भाषाई विवादों को पीछे छोड़ते और “राज ठाकरेवाद” को सबक देते दो युवा कलाकार… … Zee Marathi Saregamapa, Rahul Saxena, Abhilasha Chellam, Urmila Dhangar

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21 Comments

  1. February 1, 2010 at 9:21 am

    आज हम कहें कि हिन्दी मेरी है तो यह मुर्खता होगी, ठीक वैसे ही मराठी पर किसी का कोई अधिकार नहीं. जो भाषा समझ न आए उसे गा लेना अजीब भी है और आश्चर्यजनक भी. ठाकरेवाद अगर राष्ट्रवाद के आड़े आएगा तो अस्वीकार होगा ही.

  2. SHASHI SINGH said,

    February 1, 2010 at 9:25 am

    सुरेश भाई, यही वो कुछ बातें हैं ठाकरेवाद की महामारी के बाद भी मुम्बई में रहने का हौसला देती हैं। इस महामारी पर अवधूत गुप्ते का हस्तक्षेप "झेण्डा" ने भी मुझे खासा प्रभावित किया… और यह यकीन दिया कि महाराष्ट्र में अभी भी राष्ट्र की चिंता करने वाली की कोई कमी नहीं है। संघ प्रमुख का ताजा बयान भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है।

  3. February 1, 2010 at 9:53 am

    सुरेश जीआपसे आशा थी कि आप मराठी माणूस कि भावनाको समजते. आपके भाषामे आप उसे ठाकरे वाद कहते हेमै ऐसे कितनेही लोग जो शिवसेना या मनसे को मानते हे उन्हे राहुल को जितने केलीये कोशिश करते हुये देखा हैमराठी माणूस कभी भी संगीत या प्रतिभा के बीच मै नही आता और नही कोई मराठी माणूस को राष्ट्रवाद शिखाये .बाळासाहेब के प्रखर राष्ट्रवाद से सब वाकीफ हैचाहे ओ कोई 'खान' भी होजय हिंदजय महाराष्ट्र !जीवनमूल्य

  4. February 1, 2010 at 10:00 am

    “संगीत” को किसी भी भाषा, किसी राजनीति, किसी क्षेत्रवाद, किसी ठाकरेवाद में बाँधा नहीं जा सकता …"भाषा, संगीत और देश तो महान हैं मूर्ख हैं वे जो इन्हें किसी भी वाद से बाँधने की कोशिश करते हैं!

  5. Yogesh said,

    February 1, 2010 at 12:26 pm

    बहुत उमदा लेख है । आज ये खबर आई है कि राज ठाकरे ने बयान दिया है कि महाराष्ट्र मे अगर काम करना है तो सिर्फ़ मराठी बोलने से काम नही चलेगा, जनम से भी मराठी होना चाहिए । इस बात से सब कुछ साफ हो जाता है कि दबाव कहा से था ।

  6. Yogesh said,

    February 1, 2010 at 12:27 pm

    बहुत उमदा लेख है । आज ये खबर आई है कि राज ठाकरे ने बयान दिया है कि महाराष्ट्र मे अगर काम करना है तो सिर्फ़ मराठी बोलने से काम नही चलेगा, जनम से भी मराठी होना चाहिए । इस बात से सब कुछ साफ हो जाता है कि दबाव कहा से था ।

  7. February 1, 2010 at 1:09 pm

    @ विक्रम, बाळासाहेब के प्रखर राष्ट्रवाद….क्या राष्ट्रवादी मराठी-हिन्दी-तमील के चक्कर में पड़ता है? क्षमा करना दोस्त क्षेत्रियता ने भारत को गुलाम बनाया था, उसका समर्थन करना नासमझी होगी.

  8. February 1, 2010 at 1:25 pm

    संजय जी ने मेरे मन की बात कह दी.

