी को किसी प्रकार के मानवाधिकार प्राप्त नहीं होने चाहिये, यहाँ तक कि किसी अन्य धर्म के पूजा स्थल भी नहीं बनाये जा सकते, सऊदी अरब और “etc.” का उदाहरण देते हुए वे कुतर्क देते रहते हैं, अपने सपनों में रमे हुए ज़ाकिर नाईक लगातार दोहराते हैं कि इस्लाम ही एकमात्र धर्म है, बाकी सब बेकार हैं, और मजे की बात यह कि फ़िर भी “कुर-आन” की टेक नहीं छोड़ते। ज़ाकिर नाईक के अनुसार मुस्लिम लोग तो किसी भी देश में मस्जिदें बना सकते हैं लेकिन इस्लामिक देश में चर्च या मन्दिर नहीं चलेगा। यदि कुर-आन में यही सब लिखा है तो समझ नहीं आता कि फ़िर काहे “शान्ति का धर्म” वाला राग अलापते रहते हैं? और जो भी मुठ्ठी भर शान्तिप्रिय समझदार मुसलमान हैं वह ऐसे “विद्वान”(?) का विरोध क्यों नहीं करते? वीडियो को पूरा सुनिये और सोचिये कि ज़ाकिर नाईक और तालिबान में कोई फ़र्क नज़र आता है आपको?

पाकिस्तान और अन्य इस्लामिक देशों से लगातार खबरें आती हैं कि वहाँ अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं, मलेशिया में हिन्दुओं पर ज़ुल्म होते हैं, पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या घटते-घटते 2 प्रतिशत रह गई है, हिन्दू परिवारों की लड़कियों को जबरन उठा लिया जाता है और इन परिवारों से जज़िया वसूल किया जाता है और हाल ही में पाकिस्तान में तालिबान द्वारा दो सिखों के सर कलम कर दिये गये, क्योंकि उन्होंने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया था, ऐसा लगता है कि यह सब ज़ाकिर नाईक की शिक्षा और व्याख्यानों का असर है। ऐसे में भारतीय मुसलमानों द्वारा ऐसी घटनाओं की कड़ी निंदा तो दूर, इसके विरोध में दबी सी आवाज़ भी नहीं उठाई जाती, ऐसा क्यों होता है? लेकिन ज़ाकिर नाईक जैसे “समाज-सुधारक” और “व्याख्याता” मौजूद हों तब तो हो चुका उद्धार किसी समाज का…। बढ़ते प्रभाव (या दुष्प्रभाव) की वजह से आम लोगों को लगने लगा है कि सचमुच कहीं इस्लाम वैसा ही तो नहीं, जैसा अमेरिका, ब्रिटेन अथवा इज़राइल सारी दुनिया को समझाने की कोशिश कर रहे हैं… और पाकिस्तान, लीबिया, सोमालिया, जैसे देश उसे अमलीजामा पहनाकर दिखा भी रहे हैं…

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>प्रेस कौंसिल की बराबरी क्यूं…?

