क्या अब अमेरिका में भी सच्चर और रंगनाथ मिश्र आयोग की जरूरत है??? Sachchar Rangnath Mishra Commission, Muslims in USA

भारत अथवा विश्व के किसी भी देश में जब भी कोई सामाजिक स्थिति सम्बन्धी अध्ययन किये जाते हैं, तब इस बात पर मुख्य जोर दिया जाता है कि विभिन्न धर्मों और जातियों में देश के विकास और अर्थव्यवस्था से होने वाले फ़ायदे बराबर पहुँच रहे हैं या नहीं। सामान्यतः यह माना जाता है कि खुली अर्थव्यवस्था और पूंजीवाद एक शिक्षित समाज में सबको बराबरी से धन कमाने का मौका देते हैं।

पूंजीवाद का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है अमेरिका। हाल ही में अमेरिका के सामान प्रशासन विभाग द्वारा अमेरिका में रहने वाले विभिन्न धर्मों और जातियों की आर्थिक स्थिति का एक लेखाजोखा पेश किया गया है। अमेरिका में बसने वाले सभी धर्मों के लोगों की वार्षिक आय का विस्तृत सर्वे है यह रिपोर्ट। इस रिपोर्ट की सबसे आश्चर्यजनक किन्तु सत्य बात (जो हमें पहले से ही पता थी) यह निकलकर सामने आई है कि अमेरिका में रहने वाले “हिन्दुओं” और यहूदियों की आमदनी, वहाँ के वार्षिक औसत आय से काफ़ी आगे हैं। अलग-अलग समूहों में हिन्दुओं ने वहाँ अपनी मेहनत, काबिलियत और दिमाग का लोहा मनवाया है, और यह बात इस सर्वे से जाहिर होती है।

इस सर्वे में हिन्दू, मुस्लिम, यहूदी, रोमन कैथोलिक, अश्वेत, बौद्ध आदि समूहों को शामिल किया गया। आधार अध्ययन के रूप में अमेरिका की वार्षिक औसत आय को पैमाना रखा गया और देखा गया कि कौन से समूह इस आधार रेखा से कितनी नीचे और कितने ऊपर हैं। एक लाख डालर वार्षिक से लेकर 30000 डालर वार्षिक तक के समूहों में वार्षिक आय को 5 समूहों में बाँटा गया। सर्वे में यह बात उभरकर सामने आई कि एक लाख डालर वार्षिक से अधिक आय रखने में यहूदी 46% तथा हिन्दू 43% हैं। जबकि 75 हजार डालर से लेकर एक लाख डालर के आय वर्ग में भी हिन्दू सबसे अधिक 22% पाये गये। यदि नीचे से शुरु किया जाये तो 30 हजार डालर से कम वाले आय वर्ग में अश्वेत ईसाई 47% और मुस्लिम 35% लेकर नीचे की दो पायदानों पर थे, जबकि हिन्दुओं में यह प्रतिशत सिर्फ़ नौ प्रतिशत है। जबकि अमेरिका का राष्ट्रीय औसत एक लाख डालर से ऊपर सिर्फ़ 18% और 30 हजार से कम आय वर्ग में 31% है। प्रस्तुत ग्राफ़ देखने पर यह स्पष्ट नज़र आता है कि यहूदी और हिन्दू सबसे अधिक धनवान या कहें कि गरीबों में भी कम गरीब हैं, जबकि अश्वेत ईसाई और मुस्लिम समुदाय पिछड़ा हुआ है।

http://awesome.good.is/transparency/web/1002/almighty-dollar/flat.html

भारत में अक्सर यह मूर्खतापूर्ण आरोप लगाया जाता है कि मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जाता है (जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है), लेकिन अमेरिका में जहाँ कार्य संस्कृति अव्वल, प्रतिभाशाली को उचित स्थान और पूंजीवाद तथा पैसा कमाना ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता हो, ऐसे देश में बाहर से आकर बसे हुए हिन्दू और यहूदी अधिक धनवान और प्रभावशाली क्यों हैं? और अश्वेत तथा मुसलमान वहाँ भी पिछड़े हुए क्यों हैं? 9/11 के बाद पिछले कुछ वर्षों को छोड़ भी दिया जाये तो अमेरिका के सामाजिक हालात कम से कम भारत जैसे तो नहीं हैं। अमेरिका में भारत जैसी कांग्रेस पार्टी नहीं है जिसने मुसलमानों को सिर्फ़ एक वोट बैंक समझा है, अमेरिका में भाजपा भी नहीं है जिसका नाम लेकर मुसलमानों को इधर डराया जाता है, अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था भी भारत की तरह की नहीं है, फ़िर क्या कारण है कि अमेरिका के अश्वेत और मुस्लिम आर्थिक रूप से इतनी तरक्की नहीं कर पाये?

