मंगलोर विमान दुर्घटना की वजह से "फ़र्जी पासपोर्ट रैकेट" का प्रभाव पुनः दिखाई दिया… Manglore Plane Crash, Fake Passports

कुछ दिनों पहले मंगलोर में एक विमान दुर्घटना हुई थी जिसमें 158 यात्रियों की मौत हुई तथा इस पर काफ़ी हो-हल्ला मचाया गया था। प्रफ़ुल्ल पटेल की इस बात के लिये आलोचना हुई थी कि नई बनी हुई छोटी हवाई पट्टी पर बड़ा विमान उतारने की इजाजत कैसे दी गई? लेकिन न तो इस मामले में आगे कुछ हुआ, न ही किसी मंत्री-अफ़सर का इस्तीफ़ा हुआ। इस विमान दुर्घटना के कई पहलुओं में से एक महत्वपूर्ण पहलू को मीडिया ने पूरी तरह से ब्लैक आउट कर दिया, और वह यह कि मारे गये कम से कम 9 यात्री ऐसे थे, जिनके ज़ब्त सामान की जाँच के बाद उनके पासपोर्ट फ़र्जी पाये गये, इसलिये न तो उनकी सही पहचान हो सकी है, और न ही मुआवज़ा दिया जा सका।

इस बात का खुलासा इस समय हुआ, जब स्थानीय अखबारों ने दुर्घटना में सौभाग्य से जीवित बचे यात्री से पूछताछ की, संयोग से उसके पास भी फ़र्जी पासपोर्ट ही पाया गया। मृतकों में से कुछ यात्री केरल के मूल निवासी थे, लेकिन उनके पासपोर्ट पर तमिलनाडु के घर के पते पाये गये, इसी प्रकार उनके फ़ोटो भी मिलते नहीं थे। केरल के उत्तरी इलाके के कासरगौड़ (Kasargod) जिले के कलेक्टर और एसपी ने इस मामले में जाँच शुरु कर दी है, ताकि विमान दुर्घटना में मारे गये असली लोगों की पहचान की जा सके। अपनी शर्म छिपाने की कोशिश करते हुए एसपी प्रकाश पी. कहते हैं कि “फ़र्जी पासपोर्ट पर इतनी जल्दी नतीजों पर पहुँचना ठीक नहीं है, अभी जाँच चल रही है और हम हरेक दस्तावेज की गम्भीरता से जाँच करेंगे…”। (तो अभी तक क्या कर रहे थे?)

केरल के इस जिले की सीमाएं एक तरफ़ कर्नाटक से लगती हैं, जबकि इस जिले से कन्नूर (Kannur) और मलप्पुरम (Malappuram) जैसे इस्लामी उग्रवाद के गढ़ और सिमी के ठिकाने भी अधिक दूर नहीं हैं। कासरगौड़ जिले में किसी भी आम आदमी से पासपोर्ट लेने के बारे में पूछिये वह आपसे पूछेगा कि “क्या आपको कासरगौड़ दूतावास का पासपोर्ट चाहिये?” “कासरगौड़ एम्बेसी” नामक परिभाषा स्थानीय स्तर पर गढ़ी गई है, जो लोग पासपोर्ट में तकनीक के जरिये फ़ोटो बदलकर नकली पासपोर्ट पकड़ा देते हैं उनके इस “रैकेट” को कासरगौड़ एम्बेसी कहा जाता है, जिसके बारे में “पुलिस और प्रशासन के अलावा” सभी जानते हैं। यह गोरखधंधा 1980 से चल रहा है, लेकिन खाड़ी देशों में काम करने के लालच और गरीबी के चलते असली पासपोर्ट बनवाने में अक्षम लोग इनके जाल में फ़ँस जाते हैं।

