“बैप्टिज़्म सर्टिफ़िकेट” की वैधता और पोलैण्ड के राष्ट्रपति की मौत पर विज्ञापन : कुछ विशिष्ट संकेत…… Baptism Certificate Date of Birth Proof and Church

हाल ही में दो घटनाओं पर मेरी नज़र पड़ी और उन्हें पढ़कर मैं थोड़ा आश्चर्यचकित हूं, थोड़ा भ्रमित हूं और थोड़ा संशय की स्थिति में हूं। कृपया इन दोनों घटनाओं पर नज़र डालें और जो सवाल उठ रहे हैं, उनके जवाब देकर मेरा सामान्य ज्ञान बढ़ायें।

जैसा कि सभी जानते हैं भारत घोषित रूप से एक “सेकुलर” देश है। अमूमन हमारे यहाँ किसी “धर्म विशेष” को शासकीय तौर पर वरीयता देने की परम्परा और नियम नहीं हैं (हालांकि ऐसा सिर्फ़ कागज़ों में ही है, क्योंकि धर्म आधारित आरक्षण और पर्सनल लॉ, अब एक वास्तविकता बन चुकी है)। प्रस्तुत चित्र मुम्बई के मझगाँव डॉकयार्ड (बन्दरगाह) के मैनेजर द्वारा एक अभ्यर्थी को इंटरव्यू के बुलावे के लिये भेजे गये पत्र का है। यूँ तो यह एक सामान्य सा कॉल-लेटर है, लेकिन इसमें आवेदक को जन्म प्रमाण-पत्र पेश करने के लिये जो कालम लिखा है उसमें अन्य सभी “जन्म प्रमाण के सर्वमान्य प्रशासनिक दस्तावेजों” के अलावा “बैप्टिज़्म सर्टिफ़िकेट” का विकल्प भी रखा है।

हालांकि देश के कुछ (ईसाई बहुल) राज्यों में “बैप्टिज़्म सर्टिफ़िकेट” को जन्मप्रमाण पत्र के तौर पर आधिकारिक मान्यता प्राप्त है जैसे गोआ, मिजोरम और केरल आदि (शायद वहाँ इसी को सेकुलरिज़्म कहते होंगे), लेकिन चूंकि यह कॉल-लेटर मुम्बई के मझगाँव डॉक का है अतः मैं यह भी जानना चाहता हूं (कृपया मेरा ज्ञानवर्धन करें) कि –

1) क्या बैप्टिज़्म सर्टिफ़िकेट अब महाराष्ट्र में भी वैध है?

2) कहीं केन्द्र सरकार ने इसे अपनी आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र सूची में तो शामिल नहीं कर लिया है? (मझगाँव डॉकयार्ड केन्द्र सरकार के अधीन आता है)

3) यदि किया है तो कब से?

4) यदि नहीं, तो केन्द्र सरकार का एक विभाग ऐसा कॉल लेटर कैसे जारी कर सकता है?

5) यह “विशेष सुविधा” अन्य धर्मों के लोगों भी प्राप्त है या नहीं? (जैसे किसी मौलवी या किसी ग्रन्थी के हस्ताक्षरों द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र)

इस कॉल लेटर से कुछ सवाल उठना स्वाभाविक है –

1) क्या यह एक धर्मनिरपेक्ष देश की “राज्य व्यवस्था” में ईसाईयों के पक्ष में पक्षपात है?

2) क्या इस प्रकार की धार्मिक जन्म प्रमाण पत्र विधि को मान्य करना ईसाईयों को अतिरिक्त फ़ायदा नहीं देगी?