इस सर्वे के परिणामों से यह सवाल उठने भी स्वाभाविक हैं कि हिन्दुओं के प्रति विश्व के अनेक देशों के समाज में नफ़रत की भावना के कारणों में से क्या यह (आर्थिक खुशहाली) भी एक कारण है? और यदि ऐसा ही है तो अमेरिका में बाकी धर्मों के लोगों को तरक्की करने से किसने रोका है? क्या अब अमेरिका में भी सच्चर और रंगनाथ आयोग जैसी कोई व्यवस्था करनी पड़ेगी? फ़िर अमेरिका के “सबको समान अवसर वाला देश” के नारे का क्या होगा? यदि अमेरिका में सबको समान अवसर मिलते हैं तो सिर्फ़ यहूदी और हिन्दू बाकियों से काफ़ी आगे क्यों हैं, बाकी धर्मों को छोड़ दें तो स्थानीय कैथोलिक गोरे ईसाई भी इन दोनों से पीछे क्यों हैं?

बहरहाल, हिन्दुओं के लिये भले ही यह एक खुशखबरी हो लेकिन अमेरिका सहित भारत के भी समाजशास्त्रियों के लिये यह एक शोध का विषय है कि हिन्दू जिस देश में भी जाते हैं वहाँ अपनी बुद्धि, कौशल, काम के प्रति समर्पण के कारण जल्दी ही एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लेते हैं और उस देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, लेकिन हिन्दू यही काम अपने देश भारत में नहीं कर पाते… ऐसा क्यों? इसके कुछ मोटे-मोटे कारण काफ़ी लोग जानते तो हैं लेकिन खुलकर कुछ कहते नहीं… क्योंकि सच कड़वा होता है… और हमारे कथित बुद्धिजीवी, समाजशास्त्री और राजनेता मीठा बोलने के आदी हो चले हैं… भले ही इससे देश का सतत नुकसान हो रहा हो।

ऊपर दिये गये सवालों पर अपनी राय भी रखें… शायद भारत के नीति-निर्माताओं को कुछ अक्ल आये (उम्मीद तो कम है) … 
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36 Comments

  1. March 12, 2010 at 9:17 am

    अच्छा मुद्दा सुरेश जी ; आज ही एक मेल मिली थी, उसके कुछ पॉइंट यहाँ हिन्दी अनुवाद करके रख रहा हूँ ; क्या आप एक धर्मनिरपेक्ष है ? तो कृपया इन सवालों का जवाब दीजिये, 1.इस दुनिया में लगभग 52 मुस्लिम देश हैं. दिखाएँ एक मुस्लिम देश जो हज सब्सिडी प्रदान करता है?2. एक मुस्लिम देश दिखाएँ जहाँ हिंदू को वे विशेष अधिकार दिए गए हो जो मुसलमानों को भारत में दिए गए है ?3. दिखाएँ एक मुस्लिम देश जहां एक गैर-मुस्लिम राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री हो ? 4. दिखाएँ एक देश जहाँ 85% बहुसंख्यक, 15% अल्पसंख्यको के आगे गिडगिडाते हों ? 5. दिखाएँ एक मुल्ला या मौलवी जिसने किसी आतंकवादी के खिलाफ एक 'फतवा' जारी किया हो ? 6. हिंदू बहुमत वाले राज्यों में भूतकाल में मुस्लिम मुख्यमंत्रियों के रूप नियुक्ति हुई है, आप कभी कल्पना कर सकते है कि एक हिंदू कभी मुस्लिम – बहुल जम्मू और कश्मीर का मुख्यमंत्री बन जाएगा ? 7. आज 85% हिन्दू जनसंख्या वाले देश में १५% मुस्लिम दिन में पांच बार लाउडस्पीकर पर कहता है कि अल्लाह के अलावा कोई भगवान् नहीं! आप यह कल्पना कर सकते है कि यदि ८५% मुसलमान होता और १५% हिन्दू तो क्या आप भी लाउडस्पीकरों पर यह कह सकते थे कि भगवान् के अलावा कोई अल्लाह नहीं ?8. देश के अन्य राज्यों में यदि मुसलमानों और ईसाइयों को अल्पसंख्यकों के लाभ प्राप्त है तो हिंदू जम्मू और कश्मीर, मिजोरम, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय में अल्पसंख्यकों के अधिकारों से वंचित क्यों ?9. क्या आप मानते हैं कि हिंदू की समस्याओं को भी मान्यता देने की आवश्यकता है या फिर, तुम्हें लगता है कि जो लोग खुद को हिंदु कहते है वही खुद एक समस्या है ? 10. 1947 में, पाकिस्तान में हिंदू आबादी 24% थी , आज 1% भी नहीं है. 1947 में पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू आबादी (अब बांग्लादेश) 30% थी. आज 7% है ! हिंदुओं को क्या हुआ? क्या सभी हिंदुओं में मानव अधिकार नहीं है? इसके विपरीत, भारत में मुस्लिम जनसंख्या 10.4% से (१९५१) से बढ़कर 15% हो गई , जबकि हिंदू आबादी 87.2% से घटकर 85% है!

