>प्लीज उसे मेरा बाप मत कहो …………………..

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 सोम- लता या मशरूम


           यूं ही ब्‍लाग्‍स को टटोलते हुए आज मै एक बडे ही प्‍यार ब्‍लाग पर पहुंच गया जहां श्रीमद्भगवद्गीता के विषय में एक लेख लिखा हुआ था । पढकर बहुत ही अच्‍छा लगा । पर उसी ब्‍लाग पर मैंने एक पोस्‍ट और देखी जो सोमलता विषय पर थी । वहां सोम को एक फंफूद या मशरूम बताया गया है । हालांकि इस पोस्‍ट में लेखक का कोई दुराग्रह नहीं दिखा , पोस्‍ट के लेखक ने कुछ वैज्ञानिकों द्वारा दिये गये तथ्यों को ही उद्धृत किया है । यहां मैं उस पोस्‍ट की लिंक दे रहा हूं , आप स्‍वयं इसे पढ सकते हैं कहीं यही तो सोम नहीं  इस पोस्‍ट को पढकर आप भी उन प्रमत्‍त वैज्ञानिकों के द्वारा दिये गये उल्‍टे-सीधे तर्क पढ सकते हैं ।
           उनमें से कुछ को मैं यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं ।।

  1. डॉ0 वाट ने कोंकण, कर्नाटक, सिंहभूम, रांची, पुरी और बंगाल में मिलने वाले तथा आरोही (ट्रेलिंग या ट्वाइनिंग) झाडी के रूप में फैलने वाले 'सारकोटेस्‍टेम्‍मा एसिडम' (रौक्‍स) वोगृ (मदारकुल) को सोम बतलाया है ।
  2. कुछ विद्वानों ने पेरिप्‍लोका एफाइल्‍लाडेकने मदारकुल को सोम माना है । पंजाब में इसका नाम 'तरी' तथा बंबई में 'बुराये' है । यह पजाब के मैदानों में झेलम से पश्चिम की ओर तथा हिमालय के निचले भाग में बिलोचिस्‍तान तक पाया जाता है ।  इसके दूधिया रस का प्रयोग सूजन व फोडे पर किया जाता है ।
  3. डॉ0 उस्‍मान अली तथा नारायण स्‍वामी ने 'सिरोपिजिया जाति (मदारकुल) को सोम का प्रतिनिधि कहा है । केरल में इसका प्रचलन भी 'सोम' नाम से है ।
  4. पेशावर विश्‍वविद्यालय के वनस्‍पतिशास्‍त्री एन0 ए0 काजिल्‍वास के अनुसार 'एफेड्रा पैकिक्‍लाडा बौस (ग्‍नेटेसी)' तथा इसकी एक अन्‍य जाति सोम है जो हिन्‍दुकुश पर्वत, सफेद कोह तथा सुलेमान रेंज में प्राप्‍त होती है ।
  5. डॉ0 मायर्स ने 'एफेड्रा गिरार्डियाना' को सोम माना है ।
  6. डॉ0 आर0 एन0 चोपडा ने सोम की पहचान गिलोय एवं 'रूटा ग्रविलोलेसं' से की है ।
  7. कहा जाता है कि चीन में प्रयुक्‍त होने वाली 'गिनसेगं' नामक वनौषधि (पैनेक्‍स शेनशुगं अरालिऐसीकुल ) में भी सोम के सदृश कुछ गुण हैं ।
  8. सुप्रसिद्ध अमेरिकी अभिकवकशास्‍त्री रिचर्ड गार्डन वैसन ने अपने 15 वर्ष के अनुसन्‍धान के पश्‍चात् 'फ्लाई आगेरिक' नामक कुकुरमुत्‍ते की जाति के 'अमानिता मस्‍कारिया' से सोम की पहचान की है । यह कवक (फंफूद) अफगानिस्‍तान, एशिया के समशीतोष्‍णवनीय भाग तथा उत्‍तरी साइबेरिया में भोज्‍ वृक्ष (बर्च) तथा चीड के चपसें में मिलता है । इसका सेवन उन्‍मादक रूप में होता है । कवक के टुकडे या रस के प्रयोग से शारीरिक शक्ति
    बढ जाती है, दिवास्‍वप्‍न दिखाई देने लगते हैं । इसमें मस्‍केरीन, एट्रोपीन, स्‍कोपोलेमीन, हाइयो सायेमीन आदि एल्‍कलायड् पाए जाते हें। सन् 1971 में , मैनबरा (आस्‍ट्रेलिया) में हुए प्राच्‍यवेत्‍ताओं के अनतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में जब डॉ0 वैसन ने सोम को उपयुक्‍त मतिविभ्रमकारी फफूद बतलाया तो डॉ0 एस0 भट्टाचार्य ने उसका वहीं सतर्क खण्‍डन किया ।


