नरेन्द्र मोदी के नाम से अब पूरी कॉंग्रेस “फ़्रस्ट्रेशन” का शिकार होने लगी है… … Narendra Modi, Congress Frustration, SIT, Gujrat Riots

वैसे तो “फ़टे हुए मुँह” वाले (बड़बोले) कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी किसी वक्तृत्व कला के लिये नहीं जाने जाते हैं, न ही उनसे कोई उम्मीद की जाती है कि तिवारी जी कोई “Sensible” (अक्लमंदी की) बात करेंगे (बल्कि अधिकतर कांग्रेस प्रवक्ता लगभग इसी श्रेणी के हैं चाहे वे सत्यव्रत चतुर्वेदी जैसे वरिष्ठ ही क्यों न हों), लेकिन कल (29/03/10) को टीवी पर नरेन्द्र मोदी सम्बन्धी बयान देते वक्त साफ़-साफ़ लग रहा था कि मनीष तिवारी सहित पूरी की पूरी कॉंग्रेस “Frustration” (हताशा) की शिकार हो गई है। जिस अभद्र भाषा का इस्तेमाल मनीष तिवारी ने एक प्रदेश के तीन-तीन बार संवैधानिक रुप से चुने गये मुख्यमंत्री के खिलाफ़ उपयोग की उसे सिर्फ़ निंदनीय कहना सही नहीं है, बल्कि ऐसी भाषा एक “घृणित परम्परा” की शुरुआत मानी जा सकती है।

अवसर था पत्रकार वार्ता का, जिसमें एक पत्रकार ने नरेन्द्र मोदी के साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की एक मंच पर उपस्थिति के बारे में पूछ लिया। पत्रकार तो कभीकभार “छेड़ने” के लिये, या कभीकभार अपनी “कान्वेंटी अज्ञानता” की वजह से ऐसे सवाल पूछ लेते हैं लेकिन मनीष तिवारी एक राष्ट्रीय पार्टी (जो अभी तक स्वाधीनता संग्राम और गाँधी के नाम की रोटी खा रही है) के प्रवक्ता हैं, कम से कम उन्हें अपनी भाषा पर सन्तुलन रखना चाहिये था…।

उनका बयान गौर फ़रमाईये – “जब राज्य का मुख्यमंत्री खुद ही इतना “बेशरम” हो कि जिस मंच पर मुख्य न्यायाधीश विराजमान हों, उनके पास जाकर बैठ जाये, जिस आदमी को कल ही SIT ने पेशी के लिये बुलाया था, वह कैसे उस मंच पर बैठ “गया”। यह बात तो “उसे” सोचना चाहिये थी, यदि भाजपा में जरा भी शर्म बची हो तो वह उसे तुरन्त हटाये…” आदि-आदि-आदि-आदि और नरेन्द्र मोदी की तुलना दाऊद इब्राहीम से भी।

उल्लेखनीय है कि नरेन्द्र मोदी को अभी सिर्फ़ SIT ने पूछताछ के लिये बुलाया है, न तो नरेन्द्र मोदी पर कोई FIR दर्ज की गई है, न कोई मामला दर्ज हुआ है, न न्यायालय का समन प्राप्त हुआ। दोषी साबित होना तो दूर, अभी मुकदमे का ही अता-पता नहीं है, फ़िर ऐसे में गुजरात विधि विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में एक चुना हुआ मुख्यमंत्री उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के साथ मंच साझा करता है तो इसमें कौन सा गुनाह हो गया? उसके बावजूद एक संवैधानिक पद पर आसीन मुख्यमंत्री के लिये “बैठ गया” (गये), “उसे” (उन्हें), “वह” (वे) जैसी “तू-तड़ाक” की भाषा और “बेशर्म” का सम्बोधन? पहले मनीष तिवारी खुद बतायें कि उनकी क्या औकात है? नरेन्द्र मोदी की तरह तीन बार मुख्यमंत्री बनने के लिये मनीष तिवारी को पच्चीस-तीस जन्म लेने पड़ेंगे (फ़िर भी शायद न बन पायें)। लेकिन चूंकि “मैडम” को नरेन्द्र मोदी पसन्द नहीं हैं इसलिये उनके साथ “अछूत” सा व्यवहार किया जायेगा, चूंकि “मैडम” को अमिताभ बच्चन पसन्द नहीं हैं इसलिये अभिषेक बच्चन के साथ भी दुर्व्यवहार किया जायेगा, चूंकि मैडम को मायावती जब-तब हड़का देती हैं इसलिये कभी मूर्तियों को लेकर तो कभी माला को लेकर उन्हें निशाने पर लिया जायेगा (भले एक ही परिवार की समाधियों ने दिल्ली में हजारों एकड़ पर कब्जा कर रखा हो), यह “चाटुकारिता और छूआछूत” की एक नई राजनैतिक परम्परा शुरु की जा रही है।

इस सम्बन्ध में कई प्रश्न खड़े होते हैं कि जब लालू और शिबू सोरेन जैसे बाकायदा मुकदमा चले हुए और सजा पाये हुए लोग सोनिया के पास खड़े होकर दाँत निपोर सकते हैं, सुखराम और शहाबुद्दीन जैसे लोग संसद में कांग्रेसियों के गले में बाँहे डाले बतिया सकते हैं, तो नरेन्द्र मोदी के ऊपर तो अभी FIR तक नहीं हुई है, लेकिन चूंकि मैडम को साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है कि उनके “भोंदू युवराज” की राह में सबसे बड़े रोड़े नरेन्द्र मोदी, मायावती जैसे कद्दावर नेता हैं। ये लोग भूल जाते हैं कि चाहे मोदी हों या मायावती, सभी जनता द्वारा चुने गये संवैधानिक पदों पर आसीन मुख्यमंत्री हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के साथ ही क्या, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के साथ भी मंच पर आयेंगे (यदि वे उनके राज्य के दौरे पर आये तो)।

भाजपा-संघ के किसी अन्य नेता के साथ इस प्रकार का व्यवहार अभी तक नहीं हुआ है, इसी से पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी, भाजपा के नेताओं से काफ़ी ऊपर और लोकप्रिय हैं, तथा इसीलिये उनके नाम से कांग्रेस को मिर्ची भी ज्यादा लगती है, परन्तु जिस प्रकार की “राजनैतिक अस्पृश्यता” का प्रदर्शन कांग्रेस, नरेन्द्र मोदी और बच्चन के साथ कर रही है वह बेहद भौण्डापन है।

एक बार पहले भी जब आडवाणी देश के गृहमंत्री पद पर आसीन थे (वह भी जनता द्वारा चुनी हुई सरकार ही थी), तब भी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने उन्हें “बर्बर” कहा था, ऐसी तो इन लोगों की मानसिकता और संस्कृति है, और यही लोग भाजपा को हमेशा संस्कृति और आचरण के बारे में उपदेश देते रहते हैं… जबकि भाजपा ने कभी नहीं कहा कि सिख दंगों में “बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है…” जैसे बयान देने वाले राजीव गाँधी के साथ मंच शेयर नहीं करेंगे। क्या कभी भाजपा ने यह कहा कि चूंकि सुधाकरराव नाईक 1993 के मुम्बई दंगों के समय मूक दर्शक बने बैठे रहे इसलिये, शरद पवार “शकर माफ़िया” हैं इसलिये, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ज़मीन माफ़िया हैं इसलिये, सज्जन कुमार सिक्खों के हत्यारे हैं इसलिये, इनके खिलाफ़ अनाप-शनाप भाषा का उपयोग करेंगे? इनके साथ मंच शेयर नहीं करेंगे? कभी नहीं कहा। लेकिन नरेन्द्र मोदी के नाम के साथ “मुस्लिम वोट बैंक” जुड़ा हुआ है इसलिये उनका अपमान करना कांग्रेस अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानती है। भारत के किसी राज्य की जनता द्वारा चुने हुए मुख्यमंत्री को अमेरिका वीज़ा नहीं देता लेकिन कांग्रेस के मुँह से बोल तक नहीं फ़ूटता, क्योंकि तब वह “देश का अपमान” न होकर “हिन्दुत्व का अपमान” होता है… जिसमें उन्हें खुशी मिलती है।

अंग्रेजी के चार शब्द हैं – Provocation, Irritation, Aggravation और Frustration. (अर्थात उकसाना, जलाना, गम्भीर करना और कुण्ठाग्रस्त करना) । अक्सर मनोविज्ञान के छात्रों से यह सवाल पूछा जाता है कि इन शब्दों का आपस में क्या सम्बन्ध है, तथा इन चारों शब्दों की सीरिज बनाकर उसे उदाहरण सहित स्पष्ट करो…।

