>अक गीतिका : जड़ो तक साजिशें गहरी…..

>एक गीतिका : जड़ों तक साज़िशें गहरी…..

जड़ों तक साज़िशे गहरी सतह तक हादसे थे
जहाँ बारूद की ढेरी वहीं पर घर बसे थे

उनकी आदतें थी आस्माँ ही देखते चलना
ज़मीं पाँवों के नीचे खोखली थी ,बेख़बर थे

बहुत उम्मीद थी उनसे ,बहुत आवाज़ दी हमने
कि जिनको चाहिए था जागना, सोए हुए थे

ज़रूरत रोशनी की थी ,अँधेरा ले कर आए हैं
वह अपने आप की परछाईयों से यूँ डरे थे

बहुत फुँफकार करते थे ,बहुत हुंकार थी जिनकी
ज़रूरत जब पड़ी आवाज़ कितने बेअसर थे

लगी जब उँगलियाँ उठने हुई दीवार में कम्पन
इमारत की अरे ! बुनियाद कितने हिल चुके थे

बहुत इच्छा हमारी थी कि ’दर्शन’ आप के होते
मगर जब भी मिले तो आप पर चेहरे चढ़े थे

-आनन्द

भारतीय मीडिया के चरित्र को उजागर करती बैरकपुर स्पोर्टस कॉम्पलेक्स की शर्मनाक घटना…… Pseudo-Secular Indian Media, Barrackpur Molestation

16 अप्रैल 2010 को पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना जिले में स्थित बैरकपुर स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स की यह घटना है। स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स की महिला खिलाड़ी और युवा प्रशिक्षु लड़कियाँ मैदान में प्रैक्टिस कर रही थीं। मैदान से बाहर बैठे हुए कुछ मुस्लिम लड़कों ने (आयु 16 से 20) इन खिलाड़ी लड़कियों पर ताने कसना शुरु किये, गालियाँ दीं और झूमाझटकी शुरु की। लड़कियों के साथ, आसपास की झुग्गी बस्तियों के मुस्लिम लड़के आये दिन इस प्रकार की छेड़छाड़ करते रहते हैं जिसकी शिकायत कई बार की जा चुकी है। उस दिन भी लड़कियों को लगा कि ये लड़के थोड़ी देर में चले जायेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उस झुण्ड में से एक-दो लड़कों ने डोना नाम की खिलाड़ी को पकड़कर उससे उसका मोबाइल नम्बर माँगा, किसी तरह डोना उनसे पीछा छुड़ाकर मैदान के बीच में आई, तब लड़कों ने मैदान के बाहर से चिल्लाना शुरु कर दिया, कि “हम तुम्हारे कमरे में आयेंगे…”, “हम तुम्हारे बिस्तर पर बैठेंगे…” आदि-आदि। इसे देखकर पास ही खेल रहे कुछ लड़कों ने उन गुण्डों का विरोध किया और उन्हें मारपीट कर वहाँ से भगा दिया, लड़कियाँ घबराकर स्पोर्ट्स क्लब की बिल्डिंग के भीतर चली गईं।

लेकिन शाम को लगभग 6.15 बजे अचानक उन्हीं लड़कों के साथ 50-60 मुस्लिम लड़के स्पोर्ट्स काम्पलेक्स की इमारत में जबरन घुस आये, जमकर तोड़फ़ोड़ की, लड़कियों के टॉयलेट में जाकर उनसे छेड़छाड़ की और कुछ लड़कियों को खूब पीटा, जिसमें से दो लड़कियाँ पूजा सिन्हा (17) और डॉली विश्वास (14) गम्भीर रूप से घायल हुईं। पूजा सिन्हा को एक निजी अस्पताल में भरती किया गया, जहाँ उसने स्थानीय पत्रकारों को घटना की जानकारी दी। उसने बताया कि वे लड़के मोहनपुर पंचायत के चोपकाथालिया मस्जिद पारा के हैं और आये दिन बाज़ार में आते-जाते हिन्दू लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करते रहते हैं, जिसकी शिकायत क्लब सेक्रेटरी को कई बार की थी, इसीलिये उस दिन उन मुस्लिम लड़कों ने मुझे अधिक निशाना बनाया और मेरी छाती पर चढ़कर पेट में लातें मारीं।