            उपरोक्‍त सोमविषयक भ्रान्तियों के विषय में खण्‍डन मण्‍डन की परम्‍परा प्राचीन रही है किन्‍तु आजतक पूर्णरूपेण सोमलता की पहचान नहीं की जा सकी है । जितने भी वैज्ञानिकों ने सोम की पहचान की वो केवल अपनी प्रशिद्धि के लिये ही बिना सारे तथ्‍यों का आकलन किये ही किसी भी तत्‍साम्‍य रखने वाले पौधे को सोम की संज्ञा दे दी । खेद तो इस बात का है कि हमारे भारतीय विद्वान भी इसी रंग में रंग कर भ्रामक तथ्‍यों का ही सम्‍पादन करते रहे पर किसी ने ठीक से सोम के सारे लक्षणों को चरितार्थ नहीं पाया ।
           ऋग्‍वेदीय वर्णन के अनुसार सोम पौधा उंचे और मजबूत पर्वतों पर उत्‍पन्‍न होता था । सोम स्‍फूर्ति प्रदान करता था।  सोम एक लता थी फंफूद या मशरूम नहीं ।
जो लोग सोम का अर्थ शराब लगाते हैं वो सोम तथा सुरा में अन्‍तर तक समझते हैं । उन्‍हें अनार के ताजे रस तथा सडाये हुए महुए के रस में फर्क करना नहीं आता ।

           आज के इस लेख में केवल इतना ही , लेख का विस्‍तार पाठकों को बोर न कर दे इसलिये सोम विषयक अन्‍य महत्‍वपूर्ण तथ्‍यों का उद्घाटन अगले लेख में किया जाएगा ।
पाठकों की राय व सोमविषयक अन्‍य ज्ञानविन्‍दुओं का स्‍वागत है । कृपया अपने सुझाव हमें ईमेल से भेजें ।।

वैदिक धर्म की जय ।।

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3G स्पेक्ट्रम की नीलामी – द पायोनियर के कारण राजा बाबू के पेट पर लात पड़ी… (एक माइक्रो पोस्ट)… 3G Spectrum License, A Raja, Telecom Companies in India

बहुप्रतीक्षित 3G स्पेक्ट्रम की नीलामी की निविदाएं कल (19 मई को) खोली गईं। UPA की महान दिलदार, उदार सरकार ने उम्मीद की थी कि उसे लगभग 35,000 करोड़ का राजस्व मिलेगा, जबकि 22 सर्कलों की लाइसेंस बिक्री के जरिये सरकार को अभी तक 70,000 करोड़ रुपये मिल चुके हैं, तथा BSNL और MTNL की “रेवेन्यू शेयरिंग” तथा “सर्कल डिस्ट्रीब्युशन” के कारण अभी यह आँकड़ा 85,000 करोड़ रुपये को पार कर जायेगा। कुछ ही दिनों में BWA (ब्रॉडबैण्ड वायरलेस एक्सेस) की भी नीलामी होने वाली है, जिससे सरकार को और 30,000 करोड़ की आय होने की उम्मीद है और निश्चित ही उसमें भी ज्यादा ही मिलेगा।