3) उस स्थिति में क्या होगा यदि नगरनिगम के जन्म प्रमाणपत्र अथवा हाईस्कूल मार्कशीट पर छपी जन्मतिथि एवं बैप्टिज़्म सर्टिफ़िकेट की तिथि अलग-अलग हो? (ऐसी स्थिति में किसे वरीयता दी जायेगी?) (इस सवाल की गम्भीरता समझने के लिये आगे यू-ट्यूब की वीडियो क्लिप भी देखें)

कुछ “खसके” हुए साम्प्रदायिक सवाल भी साथ-साथ खड़े होते हैं –

1) क्या इस प्रक्रिया से धर्मान्तरण में मदद नहीं मिलेगी? (एक अनाथ बच्चा पकड़ो, उसका बप्तिस्मा करो, एक ईसाई तैयार)

2) आदिवासी क्षेत्रों में जहाँ अनपढ़ लोग जन्म प्रमाण पत्र के बारे में जानते ही नहीं, वहाँ का स्थानीय पादरी उन्हें ताबड़तोड़ बैप्टिस्ट सर्टिफ़िकेट जारी करके ईसाई बना सकता है।

अब देखते हैं, कुछ समय पूर्व पत्रकार आशीष सारस्वत, नीरज सिंह और रोहित खन्ना द्वारा किया गया एक स्टिंग ऑपरेशन, जिसमें दिल्ली के पहाड़गंज स्थित ईदगाह बैप्टिस्ट चर्च के पादरी बेंजामिन दास एक फ़र्जी बैप्टिस्ट सर्टिफ़िकेट जारी करते हुए कैमरे पर पकड़े गये थे। इन पत्रकारों ने उन्हें कहा कि वे ईसाई हैं और उन्हें “बैक-डेट” में एक बैप्टिस्ट सर्टिफ़िकेट चाहिये। बेंजामिन दास ने उन्हें यह सर्टिफ़िकेट 15,000 रुपये में बेचा और चर्च के रजिस्टर में उन्हें उस चर्च का “सम्माननीय और पुराना सदस्य” भी दर्ज कर लिया।

इस वीडियो में पादरी साहब फ़रमाते हैं, “आजकल पैसे से हर काम करवाया जा सकता है, 2000 रुपये तो मैं एफ़िडेविट बनवाने के ले रहा हूं, और 13,000 मेरी फ़ीस होगी…”।

पत्रकारों की इस टीम ने फ़िर दिल्ली विश्वविद्यालय स्थित क्रिश्चियन कॉलोनी के होली गोस्पेल बैप्टिस्ट चर्च के फ़ादर हेनरिक जेम्स का स्टिंग ऑपरेशन किया, उसने भी बैप्टिस्म सर्टिफ़िकेट पैसा लेकर जारी कर दिया। यहाँ कारण बताया गया कि “हम मेरठ से आये हैं और वहाँ एक “प्रतिष्ठित मिशनरी स्कूल” में दाखिले के लिये बप्तिस्मा प्रमाण पत्र चाहिये”। यहाँ पर इस प्रकार का जन्म प्रमाण पत्र(?) उन्हें सस्ते में अर्थात सिर्फ़ 5000 में मिल गया। इसके बाद इस टीम ने क्रिश्चियन कॉलेज में एडमिशन के नाम पर असेम्बली ऑफ़ बिलीवर्स चर्च के पादरी सेसिल न्यूटन से भी एक ऐसा ही बैप्टिस्ट सर्टिफ़िकेट हासिल कर लिया। इस मामले में अधिक पैसा देना पड़ा क्योंकि फ़ादर सेसिल ने मजिस्ट्रेट का एक हस्ताक्षर युक्त सर्टिफ़िकेट भी साथ में दिया जिसमें यह घोषणा की गई थी कि यह तीनों पत्रकार स्वेच्छा से ईसाई धर्म अपना रहे हैं।

दूसरे वीडियो में रिपोर्टर कहते हैं – “मतलब आज से हम लोग क्रिश्चियन हो गये और आपने हमें बैप्टिस्ट सर्टिफ़िकेट दिया”। फ़ादर सेसिल कहते हैं – “हमें वकीलों को भी सेट करके रखना पड़ता है, वरना आप को इतनी आसानी से यह नहीं मिलता…”… फ़ादर सेसिल ने भी चर्च के रजिस्टर में इनकी सदस्यता पिछली तारीखों में दर्शाई।

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि “एक गैर-सरकारी और धार्मिक संस्था” द्वारा जारी किया गया जन्म प्रमाण पत्र आधिकारिक क्यों होना चाहिये? क्या ऐसे फ़र्जी प्रमाण-पत्रों को शासकीय दस्तावेज का दर्जा दिया जा सकता है? और वह भी एक “सेकुलर” राज्य में?

