नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में मुसलमानों पर इतने अत्याचार किये कि मनमोहन सिंह ने खुश होकर उन्हें ईनाम दे दिया… … Narendra Modi, Muslims in Gujarat, Planning Commission

मुझे पता है कि शीर्षक पढ़कर आप चौंकेंगे, लेकिन यह सच है। गुजरात से बाहर रहने वाले मुस्लिम सोचते होंगे, कि पता नहीं गुजरात में नरेन्द्र मोदी नाम का आदमी उनकी कौम पर कितने ज़ुल्म ढाता होगा और तीस्ता “जावेद” सीतलवाड जैसी समाजसुधारिका(?) तथा राजदीप और “बुरका” दत्त जैसे स्वनामधन्य(?) पत्रकार दिन-रात जिस खलनायक(?) को गरियाते हुए नहीं थकते, पता नहीं संघ-भाजपा यह व्यक्ति गुजरात में मुस्लिमों पर कितने अत्याचार करता होगा।

लेकिन अब समूचे भारत के नकली सेकुलरों और फ़र्जी लाल झण्डे वालों को यह सुनकर बड़ा दुख होगा कि योजना आयोग ने गुजरात के मुख्यमंत्री के कार्यों से खुश होकर गुजरात के योजना व्यय को बढ़ाकर 30,000 करोड़ रुपये कर दिया है, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 6,500 करोड़ रुपये ज्यादा है… अर्थात गुजरात की 50वीं वर्षगाँठ पर उसे लगभग 25% का अतिरिक्त पैकेज दिया गया है। ऐसा नहीं कि यह सब इतनी आसानी से मिल गया, इसके लिये नरेन्द्र मोदी ने गुहार लगाई और प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा, वरना योजना आयोग की सदस्या मैडम सईदा हमीद ने “गुजरात में मुस्लिमों से भेदभाव” का बहाना बनाकर इसमें अड़ंगे लगाने की भरपूर कोशिशें कर ली थीं, यह मैडम पूर्व में जब राष्ट्रीय महिला आयोग में थीं तब भी इन्होंने गुजरात की योजनाओं में काफ़ी टंगड़ी मारी थी।

http://www.narendramodi.in/news/news_detail/733

गत दिनों योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया और नरेन्द्र मोदी की बैठक के बाद पत्रकारों से मुखातिब होते हुए अहलूवालिया ने कहा कि “गुजरात योजना व्यय में हुई इस बढ़ोतरी का हकदार भी है और वह इस विशाल व्यय को झेलने की क्षमता भी रखता है…”। मोंटेक ने आगे बताया कि गुजरात का राजस्व गत वर्ष के 74% से बढ़कर 81% हो गया है तथा VAT कलेक्शन में 42% की जबरदस्त उछाल आई है। हाल ही में राज्य विधानसभा ने “स्वर्णिम गुजरात” योजना के तहत उत्तरी गुजरात में 500 मेगावाट बिजली उत्पादन करने वाला एक सौर ऊर्जा प्लाण्ट लगाने, 82 तहसीलों में अंडरग्राउण्ड सीवेज लाइन बिछाने की बड़ी योजना पर काम शुरु करने को हरी झण्डी दे दी है।

(जब देश में चारों तरफ़ एक से बढ़कर एक निकम्मे मुख्यमंत्री और लुटेरे IAS अफ़सरों की गैंग, भारत के विकास में अड़ंगे लगाती दिखाई देती है ऐसे में पिछले 10 साल से गुजरात की भलाई हेतु अनथक काम करता नरेन्द्र मोदी नामक यह राष्ट्रवाद का योद्धा सहज ही ध्यान आकर्षित कर लेता है…)

इसी के साथ केन्द्र सरकार ने सरदार सरोवर से सम्बन्धित 39240 करोड़ रुपये के संशोधित योजना व्यय को भी मंजूरी दे दी। अब कांग्रेस का अदभुत विकास और गरीबों का साथ देखिये – कच्छ और सौराष्ट्र के ढाई करोड़ लोगों के पेयजल के लिये इस योजना को 1986-87 में बनाया गया था, तब अनुमान था कि इसकी लागत 6406 करोड़ रुपये होगी, लेकिन राजनीति, श्रेय लेने की होड़ (योजना का नाम किसी गाँधी के नाम पर करने) तथा लालफ़ीताशाही ने 23 साल में भी इसे पूरा होने नहीं दिया और अब इसकी लागत बढ़कर 39240 करोड़ रुपये हो गई है। (अंग्रेजी में “PRO” का विपरीत शब्द होता है “CON”, इसलिये कोई आश्चर्य नहीं कि “PROGRESS” का उलटा होता है “CONGRESS”……)

http://www.livemint.com/2010/05/27231219/Gujarat-to-get-more-funds-afte.html?d=1

चलिये आईये अब देखते हैं कि आखिर गुजरात में मोदी ने मुसलमानों पर कौन-कौन से अत्याचार किये हैं, जिसका ईनाम उन्हें मिला है –

पेश किये जा रहे आँकड़े और तथ्य मनगढ़न्त नहीं हैं, बल्कि केन्द्र सरकार द्वारा गठित सच्चर कमीशन की रिपोर्ट में से लिये गये हैं। जी हाँ, “गुजरात में मुस्लिमों पर इतने ज़ुल्म ढाये गये हैं कि गुजरात के मुसलमान देश के बाकी सभी हिस्सों के मुसलमानों के मुकाबले शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के मामले में आगे निकल गये हैं…”।

1) गुजरात में मुस्लिमों का साक्षरता प्रतिशत 73%, जबकि बाकी देश में 59%।

2) ग्रामीण गुजरात में मुस्लिम लड़कियों की साक्षरता दर 57%, बाकी देश में 43%।

3) गुजरात में प्राथमिक शाला पास किये हुए मुस्लिम 74%, जबकि देश में 60%।

4) गुजरात में हायर सेकण्डरी पास किये मुस्लिमों का प्रतिशत 45%, देश में 40%।

शिक्षा सम्बन्धी सारे के सारे आँकड़े मुस्लिम हितों की कथित पैरवी करने वाले, मुस्लिम हितैषी(?) पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश और बिहार से कोसों आगे हैं।

1) गुजरात के जिन गाँवों में मुस्लिम आबादी 2000 से अधिक है वहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र की उपलब्धता है 89%, जबकि बाकी देश में 70%।

2) जिन गाँवों में मुस्लिम आबादी 1000 से 2000 के बीच है वहाँ स्वास्थ्य केन्द्र का प्रतिशत 66% है, जबकि देश का औसत है 43%।

3) जिन गाँवों में मुस्लिम आबादी 1000 से कम है वहाँ 53%, राष्ट्रीय औसत है सिर्फ़ 20%।

शायद राहुल गाँधी आपको बतायेंगे, कि उनके पुरखों ने बीते 60 साल में, भारत के ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने के लिये कितने महान कार्य किये हैं।

1) गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिमों की प्रति व्यक्ति आय 668 रुपये हैं, पश्चिम बंगाल में 501, आंध्रप्रदेश में 610, उत्तरप्रदेश में 509, मध्यप्रदेश में 475 और मीडिया के दुलारे जोकर यानी लालू द्वारा बर्बाद किये गये बिहार में 400 रुपये से भी कम।

2) गुजरात के शहरों में भी मुस्लिमों की बढ़ती आर्थिक सम्पन्नता इसी से प्रदर्शित होती है कि गुजराती मुस्लिमों के बैंक अकाउंट में औसत 32,932 रुपये की राशि है, जबकि यही औसत पश्चिम बंगाल में 13824/- तथा आसाम में 26,319/- है।