2G के महाघोटाले के बाद सतत राजा बाबू और नीरा राडिया के कारनामों को उजागर करने वाले “एकमात्र अखबार” द पायोनियर को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने सरकार को मजबूर कर दिया कि 3G लाइसेंस बिक्री के सूत्र राजा बाबू के हाथ न आने पायें। पायनियर द्वारा लगातार बनाये गये दबाव के कारण सरकार को मजबूरन थ्री-जी की नीलामी के लिये –

1) मंत्रियों का एक समूह बनाना पड़ा

2) जिसकी अध्यक्षता प्रणब मुखर्जी ने की,

3) इसमें प्रधानमंत्री की तरफ़ से विशेषज्ञ के रूप में सैम पित्रोदा को भी शामिल किया गया

4) भारी चिल्लाचोट और कम्पनियों द्वारा छातीकूट अभियान के बावजूद नीलामी की प्रक्रिया जनवरी 2009 से शुरु की गई, जब वैश्विक मंदी कम होने के आसार दिखने लगे (वरना कम्पनियाँ मंदी का बहाना बनाकर कम पैसों में अधिक माल कूटने की फ़िराक में थीं…)

5) नीलामी रोज सुबह 9.30 से शाम 7.00 तक होती, और इसके बाद प्रत्येक कम्पनी को उस दिन शाम को अपने रेट्स केन्द्रीय सर्वर को सौंपना होते थे, जिस वजह से सरकार को अधिक से अधिक आय हुई।

6) इस सारी प्रक्रिया से बाबुओं-अफ़सरों-नौकरशाही-लॉबिंग फ़र्मों और फ़र्जी नेताओं को दूर रखा गया।

सोचिये, कि यदि अखबार ने राजा बाबू-नीरा राडिया के कारनामों को उजागर नहीं किया होता तो इसमें भी राजा बाबू कितना पैसा खाते? अर्थात यदि प्रमुख मीडिया अपनी भूमिका सही तरीके निभाये, फ़िर उसे अंग्रेजी-हिन्दी के ब्लॉगर एवं स्वतन्त्र पत्रकार आम जनता तक जल्दी-जल्दी पहुँचायें तो सरकारों पर दबाव बनाया जा सकता है। यदि सरकार द्वारा यही सारे उपाय 2G के नीलामी में ही अपना लिये जाते तो सरकार के खाते में और 60,000 करोड़ रुपये जमा हो जाते।

(दिक्कत यह है कि यदि ऐसी प्रक्रिया सभी बड़े-छोटे ठेकों में अपनाई जाने लगे, तो कांग्रेसियों को चुनाव लड़ने का पैसा निकालना मुश्किल हो जाये… दूसरी दिक्कत यह है कि सभी को मोटी मलाई चाहिये, जबकि इतने बड़े सौदों में “तपेले की तलछट” में ही इतनी मलाई होती है कि “बिना कुछ किये” अच्छा खासा पेट भर सकता है, लेकिन फ़िर भी पता नहीं क्यों इतना सारा पैसा स्विट्ज़रलैण्ड की बैंकों में सड़ाते रहते हैं ये नेता लोग…?)

बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि इतनी सारी प्रक्रियाएं अपनाने के बावजूद सारा मामला एकदम पाक-साफ़ ही हुआ हो, लेकिन फ़िर भी जिस तरह से राजा बाबू खुलेआम डाका डाले हुए थे उसके मुकाबले कम से कम प्रक्रिया पारदर्शी दिखाई तो दे रही है। 3G की नीलामी में राजा बाबू को पैसा खाने नहीं मिला और उनके मोटी चमड़ीदार पेट पर लात तो पड़ ही गई है, लेकिन फ़िर भी “जिस उचित जगह” पर उन्हें लात पड़नी चाहिये थी, वह अब तक नहीं पड़ी है… देखते हैं “ईमानदार बाबू” का धर्म-ईमान कब जागता है।

>बुन्देली लोक साहित्य के संरक्षण-संवर्धन की आवश्यकता

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किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति, भाषा, बोली आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकविश्वासों, लोकरंजन के विविध पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सांस्कृतिकता का, ऐतिहासिकता का लोप होने, उसके विनष्ट होने से उस क्षेत्र में विकास की गति और भविष्य का उज्ज्वल पक्ष कहीं दूर तिरोहित होने लगता है।

