>धर्म की दुकानों से कब तक आँख फेरेंगे , कुछ तो शर्म करो !

>शर्म आती है ?

किसे ? 
अरे , हमें और किसको ! 
अब पूछिए क्यों ? इसलिए कि हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ बड़ी आसानी से योग ,अध्यात्म ,भजन-कीर्तन के नाम पर कोई भी दाढ़ी-बालों वाला नकलची ,ढोंगी ,मक्कार भगवान् के समक्ष पूजा जाने लगता है . हिन्दू समाज के लिए वर्तमान समय धार्मिक और आध्यात्मिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है . ऐसा कहने के एक नहीं अनेक कारण है .और तत्काल उदाहरण भी सामने हैं बस गिनते चलिए और अपने आस-पास भी खोजिये कई मिल जायेंगे ! दिल्ली में चमत्कारी बाबा ६ लड़कियों के साथ सेक्स रेकेट में पकड़ा गया . आसाराम बापू के आश्रम में यौन शोषण और बच्चों के खरीद-फरोख्त की बात कई दफे सामने आई है .कुम्भ मेले में शंकराचार्यों के बीच असली-नकली को लेकर लड़ाई जारी है . दक्षिण के एक बाबा नित्यानंद  को दो अभिनेत्रियों  के साथ मजे लुटते हुए एक सीडी बरामद हुई है . डेरा सच्चा सौदा के बाबा राम रहीम पर हत्या का आरोप लगा है . यह तो कुछ हाई प्रोफाइल बाबाओं के हालिया किस्से हैं ! अनुमानतः दस लाख से अधिक बाबाओं के इस देश में कितने ऐसे हैं और कितने सच्चे यह कहना बगैर किसी सर्वेक्षण के गलत होगा ! बात केवल बाबाओं के सेक्स रेकेट ,किडनी रेकेट ,आदि में लिप्त होने तक नहीं रह जाती है . बात है कि हम कैसे समाज में जी रहे हैं जहाँ उपदेशक /गुरु /संत कहलाने वाले ,भगवान् के तौर पर पूजे जाने वाले लोग इतने गिर गये हैं . मंदिरों मठों को आपसी वर्चस्व और निजी स्वार्थपूर्ति का साधन बना दिया है . बिहार के सुल्तानगंज स्थित अजगैवी मठ का किस्सा याद होगा आपको जहाँ का महंथ मठ की जायदाद बेच कर पकड़े जाने पर शिष्या के संग कमरे में बंद हो गया था . अरे ,इनसे अच्छा तो प्राचीन देवदासी परम्परा थी जिसमें छिप-छिपाकर कदाचार नहीं होता था . इनकी तरह भक्तों को ब्रह्मचारी का उपदेश देकर खुद मज़े तो नहीं लुटते थे . जो भी होता था उसमें समाज की इच्छा शामिल थी और कम से कम सबको मालूम तो जरुर होता था . ” ऊपर से फीट -फाट अन्दर से मोकामा घाट ” ऐसी बात तो कतई नहीं थी. 
आज पत्रकारिता , समाजसेवा , राजनीति आदि के तर्ज पर धर्म -अध्यात्म मिशन से प्रोफेशन बन चुका है लेकिन बाबागिरी  नाम के इस प्रोफेशन में ईमानदारी की कोई गुंजाईश नहीं बची है .लोगों ने इसे भी धंधा बनाया , चलो अच्छी बात है , लेकिन धंधे का पहला वसूल; पेशे के चरित्र को बचाए रखना , को हीं गायब कर दिया ! किसी फिल्म का संवाद याद आ रहा है कि ‘ बेईमानी का काम भी हम ईमानदारी से करते हैं ‘ . कई सवाल आपके मन भी तैर रहे होंगे ! जैसे , यह सब अचानक से अभी क्यों सामने आ रहा है ? पहले ऐसा नहीं था ? ये सब कब से शुरू हुआ ? आदि-आदि . ऐसा नहीं कहा जा सकता कि पहले ऐसा नहीं था लेकिन इतना जरुर है कि अब जबकि बाबागिरी नाम का एक नया धंधा बाजार में आया है तब तादाद बढ़ गयी है .निजी शिक्षण संस्थानों की तरह धार्मिक-आध्यात्मिक -ज्योतिष वगैरह ,वगैरह की संस्थाओं की बाढ़ आ गयी है . और इस पूरे हादसे मे सूचना क्रांति की उपज इलेक्ट्रोनिक मीडिया और इंटरनेट ने सबसे अहम् भूमिका निभाई है . एक बार खुद से आंकलन करके देखिये तो पता चलेगा कि टीवी पर सामाजिक सरोकारों से जुडे विषयों से दुगुने -तिगुने समय में इन धंधेबाजों को दिखाया जाता है और इन्टरनेट पर समाजोपयोगी वेबसाइट के मुकाबले ज्योतिष -अध्यात्म -धर्म के नाम पर चल रही दुकानें सौ गुना अधिक संख्या में है .सुना है कि बीबीसी हिंदी की साईट से अधिक पाठक शनिधाम .कॉम पर जाते हैं ! हिन्दुओं का असंख्य धन राशि मंदिर -मठ रूपी दुकानों के महंथों और कुकुरमुत्ते की तरह फैले बाबाओं के पास बेकार पड़ा है और जो धन मात्र कुछ लोगों की ऐय्याशी में झोका जाता है . सबको मालूम है राम जी ,दुर्गा माँ ,शिव जी या साईं बाबा को पैसों का कोई काम नहीं है .अरे जिसके दर पे हम खुद भीख मांगने जाते है उनको कुछ देकर बड़ी चीज की उम्मीद रखना उनके ही विरुद्ध है .  