ग्लोबल मलयाली फ़ाउण्डेशन (Global Malyali Foundation) के अध्यक्ष वर्गीज़ मूलन, जो कि सऊदी अरब में रहते हैं… कहते हैं कि “केरल में गरीबी और बेरोजगारी के कारण कई मजदूर इस रैकेट के चंगुल में आ ही जाते हैं, जो इनका फ़ायदा उठाकर इन्हें किसी पासपोर्ट में फ़ोटो बदलकर इन्हें खाड़ी भेज देते हैं, दलालों को यह पता होता है कि इनका खाड़ी स्थित मालिक इनके दस्तावेज इन्हे नहीं देगा। बल्कि कई मामलों में तो इनके फ़र्जी पासपोर्ट भी उनके मालिक गुमा देते हैं या जानबूझकर खराब कर देते हैं। इसके बाद ये वहाँ नारकीय परिस्थितियों में काम करते रहते हैं, और जब तंग आकर भारत वापस भागना होता है तब या तो विमान के टायलेट में छिपकर आते हैं, अथवा फ़िर से उसी दलाल को पकड़ते हैं जिसने उसे पासपोर्ट दिलवाया था। वह दलाल फ़िर से उनसे 25000 रुपये लेकर एक और फ़र्जी पासपोर्ट दे देता है। सवाल उठता है कि दलालों के पास यह पासपोर्ट कैसे आते हैं, तो निश्चित रूप से कासरगौड़ के पासपोर्ट कार्यालय में इनके कुछ गुर्गे मौजूद हैं, साथ ही ये लोग ऐसे गरीब हज यात्रियों पर भी निगाह रखते हैं जिन्हें जीवन में सिर्फ़ एक बार ही पासपोर्ट की आवश्यकता पड़ने वाली है। ऐसे लोगों के बेटे और रिश्तेदार इन दलालों को सस्ते में यह पासपोर्ट बेच देते हैं, जिसे दलाल, अफ़सरों और बाबुओं से मिलकर आगे अपने “अंजाम” तक पहुँचाते हैं।

क्राइम ब्रांच के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि देश से बाहर जाने वाले हरेक व्यक्ति की पूरी जाँच की जाती है, लेकिन मंगलोर दुर्घटना के सभी कागज़ातों की जाँच करना अब सम्भव नहीं है, क्योंकि कुछ जल गये हैं और कुछ गायब हो चुके हैं। पुलिस अधिकारी दबी ज़बान में स्वीकार करते हैं कि भले ही पासपोर्ट बनाने वाले एजेण्ट स्थानीय हों, लेकिन यह सारा खेल “खाड़ी देशों से कुछ बड़े लोग” चला रहे हैं।

वैसे फ़र्जी पासपोर्ट का मामला भारत के लिये नई बात नहीं है, अबू सलेम और उसकी प्रेमिका का पासपोर्ट भी भोपाल से बनवाया गया था, जिसमें गलत जानकारी, गलत पता, गलत फ़ोटो, गलत पुलिस सत्यापन किया गया था, लेकिन भारत के कर्मचारी-अधिकारी और अपना काम किसी भी तरह करवाने के लिये बेताब रहने वाली आम जनता इतनी भ्रष्ट है कि देश की सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करने में भी उन्हें कोई शर्म नहीं आती

सरकार दिनोंदिन भारत से अन्तर्राष्ट्रीय हवाई उड़ानों और टर्मिनलों को बढ़ाती जा रही है, लेकिन उन हवाई टर्मिनलों पर सुरक्षा व्यवस्था और जाँच का काम रामभरोसे ही चलता है। केरल जैसे अतिसंवेदनशील राज्य, जहाँ सिमी की जड़ें मजबूत हैं तथा जहाँ से “ईसाई धर्मान्तरण के दिग्गज” पूरे भारत में फ़ैलते हैं, ऐसे राज्य में खाड़ी देशों से आने वाले यात्रियों के पास फ़र्जी पासपोर्ट मिलना इसी ओर इशारा करता है कि कोई भी जब चाहे तब इस देश में आ सकता है, जा सकता है, रह सकता है, बम विस्फ़ोट कर सकता है… कोई रोकने वाला नहीं। कोई भी चाहे तो नेपाल के रास्ते आ सकता है, चाहे तो बांग्लादेश के रास्ते, चाहे तो वाघा बॉर्डर से, चाहे तो कुपवाड़ा-अखनूर से, चाहे तो मन्नार की खाड़ी से, चाहे तो श्रीलंका के रास्ते से… और अब चाहे तो फ़र्जी पासपोर्ट से देश के किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरो, और भीड़ में खो जाओ। तात्पर्य कि कोई कहीं से भी आ सकता है, क्या भारत एक देश नहीं, धर्मशाला है? जहाँ बिना पैसा चुकाये, कोई भी, कैसी भी मौज करता रह सकता है? असल में, सरकार को इन बातों की कोई परवाह नहीं है, जबकि नेताओं-अफ़सरों-नागरिकों को “हराम के पैसों” की लत लग चुकी है, चाहे देश जाये भाड़ में। ऐसे में यदि आप सोचते हैं कि “भारत एक मजबूत और सुरक्षित राष्ट्र” है, तो आप निहायत मूर्ख हैं…

http://www.mangaloretoday.com/mt/index.php?action=mn&type=1012

http://www.youtube.com/watch?v=Yxbh3bwI7k0

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>बच्चे जब आपके बाप बन जाएँ तो उनका सम्मान करें

