>नव गीत: रंगों का नव पर्व –संजीव ‘सलिल’

>रंगों का नव पर्व बसंती

सतरंगा आया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

आशा पंछी को खोजे से

ठौर नहीं मिलती.

महानगर में शिव-पूजन को

बौर नहीं मिलती.

चकित अपर्णा देख, अपर्णा

है भू की काया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

कागा-कोयल का अंतर अब

जाने कैसे कौन?

चित्र किताबों में देखें,

बोली अनुमानें मौन.

भजन भुला कर डिस्को-गाना

मंदिर में गाया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

है अबीर से उन्हें एलर्जी,

रंगों से है बैर.

गले न लगते, हग करते हैं

मना जान की खैर.

जड़ विहीन जड़-जीवन लखकर

‘सलिल’ मुस्कुराया.

सद्भावों के जंगल गायब

पर्वत पछताया…

*

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