इसे मोटे तौर पर समझने के लिये एक काल्पनिक फ़ोन वार्ता पढ़िये –

(नरेन्द्र मोदी भारत के लोहा व्यापारी हैं, जबकि आसिफ़ अली ज़रदारी पाकिस्तान के लोहे के व्यापारी हैं)
फ़ोन की घण्टी बजती है –
नरेन्द्र मोदी – क्यों बे जरदारी, सरिया है क्या?
जरदारी – हाँ है…
मोदी – मुँह में डाल ले… (फ़ोन कट…)

इसे कहते हैं Provocation करना…

अगले दिन फ़िर फ़ोन बजता है –
नरेन्द्र मोदी – क्यों बे जरदारी, सरिया है क्या?
जरदारी (स्मार्ट बनने की कोशिश) – सरिया नहीं है…
मोदी – क्यों, मुँह में डाल लिया क्या? (फ़िर फ़ोन कट…)

इसे कहते हैं, “Irritation” में डालना…

अगले दिन फ़िर फ़ोन बजता है –
नरेन्द्र भाई – क्यों बे जरदारी, सरिया है क्या?
जरदारी (ओवर स्मार्ट बनने की कोशिश) – अबे साले, सरिया है भी और नहीं भी…
नरेन्द्र भाई – अच्छा, यानी कि बार-बार उसे मुँह में डालकर निकाल रहा है? (फ़ोन कट…)

इसे कहते हैं Aggravation में डालना…

अगले दिन जरदारी, मोदी से बदला लेने की सोचता है… खुद ही फ़ोन करता है…
जरदारी – क्यों बे मोदी, सरिया है क्या?
नरेन्द्र मोदी – अबे मुँह में दो-दो सरिये डालेगा क्या? (फ़ोन कट…)

इसे कहते हैं Frustration पैदा कर देना…

इसी “साइकियाट्रिक मैनेजमेण्ट” की भाषा में कहा जाये तो मोदी ने अमिताभ को गुजरात का ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाकर कांग्रेस को पहले “Provocation” दिया, फ़िर SIT के समक्ष “भाण्ड मीडिया की मनमानी” से तय हुई 21 तारीख की बजाय, 27 को मुस्कराते हुए पेश होकर कांग्रेस को “Irritation” दिया, फ़िर अमिताभ के साथ हुए व्यवहार की तुलना में, कांग्रेसियों को तालिबानी कहकर “Aggravation mode” में डाल दिया, और अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के साथ एक मंच पर आकर मोदी ने कांग्रेस को “Frustration” भी दे दिया…। मनीष तिवारी की असभ्य भाषा उसी Frustration का शानदार उदाहरण है… इसलिये अपने परम विरोधी के बारे आदरणीय शब्दों में बयान देने की क्लास अटेण्ड करने के लिये मनीष तिवारी को अमर सिंह के पास भेजा जाना चाहिये।
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चलते-चलते :- पुराना हैदराबाद दंगों की आग में जल रहा है, लगभग 20 मन्दिर तोड़े जा चुके हैं और एक जैन गौशाला को आग लगाकर कई गायों को आग के हवाले किया गया है, दूसरी तरफ़ देश की एकमात्र “त्यागमूर्ति” ने लाभ के पद से इस्तीफ़ा देने का नाटक करने के बाद अब पुनः “राष्ट्रीय सलाहकार परिषद” का गठन कर लिया है और उसके अध्यक्ष पद पर काबिज हो गईं हैं… क्या यह दोनों खबरें किसी कथित नेशनल चैनल या अंग्रेजी अखबार में देखी-सुनी-पढ़ी हैं? निश्चित रूप से नहीं, क्योंकि “त्याग की देवी” की न तो आलोचना की जा सकती है, न उनसे सवाल-जवाब करने की किसी पत्रकार की हैसियत है…। इसी प्रकार चाहे बरेली हो, रायबरेली हो, इडुक्की हो या हैदराबाद सभी दंगों की खबरें “सेंसर” कर दी जायेंगी…आखिर “गंगा-जमनी” संस्कृति का सवाल है भई!!! 6M आधारित टीवी-अखबार वालों को हिदायत है कि सारी खबरें छोड़कर भाजपा-संघ-हिन्दुत्व-मोदी को गरियाओ…। जिन लोगों को यह “साजिश” नहीं दिखाई दे रही, वे या तो मूर्ख हैं या खुद भी इसमें शामिल हैं…

बहरहाल, अब तो यही एकमात्र इच्छा है कि किसी दिन नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लें, और मैं उस दिन टीवी पर मनीष तिवारी, सीताराम येचुरी, प्रकाश करात, सोनिया गाँधी आदि का “सड़े हुए कद्दू” जैसा मुँह देखूं… और उनके जले-फ़ुँके हुए बयान सुनूं…

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>कायर मनुष्य,कायर समाज व कायर राष्ट्र का कोई सहायक नहीं होता

>समझोतों से नहीं कभी भी युद्ध टला करते हैं।
कायर जन ही इनसे खुद को स्वयं छला करते हैं।।

स्वतंत्रता -काल से आज तक की कालावधि में पकिस्तान और भारत के मध्य लगभग १७५ बार से भी अधिक वार्तालापों के दौर चल चुके हैं। इस लम्बी वार्ताओं की कड़ी में उन सभी वार्तालापों के क्या परीणाम रहे,इसकी गहराई में जाने की अब कोई आवश्यकता नहीं रही है। इसको संछेप में सीधे सीधे ही यही कहा जा सकता है कि पकिस्तान से भारत लगभग १७५ बार ही कूटनीतिक युद्ध में पराजित हो चुका है। १९४८ में पाकिस्तान के सैनिकों का कबाइलियों के वेश में आक्रमण रहा हो या १९६५ का युद्ध हो अथवा १९७१ या फिर १९९९ में कारगिल का युद्ध हो, भारत समर-छेत्र सैनिक विजय के प्राप्त करने के बावजूद भी बार बार हारा है। इन युद्दों में प्राप्त सैनिक विजय के लिए भारत का शासक वर्ग यदि अपनी पीठ थपथपाता है तो वह राष्ट्र को यह बतलाने का भी साहस करे कि विजय प्राप्त करने के उपरांत भी पाकिस्तान के किस भू-भाग को उसने भारत के अधिकृत किया है। अथवा कोन सा लाभ या लक्सय उसकी इन विजयों द्वारा प्राप्त किया गया। जबकि पाकिस्तान बार बार पराजित होकर भी हर युद्ध के बाद भारत की अपेक्सा सदैव लाभ में ही रहा है।
भारत की कायर सत्ता एक बड़े युद्ध को टालने के लिए समय समय पर समझोतों और वार्ताओं का खेल खेलती है। जबकि शत्रु इस समय का सदुपयोग केवल अपनी सैनिक शक्ति को सुद्रढ़ करने में लगता रहता है। आजादी के समय पाकिस्तान एक अत्यंत निर्बल राष्ट्र ही था । किन्तु वार्तालापों में भारत को बार बार उलझाकर उसने आज तक जो शक्ति अर्जित कर ली है , वह आज सबके सम्मुख है। आज पाकिस्तान भारत की और आँख तरेरता है, उसकी नितांत ऊपेक्छा करता है ,बार बार धमकी देता है,यही सब आज तक के भारतीय राजनेताओं की उन सभी वार्ताओं से प्राप्त की गयी उपलब्धियां हैं। और अब फिर से एक नयी उपलब्धी प्राप्त करने की भारत सरकार की पाकितान के साथ सचिव स्तर की बात चल पडी है । भारत का जन जन इस वार्तालाप की अंतिम परिणति से परिचित है। वार्ता आरम्भ होने से पूर्व अपने आतंकवादियों से पुणे में कराये गए विस्फोटो के द्वारा पाकिस्तान ने इसकी जानकारी भारत को पहले ही दे दी है। बस अब तो केवल भारत सरकार ही इस वार्तालाप की ऊलाब्धि जान्ने के लिए उत्सुकता बची हुई है।
गत ६० वर्षों से इसी प्रकार से वार्ताओं का दोर चला आ रहा है । क्या भारत की सरकारे सचमुच इतनी भोली है कि वह केवल चर्चाओं के दोर चलाकर एक ऐसे शत्रु को नियंत्रण में लाना चाहती है,जिसके मन में कहीं गहरे तक भारत के प्रति केवल तीव्र घ्रणा ही बसी है।जिसका एक मात्र उदेश्य अपने जन्म काल से ही भारत को खंड खंड करके उसको मिटा देना या अपने अधिकार में करने का ही रहा है। केवल अपनी कायरता के कारण भारत उसके इस उद्देश्य की पूर्ती का ही एक परोक्स्त: माध्यम बनता चला आ रहा है ।
मेरा इन बातों का कहने का तात्पर्य यह भी नहीं है कि भारत को तुरंत ही पाकिस्तान पर आक्रमण कर देना चाहिए। किन्तु स्वाभिमान को बचाए रखने की सम्मति तो हर किसी भारतीय की भारत सरकार को देने की जिम्मेदारी बनती ही है।पाकिस्तान भारत का कोई छिपा शत्रु नहीं है,जिसके शत्रु भाव से कोई परिचित न हो। वह हर पल बातों का जहर उगलकर भारत के प्रति अपनी शत्रुता की घोषणा करता रहता है । तब क्या भारत को उसके प्रलाप का उत्तर इस प्रकार देना चाहिए,जिस प्रकार वह आज तक देता रहा है। अब पाकिस्तान को भारत की और से यह स्पष्ट चेतावनी मिलनी ही चाहिए कि यदि एक निश्चित समय सीमा तक यह अपने आतंकी कार्यों में सुधार नहीं करता तो फिर किसी भी सीमा तक जाने के लिए भारत की स्वतंत्रत है । इस वर्तमान वार्ता के दोर का तभी कुछ लाभ हो सकता है जब भारत पाकितान के सम्मुख आतंक समाप्त कर ने के लिए समय की एक निश्चित सीमा रेखा खीचे ।
भारत यदी इस प्रकार के चेतावनी देकर अपना दृढ रुख इस पर बनाए रखे तो विश्व बिरादरी भी उसका साथ देने के लिए विवश हो सकती है। भारत सरकार को यह समझ लेने की आवश्यकता है कि कायर मनुष्य का , कायर समाज का और कायर राष्ट्र का कोई सहायक नहीं होता । अपनी भुजाओं के बल पर विशवास करके ही इतिहास की धारा मोड़ी जा सकती है। एक अवश्यम्भावी युद्ध को टालने का प्रयास सदा कायर सत्ता ही करती है। धरती के यथार्थ कठोर तल पर पैर न जमाये रखकर जो केवल दिवा- स्वप्नों में ही झूलता है,ऐसा भयग्रस्त राष्ट्र कभी अपना भविष्य नहीं बना सकता । और अंत में ………………..
उचित काल को राष्ट्र स्वयं ही बातों में खोता जो।
अपनी ही भावी पीढी का अपराधी होता वो॥