जैसा कि सभी जानते हैं, पश्चिम बंगाल के कई जिले अब मुस्लिम बहुल बन चुके हैं, 24 परगना जिला भी इसी में से एक है। इस स्पोर्ट्स क्लब के सेक्रेटरी अजय बर्मन रॉय, “माकपा के स्थानीय नेता” हैं, जिन्होंने पत्रकारों को इस घटना के बारे में कुछ भी लिखने के खिलाफ़ धमकाया। जब क्लब के वरिष्ठ सदस्य विष्णुपद चाकी से इस घटना और सुरक्षा के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि 50-60 लड़कों द्वारा अचानक हमला किये जाने से वे घबरा गये और ऐसे में सुरक्षा का कोई भी उपाय काम नहीं आता। आगे उन्होंने बताया कि मस्जिद पारा मोहल्ले से सलाम अहमद (36), कलाम खान (38) और मुबीन अहमद ने उन लड़कों को “समझा-बुझाकर”(?) क्लब से बाहर निकाला (घटना हो जाने के बाद)। उल्लेखनीय है कि सलाम खान भी एक स्थानीय CPIM नेता है और उसने भी क्लब के सदस्यों को इस बात की रिपोर्ट पुलिस में नहीं करने हेतु धमकाया। यहाँ तक कि उसने तोड़फ़ोड़ के निशान मिटाने की गरज से सामान को ठीकठाक जमवाने की कोशिश भी की, लेकिन क्लब के सदस्यों के विरोध के बाद वह वहाँ से चला गया।

इसके बाद घबराये हुए स्पोर्ट्स क्लब के सदस्यों ने टीटागढ़ पुलिस थाने में दबाव के तहत “बगैर किसी का नाम लिखे” एक रिपोर्ट दर्ज करवाई और 18.04.10 को 24 परगना जिले के एसपी के नाम भी ज्ञापन सौंपा। स्पोर्ट्स क्लब के सदस्यों ने लिखित में स्थानीय पंचायत के अध्यक्ष प्रेमचन्द बिस्वास (CPIM) और बैरकपुर नगरपालिका चेयरमैन बिजोली कान्ति मित्रा (CPIM) को भी इसकी रिपोर्ट दी, लेकिन न ही कुछ होना था, न ही हुआ।

http://www.indiaworldreport.com/archive/update24_04_10_kolkata_media.html

क्या आपने इस घटना की कोई खबर किसी राष्ट्रीय चैनल या अखबार में पढ़ी-देखी-सुनी? निश्चित रूप से नहीं। क्योंकि एक तो यह मामला वामपंथियों से जुड़ा हुआ है जो पश्चिम बंगाल के आगामी चुनाव में मुस्लिमों के वोट लेने के लिये “कुछ भी” (जी हाँ कुछ भी) करने-करवाने को तैयार बैठे हैं, और दिल्ली सहित कई क्षेत्रों में इनके जो “बौद्धिक गुर्गे” मीडिया में कब्जा जमाये बैठे हैं, वह ऐसी खबरों को सामने आने नहीं देते… अलबत्ता मौका लगने पर देशद्रोही चिल्लाचोट करने (जैसे JNU में नक्सल समर्थक मीटिंग) में आगे रहते हैं। मंगलोर के पब में प्रमोद मुतालिक के गुण्डों ने जो किया वह गलत था, उसकी मैं निंदा करता हूं, लेकिन उस घटना और इस घटना के मीडिया कवरेज का अन्तर ही “सेकुलरिज़्मयुक्त मीडिया(?)” का असली चरित्र उजागर करने के लिये काफ़ी है (मतलब ये कि गुजरात दंगों में हुई कुछ मौतों को जमकर लगातार उछालो, लेकिन कश्मीर से 3 लाख हिन्दुओं के जातीय सफ़ाये पर चुप रहो…)। रही बात मानवाधिकार और नारी संगठनों की तो वे भी उसी समय जागते हैं जब मामला अल्पसंख्यकों से जुड़ा हुआ हो (जैसे कि कश्मीर के स्वर्गीय रजनीश की पत्नी अमीना यूसुफ़ न तो नारी है, न ही मानव)।

