>माया की माया

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माया की माया अपरम्पार है. इनके प्रशंसक इनके गलत कामों में भी अच्छाई ढूढ़ लेते हैं. एसी रूम या न्यूज़ चैनल के दफ्तर में बैठ कर माया का गुणगान करने वाले जमीनी हकीकत से उतने वाकिफ नहीं होते जितनी वे बातें करते हैं.

माया की मायागिरी ने कानपुर की मस्तमौला छवि को बहुत ठेस पहुँचायी है. मायावती को हर वो काम करने में खुशी हासिल होती है, जिसके करने से उन्हें व्यक्तिगत लाभ हो और साथ ही उनके समर्थक उनके जयकारे लगाएं। आम लोगों की परेशानियां से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। शहर बिजली और पानी की कमी से त्रस्त है, पर मज़ाल है कि प्रशासन के कान में जूँ तक रेंग जाए. प्रशासन अपने उच्चाधिकारियों को खुश करने के लिए आँकड़ों से खेलता है इसलिए पेपर में बिजली कटौती सिर्फ आठ घंटे दिखाई जाती है, जो हकीकत से परे है. कानपुर के पिछले प्रवास ने मेरी नींद ही उड़ा दी. पता नहीं कौन बुद्धिमान व्यक्ति बिजली कटौती का वक्त निर्धारित करता, वो जो भी होगा, मुफ्त की बिजली का उपभोग कर रहा होगा और बिजली उसके यहां से न जाए इसकी व्यवस्था भी उसने पूरी तरह कर रखी होगी, इसीलिए वह आम लोगों की समस्याओं को समझ नहीं पाता।

शहर में बिजली संकट बेकाबू हो चुका है. बिजली कटौती का कोई निर्धारित समय नहीं है. जब बत्ती की सबसे ज्यादा जरूरत होती, तब घंटों के लिए लाइट चली जाती है. इस भीषण गरमी में 12 से 14 घंटे बिजली के गायब रहने से लोग परेशान हैं. बिजली कटौती के अलावा फाल्ट और ब्रेक डाउन के कारण भी घंटों बिजली गायब रहती है. सबसे ज्यादा उलझन तो तब होती है, जब रात के ठीक बारह बजे बिजली गुल हो जाती है जो फिर सुबह ही आती है.

औद्योगिक क्षेत्र की हालत तो और भी खराब है यहां रात में छह घंटे की बिजली की कटौती शुरू होने के साथ, पावर के रेट भी बढ़ा दिए गए हैं. पावर रोस्टिंग से रात की शिफ्ट में फैक्ट्रियां बंद करना मजबूरी हो गई है. इससे मजदूरों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो गया.

केस्को के शहर में तकीब 72 सब स्टेसन और 3323 ट्रांसफ्र्मर हैं. इनके जरिए ही केस्को 3.90 लाख डोमेस्टिक, 86 हजार कामर्शियल, 9 हजार हैवी वावर कंज्यूमर्स, 9 हजार हैवीपावर कंज्यूमर्स तक बिजली पहुँचाता है, लेकिन केस्को की लाइने बेहद जर्जर होने के कारण आए दिन टूट जाती हैं. जम्फर और ट्रंसफार्मर के फ्यूज उड़ना आम बात है. यही हाल ट्रंसफार्मर का है. इसमें ऑयल ही नही, लोड, सिलिका, अर्थिंग आदि जरूरी प्वाइंट को चेक करने भी केस्को लापरवाही बरतता है.

जैसा की मैंने पहले भी कहा की कि माया की माया निराली है. उसे हर कोई नहीं समझ सकता. उनके पास आम जनता को देने के लिए बिजली नहीं है परंतु बुतों को प्रकाशमान रखने के लिए पर्याप्त बिजली है.

इतनी भायनक गरमी में बिजली न आने से लोग बीमार हो हे हैं. छोटे बच्चे गरमी के कारण रात भर रोते रहते हैं तथा स्कूल जाने वाले बच्चे, अपने स्कूल की वैन, बस, रिक्शे या क्लासरूम में अपनी नींद पूरी करते हैं.

