>16 मई को राम राज्य पार्टी मैदान में

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भगवान राम के नाम पर कुछ लोगों ने सिर्फ राजनीति की या कुछ और भी किया, इस मुद्दे पर बहस कई बार हो चुकी है पर एक बात निश्चित है कि आम राम भक्त इस मुद्दे पर निराश रहा. उसे लगता रहा कि उसे छला जा रहा है.अब आम राम भक्त की यह धारणा सही है या गलत इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है लेकिन एक सूचना अभी अभी मेरे इनबाक्स में आई है जो आम राम भक्त के लिए खुशखबरी हो सकती है. कल 16 मई रविवार को हैदराबाद में राम राज्य पार्टी का उदघाटन हो रहा है. अक्षय तृतीय के दिवस को अभिजीत महूरत के पावन मौके पर यह औपचारिक घोषणा हैदराबाद के अमृता आर्केड, काचेगुडा, में सुबह 11 बज कर तीस मिनट पर होगी. आयोजकों ने इस नयी पार्टी के गठन का मकसद राजनीति में आ चुके प्रदूषण को दूर करके इसे शुद्ध करना बताया है. गौरतलब है कि इस पार्टी को संगठित करने में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं स्वामी आत्मयोगी. ग्लोबल राम राज्य, अखंड कश्मीर और ग्लोबल गृह लक्ष्मी जैसे अनेक सफल अभियानों को चला रहे स्वामी आत्मयोगी का कहना है कि भगवान राम के राज्य में किसी को भी तन, मन या धन का कोई दुःख नहीं था. उल्लेखनीय है कि किसी भी क्षेत्र में सफलता पाने के लिए राम राज्य विजयी कोर्स का नया स्तर भी 16 मई को अयोध्या में शुरू किया जा रहा है. स्वामी आत्मयोगी ने विश्व भर में छाई मंदी और भारतीय घरों में आर्थिक संकट के नाज़ुक मुद्दों को लेकर कवितायें भी लिखीं थी. कविता और एक्शन में एक जैसी तेज़ी रखने वाले स्वामी आत्मयोगी के संचालन में यह राम राज्य पार्टी कहां तक अपने निशाने में सफल होती है इसका पता तो अब आने वाले समय में ही लग सकेगा.–रैक्टर कथूरिया 

>विशेष लेख: हिंदी की प्रासंगिकता और चिट्ठाकार -संजीव वर्मा ‘सलिल

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विशेष लेख: हिंदी की प्रासंगिकता और चिट्ठाकार 
संजीव वर्मा ‘सलिल’

हिंदी जनवाणी तो हमेशा से है…समय इसे जगवाणी बनाता जा रहा है. जैसे-जिसे भारतीय विश्व में फ़ैल रहे हैं वे अधकचरी ही सही हिन्दी भी ले जा रहे हैं. हिंदी में संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, उर्दू , अन्य देशज भाषाओँ या अंगरेजी शब्दों के सम्मिश्रण से घबराने के स्थान पर उन्हें आत्मसात करना होगा ताकि हिंदी हर भाव और अर्थ को अभिव्यक्त कर सके. ‘हॉस्पिटल’ को ‘अस्पताल’ बनाकर आत्मसात करने से भाषा असमृद्ध होती है किन्तु ‘फ्रीडम’ को ‘फ्रीडमता’ बनाने से नहीं. दीनिक जीवन में  व्याकरण सम्मत भाषा हमेशा प्रयोग में नहीं ली जा सकती पर वह अशीत्या, शोध या गंभीर अभिव्यक्ति हेतु अनुपयुक्त होती है. हमें भाषा के प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च तथा  शोधपरक रूपों में भेद को समझना तथा स्वीकारना होगा. तत्सम तथा तद्भव शब्द हिंदी की जान हैं किन्तु इनका अनुपात तो प्रयोग करनेवाले की समझ पर ही निर्भर है.

हिंदी में शब्दों की कमी को दूर करने की ओर भी लगातार काम करना होगा. इस सिलसिले में सबसे अधिक प्रभावी भूमिका चिट्ठाकार निभा सकते हैं. वे विविध प्रदेशों, क्षेत्रों, व्यवसायों, रुचियों, शिक्षा, विषयों, विचारधाराओं, धर्मों तथा सर्जनात्मक प्रतिभा से संपन्न ऐसे व्यक्ति हैं जो प्रायः बिना किसी राग-द्वेष या स्वार्थ के सामाजिक साहचर्य के प्रति असमर्पित हैं. उनमें से हर एक को अलग-अलग शब्द भंडार की आवश्यकता है. कभी शब्द मिलते हैं कभी नहीं. यदि वे न मिलनेवाले शब्द को अन्य चिट्ठाकारों से पूछें तो अन्य अंचलों या बोलियों के शब्द भंडार में से अनेक शब्द मिल सकेंगे. जो न मिलें उनके लिये शब्द गढ़ने का काम भी चिट्ठा कर सकता है. इससे हिंदी का सतत विकास होगा. सिविल इन्जीनियरिंग को हिंदी में नागरिकी अभियंत्रण या स्थापत्य यांत्रिकी किअटने कहना चाहेंगे? इसके लिये अन्य उपयुक्त शब्द क्या हो? ‘सिविल’ की हिंदी में न तो स्वीकार्यता है न सार्थकता…फिर क्या करें? सॉइल, सिल्ट, सैंड, के लिये मिट्टी/मृदा, धूल तथा रेत का प्रयोग मैं करता हूँ पर उसे लोग ग्रहण नहीं कर पाते. सामान्यतः धूल-मिट्टी को एक मान लिया जाता है. रोक , स्टोन, बोल्डर, पैबल्स, एग्रीगेट को हिंदी में क्या कहें?  मैं इन्हें चट्टान, पत्थर, बोल्डर, रोड़ा, तथा गिट्टी लिखता हूँ . बोल्डर के लिये कोई शब्द नहीं है? रेत के परीक्षण में  ‘मटेरिअल रिटेंड ऑन सीव’ तथा ‘मटेरिअल पास्ड फ्रॉम सीव’ को हिंदी में क्या कहें? मुझे एक शब्द याद आया ‘छानन’ यह किसी शब्द कोष में नहीं मिला. छानन का अर्थ किसी ने छन्नी से निकला पदार्थ बताया, किसी ने छन्नी पर रुका पदार्थ तथा कुछ ने इसे छानने पर मिला उपयोगी या निरुपयोगी पदार्थ कहा. काम करते समय आपके हाथ में न तो शब्द कोष होता है, न समय. सामान्यतः लोग गलत-सलत अंगरेजी लिखकर काम चला रहे हैं. लोक निर्माण विभाग की दर अनुसूची आज भी सिर्फ अंगरेजी मैं है. निविदा हिन्दी में है किन्तु उस हिन्दी को कोई नहीं समझ पाता, अंगरेजी अंश पढ़कर ही काम करना होता है. किताबी या संस्कृतनिष्ठ अनुवाद अधिक घातक है जो अर्थ का अनर्थ कर देता है. न्यायलय में मानक भी अंगरेजी पाठ को ही माना जाता है. हर विषय और विधा में यह उलझन है. मैं मानता हूँ कि इसका सामना करना ही एकमात्र रास्ता है किन्तु चिट्ठाजगत में एक मंच ऐसा ही कि ऐसे प्रश्न उठाकर समाधान पाया जा सके तो…? सोचें…
                             भाषा और साहित्य से सरकार जितना दूर हो बेहतर… जनतंत्र में जन, लोकतंत्र में लोक, प्रजातंत्र में प्रजा हर विषय में सरकार का रोना क्यों रोती है? सरकार का हाथ होगा तो चंद अंगरेजीदां अफसर वातानुकूलित कमरों में बैठकर ऐसे हवाई शब्द गढ़ेगे जिन्हें जनगण जान या समझ ही नहीं सकेगा. राजनीति विज्ञान में ‘लेसीज फेयर’ का सिद्धांत है आशय वह सरकार सबसे अधिक अच्छी है जो सबसे कम शासन करती है. भाषा और साहित्य के सन्दर्भ में यही होना चाहिए. लोकशक्ति बिना किसी भय और स्वार्थ के भाषा का विकास देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप करती है. कबीर, तुलसी सरकार नहीं जन से जुड़े और जन में मान्य थे. भाषा का जितना विस्तार इन दिनों ने किया अन्यों ने नहीं. शब्दों को वापरना, गढ़ना, अप्रचलित अर्थ में प्रयोग करना और एक ही शब्द को अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग अर्थ देने में इनका सानी नहीं. 
                                                      