जैसे-जैसे बंगाल का चुनाव नज़दीक आयेगा, तृणमूल, कांग्रेस और वाम दलों में मुस्लिमों को रिझाने का गंदा खेल अपने चरम पर पहुँचेगा (लेकिन यदि किसी ने हिन्दू वोटों को एकजुट करने की बात की, तो वह “साम्प्रदायिक” घोषित हो जायेंगे)

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चलते-चलते : वामपंथियों के “बौद्धिक पाखण्ड” का एक और उदाहरण देखते जाईये – केरल के अलप्पुझा जिले की माकपा केन्द्रीय समिति ने स्थानीय नेता के राघवन के खिलाफ़ अनुशासनहीनता की कार्रवाई की है, क्योंकि उन्होंने अपने पुत्र की “विद्यारम्भम” नामक धार्मिक क्रिया करवाई (बच्चे की औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ किये जाने पर यह धार्मिक क्रिया की जाती है)। अलप्पुझा के माकपा प्रमुख थॉमस इसाक के अनुसार, राघवन ने हिन्दू धार्मिक क्रियाकलाप करके एक बड़ा अपराध किया है। इसी महान बौद्धिक पार्टी ने कन्नूर जिले में एक माकपा कार्यकर्ता को पार्टी से निकाल दिया था क्योंकि उसने गृहप्रवेश के दौरान गणेश पूजा कर ली थी। ये बात और है कि पार्टी के ही एक नेता टीके हम्ज़ा द्वारा हज यात्रा किये जाने पर, तथा पिनरई विजयन द्वारा खुलेआम मुरिन्गूर चर्च के “चंगाई” कार्यक्रमों की तारीफ़ के मामले में माकपा ने चुप्पी साध रखी है।

अर्थात साम्प्रदायिकता का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दुत्व होता है, और “धर्म अफ़ीम है” का जो नारा बुलन्द किया जाता है वह सिर्फ़ हिन्दू धर्म के लिये होता है…। एक बात जरूर है कि पैसे और ज़मीन पर कब्जे के लिये उन्हें हिन्दू मठ-मन्दिर ही याद आते हैं, शायद इसीलिये आजीवन ये लोग केरल और बंगाल से बाहर नहीं निकल पाये और अब जल्दी ही ममता बैनर्जी द्वारा बंगाल की खाड़ी में फ़ेंक दिये जायेंगे।

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>अरे , भूल गये पुन्यप्रसून जी कि …………………………….

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झारखण्ड की किस्मत किसने तय की है , वहां की जनता ने ही ना !  अरे , भूल गये पुन्यप्रसून जी कि ये वही प्रदेश है जहाँ की जनता ने घोटाले में लिप्त मुख्यमंत्री की बीबी को सर आँखों पर बिठाया था . यही वो प्रदेश है जो भावनाओं में बहकर शिबू सोरेन जैसों को अपनी बागडोर थमाता है . अब सांप को दूध पिलाओ तब भी जहर कम नहीं होता ! ये शिबू सोरेन की आदत है कभी यहाँ कभी वहां मुंह मारने की . लोग तो तब भी भाजपा के फैसले पर आश्चर्यचकित थे . तब विधायकों के   टूट जाने के भय से जिस स्संप को गले में डाला उसके जहर भरे दांत तोड़ने के उपाय भी करने चाहिए थे . वैसे मानते हैं कि आपकी रपट अलग होती है गरीब आदिवासियों से आपकी विशेष सहानुभूति है लेकिन भाई हम ऐसे लोगों से सहानुभूति नही रखते जो बार-बार एक ही गलती दुहराते हैं .झारखण्ड का मतदाता इतना सीधा-सादा भी नहीं है कि शिबू जैसों की असलियत ना पहचान सके , और फ़िर भी वोट देता है तो इसमें शिबू से ज्यादा इनकी गलती है ……………

