क्या शाहरुख खान का कोई “छिपा हुआ इस्लामिक एजेण्डा” है?…… My Name is Khan, Shahrukh, Islamic Agenda

बाल ठाकरे, मीडिया और जनता को मूर्ख बनाकर, कॉंग्रेस की तरफ़ से अगले लोकसभा चुनावों में अपना टिकट पक्का करने और अपनी फ़िल्म की सफ़ल अन्तर्राष्ट्रीय मार्केटिंग करने वाले शाहरुख खान अब दुबई से लौटकर अपने बंगले मन्नत में आराम फ़रमा रहे हैं। मीडिया को तो खैर इस “काम” के लिये पैसा मिला था और कांग्रेस को मुम्बई में लोकसभा की एक सीट के लिये अज़हरुद्दीन टाइप का सदाबहार “इस्लामिक आईकन” मिल गया, सबसे ज्यादा घाटे में रहे बाल ठाकरे और आम जनता। बाल ठाकरे के बारे में बाद में बात करेंगे, लेकिन जनता तो इस घटिया फ़िल्म को “मीडिया हाइप” की वजह से देखने गई और बेहद निराश हुई, वहीं दूसरी तरफ़ महंगाई और आतंकवाद जैसे मुद्दे 4-5 दिनों के लिये सभी प्रमुख चैनलों से गायब हो गये। इस सारे तमाशे में कुछ प्रमुख बातें उभरकर आईं, खासकर शाहरुख खान द्वारा खुद को इस्लामिक आईकॉन के रूप में प्रचारित करना।

राजनीति की बात बाद में, पहले बात करते हैं फ़िल्म की, क्योंकि फ़िल्म ट्रेड संवाददाताओं और आँकड़े जुटाने वाली वेबसाईटों को स्रोत मानें तो इस फ़िल्म का अब तक का कलेक्शन कमजोर ही रहा है। जब सारे “भारतीय समीक्षकों” ने इस 5 स्टार की रेटिंग दे रखी हो ऐसे में मुम्बई में रिलीज़ 105 थियेटरों में पहले शो की उपस्थिति सिर्फ़ 75% रही, जबकि मीडिया हाइप और उत्सुकता को देखते हुए इसे कम ही कहा जायेगा। करण जौहर की किसी भी फ़िल्म के प्रारम्भिक तीन दिन साधारणतः हाउसफ़ुल जाते हैं, लेकिन इस फ़िल्म में ऐसा तो हुआ नहीं, बल्कि सोमवार आते-आते फ़िल्म की कलई पूरी तरह खुल गई और जहाँ रविवार को दर्शक उपस्थिति 70-80% थी वह सोमवार को घटकर कहीं-कहीं 30% और कहीं-कहीं 15% तक रह गई। ज़ाहिर है कि शुरुआती तीन दिन तो बाल ठाकरे से खुन्नस के चलते, उत्सुकता के चलते, शाहरुख-काजोल की जोड़ी के चलते दर्शक इसे देखने गये, लेकिन बाहर निकलकर “निगेटिव माउथ पब्लिसिटी” के कारण इसकी पोल खुल गई, कि कुल मिलाकर यह एक बकवास फ़िल्म है। और हकीकत भी यही है कि फ़िल्म में शाहरुख खुद तो ओवर-एक्टिंग का शिकार हैं ही, उनकी महानता को दर्शाने वाले सीन भी बेहद झिलाऊ और अविश्वसनीय बन पड़े हैं… ऊपर से बात-बात में कुरान का “ओवरडोज़”…। अमेरिकी कम्पनी फ़ॉक्स स्टार ने इसे 100 करोड़ में खरीदा है, इस दृष्टि से इसे कम से कम 250 करोड़ का राजस्व जुटाना होगा, जो कि फ़िलहाल दूर की कौड़ी नज़र आती है (हालांकि भोंपू पत्रकार झूठे आँकड़े पेश करके इसे 3 इडियट्स से भी अधिक सफ़ल बतायेंगे)…हकीकत इधर देखें…

http://www.ibosnetwork.com/newsmanager/templates/template1.aspx?a=22038&z=4

मीडियाई भोंपुओं द्वारा फ़ैलाया गया गर्द-गुबार बैठ गया है तो शान्ति से बैठकर सोचें कि आखिर हुआ क्या? सारे मामले की शुरुआत हुई शाहरुख के दो बयानों से कि – 1) IPL में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को लिया जाना चाहिये था और 2) पाकिस्तान हमारा एक “महान पड़ोसी” है। इस प्रकार के निहायत शर्मनाक और इतिहासबोध से परे बयान एक जेहादी व्यक्ति ही दे सकता है। पहले बयान की बात करें तो आज की तारीख में भी यह एक “खुला रहस्य” बना हुआ है कि आखिर शाहरुख खान ने अपनी टीम में पाकिस्तान के किसी खिलाड़ी को क्यों नहीं खरीदा? यह सवाल मीडियाई भाण्डों ने उनसे आज तक नहीं पूछा… और जब नहीं खरीदा तब बोली खत्म होने के बाद अचानक उनका पाकिस्तान प्रेम क्यों उमड़ पड़ा? रही-सही कसर बाल ठाकरे ने अपनी मूर्खतापूर्ण कार्रवाईयों के जरिये पूरी कर दी, और शाहरुख को खामखा एक बकवास फ़िल्म को प्रचारित करने का मौका मिल गया।