(चित्र गूगल छवियों से साभार)

बुन्देली संस्कृति के सामने, इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, भाषा-बोली के सामने अपने अस्तित्व का संकट लगातार खड़ा हो रहा है। किसी समय में अपनी आन-बान-शान का प्रतीक रहा बुन्देलखण्ड वर्तमान में गरीबी, बदहाली, पिछड़ेपन के लिए जाना जा रहा है। विद्रूपता यह है कि इसके बाद भी बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने वालों की कमी नहीं है। सांस्कृतिक विरासत से सम्पन्न, स्वाभिमान से ओत-प्रोत, शैक्षणिक क्षेत्र में सफलता के प्रतिमान स्थापित करने वाले इस क्षेत्र की विरासत को पूरी तरह से नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। विचार करना होगा कि इस क्षेत्र में पर्याप्त नदियाँ हैं; वैविध्यपूर्ण उपजाऊ मृदा है; प्रचुर मात्रा में खनिज सम्पदा है; वनाच्छादित हरे-भरे क्षेत्र हैं फिर भी इस क्षेत्र को विकास के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार का मुँह ताकना पड़ता है।

संसाधनों की पर्याप्तता के बाद भी क्षेत्र का विकास न होना यदि सरकारों की अरुचि को दर्शाता है तो साथ ही साथ यहां के जनमानस में भी जागरूकता की कमी को प्रदर्शित करता है। किसी भी क्षेत्र, समाज, राज्य, देश के विकास में किसी भी व्यक्ति का योगदान उसी तरह से महत्वपूर्ण होता है जैसे कि उस व्यक्ति का अपने परिवार के विकास में योगदान रहता है। परिवार के विकास के प्रति अरुचि होने से विकासयात्रा बाधित होती है, कुछ ऐसा ही बुन्देलखण्ड के साथ हो रहा है। यहां के निवासी उन्नत अवसरों की तलाश में यहाँ से पलायन कर रहे हैं। युवा पीढ़ी अपने आपको किसी भी रूप में इस क्षेत्र में स्थापित नहीं करना चाहती है। इस कारण से इधर के शैक्षणिक संसाधन, औद्योगिक क्षेत्र, खेत-खलिहान, गाँव आदि बदहाली की मार को सह रहे हैं।

बुन्देलखण्ड के कुछ जोशीले, उत्साही नौजवानों और अनुभवी बुजुर्गों के प्रयासों, प्रदर्शनों, संघर्षों, माँगों आदि के द्वारा बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण हेतु कार्य किया जा रहा है। इस प्रयास के चलते और बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने की मंशा से सरकार ‘पैकेज’ आदि के द्वारा आर्थिक सहायता का झिझकता भरा कदम उठाने लगती हैं। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विरासत को देखते हुए इस तरह के प्रयास खुशी नहीं वरन् क्षोभ पैदा करते हैं। यह सब कहीं न कहीं इस क्षेत्र के जनमानस का अपने क्षेत्र के प्रति स्नेह, अपनत्व, जागरूकता में कमी के कारण ही होता है।

जागरूकता में कमी अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर बहुत अधिक है जो नितान्त चिन्ता का विषय होना चाहिए। युवा पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिकता, ऐतिहासिकता से किसी प्रकार का कोई सरोकार नहीं दिखाई देता है। उसे क्षेत्र के लोकसाहित्य, लोककला, लोकगाथा, लोककथा, लोकविश्वास, लोकपर्व आदि के साथ ही साथ इस क्षेत्र की विशेषताओं के बारे में भी पता करने की आवश्यकता नहीं। किसी क्षेत्र का स्वर्णिम अतीत उसके उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला बनता है किन्तु वर्तमान पीढ़ी को अतीत को जानने की न तो चाह है और न ही वह इसके भविष्य को उज्ज्वल बनाने को प्रयासरत् है। यहां की बोली-भाषा को अपनाना-बोलना उसे गँवारू और पिछड़ेपन का द्योतक लगता है। इस दोष के शिकार युवा हैं तो बुजुर्गवार भी कम दोषी नहीं हैं जो अपने गौरवमयी अतीत की सांस्कृतिक विरासत का हस्तांतरण नहीं कर रहे हैं।