बाबरी मस्जिद पर अंजू गुप्ता का बयान, आडवाणी की उदासी और उमा-ॠतम्भरा की बेबाकी… Babri Mosque Demolition, Advani, Anju Gupta

एक बार फ़िर से बाबरी विध्वंस का मामला “नकली-सेकुलर मीडिया” की हेडलाइन बना हुआ है। इस बार का हंगामा बरपा है 1992 में आडवाणी की निजी सुरक्षा अधिकारी रहीं अंजू गुप्ता के उस बयान की वजह से जिसमें उन्होंने कहा कि “उस दिन आडवाणी ने भड़काऊ भाषण दिया था और बाबरी ढाँचा गिरने के बाद आडवाणी बहुत खुश हुए थे…”।

अंजू गुप्ता के समक्ष अब इस बयान की गम्भीरता साबित करने का भारी दबाव आने वाला है, उसका कारण यह है कि यही अंजू गुप्ता पहले दो बार आडवाणी को “क्लीन चिट” दे चुकी हैं, पहली बार सीबीआई की पूछताछ और सीबीआई कोर्ट में, तथा दूसरी बार लिब्रहान आयोग के सामने उन्होंने आडवाणी को पूरी तरह बेकसूर और मामले से असम्बद्ध बताया था, लेकिन अंजू गुप्ता के इस नवीनतम “यू-टर्न” का औचित्य समझना थोड़ा मुश्किल जरूर है, परन्तु नामुमकिन नहीं। अपने पहले बयान में (जब मामला ताज़ा-ताज़ा था, अब तो मामला भी पुराना हो गया, कई बातें भूली जा चुकी हैं जबकि कई मुद्दों और बयानों को “सेकुलर सुविधानुसार” तोड़ा-मरोड़ा जा चुका है) अंजू गुप्ता ने कहा था कि “आडवाणी ने कारसेवकों से बार-बार गुम्बद से उतर जाने की अपील की थी…” अब बदले हुए बयान में वे कह रही हैं कि “आडवाणी ने कारसेवकों से गुम्बद से उतरने की अपील कर रहे थे ताकि, कहीं कारसेवक गुम्बद के गिरने से घायल न हो जायें…”।

बहरहाल, “डेली पायोनियर” http://dailypioneer.com/244999/Officer-blames-Advani-BJP-unfazed.html ने अंजू गुप्ता के इस ताज़ा बयान के साथ ही उनका बायो-डाटा खंगालने की भी कोशिश की है। अपनी एक हालिया पोस्ट में मैंने भी कहा था कि “पूरे नाम” लिखने की परम्परा शुरु की जाये, ताकि सम्बन्धित व्यक्ति का पूरा “व्यक्तित्व” उभरकर सामने आ सके। श्रीमती अंजू गुप्ता फ़िलहाल “रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग” (RAW) में पदस्थ हैं जबकि उनके पति “शफ़ी अहमद रिज़वी”, गृहमंत्री पी चिदम्बरम के “विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी” (OSD) हैं…। अब आपके दिमाग की बत्ती भी जल गई होगी… कि अंजू गुप्ता “रिज़वी” को कहाँ से “प्रेरणा” प्राप्त हो रही है।  क्या अब भी कुछ कहने को बाकी रह गया है? इतने समझदार तो आप लोग हैं ही, कि “खिचड़ी” सूंघकर ही पहचान सकें… (अंजू गु्प्ता रिज़वी + शफ़ी रिज़वी + पी चिदम्बरम = सेकुलर खिचड़ी… यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कि ईसाई पादरी + वीडियो टेप + NGO + तहलका = सेकुलर खिचड़ी…)

वहीं दूसरी तरफ़, आडवाणी अभी भी Politically Correct बनने (दिखने) के चक्कर में बाबरी ढाँचे के गिरने की खुशी को सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं… कहने का मतलब यह है कि तीन तरह के “कैरेक्टर” हमें देखने को मिल रहे हैं –

1) पहले हैं आडवाणी, जो अभी भी खुलेआम बाबरी विध्वंस की जिम्मेदारी नहीं ले रहे, जिन्ना की मज़ार पर जाकर मत्था भी टेक आये, जबकि बाल ठाकरे, आचार्य धर्मेन्द्र और विहिप के कई नेता इस पर सार्वजनिक खुशी जता चुके हैं। इसे कहते हैं “राजनीति”, और आडवाणी का यह मुगालता कि शायद मुसलमान कभी भाजपा को वोट दे भी दें… जबकि यह कई बार साबित हो चुका है कि चाहे किसी गधे को भी वोट देना पड़े, तब भी मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देंगे।

2) दूसरी हैं, अंजू गुप्ता “रिज़वी” जो एक हिन्दू नारी होने की वजह से अपने “संस्कारों” के चलते (शायद) अपने “पति” के कहने पर अपने दो-दो बार दिये गये बयान से पलटी खा गईं…

3) तीसरी हैं, उमा भारती और साध्वी ॠतंभरा, जो बाबरी ढाँचा गिरने पर खुशी से चिल्लाईं और गले मिलीं। उमा भारती ने खुलेआम कहा कि जो हुआ अच्छा हुआ, और यूपीए सरकार में दम है तो उन्हें गिरफ़्तार करें। यह उमा भारती ही थीं जिन्होंने हुबली में तिरंगा फ़हराया और मुख्यमंत्री पद से हाथ धोया, और वह भी उमा भारती ही हैं जिन्हें भाजपा से बेइज्जत होकर निकलना पड़ा था…

तीनों “कैरेक्टरों” का विश्लेषण करने से तीन बातें उभरती हैं –

1) भाजपा भी “Politically Correct” होने के चक्कर में अपना “हिन्दू वोट” गँवा रही है, क्योंकि गडकरी का ताज़ा बयान “आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता…” इसी “पोलिटिकल करेक्टनेस” की ओर इशारा कर रहा है…

2) “लव जेहाद” एक वास्तविकता है, अतः जहाँ तक सम्भव हो (और जैसे ही पता चले) व्यक्ति का पूरा नाम लिखें। (जैसे तीस्ता जावेद सीतलवाड…, मुझे भी “अंजू गुप्ता रिज़वी” का पूरा नाम आज ही पता चला, इसलिये डेली पायोनियर को धन्यवाद)।

3) हिन्दू साध्वियाँ (उमा, ॠतम्भरा और प्रज्ञा) जैसी भी हों, कम से कम राजनेताओं की तरह ढोंगी और पाखण्डी तो नहीं हैं। (बगैर आरक्षण के आगे बढ़ी हुई महिला शक्ति को सलाम… )