  2. March 12, 2010 at 9:17 am

    ये गाँधी नेहरु की दी हुई खुजली है जो अब एक नासूर और कोढ़ बन गई है. समाज को हिन्दू, मुस्लिम, आमिर, गरीब, अगड़े, पिछड़े, अति पिछड़े, अति अति पिछड़े, उससे भी पिछड़े, महिला पुरुष में बाँट कर योग्यता का दशको से खुले आम क़त्ल किया जा रहा है. एक चोर को हटाओगे तो दूसरा जो आएगा वो भी गुंडा राज ही चलाएगा. हाल ही में पढ़ा थी की होली पर कुछ बच्चो ने मायावती के पोस्टर पर कालिख पोत दी और उन बच्चो पर सरकारी काम में अडंगा लगाने और अनुसूचित जाती उत्पीडन एक्ट लगा दिया गया. देखिये देश, कानून, न्याय के ये बलात्कारी कितने स्वछंद रूप से अपने घिनोने कार्यो को अंजाम दे रहे है. पूरा सरकारी महकमा ऐसे नेताओ के तलुवे चाटने में ही लगा रहता है. आम आदमी बेबस और लचर होकर केवल तमाशा देख रहा है. देश के बहार विकसित देशो में जहाँ सभी को बराबर के अवसर है, वहां के नतीजे इस सर्वे से साफ़ साफ़ देखे जा सकते है. केवल अमेरिका ही नहीं मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की हमारे देश के लोग अन्य विकसित देशो में भी वहां के आम लोगो से ज्यादा पढ़े लिखे और समृद्ध है.

  3. March 12, 2010 at 9:24 am

    आदरणीय गोदियाल जी, आपने सही फ़रमाया… यह ई-मेल बहुत पुराना है लेकिन अभी सभी हिन्दुओं तक नहीं पहुँच पाया है… इसे देखिये… 4 अप्रैल 2007 को मैंने लिखा था… http://blog.sureshchiplunkar.com/2007/04/blog-post_560.html

  4. March 12, 2010 at 9:26 am

    अल्प संख्यकों पर एक बात भारत की बताता हूँ. भारत में सबसे ज्यादा आयकर (कुल का 24%) भरने वाला समुदाय जैन है. क्या जैनियों ने कभी कहा हमारे साथ अन्याय होता है? आरक्षण दो. हम अल्पसंख्यक है? बात है बिना महेनत के खाने की आदत हो तो रोने के हजार बहाने है.