हमें समझना होगा कि संस्कृति का, विरासत का हस्तांतरण किसी भी रूप में सत्ता का, वर्चस्व का हस्तांतरण नहीं होता है। इस प्रकार का हस्तांतरण क्षेत्र की सांस्कृतिकता का, सामाजिकता का विकास ही करता है। यह ध्यान हम सभी को रखना होगा कि संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन मनुष्य पशु समान होता है और बुन्देलखण्ड को हम संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन, बोलीविहीन करके उसकी गौरवगाथा को मिटाते जा रहे हैं। यदि इस दिशा में शीघ्र ही प्रयास न किये गये; वर्तमान पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत से, भाषाई-बोली की मधुरता से परिचित न करवाया गया तो बुन्देलखण्ड को एक शब्द के रूप में केवल शब्दकोश में देख पायेंगे। इसके अलावा हम बुन्देलखण्ड के लोक से सम्बन्धित विविध पक्षों को भी सदा-सदा को विलुप्त कर चुके होंगे। स्थिति बद से बदतर हो इसके पूर्व ही हम सभी को सँभलना होगा, इस दिशा में सकारात्मक प्रयास करना होगा।

>: संस्‍कृतगीतम्

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मनसा सततं स्‍मरणीयम्
वचसा सततं वदनीयम् ।।
लोकहितं मम करणीयम् ।।

न भोगभवने रमणीयम्
न च सुखशयने शयनीयम्
अहर्निशं जागरणीयम्
लोकहितं मम करणीयम् ।।

न जातु दु:खं गणनीयम्
न च निजसौख्‍यं मननीयम्
कार्यक्षेत्रे त्‍वरणीयम्
लोकहितं मम करणीयम् ।।

दु:खसागरे तरणीयम्
कष्‍टपर्वते चरणीयम्
विपत्तिविपिने भ्रमणीयम्
लोकहितं मम करणीयम् ।।

गहनारण्‍ये घनान्‍धकारे
बन्‍धुजना ये स्थिता गह्वरे
तत्र मया संचरणीयम्
लोकहितं मम करणीयम्

गेयसंस्‍कृतम् पुस्‍तकात् साभार गृहीत:

>है फटी लंगोटी भारती के लाल की ।।

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     आज की गंदी राजनीति में फंस कर बेहाल हुए देश की दशा का वर्णन बडे ही मार्मिक ढंग से कवि आर्त ने अपनी इन पंक्तियों में किया है ।
प्रस्‍तुत पंक्तियां महाकवि अनिरूद्धमुनि पाण्‍डेय 'आर्त' कृत हनुमच्‍चरितमंजरी महाकाव्‍य से ली गयी हैं ।

कहां वो सुराज्‍य जहां श्‍वान को भी मिले न्‍याय
आज न्‍याय-देवि बिके धनिकों के हॉंथ हैं ।
मन्‍द पडी धर्म, सत्‍य, नीति की परम्‍परायें
कर रहे ठिठोली तप-साधना के साथ हैं ।
परशीलहारी दुराचारिये निशंक घूमें
किन्‍तु पतिरखवारे ठाढे नतमाथ हैं ।
चाह महाकाल की कि चाल कलिकाल की
अचम्‍भा, हाय!  कौन सोच मौन विश्‍वनाथ हैं ।।

सत्‍य अनुरागी हैं उटज में अभावग्रस्‍त
किन्‍तु दूर से ही दिखें कोठियां दलाल की ।
चोरी, घूसखोरी, बरजोरी में ही बरकत है
कोई ब्‍यर्थ क्‍यूं करे पढाई बीस साल की ।
पौंडी-पौंडी उठने का कौन इन्‍तजार करे
वंचकों को चाहिये उठान तत्‍काल की ।
दूर से दमकता दुशाला दगाबाजियों का
'आर्त' है फटी लंगोटी भारती के लाल की ।।

