>एक ग़ज़ल : जुनूने-ए-इश्क में हमनें ……

>जुनून-ए-इश्क़ में हमने न जाने क्या कहा होगा !
हैं इतने बेख़ुदी में गुम कि हम को क्या पता होगा

मैं अपने इज़्तिराब-ए-दिल को समझाता हूँ रह रह कर
कि जितना चाहता हूँ वो भी उतना चाहता होगा

हमें मालूम है नाकामी-ए-दिल, हसरत-ए-उल्फ़त
हमें तो आख़िरी दम तक वफ़ा से वास्ता होगा

सभी तो रास्ते जाते तुम्हारी ही गली को हैं
वहाँ से लौट आने का न कोई रास्ता होगा

ख़याल-ओ-ख़्वाब में जिस के, कटी है ज़िन्दगी अपनी
मैं उसको जानता हूँ, क्या वो मुझ को जानता होगा ?

जो उसको ढूँढने निकला ,तो खुद भी खो गया”आनन”
जिसे ख़ुद में नहीं पाया , वो बाहर ला-पता होगा

-आनन्द

इज़्तिराब-ए-दिल = दिल की बेचैनी/बेचैन दिल

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