बहरहाल , हिन्दू धर्म के हित में सोचने वाले तमाम बुद्धिजीवों से आग्रह है कि आप खुद सोचिये , प्रमाणित रूप से ज्ञात संसार के सबसे प्राचीनतम धर्म -संस्कृति की इस दयनीय दशा पर रोना नहीं आता ? रोइए मत ! कुछ करिए . सबसे पहले खुद पर शर्म करिए कि हम लोग ऐसे समाज में जी रहे हैं और जब शर्म का अहसास होगा और लगेगा कि सच में कुछ गलत हो रहा है तब कहीं जाकर इस लड़ाई का आगाज होगा . यह आग्रह उन सभी के लिए है जो इंटरनेट पर हिन्दू धर्म को लेकर संघर्ष कर रहे हैं या ऐसा दावा करते हैं .हम शुतुरमुर्ग नहीं बन सकतेहैं . अपनी गर्दनें रेत में नहीं छुपा सकते हैं . सदियों से जागृत समाज का वंशज होने का दायित्व हमारे सर पर है उसे हम छोड़ कर आत्मप्रशंसा में डूबे रहेंगे ? नहीं , तो फ़िर क्या करेंगे इस पर गंभीरता से चिंतन करना होगा . धर्म-संसद जैसी संस्थाओं को जागृत करने की दिशा में प्रयास जरुरी है क्योंकि जब तक पथप्रदर्शक नहीं होगा पथानुगामी क्या करेंगे ! हमें अपने घर का कचड़ा स्वयं हीं साफ़ करना होगा . एक जागरण की शुरुआत करनी होगी  जिसमें हिन्दू जनता के धन के इस बेजा उपयोग को रोका जाए और इसका इस्तेमाल हिन्दू धर्म की समृद्धि { जैसे हिन्दू धर्म से जुड़े रिसर्च कार्यों , असहाय हिन्दुओं को रोटी कपडा मकान व शिक्षा देने तथा अशोक महान के तर्ज पर हिन्दू धर्म के विश्वव्यापी प्रचार} का काम किया जाए .

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