राजनीति की पुनीत वीथि आज पंकिल है
क्षुद्र स्‍वार्थ-साधना में लीन ये जहान है ।
धूर्त, नीच, लम्‍पट, सदैव जो अनीतिरत
लोक-धारणा मे वही बन रहा महान है ।
झूठ, चाटुकारी, पक्षपात का है बोलबाला
जितना पिचाली, उतना ही वो सयान है ।
'आर्त' रे अभागे! हरि सों न अनुरागे
मिथ्‍या दम्‍भ वश त्‍यागे सद्ग्रन्‍थन को ज्ञान है ।।

मानस के राजहंस काक, बक, बृकों मध्‍य
सहें अपमान , रहें आहत हो मौन है ।
गणिका पढाती पाठ सतियों, सावित्रियों को
कपिला को व्‍यंग्‍य कसें सूकरी कै छौन हैं ।
देव-संस्‍कृति के पुजारी मधुशाला चले
मन्दिरों को मुंह चिढाते जालिमों के भौन हैं ।
'आर्त' विलखात हाय! क्‍या है विधिना की चाह
ऐसी दुर्दशा के जिम्‍मेदार कौन कौन हैं ।।

।। कवि अनिरूद्धमुनि पाण्‍डेय 'आर्त' कृत ''हनुमच्‍चरितमंजरी महाकाव्‍य'' से साभार स्‍वीकृत ।।


ANAND

प्रिय पाठकों से एक अनुरोध और एक “डिस्क्लेमर” … (माइक्रो पोस्ट)

प्रिय मित्रों, पाठकों, शुभचिंतकों… राजा बाबू और नीरा राडिया वाली पोस्ट सीरिज के बाद मुझे कई व्यक्तिगत ई-मेल मिले हैं, जिसमें पाठकों ने कहा है कि इस घोटाले के बारे में जानकर उन्हें बेहद आश्चर्य और क्षोभ हुआ है। साथ ही कई पाठकों ने लिखा है कि उनके विभाग में भी इस प्रकार के कई घोटाले उनकी आँख के सामने होते रहते हैं, लेकिन चूंकि उनके हाथ बँधे हुए हैं इसलिये वे इस बारे में कुछ नहीं कर सकते…

अतः ऐसे सभी व्यक्तियों, मित्रों, पाठकों, शुभचिन्तकों, पत्रकार मित्रों सभी-सभी से सादर अनुरोध है कि यदि उनकी निगाह में उनके आसपास किसी सरकारी या निजी विभाग में कोई घोटाला, अनियमितता, अनाचार या अत्याचार चल रहा है, तो कृपया इसकी जानकारी मेरे ई-मेल पर करने का कष्ट करें। यदि आपके पास किसी अनियमितता सम्बन्धी कोई कागज़ात, फ़िल्म क्लिप, मोबाइल क्लिप अथवा अखबार की कटिंग आदि उपलब्ध हो, तो कृपया मुझे स्कैन करके अथवा मुझसे ई-मेल पर सम्पर्क करके मुझे भिजवा सकते हैं।

कई मित्र सरकारी विभागों में हैं, जहाँ उनके पास उस विभाग के घोटाले सम्बन्धी दस्तावेज़ अथवा सूचना के अधिकार के तहत कोई विस्फ़ोटक जानकारी हाथ लग जाती है, और वे उनकी नौकरी पर खतरे की आशंका के तहत इस बारे में यदि कुछ नहीं कर पाते और वाकई दिल से चाहते हैं कि उस अनियमितता को उजागर होना ही चाहिये, तो कृपया वे दस्तावेज (या अन्य सबूत) मुझे भेज सकते हैं… मैं वचन देता हूं और विश्वास दिलाता हूं कि आपका नाम-पता-पहचान गुप्त रखी जायेगी।