>तू मेरे गोकुल का कान्हा, मैं हूं तेरी राधा रानी…-फ़िरदौस ख़ान

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जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है… इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना… क्योंकि इश्क़ तो ‘उससे’ हुआ है…उसकी ज़ात (अस्तित्व) से हुआ है… उस ‘महबूब’ से जो सिर्फ़ ‘जिस्म’ नहीं है… वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है… इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है… इश्क़ में रूहानियत होती है… इश्क़, बस इश्क़ होता है… किसी इंसान से हो या ख़ुदा से…

अगर इंसान अल्लाह या ईश्वर से इश्क़ करे तो… फिर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि किसी मस्जिद में नमाज़ पढ़कर उसकी इबादत की है… या फिर किसी मन्दिर में पूजा करके उसे याद किया है…
एक गीत
तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
राधा कुंज भवन में जैसे
सीता खड़ी हुई उपवन में
खड़ी हुई थी सदियों से मैं
थाल सजाकर मन-आंगन में
जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
तड़प रही थी मन की मीरा
महा मिलन के जल की प्यासी
प्रीतम तुम ही मेरे काबा
मेरी मथुरा, मेरी काशी
छुआ तुम्हारा हाथ, हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
रोम-रोम में होंठ तुम्हारे
टांक गए अनबूझ कहानी
तू मेरे गोकुल का कान्हा
मैं हूं तेरी राधा रानी
देह हुई वृंदावन, मन में सपनों की बरसात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
सोने जैसे दिवस हो गए
लगती हैं चांदी-सी रातें
सपने सूरज जैसे चमके
चन्दन वन-सी महकी रातें
मरना अब आसान, ज़िन्दगी प्यारी-सी सौगात ही गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
-फ़िरदौस ख़ान

>ब्‍लाग जगत पर संस्‍कृत का पहला ब्‍लाग।।

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संस्‍कृतम्- भारतस्‍य जीवनम्
मुझे ब्‍लागजगत पर लिखते त‍था चिट्ठे पढते हुए काफी समय हो गया। इस दौरान मैने लगभग हर भाषा में ब्‍लाग देखे तथा उनमें से जो पढ सकता था पढा भी।
किन्‍तु अबतक मुझे कोई भी ब्‍लाग ऐसा नहीं मिला जो पूर्णतया संस्‍कृत में हो।  हां कुछ ब्‍लाग आंशिक रूप से संस्‍कृत में जरूर मिले जिनमें बहुत महत्‍वपूर्ण सामाग्रियां भी प्राप्‍त हुईं।  कुछ में अच्‍छे मन्‍त्रों का संकलन मिला तो कुछ में मंगल श्‍लोक प्राप्‍त हुए। मगर इसके बावजूद भी कोई भी ब्‍लाग ऐसा नहीं मिला जिसके लेखन का माध्‍यम भी संस्‍कृत ही हो तथा सामाग्रियां भी संस्‍कृत में ही हो जैसा कि हिन्‍दी ब्‍लाग, अंग्रेजी ब्‍लाग तथा अन्‍य भाषाओं के ब्‍लागों पर है।
यह सोंचकर बहुत ही क्‍लेश हुआ। ऐसा नहीं है कि हमारे समाज में या हमारे ब्‍लाग परिवार में कोई भी संस्‍कृत का ज्ञाता नहीं है। मैने अपने ब्‍लाग पर जिनकी प्रतिक्रियाएं प्राप्‍त की हैं उनमें से अधिकांश ने संस्‍कृत में ही टिप्‍पणियां दी हैं जिससे लगता है कि संस्‍कृत में लिख सकने वालों की भी कमी नहीं है। पर फिर भी संस्‍कृत के विषय में इतनी उदासीनता क्‍यूं है यह बात मेरी समझ में अबतक नहीं आ पा रही है।