“महान पड़ोसी” वाला बयान तो निहायत ही बेवकूफ़ाना और उनके “इतिहास ज्ञान” का मखौल उड़ाने वाला है। क्या पाकिस्तान के निर्माण से लेकर आज तक भारत के प्रति उसके व्यवहार, लियाकत अली खान, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो, बेनज़ीर भुट्टो, ज़िया-उल-हक, मुशर्रफ़ और कियानी जैसों तथा तीन-तीन युद्धों के बारे में, शाहरुख खान नहीं जानते? यदि नहीं जानते तब तो वे मूर्ख ही हैं और जानते हैं फ़िर भी “महान पड़ोसी” कहते हैं तब तो वे “जेहादी” हैं और उनका कोई गुप्त एजेण्डा है। शाहरुख खान, या महेश भट्ट जैसे लोग जानते हैं कि “बाज़ार” में अपनी “घटिया चीज़” बेचने के लिये क्या-क्या करना पड़ता है, साथ ही ऐसे “उदारवादी” बयानों से पुरस्कार वगैरह कबाड़ने में भी मदद मिलती है, इसीलिये पाकिस्तान के साथ खेलने के सवाल पर सभी कथित गाँधीवादी, पाकिस्तान के प्रति नॉस्टैल्जिक बूढे और भेड़ की खाल में छुपे बैठे कुछ उदारवादी एक सुर में गाने लगते हैं कि “खेलों में राजनीति नहीं होना चाहिये… खेल इन सबसे ऊपर हैं…”। ऐसे वक्त में यह भूल जाते हैं कि चीन ने भी ओलम्पिक को अपनी “छवि बनाने” के लिये ही उपयोग किया, और “पैसा मिलने” पर “कुछ भी” करने के लिये तैयार आमिर और सैफ़ खान ने, तिब्बतियों, और यहाँ तक कि मुस्लिम उइगुरों के भी दमन के बावजूद, ओलम्पिक मशाल लेकर दौड़ने में कोई कोताही नहीं बरती, जबकि फ़ुटबॉल खिलाड़ी बाइचुंग भूटिया अधिक हिम्मत वाले और मजबूत रीढ़ की हड्डी वाले निकले, जिन्होंने चीन में बौद्धों के दमन के विरोध में ओलम्पिक मशाल नहीं थामी। कोई मूर्ख ही यह सोच सकता है कि अन्तर्राष्ट्रीय खेलों में राजनीति नहीं होती। IPL-3 ने जो कड़ा संदेश पाकिस्तान पहुँचाया था उसे शाहरुख खान ने तुरन्त धोने की कवायद कर डाली, लेकिन किसके इशारे पर? यह प्रश्न संदेह के घेरे में अनुत्तरित है।

बाल ठाकरे, जो पहले ही उत्तर भारतीयों पर निशाना साधने की वजह से जनता की सहानुभूति खो चुके थे, शाहरुख खान और इस्लामिक जगत की इस “इमेज-बनाऊ” “बाजारू चाल” को भाँप नहीं सके और उनके जाल में फ़ँस गये। उप्र-बिहार के निवासियों को नाराज़ करके “हिन्दुत्व आंदोलन” को पहले ही कमजोर कर चुके और उसी वजह से खुद भी कमजोर हो चुके बाल ठाकरे बेवकूफ़ बन गये। युवाओं ने बाल ठाकरे से खुन्नस के चलते मल्टीप्लेक्सों में जाकर इस थर्ड-क्लास फ़िल्म पर अपने पैसे लुटाये (और बाद में पछताये भी)। भाजपा ने युवाओं के इस रुख को भाँप लिया था और वह इससे दूर ही रही, लेकिन तब तक शाहरुख ने खुद को करोड़ों रुपये में खेलने के लिये ज़मीन तैयार कर ली। जबकि बाल ठाकरे यदि रिलीज़ से एक-दो दिन पहले इस फ़िल्म की पायरेटेड सीडी हजारों की संख्या में अपने कार्यकर्ताओं के जरिये आम जनता और युवाओं में बंटवाते तो वह विरोध अधिक प्रभावशाली होता तथा पहले तीन दिन जितने लोग मूर्ख बनने थियेटरों में गये, उनके पैसे भी बचते। ठाकरे के इस कदम का विरोध करना भी मुश्किल हो जाता क्योंकि पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्मों और गानों की पाइरेसी से करोड़ों रुपये का फ़टका खाने के बावजूद इधर के मूर्ख कलाकार अभी भी पाकिस्तान का गुणगान किये ही जा रहे हैं।