चिट्ठा जगत ही हिंदी को विश्व भाषा बना सकता है? अगले पाँच सालों के अन्दर विश्व की किसी भी अन्य भाषा की तुलना में हिंदी के चिट्ठे अधिक होंगे. के उनकी सामग्री भी अन्य भाषाओँ के चिट्ठों की सामग्री से अधिक प्रासंगिक, उपयोगी व् प्रमाणिक होगी? इस प्रश्न का उत्तर यदि ‘हाँ’ है तो सरकारी मदद या अड़चन से अप्रभावित हिन्दी सर्व स्वीकार्य होगी, इस प्रश्न का उत्तर यदि ‘नहीं” है तो हिंदी को ‘हां’ के लिये जूझना होगा…अन्य विकल्प नहीं है. शायद अकम ही लोग यह जानते हैं कि विश्व के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने हमारे सौर मंडल और आकाशगंगा के परे संभावित सभ्यताओं से संपर्क के लिये विश्व की सभी भाषाओँ का ध्वनि और लिपि को लेकर वैज्ञानिक परीक्षण कर संस्कृत तथा हिन्दी को सर्वाधिक उपयुक्त पाया है तथा इनदोनों और कुछ अन्य भाषाओँ में अंतरिक्ष में संकेत प्रसारित किए जा रहे हैं ताकि अन्य सभ्यताएँ धरती से संपर्क कर सकें. अमरीकी राष्ट्रपति अमरीकनों को बार-बार हिन्दी सीखने के लिये चेता रहे हैं किन्तु कभी अंग्रेजों के गुलाम भारतीयों में अभी भी अपने आकाओं की भाषा सीखकर शेष देशवासियों पर प्रभुत्व ज़माने की भावना है. यही हिन्दी के लिये हानिप्रद है.

भारत विश्व का सबसे बड़ा बाज़ार है तो भारतीयों की भाषा सीखना विदेशियों की विवशता है. विदेशों में लगातार हिन्दी शिक्षण और शोध का कार्य बढ़ रहा है. हर वर्ष कई विद्यालयों और कुछ विश्व विद्यालयों में हिंदी विभाग खुल रहे हैं. हिन्दी निरंतर विकसित हो रहे है जबकि उर्दू समेत अन्य अनेक भाषाएँ और बोलियाँ मरने की कगार पर हैं. इस सत्य को पचा न पानेवाले अपनी मातृभाषा हिन्दी के स्थान पर राजस्थानी, मारवाड़ी, मेवाड़ी, अवधी, ब्रज, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी, बुन्देली या बघेली लिखाकर अपनी बोली को राष्ट्र भाषा या विश्व भाषा तो नहीं बना सकते पर हिंदी भाषियों की संख्या कुछ कम जरूर दर्ज करा सकते हैं. इससे भी हिन्दी का कुछ बनना-बिगड़ना नहीं है. आगत की आहत को पहचाननेवाला सहज ही समझ सकता है कि हिंदी ही भावी विश्व भाषा है. आज की आवश्यकता हिंदी को इस भूमिका के लिये तैयार करने के लिये शब्द निर्माण, शब्द ग्रहण, शब्द अर्थ का निर्धारण, अनुवाद कार्य तथा मौलिक सृजन करते रहना है जिसे विश्व विद्यालयों की तुलना में अधिक प्रभावी तरीके से चिट्ठाकर कर रहे हैं.

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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम/ सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम

>ब्लॉगजगत के इन धुरंधरों के कारण आलोक मेहता की बात सच निकली !

>बहुत कोशिश की खुद को इस मुद्दे पर लिखने से रोकने की लेकिन उंगलियाँ की-बोर्ड पर चल निकली है तो बस चार पंक्तियाँ लिख रहा हूँ . मुझे ठीक से याद नहीं है लेकिन होली के अवसर पर आलोक मेहता ने नई दुनिया में लिखते हुए कहा था कि ब्लॉग पर लिखने वाला नाली साफ करने वाली स्टाइल में बदबूदार सामग्री दुनिया-जहां में फैला दे, कोई बाल बांका नहीं कर सकता. इस पर भी ब्लॉगजगत के तमाम सूरमाओं ने पलटवार किये थे . लेकिन पिछले तीन -चार दिन से जो कुछ चल रहा है उसे देख कर खुद मेहता की बात सही लगने लगी है .  समीरलाल-ज्ञानदत्त पाण्डेय-अनूप शुक्ल मामले में जमकर कीचड़  उछाली प्रतियोगिता हो रही है . ये सुरमा अकेले नहीं है . सबकी अपनी अपनी फ़ौज है . इनके सिपाही पोस्ट पर पोस्ट ठेले जा रहे हैं और ब्लोगवाणी पर सर्वाधिक वाला कॉलम इन्हीं की बेकार बातों से भरा पड़ा है .  शर्म आनी चाहिए उन सभी को जो चमचागिरी में लगे हुए हैं किसी के पक्ष तो किसी के विपक्ष में लिख रहे हैं . किसी ने लिख दिया तो क्या कोई घटिया ब्लोगर हो गया या कोई बढ़िया ब्लोगर हो गया ? अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने में तो इन लोगों का जबाव नहीं !  खैर , ब्लॉगजगत के इन धुरंधरों के कारण आलोक मेहता की बात सच निकली ! 

राजा बाबू और नीरा राडिया की जुगलबन्दी, 2G स्पेक्ट्रम महाघोटाला और सीबीआई के कुछ गोपनीय दस्तावेज… (अंतिम भाग) … Spectrum Scandal, A Raja, Neera Radia, CBI, PMO (Part-3)

भाग-1 में हमने देखा कि 2G स्पेक्ट्रम घोटाला क्या है, तथा भाग-2 में हमने देखा कि इस महाघोटाले को कैसे अंजाम दिया गया तथा पैसा किस प्रकार ठिकाने लगाया गया, इस वजह से अब उन पत्रों और दस्तावेजों के मजमून में से कुछ खास-खास बातें पेश करने पर किसी को भी इसे समझने में आसानी होगी, कि किस तरह से उद्योगपति-नेता-अफ़सर का बदकार त्रिकोण हमारे देश को लूट-खसोट रहा है… पेश है तीसरा और अन्तिम भाग…

चूंकि पत्रों-दस्तावेजों की स्कैन प्रति यहाँ अटैच कर ही रहा हूं, इसलिये उसमें उल्लेखित सिर्फ़ कुछ खास-खास बातें ही लिखूंगा… ऐसा करने पर भी लेख लम्बा हो गया है… अतः अधिक विस्तार से पढ़ने के लिये उस पर चटका लगाकर अक्षर बड़े करके पढ़ा जा सकता है –

राजा बाबू को मंत्री बनवाने के समय राजा-राडिया और कनिमोझी के किये गये फ़ोन टेप का चित्र यह है,
जिसमें नीरा, कनिमोझी से कहती हैं – “DMK के कोटे से कौन मंत्री बनेगा कौन नहीं बनेगा इससे प्रधानमंत्री को कोई मतलब नहीं है…प्रधानमंत्री ने कहा है कि उन्हें टीआर बालू अथवा ए राजा से कोई तकलीफ़ नहीं है, दयानिधि मारन ने गुलाम नबी आज़ाद से बात की है, लेकिन अन्तिम निर्णय तो करुणानिधि का ही होगा…, प्रधानमंत्री के सामने पाँच मंत्रालयों की माँग रख दी है और कह दिया है कि यदि नहीं मिले तो हम सरकार में शामिल नहीं होंगे…”
दूसरे फ़ोन में नीरा, राजा बाबू से कहती हैं, “अझागिरी या मारन में से कोई एक मंत्रिमण्डल में आ सकता है, लेकिन एक ही परिवार के तीन लोग होंगे तो करुणानिधि को इसकी सफ़ाई देना मुश्किल होगा… कपड़ा मंत्रालय या उर्वरक मंत्रालय? राजा बाबू कहते हैं कि “हाँ… एक ही परिवार के तीन लोग मंत्री, मुश्किल तो होगी… लेकिन राजनीति में यह तो चलता है…” (हँसते हैं…) खैर देखते हैं आगे क्या होता है…। अन्ततः टाटा और राडिया मिलकर मारन को मंत्रिमण्डल से बाहर रखने में सफ़ल होते हैं… और जमकर सौदेबाजी के बाद DMK के लिये 5 मंत्रालय दिये जाते हैं।