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खुशी मनाने के कुछ बिन्दु

1- आपके परिवार के बेटे-बेटी मानने लगें कि उनका जन्म आपके परिवार की अभिलाषा नहीं वरन् उन बच्चों के माता-पिता के शारीरिक सुखों की परिणति है।

2- आपके बच्चे मानते हों कि आपने उनके लिए कभी कुछ किया ही नहीं जो कुछ किया है वो इस कारण से क्योंकि आपने अपने शारीरिक सुखों के एवज में उनको पैदा करने का अपराध जो किया था।

3- इस अपराध की सजा के रूप में आपने अपने बच्चों की परवरिश की।

4- खुशी मनाइये कि आपके बच्चे अब आपका कहा हुआ बिलकुल भी नहीं मानते।

5- आपका कुछ भी कहना उनके ऊपर तानाशाही दिखाने जैसा लगने के कारण वे अब घर से बाहर रहना शुरू कर रहे हैं।

6- जलसा मनाइये कि आपके बच्चे अब खुल्लमखुल्ला अपने विपरीतलिंगियों के साथ दिन गुजारने के साथ-साथ रातें भी गुजार रहे हैं।

7- यह आपके लिए खुशी की बात है कि इतनी उम्र के बाद भी आपकी बेटी गर्भवती नहीं हुई है और न ही किसी लड़की ने आकर आपके बेटे से कहा है कि मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ, अर्थात दोनों सुरक्षित साधनों का प्रयोग कर रहे हैं।

8- खुशी अब मनाइये कि आपके बच्चों ने आपको दादा-नाना बनाने वाली खुबर सुना दी, वह भी बिना शादी किये। इसका मतलब है कि आपके बच्चे उतने पिछड़े नहीं जितना कि मुहल्ले वाले समझ रहे थे।

9- यह क्या कम खुशी की बात है कि आपके मना करने की स्थिति में आपके बच्चे घर से भाग सकते हैं। आप उनके भागने का नहीं उनके किसी भी ऐरे-गैरे से शादी करने का इंतजाम करिये।

10- खुश होइये कि आपके ऊपर यह दोष नहीं आयेगा कि आपने अपनी बेटी को किसके पल्ले बाँध दिया अथवा बेटे के पल्ले किसको बाँध दिया।

11- यह तो बहुत खुशी की बात है कि आपकी बेटी ने ऐसे व्यक्ति को अपना जीवनसाथी चुना है जो लगातार अपराध की दुनिया से जुड़ा रहा। आखिर आप ऐसा दामाद खोज सकते थे?

12- यह भी खुश होने वाली खबर है कि आपका बेटा अब तक कइयों लड़कियों को झाँसा देकर गर्भवती बनाता रहा और अब तो शादी कर ही बैठा किसी शादीशुदा महिला से, उसको भगा कर।

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खुश
होने के और भी बिन्दु हैं पर कृपया खुशी में ऑनर किलिंग जैसी हरकत नहीं कीजिए। आप स्वयं विचार करके देखें कि आपको इतनी इज्जत और कौन देगा? आपके बेटे और बेटी ही यदि इस तरह की इज्जत नहीं देंगे तो क्या समाज देगा? आप अपने बेटे और बेटी का बस यहीं तक अच्छा सोच सकते थे, इसके बाद तो सोचना उनका काम है कि किस लड़के अथवा लड़की के साथ वो सुखी रहेंगे।

आप क्यों बिलावजह अपने आदेश को पारित करने का प्रयास करते हैं। याद रखिये एक उम्र के बाद आपके बेटे और बेटियाँ आपके बाप हो जाते हैं। इस अवस्था में आपको अपने इन दत्तक बापों का आदर करना चाहिए।

ऐसे बेटे और बेटियों को ससम्मान समाज में प्रतिष्ठित करो जो अपने माता-पिता की गरिमा, उनकी भावनाओं का आदर नहीं कर सकते हैं।

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(चित्र गूगल छवियों से साभार)

सन्देश—
ऊपर के संदेश का सार समझें और आइये समाज हित में किसी भी तरह की हिंसा को, किलिंग (जो कम से कम ऑनर जैसी तो नहीं है) को बन्द करें।

अब ज़ाकिर नाईक को कनाडा ने भी वीज़ा देने से इंकार किया… … Zakir Naik Denied Visa UK and Canada

बेचारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, उनकी रातों की नींद का क्या होगा। जब-जब किसी “मासूम”, “भटके हुए”, “निरपराध” भारतीय को कोई विदेशी सरकार परेशान करती है तो मनमोहन सिंह की रातों की नींद खराब हो ही जाती है। कुछ दिनों पहले ही यह खबर आई थी कि ब्रिटेन ने “जोकर” (सॉरी जाकिर) नाईक को उनके देश में प्रवेश देने से इंकार कर दिया था (यहाँ देखें… http://arabnews.com/world/article68460.ece) और अब ताज़ा खबर यह है कि “जोकर” (सॉरी… ज़ाकिर) नाईक को कनाडा ने भी अपने यहाँ घुसने से मना किया है (यहाँ देखें…http://peacetimes.net/2010/06/dr-zakir-naik-banned-in-canada-follows-the-footsteps-of-uk/)

मजे की बात तो यह है कि कनाडा की “मुस्लिम कनाडा कॉंग्रेस” के अध्यक्ष तारिक फ़तेह ने खुद ही फ़ेसबुक पर “Keep Zakir Naik Out of Canada” का जोरदार अभियान चलाया था और उन्हें भरपूर समर्थन भी मिला (यहाँ देखें…http://www.facebook.com/group.php?gid=128828540484928&v=app_2373072738)। इससे यह भी साबित होता है कि आम मुस्लिम तो शान्ति से रहना चाहता है, लेकिन कुछ जेहादी टाइप के लोग उन्हें सभी देशों में शक की निगाह से देखे जाने को अभिशप्त बना देते हैं। ज़ाकिर नाईक द्वारा कुरआन की ऊटपटांग व्याख्याओं का विरोध भारत में भी हो चुका है, लेकिन फ़िर रहस्यमयी चुप्पी साध ली गई।

बहरहाल, भारत में ज़ाकिर नाईक और “भटके हुए नौजवानों” के “खैरख्वाह चैम्पियन” यानी कि महेश भट्ट ने ब्रिटेन को धमकी(? हा हा हा हा हा हा) दी है कि इस कारण भारत के साथ उसके सम्बन्ध खराब हो सकते हैं। ज़ाकिर नाईक ने भी कहा है कि वे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से मिलकर उन पर लगे बैन को हटवाने का अनुरोध करने की अपील करेंगे (लेकिन अब तो कनाडा ने भी…? बेचारे कृष्णा को बुढ़ापे में कहाँ-कहाँ दौड़ाओगे यार?)। एक मुस्लिम संगठन ने मुम्बई में ब्रिटिश उच्चायोग (British High Commissioner) के दफ़्तर के सामने प्रदर्शन करने की धमकी भी दी है… यानी चारों तरफ़ से “मासूम” ज़ाकिर को बचाने की मुहिम शुरु की जा चुकी है।

वैसे आप लोगों को यह अच्छी तरह से याद होगा कि किस तरह भारत के एक प्रदेश के तीन-तीन बार चुने हुए संवैधानिक पद पर आसीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) को अमेरिका ने जब वीज़ा देने से इंकार कर दिया था, उस समय कौओं की काँव-काँव सुनाई नहीं दी थी, क्योंकि उस समय मामला किसी “मासूम”, “निरपराध” और “भटका हुआ नौजवान” से जुड़ा हुआ नहीं था…

ज़ाकिर नाईक साहब के कुछ प्रसिद्ध वक्तव्यों की एक बानगी देख लीजिये –

1) “यदि कोई व्यक्ति मुस्लिम से गैर-मुस्लिम बन जाता है तो उसकी सज़ा मौत है, यहाँ तक कि इस्लाम में आने के बाद वापस जाने की सजा भी मौत है…”

2) मुस्लिम देशों में किसी अन्य धर्मांवलम्बी को किसी प्रकार के मानवाधिकार प्राप्त नहीं होने चाहिये, यहाँ तक कि किसी अन्य धर्म के पूजा स्थल भी नहीं बनाये जा सकते…

3) ज़ाकिर नाईक के अनुसार मुस्लिम लोग तो किसी भी देश में मस्जिदें बना सकते हैं लेकिन इस्लामिक देश में चर्च या मन्दिर नहीं चलेगा

4) यदि मुझसे पूछा जाये लादेन इस्लाम के विरोधियों से लड़ रहा है और वह इस्लाम का सच्चा योद्धा है।

5) यदि लादेन सबसे बड़े आतंकवादी देश अमेरिका को आतंक का सबक सिखा रहा है तो हर मुस्लिम को आतंकवादी बन जाना चाहिये।