  5. March 12, 2010 at 9:28 am

    रंगनाथ मिश्र जैसे आयोंग देश मैं अलगाववाद के बीज बो रहे हैं….अधिकतर मुस्लिम परिवारों मैं पांच से दस संताने होती हैं…मदरसे की शिक्षा उनके लिए जरूरी है चाहे हिंदी पढना आता हो या नहीं …ऐसे मदरसे जो कि जिहाद की शिक्षा तो देते हैं पर कखग नहीं सिखाते……कमोबेश यही हाल अमेरिका मैं होगा……फिर हिंदु को जिम्मेदार ठहराना कितना सही है……

  6. March 12, 2010 at 9:35 am

    बेंगाणी जी, एकदम सही कहा आपने… इस पोस्ट का संदेश यही है कि अच्छी शिक्षा, कड़ी मेहनत और देश (जहाँ वे रहते हैं) के आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य के प्रति सकारात्मक रवैया रखने वाले हिन्दू और यहूदी अधिक सफ़ल हैं, बनिस्बत हर बात में आरक्षण और अन्याय का रोना रोने वाले समूहों के…

  7. March 12, 2010 at 9:51 am

    एक सार्थक मुद्दा उठाया है आपने , सही कह रहे हैं गोदियाल साहेब , ये सब अधिकार सिर्फ हमने मुसलमानों को अपना समझ कर के दिया अब। लेकिन ab वो वक्त आ गया है जब हमें एक होकर के भारतीय संस्कृत को बचाना होगा और इन कट्टरपंथियों के खिलाफ आवाज बुलंद करनीं होगी।रही होगी पुराने ज़माने मैं लोगो की कोई मजबूरी अपना धर्म बदलने के लिए। लेकिन अब नहीं। नहीं तो ये लोग जेहाद के नाम पर पुरे संसार मैं आतंक फैला कर के रख देंगे।

  8. March 12, 2010 at 9:56 am

    I see, tabhi main sochun 26/11 ko paki tv par HINDU_ZIONIST shabd baar baar kyon prayog kia ja raha tha.

  9. March 12, 2010 at 11:00 am

    सुरेश भईया बहुत बढ़िया लगी आपकी पोस्ट ,

  10. nitin tyagi said,

    March 12, 2010 at 11:30 am

    बहुत अच्छी जानकारी दी आपने

  11. nitin tyagi said,

    March 12, 2010 at 11:30 am

    बहुत अच्छी जानकारी दी आपने

  12. मनुज said,

    March 12, 2010 at 2:28 pm

    @आदरणीय सुरेश चिपलूनकर जी,इस लेख के लिए आपको साधुवाद. @ "स्वच्छता वाले भाई साहब", "वेद और कुर'आन के तथाकथित विद्वान" और वो "अंतिम अवतार वाले धर्मगुरु", आप लोग कहाँ है ?, कहीं दिखाई नहीं पड़ रहे. आपके कमेंट्स का इंतज़ार रहेगा..

  13. कुश said,

    March 12, 2010 at 2:43 pm

    लगता है चाचा वहा चले ही गए जहाँ कभी गए नहीं थे..

  14. the said,

    March 12, 2010 at 3:31 pm

    शानदार आलेख. ऐसा कुछ पढकर बडा सुकून मिलता है कि हिंदुत्व की अच्छाइयों को कोई बर्बरता नहीं मिटा सकती. लेकिन दुख इसी बात का है कि भारतवर्ष में हिंदुत्व का सूरज हिंदू नाम वाले तथाकथित बुद्धीजीवियों के कारण पूरे तेज़ के साथ चमक नहीं पा रहा है. अगर जातिवाद, अल्पसंख्यकवाद, इसलामिक आतंकवाद, माओवाद उर्फ़ कम्युनिस्ट आतंकवाद मिट जाए तो भारत पांच साल में ही दुनिया का नंबर वन देश बन जाएगा. मैंने प्रगति की राह में सबसे बडा रोडा जातिवाद को माना है, क्योंकि इसी जातिवाद के कारण ही हमारा खुद का घर (हिंदुत्व) कमज़ोर है, जिससे दूसरों को हमले करने का हौसला मिल रहा है. इस बात को स्वामी विवेकानंद, डा. हेडगेवार, आचार्य श्रीराम शर्मा जैसे महापुरुषों ने पहचाना और जातियों के उन्मूलन का आह्वान किया था. लेकिन बडे खेद के साथ कहना पडता है कि इतनी ठोकरें खाने के बाद भी जातिगत श्रेष्ठता का ज़हर ज़्यादातर लोगों की रग रग में समाया हुआ है- चाहे वे खुद को कितना ही बडा हिंदू हितैषी कहते हों. मेरा मानना है कि अगर जातियां खत्म हो गईं, तो आधे से ज़्यादा मुसलमान बंधु रातोरात पूरी स्वेच्छा से हिंदू धर्म स्वीकार कर लेंगे. अभी भी बहुत सारे लोग ऐसा करना चाहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि आप उन्हें किस जाति में शामिल करेंगे? क्योंकि दुर्भाग्य से किसी जाति का हुए बगैर कोई हिंदू नहीं हो सकता. और जब आप किसी जाति के नहीं होंगे, तो आपकी संतानों से किस जाति वाले शादी करेंगे? यही सवाल हिंदू धर्म का सम्मान करने वाले गैर हिंदुओं को रोकता है. अगर जातिवाद खत्म हो जाए तो ऊपर के बाकी के सारे वाद भी चुटकी बजाते भाग जाएंगे. – Vicky G