      खैर जो भी हो , विद्वानों की बातें तो विद्वान ही जानें । मैं तो एक अदना सा व्‍यक्ति हूं जो संस्‍कृत के प्रति अगाध श्रद्धा रखता है त‍था थोडा सा ज्ञान भी किन्‍तु ये ज्ञान इतना अल्‍प है कि विदुषों की नजर से बच नहीं सकता। पर फिर भी इनके हृदय की विशालता तो देखिये , मुझ जैसे अल्‍पज्ञ का उत्‍साह बढाने में कोई भी कमी नहीं रखी है।

        मैं आप सबका आभारी हूं जिन्‍होंने संस्‍कृत के पहले ब्‍लाग को इतना अधिक प्‍यार दिया कि मुझे संस्‍कृत का भविष्‍य अभी से उज्‍ज्‍वल दिखने लगा है।
आशा है आप सब का प्‍यार यूं ही मिलता रहेगा जिससे मेरी संस्‍कृत विषयक श्रद्धा तथा संस्‍‍कृत भाषा को जनभाषा बनाने के प्रयास को गति तथा दिशा मिलेगी।
      आप लोगों को आमन्त्रित करता हूं संस्‍कृत भाषा के पहले ब्‍लाग पर। http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/ इस लिंक पर क्लिक करके संस्‍कृत के पुनरूत्‍थान में कृपया अपना थोडा सा सहयोग दीजिये।
           इस ब्‍लाग के विषय में टिप्‍पणियों द्वारा अपने विचारों से अवगत करायेंगे तो मेरे इस प्रयास को और भी बल मिलेगा।

आपकी श्रद्धा एवं सहयोग के लिये धन्‍यवाद

आपका आनन्‍द

>उन पैंतालिस दिन और पैंतालिस रातों का क्या ?

>संचार-क्रांति के फलस्वरूप जब मोबाईल आया तो लोग बड़े खुश हुए . सरकारी -प्राइवेट सभी तरह की कंपनियों के इस क्षेत्र में कूदने से मोबाईल का प्रसार तेजी से बढ़ता गया . आज हर आदमी इस अत्याधुनिक उपकरणों से लैस है . क्या कमाल हो गया कभी भी कहीं भी बात करके अपनी बात बना सकते हैं . पर साहब , मोबाइल कंपनियों ने जीना मुहाल कर रखा है . एक उपभोक्ता शायद उतनी देर किसी दोस्त या रिश्तेदार से बात नहीं कर पाता है जितनी देर ये कंपनी वाले अपना विज्ञापन सुनाते हैं . कुछ समय  पहले तो पता चल जाता था नंबर देखकर कि यह कंपनी की कॉल है और हम इग्नोर करते थे . लेकिन आजकल इनकी चालाकियां इतनी बढ़ गयी हैं कि हर बार अलग-अलग नंबरों से कॉल करते हैं . सुबह-शाम कहीं भी कभी भी  , एयरटेल के विज्ञापन से एन कम्पनियाँ इतनी परभावित दिखती हैं कि अपनी बात बनाने के लिए हमें अपनी बात सुनने पर मजबूर करते हैं . सोचिये कितना गुस्सा आता होगा जब आप किसी प्रियजन के कॉल का इन्तेजार कर रहे हों , आप बाइक चला रहे हों , आप बाथरूम में हों , आप पढ़ रहे हों , आप एक अच्छी नींद में हों और मोबाइल कंपनी का फ़ोन आये और कहे सर , आप हमारी ये स्कीम ले लीजिये , आप कॉलर ट्यून लगवा लीजिये ……………!