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प्रेस कौंसिल का नाम सुनते ही बस एक ही संस्थान दिमाग में आता है…भारतीय प्रेस परिषद अर्थात  प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया. लोग इसे इसके संक्षिप्त नाम पी सी आई  से भी जानते हैं.  पर “प्रेस कौंसिल” शब्दों  का दुरपयोग करके  इस एतिहासिक और गौरवशाली संस्थान की बराबरी के निंदनीय प्रयासों का सिलसिला अब भी जारी है. मुझे याद है कि कुछ वर्ष पूर्व भी लुधियाना की एक्सटेंशन लाएब्रेरी में एक कार्यक्रम हुआ  था जिसका आयोजन करने वाली संस्था ने “प्रेस कौंसिल” शब्द बड़े बड़े आकार में लिख कर अपने इस आयोजन का प्रचार किया था. उन दिनों मै पंजाब यूनियन आफ जर्नलिस्ट (पी यू जे) के साथ सरगरम था. मेरे साथिओं में अशोक सिंघी और डाक्टर एच एस लाल भी थे. श्याम खोसला, बलबीर पुंज और अशोक मलिक जैसे वरिष्ठ लोग नैशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट (एन यू जे) में से हमें सहयोग भी करते थे और मार्गदर्शन भी. बदले हुए हालात में मीडिया कौंसिल बनाने की बात तो श्याम खोसला ने भी कही लेकिन कभी भी किसी ने प्रेस कौंसिल के समान को ठेस पहुँचाने या फिर उसकी बराबरी करने की बात न तो कभी सोची और न ही कभी की. लेकिन कुछ ऐसे लोग जो खुद को पत्रकार भी कहते हैं पर बातें वे इस तरह की कर रहे हैं जिनसे लगता है कि वे जाने या अनजाने में प्रेस कौंसिल की बराबरी करने का अनुचित, निंदनीय  और नाकाम प्रयास भी कर रहे हैं और भूलवश या फिर गुमराह हो  कर प्रेस कौंसिल के सम्मान को ठेस भी पहुंचा रहे हैं. इसकी चर्चा हिंदी ब्लोग जगत में भी हुई है. हमें यकीन है कि वे जान बूझ कर ऐसा कर ही नहीं सकते. जिस सभा के नाम  पर वे अपनी इस तरह की सरगर्मियां  चला रहे हैं उस सभा  ने भी अपना नाम बदल लिया है और इसकी घोषणा भी बाकायदा की गयी है. इस लिए हमारा अपने इन दोस्तों से भी विनम्र निवेदन है कि वे भी सर्व स्वीकृत मुख्या धारा में लौट आयें. जिसका सम्मान देश की सरकार भी करती है, पूरे  विश्व  का मीडिया  भी, देश की न्याय पालिका भी और देश की जनता भी..उसके साथ  टकराव करने की भूल कभी भूल कर भी न करें.                 –रैक्टर कथूरिया                       









                    

राहुल गाँधी का ज्ञान, राजनीति और मार्केटिंग के फ़ण्डे … … Rahul Gandhi Indian Politics and Marketing

मार्केटिंग मैनेजमेण्ट के कुछ खास सिद्धान्त होते हैं, जिनके द्वारा जब किसी प्रोडक्ट की लॉंचिंग की जाती है तब उन्हें आजमाया जाता है। ऐसा ही एक प्रोडक्ट भारत की आम जनता के माथे पर थोपने की लगभग सफ़ल कोशिश हुई है। मार्केटिंग के बड़े-बड़े गुरुओं और दिग्विजय सिंह जैसे घाघ और चतुर नेताओं की देखरेख में इस प्रोडक्ट यानी राहुल गाँधी की मार्केटिंग की गई है, और की जा रही है। जब मार्केट में प्रोडक्ट उतारा जा रहा हो, (तथा उसकी गुणवत्ता पर खुद बनाने वाले को ही शक हो) तब मार्केटिंग और भी आक्रामक तरीके से की जाती है, बड़ी लागत में पैसा, श्रम और मानव संसाधन लगाया जाता है, ताकि घटिया से घटिया प्रोडक्ट भी, कम से कम लॉंचिंग के साथ कुछ समय के लिये मार्केट में जम जाये। (मार्केटिंग की इस रणनीति का एक उदाहरण हम “माय नेम इज़ खान” फ़िल्म के पहले भी देख चुके हैं, जिसके द्वारा एक घटिया फ़िल्म को शुरुआती तीन दिनों की ओपनिंग अच्छी मिली)। सरल भाषा में इसे कहें तो “बाज़ार में माहौल बनाना”, उस प्रोडक्ट के प्रति इतनी उत्सुकता पैदा कर देना कि ग्राहक के मन में उस प्रोडक्ट के प्रति लालच का भाव पैदा हो जाये। ग्राहक के चारों ओर ऐसा वातावरण तैयार करना कि उसे लगने लगे कि यदि मैंने यह प्रोडक्ट नहीं खरीदा तो मेरा जीवन बेकार है। हिन्दुस्तान लीवर हो या पेप्सी-कोक सभी बड़ी कम्पनियाँ इसी मार्केटिंग के फ़ण्डे को अपने प्रोडक्ट लॉंच करते समय अपनाती हैं। ग्राहक सदा से मूर्ख बनता रहा है और बनता रहेगा, ऐसा ही कुछ राहुल गाँधी के मामले में भी होने वाला है।

