>नव संवत्सर , चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, २०६७—डा श्याम गुप्त की कविता

> भारतीय नव वर्ष
(एक अतुकांत कविता )

पहली जनवरी को,
हाथ मिलाते हुए ;
हमारे मित्र , वर्माजी बोले –
‘हेप्पी न्यू ईअर’|

हमने कहा माई डियर,
कैसा हेप्पी और कैसा न्यू ईअर ।
यहाँ तो हाथ ठण्ड में सिकुड़ कर
छुहारा हुए जारहे हैं;
एक आप हैं कि –
एसे बेदर्द मौसम में,
न्यू ईअर मना रहे हैं |

यह तो ,
अंग्रेज़ी कलेंडर का नव वर्ष है
हाँ,उनके लिए भी हमें हर्ष है;
पर, हमारा भी तो कोइ ,
नव वर्ष है।

हमारा विक्रम संवत तो,
चैत्र में होता है प्रारम्भ ।
वही होता है हमारा ,
भारतीय नव वर्षारंभ ।
जब हरी पीली साड़ी पहन कर,
धरती इठलाती है ।
चारों और , सरसों, गेहूं चने की ,
सुगंध महकाती है।

जब नई फसल,
कट कर घर आती है;
घर घर में उमंग , और-
खुशहाली छाती है।

वर्माजी सकपकाए,
फिर मुस्कुराए, बोले-
भाई, जब सभी इसी को ,
नव वर्ष मानते हैं, तो-
आप क्यों अपनी ही भंग ,
अलग से छानते हैं |

हम भी मुस्कुराए , बोले-
आपने ही तो ,
अंग्रेज़ी खंडहरोंको ,
हटाने का बीड़ा उठाया है ;
बंबई को मुम्बई,
मद्रास को चेन्नई,
कलकत्ता को कोलकाता कराया है ।
तो हिन्दी नव वर्ष ने ही ,
क्या कहर ढाया है;
जो अभी तक-
आप की नज़र में नहीं आया है ॥


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