>संसद में शोर

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लेखक : रमेश भट्ट , लोकसभा टीवी 



संसद, लोकतन्त्र का खंभा , 
देश की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था, 
देश के विकास की नींव यही रखी जाती है। देश के कोने कोने से चुने हुए प्रतिनिधि देश भर की समस्याओं को लेकर यहां अपनी आवाज बुलन्द करते है। जनता से जुड़े मुददों पर सार्थक बहस इसी जगह होती है। कानून बनाने की ताकत भी इसी संसद के पास है। मगर आज यहां हालात बदले बदले नज़र आ रहे है। सदन में आए दिन होने वाले हो हंगामें से अब जनता त्रस्त हो गई है। आखिर किसके लिए है संसद। क्या है इसका उद्देश्य। क्या संसद आम आदमी के प्रति नही है। इसमें कोई दो राय नही की संसदीय बहस का स्तर लगातार गिर रहा है। सांसद रचनात्मक बहस से ज्यादा आपसी टोकाटोकी में ज्यादा मशगूल नज़र आते है। संसद में आए दिन हंगामा होना कोई नही बात नही है। सच्चाई यह है कि राजनीतिक दलों ने इसे एक सियासी हथियार के तौर पर अपना लिया है। वैसे तो सदन में सांसदों के लिए कई नियम बनाये गए है। मगर इसका अनुसरण कोई नही करता। मसलन कोई सदस्य अगर भाषण दे रहा हो, तो उसमें बांधा पहुचाना नियम के खिलाफ है। सांसद ऐसी कोई पुस्तक, समाचार पत्र या पत्र नही पडे़गा जिसका सभा की कार्यवाही से सम्बन्ध न हो । सभा में नारे लगाना सर्वथा नियम विरूद है। सदन में प्रवेश और निकलते वक्त अध्यक्ष की पीठ की तरफ नमन करना नियम के तहत है। अगर कोई सभा में नही बोल रहा हो तो उसे शान्ति से दूसरे की बात सुननी चाहिए।  भाषण देने वाले सदस्यों के बीच से नही गुजरना चाहिए। यहां तक कि कोई भी सांसद अपने भाषण देने के तुरन्त बाद बाहर नही जा सकता। हमेशा अध्यक्ष को ही सम्बोधित करना चाहिए। नियम के मुताबिक सदन की कार्यवाही में रूकावट नही डालनी चाहिए। सदन की कार्यवाही में रूकावट नही डालेगा। इन सारे नियमों के लब्बोलुआब को कुछ अगर एक पंक्ति में समझना हो तो सदन में अध्यक्ष के आदेश के बिना पत्ता भी नही हिल सकता। दु:ख की बात तो यह है कि ऐसे कई नियम मौजूद है लेकिन इन नियमों केा मानने वाला कोई नही। राजनीतिक चर्चाऐं कई बार अखाड़ों में तब्दील हो जाती है। आज इन सारे नियमेंा की अनदेखी एक बड़े संसदीय संकट की ओर इशारा कर रही है। क्या इसका उपाय है हमारे पासर्षोर्षो आज 100 दिन संसद का चलना किसी सपने की तरह है। कई जरूरी विधेयक बिना बहस के पास हो रहे है। सभा की कार्यवाही से कई सांसद अकसर नदारद रहते है। कभी कभी तेा कोरम पूरा करने के लिए सांसद खोज के लाने पड़ते है। क्या दुनिया के सबसे बडे लोकतन्त्र की तस्वीर ऐसी होनी चाहिए। आज सासन्द असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करने से भी नही चूक रहे है। अब समय आ गया है कि जनता `काम नही तो भत्ता नही` और `जनप्रतिनिधी को वापस बुलाने के अधिकार` को कानूनी रूप प्रदान करने के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव बनाये। 


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