अगले पत्र में सीबीआई के आईपीएस अधिकारी श्री विनीत अग्रवाल ने श्री मिलाप जैन को पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने केस क्रमांक और दिनांक के उल्लेख सहित इस बात को रेखांकित किया है कि नीरा राडिया की कम्पनी नोएसिस कंसल्टेंसी इस पूरे षडयंत्र में पूरी तरह से शामिल है, और इन लोगों पर कड़ी नज़र रखने की जरूरत है, चाहे फ़ोन टेपिंग ही क्यों न करनी पड़े…और इससे जाँच के काम में मदद मिलेगी…

पत्र क्रमांक 2, श्री आशीष अबरोल (आयकर संयुक्त आयुक्त) द्वारा श्री विनीत अग्रवाल को लिखा गया, जिसमें अबरोल ने कहा है कि CBDT से मिली सूचना के आधार पर (गृह सचिव की अनुमति से) नीरा राडिया की फ़ोन लाइनें निगरानी पर ली गई हैं। नीरा राडिया की कम्पनियाँ नोएसिस, वैष्णवी कंसल्टेंसी, विटकॉम और न्यूकॉम, सरकार के विभिन्न विभागों जैसे, टेलीकॉम, पावर, एवियेशन, और इन्फ़्रास्ट्रक्चर में खामख्वाह दखल और सलाह देती हैं। पत्र में दो प्रमुख बातें हैं –
1) यह स्पष्ट है कि नीरा राडिया का टेलीकॉम लाइसेंस के मामले में कुछ भूमिका है।
2) नीरा राडिया और संचार मंत्री के बीच अक्सर सीधी बातचीत होती रहती है।

(अर्थात आयकर, सीबीआई, CBDT तीनों विभागों की निगरानी राडिया और राजा पर थी और इसमें सरकार की सहमति, अनुमति और जानकारी थी…) जबकि सरकार लगातार (आज भी) कहती रही है कि किसी की भी फ़ोन टैपिंग नहीं की गई है…

अगला दस्तावेज़, CBDT के श्री सुधीर चन्द्रा को सम्बोधित किया गया है, और इसमें सौदे में Unitech कम्पनी की संदिग्ध भूमिका, उसकी अनियमितताएं आदि के बारे में बाकायदा टेबल बनाकर बताया गया है, कि किस तरह यूनिटेक ने फ़र्जी लोन एंट्रियाँ दर्शाईं, और केपिटल गेन के 240 करोड़ रुपयों को भी हेराफ़ेरी करके दिखाया।

अगला चित्र इसी का दूसरा पेज है, जिसमें बताया गया है कि अमेरिका के लेहमैन ब्रदर्स के धराशाई हो जाने पर यूनिटेक घबरा गई तब नीरा राडिया ने ही टाटा रियलिटी से कहकर यूनिटेक के लिये 650 करोड़ का एडवांस जुगाड़ करवाया (इसे कहते हैं हाईटेक हाईफ़ाई दल्लेबाजी)। यूनिटेक ने टाटा को जो चेक दिये वह बाउंस हो गये जबकि राडिया ने प्रेस कान्फ़्रेंस में कहा था कि उस एडवांस का हिसाब-किताब हो चुका है। नीरा राडिया ने ही यूनीटेक को लाइसेंस दिलवाने में मुख्य भूमिका निभाई।

अगला पत्र आयकर विभाग की अन्तरिम जाँच रिपोर्ट (जून 2009) का है, जिसमें विभाग द्वारा सरकार को रिपोर्ट पेश की गई है कि नीरा राडिया की कम्पनियों की 9 लाइनों को 180 दिनों तक लगातार निगरानी और टेप किया गया, और इस बातचीत से पता चलता है कि टेलीकॉम, पावर और एवियेशन (उड्डयन) मंत्रालय में इन चारों फ़र्मों की गहरी पैठ है तथा इनके द्वारा कई काम करवाये गये हैं (अर्थात जून 2009 में ही सरकार को पता चल गया था कि राडिया-राजा के बीच जमकर घी-खिचड़ी है, तब भी राजा बाबू को दूरसंचार मंत्रालय सौंपने में “ईमानदार” बाबू को कोई अड़चन नहीं आई?)

अगले पत्र में विभाग की जुलाई 2009 की अन्तरिम जाँच रिपोर्ट है, जिसमें सरकार को बताया गया है कि फ़ोन पर सुनी गई बातों के मुताबिक, सरकार के गोपनीय दस्तावेज और सरकार की नीतियों सम्बन्धी जानकारी राडिया की कम्पनियों को कहीं से लीक हो रही है। टेपिंग के अनुसार अफ़्रीका के गिनी अथवा सेनेगल देशों से भी भारी मात्रा में पैसों के लेनदेन की बात सामने आई है। यह बात भी सामने आई है कि बड़ी मात्रा में निवेश करके भारत के किसी चैनल को खरीदने और अपने पक्ष में तथा विरोधी को परेशान करने के लिये अदालतों में NGOs द्वारा जनहित याचिका लगाने के लिये पैसा दिया जा रहा है। (तात्पर्य यह कि यह सब काले धंधे सरकार को जुलाई 2009 में ही पता चल चुके थे, तब भी “भलेमानुष” हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे? और आज भी कह रहे हैं कि “जाँच जारी है…)

अगला दस्तावेज़ कहता है कि “भारतीय टेलीकॉम के बेताज बादशाह” (अर्थात सुनील भारती मित्तल), नीरा राडिया की मदद से ए राजा से मधुर सम्बन्ध बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि दक्षिण अफ़्रीका की कम्पनी के अधिग्रहण करने में आसानी हो (हालांकि राजा के मंत्री बनने से पहले भारती मित्तल पूरी कोशिश कर चुके थे कि राजा मंत्री न बनने पायें)। इसी पत्र में बताया गया है कि राडिया की “विटकॉम” कम्पनी NDTV इमेजिन का भी काफ़ी कामधाम संभालती है (शायद इसीलिये बरखा दत्त, राडिया की लॉबिंग में लगी थीं), “वैष्णवी” कम्पनी टाटा समूह के “पर्यावरण सम्बन्धी” मामलों का “निपटारा” करती है, जबकि “न्यूकॉम” कम्पनी मुकेश अम्बानी की कुछ कम्पनियों की देखरेख करती है। (अब बताईये भला, टाटा-अम्बानी जैसों से मधुर सम्बन्ध रखने वाली राडिया का बाल भी बाँका हो सकता है क्या?) टेलीफ़ोन टेपिंग से पता चला कि जिन चार कम्पनियों को राडिया ने प्रमुख स्पेक्ट्रम और लाइसेंस दिलवाये उसमें से DataComm कम्पनी को वीडियोकॉन के धूत साहब ने मुकेश अम्बानी समूह के एक खास रसूखदार मनोज मोदी से साँठगाँठ कर खड़ा किया, मनोज मोदी भी लगातार नीरा राडिया के सम्पर्क में बने रहे हैं।