6) यदि महिलाएं पश्चिमी परिधान पहनती हैं तो वह खुद को बलात्कार का शिकार बनने के लिये “पेश करती” हैं
(उक्त सभी महान विचार बाकायदा अखबारों और यू-ट्यूब पर मौजूद हैं…)

भला बताईये… ऐसे “विद्वान” को अपने देश में घुसपैठ करने से रोक कर ब्रिटेन और कनाडा अपना कितना “बौद्धिक नुकसान” कर रहे हैं।

अब यदि इस मामले में भारत सरकार हस्तक्षेप करती है तो पहले से ही “नंगी” हो चुकी उनकी धर्मनिरपेक्षता और भी “बदकार” सिद्ध हो जायेगी, क्योंकि नरेन्द्र मोदी के मामले में भारत सरकार का मुँह बन्द हो गया था जबकि संवैधानिक रुप से देखा जाये तो मोदी का अपमान देश का अपमान था। साथ ही ज़ाकिर वीज़ा मुद्दे पर दोगले वामपंथियों का रुख भी देखने लायक होगा, जो पहले ही तसलीमा नसरीन वीज़ा मामले में “सेकुलरिज़्म” की रोटी सेंक चुके हैं। मुस्लिमों को खुश करने सम्बन्धी अमेरिका का दोगलापन भी ज़ाहिर हो ही चुका है, क्योंकि उसने नरेन्द्र मोदी को भले ही वीज़ा न दिया हो, लेकिन सिखों के नरसंहार वाले HKL भगत, टाइटलर, सज्जन कुमार से लेकर गैस काण्ड के मौत के सौदागर “अर्जुन सिंह” और “राजीव गांधी” न जाने कितनी बार अमेरिका की यात्रा कर चुके हैं…।

ऐसा महान देश आपने कहीं नहीं देखा होगा, जहाँ विदेश नीति भी “शर्मनिरपेक्षता” के आधार पर तय होती हो… क्योंकि जिस देश को कभी भी “तनकर खड़ा होना” सिखाया ही नहीं गया, जिसे जानबूझकर “एक पार्टी” द्वारा अशिक्षित और गरीब रखा गया, जिसे कुछ पार्टियों ने जानबूझकर स्कूली पुस्तकों में उसकी संस्कृति से काटकर रखा, वह ऐसे ही कीड़े की तरह रेंगता रहता है… और चीन की तरह ताकतवर बनने के सपने (सिर्फ़ सपने) देखता रहता है।

बहरहाल, ज़ाकिर नाईक वीज़ा मामले में आगामी घटनाक्रम पर नज़र रखने की आवश्यकता है, क्योंकि यह भी कांग्रेसियों और वामपंथियों की “शर्मनिरपेक्षता” की राह में एक नज़ीर साबित होगा…। ब्रिटेन और कनाडा ने राह तो दिखाई है लेकिन शायद बराक “हुसैन” ओबामा (जो कम से कम 9 मौकों पर सार्वजनिक रुप से खुद को मुस्लिम कह चुके हैं) इतनी हिम्मत जुटाने में कामयाब न हो सकें…। और भारत की सरकार तो खैर………

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चलते-चलते : विषय से थोड़ा हटकर एकदम ताज़ा खबर मिली है कि गुजरात सरकार को संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा पुरस्कार (UNPSA) हेतु चुना गया है। गुजरात सरकार द्वारा आम जनता की शिकायतों को सुनने के लिये “स्वागत” (SWAGAT – State Wide Attention on Grievances with Application of Technology योजना शुरु की गई थी, जिसमें मुख्यमंत्री खुद 26 जिलों की 225 तहसीलों से सीधे संवाद करते हैं तथा शिकायतों का तत्काल निवारण करते हैं। इस पुरस्कार को दो बार प्राप्त करने वाला गुजरात देश का पहला राज्य है। (यहाँ देखें… http://www.narendramodi.in/#slideshare)

(गैस काण्ड में जनता को लूटने वाले हत्यारों के सरताजों तथा 30 साल से लगातार एक ही राज्य को बरबाद करने वालों, कांग्रेस के हाथों बिके हुए मीडियाई भाण्डों… कुछ तो शर्म करो…)