चूंकि मेरे जानकारी एकत्र करने के स्रोत तो बहुत सीमित हैं, जबकि कुछ पत्रकार मित्र तो अपने फ़ील्ड सम्पर्कों के जरिये एक से बढ़कर एक गोपनीय दस्तावेज़ ला सकते हैं, लाते भी हैं या उनके पास कहीं से पहुँचते हैं। परन्तु कई बार बड़ी मेहनत से लाई गई उनकी रिपोर्ट को उनका चैनल (अथवा अखबार) उस खबर या दस्तावेज को सार्वजनिक करने (प्रकाशित करने) से इंकार कर देता है। अखबार (चैनल) प्रबन्धन और मालिक के दबाव में वह सनसनीखेज लेकिन “सच्ची रिपोर्ट” दबा दी जाती है क्योंकि उसमें मालिकों के हित-अहित और स्वार्थ जुड़े होते हैं, ऐसे सभी पत्रकार मित्रों से विनम्र अनुरोध है कि वे चाहें तो वह सारा मैटर मुझे भेज सकते हैं… ज़ाहिर है कि उन पर पड़ने वाले दबाव और उनकी नौकरी पर खतरे के कारण, उनका नाम-पता-पहचान आदि बिलकुल गुप्त रखा जायेगा।

देशहित में किसी भी बड़े गैरकानूनी मामले को सामने लाना हम सभी का कर्तव्य है, यदि आप किसी भी मजबूरी की वजह से ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन उसकी आपको जानकारी है, तो वह आप सबूत सहित मुझे भेज सकते हैं, मैं उसे अपने ब्लॉग पर उठाउंगा, मुझे अपनी नौकरी जाने का कोई डर नहीं है, क्योंकि मैं नौकरी करता ही नहीं।

तो भाईयों मैं अपने ई-मेल पर नीरा राडिया जैसे ही कुछ और घोटालों के सबूतों (चित्र, स्कैन इमेज, गोपनीय दस्तावेज, किसी अवैध सरकारी आदेश की छायाप्रति, इत्यादि) का इन्तज़ार कर रहा हूं… निःसंकोच भेजें… (suresh.chiplunkar @ gmail. com)
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अब बारी डिस्क्लेमर कीइस ब्लॉग पर प्रकाशित होने वाले किसी भी लेख, पोस्ट, चित्र अथवा लिंक सम्बन्धी किसी भी कानूनी विवाद का न्यायक्षेत्र उज्जैन (मध्यप्रदेश) रहेगा। आज दिनांक 17 मई 2010 को ब्लॉग लेखक द्वारा यह सार्वजनिक घोषणा की जाती है, ताकि सबको जानकारी हो और सनद रहे…।

कृपया इस डिस्क्लेमर को नीरा राडिया वाली पोस्ट से जोड़कर न देखा जाये… यह डिस्क्लेमर (सर्वसाधारण आम सूचना) भविष्य में किसी भी परेशानी से बचने अथवा कम करने हेतु की जा रही है। जो भी “सज्जन”(?) भविष्य में किसी अदालती विवाद में मुझे निपटाना चाहते हों, उज्जैन में मुकदमा दाखिल करें…।

हस्ताक्षर – सुरेश चिपलूनकर, उज्जैन (मप्र) दिनांक 17/05/2010

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>एक ग़ज़ल : यहाँ लोगो की आँखों में ……

>ग़ज़ल : यहाँ लोगों की आँखों में…….

यहाँ लोगों की आँखों में नमी मालूम होती है
नदी इक दर्द की जैसे थमी मालूम होती है

हज़ारों मर्तबा दिल खोल कर बातें कही अपनी
मगर हर बार बातों में कमी मालूम होती है

चलो रिश्ते पुराने फिर से अपने गर्म कर आएं
दुबारा बर्फ की चादर तनी मालूम होती है

दरीचे खोल कर देखो कहाँ तक धूप चढ़ आई
हवा इस बन्द कमरे की थमी मालूम होती है

हमारे हक़ में जो आता है कोई लूट लेता है
सदाक़त में भी अब तो रहज़नी मालूम होती है

तुम्हारी “फ़ाइलों” में क़ैद मेरी ’रोटियां’ सपने
मिरी आवाज़ “संसद” में ठगी मालूम होती है

उमीद-ओ-हौसला,हिम्मत अभी ना छोड़ना “आनन”
सियाही रात में कुछ रोशनी मालूम होती है

-आनन्द

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