लगता है समय आ गया है, कि कांग्रेस की “बी” टीम तथा “बेशर्म Political Correctness” की ओर बढ़ रही, “भाजपा” का कोई अन्य सशक्त विकल्प खोजना शुरु करना पड़ेगा…क्योंकि दो-दो लोकसभा चुनावों में हार का मुँह देखने के बावजूद, न तो भाजपा ने बरेली दंगा मुद्दे पर कोई आंदोलन-घेराव-प्रदर्शन किया, न ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुसलमानों को 4% आरक्षण दिये जाने का पुरजोर ढंग से विरोध किया है… जब तक भाजपा इस दुविधा में फ़ँसी रहेगी, ऐसे ही पिटती रहेगी…, और फ़िर अंजू गुप्ता रिज़वी हों या कम्युनिस्ट बैकग्राउण्ड वाले सुधीन्द्र कुलकर्णी हों… हिन्दुत्व को “धक्का-अडंगा मारने वाले” भी तो सैकड़ों भरे पड़े हैं…

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>एक सवाल है मन में ….. आप लोगों से पूछना चाहता हूँ

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एक सवाल है मन में ..… आप लोगों से पूछना चाहता हूँ ……. आखिर ऐसा क्या होता है कि अचानक से कभी बाघ की चिंता करने लग जाते हैं तो कभी गौरैया की फ़िर कुछ दिनों तक चिर शांति ………… मुझे याद है जब मैं १० वीं में पढता था तब जनसँख्या नियंत्रण को लेकर अख़बारों से लेकर विभिन्न संगोष्ठियों में खूब चिंता प्रकट की जा रही थी . अपने विद्यालय के एक सेमिनार में मैंने भी एक जोरदार परचा पढ़ा था . उन दिनों दिन-रात मेरे किशोर मन में देश की बढ़ती आबादी की चिंता थी पर धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया . क्यों ? शयद इसलिए कि अब संचार माध्यमों ( अख़बारों-टीवी,संगोष्ठियों आदि) में इस बात की चर्चा नहीं के बराबर होती है . आजकल दूसरे मुद्दे कलम घिसी के लिए हावी हो गये हैं जबकि जनसँख्या विस्फोट की समस्या वहीँ की वहीँ है . हमरा ध्यान तो तब जाता है जब किसी सरकारी या गैर सरकारी रपट में सनसनीखेज खुलासा होता है . जैसा कि बाघ वाले मामले में एक विज्ञापन क्या आया हम सभी लिख-लिख कर बाघ बचाने की कवायद में जुट गये . मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि लिखने से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है लेकिन एक शंका है कि आखिर कौन से कारक हमें अचानक से ऐसा करने पर मजबूर करते हैं ? किसी भी मुहीम को जोर-शोर से उठाने वाले लोग कुछ समय में भूल क्यों जाते हैं ? 

 कृपया अपनी बात जरुर रखें ……… 

>विश्व रंगमंच पर देखिये देश में चल रही सबसे बड़ी नाटकबाजी

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आज विश्व रंगमंच दिवस है, ऐसा हमें हमारी उरई इप्टा के कुछ साथियों ने बताया। रंगमंच का नाम आते ही सामने आता है एक बड़ा सा मंच और उस पर कुछ सार्थक प्रस्तुतियाँ करते कलाकार। इधर पिछले कुछ सालों से हमने नाटकों के प्रति लोगों में रुझान कम से कमतर की स्थिति तक देखा है।

(चित्र साभार गूगल से)

नाटकों का स्थान कभी फिल्मों (सिनेमा हॉल में) ने लिया और अब फिल्मों का स्थान छोटे से पर्दे ने ले लिया है। इसके बाद भी नाटकों की अहमियत कम नहीं हुई। जब भी किसी बड़े फिल्मी कलाकार का साक्षात्कार देखा अथवा सुना है तो उसके मन में नाटकों के प्रति, थियेटर के प्रति एक अजब सा मोह देखा है।

कहना न होगा कि देश की आधुनिकतम पीढ़ी ने प्रत्येक स्वरूप का लघु संस्काण प्रस्तुत कर उस स्वरूप को विखण्डित ही किया है। इस तरह से तुरत-फुरत मजा लेने की प्रवृत्ति ने आज की युवा पीढ़ी को कुछ करने के जज्बे से बहुत ही दूर कर दिया है।

नाटक ही क्यों खेल में, पढ़ाई में, कैरियर में, जीवन में, कुल मिला कर कहा जाये तो प्रत्येक क्षेत्र में लघुतम संस्करण की माँग उठने लगी है। हमारा युवा वर्ग इसे बहुत ही सहजता से स्वीकार भी कर रहा है। पढ़ाई के लिए किसी भी तरह से अच्छे नम्बर आने की लालसा, किसी भी तरह नौकरी पाना और फिर किसी भी तरह से अधिक से अधिक धन प्राप्ति की लालसा, प्यार में भी तुरत फुरत सब कुछ पाने की चाह में आज लघु संस्करण आसानी से देखने को मिल रहे हैं।

इस लघुतम को पाने की बीमारी के अलावा जब हमें रोजमर्रा के कार्यों में ही अच्छे से अच्छे नाटक देखने को मिल जाते हों तो कौन है जो थियेटरों की ओर जाना चाहेगा? घर से ही शुरुआत कीजिए, सड़क पर निकल जाइये, किसी भी कार्यालय पहुँच जाइये, किसी भी स्थान पहुँच जाइये सब जगह किसी न किसी रूप में नाटक होता मिल ही जायेगा।

इसके बाद भी आज के दिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि सबसे बड़ा नाटक तो आज राजनीतिक क्षेत्र में लगे लोग कर रहे हैं। आये दिन बिना बात में जनता को फँसा लेना और फिर उस पर बेमतलब की बहस करवाकर अपना उल्लू सीधा करना किसी भी अच्छे से अच्छे नाटक से कम नहीं।

इसके अलावा एक बहुत ही बड़ा और गम्भीर किस्म का नाटक इस समय देश में खेला जा रहा है और वह है कसाब का नाटक। कसाब ने अपना डायलॉग बोल दिया है, वह अपना रोल निभा चुका है, अब देश की सरकार की बारी है। सब मिल कर सिद्ध करो कि वह आतंकवादी हमले में था। सबके सामने, सबको सब कुछ दिखाने के बाद भी हमें सिद्ध करना पड़ रहा है कि कसाब आतंकवादी है तो इससे बड़ा नाटक और कौन सा होगा? विडम्बना देखिये कि विश्व रंगमंच दिवस पर इससे बड़ा वैश्विक नाटक और कौन सा कहा जायेगा, जिसे केवल हमारे देश ने नहीं बल्कि मीडिया के द्वारा सारे संसार ने देखा था।

>यहाँ देशद्रोही ही मंत्री व .संसद ………बनते है.

>सप्रग की पिछली सरकार में पेट्रोलियम मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर का नाम तो आप सभी को याद होगा। इस सरकार में भी नेताजी मैडम के दूत बनकर जगह जगह सोनिया गान करते घूम रहे है।
मणिशंकर का चरित्र एक ऐसे राष्ट्रद्रोही का रहा है,जिसको कभी छमा नही किया जा सकता।
१९६२ में जिस समय चीन ने भारत पर आक्रमण किया था,उस समय ये नेता लन्दन में पढ़ाई कर रहा था। पूरा का पूरा देश इस आक्रमण से शोकग्रस्त था। गाँव गाँव व नगर नगर से भारतीय सैनिको के लिए धन एकत्र किया जा रहा था।माता व बहनों ने अपने हाथों के जेवर व मंगलसूत्र तक भारतीय सेना के लिए दे दिए थे। सारा देश रो रहा था। परंतु लन्दन में ये देशद्रोही कुछ और ही खेल खेल रहा था। अय्यर व इसके साथी भी सैनिको के लिए चंदा एकत्र कर रहे थे किंतु वो जो धन एकत्र कर रहा था,वो भारतीय सैनिको के लिए नही बल्कि लाल सेना (चीनी सेना) के लिए धन एकत्र कर रहा था।
उसकी इस बात का नेहरू को भी पता था।क्यो कि जिस समय अय्यर का चयन इंडियन फ़ौरन सर्विस में हुआ था, तो देश की सबसे बड़ी जासूसी संस्था ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक पत्र लिखा,तथा उपरोक्त बात का हवाला देते हुए उसके चयन पर रोक लगाने को कहा। परन्तु देश के इस महान? नेता ने भी अय्यर का पक्ष लेते हुए उसके चयन को मान्यता दे दी।
यही प्रक्रिया सप्रग ने अपने प्रथम कार्यकाल में अय्यर को पेट्रोलियम मंत्री बनाकर दोहराई। सोनिया स्तुति करने का अय्यर को इस सरकार ने अरे नहीं माननीय राष्ट्रपति जी (सरकार गलत नहीं लिखा क्योंकि राष्ट्रपति जी भी तो सरकारी है) ने भी प्रसाद दे दिया है बात ये है कि राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह कुछ ऐसे लोगों को राजसभा में मनोनीत कर सकता है जिन्होंने कला ,संगीत जैसे क्षेत्रों में विशेष योगदान दिया हो। जिस रास्ते से लता मंगेशकर, हेमा मालिनी जैसे कलाकार राजसभा में पहुंचे उसी रास्ते से अय्यर को राजसभा में भेजने के लिए राष्ट्रपति ने कैसे चुना । न तो अय्यर कोई कलाकार हैं और न ही समाज के लिए कोई ऐसा कार्य किया है जिससे उसे राजसभा के लिए चुना जाय। हाँ अय्यर मैडम भक्त जरूर है,और मैडम कि चमचा गिरी व चरण वंदना का ही प्रसाद के रूप में उसे राजसभा में भेजा जा रहा है।
१९६२ में जो देशद्रोही कार्य अय्यर ने किया था। यही कार्य किसी और देश का व्यक्ति करता तो निश्चय ही उस देश का क़ानून उसे कड़ी से कड़ी सजा देता। परंतु एक देशद्रोही भारत में ही मंत्री व संसद ……………………………….. बन सकता है। अय्यर इसका जीता जगता सबूत है।