  9. KAVITA RAWAT said,

    February 1, 2010 at 1:39 pm

    Kisi par jabardasti bhasha thopna is rajnitikaran se sabko baahar aana hoga, tabhi desh ek kahlayega. yah bhashavaad sankirn mansikta ka parichayak or dushit rajniti ka karak hai. Ise sabhi logon ko bhali bhanti samjh lena hoga… Kisi ko bhashavaad mein bandhna murkhata hi hai, samjhdarinahi…Bahut achha likha aapne.Aapko bahut badhai

  10. February 1, 2010 at 2:24 pm

    हद हो गयी वैसे कोई नयी बात नहीं है तुछ राजनीति सब पे भारी

  11. February 1, 2010 at 2:28 pm

    @संजय बेंगाणीजब भी देश कि बात या हिंदू धर्म कि बात आई है सबसे पहले बाळासाहेब ने आवाज उठाई हैउनके देशनिष्ठा या धर्मनिष्ठा पार शक खाना बेवखुफी कि बात होगीमगर महाराष्ट्र में मराठी भाषा और उस संस्कृती का मन रखना चाहिये ऐसा उनका और पुरी राज्य का मत है तो उसमे गलत क्या है ?जीवनमूल्य

  12. February 1, 2010 at 2:31 pm

    आपकी बात से सहमत हूं.दुख की बात यह है, कि ठाकरे की वजह से अधिकतर मराठीयों पर यह तोहमत लग रही है कि हम क्षेत्र वाद का समर्थन करतें है. आपकी इस पोस्ट से यह बात पक्की हो जानी चाहिये कि मराठीयों में न्यायप्रियता, रेशनेलिटी , और कला, साहित्य एवम संस्कृति की समझ है, और वे संकिर्णता की मानसिकता से कोसों दूर हैं.बस यहां सहिष्णुता की वजह से नुकसान भी होता है.मेरी समझ से अभिलाषा चेल्लम निस्संदेह बेहतर गायिका है. अगर किसी अंदरूनी राजनीति की बात ना करें (संभावना हो सकती है) तो उर्मिला धनगर को ज़्यादा वोट मिलनें का एक कारण यह भी हो सकता है, कि उसनें अधिकतर ग्रामीण और लोकसंगीत के टच लिये गानें लिये, जिसकी वजह से दूरस्थ ग्रामीण महाराष्ट्र में ज़्यादाह पसंद किया गया हो, और जिसे वोट में तब्दिल होना समझा जा सकता है.वैसे भी गायक या गायिका की प्रतिभा किसी वोट से निर्धारित हो ही नहीं सकती, क्योंकि गुणवत्ता और लोकप्रियता के मापदंड में लोकप्रियता कहीं भी टिकती नहीं.

  13. kayvatelte said,

    February 1, 2010 at 2:48 pm

    सुरेशअतिशय सुंदर लेख झालाय.आवडला..इथे पण एक छान लेख आहे निरंजन ने लिहिलेला , वाचुन बघा.. http://preview.tinyurl.com/yzpaj7y

  14. February 1, 2010 at 5:05 pm

    वीर शिवाजी जो पूरे भारत का गौरव है आज विचलित होन्गे कि उन्के नाम क उप्योग करने वाले लोग कितनी तुच्छ मानसिकता क प्रदर्शन कर रहे है . ईश्वर इस ठाकरे परिवार को सदबुद्धी प्रदान करे .एक हमारे पारिवारिक संरक्षक स्व.कुशाभाऊ ठाकरे थे जो इन ठाकरे लोगो से लाख दर्जे अब्बल थे

  15. February 2, 2010 at 3:36 am

    राजनिती जो न कराये कम है!

  16. February 2, 2010 at 6:30 am

    जैसे भारत में बांगला गीत-संगीत गौरव के प्रतीक हैं वैसे ही मराठी भाषा और संगीत भी है. यहाँ आलोचना सिर्फ राजनीत या सामजिक जीवन में क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वालों की हो रही है. राष्ट्रवाद एक ऐसी धारणा हैं जहाँ कभी किसी क्षेत्रीय भाषा की गुलामी नहीं की जा सकती. यदि हम भाषाई लड़ाई या क्षेत्रवाद को ले लड़ते रहे तो कभी भी राष्ट्र उन्नत नहीं हो पायेगा.