इसी दस्तावेज के अगले पेज पर भी टेलीफ़ोन टेपिंग से सम्बन्धित सीबीआई के कुछ नोट्स हैं – जैसे कि रतन टाटा और नीरा राडिया के बीच लम्बी बातचीत हुई जिसमें टाटा ने दयानिधि मारन को किसी भी कीमत पर मंत्री बनने से रोकने सम्बन्धी पेशकश की है। अप्रत्यक्ष रूप से रतन टाटा Aircell (एयरसेल) कम्पनी के मालिक हैं, और उन्होंने कह दिया था कि यदि मारन संचार मंत्री बने तो वे टेलीकॉम का धंधा ही छोड़ देंगे। नीरा राडिया और कनिमोझी (करुणानिधि की पुत्री) की तरफ़ से बरखा दत्त और वीर संघवी, राजा को मंत्री बनवाने के लिये कांग्रेस में बातचीत कर रहे थे। जबकि दूसरी तरफ़ एयरटेल (मित्तल) चाहते थे कि राजा को मंत्री नहीं बनने दिया जाये और उसे अपना मनपसन्द स्पेक्ट्रम मिल जाये, क्योंकि अनिल अम्बानी की रिलायंस कम्युनिकेशंस को वह अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। बरखा दत्त और नीरा राडिया की इस काम में मदद के लिये तरुण दास, वीर संघवी तथा सुनील अरोरा (राजस्थान कैडर के एक IAS) तैनात थे। इसी प्रकार भारती एयरटेल चाहती थी कि मारन संचार मंत्री बन जायें ताकि CDMA लॉबी की बजाय GSM लॉबी में प्रभुत्व जमाया जा सके। सुनील मित्तल ने राडिया के समक्ष उनके लिये काम करने की पेशकश भी की, लेकिन राडिया ने कहा कि जब तक वे उधर हैं “टाटा” के हितों पर आँच आने जैसा कोई काम नहीं करेंगी। फ़ोन टेप से यह भी पता चला कि सुहैल सेठ के निवास पर सुनील मित्तल से मिलने एक तीसरा व्यक्ति आया था जो कि राडिया और मित्तल के बीच की कड़ी की तरह काम कर रहा था, यही व्यक्ति बाद में मुकेश अम्बानी से भी मिला और उन्होंने नीरा राडिया और सुनील मित्तल के बीच चल रही संदेहास्पद चालों पर अप्रसन्नता व्यक्त की।

अर्थात नीरा राडिया की घुसपैठ लगभग प्रत्येक बड़े उद्योग घराने, मीडिया के प्रमुख लोगों तथा स्वाभाविक रुप से राजनीतिकों तक भी थी… अगले पत्र में यह बताया गया है कि किस तरह से नीरा राडिया के दो सहयोगियों अमित बंसल और आरएस बंसल ने यूनीटेक के लिये पैसों की जुगाड़ की, यूनिटेक को रीयल एस्टेट के धंध मे हुए नुकसान की भरपाई किस तरह करवाई, किस तरह से सरकार को चूना लगाने हेतु काम किया, आदि-आदि। नीरा राडिया और जहाँगीर पोचा, “नईदुनिया” के छजलानी के भी निरन्तर सम्पर्क में थे, ताकि भारत में एक न्यूज़ चैनल शुरु किया जा सके (सम्भवतः न्यूज़ 9X) जिसे बाद में पीटर और इन्द्राणी मुखर्जी अधिग्रहण कर सकें। लगभग सभी मामलों में काम करने का तरीका एक ही था, मीडिया वालों और बड़े पत्रकारों को महंगे उपहार जैसे कार, विदेश यात्रा (और शायद पद्मश्री भी?) आदि का लालच देकर अपने पक्ष में करना

झारखण्ड में टाटा एक खदान की लीज़ बढ़वाना चाहते थे, मधु कौड़ा उनसे 180 करोड़ मांग रहे थे, लेकिन राडिया ने झारखण्ड के राज्यपाल की मदद से टाटा को खदान की लीज़ आगे बढ़वा दी, उसकी उन्हें फ़ीस (आँकड़ा मालूम नहीं) मिली। नीरा राडिया का वित्तीय कारोबार अफ़्रीकी देशों में भी फ़ैला हुआ है, इसीलिये उनकी फ़र्म “ग्लोबल मिनरल्स” के जरिये अफ़्रीकी देशों में पैसा निवेश करने के लिये करुणानिधि के CA मुथुरामन और IAS अधिकारी प्रदीप बैजल उनसे एक ई-मेल में अनुरोध करते हैं।

ADAG और रिलायंस के झगड़ों, हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स में मुकेश अम्बानी की दिलचस्पी, राडिया और मनोज मोदी द्वारा रिलायंस कम्युनिकेशंस को घेरने के षडयन्त्र, मनोज मोदी के मार्फ़त दिल्ली के एक NGO को पैसा देकर न्यायालय में फ़र्जी जनहित याचिकाएं दायर करने… इत्यादि बातों के बारे में पढ़ने के लिये अगला चित्र देखें…

डॉ स्वामी ने आरोप लगाया है कि इस सौदे में सोनिया गाँधी के  केमैन आइलैण्ड स्थित बैंक ऑफ़ अमेरिका के खाते में करोड़ों डॉलर की एंट्रियाँ हुई हैं…। राजनैतिक (और बौद्धिक) क्षेत्रों में अक्सर डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी को गम्भीरता से नहीं लिया जाता, इसकी वजह या तो स्वामी का अधिक बुद्धिमान होना है या फ़िर राजनैतिक दलों में उनके तर्कों के प्रति घबराहट का भाव… कारण जो भी हो, लेकिन डॉ स्वामी ने अकेले दम पर सोनिया गाँधी के खिलाफ़ उनकी नागरिकता, उनके KGB से सम्बन्धों, उन पर बहुमूल्य कलाकृतियों की स्मगलिंग आदि के बारे में कोर्ट केस, आरोपों और याचिकाओं की झड़ी लगा दी है। यदि विपक्ष में जरा भी दम होता और वह एकजुट होता तो उसे डॉ स्वामी का साथ देना चाहिये था? जरा डॉ स्वामी द्वारा प्रेस विज्ञप्ति में जारी विभिन्न आरोपों की सूची देखिये… http://www.janataparty.org/pressdetail.asp?rowid=58

इस महाघोटाले के सम्बन्ध में और भी पढ़ना चाहते हैं तो निम्न लिंक्स पर जाकर देख सकते हैं…

1) http://www.hinduonnet.com/fline/fl2601/stories/20090116260112800.htm

2) http://jgopikrishnan.blogspot.com/2009/03/spectrum-scandal-and-telecom-ministers.html

3) http://www.businessworld.in/bw/2009_10_24_CBI_Raid_Turns_The_Heat_On_DoT.html

4) http://www.telecomasia.net/content/proving-charges-tricky-indias-spectrum-scandal

सारे मामले-झमेले का लब्बेलुबाब यह है कि सीबीआई के अधिकारी और पुलिस जानती है कि किस नेता या उद्योगपति की असल में क्या “औकात” है, किस-किस ने अपने हाथ कहाँ-कहाँ गन्दे किये हुए हैं, लेकिन सीबीआई हो, पुलिस हो या चाहे सेना ही क्यों न हो… सभी के हाथ बँधे हुए हैं, जनता को महंगाई के बोझ तले इतना दबा दिया गया है कि उसे अपनी रोजी-रोटी से ही फ़ुर्सत नहीं मिलती… विपक्षी दलों की पूँछ भी सीबीआई के डण्डे तले ही दबा दी गई है, 95% मीडिया या तो बिका हुआ है अथवा “विचारधारा” के आधार पर लॉबिंग कर रहा है। गिने-चुने हिन्दी ब्लॉगर, 50-100 अंग्रेजी ब्लॉगर और कुछ स्वतन्त्र पत्रकार जिन्हें बमुश्किल 1000-2000 लोग भी नहीं पढ़ते, अपना सिर फ़ोड़ रहे हैं, भला ऐसे में जनता तक बात पहुँचेगी कैसे? 