कानून व्यवस्था के कहने ही क्या? सड़कों पर अँधेरा छाया रहने के कारण चोर-उचक्कों को राम-राज्य मिल गया है. पुलिस इतनी निकम्मी है कि चार माह की बच्ची के बालात्कारी को लोग इस आशा से पकड़ कर पुलिस के हवाले करते हैं कि वह उस पर कठोर कारर्वाई करेगी, पर पुलिस पैसे देकर मामला रफा-दफा कर देती है.

आपने सुना होगा कि मायावती बुतों की सुरक्षा के लिए एक फोर्स बना रही हैं. इस फोर्स में रिटायर्ड सैनिकों की भरती की जाएगी, ताकि प्रदेश के अराजक तत्त्वों से उनकी रक्षा की जा सके. इन सब कामों के लिए उनके पास पर्याप्त धन है, लेकिन बच्चो की शिक्षा के लिए उनके पास धन नहीं है. मायावती बहुत दूरदर्शी है, उन्हें पता है कि बच्चो को साक्षर बनाने से उन्हें कोई लाभ नहीं है. साक्षरता सोचने समझने की ताकत देती है और उन्हें अपने अधिकारों का ज्ञान कराती है, ऐसी स्थिति में वे सरकार से उसके कामकाज को लेकर प्रति प्रश्न कर सकते हैं। अक्सर देखा गया है कि जब जनता सरकार से प्रति-प्रश्न करती है तो प्रायः सत्ता की चूले हिलने लगती हैं, इसलिए जनता को मूढ़ बनाए रखने में ही सत्ता की भलाई होती है और मयावती वही कर रही हैं लेकिन ऐसा करते हुए वह भूल रही हैं कि इस तरह वे अनपढ़ लोगों की अराजक फौज को जन्म देने जा रही है.

मुलायम और मायावती के शासन ने कानपुर की जनता को काफी हद तक स्वालंबी बना दिया है क्योंकि लाइट कम आती है तो घर-घर में इन्वर्टर आ गए हैं. पानी के लिए भी वे सरकार पर ज्यादा निर्भर नहीं है (खासकर जो नई बस्तियां बनी हैं) हर घर में हैंडपाइप है, मोटर लगी है, जैसे ही बिजली आती है, लोग पानी भरने के लिए दौड़ पड़तें है। नहीं तो हैंडपम्प तो है ही। इसलिए यहां इस बात का कोई चिंतन नहीं है की सरकार पानी देती है या नहीं, लेकिन उन इलाको में जहां पानी की सप्लाई सरकार द्वारा की जाती है हालत बहुत खराब है. लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। और पानी के लिए झगड़ा होना आम बात है।

पानी और बिजली से संबंधित एक बड़ा रोचक तथ्य है कि पानी नहीं आता पर वाटर टैक्स आता है. इसी तरह शहर के बिजली चोरों के कारण सरकार को जो राजस्व की हानि होती है उसका हरजाना नियमित रूप से बिजली का बिल भरने वालों से वसूला जाता है. वैसे कानपुर के बारे में बहुजन समाजवादी पार्टी की राय कम रोचक नहीं है, वे कहते हैं कि जब कानपुर के लोगों ने हमें एक भी सांसद और विधायक नहीं दिया है तो हम उनके विकास पर क्यों ध्यान दें?

मायावती को समझना चाहिए कि वे सिर्फ दलित वोटों से जीत कर सत्ता में नहीं आई है. उनको जिताने में सभी जाति और धर्म के लोगों का हाथ है. जनता ने उन्हें स्पष्ट बहुमत इसलिए दिया था ताकि प्रदेश का विकास सुचारु रूप से हो सके न की प्रदेश के विकास को दरकिनार कर सारा पैसा बुतों की तामीर में खर्च कर दिया जाए. अभी भी समय है यदि सरकार चेत जाए तो प्रदेश का भविष्य बदल सकता है।

-प्रतिभा वाजपेयी.

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