जावेद अख्तर और मणिशंकर अय्यर को राज्यसभा सीट – संयोग है, बेशर्मी है, या साजिश है?…… Javed Akhtar, Manishankar Aiyyar, Modi Bashing Reward

हाल ही में देश की “अब तक की सबसे मजबूत और होनहार राष्ट्रपति” श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने राज्यसभा के लिये पाँच सदस्यों का नामांकन किया है। जिसमें से दो प्रमुख व्यक्ति हैं मणिशंकर अय्यर और गीतकार जावेद अख्तर…। यह राष्ट्रपति का विवेकाधिकार(??) और विशेषाधिकार है कि वह अपने कोटे से किन पाँच ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों को राज्यसभा के लिये नामांकित करे। बाकी के तीन नाम तो ध्यान आकर्षित नहीं करते क्योंकि वे जायज़ हैं उनकी उपलब्धियाँ भी चमकदार हैं, लेकिन इन दोनों महानुभावों के नाम चौंकाने वाले और निंदनीय हैं। हालांकि अब पद्म पुरस्कारों अथवा राज्यसभा सीट की न तो कोई इज्जत रह गई है, न ही कोई प्रतिष्ठा, यहाँ पर “अंधा बाँटे रेवड़ी” वाली मिसाल भी लागू नहीं की जा सकती, क्योंकि रेवड़ी बाँटने वाले अंधे-बहरे नहीं हैं, बल्कि बेहद शातिर हैं।

पहले बात करेंगे अय्यर साहब की…, जैसा कि सभी जानते हैं अय्यर साहब खुलेआम वीर सावरकर को गरिया चुके हैं… वैसे तो ये साहब बड़े विद्वान कहलाते हैं, लेकिन अंडमान निकोबार की सेल्यूलर जेल में भी इन्हें सावरकर की उपस्थिति सहन नहीं होती। ये सज्जन भी पिछले लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में अपनी सीट पर बुरी तरह लतियाये गये और चुनाव हारे। चलो हार गये तो कोई बात नहीं, अर्जुन सिंह भी तो तीन-तीन चुनाव हारने के बावजूद सत्ता के गलियारे में अतिक्रमण किये बैठे ही रहे, अय्यर साहब भी उसी तरह राज्यसभा में घुस जाते। लेकिन मणिशंकर अय्यर साहब के इस ताज़ा मामले में पेंच यह है कि इन्हें राष्ट्रपति ने “मनोनीत” किया है। असल में राष्ट्रपति अपने विशेषाधिकार के तहत पाँच ऐसे लोगों को मनोनीत कर सकता है जिन्होंने समाज, कला, खेल, संगीत आदि क्षेत्रों में विशेष उल्लेखनीय योगदान दिया हो, जावेद अख्तर साहब को तो गीतकार होने के नाते जगह मिल गई, बाकी के तीन लोग भी अपने-अपने क्षेत्र के जाने-माने लोग हैं, लेकिन जिस रास्ते से लता मंगेशकर, दिलीप कुमार, जावेद अख्तर, या अन्य कोई कलाकार राज्यसभा में प्रवेश करते हैं, उस मनोनीत हस्तियों वाले कोटे में घुसपैठ करने के लिये अय्यर साहब की “क्वालिफ़िकेशन” क्या है? जी हाँ सही समझे आप, वह क्वालिफ़िकेशन है, हिन्दुत्व को जमकर गरियाना, सावरकर को भला-बुरा कहना और इतालवी मम्मी की चमचागिरी करना…। यहाँ देखें

लेख की सबसे पहली लाइन में मैंने श्रीमति प्रतिभा पाटिल की शान में कसीदे काढ़े हैं, उन्हीं “विशिष्ट गुणों” का पालन करते हुए जो लिस्ट उन्हें सोनिया मैडम ने थमाई थी, वही पाँच नाम उन्होंने नामांकित कर दिये, एक बार भी पलटकर नहीं पूछा कि “जब मणिशंकर अय्यर को उनके मतदाता नकार चुके हैं और तमिलनाडु में द्रमुक ने कांग्रेस को अपने हिस्से की एक राज्यसभा सीट देने का वादा भी किया है, तब कलाकारों, खिलाड़ियों, समाजसेवकों, संगीतज्ञों के लिये आरक्षित इन 5 सीटों में घुसपैठ करने की क्या जरूरत आन पड़ी थी?” लेकिन मैडम से कौन सवाल-जवाब कर सकता है (अपने आप को देश के बड़े-बड़े पत्रकारों में शुमार करवाने वाले स्टार पत्रकारों, सबसे तेज़ चैनल चलाने वालों आदि में से किसी की भी औकात नहीं है कि मैडम का एक “सही ढंग का” इंटरव्यू ले सकें), तो इस तरह अय्यर साहब को सरकार ने बड़ी बेशर्मी से “पुनर्वास पैकेज” दे दिया।

अब हम आते हैं “संयोगों की लम्बी सीरीज” पर… जावेद अख्तर साहब एक बेहतरीन गीतकार हैं और सलीम-जावेद की जोड़ी ने कई हिट फ़िल्में भी दी हैं, लेकिन जिस दिन से जावेद साहब ने गुजरात सरकार के खिलाफ़ सोहराबुद्दीन और इशरत जहाँ समेत बाकी के सभी एनकाउंटरों की जाँच की माँग को लेकर 2007 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, उसी वर्ष उन्हें साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिये पद्मभूषण मिला, और अब इन्हें राज्यसभा की सीट से भी नवाज़ा गया है। “सेकुलर्स” कहेंगे कि यह तो संयोग है, लेकिन जावेद अख्तर जैसा मामला कोई अकेला मामला नहीं है। जिस वर्ष जावेद अख्तर को पद्मभूषण दिया गया उसी साल तीस्ता जावेद सीतलवाड को भी “न्याय हेतु संघर्ष” के लिये पद्मश्री बाँटा गया। तीस्ता के NGO “सिटीज़न्स फ़ॉर पीस” का गठन 2002 के गुजरात दंगों के बाद किया गया था (और इस संस्था ने सिर्फ़ 5 साल में ही इतना बड़ा काम कर दिखाया कि तीस्ता को पद्मश्री दी जाये)… यह और बात है कि विशेष अदालत ने यह पाया कि तीस्ता जावेद ने जो शपथ-पत्र (Affidavit) लगाये थे वह फ़र्जी थे, और एक जैसी भाषा में, एक ही जगह बैठकर, एक ही व्यक्ति द्वारा भरे गये थे, लेकिन पद्मश्री फ़िर भी मिली, क्योंकि तीस्ता ने “अपना काम” बखूबी निभाया था। क्या यह भी संयोग है?

ऐसी ही एक और हस्ती हैं प्रसिद्ध नृत्यांगना मल्लिका साराभाई, जो कि अपने नृत्यकला के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी विरोध के लिये भी जानी जाती हैं, इन मोहतरमा को भी पद्मभूषण “बाँटा” गया, सन् 2009 में इससे उत्साहित होकर और मुगालता पालकर इन्होंने लोकसभा में आडवाणी के खिलाफ़ चुनाव लड़ा, बुरी तरह हारीं, नरेन्द्र मोदी दोबारा चुनाव जीते, लेकिन इनकी ऐंठ अब तक नहीं गई। मल्लिका मैडम को पहले नृत्यकला के लिये पद्मश्री मिल चुका था, लेकिन अब मोदी-भाजपा विरोध के लिये पद्मभूषण भी मिल गया। क्या यह भी संयोग है?

