>रेडिएशन एक सच्चाई

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पूरे विश्व का हजारों टन कबाड़ भारत भूमि में रोज उतरता है। आने वाले कबाड़ का निरीक्षण करने के लिए हमारे देश में कोई नियामक संस्था नहीं है। 9/11 में ध्वस्त हुए ट्विन टावर का एक बड़ा हिस्सा भारत में आया था। रसायनिक अपशिष्ट के पुनर्चक्ररण का भी भारत एक बड़ा बाजार है। कुछ वर्ष पहले मुझे गुरजात के वेरावल के पास अलंग शिप ब्रेकिंग यार्ड देखने का मौका मिला था। यहां पर बिहार और उत्तर प्रदेश से आए मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपाय के विश्व भर से आए जहाजों को रात-दिन तोड़ते रहते हैं। यहां दुर्घटनाएं होना सामान्य सी बात है।

अब आइए दिल्ली की बात करते हैं। अलंग में काम करने वाले मजदूरों की तो वहां काम करने की मजबूरियां हो सकती हैं। पर दिल्ली विश्विद्यालय से हम इस तरह की भूलों की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। यहां तो एक से एक धुरंधर विद्वान बैठे हैं, जिन्हें कोबाल्ट 60 के बारे में पूरी जानकारी है, फिर उनसे यह भूल कैसे हो गई? जब रसायन विभाग ने वर्षों पहले शोध के लिए कोबाल्ट60 को कनाडा से मंगाया गया था तो क्या विभाग के प्रोफेसरों को इस बात का अंदाज नहीं था कि इसे खुले बाजार में कबाड़ के रूप में उसे बेचने का क्या दुष्प्रभाव होगा। साथ ही यह बात भी गौर करने लायक है कि एक इंसान की मौत और छह लोगों की गंभीर बीमारी की खबर सुनने के बाद भी विभाग के सदस्य मौन क्यों रहे?

क्या है कोबाल्ट-60? कोबाल्ट-60 को प्रतीकात्मक रूप में सीओ- 60 लिखा जाता है। इसमें 33 न्यूट्रॉन और 27 प्रोटॉन होते हैं। यह कोबाल्ट का रेडियोएक्टिव आइसोटोप होता है। इसकी अर्धआयु 5.2714 वर्ष होती है। इस वजह से यह प्रकृति में नहीं पाया जाता है। कोबाल्ट 59 को न्यूक्लियर रिअक्टेर के कोर में डाला जाता है जहां पर नाभकीय प्रतिक्रिया द्वारा कोबाल्ट 59 कोबाल्ट 60 में परिवर्तित हो जाता है।

उल्लेखनीय है कि कोबाल्ट-60 एक रेडियोधर्मी आइसोटोप है। जो कठोर, चमकीली और भूरे रंग की धातु होता है। इसका इस्तेमाल चिकित्सा, उद्योग, कृषि, उड्यन आदि क्षेत्रों में किया जाता है। कोबाल्ट 60 आम आदमी के जिंदगी से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। जैसे आप चिकित्सा या सौंदर्य प्रसाधन की कुछ चीज खरीदते हैं और यदि उस पर स्टरलाइज़इड लिखा हुआ है तो समझ लीजिए कि यह कार्य कोबाल्ट 60 द्वारा उत्सर्जित गामा किरणों द्वारा ही किया गया है। कैंसर उपचार के लिए प्रयुक्त रेडियाथैरेपी मशीन में इसका इस्तेमाल सर्वविदित है। इसी प्रकार कृषि के क्षेत्र में उन्नत बीजों का निर्माण भी इसी के द्वारा किया जाता है।

परमाणु ऊर्जा विभाग में जन-संपर्क विभाग के प्रधान डॉक्टर स्वप्नेश कुमार मल्होत्रा कोबाल्ट 60 की तुलना आग से करते हुए कहते हैं कि हम सभी जानते हैं कि आग से कितनी बड़ी-बड़ी हानियां हुई है। इसके बावजूद भी अपनी रसोई में दिन में कई बार आग जलाते ही है ऐसा हम इसलिए कर पाते है क्योंकि इसके बारे में हमें पूरी जानकारी है वहीं हम छोटे बच्चों को आग से दूर रखते है ताकि कोई दुर्घटना न हो जाए। लेकिन यदि यही आग एक मासूम बच्चे के समीप पहुँच जाए, तो वो उसको हानि पहुंचा देती है। इसमें आग का दोष नहीं है, दोष है उस व्यक्ति की अनभिज्ञता का जिसके कारण वह दुर्घटना का शिकार हो जाता है। इसी प्रकार से आप कोबाल्ट 60 को समझिए। यह एक बहुउपयोगी आइसोटोप है। जिसका प्रयोग वही लोग करते हैं जो इसके प्रयोग में माहिर हैं। जिस तरह बच्चे आग के साथ खिलवाड़ करते है और उन्हे नुकासान हो जाता उसी तरह यदि कोबाल्ट 60 अनाड़ी लोगों के हाथ में पड़ जाए तो उसका भी वही हश्र होगा जैसा की दिल्ली के मायापुरी के कबाड़ी मार्केट में हुआ।