बहरहाल, प्रस्तुत लेख सीरिज में जो भी दस्तावेज़ पेश किये गए हैं उनमें से कुछ इंटरनेट से, कुछ पत्रकार मित्रों से तथा कुछ अन्य सहयोगियों से ई-मेल पर प्राप्त हुए हैं… इनकी विश्वसनीयता की जाँच कर सकना, मेरे जैसे सीमित संसाधनों वाले आम आदमी के बस की बात नहीं है, लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि इसमें से (बल्कि इससे भी अधिक) गोपनीय दस्तावेज़ देश के लगभग सभी प्रमुख मीडिया संस्थानों और बड़े-बड़े पत्रकारों के पास पहले से ही मौजूद हैं। उनमें से सभी ने इस मामले को दिखाने-छापने से या तो परहेज किया अथवा अपने-अपने स्वार्थ पूर्ति के अनुसार काट-छाँट कर प्रकाशित किया, ऐसा करने के पीछे उनके “आपसी व्यावसायिक सम्बन्ध” हैं।

राजा बाबू आज भी तनकर चल रहे हैं, नीरा राडिया सारा माल-असबाब समेटकर लन्दन में आराम फ़रमा रही हैं… उद्योगपति-IAS अफ़सर के गठजोड़ मस्ती छान रहे हैं, आज तक भ्रष्टाचार के किसी मामले में किसी नेता को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जा सका है… तो इसके पीछे कब्र में पैर लटकाये बैठे उनके करुणानिधि टाइप के सैकड़ों मसीहा, “ऊपर” से आदेश लेकर हर काम करते हमारे भलेमानुष प्रधानमंत्री, “त्यागमूर्ति” और भारत के युवाओं को सपने बेचते भोंदू युवराज, गठबन्धन की कीचड़नुमा राजनीतिक मजबूरी, हमारा सड़ा हुआ लोकतांत्रिक सिस्टम, और कुछ हद तक “लूट से बेखबर”, वोटिंग के दिन घर पर आराम फ़रमाने वाले हम-आप-सभी मिलजुलकर जिम्मेदार हैं…

इति श्री 2G स्पेक्ट्रम महाकथा स्रोत सम्पूर्णम्

2G Spectrum Scam, Mobile Service License Scam, A Rajas role in Telecom 2G Scam, Neera Radia and A Raja, Tamilnadu Politics and Kanuranidhi Family, Telecom Ministry and BSNL, Bharti Airtel, Tata DoCoMo and Swan Technologies, Lalit Modi Sunanda Pushkar and IPL, 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, मोबाइल सेवा लाइसेंस घोटाला, दूरसंचार घोटाला और मंत्री ए राजा, नीरा राडिया और ए राजा, तमिलनाडु की राजनीति और करुणानिधि परिवार, दूरसंचार मंत्रालय तथा BSNL, भारती एयरटेल, टाटा डोकोमो तथा स्वान, ललित मोदी सुनन्दा पुष्कर और IPL, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode

>दोहा का रंग भोजपुरी के संग: संजीव वर्मा ‘सलिल’

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दोहा का रंग भोजपुरी के संग:

संजीव वर्मा ‘सलिल’

सोना दहल अगनि में, जैसे होल सुवर्ण.
भाव बिम्ब कल्पना छुअल, आखर भयल सुपर्ण..
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सरस सरल जब-जब भयल, ‘सलिल’ भाव-अनुरक्ति.
तब-तब पाठक गणकहल, इहै काव्य अभिव्यक्ति..
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पीर पिये अउ प्यार दे, इहै सृजन के रीत.
अंतर से अंतर भयल, दूर- कहल तब गीत..
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निर्मल मन में रमत हे, सदा शारदा मात.
शब्द-शक्ति वरदान दे, वरदानी विख्यात..
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मन ऐसन हहरल रहन, जइसन नदिया धार.
गले लगल दूरी मितल, तोडल लाज पहार..
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कुल्हि कहानी काल्ह के, गइल जवानी साँच.
प्रेम-पत्रिका बिसरि के, क्षेम-पत्रिका बाँच..
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जतने जाला ज़िन्दगी, ओतने ही अभिमान.
तन संइथाला जेतने, मन होइल बलवान..
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चोटिल नागिन के ‘सलिल’, ज़हरीली फुंकार.
बूढ बाघ घायल भयल, बच- लुक-छिप दे मार..
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नेह-छोह राखब ‘सलिल’, धन-बल केकर मीत.
राउर मन से मन मिलल, साँस-साँस संगीत..
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दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पोट.कॉम

>इस सप्ताह के सर्वाधिक लोकप्रिय आलेख ,लेखक के नाम और लिंक दिए गये हैं

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जनोक्ति .कॉम पर इस सप्ताह के सर्वाधिक लोकप्रिय आलेख ,लेखक के नाम और लिंक दिए गये हैं  . आप भी पढ़िये और विमर्श में भाग लीजिये . 

>जागो भारत

>अगर आप सुबह घुमने या रेस लगाने जाते है तो कोई भी पीपल रास्ते में जरूर आता होगा अथवा मंदिर . वहा कुछ स्त्रिया आपको पीपल प़र जल चढाते और देसी घी का दिवा जगाते दिकेंगी पुरूष भी जल चढाने जाते है लेकिन महिलाये अधिक होती है . आपके मन में जरूर आता होगा की पीपल के पेड़ की पूजा क्यों की जाती है . कुछ लोग जो पश्चिमी सोच रखते है वह तो इसे अंधविश्वास कहने से भी नही चुकते होंगे . लेकिन बिना कुछ जाने और सोचे अपने ही लोग एसी बाते करे तो दिल तो दुखता ही है और आस्था हमारी श्रद्ध प़र भी चोट पहुचती है . लेकिन हम फिर भी सब कुछ सहन कर लेते है क्यों की दया , क्षमा ही हमारे संस्कार है . लेकिन उन लोगो को जरुर जान लेना चाहिए यह कोई अंधविश्वास नही है इसके पीछे मनुष्य के कल्याण की कामना है . आइये जाने

पीपल का वृक्ष ही पवित्र और पूजनीय क्यों माना गया है = हिन्दुओ की धार्मिक आस्था के अनुसार सवयम श्री हरी विष्णु पीपल के वृक्ष में निवास करते है . श्री मद्भ्ग्वत्गीता का उपदेश करते समय श्री कृष्ण जी अपने मुख से उच्चारित किये है की वृक्षो में मै पीपल हूँ . सकन्ध पुराण के अनुसार पीपल के मूल में विष्णु , तने में केशव शाखाओं में नारायण और पत्तो में भगवान हरी निवास करते है

वज्ञानिक अर्थ = पीपल ही एक एसा वृक्ष है जो चोबीसो घंटे आक्सीजन निकालता है और कार्ब्न्दैआक्साइद खिचता है .आक्सीजन जिव धारियों के लिये प्राण वायु है . इसके अलावा भी पीपल के वृक्ष में अनेक अन्य विशेषताए है जैसे सर्दी के मोसम में इसकी छाया में बैठने से गर्माहट रहती है और गर्मी के मोसम में शीतलता . एक अन्य विशेषता भी है पीपल के पत्तो से सपर्श करने से वायु में मिले संक्रामक वायरस नष्ट हो जाते है . आयुर्वेद के अनुसार इसकी छाल , पत्तो और फलो से अनेक प्रकार की दवाये बनती है .इस तरह से वज्ञानिक हो अथवा धार्मिक पीपल का वृक्ष सम्पूर्ण समाज को इसकी पूजा करनी चाहिए और अधिक से अधिक पीपल के वृक्ष लगाये ताकि पर्दुष्ण को कम किया जा सके

हम और हमारे संस्कार सम्पूर्ण पृथ्वी के कल्याण के लिये कार्यरत है लेकिन बहुत से लोग बिना कुछ सोचे समझे जाने धर्म प़र ऊँगली उठाते है . लेकिन हिन्दू धर्म प़र अगर विस्तार से शोध किये जाए और छात्र – छात्राओं को भारत की शिक्षा का कुछ भाग भी अच्छे से समझाया जाए तो पूरे विश्व में शान्ति और मानवता का विस्तार हो जाए . और प्रकृति की रक्षा भी

राजा बाबू और नीरा राडिया की जुगलबन्दी, 2G स्पेक्ट्रम महाघोटाला और सीबीआई के कुछ गोपनीय दस्तावेज… (भाग-2)…… 2G Spectrum Scam, A Raja, Neera Radia, CBI, PMO (Part-2)

भाग-1 में हमने देखा था कि 2G स्पेक्ट्रम घोटाले की पृष्ठभूमि क्या है और असल में यह खेल है क्या… इस भाग में, यह घोटाला कैसे किया गया, इसे देखते हैं…

इस महाघोटाले को ठीक से और जल्दी समझने के लिये मैं इसे दिनांक के क्रम में जमा देता हूं –

– 16 मई 2007 को राजा बाबू को प्रधानमंत्री ने कैबिनेट में दूरसंचार मंत्रालय दिया।
(2009 में फ़िर से यह मंत्रालय हथियाने के लिये नीरा राडिया, राजा बाबू और करुणानिधि की पुत्री कनिमोझि के बीच जो बातचीत हुई उसकी फ़ोन टैप की गई थी, उस बातचीत का कुछ हिस्सा आगे पेश करूंगा…)