जिस किसी सज्जन को इस बारे में जो भी आधिकारिक जानकारी उपलब्ध हो वह टिप्पणी के माध्यम से प्रदर्शित करे, ताकि लोगों को सही स्थिति की जानकारी मिल सके। क्या जीवन बीमा करते समय “आयु-प्रमाण” के लिये भी “बैप्टिस्ट सर्टिफ़िकेट” को मान्य किया जाता है? यदि यह सही है, तो क्या यह बीमा कम्पनियों के लिये एक खतरे का संकेत नहीं है? साथ ही कृपया ऐसे सभी सरकारी (केन्द्रीय और राज्य) विभागों और संस्थाओं की सूची बनायें जो बैप्टिस्ट सर्टिफ़िकेट को मान्य करते हैं… ताकि उचित मंच से इस पर विरोध दर्ज किया जा सके।

सीएनएन-आईबीएन की वेबसाईट पर नकली प्रमाणपत्र बेचने के इस गोरखधंधे का भण्डाफ़ोड़ किया जा चुका है…
इसे देखें… http://18b882d9.linkbucks.com

यह है यू-ट्यूब की लिंक जिसमें बप्तिस्मा प्रमाणपत्र पैसा लेकर दिया जा रहा है-

http://www.youtube.com/watch?v=nkomR3ndjfg

बप्तिस्मा सर्टिफ़िकेट बेचने का एक और वीडियो…

http://www.youtube.com/watch?v=5S0sx1cmSck&feature=related

अब एक अन्य घटना देखिये :- पोलैण्ड के राष्ट्रपति की हाल ही में एक हवाई दुर्घटना में मौत हुई, इधर दिल्ली में “सेक्रेड हार्ट कैथेड्रल” द्वारा टाइम्स ऑफ़ इंडिया अखबार में एक विज्ञापन प्रकाशित करवा कर दिवंगतों को श्रद्धांजलि देने का कार्यक्रम (15 अप्रैल 2010) आयोजित किया गया। विज्ञापन में कहा गया है कि पोलैण्ड के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी के हवाई दुर्घटना में हुए दुखद निधन पर गहरा शोक हुआ है अतः आर्चबिशप विन्सेण्ट माइकल एक शोकसभा लेंगे। ठीक इसी प्रकार “सेमुअल” राजशेखर रेड्डी के हवाई दुर्घटना में मारे जाने पर मुम्बई सहित अनेक शहरों के चर्चों ने शोकसभा आयोजित की थी (तो क्या सिंधिया, जीएमसी बालयोगी आदि कांग्रेसी नेता सड़क दुर्घटना में मारे गये थे? और हाल ही में माओवादियों द्वारा 76 सैनिकों की हत्या पर तो इस चर्च ने कोई शोकसभा आयोजित नही की…)। शायद “Deepest sense of grief” तथा “Most Terrible Tragedies” जैसे वाक्य कुछ “खास” लोगों के लिये ही आरक्षित हैं।

अब बताईये…… राष्ट्रपति हैं पोलैण्ड के, निधन हुआ रूस में और उनकी शोकसभा दिल्ली में? क्यों? कोई औचित्य दिखता है? नहीं ना… अब आपके दिमाग की कोई घण्टी बजी? बजेगी, बजेगी जरूर बजेगी… थोड़ा दिमाग पर जोर लगाईये, तथा “भारत के सेकुलर मीडिया” की भाण्डनुमा (सानिया मिर्ज़ा-थरूर) खबरों से अपना ध्यान हटाईये… सब साफ़-साफ़ दिखने लगेगा।