  15. March 12, 2010 at 3:50 pm

    निश्चित ही यह हिंदू जीवन पद्धति का प्रभाव है।

  16. मनुज said,

    March 12, 2010 at 4:24 pm

    @theagree with you

  17. मनुज said,

    March 12, 2010 at 4:24 pm

    @the agree with you

  18. March 12, 2010 at 6:17 pm

    @vicky – निश्चित रूप से जातिवाद एक बहुत बड़ी बीमारी है, लेकिन हमारे वोटों के भूखे नेता ही इसे बढ़ावा दे रहे हैं. साम्प्रदायिकता और छदम धर्मनिरपेक्षता इससे भी बड़ा खतरा है देश के लिये. जब भी कभी साम्प्रदायिकता की बात आती है तो तुरन्त ही हिन्दुओं को अगड़े-पिछड़े-दलित-सवर्ण में बांटने की योजना तैयार हो जाती है. जब देश ही नहीं बचेगा तो हिन्दू-मुसलमान-अगड़े-पिछड़े-दलित-सवर्ण कहां रह जायेंगे. और श्रीमान जी हिन्दू कब धर्म परिवर्तन में लगे हुये हैं, यह कार्य तो अन्य प्रचारकों ने संभाल रखा है. दलितों में जिन्हें सबसे अधिक जरूरत थी, उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ और जो पा गये, वे अब सवर्ण बनते जा रहे हैं.

  19. Dhananjay said,

    March 12, 2010 at 6:23 pm

    अब क्या कहा जाये इन मलिच्छों के बारे में. वैसे उनसे ज्यादा मलिच्छ तो वे लोग हैं जो वोटों के लिए इनके तलवे चाटते हैं और बाकी सारे भांड (read media) इनका साथ देते हैं. As they say, every dark cloud has a silver lining. मुझे उम्मीद है वो सिल्वर लाइनिंग जल्द ही सामने आएगी.

  20. SHIVLOK said,

    March 13, 2010 at 2:19 am

    Again I salute youI salute your motherYou are really logical & have a scientific attitudeभारत में अक्सर यह मूर्खतापूर्ण आरोप लगाया जाता है कि मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जाता है (जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है), लेकिन अमेरिका में जहाँ कार्य संस्कृति अव्वल, प्रतिभाशाली को उचित स्थान और पूंजीवाद तथा पैसा कमाना ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता हो, ऐसे देश में बाहर से आकर बसे हुए हिन्दू और यहूदी अधिक धनवान और प्रभावशाली क्यों हैं? और अश्वेत तथा मुसलमान वहाँ भी पिछड़े हुए क्यों हैं? 9/11 के बाद पिछले कुछ वर्षों को छोड़ भी दिया जाये तो अमेरिका के सामाजिक हालात कम से कम भारत जैसे तो नहीं हैं। अमेरिका में भारत जैसी कांग्रेस पार्टी नहीं है जिसने मुसलमानों को सिर्फ़ एक वोट बैंक समझा हैइस सर्वे के परिणामों से यह सवाल उठने भी स्वाभाविक हैं कि हिन्दुओं के प्रति विश्व के अनेक देशों के समाज में नफ़रत की भावना के कारणों में से क्या यह (आर्थिक खुशहाली) भी एक कारण है? और यदि ऐसा ही है तो अमेरिका में बाकी धर्मों के लोगों को तरक्की करने से किसने रोका है? क्या अब अमेरिका में भी सच्चर और रंगनाथ आयोग जैसी कोई व्यवस्था करनी पड़ेगी? फ़िर अमेरिका के “सबको समान अवसर वाला देश” के नारे का क्या होगा? यदि अमेरिका में सबको समान अवसर मिलते हैं तो सिर्फ़ यहूदी और हिन्दू बाकियों से काफ़ी आगे क्यों हैं, बाकी धर्मों को छोड़ दें तो स्थानीय कैथोलिक गोरे ईसाई भी इन दोनों से पीछे क्यों हैं? Really ExcellentRegardsSHIV RATAN GUPTA9414783323