एक और सज्जन हैं न्यायमूर्ति वीएन खरे, यह साहब भारत के उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश हैं, और गोधरा काण्ड के बाद हुए दंगों को लेकर माननीय जज साहब ने कहा था कि “गुजरात सरकार राजधर्म निभाने में पूरी तरह नाकाम रही है”, अपने रिटायरमेण्ट के बाद एक इंटरव्यू में खरे साहब ने कहा कि “गुजरात में स्टेट मशीनरी पूरी तरह विफ़ल है”, इसी के बाद तीस्ता जावेद सीतलवाड ने कई याचिकाएं दायर करवाईं। खरे साहब के कार्यकाल में ही बेस्ट बेकरी काण्ड के 21 अभियुक्तों के खिलाफ़ दोबारा केस खोला गया… अन्ततः जस्टिस वीएन खरे साहब को सामाजिक क्षेत्र में विशेष योगदान(?) के लिये 2006 में भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान “पद्मविभूषण” मिल गया…(इसके बाद सिर्फ़ भारत रत्न बचा है)। शायद ये भी संयोग ही होगा…

(कुछ ऐसा ही भीषण संयोग हाल ही में केरल में देखने में आया था, इस लिंक पर देखें)
http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/02/blog-post_21.html

कृपया अभी से नोट कर लें, अगले साल के पद्म पुरस्कारों की लिस्ट में “स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT)” के प्रमुख श्री राघवन साहब का नाम शामिल होगा। ऐसे “विशिष्ट संयोग” यूपीए सरकार के कार्यकाल में जब-तब होते ही रहे हैं… जैसे राजदीप सरदेसाई, बुर्का दत्त… सॉरी बरखा दत्त, तहलका के तरुण तेजपाल… लिस्ट लम्बी है… लेकिन जिस-जिस ने नरेन्द्र मोदी-भाजपा-संघ-हिन्दुत्व को गरियाया, परेशान किया, झूठ बोल-बोलकर, गला फ़ाड़-फ़ाड़कर अपने-अपने चैनलों, अखबारों, संस्थाओं, फ़र्जी NGOs आदि के द्वारा यह “पावन-पुनीत” कार्य किया, उसे मैडम ने कुछ न कुछ “ईनाम-इकराम” अवश्य दिया। जब से यूपीए सत्ता में आया है, तभी से यह परम्परा स्थापित करने की कोशिश की जा रही है कि नरेन्द्र मोदी और हिन्दुत्व पर कीचड़ उछालने में जो लोग सबसे अगुआ रहेंगे, उन्हें सरकार की ओर से या तो किसी पद्म पुरस्कार से नवाज़ा जायेगा, या फ़िर राज्यसभा सीट देकर पुरस्कृत किया जायेगा, यदि कोई फ़र्जी NGOs चलाते हों तो भारी अनुदान, चैनल चलाते हों तो विज्ञापन, अखबार चलाते हों तो फ़ोकट की ज़मीन और कागज़ का कोटा इत्यादि दिया जायेगा… और यह भी संयोगवश ही होगा।

हाल ही में एक और नया शिगूफ़ा आया है… “प्रशान्त” नामक NGO चलाने वाले फ़ादर फ़्रेडेरिक प्रकाश (एक और ईसाई) ने दावा किया है कि गुजरात दंगों में नरेन्द्र मोदी के शामिल होने के पक्के सबूत के रूप में वह जल्दी ही कुछ चुनिंदा “वीडियो क्लिपिंग” जारी करेंगे, इन वीडियो टेप की शूटिंग “तहलका” ने की है…।

अब कोई मूर्ख या नकली सेकुलर ही होगा, जो कि एक ईसाई फ़ादर, NGO, वीडियो टेपों के इतिहास (नित्यानन्द स्वामी, संजय जोशी जैसे) तथा तहलका, के नापाक गठजोड़ को समझ ना सके… (खबर इधर है)
http://news.rediff.com/report/2010/mar/22/ngo-claims-its-godhra-footage-proves-modis-role.htm

जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने 21 मार्च को SIT के सामने मोदी के पेश होने की झूठी कहानी गढ़ी और नरेन्द्र मोदी द्वारा पत्र लिखकर दिये गये स्पष्टीकरण तक को प्रमुखता नहीं दी, इससे इनका चेहरा पिछली कई बार की तरह इस बार भी बेनकाब हो गया है। पिछले 8-10 दिनों से लगातार लगभग सभी चैनलों-अखबारों के कुछ “भाण्डनुमा”, जबकि कुछ “बोदे और भोंदू किस्म” के पत्रकारों द्वारा नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ लगातार विषवमन किया गया है, लेकिन बरेली के दंगों के बारे में आपको किसी चैनल या अखबार में कवरेज नहीं मिलेगा। नेहरु डायनेस्टी टीवी जब तक दिन में एक बार गुजरात और मोदी को जी भरकर कोस न ले, वहाँ काम करने वालों का खाना नहीं पचता, लेकिन जीटीवी, आज तक, NDTV या कोई अन्य चैनल हो, किसी ने बरेली जाना तो दूर, उसका कवरेज देना-दिखाना भी उचित नहीं समझा, मौलाना तौकीर रज़ा खान का नाम लेना तो बहुत दूर की बात है।

तो भाईयों-बहनों, आईपीएल की तरह एक बड़ा “ऑफ़र” खुला हुआ है – नरेन्द्र मोदी-भाजपा-संघ (या हिन्दुत्व) को गरियाओ तथा पद्म-पुरस्कार या राज्यसभा सीट पाओ…। जो लोग इस ऑफ़र में “इंटरेस्टेड” नहीं हैं, वे यह सोचें कि भारत के “बीमार”, चाटुकार और भ्रष्ट मीडिया का क्या और कैसा इलाज किया जाये? तथा कांग्रेस नामक “कैंसर” की दवा क्या हो?

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>शहीदे आज़म भगतसिंह की याद में -एक इंकलाब की भारी ज़रूरत है।