हालाँकि , कंपनियों के मुताबिक यदि आप अनचाहे कॉल नहीं न चाहते हैं तो DND लिख कर sms  करने के पैंतालिस दिनों बाद आपको कोई कॉल अन्हीं आएगी लेकिन यह बस कहने भर को है . अधिकांश लोगों के पास फ़िर भी कॉल आते रहते हैं . कस्टमर केयर में पूछने पर कोई संतोष जनक जवाब  ना पाकर आख़िरकार एक आम आदमी दिमाग लगाना छोड़  देता है . और मान ल्जिये अगर किसी-किसी का हो भी गया तो उन पैंतालिस दिन और पैंतालिस रातों का क्या ?  आखिर ४५ दिन भी कोई उपभोक्ता जबरन किसी कंपनी का विज्ञापन क्यों सुने ? क्या यह एक आदमी की निजता के अधिकारों का हनन करना नहीं है ? सरकार को तुरंत प्रभाव से सभी मोबाइल कंपनियों को यह निर्देश दे कि उपभोक्ता को किसी भी प्रकार का विज्ञापन उसके मोबाइल पर ना भेजा जाए . अरे ,है विज्ञापन के लिए सड़कों किनारे होर्डिंग्स , अख़बार, टीवी , रेडिओ, इंटरनेट आदि मौजूद हैं फ़िर मोबाइल पर लोगों को क्यूँ परेशां किया जाता है . यदि यही ट्रेंड चलता रहा तो एक दिन कंपनियों के विज्ञापन लोगों के बेडरूम की दीवारों पर नज़र आयेंगे ……………………………..

>राजनीति में सिद्धांत — दिवास्वप्न सरीखा है अब

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राजनीति में सिद्धान्तों की राजनीति तो समाप्त हो गई और सिद्धान्त विहीन राजनीति की शुरुआत होने लगी। किसी भी स्थिति के सिद्धान्त क्या होगे और कब तक वे लागू रहेंगे यह एक प्रश्न हो सकता है किन्तु हमारा मानना है कि सिद्धान्त वही होते हैं जो कभी बदलते नहीं या फिर उनमें परिवर्तन नहीं होता। यदि ऐसा है तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि राजनीति में कोई सिद्धान्त था ही नहीं? यदि कोई सिद्धान्त होते तो हम कैसे उनके बदलने की चर्चा करते, हाँ नियमों का बदला जाना तो समझ में आता है।

(चित्र गूगल छवियों से साभार)

राजनीति में जिन सिद्धान्तों की हम बात करते हैं वे हमारे जीवन के सिद्धान्त हैं। इनके सहारे ही हम अपनी जीवन-शैली को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। जीवन से इतर जब हम राजनीति की बात करते हैं तो हम इसके द्वारा कल्पना करते हैं एक ऐसी व्यवस्था की जो हमें शासन-प्रशासन की उपलब्धता करवाती है। एक ऐसी व्यवस्था की जो हमें संसाधनों की, अवसरों की सुविधा-उपलब्धता उपलब्ध करवाती है।

वर्तमान में हमने राजनीति में सक्रिय व्यक्तियों के आधार पर, उनके कार्यों के आधार पर सिद्धान्तों का प्रतिपादन कर लिया है। अब हमें दिखाई देता है कि किसी भी दल के लिए अपने किसी भी सिद्धान्त का कोई अर्थ नहीं। उसके लिए उसके ही द्वारा बनाये गये सिद्धान्तों की कोई अहमियत नहीं। किसी दल के लिए कल कोई दुश्मन से ज्यादा खतरनाक होता है तो अगले ही दिन वही उसका सर्वप्रिय बन जाता है। वर्षों पहले के नारों में से सबसे विवादित नारा ‘तिलक, तराजू और तलवार……..’ किसी ने भी नहीं भुलाया होगा किन्तु आज यही सबसे आगे की पंक्ति में साथ देते दिख रहे हैं।