  21. SHIVLOK said,

    March 13, 2010 at 2:26 am

    I again salute youI salute your motherYou are really logical and have scientific attitudeभारत में अक्सर यह मूर्खतापूर्ण आरोप लगाया जाता है कि मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जाता है (जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है), लेकिन अमेरिका में जहाँ कार्य संस्कृति अव्वल, प्रतिभाशाली को उचित स्थान और पूंजीवाद तथा पैसा कमाना ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता हो, ऐसे देश में बाहर से आकर बसे हुए हिन्दू और यहूदी अधिक धनवान और प्रभावशाली क्यों हैं? और अश्वेत तथा मुसलमान वहाँ भी पिछड़े हुए क्यों हैं? 9/11 के बाद पिछले कुछ वर्षों को छोड़ भी दिया जाये तो अमेरिका के सामाजिक हालात कम से कम भारत जैसे तो नहीं हैं। अमेरिका में भारत जैसी कांग्रेस पार्टी नहीं है जिसने मुसलमानों को सिर्फ़ एक वोट बैंक समझा है,इस सर्वे के परिणामों से यह सवाल उठने भी स्वाभाविक हैं कि हिन्दुओं के प्रति विश्व के अनेक देशों के समाज में नफ़रत की भावना के कारणों में से क्या यह (आर्थिक खुशहाली) भी एक कारण है? और यदि ऐसा ही है तो अमेरिका में बाकी धर्मों के लोगों को तरक्की करने से किसने रोका है? क्या अब अमेरिका में भी सच्चर और रंगनाथ आयोग जैसी कोई व्यवस्था करनी पड़ेगी? फ़िर अमेरिका के “सबको समान अवसर वाला देश” के नारे का क्या होगा? यदि अमेरिका में सबको समान अवसर मिलते हैं तो सिर्फ़ यहूदी और हिन्दू बाकियों से काफ़ी आगे क्यों हैं, बाकी धर्मों को छोड़ दें तो स्थानीय कैथोलिक गोरे ईसाई भी इन दोनों से पीछे क्यों हैं?Really excellentRegardsSHIV RATAN GUPTA9414783323

  22. SHIVLOK said,

    March 13, 2010 at 2:32 am

    EK SABSE KHAAS BAAT AUR VAHAAN KE MUSALMANON KA JO SAMPANNAVARG HAI USMEN BHII BHARTIYA MUSALMAN JYADA SAMPANNA HAINshaayad achhi sangat ka asar ho

  23. March 13, 2010 at 4:47 am

    तुष्टीकरण की नीति ने इस देश का कबाड़ा कर दिया है।वैसे आपकी लिखी हर बात से सहमत हूं।

  24. March 13, 2010 at 5:43 am

    @सुरेश जी मैं तो अभी हाल ही में यु. एस. से आया हूँ. वास्तव में यह बिलकुल सत्य है भारतीय अथवा हिंदू स्वभावतः मेहनती और बुद्धिमान होता है जिसकी जड़ें उसके धर्म ओर संस्कृति से पोषण लेती हैं बस उसको काम का मौका मिलना चाहिए. हमारे अपने घर भारत में तो हम लोगो कि दुर्दशा की हुई है वरना यदि सब कुछ यहाँ ठीक हो जाए तो हम लोगो को बहार जाने कि क्या आवश्यकता है यहाँ पर ही यु. एस. से अधिक तरक्की न हो जायेगी. @पंकज बेगानी जी जैन समाज भी अपने आप को अल्पसंख्यक घोषित करने की पूर्व में कोशिश कर चुका है किन्तु मुझे पक्का याद नहीं है पर जितना याद है उनकी यह मांग दिल्ली उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय ने ठुकरा दी थी, और तो और विवेकानंद जी द्वारा चलाये गए राम-कृष्ण मिशन वालो ने भी ये मांग उठाई थी. ये देश का दुर्भाग्य है कि हिंदुओं के कुछ वर्गों से भी मांग उठ चुकी है. सब देश की बर्बादी की बहती गंगा में हाथ धोने के लिए तैयार बैठे हैं बस मौका मिला चाहिए. @भावेश जी १००% सहमत पहले यह काम अंग्रेज करते थे अब इनकी ओलादों ने संभाल लिया है.