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फिर वह काला दिन आ गया है जिस दिन हिन्दुस्तानी आज़ादी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा के प्रमुख प्रतिनिधि योद्धा शहीदेआज़म भगतसिंह को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के क्रूर पंजों ने हमसे छीन लिया था। यूँ तो ब्रिटिश शोषण-शासन के शिकार हिन्दुस्तान के हज़ारों नौजवान देशप्रेमी हुए थे, परन्तु उन सबमें से भगतसिंह ही ऐसे नौजवान रहे जो आज इतने साल बाद भी अपनी शहादत के लिए शिद्दत से याद किए जाते हैं, और बहुत साफ है कि इसका प्रमुख कारण वह विचारधारा, वह आदर्श है जिसको अपने मजबूत नैतिकता-बोध की वजह से एक मात्र सही विचारधारा मानने हुए बेहद कच्ची उम्र में ही भगत सिंह ने स्वाभाविक रूप से अपना लिया था, जबकि वे जानते थे कि उस वक्त की खास राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में वह विचारधारा अपनाने का मतलब सर पर कफन बांधे चलना और अपने प्राण तक गँवाना था।
उस वक्त अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक रूप से पूंजीवादी, साम्राज्यवादी देशों की स्थिति बहुत ही खराब थी। पूरा पूँजीवादी साम्राज्यवादी तबका सोवियत रूस की सर्वहारा क्रांति के असर से आतंकित था। कई छोटे मोटे देशों में धड़ाधड़ क्रांतियाँ हो रही थीं। एक साम्राज्यवादी ताकत होने के कारण ब्रिटिश सरकार की स्थिति भी इसी वजह से उन दिनों बहुत नाज़ुक हो गई थी। इस स्थिति में 18-20 साल की उम्र के नौजवान भगतसिंह, शोषित पीड़ित जनता की मुक्ति के एक मात्र विज्ञान ‘मार्क्सवाद’ को अपना आदर्श मानकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को सर्वहारा क्रांति की दिशा देना चाहते थे। उनका विश्वास था कि ‘‘महान आदर्श के मूर्त रूप होने का स्वप्न संजोने वाले सभी तरुणों को जेल में डालकर भी क्रांति के बढ़ते हुए कदमों को नहीं रोका जा सकता।’’(भगतसिंह)
दूसरे देशों की क्रांतियों से उनका यह विश्वास और भी ज़्यादा दृढ हुआ था -‘‘ फ्रांस के क्रूरतम कानून और बड़ी बड़ी जेलें भी क्रांतिकारी आन्दोलन को दबा नहीं सकीं। मृत्युदंड के वीभत्स तरीके और साइबेरिया की खदानें भी रूसी क्रांति को रोक नहीं सकीं, तब क्या ये अध्यादेश और सुरक्षा अधिनियम भारत में आज़ादी की लौ बुझा पाएंगे?’’(भगतसिंह)
शोषक वर्ग के प्रति उनका सोचना एकदम स्पष्ट था। वे यह जानते थे कि हिन्दुस्तान से ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकना ही हिन्दुस्तानी आम आदमी की मुक्ति के लिए काफी नहीं है। उन्होंने कहा था कि -‘‘भारतीय मुक्ति संग्राम तब तक चलता रहेगा जब तक मुट्ठी भर शोषक लोग अपने फायदे के लिए आम जनता के श्रम को शोषण करते रहेंगे। शोषक चाहे ब्रिटिश हों या भारतीय।’’(भगतसिंह)। मतलब वे यह अच्छी तरह जानते थे कि भारत में आम जनता के शोषण में भारतीय पूंजीपति वर्ग भी शामिल है, और गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस जिस तरह की आज़ादी चाहती थी वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद और हिन्दुस्तानी पूँजीपति वर्ग के साथ महज़ एक समझौता साबित होगी, और उससे हिन्दुस्तान की आम जनता, शोषित पीड़ित मजदूर वर्ग की मुक्ति कभी भी नहीं हो सकेगी।
यह बात आज सच साबित हो रही है । आज के हिन्दुस्तान की सामाजिक परिस्थिति देखने से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 1 अरब से भी ज़्यादा आबादी में 95 प्रतिशत जनता बुरी तरह से 5 प्रतिशत शोषकों की शोषण की चक्की में पिस रहे हैं। चाहे कोई पढ़ा लिखा हो चाहे अनपढ़ औद्योगिक मजदूर हो चाहे सड़क पर देहाड़ी करने वाला मज़दूर, चाहे वह कृषि मज़दूर हो या छोटा किसान, चाहे वह सरकारी कर्मचारी हो या गैरसरकारी, स्त्री हो, पुरुष हो, छात्र हो, नौजवान हो या बच्चा, यहाँ तक कि किसी माँ के पेट में पलता हुआ अपरिपक्व भ्रूण…….. इस हिन्दुस्तान के अन्दर हर एक व्यक्ति बुरी तरह से पूँजीवादी शोषण का शिकार है। हर एक के एकदम बुनियादी अधिकारों के ऊपर शोषक वर्ग ने नाना तरीके से आक्रमण कर उसे वंचित कर रखा हुआ है। जहाँ दिन पर दिन गरीबी की रेखा के नीचे जनता का प्रतिशत लगातार बढ़ता ही जा रहा है, बेरोज़गारी का प्रतिशत लगातार बढ़ता ही जा रहा है, महँगाई बढ़ती ही जा रही है। सभी को शिक्षा की कोई व्यवस्था पहले ही नहीं थी, अब शिक्षा के निजीकरण के ज़रिए आम जनता के शिक्षा के अधिकार को संकुचित कर दिया जा रहा है। गरीबों के लिए चिकित्सा की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं, जहाँ विश्व भर में साइंस और टेक्नालॉजी उन्नत से उन्नत होती चली जा रही है, हिन्दुस्तान में मामूली सी बीमारी से आदमी मर जाता है। भीषण कुपोषण जिसके चलते जन्म दर कम होती चली जा रही है, मृत्युदर बढ़ती चली जा रही है।
लगातार लिए जा रहे कर्ज़ों का बोझ जनता के कंधों पर अनिवार्य जुए की तरह लदा हुआ है। बाहर से पैसा आता है विकास योजनाओं के लिए और तिजोरियाँ भरती चली जाती है हिन्दुस्तानी पूँजीपति वर्ग की। इस बात से आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जिन टाटा-बिड़ला की संपति आज़ादी के पहले मात्र कुछ करोड़ थी और अम्बानी जैसे पूँजीपति परिदृष्य में ही नहीं थे वहाँ आज कोई चार-पाँच सौ घराने देश की अकूत सम्पदा का उपभोग कर रहे हैं। जिस पूँजी को देश के औद्योगिक विकास में लगना चाहिए, जिस पूँजी को देश के कृषि के आधुनिकीकरण में लगना चाहिए, जिस पूँजी को देश के भीतर फिजूल नष्ट हो रही श्रम शक्ति के उपयोग और आम जनता के रोज़गार की व्यवस्था के लिए लगना चाहिए, वह मात्र कुछ घरानों की तिजोरी में कैद पड़ी हुई है, बल्कि भारतीय आम जनता का पर्याप्त शोषण करने के बाद अब वह देश की सीमाएँ लाँधकर दूसरे देशों की जनता के श्रम का शोषण करने भी पहुँच गई है। मतलब जो काम ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने यहाँ भारत में आकर किया, वही भारतीय पूँजीपति भी कर रहे हैं, यानी भारतीय पूँजीपति वर्ग भी साम्राज्यवाद का चरित्र अख्तियार कर चुका है……….।
सम्पूर्ण देश में नौकरशाही, हाथी के रूप में पाल छोड़ी गई है जो कि हिंसक एवं आदमखोर हो चुकी है। जाने कितने सारे आर्थिक घोटाले देश की जनता की कीमत पर खुले आम हो रहे हैं। लगातार नये नये टेक्सों को जबरदस्ती जनता के ऊपर लादकर दिन पर दिन उसकी कमर तोड़ी जा रही है। वहीं दूसरी ओर सरकारें दिन पर दिन नए नए कानून अध्यादेश लागू कर देश की आम जनता की बुनियादी अधिकारों को भी छीने ले रही है, जिसमें से हर एक अधिकार मेहनतकश जनता ने काफी संघर्ष के बाद हासिल किया है।
देश भर में साम्प्रदायिक उन्माद की लहर व्याप्त है। जातीयता, प्रांतीयता, भाषा के झगड़े आदि आम बात हो गए हैं। साम्प्रदायिक संगठन हज़ारों की तादात में युवकों को पथभ्रष्ट कर रहे हैं। और यह सब कुछ हो रहा है महज वोटों की राजनीति के चलते जिस राजनीति का काम है कि पूँजीपतियों के इस या उस खेमें के स्वार्थ की रक्षा करना, आम जनता के शोषण के लिए इस या उस घराने के लिए यथा सम्भव रास्ते खोलना।
क्या इसी हिन्दुस्तान का चित्र आँखों में लिए हुए भगतसिंह फाँसी पर चढे थे? क्या उनकी कल्पना का हिन्दुस्तान ऐसा ही था? नहीं, बात ऐसी नहीं, भगतसिंह तो बहुत दूर की बात, हिन्दुस्तानी आज़ादी आन्दोलन में अपनी जान की कुरबानी देने वाले किसी भी क्रांतिकारी का सपना हरगिज़ ऐसा नहीं रहा होगा। बल्कि गाँधी जी के नेतृत्व में जो लोग थे उन्होंने भी कभी भारतीय समाज का यह घिनौना सपना कभी नहीं देखा होगा। भगतसिंह का सपना था-‘‘अन्त में समाज की एक ऐसी व्यवस्था जिसमें किसी प्रकार के हड़कम्प का भय ना हो, और जिसमें मजदूर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए, और उसके फलस्वरूप विश्व संघ पूँजीवाद के बंधनों, दुखों तथा युद्धों की मुसीबतों से मानवता का उद्धार कर सकें।’’(भगतसिंह)। उनका सपना इस उद्धरण में झलकता है कि -‘‘ क्रांति, पूँजीवाद और वर्गभेदों तथा विशेष सुविधाओं की मौत की घंटी बजा देगी। आज विदेशी और भारतीय शोषण के क्रूर जुए के नीचे कराहते पसीना बहाते तथा भूखों मरते हुए करोड़ों लोगों के लिए वह हर्ष और सम्पन्नता लाएगी। वह देश को उसके पैरों पर खड़ा कर देगी। वह एक नई राज्य व्यवस्था को जन्म देगी। सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मज़दूर वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित कर देगी और समाज की जोकों को राजनीतिक शक्ति के आसन से सदा के लिए च्युत कर देगी।’’(भगतसिंह)
ये शब्द हैं उस 23 साल के नौजवान के, कितने शक्तिशाली, कितने वज़नदार कितने साफ साफ……… और आज अपने आप को मार्क्सवादी कहने वाली, तथाकथित नामधारी कम्युनिस्ट पार्टियाँ संसद के अन्दर बैठकर जनता के हितों को ताक पर रख वोटों की राजनीति कीचड़ में लिप्त होकर सौदेबाज़ी में मशगूल हैं। इतना ही नहीं आज ये सभी वामपंथी पार्टियाँ खुलेआम पूँजीपति वर्ग की दलाली पर उतर आई हैं।
बहरहाल, फांसी से पहले भगतसिंह ने कहा था-‘‘ मेरी शहादत हिन्दुस्तानी नौजवानों के भीतर आज़ादी की लौ जलाएगी……….।’’(भगतसिंह) आज के नौजवानों को देखकर लगता है कि कभी इन लोगों ने स्वतंत्रता आन्दोलन के इन महान नौजवानों खुदीराम, भगतसिंह, सुभाष बोस, इनसे कुछ भी सीखने का ज़रा भी प्रयास किया है ? जिस देश के ये ओजस्वी नौजवान कभी पूरी दुनिया में हिन्दुस्तानी युवा वर्ग के प्रतीक हुआ करते थे, आज उस हिन्दुस्तान के नौजवान वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों, शोषण शासन के दुष्चक्र से बिल्कुल बेखबर घोर गैर जिम्मेदाराना तरीके से जीवन यापन किये चले जा रहे हैं। समाज के दुख दर्दों से उन्हें कुछ लेना देना नहीं , महान आदर्शो से उन्हें कोई मतलब नहीं। कुछ घोर असामाजिक हो गए हैं, कुछ कैरियरिस्टिक हो गए हैं, कुछ कुंठित होकर आत्महत्याएँ कर रहे हैं, कुछ ड्रग्स और नशीले पदार्थों के सेवन में अपनी जिन्दगी तबाह कर हरे हैं………. न उन्हें भगतसिंह याद है ना भगतसिंह की यह बात -‘‘ जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर अपने हाथों में लेनी है उन्हें अक्ल के अंधे बनाने की कोशिश की जा रही है। इसका जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। हम मानते हैं कि विद्यार्थी का मुख्य काम शिक्षा प्राप्त करना है उसे अपना सारा ध्यान इसी तरफ लगाना चाहिए लेकिन क्या देश के हालातों का ज्ञान और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना क्या विद्या में शामिल नहीं है ? अगर नहीं तो हम ऐसी विद्या को निरर्थक समझते हैं जो केवल क्लर्की के लिए ली जाए……..।’’(भगतसिंह)
आज फिर भगतसिंह के इस आव्हान को याद करने की जरूरत है कि -‘‘ एक इंकलाब की भारी ज़रूरत है। वे पढ़े ज़रूर पढ़े। साथ ही राजनीति का ज्ञान भी हासिल करें और जब जरूरत हो मैदान में कूद पड़ें और ज़िन्दगियाँ इसी काम में लगा दें। अपनी जान इसी काम में दान कर दें। अन्यथा बचने का और कोई उपाय नज़र नहीं आता।’’(भगतसिंह)
आज फिर वह जरूरत आ पड़ी है, राजनीति में कूद पड़ने की ज़रूरत……. मगर राजनीति ऊँचे आदर्शों वाली अर्थात वर्तमान जर्जर समाज व्यवस्था को उखाड़ फेंककर नई समाज व्यवस्था कायम करने के संघर्ष की राजनीति, अर्थात क्रांतिकारी राजनीति ना कि घटिया संसदीय चुनावी राजनीति।