कुछ पत्रकार बन्धुओं का शाहरुख प्रेम अचानक जागृत हो उठा है, शाहरुख के पिता ऐसे थे, दादाजी वैसे थे, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे, आजादी की लड़ाई में भाग भी लिया था… आदि-आदि-आदि किस्से हवा में तैरने लगे हैं, लेकिन वे लोग यह भूल जाते हैं कि शाहरुख शाहरुख हैं, अपने पिता और दादा नहीं…। शाहरुख ने तो “लव जेहाद” अपनाते हुए एक हिन्दू लड़की को भगाकर शादी की है, फ़िर उनकी तुलना स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी से कैसे की जा सकती है?

उधर हमारा “बिका हुआ सेकुलर मीडिया” जो पहले ही हिन्दुत्व और हिन्दू हित की खबरों को पीछे धकेल रखता है, हरिद्वार कुम्भ के शाही स्नान की प्रमुख खबरें छोड़कर, देश पर आई इस “सेकुलर आपदा” यानी खान की फ़िल्म रिलीज़ को कवरेज देता रहा (ऐसी ही भौण्डी कोशिश देश के स्वतन्त्रता दिवस के दिन भी हुई थी जब इस व्यक्ति को अमेरिका के हवाई अड्डे पर तलाशी के लिये रोका गया था, उस दिन भी मीडिया ने 15 अगस्त के प्रमुख कार्यक्रम छोड़कर इस छिछोरे पर हुए “कथित अन्याय” को कवरेज में पूरे तीन दिन खा लिये थे)। शाहरुख खान ने पाकिस्तान से मधुर सम्बन्ध की नौटंकी का पहला भाग अपनी फ़िल्म “मैं हूँ ना…” से पहले भी खेला था, अभी जो खेला गया, वह तीसरा भाग था, जबकि दूसरा भाग अमेरिकी हवाई अड्डे की तलाशी वाला था। इससे शक गहराना स्वाभाविक है कि शाहरुख का कोई गुप्त एजेण्डा तो नहीं है? इसी प्रकार फ़िल्म की रिलीज़ के पहले शाहरुख खान ने लन्दन एयरपोर्ट पर बॉडी स्कैनर द्वारा उसकी नग्न तस्वीरें खींचे जाने सम्बन्धी सरासर झूठ बोला, फ़िर उसके हवाले से खबर आई कि उसकी नग्न तस्वीरों पर लन्दन में लड़कियों ने ऑटोग्राफ़ भी लिये… ब्रिटिश कस्टम अधिकारियों के खण्डन के बावजूद (क्योंकि ऐसा नग्न स्कैन सम्भव नहीं है), चमचे पत्रकारों ने कुछ समय हंगामे में गुज़ार दिया… और अचानक तुरन्त ही इस्लामिक जगत की ओर से “फ़तवा” आ गया कि “कोई भी मुसलमान एयरपोर्ट पर अपना बॉडी स्कैनर न करवायें, क्योंकि यह गैर-इस्लामिक है…” ताबड़तोड़ दारुल उलूम ने भी इसका अनुमोदन कर दिया… क्या यह सिर्फ़ संयोग है कि शाहरुख के बयान के तुरन्त बाद फ़तवा आ गया? क्या यह भी संयोग है कि नायक का नाम रिज़वान है (कोलकाता में एक हिन्दू लड़की से शादी रचाने और मौत के बाद “सेकुलरों” द्वारा रोने-पीटने के मामले में भी “हीरो” रिज़वान ही था)। क्या यह भी सिर्फ़ संयोग है कि नायिका एक हिन्दू विधवा है? इतने सारे संयोग एक साथ? मामला कुछ गड़बड़ है भैया…
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इसी विवाद से सम्बन्धित एक और हिट लेख पढ़िये – क्या इन्हीं पाकिस्तानियों के लिये मरे जा रहे हैं शाहरुख खान…

http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/02/paki-players-ipl-shahrukh-khan-aman-ki.html

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33 Comments

  1. February 18, 2010 at 7:51 am

    हमारा तो सर चक्करा रहा है. अभी कुछ नहीं कहेंगे.