“लाल झण्डे वाले बन्दर” हों या “पंजा छाप लुटेरे’, इनकी राजनीति, रोजी-रोटी-कुर्सी इसी बात से चलती है कि किस तरह से भारत की जनता को अधिक से अधिक समय तक गरीब और अशिक्षित बनाये रखा जाये। क्योंकि उन्हें पता है कि जिस दिन जनता शिक्षित, समझदार और आत्मनिर्भर हो जायेगी, उसी दिन “लाल झण्डा” और “परिवार की चमचागिरी” दोनों को ज़मीन में दफ़ना दिया जायेगा। इसीलिये ये दोनों शक्तियाँ मीडिया को पैसा खिलाकर या उनके हित साधकर अपने पक्ष में बनाये रखती है, और नरेन्द्र मोदी जैसों के खिलाफ़ “एक बिन्दु आलोचना अभियान” सतत चलाये रखती हैं, हिन्दू आराध्य देवताओं, हिन्दू धर्मरक्षकों, संतों और शंकराचार्यों के विरुद्ध एक योजनाबद्ध घृणा अभियान चलाया जाता है, लेकिन जब गुजरात सम्बन्धी (उन्हीं की सरकार द्वारा गठित टीमों द्वारा पाये गये) आँकड़े और तथ्य उन्हें बताये जाते हैं तो वे बगलें झाँकने लगते हैं। ढीठता और बेशर्मी से बात तो ऐसे करते हैं मानो भारत के इतिहास में सिर्फ़ गुजरात में ही दंगे हुए, न पहले कभी कहीं हुए, न अब कभी होंगे

गुजरात के विकास के लिये नरेन्द्र मोदी को क्रेडिट देते समय मीडिया वालों का मुँह ऐसा हो जाता है, मानो उन्हें किसी ने उन्हें अरंडी के बीज का तेल पिला दिया हो। तीन-तीन चुनाव जीते हुए, दस साल से एक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे किसी व्यक्ति के खिलाफ़ इतिहास में आज तक कभी ऐसी उपेक्षा-अपमान-आलोचना नहीं आई होगी, न तो 15 साल में बिहार को चरने वाले लालू के… न ही दस साल राज करके मध्यप्रदेश को अंधेरे में धकेलने वाले दिग्गी राजा के…, परन्तु नरेन्द्र मोदी की गलती सिर्फ़ एक ही है (और आजकल यही सबसे बड़ी गलती भी मानी जाती है) कि वे हिन्दुत्ववादी-राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ हैं। मजे की बात तो यह है कि गुजरात के इन नतीजों के बावजूद सच्चर कमेटी ने मुसलमानों को पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की सिफ़ारिश कर दी है, जबकि सच्चर साहब को केन्द्र सरकार से सिफ़ारिश करना चाहिये थी कि नरेन्द्र मोदी के “थोड़े से गुण” देश के बाकी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केन्द्रीय मंत्रियों के दिमागों में भरे जायें…

बहरहाल, मुझे डर है कि योजना आयोग द्वारा गुजरात की तारीफ़ तथा इस शानदार बोनस और प्रमोशन के कारण कहीं मनमोहन सिंह अपनी “नौकरी” न खो बैठें। जी हाँ नौकरी… क्योंकि वैसे भी वे आजीवन “यस-मैन” ही रहे हैं, कभी रिजर्व बैंक के, कभी वित्त मंत्रालय के, कभी IMF के, कभी विश्व बैंक के… और अब “भरत” की तरह खड़ाऊं लिये तैयार बैठे हैं कि कब “राहुल बाबा” आयें और उन्हें रिटायर करें…

सन्दर्भ : http://www.indianexpress.com/news/hard-facts-to-face/622193/1

Narendra Modi Lion of Gujrat, Narendra Modi and Discrimination with Muslims in Gujrat, Development in Gujarat and Muslims, Sachchar Commission and Muslim Reservation, Prosperity of Muslims in Gujarat, Manmohan Singh and World Bank, Muslim appeasement and Secularism, Social and Financial Problems of Muslims in India, नरेन्द्र मोदी और गुजरात, नरेन्द्र मोदी गुजरात में मुस्लिमों से भेदभाव, गुजरात का विकास और नरेन्द्र मोदी, सच्चर कमीशन और मुस्लिम आरक्षण, गुजरात में मुसलमानों की आर्थिक स्थिति, मनमोहन सिंह और विश्व बैंक, मुस्लिम तुष्टिकरण और सेकुलरिज़्म, भारत में मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode

>आज इस कहानी के माध्‍यम से एक बार फिर मैं अपने बचपन से मिल आया हूँ ।

>

आज आपको अपने बचपन में सुनी हुई एक कहानी सुनाता हूं । इस कहानी को सुनकर आप को हँसने से खुद आप भी नहीं रोक पाएंगे ।।

     एक बार एक चोर किसी घर में चोरी करने गया ।
अंधियारी रात का घुप अन्‍धेरा था । चोर ने दीवाल में सेंध लगाई और घर में घुस गया ।
घर में केवल तीन लोग थे, दो बहुऍं जो अपने-अपने कमरों में सो रही थीं और उनकी सास जो भोजनालय में मिट्टी के चूल्‍हे के पास सो रही थी ।
चोर ने आहिस्‍ता-आहिस्‍ता पूरा घर छान मारा और थोडे-बहुत सामान इकट्ठा कर लिये ।
अब वो बाहर निकलने की तैयारी में था
तभी उसने रसोईघर में सूजी रखी देखी ।
सूजी देख उसे भूख लग आई और उसने सोंचा , भला इस रात के अंधेरे में मुझे कौन देखने आ रहा है ।
घर के लोग तो गहरी नींद में हैं ।
बस फिर क्‍या था ।
वह रसोई में घुस गया ।
रसोई में घुसते ही उसका सामना सोती हुई बुढिया से हुआ ।
अपनी चोरी का अनुभव लगाते हुए उसने बडे ही धीरे से बुढिया के नाक के पास हांथ फेरा और गहरी नींद में जानकर लग गया अपने काम में ।
हलुवा बनाने के सारे सामान उसे थोडे से अन्‍वेषण पर ही मिल गये ।
उसने चूल्‍हा जलाया और यथोक्‍त विधि से हलुवा बनाया ।
अब वो हलुवा ठंडा होने के इंतजार में था तभी बुढिया ने करवट बदला जिससे बुढिया का एक हां‍थ चूल्‍हे के पास बैठे चोर के पास पहुच गया ।
फैली हुर्इ हथेलिया देख चोर ने कहा- माता जी जरा ठहरिये, अभी तो बनाया है। अभी जल रहा होगा, दो मिनट बाद दूंगा ।
इतना कहकर चोर ने बुढिया का हांथ हटा दिया ।
पर गहरी नींद में सो रही बुढिया का अपने हांथ पर नियन्‍त्रण न होने के कारण हांथ फिर से चोर के आगे आ गिरा ।
चोर ने फिर से हलुवा गरम है, थोडी देर बाद दूंगा, कहकर हाथ हटा दिया ।
पर हाथ को भला क्‍या पता कि उसे अभी नहीं गिरना चाहिये । अत: फिर से दो तीन बार यही प्रक्रिया होती रही ।
हाथ चोर के आगे गिरता और चोर उसे बडी ही विनम्रता से हटा देता ।
पर अब चोर का धैर्य जबाब दे चुका था ।
उसने गुस्‍से में आकर एक चम्‍मच गरम हलुवा बुढिया के फैले हुए हांथ पर रखते हुए कहा – कितनी देर से कह रहा हूं गरम है, गरम है पर मानती ही नहीं ।
अब ले मर ।।।।।।।
जलते हुए हलवे के हांथ पर एकाएक पड जाने से बुढिया चिल्ला उठी ।
इस अप्रत्‍याशित कार्य की उसे तनिक भी आशा न थी ।
बुढिया देख न ले जाए इसलिये चोर तुरन्‍त ही रसोई के छज्‍जे पर चढ गया ।
बुढिया की चीख सुनकर उसकी दोनो बहुएं भाग कर रसोई में पहुंच गईं ।
बुढिया के हांथ में हलुवा देख एक ने कहा- ये देखो बुढिया को, रात में चुपके से हलुवा बनाकर खा रही थी । अब जब गलती से जल गई तो चिल्‍ला रही है ।
सहमते हुए बुढिया ने सफाई पेश की – न बेटा, मैं न जाने हूं ये कैसे हुआ । मैं तो सो रही थी ।
दूसरी बहू ने घुडकाते हुए कहा- तू न जाने है तो कौन जाने है ।
बुढिया ने दीनता से दोनों हांथ उठाकर कहा- वो उपर वाला ही जाने है ।