>पत्रकारिता में चाटुकारिता .

>पत्रकारिता में चाटुकारिता आज कल खूब हो रहा है । इसके पीछे कारन यह है की संपादको का नौसिखुआ होना । संपादक वही लोग हो रहे है जो पैसा लगा रहे है या राज नेताओ से अच्छे सम्बन्ध है । मैं केवल प्रिंट मीडिया की बात नहीं कर रहा हूँ मैं इलेक्ट्रोनिक या वेब मीडिया , सभी माध्यमो की बात कर रहा हूँ । आज कल पत्रकार .संपादक के चाटुकारिता पर ज्यादा धन दे रहे है । आपने काम पर कम । इसके पीछे कारन यह है की । उन्हें अपने काम का ज्ञान नहीं होना । प्रिंट मीडिया के लिए लिखते तो है । पर उन्हें रचना प्रक्रिया का क , ख , ग का पता नहीं है । तो क्यों नहीं चाटुकारिता करे । नौकरी जो करनी है , पर अगर अगर अच्छे पत्रकार हमारे समाज को चाहिए तो । चाटुकारिता पर लगाम कसना होगा । और संपादक उन्हें ही बनाया जाये जिन्हें पत्रकारिता का ज्ञान हो । और समाज के लिए कुछ करने का जज्बा हो .

>वेद-कुरआन और विज्ञान (जाकिर नाइक के चेलों को समर्पित)

>आज-कल एक मुस्लिम ब्लोगर अनवर जमाल को विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों वेदों की बुराई करने का या कह सकते है की अपने ही ढंग से उनके उलटे सीधे अर्थ निकालने का चस्का लगा हुआ है. निसंदेह वेद विश्व का सबसे महानतम ज्ञान है. परन्तु उस ब्लोगर को वेद मजाक की पुस्तके तथा विश्व का सम्पूर्ण ज्ञान कुरान में दिखता है.
मे यहाँ पर आज इस लेख में खगोल विज्ञान के कुछ तथ्यों पर द्रष्टि डालूँगा.
हिन्दू धर्म के अनुसार प्रथ्वी गोल है और सूर्य के चारो और अपनी धुरी पर घूमती है.(यजुर्वेद ३/६)
कितना महान ज्ञान था खगोल का हजारों हजारों वर्ष पहले.

इसाई पंथ में जब वेदों से ज्ञान प्राप्त करके गैलिलियो ने १६२६ के आस पास यही बात बताई तो तो उस समय पोप ने उसे १० वर्ष का कारावास दिया . क्यों कि इसाई पंथ के अनुसार सूर्य प्रथ्वी के चारो और घूमता है.

इस्लाम मजहब में कुरआन जिसकी व्याख्या इब्नेक्सीर ने की , पारा १३,पेज २७ पर ओर पारा २७,व पेज ४८ पर की है ,दोनों ही स्थान पर प्रथ्वी को चपटा कहा गया है. १९६९ में जब आदमी चाँद पर पहुंचा और जब उसने कहा की मुझे प्रथ्वी चाँद से गोल नजर आती है , तो अरब के सुलतान फैसल ने कहा की यह बिलकुल झूठ है क्यों की कुरआन के अनुसार तो प्रथ्वी चपटी है.

कुरआन के अनुसार जिसे मकतब अलाह्सनात रामपुर ने प्रकाशित किया है ,में पारा १४,सूरा १६,आयत १५ में अल्लाह की वाणी है “और उस खुदा ने धरती में अटल पहाड़ ड़ाल दिए ताकि वह तुम्हे लेकर लुडक न जाय.”
कुरआन शरीफ शेरवानी लखनऊ के संस्करण में उपरोक्त आयत का अर्थ दिया है “और पहाड़ जमीन पर गाड़े गए ताकि जमीन तुम्हे एक तरफ लेकर लुढ़क न जाय.”
कितनी हास्यप्रद बात है कि कुरआन का अल्लाह ये भी नहीं जानता कि प्रथ्वी गोल है चपटी नहीं. और अल्लाह ने धरती पर पहाड़ क्यों बनाए इसका कुरआन में क्या उत्तर है ,सुनकर ही मजा आता है।
कुरआन में ही सूरा १८ की ८६ वि आयत के अनुसार सूर्य अस्त होने के लिए कृष्णा सागर में जाता है।
अरे फिर तो रोज ही सूरज को गर्म करने के लिए करोडो टन लकड़ी रोज लगती होगी।क्यों कि कृष्ण सागर में तो डूबकर सूर्य ठंडा हो जाता होगा।
वारि जाऊं मै अल्लाह के ऐसे ज्ञान पर और खुदाई पुस्तक कुरआन पर.

वहीँ यजुर्वेद कहता है कि”यह भूगोल प्रथ्वी जल और अग्नि के निम्मित
अर्थात उत्पन्न हुई अपनी कक्षा में सबकी रक्षा करने वाले सूर्य के चारों तरफ छन-छन घूमती है.,इसी से दिन-रात्री,ऋतु और अयन आदि काल विभाग से संभव होते हैं। ” (यजुर्वेद -३/६)
“ये होता है ज्ञान.”
सच आपके सामने है ,आप स्वं सोचें की क्या कुरआन के अल्लाह को इतना भी ज्ञान नहीं की प्रथ्वी गोल है.कितकी हास्यप्रद बात है की प्रथ्वी पर पहाड़ इसलिए डाले गए कि कहीं वह मोहम्मद(परमात्मा उन्हें शान्ति दे) के शिष्यों को लेकर लुडक न जाए.
मित्रों देखो कही झामाल अरे नहीं नहीं गुरु जमाल अपने चेलों के साथ कही लुड़का तो नहीं पड़ा. किसी को मिल जाए तो मुझे जरूर बताना।

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