विवादों और आरोपों का राजनीति के साथ चोली-दामन का साथ है किन्तु अब इसमें स्वार्थपरकता भी शामिल हो चुकी है। स्वार्थ की स्थिति यह है कि प्रत्येक दल को दलित और मुस्लिम एक प्रकार का वोट-बैंक लगता है। हरेक दल किसी न किसी रूप में इन दोनों को अपने-अपने पाले में खींचने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसके लिए उन्हें किसी भी हद तक गिरना पड़े, वे स्वीकार कर लेते हैं। मुस्लिमों को राजनीति में आरक्षण की बात हो अथवा दलितों के आरक्षण में से उनको भी आरक्षण देने की रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट, सब कहीं न कहीं स्वार्थपूर्ति का साधन बनती दिख रही हैं।

ऐसा कब तक होगा यह कहना तो बहुत ही मुश्किल है किन्तु इतना तो कहा जा सकता है कि जब तक होगा तब तक किसी भी वर्ग का, किसी भी जाति का, किसी भी धर्म का भला होने वाला नहीं, सिवाय उन राजनैतिक महानुभावों के जो इस सिद्धान्तविहीन राजनीति को जन्म दे रहे हैं। इसके उदाहरण हम उत्तर प्रदेश में हो रही राजनीति से देख सकते हैं जहाँ सब एक दूसरे के लिए सिर्फ और सिर्फ बदले की भावना से राजनीति में लगे हैं।

>शहीद स्मारक पर बना शौचालय

>भारतवर्ष के लिए बलिदान हुए खुदीराम ,भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव . क्या आज उनके शहादत की कोई अहमियत नहीं रह गयी है ? ये प्रश्न मैं यूँ  हीं नहीं कह रहा हूँ . आज देश के हालात हीं इस बात की हकीकत बयाँ कर रहे हैं . शहीदों के स्मारकों की व्यवस्था दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है . स्वतंत्रता आंदोलन के अमर सेनानी शहीद खुदीराम बोस से जुडे ऐतिहासिक स्थलो की बदहाली का मामला प्रकाश में आया है . बिहार विधान सभा में शून्यकाल के दौरान  बिधायक किशोर कुमार ने सरकार से उन स्थलो को राष्‍टीय स्मारक के रूप में विकसित करने की मांग की  है . फांसी के बाद शहीद खुदीराम बोस का मुजफ्‌फरपुर के बर्निंगघाट पर अंतिम संस्कार किया गया था लेकिन उस स्थल पर शौचालय बना दिया गया है. इसी तरह किंग्सफोर्ड को जिस स्थल पर बम मारा गया था . उस स्थल पर मुर्गा काटने और बेचने का धंधा बेरोकटोक चल रहा है .  शहीदों के प्रति घोर अपमान का यह आपराधिक कृत्य बेहद निंदनीय है  . किशोर कुमार ने  राज्य सरकार से इस मामले को गंभीरता से लेने और शहीद खुदीराम बोस से जुडे ऐतिहासिक स्थलो को संरक्षित कर पर्यटक धरोहर और राजकीय स्मारक के रूप में विकसित करने की मांग की ताकि आने वाली पीढी इससे प्रेरणा ले. आजकल की पीढ़ी में उपेक्षा का भाव पैदा ना हो इसके लिए इस तरह की लापरवाहियों पर उचित ध्यान देते हुए एक राष्ट्रीय समिति गठित की जानी चाहिए . 



>सामान्‍यजीवने प्रयोगाय कानिचन् दैनिकवाक्‍यानि

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 अत्र केचन दैनिक प्रयोगाय वाक्‍यानि सन्ति। अवगमने सुविधा भवेत अत: एतेषाम हिन्‍दी अनुवाद: अपि दीयते।


संस्‍कृतं वदतु-                                                       संस्‍कृत बोलिये
नमो नम:-                                                            नमस्‍कार
नमस्‍कार:-                                                           नमस्‍कार
प्रणाम:-                                                                प्रणाम
धन्‍यवाद:-                                                             धन्‍यवाद
स्‍वागतम्-                                                            स्‍वागत है
क्षम्‍यताम्-                                                           क्षमा कीजिये
चिन्‍ता मास्‍तु-                                                      कोई बात नहीं, जाने दीजिये, चिन्‍ता मत कीजिये
कृपया-                                                                कृपा करके
पुन: मिलाम:-                                                       फिर मिलेंगे
अस्‍तु-                                                                  ठीक है
श्रीमन्, मान्‍यवर-                                                 श्रीमान, मान्‍यवर, महोदय
मान्‍ये-                                                                 श्रीमती जी
उत्‍तमम्, शोभनम्-                                              बहुत अच्‍छा
भवत: नाम किम्-                                               आपका क्‍या नाम है  पुलिंग
भवत्‍या: नाम किम्-                                            आपका क्‍या नाम है स्‍त्रीलिंग
मम नाम आनन्‍द:                                                मेरा नाम आनन्‍द है