इतना सब सुनता हुआ चोर गुस्‍से में आकर उपर से कूदा और कहा ।
मैं क्‍या जाने हूं भला । कब से मना कर रहा था, जल जायेगी-जल जायेगी । पर नहीं मानी ।
अब जल गई तो सब मैं जाने हूँ ।।।

अब इसके आगे क्‍या हु‍आ होगा इसपर मैं कभी विचार नहीं करता हूं क्‍यूकि बचपन में तो इतना ही सुनते-सुनते हँस-हॅंस कर पेट फूल जाता था ।
आज इस कहानी के माध्‍यम से एक बार फिर मैं अपने बचपन से मिल आया हूँ ।
आप को भी अपने बचपन की तो याद आ ही गई होगी न ।।।।

http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/

>भारतीय स्वतंत्रता के जनक को कोटि -कोटि नमन

>

“वीर सावरकर की पीढ़ी में उनके समान प्रभावी, साहसी,ढ्रद,देशभक्त भारतवर्ष में पैदा नही हुआ है। सावरकर ने जो कष्ट सहे हैं,उसी के फलस्वरूप भारत ने स्वाधीनता प्राप्त की है। आदर्श सिधांतों को निभाने के लिए जी जान से प्रयत्न करने वालो में वीर सावरकर का स्थान बहुत ऊचा है। ——वे केवल हिन्दी देशभक्त hee नही,वरन समस्त विश्व के प्रेरणा श्रोत हैं। में तो मानव समाज के दर्शनकार के रूप में उन्हें देखता हूँ। भारतीय जनता का यह आध्य कर्तव्य है कि सम्पूर्ण स्वतंत्रता के जनक के रूप में उनका सत्कार करे.”—ये शब्द इंग्लेंड के सुप्रसिद्ध विद्वान् व पत्रकार श्री गाय अल्द्रेड के हैं, जो सावरकर के समय में हेराल्ड,फ्री वूमेन एवं जस्टिस आदि पत्रों के सम्पादक, प्रकाशक व प्रतिनिधि थे.(गाय अल्द्रेड)
२५ जून सन १९४४ को सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार की स्थापना पर नेताजी सुभाष चंद्र बोश ने सिंगापुर रेडियो पर अपने संदेश में कहा कि,——-“जब भ्रमित राजनैतिक विचारों और अदूरदर्शिता के कारन कांग्रेस के लगभग सभी नेता अंग्रेजी सेना में भारतीय सिपाहियों को भाड़े का टट्टू कहकर बदनाम कर रहे थे,उस समय सबसे पहले वीर सावरकर ने निर्भीकता से भारतीय युवको को सेना में भरती होने का आह्वान किया.सावरकरजी कि प्रेरणा पर सेना में भरती युवक ही हमारी आई ० एन ० ऐ ० के सिपाही बने हैं.उन्होंने इस बात का भी रहस्योद्घाटन किया कि,आइ० एन० ए० को संघटित करने कि प्रेरणा भी उन्हें सावरकर जी से ही मिली थी। उन्होंने बताया कि,जब वे सावरकर जी से मिलने मुंबई गए तब सावरकर जी ने उन्हें यह राय दी थी कि अंग्रेजों कि जेल में सड़कर मरने कि बजाय यह अच्छा होगा कि वे देश से बाहर चले जायं और आई ० एन० ए० को संगठित करें। (नेता जी सुभाष चंद्र बोश)
सरदार भगत सिंह ने रत्ना गिरी में जाकर सावरकर जी से आशीर्वाद लिया था.तथा सावरकर जी के लिखे ग्रन्थ को प्रकाशित कराया था।
ऐसे क्रांतिकारियों के प्रेरणा श्रोत,महान दार्शनिक, हिंदुत्व विचारक, करोड़ो भारतियों के ह्रदय सम्राट वीर सावरकर की जयंती (28 may)पर कोटि-कोटि नमन .

>ताज महल नहीं तेजोमहल, मकबरा नहीं शिवमन्दिर ।।

>

बी.बी.सी. कहता है………..

ताजमहल………..
एक छुपा हुआ सत्य……….
कभी मत कहो कि………
यह एक मकबरा है……….

प्रो.पी. एन. ओक. को छोड़ कर किसी ने कभी भी इस कथन को चुनौती नही दी कि……..

"ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था"

प्रो.ओक. अपनी पुस्तक "TAJ MAHAL – THE TRUE STORY" द्वारा इस

बात में विश्वास रखते हैं कि,–

सारा विश्व इस धोखे में है कि खूबसूरत इमारत ताजमहल को मुग़ल बादशाह
शाहजहाँ ने बनवाया था…..

ओक कहते हैं कि……

ताजमहल प्रारम्भ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर,एक हिंदू प्राचीन शिव
मन्दिर है जिसे तब तेजो महालय कहा जाता था.

अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मन्दिर को शाहजहाँ ने जयपुर
के महाराज जयसिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्ज़ा कर
लिया था,,

=> शाहजहाँ के दरबारी लेखक "मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी "ने अपने
"बादशाहनामा" में मुग़ल शासक बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000  से ज़्यादा
पृष्ठों मे लिखा है,,जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का
उल्लेख है कि, शाहजहाँ की बेगम मुमताज-उल-ज़मानी जिसे मृत्यु के बाद,
बुरहानपुर मध्य प्रदेश में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके ०६
माह बाद,तारीख़ 15 ज़मदी-उल- अउवल दिन शुक्रवार,को अकबराबाद आगरा लाया
गया फ़िर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए,आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से
सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) मे पुनः दफनाया गया,लाहौरी के
अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस आली मंजिल से बेहद प्यार करते थे
,पर बादशाह के दबाव मे वह इसे देने के लिए तैयार हो गए थे.

इस बात कि पुष्टि के लिए यहाँ ये बताना अत्यन्त आवश्यक है कि जयपुर के
पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनो आदेश अभी तक रक्खे हुए हैं जो
शाहजहाँ द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा
जयसिंह को दिए गए थे…….

=> यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम शासकों के समय प्रायः मृत दरबारियों और
राजघरानों के लोगों को दफनाने के लिए, छीनकर कब्जे में लिए गए मंदिरों और
भवनों का प्रयोग किया जाता था ,

उदाहरनार्थ हुमायूँ, अकबर, एतमाउददौला और सफदर जंग ऐसे ही भवनों मे
दफनाये गए हैं ….

=> प्रो. ओक कि खोज ताजमहल के नाम से प्रारम्भ होती है———

=> "महल" शब्द, अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में
भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता…

यहाँ यह व्याख्या करना कि महल शब्द मुमताज महल से लिया गया है……वह कम
से कम दो प्रकार से तर्कहीन है———

पहला —–शाहजहाँ कि पत्नी का नाम मुमताज महल कभी नही था,,,बल्कि उसका
नाम मुमताज-उल-ज़मानी था …

और दूसरा—–किसी भवन का नामकरण किसी महिला के नाम के आधार पर रखने के
लिए केवल अन्तिम आधे भाग (ताज)का ही प्रयोग किया जाए और प्रथम अर्ध भाग
(मुम) को छोड़ दिया जाए,,,यह समझ से परे है…

प्रो.ओक दावा करते हैं कि,ताजमहल नाम तेजो महालय (भगवान शिव का महल) का
बिगड़ा हुआ संस्करण है, साथ ही साथ ओक कहते हैं कि—-

मुमताज और शाहजहाँ कि प्रेम कहानी,चापलूस इतिहासकारों की भयंकर भूल और
लापरवाह पुरातत्वविदों की सफ़ाई से स्वयं गढ़ी गई कोरी अफवाह मात्र है
क्योंकि शाहजहाँ के समय का कम से कम एक शासकीय अभिलेख इस प्रेम कहानी की
पुष्टि नही करता है…..