  17. SANJAY KUMAR said,

    February 2, 2010 at 8:53 am

    During my long stay in MUMBAI, I had not come across a single Taxi Driver who could not communicate in Marathi, I am sure, others' experiance may not be very different.It is Thakreys who projected Non-Maharastrian Taxi Drivers as anti-marathi.During my stay I picked Marathi on my own and many Maharastrian appreciate my command over Marathi.BUT I certainly object, if someone dictate me to speak a particular language to become eligible to stay in a particular city.Moreover,If a person who dictate a hindu not to celebrate his festival say Chhath, dictate against speaking National Language can be any other thing than a Nationalist.

  18. flare said,

    February 2, 2010 at 10:25 am

    ब्लॉगिंग के नशे के बाद संगीत का नशा ही लेता हूं…गलत !!!!! सबसे बड़ा नशा है ……………. बढ़िया भोजन का नशा ………. 🙂

  19. मनुज said,

    February 3, 2010 at 6:54 pm

    @सुरेश जी, एक बात जो मैं आपसे कहना चाहूँगा वो ये है कि हमें किसी समूह या व्यक्ति पर "टेग" नहीं लगाना चाहिए. जैसा कि आपने लिखा – "खास बात इसलिये भी है, कि संगीत, नाटक, अभिनय आदि की समालोचना मराठी लोग बड़ी ही सूक्ष्म दृष्टि से करते हैं और सच्चे अर्थों में उच्च दर्जे का कलाकार ही यहाँ टिक पाता है। "अब अगर, दादा कोंडके की लोकप्रियता से मराठी लोगो के विषय में ये अंदाज़ा लगाया जाये (यानि कि उनपर टेग लगाया जाये ) कि मराठी जनमानस फूहड़ और द्विअर्थी संवादों को पसंद करने वाले लोग है जो कि निम्न स्तर के मनोरंजन पसंद करते है, तो निश्चित रूप से ये एक गलत बात होगी. हर समाज में हर तरह के लोग होते हैं, और जैसे काबुल के घोड़े विश्वप्रसिद्ध हैं पर इसका ये अर्थ कतई नहीं है कि वहां गधे नहीं पाए जाते ! अब दूसरी बात, इस क्षेत्रीयता की संक्रींड देशतोदू राजनीति को मात्र "राज-ठाकरेवाद" कह देना एक तरह से बाल ठाकरे और उनके तालिबानी गुंडों को "नो ओब्जेक्शन सर्टिफिकेट" दे देना है. अगर राज गद्दार है तो चचा भी कोई दूध के नहाये हुए नहीं हैं…. वस्तुतः राज अपने चाचा की ही विचारधारा को ही आगे बढ़ा रहे हैं. चचा के बयानों को सुनकर तो ऐसा लगता है कि वो बिलकुल ही सठिया गए हो. कभी कभी तो अमर सिंह से भी बड़े बक्चोद मालूम होते हैं…गौर फरमाईयेगा ज़रा

  20. मनुज said,

    February 3, 2010 at 7:15 pm

    मैं आपकी बेबाक और आग-उगलती शैली का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ ; मैंने पिछली टिप्पड़ी इसलिए की क्यूंकि मैंने "आपको" राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कुछ कम बेबाकी दिखाते देखा, जो कि आपके लिखने का स्टाइल नहीं है. मैं बस इतना चाहता हूँ कि राष्ट्रवाद के मुद्दे पर आप कभी अपनी कलम को ढीला न पड़ने दें. जितनी बेबाकी से आप कमीनिस्टों और "छद्म-सेकुलरों" की बखिया उधेड़ते रहे हैं, उसी तरह से आप इन नकली-हिंदुत्व-वादियों को भी न बख्शे!

  21. February 26, 2010 at 12:00 pm

    नमस्कार !हो सके तो यंहा भी भेट दे.http://www.misalpav.com/node/10899


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