इति

एतानि सन्ति कानिचन दैनिक वाक्‍यानि
येषाम् प्रयोग: वयं प्रतिदिनं बहुवारं कुर्म:।
अत: अद्य आरभ्‍य एव एतेषां दैनिक अभ्‍यास: करणीय:।
अग्रिम दिवसे अन्‍यानि कानिचन् वाक्‍यानि प्रेषयिष्‍यामि।
तावत् पर्यन्‍तं नमोनम: ।

साभार संस्‍कृतं वदतु पुस्‍तकात


भवदीय: आनन्‍द:
http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/


http://vivekanand-pandey.blogspot.com/

>अगर आप संस्‍कृत बोलना सीखना चाहते हैं तो

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सरल संस्‍कृत में वार्तालाप करना चाहते हैं
संस्‍कृत माध्‍यम से ही संस्‍कृत पढना चाहते हैं
संस्‍कृत क्षेत्र में रोजगार प्राप्‍त करना चाहते है
भाषा का परिष्‍कार करना चाहते है तो अब आपको कहीं भटकने की आवश्‍यकता नहीं है

संस्‍कृत भारती आपको उपरोक्‍त सभी चीजें उपलब्‍ध कराने में सहायक होगी
संस्‍कृत भारती के दो तरह के पाठ्यक्रम हैं जिनमें आप यथेष्‍ट भाग ग्रहण कर संस्‍कृत की शिक्षा प्राप्‍त कर सकते है।

पहला पाठ्यक्रम निशुल्‍क है। इसे आप अपने नजदीक के किसी भी संस्‍कृत भारती के कार्यालय पर 10 दिन अनवरत 2 घण्‍टे समय देकर प्राप्‍त कर सकते हैं।
इसमें आपको दश दिन तक साधारण भाषा की ही तरह संस्‍कृत भी बोलनी सिखाई जाती है
और दश दिन बाद आप असाधारण रूप से संस्‍कृत बोल सकेंगे।

दूसरी विधि सशुल्‍क है
इस पाठ्यक्रम को प्राप्‍त करने हेतु आपको संस्‍कृत भारती के नई दिल्‍ली स्थित संवादशाला में एक माह की शिक्षा दी जायेगी
यहां आप पूर्ण रूप से संस्‍कृत में पारंगत होकर निकलेंगे।

संस्‍कृत भारती की आजीवन निशुल्‍क सदस्‍यता भी ली जा सकती है

एक और उपयोगी जानकारी
6 जून 2010 से लखनउ में संस्‍कृत भारती का दश दिवसीय आवासीय वर्ग लगने जा रहा है।
इसमें प्रवेश का शुल्‍क 500 रूपये है। इसमें भाग लेकर भी आप सम्‍यक रूप से संस्‍कृत बोलने में समर्थ हो सकते हैं।
इस विषय में और अधिक जानने के लिये संस्‍कृत भारती के लखनउ कार्यक्षेत्र के अधिकारी श्री सुशील जी के पास फोन कर सकते हैं
उनकी दूरभाष संख्‍या 9454093250 है।
या फिर अवध क्षेत्र के संगठन मंत्री श्री प्रमोद जी 9598759203 के पास फोन कर सकते है।

शेष किसी सहायता के लिये टिप्‍पणी में लिखियेगा
आपकी संस्‍कृत विषयक श्रद्धा के लिये धन्‍यवाद

आपका- आनन्‍द
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