इसके अतिरिक्त बहुत से प्रमाण ओक के कथन का प्रत्यक्षतः समर्थन कर रहे हैं……
तेजो महालय (ताजमहल) मुग़ल बादशाह के युग से पहले बना था और यह भगवान्
शिव को समर्पित था तथा आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था—–

 ==> न्यूयार्क के पुरातत्वविद प्रो. मर्विन मिलर ने ताज के यमुना की तरफ़
के दरवाजे की लकड़ी की कार्बन डेटिंग के आधार पर 1985 में यह सिद्ध किया
कि यह दरवाजा सन् 1359 के आसपास अर्थात् शाहजहाँ के काल से लगभग 300 वर्ष
पुराना है…

==> मुमताज कि मृत्यु जिस वर्ष (1631) में हुई थी उसी वर्ष के अंग्रेज
भ्रमण कर्ता पीटर मुंडी का लेख भी इसका समर्थन करता है कि ताजमहल मुग़ल
बादशाह के पहले का एक अति महत्वपूर्ण भवन था……

==>यूरोपियन यात्री जॉन अल्बर्ट मैनडेल्स्लो ने सन् 1638 (मुमताज कि
मृत्यु के 07 साल बाद) में आगरा भ्रमण किया और इस शहर के सम्पूर्ण जीवन
वृत्तांत का वर्णन किया,,परन्तु उसने ताज के बनने का कोई भी सन्दर्भ नही
प्रस्तुत किया,जबकि भ्रांतियों मे यह कहा जाता है कि ताज का निर्माण
कार्य 1631 से 1651 तक जोर शोर से चल रहा था……

==> फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम.डी. जो औरंगजेब द्वारा गद्दीनशीन
होने के समय भारत आया था और लगभग दस साल यहाँ रहा,के लिखित विवरण से पता
चलता है कि,औरंगजेब के शासन के समय यह झूठ फैलाया जाना शुरू किया गया कि
ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था…….

प्रो. ओक. बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी असंगताओं को इंगित करते
हैं जो इस विश्वास का समर्थन करते हैं कि,ताजमहल विशाल मकबरा न होकर
विशेषतः हिंदू शिव मन्दिर है…….

आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहाँ के काल से बंद पड़े हैं,जो आम जनता
की पहुँच से परे हैं

प्रो. ओक., जोर देकर कहते हैं कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक
संस्कारों के लिए भगवान् शिव की मूर्ति,त्रिशूल,कलश और ॐ आदि वस्तुएं
प्रयोग की जाती हैं…….

==> ताज महल के सम्बन्ध में यह आम किवदंत्ती प्रचलित है कि ताजमहल के
अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूँद बूँद कर पानी टपकता रहता है,, यदि यह
सत्य है तो पूरे विश्व मे किसी किभी कब्र पर बूँद बूँद कर पानी नही
टपकाया जाता,जबकि
प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में ही शिवलिंग पर बूँद बूँद कर पानी टपकाने की
व्यवस्था की जाती है,फ़िर ताजमहल (मकबरे) में बूँद बूँद कर पानी टपकाने का क्या
मतलब….????

==> राजनीतिक भर्त्सना के डर से इंदिरा सरकार ने ओक की सभी पुस्तकें स्टोर्स से
वापस ले लीं थीं और इन पुस्तकों के प्रथम संस्करण को छापने वाले संपादकों को
भयंकर परिणाम भुगत लेने की धमकियां भी दी गईं थीं….

==> प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत या सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है
कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में
खुलवाए, और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे ….

 ज़रा सोचिये….!!!!!!

 कि यदि ओक का अनुसंधान पूर्णतयः सत्य है तो किसी देशी राजा के बनवाए गए
संगमरमरी आकर्षण वाले खूबसूरत, शानदार एवं विश्व के महान आश्चर्यों में से
एक भवन, "तेजो महालय" को बनवाने का श्रेय बाहर से आए मुग़ल बादशाह शाहजहाँ
को क्यों……?????

 तथा……

इससे जुड़ी तमाम यादों का सम्बन्ध मुमताज-उल-ज़मानी से क्यों……..???????

""""आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से…….

    रूहें लिपट के रोटी हैं हर खासों आम से…….

    अपनों ने बुना था हमें, कुदरत के काम से……

    फ़िर भी यहाँ जिंदा हैं हम गैरों के नाम से……"""""

Girish Kamble
Research Associate
Mahyco Life Science Research Centre
Jalna-431203(MS)
India


With Best Regards
Mahendra Patel
http://hostsewa.com
http://gyanplus.tk
http://gujvani.tk

काफी समय पहले इस विषय में एक लेख पढा था पर साक्ष्‍यों के अभाव के कारण इस पर कभी टिप्‍पणी न कर सका । ये लेख श्रीमान महेन्‍द्र पटेल जी द्वारा ईमेल के माध्‍यम से प्राप्‍त हुआ है । इस लेख के विचार व शोध इसके लेखक द्वारा सम्‍पादित हैं । इसका सारा श्रेय उन्‍ही को दिया जाए ।।

>वीर सावरकर के जन्‍मदिवस पर आप सब को बधाई ।।

>


Veer Savarkar                                      28 may  date of birth


Vinayak Damodar Savarkar, commonly known as Swatantryaveer Savarkar was a fearless freedom fighter, social reformer, writer, dramatist, poet, historian, political leader and philosopher. He remains largely unknown to the masses because of the vicious propaganda against him and misunderstanding around him that has been created over several decades. This website attempts to bring the life, thought, actions and relevance of Savarkar before a global audience.

Veer Savarkar – A legend

  • The first political leader to daringly set Absolute Political Independence as India's goal (1900).
  • The first Indian political leader to daringly perform a bonfire of foreign (English) clothes (1905).
  • The first Indian to organize a revolutionary movement for India's Independence on an international level (1906).
  • The first Indian law student who was not called to the English Bar despite having passed his examination and observed the necessary formalities, for his activities to seek India's freedom from the British (1909).
  • The only Indian leader whose arrest in London caused legal difficulties for British Courts and whose case is still referred to in the interpretations of the Fugitive Offenders Act and the Habeas Corpus (Rex Vs Governor of Brixton Prison, ex-parte Savarkar)
  • The first Indian historian whose book on the 1857 War of Independence was proscribed by British Authorities in India even before its publication. The Governor General had asked the Postmaster General to confiscate copies of the book six months before the book was officially banned (1909).
  • The first political prisoner whose daring escape and arrest on French soil became a cause celebre in the International Court of Justice at The Hague. This case was mentioned in many International Treaties at that time (1910).
  • The first graduate whose degree was withdrawn by an Indian University for striving for India's freedom (1911).
  • The first poet in the world who, deprived of pen and paper, composed his poems and then wrote them on the prison walls with thorns and nails, memorized ten thousand lines of his poetry for years and later transmitted them to India through his fellow-prisoners who also memorized these lines.
  • The first revolutionary leader who within less than 10 years gave a death-blow to the practice of untouchability in the remote district of Ratnagiri while being interned there.
  • The first Indian leader who successfully started –
    • A Ganeshotsava open to all Hindus including ex-untouchables (1930).
    • Interdining ceremonies of all Hindus including ex-untouchables (1931).
    • "Patitpavan Mandir", open to all Hindus including ex-untouchables (22 February 1931).
    • A cafe open to all Hindus including ex-untouchables (01 May 1933).
  • The first political prisoner in the world who was sentenced to Transportation for Life twice, a sentence unparalleled in the history of the British Empire.
  • The first political leader to embrace death voluntarily by way of Atma Samarpan in the highest tradition of Yoga (1966).
this mail send to many people  and 28 may savarkar janm jayanti. so we celebrit the savarkar janm jayanti
bharat mata ki jay
swatantra laxmi ki jay ho


 