  2. rahul said,

    February 18, 2010 at 8:18 am

    सांप निकल गया अब लकीर पीटने से क्‍या, खान तो घर इस लिये आया कि हिसाब लगा सके किसको किया देकर क्‍या बचा? मिडिया बारे में गलत लिख रहे हो वे ठीक काम कर रहे हैं, ठण्‍ड में 4 या 5 हजार पहुंच जायें तो 10 लाख ने कुम्‍भ में भाग लिया खबर बन तो रही है

  3. February 18, 2010 at 8:20 am

    स्वाभिमान बेच जब सरकार चलेफिर कैसे दुश्मनों पर तलवार चलेरेवरी खिलाये हैं जिसने राजाओं कोपिछे पिछे उनके ही पुरस्कार चले!… जय हो

  4. February 18, 2010 at 8:20 am

    मामला कुछ नहीं घोर गड़बड़ है भैया जनता की आँख से काजल चुराए जाने का रिवाज़ देश में सदा से चला आ रहा है ! अँगरेज़ चले गए अँगरेज़ कांग्रेस छोड़ गए, घुलाम हम तब भी थे और आज भी !जय इतालिनो माता की जय भोंदू कान्फुज़ पूत की !!!

  5. February 18, 2010 at 8:29 am

    1) IPL में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को लिया जाना चाहिये था और 2) पाकिस्तान हमारा एक “महान पड़ोसी” है……इनको पाकिस्तान नहीं भेज दिया जाये….

  6. February 18, 2010 at 9:09 am

    पिक्चर तो चल गयी ना , बस हो गया काम ।

  7. February 18, 2010 at 9:20 am

    मिथिलेश भाई, फ़िल्म तो भारत के लायक है भी नहीं और वैसा ही हश्र भी हो रहा है…। पश्चिम में जरूर पुरस्कार वगैरह बटोर लायेगी, क्योंकि उधर इमोशनल अत्याचार वाली जुगाड़ चलती है… इधर तो लोग गालियां देकर निकलते हैं थियेटर से कि खामखा पैसा बर्बाद कर दिया…

  8. February 18, 2010 at 9:24 am

    @ राहुल – चलो आपके अनुसार बुरी से बुरी स्थिति मान भी लें, तब भी इस "सेकुलर आपदा" शाहरुख खान से तो बड़ा ही है कुम्भ का स्नान और हमेशा रहेगा…। रही मीडिया की बात तो विभिन्न लेखकों के कई सौ लेखों द्वारा साबित हो चुका है कि मीडिया पर 6M (मार्क्स, मुल्ला, मिशनरी, मैकाले, माइनो, मार्केट) का स्पष्ट प्रभाव है…। आपको न मानना हो तो कोई बात नहीं…। समय मिले तो कभी इसे भी पढ़ लीजियेगा… थोड़े ज्ञानचक्षु खुलेंगे आपके… http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/08/why-indian-media-is-anti-hindutva.html

  9. February 18, 2010 at 10:17 am

    मामला कुछ नही घोर गडबड है भैया

  10. February 18, 2010 at 10:37 am

    धर्मनिरपेक्षता जिन्दाबाद.

  11. February 18, 2010 at 10:47 am

    @ सुरेश चिपलूनकर जी,आप जिस "राहूल" नाम के महोदय से संबोधित हैं…एक बार समय निकालकर जरा इसके ब्लाग पर झाँक आईये..आपको इसकी असलियत पता चल जाएगी कि ये हिन्दू नामधारी व्यक्ति वास्तव में कौन है। आप इसे बहुत अच्छे से जानते हैं….आजकल यहाँ ब्लागजगत में जाकिर नाईक जैसों की नाजायज संताने छद्म भेष में विचरण कर रही हैं…ये जो राहूल नाम के महाश्य हैं, ये उन्ही में से हैं…लेकिन मैं इनकी वास्तविकता से भली भान्ती परिचित हूँ…वैसे असल रूप में इनकी दाल नहीं गली तो आजकल ये महाश्य छद्म भेष में हिन्दू नाम(राहूल्) से प्रोफाईल बना कर हिन्दू धर्म तथा उसके धर्मग्रन्थों के बारे में ऊल जलूल बकवास करते घूम कर रहे हैं। देश की तो बात झोडिए यहाँ इस ब्लागजगत में भी अन्दर ही अन्दर बहुत गहरे षडयन्त्र पल रहे हैं….

  12. February 18, 2010 at 11:16 am

    सुरेश जी, आपने विल्कुल सही बात का उल्लेख किया है और वह एक सर्वविदित सच (ओपन ट्रूथ) भी है! लेकिन यहाँ पर पाठकों तथा टिपण्णीदाता मित्रों से एक बात कहना चाहूंगा कि किसी पेशे में जाना न जाना किसी का भी व्यक्तिगत मामला हो सकता है लेकिन राष्ट्र की कीमत पर नहीं ! और अफ़सोस की बात यही है कि कुछ ख़ास लोगो के लिए अपने और अपने धंधे के आगे राष्ट्र तो एक साधन मात्र है ! कुछ महीनो पहले एक अन्य सिनेस्टार ने अपने को सुर्ख़ियों में लाने के लिए उसे सोसाइटी द्वारा फ्लैट न बेचे जाने का फंडा उछाला था, साम्प्रदायिकता की कीमत पर खुद को सेक्युलर बताते हुए ! उसके बाद क्या हुआ सभी जानते है !