वीडियोकॉन मोबाइल के विज्ञापन में कहा जाता है, “सिग्नल पकड़ो और समझो…” मैं भी यही कह रहा हूं… बिना किसी वजह के हुए हैदराबाद के दंगे, बरेली में मोहम्मद साहब का जन्मदिन बीत जाने के बावजूद होली के अवसर पर जुलूस एक खास मोहल्ले से निकालने की जिद करना, पोलैण्ड के राष्ट्रपति के निधन पर भारत के अखबारों में शोक विज्ञापन, नित्यानन्द स्वामी जैसे मामलों को जमकर उछालना और चर्च के बाल यौन शोषण को चुपके से दबा देना, तमिलनाडु और उड़ीसा में काम कर रहे NGO को मिलने वाले विदेशी अनुदान में अचानक दोगुनी बढ़ोतरी… जैसे सैकड़ों “सिग्नल” लगातार मिल रहे हैं, यदि अपनी अगली पीढ़ी को सुरक्षित देखना चाहते हों, तो सिर्फ़ “एंटीना” सही रखकर इन सिग्नलों को पकड़ने की क्षमता विकसित कीजिये…। मैं तो बहुत मामूली आदमी हूँ, सिर्फ़ इधर-उधर फ़ैले “सिग्नल” पकड़कर, आप तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा हूं, अब यह आप पर निर्भर है कि आप कब तक “तथाकथित सेकुलर” बने रहते हैं। और हाँ… बातों-बातों में वो जन्म प्रमाणपत्र वाले कुछ सवाल भूल न जाईयेगा…

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23 Comments

  1. April 19, 2010 at 9:04 am

    सिग्लन पकड़ लिया, अब क्या होगा? कुछ नहीं होगा.दूर्भाग्य से कोई अवतारी आने वाला नहीं है. सर्वधर्म समभाव बहुत अच्छी बात है मगर अपने अस्तित्त्व के लिए सजग न रहना कायरता है, अपराध है. अद्भुत और मानने में न आए ऐसा किस्सा है.

  2. April 19, 2010 at 9:05 am

    इटलीबेटी-भारतमाता की जय ! आगे-आगे देखते जाइए होता है क्या ? एक और गुलामी की प्रस्तावना बहुत पहले से लिखी जानी शुरू हो चुकी है !

  3. kunwarji's said,

    April 19, 2010 at 9:35 am

    धन्यवाद सुरेश जी,इस बारे में जानकारी देने के लिए!सरकारी नौकरी के लिए निर्धारित उम्र निकल ही गयी थी,लेकिन अब उम्मीद फिर से जग गयी है! कुंवर जी,

  4. April 19, 2010 at 10:01 am

    सिग्नल तो एकदम साफ़ है, इधर देश में राम राज्य का खात्मा और फिर बस इटली की महारानी वाला रोम राज्य है, बहुसंख्यको का छिकना भी गुनाह और बाकि लोग अगर खून भी करे तो भी माफ है. आरक्षण, तुष्टिकरण, पर्सोनल ला आदि देश पर अभिशाप है और ये देश चलाने वाले जो कुछ भी कर रहे है वो सब सत्यानाश है. बस साहब सिग्नल तो एकदम साफ़ है.

  5. April 19, 2010 at 11:56 am

    सुरेश जी, सिग्नल कहाँ से आएगा, अब तो टावर भी सीज होने लगे हैं……. फिर सारे सिग्नल तो VSNL (वाया सोनिया नेहरु लिमिटेड) के THROUGH ही आते हैं.वैसे आने वाली पीढ़ियों का ठेठ देसी इंतजाम मैंने बहुत पहले ही खोज लिया है और इसीलिए शादी नहीं की है 🙂 🙂

  6. April 19, 2010 at 12:27 pm

    सही सिगनल को पकड़ने की आवश्यकता शर्मनिरपेक्ष बकाउओं एवं लिक्खाड़ों को है। वैसे पकड़ें भी तो कैसे पकड़ें?? ऐसे सिगनल उनका दिमागी मोबाइल कैच ही नहीं करता। उनका तो स्वार्थ मार्क्स-लेनिन कम्युनिकेशंस, माओ & संन्स लिमिटेड जैसों के ही उपभोक्ता बने रहने में है।