राहुल बाबा को देश का भविष्य बताया जा रहा है, राहुल बाबा युवाओं की आशाओं का एकमात्र केन्द्र हैं, राहुल बाबा देश की तकदीर बदल देंगे, राहुल बाबा यूं हैं, राहुल बाबा त्यूं हैं… हमारे मानसिक कंगाल इलेक्ट्रानिक मीडिया का कहना है कि राहुल बाबा जब भी प्रधानमंत्री बनेंगे (या अपने माता जी की तरह न भी बनें तब भी) देश में रामराज्य आ जायेगा, अब रामराज्य का तो पता नहीं, रोम-राज्य अवश्य आ चुका है (उदाहरण – उड़ीसा के कन्धमाल में यूरोपीय यूनियन के चर्च प्रतिनिधियों का दौरा)।

जब से मनमोहन सिंह दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं और राहुल बाबा ने अपनी माँ के श्रीचरणों का अनुसरण करते हुए मंत्री पद का त्याग किया है तभी से कांग्रेस के मीडिया मैनेजरों और “धृतराष्ट्र और दुर्योधन के मिलेजुले रूप” टाइप के मीडिया ने मिलकर राहुल बाबा की ऐसी छवि निर्माण करने का “नकली अभियान” चलाया है जिसमें जनता स्वतः बहती चली जा रही है। दुर्भाग्य यह है कि जैसे-जैसे राहुल की कथित लोकप्रियता बढ़ रही है, महंगाई भी उससे दोगुनी रफ़्तार से ऊपर की ओर जा रही है, गरीबी भी बढ़ रही है, बेरोज़गारी, कुपोषण, स्विस बैंकों में पैसा, काला धन, किसानों की आत्महत्या… सब कुछ बढ़ रहा है, ऐसे महान हैं हमारे राहुल बाबा उर्फ़ “युवराज” जो आज नहीं तो कल हमारी छाती पर बोझ बनकर ही रहेंगे, चाहे कुछ भी कर लो।