  13. February 18, 2010 at 11:21 am

    @ वत्स साहब ! आजकल पटरियों पर चाट पकोड़ी बेचने वाले इस नाम से अपने बच्चो का नामकरण ज्यादा कर रहे है 🙂

  14. बवाल said,

    February 18, 2010 at 12:21 pm

    सोचने पर मजबूर कर देने वाली बात कही आपने।

  15. Harish Bist said,

    February 18, 2010 at 12:30 pm

    जाने कॊन सा ऎसा चमत्कार हो गया कि भारत पाकिस्तान से रिश्ते सुधार ले। शाहरुख ही यह बता सकते हॆं।

  16. gg1234 said,

    February 18, 2010 at 1:36 pm

    waise yeh interview bhi padh lein…bahut jabardast hai…http://news.rediff.com/slide-show/2010/feb/17/slide-show-1-we-are-keeping-the-nation-alive-in-an-icu.htm#contentTop

  17. रंजन said,

    February 18, 2010 at 3:53 pm

    बड़ी पारखी नजर है.. छिपा हुआ भी देख लेती है…

  18. Common Hindu said,

    February 18, 2010 at 5:32 pm

    Hello Blogger Friend,Your excellent post has been back-linked inhttp://hinduonline.blogspot.com/– a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu- Hindu Online.

  19. Alok Nandan said,

    February 18, 2010 at 5:36 pm

    मीडिया वाले शाहरुख खान को राष्ट्रीय हीरो बनाने पर तुले हुये थे…स्पेशल कार्यक्रम तक चलाने की होड़ लगी हुई थी…उसके बाद भाई लोग जहां तहां धूम मचाने वाले स्टाईल में लिख भी रहे थे…तमाम विवादों से परे होकर मैं इस फिल्म की बेहतर समीक्षा की तलाश की तलाश में भटकता रहा, लेकिन अधिकतर यही पढ़ने को मिला कि बहुत ही अच्छी है…लेकिन यह फिल्म किस लिहाज से अच्छी है यह कोई नही बता रहा था…रवीश जी तो इसे उम्दा स्तर की अंतरराष्ट्रीय फिल्म बताने में जुटे हुये थे…और राजनीतिक सोंच भी थोपते हुये नजर आ रहे थे…बेहतर है बाक्स आफिस पर गुब्बारा जल्दी फूट गया…और रही सही कसर आपके इस आलेख ने पूरा कर दिया…आपसे बिल्कुल सहमत हूं कि फिल्म के खिलाफ मोर्चा खोलकर ठाकरे और उनकी टोली ने वाकई में गलती की थी….पाकिस्तानी खिलाड़ियों के पक्ष में शाहरुख के बयान का विरोध तो ठीक था लेकिन फिल्म का नहीं….सच मानिये जनता की नंगी आंखे सच्चाई को तुरंत देख लेती है…थोड़ी देर के लिए भोंपूबाज पत्रकार भाई लोग भले ही धूल गर्द उड़ा दें….वैसे शाहरुख न तो हिंदू है और न ही मुसलमान है…उनका ईमान सिर्फ धन है…हाइली मनी माइंडेड हैं…उनका लाइफ फिलोसफी है मनी के लिए सबकुछ करेगा….इसलिये उनको गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है…और जो लोग उन्हें गंभीरता से ले रहे हैं उन्हें भी गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। वैसे समय के अनुसार इस आलेख की जरूरत थी। सादर आलोक नंदन

  20. February 18, 2010 at 6:27 pm

    सुरेश जी आपने सही नब्ज पकड़ी है | इन सेकुलर और पैसे पे बिकी मीडिया के झांसें में जाने कितने लोगों ने अपने पैसे बर्बाद किये | अरे मेरी घरवाली भी कह रही थी MNIK देखने चलो, मैंने साफ़-साफ़ कह दिया देखो और कोई फिल्म बोलो चलूँगा … ये फिल्म किसी सर्त पे हाल जाकर नहीं देखूंगा … नाहक मैं पैसे की बर्बादी, २-३ घंटे का सर दर्द और ऊपर से मेरा पैसा महान सेकुलर शाहरुख को जाएगा … ना बाबा ना |आपसे अक्षरसः सहमत हूँ की बाल ठाकरे और आम जनता इस पुरे प्रकरण में मुर्ख बन गए |उनकी नजर शायद प्रधानमन्त्री या अन्य शक्तिशाली मंत्रिपद पर ho sakti है … शायद उसी की पृष्टभूमि तैयार कर रहे हैं |