>दिल तोड़ने वाले देख के चल हम भी तो पड़े हैं राहों में

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आज सुबह अपने खज़ाने में से इकबाल बानो/Iqbal Bano की गज़लों को सुन रहा था, अचानक एक ऐसी गज़ल बजने लगी कि दिल झूमने लगा। इसे मैने पहले कभी भी नहीं सुना था, मेरे अपने संग्रह में होने के बावजूद…… एक बार से मन नहीं भरा.. बार बार सुनी। फिर मन हुआ कि क्यों ना आपको भी सुनवाया जाये। वैसे भी महफिल महीनों से सूनी पड़ी है।

गज़ल और गायिका के लिए कुछ भी नहीं कहा जायेगा, बस सुनिये और आनन्द लीजिये।
http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=11791855-af0

उल्फ़त की नई मंज़िल को चला
तू बाहों में बाहें डाल के
दिल तोड़ने वाले देख के चल
हम भी तो पड़े हैं राहो में

क्या क्या ना जफ़ायें दिल पे सही
पर तुम से कोई शिकवा न किया
इस जुर्म को भी शामिल कर लो
मेरे मासूम गुनाहों में

जहाँ चांदनी रातों में तुम ने
खुद हमसे किया इकरार ए वफ़ा
फिर आज है क्यों हमसे बेगाने
तेरी बेरहम निगाहों में

हम भी है वोही, तुम भी वोही
ये अपनी अपनी किस्मत है
तुम खेल रहे हो खुशियों से
हम डूब गये हैं आहों में

दिल तोड़ने वाले देख के चल
हम भी तो पड़े है राहों में

फिल्म: कातिल (पाकिस्तान) १९५५
शायर:कतील शिफ़ाई
इस गीत को हिन्दी फिल्म कामसूत्र में शोभागुर्टू ने भी गाया था।

डाउनलोड लिंक

>स्मृति गीत: हर दिन पिता याद आते हैं… —संजीव ‘सलिल’

>स्मृति गीत:
हर दिन पिता याद आते हैं…
संजीव ‘सलिल’
*
जान रहे हम अब न मिलेंगे.
यादों में आ, गले लगेंगे.
आँख खुलेगी तो उदास हो-
हम अपने ही हाथ मलेंगे.
पर मिथ्या सपने भाते हैं.
हर दिन पिता याद आते हैं…
*
लाड, डांट, झिडकी, समझाइश.
कर न सकूँ इनकी पैमाइश.
ले पहचान गैर-अपनों को-
कर न दर्द की कभी नुमाइश.
अब न गोद में बिठलाते हैं.
हर दिन पिता याद आते हैं…
*
अक्षर-शब्द सिखाये तुमने.
नित घर-घाट दिखाए तुमने.
जब-जब मन कोशिश कर हारा-
फल साफल्य चखाए तुमने.
पग थमते, कर जुड़ जाते हैं 
हर दिन पिता याद आते हैं…
*
divyanarmada.blogspot.com

वामपंथी अखबारों और समर्थकों के लिये उन्हीं के राज्यों से "धर्मनिरपेक्षता से लबालब" भरे दो समाचार…… Secularism in Communist Kerala-Bengal

पाठकों ने अक्सर विभिन्न ब्लॉग्स और फ़ोरमों पर वामपंथी समर्थकों को अपने सिद्धान्त और नैतिकता या सेकुलरिज़्म सम्बन्धी लेक्चर झाड़ते सुना ही होगा। वामपंथियों को इस बात का मुगालता हमेशा रहा है कि इस देश में सेकुलरिज़्म यदि जिन्दा है तो सिर्फ़ उन्हीं की वजह से, क्योंकि कांग्रेस और भाजपा को वे लोग एक ही सिक्के के दो पहलू मानते आये हैं। हालांकि उनके इन “सिद्धान्तों”(?) की पोल कई बार खुल चुकी है, फ़िर भी वे खुद को “धर्मनिरपेक्षता का असली योद्धा”(?) समझने से बाज नहीं आते…। जैसा कि सभी जानते हैं, केरल और पश्चिम बंगाल में ऐसे ही महान वामपंथियों का कई वर्षों तक सत्ता पर कब्जा रहा है… इन्हीं दो राज्यों से “धर्मनिरपेक्षता से लबालब भरे” दो समाचार आये हैं…

1) तृणमूल कांग्रेस स्टूडेण्ट यूनियन ने महिला शिक्षिका को बुरका पहनने पर मजबूर किया (वामपंथियों ने मौन समर्थन किया) –