यह लेख

aplesh ghodasara  जी द्वारा लिखा गया है ।

मैं स्वीकार करता हूं, कि “कमेण्ट मॉडरेशन” मामले में मेरी हार हुई है…

ब्लॉगिंग की शुरुआत से अब तक, यानी लगभग तीन साल तक, विभिन्न लेखों और टिप्पणियों पर कई भद्रजनों और अभद्रजनों सभी से, बहस-मुबाहिसा, विवाद-कटु विवाद इत्यादि होते रहे हैं। मैं शुरु से ही “कमेण्ट मॉडरेशन” की व्यवस्था के खिलाफ़ था, और इस बारे में मैंने एक लेख भी लिखा (http://blog.sureshchiplunkar.com/2008/11/comment-moderation-and-word.html) तथा अन्य कुछ जगहों पर इसके समर्थन में टिप्पणी भी की। लेकिन विगत कुछ महीनों के दौरान मैंने पाया कि टिप्पणीकर्ताओं की भाषा असंयमित, अभद्र और गालीगलौज वाली होती जा रही है। इसी भाषा को लेकर ब्लॉगवाणी ने पहले एक बार “भड़ास” को बैन किया था।

मेरी पिछली पोस्ट “धर्म बड़ा या राष्ट्र” (http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/05/nidal-malik-hasan-faizal-shahjad.html) पर किसी फ़र्जी व्यक्ति ने पहले अनवर जमाल के नाम से एक नकली आईडी, नकली प्रोफ़ाइल बनाकर बहुत ही अश्लील टिप्पणी की (अनवर जमाल, सलीम, कैरानवी इत्यादि के साथ मेरे मतभेद हमेशा रहे हैं और रहेंगे, हम लोग कई कटु धार्मिक बहसों में उलझ भी चुके हैं, लेकिन मुझे विश्वास था कि अनवर जमाल इस तरह की अश्लील टिप्पणी नहीं कर सकते)। फ़िर कुछ देर बाद यही हरकत उसने मेरे नाम, प्रोफ़ाइल, लिंक आदि के साथ की, तब मेरा माथा ठनका, उक्त टिप्पणी को देखकर कोई साधारण व्यक्ति यही समझेगा कि यह टिप्पणी सम्बन्धित व्यक्ति ने (यानी मैंने या जमाल ने) ही की है, क्योंकि फ़ोटो, ब्लॉगर का लाल वाला निशान, प्रोफ़ाइल क्रमांक, ब्लॉग का नाम, लिंक आदि सब कुछ मेरे जैसा है, लेकिन भाषा और वर्तनी में वह मात खा गया… फ़र्जी टिप्पणी में ध्यान से देखने पर फ़ोटो थोड़ा सा धुंधला दिखाई देता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि फ़ोटो पर राइट क्लिक करने से जो प्रोफ़ाइल पेज खुलता है उसमें उस “शरारती तत्व” के ब्लॉगर प्रोफ़ाइल में On Blogger Since – May 2010 लिखा हुआ आता है, जबकि मेरे “असली फ़ोटो” के प्रोफ़ाइल को देखने पर On Blogger since January 2007 दिखता है, अर्थात हाल ही में किसी ने, मुझे और जमाल को लड़ाने-भिड़ाने तथा हिन्दी ब्लॉग जगत में भ्रम और वैमनस्यता फ़ैलाने के लिये यह घटिया हरकत की है।

(मजे की बात यह कि उस फ़र्जी ब्लॉगर ने मेरी तरफ़ से माफ़ी भी माँग ली, और खुद ही कमेण्ट मॉडरेशन लागू करने का आश्वासन भी दे डाला, उसने मेरे नाम से कोई गलत बात कहीं नहीं लिखी, सारी घटिया टिप्पणियाँ जमाल के नाम से की हैं, तो लगता है कि शायद वह मेरा प्रशंसक अथवा जमाल से खुन्नस खाया हुआ कोई व्यक्ति है, परन्तु फ़िर भी कहना चाहूंगा कि यदि वह फ़र्जी ब्लॉगर मेरा “शुभचिन्तक”(?) है तो मैं उससे कहूंगा कि वाकई में उसने मुझे दुख पहुँचाया है, और खामख्वाह मॉडरेशन के लिये मजबूर किया है)

कई मित्र और पाठक काफ़ी दिनों से सलाह दे रहे थे कि “कमेण्ट मॉडरेशन” लगा लीजिये, लेकिन मैंने कभी ध्यान नहीं दिया, क्योंकि इस तरह की अश्लील टिप्पणी कभी किसी ने नहीं की थी। हाँ… धार्मिक विवाद और असहिष्णु लोगों से बहस आदि चलती रहती है, लेकिन कैरानवी के ऊटपटांग चैलेंज और सलीम (इत्यादि) के हास्यास्पद कमेण्ट्स के बावजूद मैंने कभी मॉडरेशन नहीं लगाया, और उनकी लगभग 99% टिप्पणियाँ प्रकाशित भी कीं, क्योंकि उन्होंने कभी अश्लील शब्दों का प्रयोग नहीं किया। “बेनामी” की सुविधा तो शुरु से ही नहीं थी और किसी फ़र्जी द्वारा अश्लील कमेण्ट आने पर मैं उसे तुरन्त डिलीट कर भी दिया करता था। इस बार अश्लील टिप्पणियाँ आने पर संजय बेंगाणी भाई ने पुनः कमेण्ट मॉडरेशन की ओर ध्यान आकर्षित करवाया, और उनके आग्रह को मानते हुए तमाम भद्र पाठकों (विशेषकर महिलाओं) की मानसिक प्रताड़ना न होने पाये, इसलिये उस फ़र्जी व्यक्ति द्वारा किये गये अश्लील कमेण्ट्स से अपनी हार मानते हुए, अन्ततः कमेण्ट मॉडरेशन लागू कर रहा हूं, आशा है कि पाठक बुरा नहीं मानेंगे।

मॉडरेशन को लेकर मेरा विरोध मुख्यतः इस बात से था कि कुछ ब्लॉगर इस हथियार का उपयोग आलोचनात्मक टिप्पणी को  रोकने के लिये करते हैं, साथ ही कई बार, मॉडरेट होकर आते-आते टिप्पणी पुरानी हो जाती है और उस पर होने वाली प्रतिक्रियाएं-बहस आदि की सम्भावना भी मुरझा जाती है। पाठक इस बात से निश्चित रहें कि मेरे ब्लॉग पर हमेशा की तरह आलोचनात्मक टिप्पणियों का स्वागत ही होगा, चाहे वह खुर्शीद अहमद या वीरेन्द्र जैन साहब की ही क्यों न हो… बशर्ते गालीगलौज या अश्लीलता न हो बस…और मेरी पूरी कोशिश यही होगी कि जल्दी से जल्दी टिप्पणी को ब्लॉग पर दिखाऊं… तात्पर्य यह कि मुझे इस मॉडरेशन रूपी हथियार का उपयोग, दूसरों को होने वाली मानसिक परेशानी से बचाने के लिये मजबूरी में करना पड़ रहा है…।

(कमेण्ट मॉडरेशन में एक फ़ालतू सा लोचा यह होता है कि एक-एक कमेण्ट को मॉडरेट करते रहो, इस बीच कभी एकाध दिन के लिये कहीं व्यस्त हो गये और नेट पर मेल-चेक नहीं किया तो सामने वाले की टिप्पणी 2 दिन बाद अपनी पोस्ट पर दिखे, तब तक उस टिप्पणी का मजा और सन्दर्भ ही खत्म हो जाये, कुल मिलाकर बकवास और बोझिल काम है, लेकिन अब करना पड़ेगा।)

अब चूंकि कमेण्ट मॉडरेशन लागू कर ही रहा हूं, अर्थात एक सुविधा को सीमित कर रहा हूं, तो बदले में कुछ देना मेरा फ़र्ज़ बनता है अतः अब “बेनामी” (Anonymous) कमेण्ट्स की सुविधा शुरु कर रहा हूं। पहले कुछ शासकीय सेवाधारी पाठकों ने कहा था कि उनकी नौकरी की मजबूरी को देखते हुए वे अपने असली नाम से टिप्पणी नहीं कर सकते (खासकर “हिन्दुत्व” के समर्थन में), इसलिये बेनामी सुविधा रखी जाये, लेकिन मैंने उसे शुरु नहीं किया था… अब चूंकि मॉडरेशन लागू रहेगा तो बेनामी टिप्पणी लेने में कोई हर्ज नहीं है (वैसे भी अश्लीलता, व्यक्तिगत प्रहार और गालीगलौज को छोड़कर सारी बेनामी टिप्पणियाँ भी दिखेंगी ही)। कई बार, कई ब्लॉग्स पर बेनामी भाई बड़ी मार्के की बात कह जाते हैं और बहस को उच्च स्तर पर भी ले जाते हैं (हिन्दी ब्लॉग जगत छोड़कर), इसलिये सोचा कि, उन मित्रों को, जो अपने नाम से कमेण्ट नहीं कर सकते, यह सुविधा दी जाये।