पिछले दिल्ली में जो घटना हुई उससे हम सभी वाकिफ है, देश की राजधानी में इस घटना के घटने के कारण इसे बहुत मीडिया कवरेज मिला। पर यह अपने आप में अकेली घटना नहीं है दुर्भाग्यवश पिछले दो सालों में भारत में कोबाल्ट 60 से संबंधित 67 घटनाएं घटी हैं जिसके बारे में आम लोगों को कोई जानकारी नहीं है। डॉक्टर मल्होत्रा के अनुसार दो साल पहले की घटना है फ्रांस के नाभकीय सुरक्षा प्राधिकरण ने भारतीय अधिकारियों को सूचित किया था कि लिफ्ट में लगाएं जाने वाले बटनों की सामग्री को एक फ्रांसीसी कंपनी ने भारत से आयातित किया था जिससे बीस फ्रांसीसी कर्मचारिओं को रेडिएशन लगा। जांच करने पर पता चला कि यह यूरोप से आए कबाड़ से ही पुनर्चक्रण करके बनाया गया था। लेकिन खतरनाक बात यह है कि इस कबाड़ को उतारने, काटने, पिघलाने, बनाने में जो भी लोग शामिल थे उनका पता नहीं लगाया जा सका? उनका क्या हश्र हुआ कोई नहीं जानता। उनको रेडिएशन का कितना डोज मिला, उस डोज से उनकों क्या परेशानियां हुई, उसके बारें में कोई सरकारी जानकारी उपलब्ध नहीं है।

आइए समझे विकिरण होता क्या है? और यह शरीर को प्रभावित कैसे करता है? विकिरण का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि एक्सपोजर का स्तर क्या है और यह शऱीर के किस भाग में कितनी देर तक हुआ। एक्सपोजर कितने समय तक हुआ है। हम मोटे तौर पर विकिरण के प्रभाव को निम्न, मध्यम और उच्च-तीन स्तरों पर बाँट सकते हैं।

सबसे पहले प्रत्येर व्यक्ति प्राकृतिक विकिरण से प्रभावित हो रहा है जिसे हम निम्न स्तर एक्सपोजर कह सकते हैं। प्राकृतिक एक्सपोजर से लगभग सौ गुना अधिक एक्पोजर को मध्यम स्तर का और उससे अधिक एक्सपोजर को उच्च स्तर का एक्सपोजर कह सकते हैं।

केवल मध्यम और उच्च स्तर के एक्सपोजर लंबी समयावधि के बाद देरी से होने वाले प्रभाव छोड़ते हैं। कैंसर का होना इन प्रभावों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। अनुसंधानों से स्पष्ट हो चुका है कि कैंसर कई कारणों से हो सकता है जैसे कि हम जिस वायु में साँस लेते हैं, जो पानी पीते हैं, जो खाना खाते हैं क्योंकि उनमें भी विभिन्न विशैले पदार्थों की उपस्थिति हमेशा रहती है।

अल्प समयावधि में अवशोषित उच्च स्तरीय विकिरण से मितली आने या उल्टी आने जैसे संकेत तुरंत सामने आते हैं, लेकिन इनसे जान को खतरा नहीं होता। किंतु अवशोषित मात्राएं बढ़ने के साथ-साथ स्वस्थ होने की संभावना कम होती जाती है। सामान्य प्रकृति में व्याप्त निम्न स्तरीय विकिरण से होने वाले एक्सपोजर से लगभग 1000 गुणा अधिक की मात्रा ही जानलेवा हो सकती है।
इंसान के लिए कोबाल्ट-60 का खुला विकिरण खतरनाक होता है। यदि यह शरीर में यह चला जाए तो इसका बड़ा हिस्सा मल के साथ बाहर आ जाता है। हालांकि, लीवर, किडनी और हड्डियों द्वारा इसकी छोटी सी भी मात्रा सोख लेने पर कैंसर होने का खतरा होता है।
कोबाल्ट-60 से बनी रेडियोथैरेपी मशीनों उस समय खतरनाक साबित हो जाती हैं जब उपयोग के बाद उन्हें सही ढंग से नष्ट न किया जाए। अब इन मशीनों को आधुनिक लीनियर एक्सेलेटर से बदला जा रहा है।

इस तरह की घटनाएं देश में पुनः न हों, इसके लिए हमें सख्त कानून बनाने पड़गे, साथ ही इस बात का ध्यान देना जरूरी है कि देश में जिस जिस जगह से कबाड़ प्रवेश करता है वहां पर रेडियेशन मॉनीटर लगाए जाएं और यह सुनिश्चित किया जाए कि देश में कबाड़ प्रविष्ट होने से पूर्व उसका पूर्ण निरीक्षण किया जाए और अंत में मायापुरी कांड की गहन जांच हो, ताकि भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति न हो।

-प्रतिभा वाजपेयी.

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