कोलकाता की आलिया यूनिवर्सिटी में तृणमूल कांग्रेस स्टूडेंट यूनियन के हसन-उज-जमाँ नामक छात्र नेता ने वहाँ की एक बंगाली शिक्षिका श्रीमती शिरीन मिद्या को बुरका पहनकर कॉलेज आने के लिये धमकाया। जब श्रीमती मिद्या ने बुरका पहनने से मना कर दिया और वाइस चांसलर शम्सुल आलम और रजिस्ट्रार डॉ अनवर हुसैन से शिकायत की तो उन्होंने उस छात्रनेता पर कोई कार्रवाई करने से इंकार कर दिया। उलटे वाइस चांसलर ने उन्हें यूनिवर्सिटी न जाने की सलाह दे डाली। हिम्मती महिला श्रीमती मिद्या ने पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक मंत्री अब्दुल सत्तार से शिकायत की, तो उन्होंने बदले में श्रीमती मिद्या का तबादला यूनिवर्सिटी से साल्ट लेक कैम्पस स्थित लाइब्रेरी में कर दिया। जब इस मामले में पत्रकारों ने रजिस्ट्रार से सम्पर्क किया तो उन्होंने कहा कि “वैसे तो आलिया यूनिवर्सिटी में कोई ड्रेस-कोड नहीं है, लेकिन चूंकि यह मदरसा सिस्टम पर आधारित है, इसलिये महिला शिक्षिकाओं को “शालीन परिधान” पहनना ही चाहिये…” (यानी रजिस्ट्रार “अनवर हुसैन” महोदय मानते हैं कि सिर्फ़ “बुरका” ही शालीन परिधान है…)। क्या आपने किसी महिला संगठन, महिला आयोग या किसी महिला नेत्री को एक महिला शिक्षिका पर हुई इस “ज्यादती” का विरोध करते सुना है? विरोध करने वाली महिला का तबादला किये जाने से यूनिवर्सिटी की बाकी महिलाओं को बुरका पहनाना आसान हो गया है, क्योंकि सभी में श्रीमती मिद्या जैसी हिम्मत नहीं होती। गिरिजा व्यास जी सुन रही हैं क्या?

असल में तृणमूल कांग्रेस ने फ़िलहाल वामपंथियों के “पिछवाड़े में हड़कम्प” मचा रखा है, इसलिये तृणमूल कांग्रेस के एक छात्रनेता को “धार्मिक” मामले (इसे मुस्लिम मामले पढ़ें) में हाथ लगाने की हिम्मत बंगाल के वामपंथी मंत्री की नहीं थी, ऊपर से विधानसभा चुनाव सिर पर आन खड़े हैं सो “धर्मनिरपेक्षता” बरकरार रखने की खातिर एक टीचर का ट्रांसफ़र कर भी दिया तो क्या? लेकिन क्या श्रीमती मिद्या का तबादला करके एक तरह से वामपंथियों ने “अघोषित फ़तवे” का समर्थन नहीं किया है? मुस्लिम वोटों की खातिर सदा हर जगह “लेटने” वाले वामपंथी उस समय सैद्धान्तिक रुप से बुरी तरह उखड़ जाते हैं जब “हिन्दुत्व” या “हिन्दू वोटों” की बात की जाती है…। यहाँ एक और बात नोट करने लायक है कि पश्चिम बंगाल के अधिकतर मुस्लिम बहुल शिक्षा संस्थानों में “गैर-मुस्लिम” शिक्षकों को स्वीकार नहीं किया जा रहा है, भले ही उनके पास आधिकारिक नियुक्ति पत्र (Appointment Letter) हो 

2) दूसरी खबर वामपंथियों के एक और लाड़ले प्रदेश, जहाँ वे बारी-बारी से कांग्रेस के साथ अदला-बदली करके कुण्डली मारते हैं, उस केरल प्रदेश से –

चूंकि केरल में वामपंथी और कांग्रेसी अदल-बदल कर कुंडली मारते हैं इसलिये यह प्रदेश “धर्मनिरपेक्षता की सुनामी” से हमेशा ही ग्रस्त रहा है। देश में कहीं भी धर्म-परिवर्तन का मामला सामने आये, उसमें केरल का कोई न कोई व्यक्ति शामिल मिलेगा, कश्मीर से लेकर असम तक हुए बम विस्फ़ोटो में भी केरल का कोई न कोई लिंक जरूर मिलता है। केरल से ही प्रेरणा लेकर अन्य कई राज्यों ने “अल्पसंख्यकों” (यानी सिर्फ़ मुस्लिम) के कल्याण(?) की कई योजनाएं चलाई हैं, केरल की ही तरह मुस्लिमों को OBC से छीनकर आरक्षण भी दिया है, हिन्दू मन्दिरों की सम्पत्ति पर कब्जा करने के लिये सरकारी ट्रस्टों और चमचों को छुट्टे सांड की तरह चरने के लिये छोड़ दिया है… आदि-आदि। यानी कि तात्पर्य यह कि “धर्मनिरपेक्षता” की गंगा केरल में ही सर्वाधिक बहती है और यहीं से इसकी प्रेरणा अन्य राज्यों को मिलती है।

