>तू मेरे गोकुल का कान्हा, मैं हूं तेरी राधा रानी…-फ़िरदौस ख़ान

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जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है… इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना… क्योंकि इश्क़ तो ‘उससे’ हुआ है…उसकी ज़ात (अस्तित्व) से हुआ है… उस ‘महबूब’ से जो सिर्फ़ ‘जिस्म’ नहीं है… वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है… इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है… इश्क़ में रूहानियत होती है… इश्क़, बस इश्क़ होता है… किसी इंसान से हो या ख़ुदा से…

अगर इंसान अल्लाह या ईश्वर से इश्क़ करे तो… फिर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि किसी मस्जिद में नमाज़ पढ़कर उसकी इबादत की है… या फिर किसी मन्दिर में पूजा करके उसे याद किया है…
एक गीत
तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
राधा कुंज भवन में जैसे
सीता खड़ी हुई उपवन में
खड़ी हुई थी सदियों से मैं
थाल सजाकर मन-आंगन में
जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
तड़प रही थी मन की मीरा
महा मिलन के जल की प्यासी
प्रीतम तुम ही मेरे काबा
मेरी मथुरा, मेरी काशी
छुआ तुम्हारा हाथ, हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
रोम-रोम में होंठ तुम्हारे
टांक गए अनबूझ कहानी
तू मेरे गोकुल का कान्हा
मैं हूं तेरी राधा रानी
देह हुई वृंदावन, मन में सपनों की बरसात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
सोने जैसे दिवस हो गए
लगती हैं चांदी-सी रातें
सपने सूरज जैसे चमके
चन्दन वन-सी महकी रातें
मरना अब आसान, ज़िन्दगी प्यारी-सी सौगात ही गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
-फ़िरदौस ख़ान

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