  21. February 19, 2010 at 1:45 am

    मतलब मेरी समीक्षा सही निकली

  22. February 19, 2010 at 3:41 am

    सुरेश जी,सारगर्भित और शोधपरक लेख के लिए बधाई…मेरा आग्रह बस इतना है कि जिस तरह हाथ की पांच उंगलियां बराबर नहीं होती, वैसे ही ये बात किसी भी कौम पर लागू होती है…हमारे पास शाहरुख़ ख़ान है तो हमारे पास अपना महफूज़ अली भी है…शाहरुख के बारे में इतना ज़रूर कहूंगा कि उनका ईमान-धर्म सबसे पहले पैसा है…आपको याद होगा कि कोलकाता में रिजवानुर्रहमान नाम के युवा की लाश पटरियों पर मिली थी…उसने आराम की बात है लक्स अंडरगार्मेंट बनाने वाले अशोक टोड़ी की लड़की से शादी करने का गुनाह किया था…अब हमारे शाहरुख ख़ान साहब बड़ी मोटी फीस लेकर लक्स के ब्रैंड एम्बेसडर बन गए हैं…रिजवानुर्रहमान की बूढ़ी मां ने शाहरुख से अपील भी की थी कि वो ये एड फिल्में न करें…लेकिन चांदी के जूते के आगे एक बूढ़ी मां की अपील की क्या बिसात…जय हिंद…

  23. February 19, 2010 at 5:14 am

    अरे! भैया…. कुछ …मत कहिये…. नहीं तो अभी कुछ लोग पीछे पड़ जायेंगे….मैंने शाहरुख़ के बारे में क्या कह दिया……कि लोग मुझे तमीज सिखाने पे तुल गए….. यह शाहरुक यहाँ भी सबको पैसे खिला रहा है…. ***ला शाहरुख़….. नचनिया…. दूसरों की बरात में नांचने वाला…अपने को देशभक्त कहता है…. अभी किसी को मालूम नहीं है कि मैं शाहरुख़ को पर्सनली जानता हूँ…. एक शाहरुख़ को ही नहीं…. फिल्म जगत में काफी लोग मेरे दोस्त हैं…. यहाँ लोग मेरे लेवल के बारे में बात कर रहे हैं…. यह नहीं पता कि लेवल क्या होता है….. यह फ़िल्मी हस्तियाँ ऐसी नहीं हैं कि इनको जाना जाए…. और मैंने ज़रा सी सच्चाई क्या लिख दी…कि बवाल हो गया…. अब बताइए….मैं कुछ अगर बोल रहा हूँ तो उसमें कुछ तो सच्चाई होगी ही ना….? लोग पढ़ते नहीं हैं….बिना नॉलेज के बातें करते हैं…. मुझे राष्ट्रवादिता सिखा रहे हैं…. खरि०खरि बोलो तो बुरा लगता है…. लोगों को…. और सबसे बड़ी बात…. कि मुझसे चाहते हैं…कि ….. मैं बिना मतलब की बहस में पडूँ…. अब आप बताइए….कि क्या मेरा लेवल यही है…. कि मैं एक घटिया इंसान शाहरुख़ …. जिसने ना देश के लिए कुछ किया ना समाज के लिए….. और मुझसे पूछा जा रहा है कि मैंने क्या किया…..? अब मेरा यही लेवल है कि मैं टुच्चों को बताऊँ…. कि मेरा लेवल क्या है? मैं कभी बिना नॉलेज के बात नहीं करता….. और खरी बात बोलो… तो बुरा बन जाता हूँ…. वो भी बिना मतलब में…. अरे! भई… तर्क शास्त्र में हमसे कोई जीत नहीं सकता….. और मैं तो सिर्फ जीतने के लिए ही पैदा हुआ हूँ…. हारता हूँ तो तब तक के कोशिश करता हूँ कि जीत जाऊं …. फिर भी लोग पीछे पड़ जाते हैं….. बिना मतलब के…. भई… मैं एक राष्ट्रवादी आदमी हूँ…. और सो कॉल्ड सेक्यूलरों से नफरत करता हूँ…. मेरी राष्ट्रवादिता से कई लोग तो मुझे मुसलमाँ ही नहीं मानते…. जबकि यह नहीं पता कि धर्म मेरे बंद कमरे की चीज़ है…. यह ऐसा नहीं है कि …मैं खुद को साबित करने के लिए अपने मूंह से धार्मिक संबोधन और अलफ़ाज़ निकालूँ….. मैं राष्ट्रवादी हूँ…. मैं अपने देश से…अपने जन्मभूमि… खुद से ज्यादा प्यार करता हूँ…. और गलत बातों का हमेशा विरोध करता रहूँगा…. कुछ लोग कहते हैं (इनफैकट गाली देते हैं) यह मेल कर के…. कि मैं सुरेश चिपलूनकर का चमचा हूँ…. मैं कहता हूँ ….. हाँ भई हूँ…. बड़े भाई का चमचा होना कौन सी बुरी बात है…? सिर्फ नाच गाने से देश और समाज नहीं चलता…. एक बहुत पुरानी कहावत: महफूज़, को जब गुस्सा आता है…..तो दूर कहीं ज्वालामुखी फटता है….