आपके कमेण्ट्स मेरी पोस्ट पर तुरन्त नहीं दिखेंगे, इसलिये फ़िर एक बार दिल से माफ़ी चाहता हूं… टिप्पणी में भाषा सम्बन्धी नैतिकता का पालन मैं स्वयं तो कर सकता हूं, लेकिन दूसरों को कैसे रोक सकता हूं… इसलिये हार मान लेना ही बेहतर विकल्प है।

============

टीप : इन दिनों शादी-ब्याह, तेज गर्मी, तथा रिजल्ट का मौसम होने की वजह से व्यस्तता बढ़ी हुई है और ब्लॉग सम्बन्धी लेखन कार्य अनियमित हो गया है… जल्दी ही फ़ारिग होकर आऊँगा और चिर-परिचित लम्बी पोस्ट लिखूंगा… तब तक के लिये नमस्कार…

>आप सभी सुधी पाठक मेरी कही हुई बातों पर गौर करके ये बताइये कि मैने भला क्‍या गलत कहा ।।

>

 
हरिहर पद रति मति न कुतर्की, तिन्‍ह कहं विमल कथा रघुवर की ।।- रामचरित मानस

                सनातनी परम्परा रही है अपने दुश्‍मनों का भी अहित न विचारना । युद्ध क्षेत्र में विपक्ष सेना के घायलों को भी मरहम का लेप और जीवन दायिनी औषधियॉं देना इस सनातन हिन्‍दु धर्म की ही प्रारम्भिक परम्‍परा रही है । अपना अहित विचारने वालों तक को अपनी मृत्‍यु का सहज मार्ग बता देना इसी धर्म ने सिखाया । सत्‍य व न्‍याय के पालन के लिये अपने पुत्र तक को राजगद्दी पर न बिठाकर किसी साधारण सी जनता को राजसिंहासन दे देना भी हिन्‍दू परंपरा का ही अंग है । अपने आखिरी क्षणों में भी दूसरों की भलाई के लिये उपदेश करना कि जिनके हां‍थों शरशैरय्या मिली हो उनका भी भला सोंचना हिन्‍दू धर्म ने ही सिखाया । अरे मनुष्‍य क्‍या है और मानवता क्‍या होती है इसकी भी शिक्षा सर्वप्रथम इसी धर्म ने दी । जहां रावण जैसा महापापी अतुलित बलधारी राक्षस भी वेदों पर भाष्‍य लिखता है । उसे विरोध राम, विष्‍णु, ब्रह्मा और इन्‍द्रादि देवताओं से है पर धर्मग्रन्‍थों से कोई शिकायत नहीं ।
इसी सत्‍य सनातन धर्म के ही कुछ वाहक जो पथभ्रष्‍ट हो चुके हैं, उन्‍हे आजकल कुछ भी विषय नहीं मिलता है, केवल वो ग्रन्‍थों का अपमान करने में लगे हुए है ।
           साधारण लोगों को छोड दो साहब , अपने आप को डाक्‍टर और साहित्‍यकार कहने वाले ये लोग इतनी ओछी विचारधारा रखते हैं कि शर्म आती है ।

हिंदुओं, पहले अपना ही हिंदुपन तो तय कर लो!

                इस लेख को लिखने वाली देवी जी को पूरी हिन्‍दू परम्‍परा से ही शिकायत है । इन्‍हे शिकायत है कि पार्वती को अपना अभीष्‍ट वर पाने के लिये घर छोड कर जाने को कोई दोष नहीं देता । इन्‍हे राधा कृष्‍ण के प्रेम से भी शिकायत है और आज का समाज प्रेम की इजाजत क्‍यों नहीं देता इस बात की भी शिकायत है । शिकायत ये भी है कि कुन्‍ती, सत्‍यवती, अंजना आदि ने विना विवाह ही सन्‍तानोत्‍पत्ति की और समाज ने उन्‍हे कुछ नहीं कहा, शिकायत ये भी है कि द्रोपदी ने पांच पतियों से विवाह किया और लोग आज एसा करने नहीं देते ।

            अब मैं इस सोंच में हूं कि आखिर इनको क्‍या जबाब दूं । क्‍या इनसे ये कहूं कि अपना अभीष्‍ट वर पाने के लिये आप भी निकल जाइये और पार्वती की तरह हजारों वर्ष की तपस्‍या कीजिये । या ये कहूं कि आप भी अविवाहित रहकर सन्‍तानोत्‍पत्ति कीजिये, या कि पांच नहीं 10 पतियों से विवाह कर लीजिये । या फिर इन्‍हे ये बताउं कि जिनकी बराबरी करना चाह रही हैं वो देवमहिला और देवपुरूष या महापुरूष थे, पर इस बात को तो ये मानने से रहे। इनके मस्तिष्‍क तो विकृत हो चुके हैं कि इन्‍हे ये नहीं दिखता कि जिस ग्रन्‍थ में उपरोक्‍त प्रकरण दिये हैं उन्‍ही ग्रन्‍थों में इसका निदान भी दिया है, कोई इनसे कहे कि अगर विवाह के पूर्व ये अपने कान से पुत्र पैदा कर सकें तो इन्‍हे आज लोग गलत नही कहेंगे अपितु इनकी पूजा करेंगे। अगर सन्‍तानोत्‍पत्ति के बाद भी इनका कौमार्य भंग नहो तो भी लोग इन्‍हे दोष नहीं देंगे । अगर इनकी उत्‍पत्ति अग्निकुंड से हो तो ये पांच पतियों से विवाह कर सकती हैं । अगर पराशर और व्‍यास की तरह ही कोई महापुरूष ऐसा हो जिसके देखने मात्र से इनको गर्भ रह जाए तो ये भी तथोक्‍त कार्य कर सकती है और इन सब बातों पर मेरा दावा है समाज इन्‍हे गलत न कह कर इनकी पूजा करेगा ।

            हो सकता है यहां हमने कुछ ज्‍यादा ही कठोर शब्‍दों का प्रयोग कर दिया हो , पर आप ही बताइये मुझे क्‍या करना चाहिये था । कोई भी अदना सा व्‍यक्तित्‍व भी आज सनातन धर्म पर बडी आसानी से कीचड उछाल देता है और विपक्षियों को एक और मौका मिल जाता है ।

आप सभी सुधी पाठक मेरी कही हुई बातों पर गौर करके ये बताइये कि मैने भला क्‍या गलत कहा ।।

>राजनीती की मंडी में सी० बी० आइ० रंडी की ओकात रखती है.