  25. March 13, 2010 at 5:47 am

    सार्थक और सभी नागरिकों के लिए विचारणीय.

  26. March 13, 2010 at 5:56 am

    .भारतीय दर्शन विश्व में सबसे पुराना है लेकिन इसे केवल धर्म की चार दीवारी से बाँध दिया गया है….मैंने अभी तक जितने भी मैनेजमेंट की पुस्तकें पढ़ी है, उसमे कोई ऐसी नयी बात नहीं दिखी जो भारतीय दर्शन और साहित्य में पहले से मौजूद न हो. लड्डू बोलता है ….इंजीनियर के दिल से. http://laddoospeaks.blogspot.com

  27. March 13, 2010 at 6:24 am

    @ सौरभजी, टिप्पणी मैने की है न कि पंकज बेंगाणी ने. खैर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. रही बात अल्पसंख्यक कहलवाने की तो कानूनन प्रक्रिया अलग बात है, वास्तविकता तो यही है कि जिन्हे अल्पसंख्यक कहा जाता है उनसे तो जैन बहुत ज्यादा संख्या में कम है. मगर क्या फर्क पड़ता है? और अल्पसंख्यक का तगमा लेना हो तो ट्के-पैसे से समृद्ध यह समाज कब का ले ले. मैं सदा से इसका विरोधी हूँ और रहुँगा. मुझे हिन्दु होने और मानने से कोई नहीं रोक सकता.

  28. March 13, 2010 at 7:49 am

    vasudhav kutumbkam ke hindu sanskriti ke uddat vicharo vah shikha ke karan hi hindu har desh main safal hota hain vah musalman her desh main suvidhao ke liye roota hain.

  29. the said,

    March 13, 2010 at 8:07 am

    प्रिय भारतीय नागरिक – Indian Citizen मैंने यह नहीं कहा कि हिंदू दूसरों का धर्म परिवर्तन करवाना चाहते हैं. मेरे कहने का एकमात्र आशय यह है कि हिंदू कल्चर में इतना आकर्षण है कि अन्य धर्मों के लोग और यहां तक कि विदेशी भी सहज ही खिंचे चले आते हैं. इस्कान से जुडे करोडों लोग इस महान आकर्षण का साक्ष्य हैं. होली, दीवाली, गरबा, रक्षाबंधन, वसंत पंचमी, गणेश चतुर्थी, गोविंदा…जैसे उत्सवों में शामिल होने के उत्सुक मुसलमान और ईसाई आपने भी देखे होंगे. मैं फिर दोहराऊंगा कि जातिवाद सबसे बडी समस्या है. जिस दिन जातियां खत्म हो जाएंगी (या कम से कम हम जाति के आधार पर किसी को छोटा-बडा समझना बंद कर देंगे) उस दिन सारे हिंदू एक हो जाएंगे. और तब इसलामी आतंकवाद, कम्युनिस्ट बर्बरता, सांप्रदायिकता, देशद्रोह जैसे राक्षस दुम दबाकर भाग जाएंगे. @ मनुज जी को धन्यवाद. -Vicky G

