>गन्दा है पर धंधा है ये !

> ” Sponsership”  का नाम तो बहुत सुना होगा आपने ! हमने तो दिल्ली आकर हीं इस जुगाड़ के दर्शन किये . कोई भी काम हो प्रपोजल  बनाओ किसी कंपनी , नेता, उद्योगपति या एन जी ओ को पकड़ों और हो गया आपका काम . आजकल मीडिया के क्षेत्र में भी खूब फल-फूल रहा है यह धंधा . मिशनरी पत्रकारिता के नाम पर सेमीनार ,वर्कशॉप, गोष्ठियां आयोजित करने वाले कई पंजीकृत और गैर पंजीकृत संगठन बाजार में कूद चुके हैं . समाज और देशहित का हवाला देकर छात्रों को इकठ्ठा करते हैं .इनकी संख्या का हवाला देकर नमी-गिरामी पत्रकारों को बुलाते हैं और वो भी इनकार नहीं कर पाते क्योंकि पत्रकारों के अन्दर भाषणबाजी  का बहुत बड़ा कीड़ा होता है . फ़िर , इनके नाम पर या तो पहले हीं पैसे उठा लिए जाते हैं अथवा कार्यक्रम दिखाकर पैसे उठाये जाते हैं . आजकल तो कई राजनीतिक संगठनों ने  भी कुछ लोगों को इस तरह के सेमिनार आदि के लिए काम पर रखा हुआ है . जिनका काम है पत्रकारिता , समाजसेवा आदि के नाम पर युवाओं को जोड़ कर संगठन के कार्यक्रमों में भीड़ इकट्ठी करना . सेमीनार के बहाने जुडे युवाओं का उपयोग विभिन्न सेमिनारों से लेकर जंतर-मंतर के धरने -प्रदर्शन तक किया जाता है .उनमें से कुछ लोगों का तो इस कदर दिमाग साफ़ कर दिया जाता है कि वो भी इसी सब को अपना मकसद समझने लगते हैं . उनका असली मकसद पीछे छुट जाता है . यदि कुछ छात्र बच जाते हैं तो उन्हें किसी बड़े मीडिया हाउस में इंटर्नशिप या प्लेसमेंट का झांसा देकर अपने साथ शामिल कर लिया जाता . हालाँकि अगर यही काम खुलेआम बोलकर किया जाए तो कुछ भी गलत नहीं है लेकिन समाजसेवा के नाम पर , मिशनरी पत्रकारिता के नाम पर , भारतीयता के नाम पर , देश हित के नाम पर यह सब करना क्या सही है ?

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