>पिछले कुछ वर्षों से केंद्र की संप्रग सरकार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के पीछे हाथ-मूंह धोकर पड़ी थी। वहीँ मायावती ने भी कोंग्रेस को कोसने में कोई कमी नहीं की थी। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि सभी विपक्षियों के केंद्र सरकार के विरूद्ध खड़े होने के तुरंत बाद मायावती अचानक पलटा मार कर कोंग्रेस के पक्ष में खडी हो गयी और संप्रग सरकार की सभी नीतियों को ठीक बताया।
उससे पुर्व भी सन २००७ में परमाणु समझोते में जब सरकार को महसूस होने लगा कि वामपंथी दल इस समझोते में उसका समर्थन नहीं करेंगे तो अचानक मुलायम सिंह ने सरकार के साथ सहमती जता दी, ओर संप्रग सरकार को समर्थन दे दिया।
इसी प्रकार बोफोर्स के आरोपी व सोनिया गाँधी के मित्र क्वात्रोची को भी संप्रग सरकार ने क्लीन चिट दे दी ।
पिछली सरकार में लालू प्रसाद यादव संप्रग सरकार के साथ थे,उनके विरूद्ध कई घोटालों के मुक़दमे चल रहे थे तथा फैंसला भी आने वाला था कि अचानक उस न्यायधीश का तबादला हो गया जो लालू के केस को देख रहा था। तथा इन्कमटेक्स के ऑफिसरों की मीटिंग में सारा का सारा मामला ही ढीला कर दिया गया। लालू को संप्रग सरकार के समर्थन का इनाम मिल गया।
ये सारे के सारे मामले यूं तो देखने में अलग अलग है,किन्तु इनमे दो बातें कोमन हैं।
१..संप्रग सरकार २..सी० बी० आइ०
उपरोक्त सभी मामले संप्रग की सरकार में सी० बी० आइ० के हवाले थे । देश में कोई भी घोटाला हो तो सी० बी० आइ० से जांच कराने की मांग उठती है। जनता समझती है कि सी० बी० आइ० निष्पक्षता से जांच करेगी। किन्तु क्या कभी ऐसा होता है?
सी० बी० आई ० के एक पूर्व निदेशक का कहना है कि क्वात्रोची को क्लीन ची देना बिलकुल गलत था क्योंकि उसके विरूद्ध पूरे पुख्ता सबूत सी० बी० आइ० के पास मोजूद थे। अभी हाल ही में उन्होंने यह भी कहा है कि सी० बी० आइ० अपने से कुछ भी तय नहीं कर सकती है । किस मामले को दबाना है, तथा किस को गर्माना है , यह सब सरकार ही करती है।
अब देखिये उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री मायावती को आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में पहले सी० बी० आइ० से कहलाया गया कि उसके खिलाफ पूरे सबूत हैं। लेकिन मायावती के संप्रग के पक्ष में बोलते ही सी० बी० आइ० ने कह दिया कि केस में कोई दम ही नहीं है।
यही २००७ में मुलायम सिंह यादव व उसके परिवार भी कुछ एसा ही हुआ। परमाणु समझोते में वामपंथियों के सरकार के साथ नहीं रहने पर मुलायम ने सरकार का समर्थन किया और जिस कोंग्रेसी नेता ने इनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने की सी० बी० आइ० जाँच की मांग की थी,अपनी याचिका वापस ले ली।
वहीँ दूसरी ओर सी० बी० आइ० लोकप्रिय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरूद्ध कुछ ज्यादा ही सक्रीय नजर आ रही है। गोधरा हत्या काण्ड के बाद के दंगे हों या फिर सोहराबुदीन मुठभेड़ ,गुजरात सरकार व नरेंद्र मोदी को रोज ही घेरा जा रहा है। जबकि पुरे देश को पता है कि सोहराबुद्दीन एक आतंकवादी था तथा दाउद का पुराना सहयोगी रहा है।
वहीं छात्तिसगड़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर विधायकों की खरीद के पर्याप्त सबूत जुटाने पर भी सी० बी० आइ० उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाई। आंध्र के पूर्व इसाई मुख्यमंत्री पर हजारों करोडो की संपत्ति कहाँ से आई, उसने मंदिरों में आये दान का रुपया चर्चो को दान में क्यों दिया? इन सभी मामलों में सी० बी० आइ० कहाँ गायब हो गयी?
सी० बी० आइ० का जितना दुरूपयोग इन्द्र गाँधी ने किया ,वैसा ही दुरूपयोग यह संप्रग सरकार कर रही है। सरकार का ये कार्य निसंदेह राष्ट्र विरोधी है। सी० बी० आइ० का कार्य किस प्रकार होता है यह अपने आप में एक कटु सत्य है। सी० बी० आइ० एक सरकारी संस्था है इसलिए यह सरकार के इशारे पर ही कार्य करती है।
स्पष्ट रूप से संप्रग सरकार सी० बी० आइ० का दुरूपयोग अपनी सरकार को बचाने में तथा अपने विरोधियों को धुल चटाने के लिए कर रही है ।
सी० बी० आई ० की स्थिति राजनीती में रखैल की तरह हो गयी है ,जिसमे दम है वह उसे अपने पास रख ले।यदि सी० बी० आइ० के साख को बचाना है तो उसे स्वतंत्र कार्य करने के लिए छोड़ देना चाहिए। किन्तु क्या aisa हो सकेगा ? यह अपने आप में एक यक्ष प्रश्न है।

>एक ग़ज़ल : जुनूने-ए-इश्क में हमनें ……

>जुनून-ए-इश्क़ में हमने न जाने क्या कहा होगा !
हैं इतने बेख़ुदी में गुम कि हम को क्या पता होगा

मैं अपने इज़्तिराब-ए-दिल को समझाता हूँ रह रह कर
कि जितना चाहता हूँ वो भी उतना चाहता होगा

हमें मालूम है नाकामी-ए-दिल, हसरत-ए-उल्फ़त
हमें तो आख़िरी दम तक वफ़ा से वास्ता होगा

सभी तो रास्ते जाते तुम्हारी ही गली को हैं
वहाँ से लौट आने का न कोई रास्ता होगा

ख़याल-ओ-ख़्वाब में जिस के, कटी है ज़िन्दगी अपनी
मैं उसको जानता हूँ, क्या वो मुझ को जानता होगा ?

जो उसको ढूँढने निकला ,तो खुद भी खो गया”आनन”
जिसे ख़ुद में नहीं पाया , वो बाहर ला-पता होगा

-आनन्द

इज़्तिराब-ए-दिल = दिल की बेचैनी/बेचैन दिल

धर्म बड़ा होता है या “राष्ट्र”(?) – निदाल मलिक हसन, फ़ैज़ल शहजाद तथा माधुरी गुप्ता के सन्दर्भ में…… Nidal Malik Hasan, Faizal Shahjad, Madhuri Gupta : Nation First OR Religion?

1) कुछ माह पहले ही अमेरिका में एक मेजर निदाल मलिक हसन ने अपने एयरबेस पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसाकर 36 अमेरिकियों को हताहत किया था। निदाल मलिक हसन अमेरिकी सेना में एक मनोचिकित्सक था, और गिरफ़्तारी के बाद उसका कथन था कि वह अमेरिका द्वारा ईराक और अफ़गानिस्तान में की गई कार्रवाईयों की वजह से निराशा की अवस्था में था और उसे अमेरिका का यह हमला “इस्लाम” पर हमले के समान लगा।  पिछले कुछ समय से मेजर निदाल मलिक, इस्लामिक बुद्धिजीवी(?) अनवर-अल-अवलाकी के सम्पर्क में था, उससे निर्देश लेता था और उसकी इस्लामिक शिक्षाओं(?) से बेहद प्रभावित था…(खुद मनोचिकित्सक है, और शिक्षा ले रहा है अनवर अवलाकी से? है ना मजेदार बात…)

पूरा विवरण यहाँ देखें… http://f8ba48be.linkbucks.com

2) इसी तरह उच्च दर्जे की शिक्षा प्राप्त और पाकिस्तान के एयरफ़ोर्स अफ़सर बहरुल-हक के लड़के फ़ैज़ल शहजाद को अमेरिका से दुबई भागते वक्त हवाई जहाज में से गिरफ़्तार कर लिया गया (यहाँ देखें http://1d866b57.linkbucks.com)। फ़ैज़ल ने स्वीकार किया है कि उसी ने टाइम्स स्क्वेयर पर कार बम का विस्फ़ोट करने की योजना बनाई थी, क्योंकि अमेरिका उसे इस्लाम का दुश्मन लगता है। (http://4cfa0c9a.linkbucks.com)

इन दोनों मामलों में कुछ बातें समान है, और वह यह कि दोनों आतंकवादी अमेरिकी नागरिक बन चुके थे (अर्थात अमेरिका “उनका” देश था), दोनों अच्छे प्रतिष्ठित परिवारों से हैं, दोनों उच्च शिक्षित हैं, अमेरिका में स्थाई नौकरी कर रहे थे… लेकिन, लेकिन, लेकिन, लेकिन… दोनों ने प्रकारान्तर से यह स्वीकार किया कि उन्होंने यह हमले करके “इस्लाम” की सेवा की है। पिछले कुछ समय से अमेरिका में हुए आत्मघाती और हमले के षडयन्त्र की कुछ और घटनाएं देखिये –

1) गत दिसम्बर में फ़ोर्ट जैक्सन के मिलेट्री बेस में पाँच व्यक्तियों (यानी मुस्लिमों) को गिरफ़्तार किया गया, जब वे साउथ केरोलिना मिलेट्री बेस के लिये आये हुए खाने में जहर मिलाने की कोशिश कर रहे थे।

http://www.nypost.com/p/news/national/five_muslim_soldiers_arrested_over_zYTtFXIBnCecWcbGNobUEJ#ixzz0gEmjO5C8

2) 1 जून 2009 को अब्दुल हकीम मोहम्मद ने अरकंसास प्रान्त में दो अमेरिकी सैनिकों को गोली से उड़ा दिया।

3) अप्रैल 2009 में साउथ जर्सी में फ़ोर्ट डिक्स पर हमला करने का षडयन्त्र करते हुए चार मुस्लिम युवक धराये।

तात्पर्य यह कि अमेरिका में ऐसी घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, इसीलिये इनकी इस हरकत से यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि –

1) इस्लाम बड़ा या राष्ट्र बड़ा?