मजे की बात ये है कि राहुल बाबा सिर्फ़ युवाओं से मिलते हैं, और वह भी किसी विश्वविद्यालय के कैम्पस में, जहाँ लड़कियाँ उन्हें देख-देखकर, छू-छूकर हाय, उह, आउच, वाओ आदि चीखती हैं, और राहुल बाबा (बकौल सुब्रह्मण्यम स्वामी – राहुल खुद किसी विश्वविद्यालय से पढ़ाई अधूरी छोड़कर भागे हैं और जिनकी शिक्षा-दीक्षा का रिकॉर्ड अभी संदेह के घेरे में है) किसी बड़े से सभागार में तमाम पढे-लिखे और उच्च समझ वाले प्रोफ़ेसरों(?) की क्लास लेते हैं। खुद को विवेकानन्द का अवतार समझते हुए वे युवाओं को देशहित की बात बताते हैं, और देशहित से उनका मतलब होता है NSUI से जुड़ना। जनसेवा या समाजसेवा (या जो कुछ भी वे कर रहे हैं) का मतलब उनके लिये कॉलेजों में जाकर हमारे टैक्स के पैसों पर पिकनिक मनाना भर है। किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर आज तक राहुल बाबा ने कोई स्पष्ट राय नहीं रखी है, उनके सामान्य ज्ञान की पोल तो सरेआम दो-चार बार खुल चुकी है, शायद इसीलिये वे चलते-चलते हवाई बातें करते हैं। वस्तुओं की कीमतों में आग लगी हो, तेलंगाना सुलग रहा हो, पर्यावरण के मुद्दे पर पचौरी चूना लगाये जा रहे हों, मंदी में लाखों नौकरियाँ जा रही हों, चीन हमारी इंच-इंच ज़मीन हड़पता जा रहा हो, उनके चहेते उमर अब्दुल्ला के शासन में थाने में रजनीश की हत्या कर दी गई हो… ऐसे हजारों मुद्दे हैं जिन पर कोई ठोस बयान, कोई कदम उठाना, अपनी मम्मी या मनमोहन अंकल से कहकर किसी नीति में बदलाव करना तो दूर रहा… “राजकुमार” फ़ोटो सेशन के लिये मिट्टी की तगारी उठाये मुस्करा रहे हैं, कैम्पसों में जाकर कांग्रेस का प्रचार कर रहे हैं, विदर्भ में किसान भले मर रहे हों, ये साहब दलित की झोंपड़ी में नौटंकी जारी रखे हुए हैं… और मीडिया उन्हें ऐसे “फ़ॉलो” कर रहा है मानो साक्षात महात्मा गाँधी स्वर्ग (या नर्क) से उतरकर भारत का बेड़ा पार लगाने आन खड़े हुए हैं। यदि राहुल को विश्वविद्यालय से इतना ही प्रेम है तो वे तेलंगाना के उस्मानिया विश्वविद्यालय क्यो नहीं जाते? जहाँ रोज-ब-रोज़ छात्र पुलिस द्वारा पीटे जा रहे हैं या फ़िर वे JNU कैम्पस से चलाये जा रहे वामपंथी कुचक्रों का जवाब देने उधर क्यों नहीं जाते? लेकिन राहुल बाबा जायेंगे आजमगढ़ के विश्वविद्यालय में, जहाँ उनके ज्ञान की पोल भी नहीं खुलेगी और वोटों की खेती भी लहलहायेगी। अपने पहले 5 साल के सांसद कार्यकाल में लोकसभा में सिर्फ़ एक बार मुँह खोलने वाले राजकुमार, देश की समस्याओं को कैसे और कितना समझेंगे?

कहा जाता है कि राहुल बाबा युवाओं से संवाद स्थापित कर रहे हैं? अच्छा? संवाद स्थापित करके अब तक उन्होंने युवाओं की कितनी समस्याओं को सुलझाया है? या प्रधानमंत्री बनने के बाद ही कौन सा गज़ब ढाने वाले हैं? जब उनके पिताजी कहते थे कि दिल्ली से चला हुआ एक रुपया गरीबों तक आते-आते पन्द्रह पैसा रह जाता है, तो गरीब सोचता था कि ये “सुदर्शन व्यक्ति” हमारे लिये कुछ करेंगे, लेकिन दूसरे सुदर्शन युवराज तो अब एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं कि गरीबों तक आते-आते सिर्फ़ पाँच पैसा रह जाता है। यही बात तो जनता जानना चाहती है, कि राहुल बाबा ये बतायें कि 15 पैसे से 5 पैसे बचने तक उन्होंने क्या किया है, कितने भ्रष्टाचारियों को बेनकाब किया है? भ्रष्ट जज दिनाकरण के महाभियोग प्रस्ताव पर एक भी कांग्रेसी सांसद हस्ताक्षर नहीं करता, लेकिन राहुल बाबा ने कभी इस बारे में एक शब्द भी कहा? “नरेगा” का ढोल पीटते नहीं थकते, लेकिन क्या राजकुमार को यह पता भी है कि अरबों का घालमेल और भ्रष्टाचार इसमें चल रहा है? हाल के पंचायत चुनाव में अकेले मध्यप्रदेश में ही सरपंच का चुनाव लड़ने के लिये ग्रामीण दबंगों ने 1 करोड़ रुपये तक खर्च किये हैं (और ये हाल तब हैं जब मप्र में भाजपा की सरकार है, सोचिये कांग्रेसी राज्यों में “नरेगा” कितना कमाता होगा…), क्योंकि उन्हें पता है कि अगले पाँच साल में “नरेगा” उन्हें मालामाल कर देगा… कभी युवराज के मुँह से इस बारे में भी सुना नहीं गया। अक्सर कांग्रेसी हलकों में एक सवाल पूछा जाता है कि मुम्बई हमले के समय ठाकरे परिवार क्या कर रहा था, आप खुद ही देख लीजिये कि राहुल बाबा भी उस समय एक फ़ार्म हाउस पर पार्टी में व्यस्त थे… और वहाँ से देर सुबह लौटे थे… जबकि दिल्ली के सत्ता गलियारे में रात दस बजे ही हड़कम्प मच चुका था, लेकिन पार्टी जरूरी थी… उसे कैसे छोड़ा जा सकता था।