  7. April 19, 2010 at 12:30 pm

    सुरेश जी सर भांड और ढोली बने मीडिया के अल्ट्रा वोइलेट सिग्नल झुलसाने वाले हे लेकिन सर एक बात तो हे ..ये विसुअल मिडिया के पागल कुते की जेसे घूमने वाले रिपोर्टर क्या कारे ..असली (likol,s) भेडिये तो एडित्टर हे ….ये साले मिलावटी खून के नशे किओलादे सुधरेंगे थोड़े ही …पीढियों की जिन्दगी बनाने के चक्कर में उन्हें खतम करने पर तूले हुए हे ..ये नैन सुख ..सर इनको तो नशे किओवर doge दे कर हमेशा के लिए सूला देना चाहिए …मदर के चोद ….3rd page की गंदगी

  8. April 19, 2010 at 12:44 pm

    प्रिय सुरेश,लगभग सारा अलेख तथ्यों पर आधारित है. मेरा अनुमोदन स्वीकार करें. एक तथ्यात्मक गलती है जिसके बारे में बता दूँ. बप्तीस्मा या जलसंस्कार ईसाई समाज में एक महत्वपूर्ण संस्कार है. इस कार्य के समय जो सर्टिफिकेट दिया जाता था, उसे ब्रिटिश काल में काफी मान्यता मिलती थी. आज भी कई भारतीय दफ्तर ब्रिटिश काल के नियमों के अंतर्गत इस सर्टिफिकेट का मान्यता देते हैं. दर असल दो बातों का होना जरूरी है:1. ब्रिटिश जमाने के सारे नियम बदल कर उनको आजाद-भारत के हिसाब से पुन: बनाया जाये.2. धर्म और भाषा के आधार पर आजादी देने के बदले हर भारतीय के लिये एक ही नियम और कानून हो.लिखते रहो. असर जरूर होगा!सस्नेह — शास्त्रीहिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती हैhttp://www.IndianCoins.Org

  9. April 19, 2010 at 1:09 pm

    यहीं पर राजनीतिबाजों की धूर्तता और हमारे जैसे हिन्दुओं की बेवकूफी सामने आ जाती है. मेरे जैसे लोग जानबूझकर आंखें मूंद लेते हैं जो इतिहास से सबक नहीं लेता इतिहास उसे सबक लेने लायक नहीं छोड़ता..

  10. vedvyathit said,

    April 19, 2010 at 2:44 pm

    is desh me hindoon ko chhod kr sb ko vishadhikar hain n to hindoo ko shrm aa rhi hai n hi use koi hya hai hindoo ko jaagna hi hoga aap ko bdhai dr. ved vyathit

  11. April 19, 2010 at 5:05 pm

    लगता है कि सबको सिंहपुरी का शेर बनाना होगा नहीं तो ऐसा ही चलता रहेगा।सिग्नल पकड़ना ही होगा ।

  12. April 20, 2010 at 4:48 am

    शास्त्रीजी की बात को दोहराऊँगा, "धर्म और भाषा के आधार पर आजादी देने के बदले हर भारतीय के लिये एक ही नियम और कानून हो." हम एक देश है, फिर निमय कायदे दो क्यों?

  13. April 20, 2010 at 6:48 am

    सिग्नल तो साफ़ रिसीव हो रहा है. या तो डेवाईस बंद करना होगा या सही उपाय करना होगा.Shastri JC Philip जी के बात से सहमत.

  14. April 20, 2010 at 7:30 am

    good investigation or i should say good observation in the interest of country and hindu countryman.sonia is doing her mission successfully. next 4 years too for her to execute here hidden agenda.parshuram27.blogspot.com/

  15. Dheeraj said,

    April 20, 2010 at 10:47 am

    Suresh ji bahut janakari ke liye dhnyavad aap bahut achcha kam kar rahe hai

  16. April 20, 2010 at 3:04 pm

    आदरणीय सुरेश जी, पता नहीं हमारे देश के लोग श्रद्धेय शास्त्री जी, फिरदौस और महफूज जी जैसे आदर्शों को अपना रोल माडल क्यों नहीं स्वीकारते.. इस पर भी गहन विचार करने की आवश्यकता है.. और कैसे अल्पसंख्यकों को इस निमित्त प्रेरित किया जाये, यह भी बहुत आवश्यक है.