  24. February 19, 2010 at 7:20 am

    @महफूज भाई, जब हाथी अपनी राह चलता है तो गली के कुत्ते यूँ ही भौका करते है लेकिन हाथी अपनी राह थोड़े ही बदल लेता है. आप इनके **ने पर क्यों जाते हो………. आप बिंदास लिखते रहो. शुभकामनायें …….@राहुल, लगता है सलीम खान ने साथ छोड़ दिया इसलिए कैराना में दिल नहीं लग रहा. लेकिन शायद यह भूल गए हो कि रंग लगा लेने से भी सियार हुंआना नहीं छोड़ता. तो नाम तो तुम चाहे राहुल रख लो या राउल लेकिन रहोगे कैरानवी ही. जहाँ तक रही बात कुम्भ में गंगा में डुबकी मारने की तो तुम्हारे दादा-परदादा भी वहां डुबकी लगा चुके हैं, तुम कितना भी भूलना चाहो सच्चाई तो यही है………….

  25. RAJ SINH said,

    February 19, 2010 at 10:15 am

    इस महफूज़ अली नाम के आदमी को सलाम !हिम्मत और अक्ल दोनों हैं इसमें.और प्यारा इन्सान भी है.लेकिन इसमें एक कबीर भी है जो अन्ध्श्रद्धालुओं को और छद्म सेक्युलरों को नहीं पच पाता.कमसे कम इसने फिल्मवालों के बारे में जो भी कहा वह और भी गहरा सच है.मैं भी शायद फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े होने के नाते इतना सच न कह पाऊँ पर यहाँ सिर्फ धन वाद है ,खरीद कर पब्लिसिटी करने के जाने पहचाने आजमाए तरीके हैं और देश वेश की बातें बेमानी.पैसे के लिए ज्यादा मॉल बेचने और पैसे के लिए बहुत हैं जो अपनी माँ तक बेच डालें.शुक्र है की कुछ सुधार हुआ है वर्ना तो दस साल पहले तक कौन और किस से किस तरह फिल्मे बनवाता था वह देशद्रोह ही था.अगर याद हो तो प्रीती जिंटा को छोड़ इंडस्ट्री में कोई मर्द ही नहीं था एक वक्त.देश और देशभक्ति सहित सब कुछ यहाँ बेचने के लिए होता है .फिल्म लाईन और मीडिया इस समय सबसे पतित लोगों के हाँथ गिरवी है.सुरेश जी बहुत बार आपसे असहमत हो जाता हूँ पर इस बार इस बाजारीकरण का जो खाका आपने खींचा है उस से पूरा सहमत हूँ .इस मुल्क का दुर्भाग्य है की इनलालची दलालों को देश अपना हीरो मानता है .जैसा उसने खुद दावा किया है हिम्मत के साथ, हीरो तो 'महफूज़ ' है .और उसकी कलम किसी का चमचा है ,कहनेवाले ही चमचे हैं .जय हिंद !

  26. the said,

    February 19, 2010 at 11:29 am

    श्री महफ़ूज़ अली जैसे मानवों के लिए ही कहा गया है.."ऐसे तुर्किन पे कोटिन हिंदू वारिये…" सचमुच, महफ़ूज़ भाई पर हज़ारों नहीं लाखों सेकुलर हिंदू कुर्बान हैं. महफ़ूज़ जी हर बला से महफ़ूज़ रहें, यही कामना है.

  27. February 19, 2010 at 1:51 pm

    सुरेश चिपलूनकर जीमुझको तो लगता है की बाला साहब ने अपने बेटे उद्धव की दोस्ती का ख्याल रखा है बस और उनके दोस्त की मूवी हिट करने की कोशिश की है

