>एक ग़ज़ल : रकीबों से क्या आप ….

>एक ग़ज़ल : रक़ीबों से क्या ……

रक़ीबों से क्या आप फ़रमा रहे हैं !
हमें देख कर और घबरा रहे हैं

इलाही! मेरे यह अदा कौन सी है !
कि छुपते हुए भी नज़र आ रहे हैं

उन्हें आईना क्या ज़रा सा दिखाया
वो पत्थर उठाए इधर आ रहे हैं

सुनाया जो उनको ग़मों का फ़साना
वह झुझँला रहे है, वो शरमा रहे हैं

मुहब्बत का हासिल तो आह-ओ-फ़ुगाँ हैं
ये कह कह के वो हम को समझा रहे हैं

कहानी पुरानी है उल्फ़त की “आनन्द”
हमी तो नहीं हैं जो दुहरा रहे हैं

-आनन्द-

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