http://www.dailypioneer.com/138663/Partying-Rahul-raises-hackles.html

http://indiatoday.intoday.in/site/Story/21442/LATEST%20HEADLINES/Rahul+in+party+mood+soon+after+Mumbai+crisis.html

अरे राहुल भैया, आप शक्कर के दाम तक तो कम नहीं करवा सकते हो, फ़िर काहे देश भर में घूम-घूम कर गरीबों के ज़ख्मों पर नमक मल रहे हो? लेकिन यहाँ फ़िर वही मार्केटिंग का फ़ण्डा काम आता है कि प्रोडक्ट की कमियाँ ढँक कर रखो, उस प्रोडक्ट के “साइड इफ़ेक्ट” के बारे में जनता को मत बताओ, और यह काम करने के लिये टाइम्स ऑफ़ इंडिया, NDTV, द हिन्दू से लेकर तमाम बड़े-बड़े अखबारी-मीडिया-टीवी घराने (जिन्हें आजकल जनता “भाण्ड-गवैया” समझती है) लगे हुए हैं… लेकिन यह लोग एक बात भूल रहे हैं कि किसी प्रोडक्ट से अत्यधिक आशायें जगा देना भी बेहद खतरनाक होता है, क्योंकि जब वह प्रोडक्ट जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता तब हालात और बिगड़ जाते हैं। यदि प्रोडक्ट कोई निर्जीव पदार्थ हो तो ज्यादा से ज्यादा उस कम्पनी को नुकसान होगा, लेकिन राहुल गाँधी नामक नकली प्रोडक्ट जब फ़ेल होगा, तब सामाजिक स्तर पर क्या-क्या और कैसा नुकसान होगा…

जाते-जाते : ईमानदारी से बताईयेगा कि उड़ीसा में चर्च के प्रतिनिधियों के दौरे वाली शर्मनाक खबर के बारे में आपने पुण्यप्रसून वाजपेयी, रवीश कुमार, किशोर अजवाणी, विनोद दुआ, पंकज पचौरी, प्रणय “जेम्स” रॉय, राजदीप सरदेसाई, दिबांग आदि जैसे तथाकथित स्टार पत्रकारों से कोई “बड़ी खबर”, या कोई “सबसे तेज़” खबर, या कोई परिचर्चा, कोई “सामना”, कोई “मुकाबला”, कोई “सीधी बात”, कोई “हम लोग” जैसा कितनी बार सुना-देखा है? मेरा दावा है कि इस मुद्दे को दरी के नीचे खिसकाने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई है, और यह ऐसा कोई पहला मामला भी नहीं है, मीडिया हमेशा से ऐसा करता रहा है, और जब कहा जाता है कि मीडिया “पैसे के भूखे लोगों का शिकारी झुण्ड” है तो कुछ लोगों को मिर्ची लग जाती है। यही मीडिया परिवार विशेष का चमचा है, सम्प्रदाय विशेष का दुश्मन है, पार्टी विशेष के प्रति प्रेम भावना से आसक्त है…