– 28 अगस्त 2007 को TRAI (दूरसंचार नियामक प्राधिकरण) ने बाजार भाव पर विभिन्न स्पेक्ट्रमों के लाइसेंस जारी करने हेतु दिशानिर्देश जारी किये, ताकि निविदा ठेका लेने वाली कम्पनियाँ बढ़चढ़कर भाव लगायें और सरकार को अच्छा खासा राजस्व मिल सके।

– 28 अगस्त 2007 को ही राजा बाबू ने TRAI की सिफ़ारिशों को खारिज कर दिया, और कह दिया कि लाइसेंस की प्रक्रिया जून 2001 की नीति (पहले आओ, पहले पाओ) के अनुसार तय की जायेंगी (ध्यान देने योग्य बात यह है कि 2001 में भारत में मोबाइलधारक सिर्फ़ 40 लाख थे, जबकि 2007 में थे पैंतीस करोड़। (यानी राजा बाबू केन्द्र सरकार को चूना लगाने के लिये, कम मोबाइल संख्या वाली शर्तों पर काम करवाना चाहते थे।)

– 20-25 सितम्बर 2007 को राजा ने यूनिटेक, लूप, डाटाकॉम तथा स्वान नामक कम्पनियों को लाइसेंस आवेदन देने को कह दिया (इन चारों कम्पनियों में नीरा राडिया तथा राजा बाबू की फ़र्जी कम्पनियाँ भी जुड़ी हैं), जबकि यूनिटेक तथा स्वान कम्पनियों को मोबाइल सेवा सम्बन्धी कोई भी अनुभव नहीं था, फ़िर भी इन्हें इतना बड़ा ठेका देने की योजना बना ली गई

– दिसम्बर 2007 में दूरसंचार मंत्रालय के दो वरिष्ठ अधिकारी (जो इस DOT की नीति को बदलने का विरोध कर रहे थे, उसमें से एक ने इस्तीफ़ा दे दिया व दूसरा रिटायर हो गया), इसी प्रकार राजा द्वारा “स्वान” कम्पनी का पक्ष लेने वाले दो अधिकारियों का ट्रांसफ़र कर दिया गया। इसके बाद राजा बाबू और नीरा राडिया का रास्ता साफ़ हो गया।

– 1-10 जनवरी 2008 : राजा बाबू पहले पर्यावरण मंत्रालय में थे, वहाँ से वे अपने विश्वासपात्र(?) सचिव सिद्धार्थ बेहुरा को दूरसंचार मंत्रालय में ले आये, फ़िर कानून मंत्रालय को ठेंगा दिखाते हुए DOT ने ऊपर बताई गई चारों कम्पनियों को दस दिन के भीतर नौ लाइसेंस बाँट दिये

22 अप्रैल 2008 को ही राजा बाबू के विश्वासपात्र सेक्रेटरी सिद्धार्थ बेहुरा ने लाइसेंस नियमों में संशोधन(?) करके Acquisition (अधिग्रहण) की जगह Merger (विलय) शब्द करवा दिया ताकि यूनिटेक अथवा अन्य सभी कम्पनियाँ “तीन साल तक कोई शेयर नहीं बेच सकेंगी” वाली शर्त अपने-आप, कानूनी रूप से हट गई।

– 13 सितम्बर 2008 को राजा बाबू ने BSNL मैनेजमेंट बोर्ड को लतियाते हुए उसे “स्वान” कम्पनी के साथ “इंट्रा-सर्कल रोमिंग एग्रीमेण्ट” करने को मजबूर कर दिया। (जब मंत्री जी कह रहे हों, तब BSNL बोर्ड की क्या औकात है?)

– सितम्बर अक्टूबर 2008 : “ऊपर” से हरी झण्डी मिलते ही, इन कम्पनियों ने कौड़ी के दामों में मिले हुए 2G स्पेक्ट्रम के लाइसेंस और अपने हिस्से के शेयर ताबड़तोड़ बेचना शुरु कर दिये- जैसे कि स्वान टेलीकॉम ने अपने 45% शेयर संयुक्त अरब अमीरात की कम्पनी Etisalat को 4200 करोड़ में बेच दिये (जबकि स्वान को ये मिले थे 1537 करोड़ में) अर्थात जनवरी से सितम्बर सिर्फ़ नौ माह में 2500 करोड़ का मुनाफ़ा, वह भी बगैर कोई काम-धाम किये हुए। अमीरात की कम्पनी Etisalat ने यह भारी-भरकम निवेश मॉरीशस के बैंकों के माध्यम से किया (गौर करें कि मॉरीशस एक “टैक्स-स्वर्ग” देश है और ललित मोदी ने भी अपने काले धंधे ऐसे ही देशों के अकाउंट में किये हैं और दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही भारत जैसे भ्रष्ट देशों से आये हुए काले पैसे पर चलती है)…

बहरहाल आगे बढ़ें…

– यूनिटेक वायरलेस ने अपने 60% शेयर नॉर्वे की कम्पनी टेलनॉर को 6200 करोड़ में बेचे, जबकि यूनिटेक को यह मिले थे सिर्फ़ 1661 करोड़ में।

– टाटा टेलीसर्विसेज़ ने अपने 26% शेयर जापान की डोकोमो कम्पनी को 13230 करोड़ में बेच डाले।

अर्थात राजा बाबू और नीरा राडिया की मिलीभगत से लाइसेंस हथियाने वाली लगभग सभी कम्पनियों ने अपने शेयरों के हिस्से 70,022 करोड़ में बेच दिये जबकि इन्होंने सरकार के पास 10,772 करोड़ ही जमा करवाये थे। यानी कि राजा बाबू ने केन्द्र सरकार को लगभग 60,000 करोड़ का नुकसान करवा दिया (अब इसमें से राजा बाबू और नीरा को कितना हिस्सा मिला होगा, यह कोई बेवकूफ़ भी बता सकता है, तथा सरकार को जो 60,000 करोड़ का नुकसान हुआ, उससे कितने स्कूल-अस्पताल खोले जा सकते थे, यह भी बता सकता है)।

– 15 नवम्बर 2008 को केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने राजा बाबू को नोटिस थमाया, सतर्कता आयोग ने इस महाघोटाले की पूरी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप दी और लोकतन्त्र की परम्परानुसार(?) राजा पर मुकदमा चलाने की अनुमति माँगी।

– 21 अक्टूबर 2009 को (यानी लगभग एक साल बाद) सीबीआई ने इस घोटाले की पहली FIR लिखी।

29 नवम्बर 2008, 31 अक्टूबर 2009, 8 मार्च 2010 तथा 13 मार्च 2010 को डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री को कैबिनेट से राजा को हटाने के लिये पत्र लिखे, लेकिन “भलेमानुष”(?) के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।

– 19 मार्च 2010 को केन्द्र सरकार ने अपने पत्र में डॉ स्वामी को जवाब दिया कि “राजा पर मुकदमा चलाने अथवा कैबिनेट से हटाने के सम्बन्ध में जल्दबाजी में कोई फ़ैसला नहीं लिया जायेगा, क्योंकि अभी जाँच चल रही है तथा सबूत एकत्रित किये जा रहे हैं…”

– 12 अप्रैल 2010 को डॉ स्वामी ने दिल्ली हाइकोर्ट में याचिका प्रस्तुत की।

– 28 अप्रैल 2010 को राजा बाबू तथा नीरा राडिया के काले कारनामों से सनी फ़ोन टेप का पूरा चिठ्ठा (बड़े अफ़सरों और उद्योगपतियों के नाम वाला कुछ हिस्सा बचाकर) अखबार द पायनियर ने छाप दिया। अब विपक्ष माँग कर रहा है कि राजा को हटाओ, लेकिन कब्र में पैर लटकाये बैठे करुणानिधि, इस हालत में भी दिल्ली आये और सोनिया-मनमोहन को “धमका” कर गये हैं कि राजा को हटाया तो ठीक नहीं होगा…।

जैसा कि मैंने पहले बताया, राजा-करुणानिधि-कणिमोझी-नीरा राडिया जैसों को भारी-भरकम “कमीशन” और “सेवा-शुल्क” दिया गया, यह कमीशन स्विस बैंकों, मलेशिया, मॉरीशस, मकाऊ, आइसलैण्ड आदि टैक्स हेवन देशों की बैंकों के अलावा दूसरे तरीके से भी दिया जाता है… आईये देखें कि नेताओं-अफ़सरों की ब्लैक मनी को व्हाइट कैसे बनाया जाता है –