  17. April 20, 2010 at 4:26 pm

    आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है. आशा है हमारे चर्चा स्तम्भ से आपका हौसला बढेगा.

  18. shanki said,

    April 21, 2010 at 6:44 am

    @ भारतीय नागरिक – गन्दी हरकत से जो आज़िज़ आ जाये क्‍या वह रोल माडल हो सकते हैं? यह कैसा रोल माडल है फ़िरदौस ख़ान २१ अप्रैल २०१० १२:२१ AM ?? जी, कई 'असामाजिक तत्व' हमारे नाम से अपने ही ब्लॉग में कमेन्ट लिख रहे हैं… और उस पर क्लिक करने पर हमारा ब्लॉग खुलता है…हम इन 'असामाजिक तत्वों' के ब्लॉग का बहिष्कार कर चुके हैं…हम न तो उनके ब्लॉग पर कोई कमेन्ट लिखते हैं और न ही अपने ब्लॉग पर इन 'असामाजिक तत्वों' के कमेन्ट प्रकाशित करते हैं…क्या आप इस पर रौशनी डाल सकते हैं… कि यह सब कैसे क्या जा रहा है…?यक़ीन मानिए, इस जानकारी से बहुत लोगों को फायदा होगा, जो 'असामाजिक तत्वों' की इस गन्दी हरकत से आज़िज़ आ चुके हैं…

  19. April 21, 2010 at 7:56 am

    सेक्युलरिज्म छोड़ कर साम्प्रदायिक बन जाने की पुकार छोड़कर बाकी तथ्यों का उद्घाटन सराहनीय है। इस तरह की हरकतों को केवल एक सच्ची सेक्युलर स्टेट ही दूर कर सकती है धर्म के बदमाश तो केवल नाम बदल कर नित्यानन्द आदि ही होते हैं जब तक इनको कठोरतन दण्ड नहीं मिलता तब तक तो ये नागरिकों पर जीपें चड़ाते रहेंगे।

  20. April 21, 2010 at 8:17 am

    @ वीरेन्द्र जैन साहब – "…एक सच्ची सेक्युलर स्टेट…" यह किस चिड़िया का नाम है और कहाँ पाई जाती है? "भारत सरकार" का नाम न लीजियेगा सर, 60 साल में सैकड़ों बार देख चुके हैं कि "सेकुलरिज़्म" का क्या और कैसा हश्र हुआ है…।

  21. April 21, 2010 at 8:20 am

    @ वीरेन्द्र जैन जी आप का मै फ़ैन हो गया, कौन सा चवन्प्राश खाते हो ???

  22. Dhananjay said,

    April 21, 2010 at 2:27 pm

    @ वीरेन्द्र जैन साहबबड़ी दूर की कौड़ी लाये हैं ज़नाब. सच्ची सेक्युलर स्टेट!! वाह! वाह!! सुडो सेक्युलर स्टेट होने से हिंदुओं का ये हाल है तो शौचिये (वर्ण अशुद्धि नहीं है) सच्ची सेक्युलर स्टेट में हिंदुओं का क्या होगा. और तब आप जैसे सकुलर कहाँ जायेंगे, ये भी शौचिये. आप को तो भगवा वाले रावण लगते हैं (http://virendrajaindatiawala.blogspot.com/2010/02/blog-post.html). और ये जो ऐ के ४७ वालें हैं वो लगता है आपके सगे वाले हैं.

  23. April 21, 2010 at 2:43 pm

    जैन साहब को ब्लडटेस्ट करवाना चाहिये… अति गूड मीठे के शिकार मालूम पडते है !


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