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युवाओं से अनुरोध है कि इस लेख को अपने “राहुल भक्त” मित्रों को ट्वीट करें, ऑरकुट करें, फ़ॉरवर्ड करें… ताकि वे भी तो जान सकें कि जिस प्रोडक्ट को मार्केटिंग के जरिये उनके माथे पर ठेला जा रहा है, वह प्रोडक्ट कैसा है…

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>मियां की मल्हार और एक अजीब कहानी : बादल उमड़ बढ़ आये

>कुछ दिनों पहले मास्साब पंकज सुबीर जी के चिट्ठे पर, महान गायक पं कुमार गन्धर्व के सुपुत्र पं मुकुल शिवपुत्र के बारे में पढ़ा था कि कुमार गंधर्व के सुपुत्र मुकुल शिवपुत्र शराब के लिए भोपाल की सड़कों पर दो- दो रुपयों के लिए भीख मांग रहे हैं। यह समाचार पढ़ कर मन बहुत आहत हो गया। एक महान कलाकार के सुपुत्र पण्डित मुकुल शिवपुत्र जो स्वयं खयाल गायकी में बहुत जाने माने गायक हों, कि यह हालत!
खैर, अब पता नहीं मुकुल जी कहां है किस हालत में है?
मेरे संग्रह में एक मियां की मल्हार/ मल्हार राग पर कुछ गीत हैं जिन्हें मैने वर्षा ऋतु के आगमन पर एक पोस्ट लिखा कर सुनवाने की सोच रखी थी; में से एक गीत सुनते हुए मुझे लगा कि यूट्यूब पर इसका वीडियो देखना चाहिए… जब वीडियो देखा तो दंग रह गया, मानो फिल्म की निर्देशिका सई परांजपे जी ने मुकुल जी की कहानी को लेकर यह गीत फिल्माया हो, यह अलग बात है कि यह फिल्म 1998 में ही बन चुकी थी। तो क्या मुकुलजी…….?
वर्षा ऋतु के आगमन तक मुझसे इंतजार नहीं होगा मैं आपको इस खूबसूरत गीत को सुनवा रहा हूँ। आप इस गीत को सुनिये और देखिये… मियां की मल्हार।
साज़ फिल्म में संगीत राजकमल और भूपेन हजारिका दोनों का है। इस गाने का संगीतकार कौन है पता नहीं चला। अगर आप जानते हैं तो टिप्प्णी में जरूर बतायें।
सुरेश वाडेकर जी की आवाज में गीत
http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=10543116-795

बादल घुमड़ बढ़ आये-२
काली घटा घनघोर गगन में-२
अंधियारा चहुं ओर
घन बरसत उत्पात प्रलय का
प्यासा क्यूं मन मोर-२
बादल घुमड़ बढ़ आये-२

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यही गीत फिल्म में बाद में वृंदावन (रघुवीर यादव) की बिटिया बंसी (शबाना आज़मी) भी एक समारोह गाती है। इस गीत में दो पैरा भी जोड़े गये हैं, आईये इस का भी आनन्द लीजिये। फिल्म में इसे सुप्रसिद्ध गायिका देवकी पण्डित ने अपनी आवाज दी है।
http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=10543216-d6c
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बादल बरस अब मौन भए-२
बादल
रवि उज्जवल प्रज्वलित गगन में
प्रज्वलित गगन में-
गगन में-गगन में-गगन में -गगन में
रवि उज्जवल प्रज्वलित गगन में
कनकालंकृत मोर
जय मंगल जय घोष गगन का
जय घोष गगन का
आऽऽऽऽऽऽऽऽ
शुभ उत्सव चहूं ओर-२
बादल बरस अब मौन भए..

और अब देखिये दोनों वीडियो

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