17 सितम्बर 2008 को चेन्नई में एक कम्पनी खड़ी की जाती है, जिसका नाम है “जेनेक्स एक्ज़िम”, जिसके डायरेक्टर होते हैं मोहम्मद हसन और अहमद शाकिर। इस नई-नवेली कम्पनी को “स्वान” की तरफ़ से दिसम्बर 2008 में अचानक 9.9% (380 करोड़) के शेयर दे दिये जाते हैं, यानी दो कौड़ी की कम्पनी अचानक करोड़ों की मालिक बन जाती है, ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि स्वान कम्पनी के एक डायरेक्टर अहमद सैयद सलाहुद्दीन भी जेनेक्स के बोर्ड मेम्बर हैं, और सभी के सभी तमिलनाडु के लोग हैं। सलाहुद्दीन साहब भी दुबई के एक NRI बिजनेसमैन हैं जो “स्टार समूह (स्टार हेल्थ इंश्योरेंस आदि)” की कम्पनियाँ चलाते हैं। यह समूह कंस्ट्रक्शन बिजनेस में भी है, और जब राजा बाबू पर्यावरण मंत्री थे तब इस कम्पनी को तमिलनाडु में जमकर ठेके मिले थे। करुणानिधि और सलाहुद्दीन के चार दशक पुराने रिश्ते हैं और इसी की बदौलत स्टार हेल्थ इंश्योरेंस कम्पनी को तमिलनाडु के सरकारी कर्मचारियों के समूह बीमे का काम भी मिला हुआ है, और स्वान कम्पनी को जेनेक्स नामक गुमनाम कम्पनी से अचानक इतनी मोहब्बत हो गई कि उसने 380 करोड़ के शेयर उसके नाम कर दिये। अब ये तो कोई अंधा भी बता सकता है कि जेनेक्स कम्पनी असल में किसकी है।

29 मई 2009 को जब राजा बाबू को दोबारा मंत्री पद की शपथ लिये 2 दिन भी नहीं हुए थे, दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस मुकुल मुदगल और वाल्मीकि मेहता ने एक जनहित याचिका की सुनवाई में कहा कि, 2G स्पेक्ट्रम लाइसेंस का आवंटन की “पहले आओ पहले पाओ” की नीति अजीब है, मानो ये कोई सिनेमा टिकिट बिक्री हो रही है? जनता के पैसे के दुरुपयोग और अमूल्य सार्वजनिक सम्पत्ति के दुरुपयोग का यह अनूठा मामला है, हम बेहद व्यथित हैं…”, लेकिन हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बावजूद “भलेमानुष” ने राजा को मंत्रिमण्डल से नहीं हटाया। इसी तरह 1 जुलाई 2009 को जस्टिस जीएस सिस्तानी ने DOT द्वारा लाइसेंस लेने की तिथि को खामख्वाह “जल्दी” बन्द कर दिये जाने की भी आलोचना की।

यह जनहित याचिका दायर की थी, स्वान की प्रतिद्वंद्वी कम्पनी STel ने, अब इस STel को चुप करने और इसकी बाँह मरोड़ने के लिये 5 मार्च 2010 को दूरसंचार विभाग ने गृह मंत्रालय का हवाला देते हुए कहा कि STel कम्पनी के कामकाज के तरीके से सुरक्षा चिताएं हैं इसलिये STel तीन राज्यों में अपनी मोबाइल सेवा बन्द कर दे, न तो कोई नोटिस, न ही कारण बताओ सूचना पत्र। इस कदम से हतप्रभ STel कम्पनी ने कोर्ट में कह दिया कि उसे दूरसंचार विभाग की “पहले आओ पहले पाओ” नीति पर कोई ऐतराज नहीं है, बाद में पता चला कि गृह मंत्रालय ने STel के विरुद्ध सुरक्षा सम्बन्धी ऐसे कोई गाइडलाइन जारी किये ही नहीं थे, लेकिन STel कम्पनी को भी तो धंधा करना है, पानी (मोबाइल सेवा) में रहकर मगरमच्छ (ए राजा) से बैर कौन मोल ले?

क्रमशः जारी आहे… (भाग-3 में हम सीबीआई के कुछ दस्तावेजों में उल्लेखित तथ्यों और जाँच एजेंसी के पत्राचार में आये हुए “कथित रुप से बड़े नामों” का जिक्र करेंगे…)
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विशेष नोट (खेद प्रकाशन) : भाग-1 पढ़ने के बाद, नाम प्रकाशित नहीं करने और पहचान गुप्त रखने की शर्त पर सीबीआई के एक अधिकारी का मेरे ईमेल पर स्पष्टीकरण आया है कि “विनीत अग्रवाल का ट्रांसफ़र किसी दबाव के तहत नहीं किया गया है, यह एक विभागीय प्रक्रिया है कि सीबीआई में सात वर्ष की पुनर्नियुक्ति के बाद सम्बन्धित अधिकारी अपने मूल कैडर में वापस लौट जाता है” अतः विनीत अग्रवाल के तबादले सम्बन्धी मेरे कथन हेतु मैं खेद व्यक्त करता हूं…। सीमित संसाधनों, सूचनाओं के लिये इंटरनेट पर अत्यधिक निर्भरता  और कम सम्पर्कों के कारण, मुझ जैसे छोटे-मोटे ब्लॉगर से कभीकभार इस प्रकार की तथ्यात्मक गलतियाँ हो जाती हैं, जिन्हें तत्काल ध्यान में लाये जाने पर खेद व्यक्त करने का प्रावधान है। हालांकि इस मामले में लगभग सभी बड़े पत्रकारों ने यही लिखा है कि “केस से हटाने और राजा को बचाने के लिये विनीत अग्रवाल का तबादला कर दिया गया है…”, लेकिन बड़े पत्रकार अपनी गलती पर माफ़ी कहाँ माँगते हैं भाई… 🙂

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राजा बाबू और नीरा राडिया की जुगलबन्दी, 2G स्पेक्ट्रम महाघोटाला और सीबीआई के कुछ गोपनीय दस्तावेज… (भाग-1)… 2G Spectrum Scam, A Raja, Neera Radia, CBI, DMK (Part 1)

देश की सर्वोच्च अपराध जाँच संस्था सीबीआई यदि कड़ी मेहनत करके, लगातार 6-8 माह तक किसी के फ़ोन टेप करके पुख्ता सबूत एकत्रित करती है, और जब आगे की पूछताछ के लिये वह प्रधानमंत्री से आदेश माँगती है तो उसे आदेश तो मिलता नहीं, उलटे जाँच करने वाले आईपीएस अधिकारी को उस केस से हटा दिया जाता है… यह किसी फ़िल्म की कहानी नहीं है, हकीकत है… और इस समूचे महाघोटाले में जहाँ एक तरफ़ भलेमानुष(?) प्रधानमंत्री की बेचारगी साफ़ दिखाई देती है, वहीं द पायोनियर और दक्षिण के इक्का-दुक्का अखबारों को छोड़कर इस पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रीय मीडिया(?) की अनदेखी और चुप्पी बहुत रहस्यमयी है। यहाँ तक कि पायोनियर और द हिन्दू अखबारों ने सीबीआई अधिकारियों की आपसी “आधिकारिक” चिठ्ठी-पत्री को सार्वजनिक क्यों नहीं किया यह भी आश्चर्य की बात है। (कुछ दस्तावेज, जो अखबारों ने प्रकाशित नहीं किये अर्थात सीबीआई, CBDT जाँच अधिकारियों द्वारा जाँच की प्रगति और रिपोर्ट, पत्राचार आदि… सूत्रों के हवाले से मुझे मिले हैं, जिन्हें इस पोस्ट में आगे पेश किया जायेगा।)