2) कोई व्यक्ति जिस देश का नागरिक है उसे अपने देश के प्रति वफ़ादार रहना चाहिये या अपने धर्म के प्रति?

3) यदि इतनी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी किसी व्यक्ति के दिल में अपने देश के प्रति (जहाँ से वह रोजी-रोटी कमा रहा है) प्रेम का भाव नहीं जागता, बल्कि उसके धर्म के प्रति ऐसा “अनुराग” जाग जाता है कि उसके लिये वह मरने-मारने पर उतारू हो जाता है, तो क्या फ़ायदा है ऐसी उच्च शिक्षा का?

4) “अपने” देश से गद्दारी करने के संस्कार, उन्हें कहाँ से मिले?

5) अच्छे खासे कमाते-खाते-पीते अचानक उसी देश के प्रति गद्दारी का भाव कहाँ से जागा, जहाँ की वे रोटी खा रहे हैं?

यह ब्रेन-वॉश किसने किया?

अब आते हैं, माधुरी गुप्ता मामले पर, जैसा कि सभी जानते हैं “गद्दार” माधुरी गुप्ता को जासूसी के आरोप में पुलिस ने गिरफ़्तार किया हुआ है और उससे पूछताछ जारी है। पूछताछ में पता चला है कि माधुरी के बैंक खातों में किसी भी प्रकार की “असामान्य एंट्रियाँ” नहीं पाई गई हैं, अतः यह गद्दारी, धन के लिये होने की सम्भावना कम लगती है। वहीं दूसरी ओर जाँच में यह सामने आया है कि माधुरी गुप्ता, इस्लामाबाद में एक पाकिस्तानी सेना के अफ़सर मुदस्सर राणा के प्रेम(?) में फ़ँसी हुई थी, और माधुरी ने लगभग 6 साल पहले ही इस्लाम कबूल कर लिया था। फ़रवरी 2010 में अफ़गानिस्तान में भारतीयों पर हुए हमले के सम्बन्ध में माधुरी ने तालिबान को मदद पहुँचाने वाली जानकारी दी थी।

माधुरी गुप्ता ने कुछ समय पहले भी खुलेआम एक इंटरव्यू में कहा था कि उसे पाकिस्तान और पाकिस्तानियों से “सहानुभूति” है। यह कैसी मानसिकता है? क्या धर्म बदलते ही राष्ट्र के प्रति निष्ठा भी बदल गई? इससे पहले भी अमेरिका के एडम गैडहॉन ने इस्लाम अपनाया था और बाकायदा टीवी पर एक टेप जारी करके अमेरिकी मुसलमानों से मेजर निदाल मलिक के उदाहरण से “कुछ सीखने”(?) की अपील की थी, अर्थात जिस देश में जन्म लिया, जो मातृभूमि है, जहाँ के नागरिक हैं… उसी पर हमला करने की साजिश रच रहे हैं और वह भी “इस्लाम” के नाम पर… ये सब क्या है? 

माधुरी गुप्ता के मामले में पाखण्ड और डबल-क्रास का उदाहरण भी देखिये, कि पाकिस्तान के मीडिया ने कहा कि “माधुरी गुप्ता एक शिया मुस्लिम है और उसने यह काम करके इस्लाम को नीचा दिखाया है”। यानी यहाँ भी शिया-सुन्नी वाला एंगल फ़िट करने की कोशिश की जा रही है…। सवाल उठता है कि सानिया मिर्ज़ा भी तो शिया मुस्लिम है, उसे अपनाने में तो भाभी-भाभी कहते हुए पाकिस्तानी मीडिया, बैंड-बाजे बजाकर आगे-आगे हो रहा है, तो माधुरी गुप्ता पर यह इल्ज़ाम क्यों लगाया जा रहा है कि “वह एक शिया है…”। इससे तो ऐसा लगता है, कि मौका पड़ने पर और सानिया मिर्जा का बुरा वक्त (जो कि शोएब जैसे रंगीले रतन और सटोरिये की वजह से जल्द ही आयेगा) आने पर, पाकिस्तान का मीडिया फ़िर से शोएब के पीछे ही खड़ा होगा और सानिया मिर्ज़ा को दुत्कार देगा, क्योंकि वह शिया है? मौलाना कल्बे जव्वाद ने पाकिस्तानी मीडिया की “शिया-सुन्नी” वाली थ्योरी की जमकर आलोचना की है, लेकिन उससे उन लोगों को कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि विभाजन के वक्त भारत से गये हुए मुसलमानों को वे लोग आज भी “मुहाजिर” कहते हुए लताड़ते हैं। 

अन्त में इतना ही कहना चाहूंगा कि, भारत पर हमला करने वाला अजमल कसाब तो युवा है और लगभग अनपढ़ है अतः उसे बहकाना और भड़काना आसान है, लेकिन यदि मोहम्मद अत्ता जैसा पढ़ा-लिखा पायलट सिर्फ़ “धर्म” की खातिर पागलों की तरह हवाई जहाज ट्विन टावर से टकराता फ़िरे… या लन्दन स्कूल ऑफ़ ईकोनोमिक्स का छात्र उमर शेख, डेनियल पर्ल का गला रेतने लगे… तब निश्चित ही कहीं न कहीं कोई गम्भीर गड़बड़ी है। गड़बड़ी कहाँ है और इसका “मूल” कहाँ है, यह सभी जानते हैं, लेकिन स्वीकार करने से कतराते, मुँह छिपाते हैं, शतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गड़ा लेते हैं… और ऐसे लोग ही या तो “सेकुलर” कहलाते हैं या “बुद्धिजीवी”। सॉरी, सॉरी… एक और विषधर जमात भी है, जिसे “पोलिटिकली करेक्ट” कहा जाता है…।

खैर… यदि कसाब जैसे अनपढ़ों की बात छोड़ भी दें (क्योंकि वह पाकिस्तान का नागरिक है और भारत के विरुद्ध काम कर रहा था) लेकिन यह सवाल बार-बार उठेगा कि, उच्च शिक्षा प्राप्त युवा, 5 अंकों में डालरों की तनख्वाह पाने वाले, जब किसी दूसरे देश के “स्थायी नागरिक” बन जाते हैं तब उनके लिये “धर्म बड़ा होना चाहिये या वह देश?”

Terrorism in USA, Terrorism and Islam, Major Nidal Malik Hasan, Faizal Shahzad, Madhuri Gupta, Terrorism and India, Preference Religion Over Nation, Ajmal Kasab Convicted, Mohammed Atta, Twin Tower, Times Square Car Bomb, आतंकवाद और अमेरिका, आतंकवाद और इस्लाम, मेजर निदाल मलिक हसन, फ़ैज़ल शहजाद, माधुरी गुप्ता, भारत में आतंकवाद, धर्म बड़ा या देश, अजमल कसाब को फ़ाँसी, मोहम्मद अत्ता, टाइम्स स्क्वेयर बम विस्फ़ोट, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode

« Older entries