  30. the said,

    March 13, 2010 at 8:35 am

    @ सौरभ आत्रेय, संजय बेंगाणी आदि बंधुमेरा निजी अभिमत है कि जैन अगर अल्पसंख्यक हो भी जाते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. इससे उनकी उपासना पद्धति और रीति रिवाज तो नहीं बदलेंगे, जो पूरी तरह से भारतीय हैं. असल में, अल्पसंख्यक भारत के लिए खतरा नहीं है, देश के लिए खतरा है- अल्पसंख्यकवाद. इस देश में पारसी भी अल्पसंख्यक हैं और सिख भी, लेकिन पारसियों और सिखों पर हर हिंदू गर्व करता है और उनका एहसान भी मानता है. असल समस्या तब आती है, जब अल्पसंख्यकवाद देश के आडे आने लगता है. यह तब होता है, जब देश के बाहर स्थित मज़हबी केंद्रों को देश से ज़्यादा महत्व दिया जाने लगता है. इसलाम और ईसाइयत के साथ यही समस्या है कि उनके लिए काबा और वेटिकन अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं, बजाय उस देश के, जहां वे पैदा हुए और जहां पूरा जीवन गुज़ारना है.संजय बेंगाणी जी स्वयं को हिंदू मानते हैं, यह बहुत अच्छी बात है. वैसे भी हिंदू की व्यापक परिभाषा में हर वह व्यक्ति समाहित है, जिसने इस भूमि पर जन्म लिया है या जो इस पुण्य भूमि के प्रति आस्था रखता है. यहां पर मैं गर्व के साथ बताना चाहूंगा कि मेरे अधिकांश मित्र जैन हैं और व्यवहार-विचार व संस्कार में वे मेरे सनातनधर्मी मित्रों से ज़्यादा हिंदू हैं. _ Vicky G

  31. HINDU TIGERS said,

    March 13, 2010 at 10:19 am

    सच्चाई के माध्यम से बौद्धिक गुलाम हिन्दूओं को जगाने का आपका प्रयास न केवल सराहनीय है वल्कि अतुलनिय भी है आपको कभी वक्त लगे तो आप http://samrastamunch.spaces.live.com पर आकर अपने भाई का मार्गदर्शन जरूर करें।धन्यावाद

  32. SHIVLOK said,

    March 13, 2010 at 11:49 am

    IS POST PAR ABHII TAK KISIISECULARNE COMMENT NAHIN KIYAKAHAAN RAFOOOCHAKKAR HO GAYE

  33. March 14, 2010 at 8:14 am

    लेकिन हिन्दू यही काम अपने देश भारत में नहीं कर पाते… ऐसा क्यों?यह क्यों कहा इसकी व्याख्या चाहिए. मैं इस बात से सहमत हूँ पर समझ पाने में असमर्थ हूँ.कभी-कभी हम अपने जीवन के बेसिक भी भूल जाते हैं. आजकल हम एक 'ठस हिन्दू' बने हुए हैं. एक आलेख के द्वारा हिन्दुओं के पिछड़ेपन पर प्रकाश डालिए और उसके उपचार की प्रक्रिया भी बताइये. मुझे सख्त आवश्यकता है.

  34. March 14, 2010 at 8:38 am

    मिहिरभोज की बात से शत-प्रतिशत सहमत हूँ. ये मुसलमान जहाँ भी जाते हैं, जेहाद और मदरसे ये दोनों लेकर जाते हैं, जिसके कारण ये हर जगह पिछड़ जाते हैं. अमेरिका में भी इसी कारण से पिछड़े हुए हैं.यदि घर के बाहर मेहनत करने के बजाय ये चार शादियाँ कर के घर के भीतर मेहनत करेंगे तो कभी भी सफल नहीं होंगे. (यह सत्यता असभ्यता सी प्रतीत हो रही है, पर यहाँ कहना अति आवश्यक था. क्षमा चाहूंगा. हिन्दू हूँ किसीको ठेस नहीं पहुँचाना चाहता.)और कुश भाई ये अवधिया चाचा को मेरे अवध में न भेजो, वैसे यहाँ पर तो होली खेले रघुबीरा, इस बार जमकर हुआ. 🙂

  35. March 14, 2010 at 5:00 pm

    suresh jii need your help. did you do for my problem which has been asked.you can separately send email onparshuram27@hotmail.com.i also urge you to write truth about bareilly in UP. what happend there.regardstyagi

  36. ePandit said,

    March 20, 2010 at 12:54 pm

    बहुत सही मुद्दा उठाया आपने। अब मुस्लिम नेता क्या कारण बतायेंगे कि अन्य देशों में क्यों पिछड़े हैं वे।


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