जी हाँ, तो बात हो रही है, दूरसंचार क्षेत्र में 2G स्पेक्ट्रम आबंटन घोटाले, मंत्री ए राजा की भूमिका, उनकी महिला मित्र नीरा राडिया की संदेहास्पद हलचलें तथा सीबीआई की मजबूरी की। गत कुछ माह से द पायोनियर ने इस पूरे घोटाले की परत-दर-परत खोलकर रखी है तथा करुणानिधि, प्रधानमंत्री तथा ए राजा को लगातार परेशान रखा है। पिछले कुछ महीनों से दूरसंचार मंत्री ए राजा सतत खबरों में बने हुए हैं, हालांकि जितना बने होना चाहिये उतने तो फ़िर भी नहीं बने हैं, क्योंकि जिस प्रकार लालूप्रसाद के चारा घोटाले अथवा बंगारू लक्ष्मण रिश्वत वाले मामले में मीडिया ने आसमान सिर पर उठा लिया था, वैसा कुछ राजा के मामले में अब तक तो दिखाई नहीं दिया है। जबकि राजा के घोटाले को देखकर तो लालूप्रसाद यादव बेहद शर्मिन्दा हो जायेंगे, और उस दिन को लानत भेजेंगे जब उन्होंने दूरसंचार की जगह रेल्वे मंत्रालय चुना होगा। साथ ही शशि थरूर भी उस दिन को कोस रहे होंगे जब उन्होंने खामख्वाह ट्विटर पर ललित मोदी से पंगा लिया और उनकी छुट्टी हो गई।

फ़िर भी शशि थरूर और ए राजा के मामलों में एक बात कॉमन है, वह है एक “औरत” की सक्रिय (बल्कि अति-सक्रिय) भागीदारी। थरूर वाले केस में सुनन्दा पुष्कर थी तो राजा बाबू के साथ “मैं तो छाया बन तेरे संग-संग डोलूं…” की तर्ज पर लन्दन निवासी नीरा राडिया हैं। ठीक लालूप्रसाद वाली शर्मीली मानसिक स्थिति में सुनन्दा पुष्कर भी आ सकती हैं, यदि उन्हें पता चले कि नीरा राडिया ने राजा बाबू के साथ मिलकर जितना माल कमाया है, उतना वह सात पुश्तों में भी नहीं कमा सकतीं और फ़िर भी न तो नीरा राडिया को अब तक कुछ हुआ, न ही राजा बाबू का बाल भी बाँका हुआ, जबकि सुनन्दा के स्वेट शेयर भी गये और थरूर भी मंत्रिमण्डल से बाहर हो गये।

जिन्हें इस महाघोटाले की जानकारी नही है, उन पाठकों के लिये पूरा मामला एक बार फ़िर संक्षेप में बताता हूं –

जैसा कि सभी जानते हैं, टेलीफ़ोन-मोबाइल ऑपरेटरों को क्षेत्र विशेष में अपने मोबाइल चलाने के लिये लाइसेंस लेना पड़ता है और उन्हें एक निश्चित फ़्रीक्वेंसी अलॉट की जाती है, ताकि वे उस पर मोबाइल सेवा प्रदान कर सकें। मोबाइल की पहली जनरेशन जल्दी ही पुरानी हो गई और 2G तकनीक का ज़माना आया, तब बड़े-बड़े मोबाइल ऑपरेटरों ने अपनी-अपनी पसन्द के इलाके में 2G का स्पेक्ट्रम (फ़्रीक्वेंसी रेंज) हासिल करने के लिये जोर लगाना शुरु किया, ताकि उन्हें अधिक मालदार इलाके मिलें (उदाहरण के तौर पर हर मोबाइल कम्पनी चाहेगी कि वह मुम्बई, गुजरात, दिल्ली, पंजाब जैसे राज्यों में अच्छी फ़्रीक्वेंसी और अधिक इलाका कवर कर ले, जबकि झारखण्ड, बिहार, उत्तर-पूर्व के राज्य, उड़ीसा आदि गरीब राज्यों में कोई कम्पनी नहीं जाना चाहेगी, क्योंकि वहाँ से उसे कम राजस्व मिलेगा)। सौदेबाजी और जोड़तोड़ की इस स्टेज पर धमाकेदार एण्ट्री होती है टेलीकॉम मंत्री राजा बाबू की महिला मित्र, “नीरा राडिया” की।

अब सवाल उठता है कि नीरा राडिया कौन हैं? नीरा राडिया चार-पाँच मैनेजमेण्ट कंसलटेंट (प्रबन्धन सलाहकार) कम्पनियों की मालिक हैं, जो “कंसल्टेंट” (यानी सलाह), “लॉबीइंग” (यानी पक्ष में आवाज़ उठाना), “पीआर” (जनसंपर्क) और “ब्रोकर” (खड़ी भाषा में “दलाली”) जैसे सभी काम करती हैं। इसी सत्ता और पैसे की दलाल नीरा राडिया की जुगलबन्दी, हमारे राजा बाबू से विगत चार साल से भी अधिक समय से चली आ रही है। जब विभिन्न कम्पनियों को स्पेक्ट्रम देने की नौबत आई, तब भारती और टाटा समेत सभी कम्पनियों ने जोर-आजमाइश शुरु की। ज़ाहिर सी बात है कि इस जोर-आजमाइश में जो भी मंत्री जी के सबसे अधिक नज़दीक होगा, जिसकी बात मंत्री जी “दिन-रात” सबसे अधिक सुनते हों, उसी के जरिये कोशिश की जायेगी, इसलिये नीरा राडिया एकदम उपयुक्त और फ़िट व्यक्ति थी। नीरा राडिया ने भी पहले से ही कुछ फ़र्जी कम्पनियाँ खड़ी कर रखी थीं, इसलिये उसने भी मित्तल, टाटा आदि को आसानी से हाथ धरने नहीं दिया और बाले-बाले ही स्पेक्ट्रम की अच्छी और मोटी मलाई अलग से छाँटकर “अपने लोगों” के लिये रख ली।
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विशेष नोट :- कई महत्वपूर्ण और गोपनीय दस्तावेजों का अनुवाद मैं आपको अगले भागों में मुहैया करवाता रहूंगा, क्योंकि जो कुछ अखबारों में प्रकाशित हुआ है वह आधा-अधूरा है और अखबारों की अपनी “आर्थिक मजबूरियों” और राजनीति की वजह से अप्रकाशित हैं, लेकिन खबरें हैं बड़ी सनसनीखेज़, मजेदार और सच्ची, क्योंकि यह CBI के हैं। इस घोटाले की जाँच कर रहे IPS अधिकारी विनीत अग्रवाल का भी तबादला कर दिया गया है। जिन चुनिंदा रिपोर्टों का अनुवाद अगले भागों में दिया जायेगा, वे सीबीआई, CBDT विभागों के अन्दरूनी विभागीय पत्राचार हैं, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि हमारी सीबीआई और जाँच एजेंसियां चुस्त-दुरुस्त हैं, काम करने की इच्छुक और सक्षम भी हैं, यदि उन्हें राजनैतिक शिकंजे और दबाव से मुक्त कर दिया जाये तो वे भ्रष्ट नेताओं-अधिकारियों-उद्योगपतियों के “बदकार त्रिकोण” को छिन्न-भिन्न कर देंगी। ऐसा भी नहीं है कि मैं कोई धमाका या भण्डाफ़ोड़ कर रहा हूं क्योंकि जिन पत्रों का मैंने उल्लेख किया है, जब वे मेरे जैसे छोटे-मोटे ब्लॉगर के पास पहुँच सकते हैं तो निश्चित ही देश के प्रमुख अखबारों के पास भी होंगे ही, अन्तर सिर्फ़ इतना है कि उन्होंने फ़ोन टेपिंग की बातचीत और सफ़ेदपोशों के सौदे तथा नाम प्रकाशित नहीं किये…

(भाग-2 में हम तारीखवार सिलसिले से देखेंगे कि राजा बाबू और नीरा राडिया ने इस महाघोटाले को किस तरह अंजाम दिया…तथा कौन-कौन से बड़े चौंकाने वाले नाम इसमें शामिल हैं… )

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  • यदि रचना पूर्व में किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर प्रकाशित हो तो कृपया शीर्षक जरुर बदल दें और संभव हो तो अग्रांश भी बदलने की कोशिश करें .
  • पोस्ट करते समय डेशबोर्ड के दायें साइडबार में दिख रहे केटेगरी में से उपयुक्त का चयन कर उसमें टिक जरुर करें . और यथासंभव उपयुक्त फोटो भी डाल दें .
  • एक आग्रह और है कि अपनी किसी भी रचना को अपने ब्लॉग के अलावा जनोक्ति.कॉम पर पहले प्रकाशित करें , वैसे यह आपके ऊपर है , हमारी कोई बाध्यता नहीं है !

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