  28. February 19, 2010 at 4:54 pm

    आपकी पोस्ट की दो बातों से असमत हूं। पहली तो यह कि बाल ठाकरे मूर्ख नहीं है। उनकी पूरी जिंदगी राजनीति करते गुजरी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि फिल्म को हिट करवाने के लिए पार्टी के लिए चंदा दे कर जानबूझ कर विवाद पैदा करवाया गया हो।दूसरी बात यह कि शाहरूख खान के वैवाआहिक जीवन पर आपकी टिप्प्णी एकदम गलत है। क्या गौरी खान के मातापित ने कहीं कभी कोई शिआख्यत की थी/है कि शाहरूख उनकी बेटी को भगा कर ले गया।लव जेहाद के मामले पर आपकी पुरानी पोस्ट में लिखा था कि ज्यादातर लड़कियों को भारत से बाहर भेज दिया जाता है, जबकि शाहरूख के मामले में यह बात बिल्कुल उल्ट है, शाहरूख ने गौरी को ससम्मान अपनी पत्नी का दर्जा दे रखा है। एक बात और भी कई बड़े बड़े पूजनीय नायकों/ अभिनेताओं से शाहरूख इस मामले में कहीं आगे निकल जाते हैं, वे अकेले ऐसे अभिनेता-पति है जिसके चरित्र पर कोइ उंगली नहीं उठा सकता, आप भी नहीं। आज तक उनका किसी अभिनेत्री के साथ नाम नहीं जुड़ा।बाकी आपकी पोस्ट और आपसे एकदम सहमत।

  29. February 19, 2010 at 8:40 pm

    सुरेश भाई,आपको बहुत से चाहने वाले हैं जो आपके हर लिखे पर सहमत होते हैं, शायद वो मुख्य बातों के बीच में थोड़ी बहुत इधर उधर की बात को बुरा न माने.दुसरे कुछ हमारे जैसे भी होंगे जो आपसे पूरी तरह सहमत नहीं होते लेकिन फिर भी आपका हर लेख पढ़ते हैं कि शायद कुछ नया जानने को मिले, अब अगर हमारे जैसे लोगों को आपके लेख के बीच में ये पढने को मिले,शाहरुख ने तो “लव जेहाद” अपनाते हुए एक हिन्दू लड़की को भगाकर शादी की है, फ़िर उनकी तुलना स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी से कैसे की जा सकती है?तो लगता है कि आप मुख्य मुद्दे से भटककर सतही लेखन पर आ गए हैं, और ऐसे में आपके बाकी तर्कों की विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में आती है| आप समझदार हैं, और निंदक नियरे राखिये की तर्ज पर ये टिपण्णी दे रहा हूँ, आशा है कि आप सागर भाई और मेरी टिपण्णी पर विचार करेंगे | असल में हमारे जैसे पाठक को जो आपकी हर बात पर भरोसा नहीं करता, 😉 को ध्यान में रखकर लिखेंगे तो आपका खुद का लेखन भी सुधरेगा क्योंकि आप खुद अपने लिखे की स्क्रूटनी कर रहे होंगे |आभार,नीरज रोहिल्ला

  30. February 20, 2010 at 7:26 am

    सुरेशजी एक बहुत ही सारगर्भित लेख के लिए बधाई.आश्चर्य है इतनी सारी सत्य बातें आप कैसे ला पाते हैं.शाहरुख़ के बारे में क्या कहा जाये????? उनकी लगभग हर फिल्मों में वो किसी न किसी लड़की को भागता है, चाहे वो कुवारी हो या शादीशुदा हो.अब वो अपनी फिल्मो के द्वारा क्या शिक्षा देना चाहते है, ये वही जाने.युवा जगत को भी आडम्बर से ही प्यार है, वेलनटाइन डे मनाना है, शाहरुख़ की फिल्मे देखनी है आदि आदि.बाला साहेब ठाकरे ने जो किया , मेरे विचार से सही किया.हिंदुत्व के मुद्दे पर शाहरुख़ का विरोध करना और इस बहाने शाहरुख़ का पाकिस्तानी प्रेम पूरी दुनिया में जाहिर हो गया. इन बातों को देखकर यह नहीं लगता की ठाकरे साहब गलत हैं.

  31. February 20, 2010 at 8:02 am

    सागर भाई और रोहिल्ला जी – आपकी असहमति सिर-आँखों पर…। ज़ाहिर है कि प्रत्येक व्यक्ति मुझसे कैसे सहमत हो सकता है… इसी में तो मजा है… और यही लोकतन्त्र है…। लेकिन आपकी बात से मेरी एक पोस्ट बनने वाली है, इसलिये आप दोनों का धन्यवाद…

  32. February 20, 2010 at 9:37 pm

    शाहरुख गया भाड़ में. आज से अपन का हीरो तो महफूज भाई है. ए पी जे कलाम साहब के बाद अपना दूसरा पसंदीदा नायक.खुदा आपको सदा सलामत रखे. आपके उम्दा खयालो को महफूज रखे.

  33. Anonymous said,

    September 8, 2010 at 7:25 am

    >hello chiplunkar jee, i m great fan of your blogs. its been two days only i m reading ur articles. Great work sir


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