अब केरल की सरकार के अजा-जजा/पिछड़ा वर्ग समाज कल्याण मंत्री एके बालन ने घोषणा की है कि धर्म परिवर्तन करने (यानी ईसाई बन जाने वालों) के ॠण माफ़ कर दिये जायेंगे। इस सरकारी योजना के तहत जिन लोगों ने 25,000 रुपये तक का ॠण लिया है, और उन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है तो उनके ॠण माफ़ कर दिये जायेंगे। इस तरह से केरल सरकार पर सिर्फ़(?) 159 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा (यह कीमत वामपंथी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों के सामने कुछ भी नहीं है)।

संदेश स्पष्ट और साफ़ है कि “धर्म परिवर्तन करके ईसाई बन जाओ और मौज करो…, अपने धर्म से गद्दारी करने का जो ईनाम वामपंथी सरकार तुम्हें दे रही है, उसका शुक्रिया मनाओ…”।

http://beta.thehindu.com/news/states/kerala/article451983.ece

अब तक तो आप समझ ही गये होंगे कि “असली धर्मनिरपेक्षता” किसे कहते हैं? तो भविष्य में जब भी कोई “वामपंथी दोमुँहा” आपके सामने बड़े-बड़े सिद्धान्तों का उपदेश देता दिखाई दे, तब उसके फ़टे हुए मुँह पर यह लिंक मारिये। ठीक उसी तरह, जिस तरह नरेन्द्र मोदी ने “मौत का सौदागर” वाले बयान को सोनिया के मुँह पर गैस काण्ड के हत्यारों को बचाने और सिखों के नरसंहार के मामले को लेकर मारा है।

रही मीडिया की बात, तो आप लोग “भाण्ड-मिरासियों” से यह उम्मीद न करें कि वे “धर्मनिरपेक्षता” के इस नंगे खेल को उजागर करेंगे… ये हमें ही करना पड़ेगा, क्योंकि अब भाजपा भी बेशर्मी से इसी राह पर चल पड़ी है…। नरेन्द्र मोदी नाम का “मर्द” ही भाजपाईयों में कोई “संचार” फ़ूंके तो फ़ूंके, वरना इस देश को कांग्रेसी और वामपंथी मिलकर “धीमी मौत की नींद” सुलाकर ही मानेंगे…

बुद्धिजीवी(?) इसे धर्मनिरपेक्षता कहते हैं, मैं इसे “शर्मनिरपेक्षता” कहता हूं… और इसके जिम्मेदार भी हम हिन्दू ही हैं, जो कि “सहनशीलता, उदारता, सर्वधर्म समभाव…” जैसे नपुंसक बनाने वाले इंजेक्शन लेकर पैदा होते हैं।
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चित्र साभार – आउटलुक

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>प्रस्‍तुतोमि तद्दृष्‍यं यद्दृष्‍ट्वा सर्वेभारतीया: प्रसन्‍तामनुभवेयु: ।।

>

हिन्‍दी भाषायां पठितुम् अत्र बलाघात: करणीय:
                  प्रस्‍तुतोमि तत् दृष्‍यं यद्दृष्‍ट्वा सर्वे भारतीया: प्रसन्‍नतामनुभविष्‍यन्ति । भवन्‍त: चिन्‍तयन् सन्ति यत् तावत अहं किं दर्शयितुम् इच्‍छामि ।  स्‍वयमेव पश्‍यन्‍तु ।


अस्ति एतत् दृष्‍यं लखनउनगरस्‍य, निरालानगरक्षेत्रस्‍य शिशुमन्दिरे आयोजितस्‍य 10 दिवसीयसंस्‍कृतआवासीयप्रशिक्षणशिविररस्‍य , यत्र सम्‍भवत: 250 प्रशिक्षार्थय: 10 दिवसपर्यन्‍तं  संस्‍कृतसम्‍भाषणस्‍य शिक्षां गृहीतवन्‍त:।  

 शिविरआयोजनस्‍य नवमे दिने नगरभ्रमणम् आयोजितम् , सरस्‍वतीशिशुमन्दिरत: श्रीरामकृष्‍णमठम् । वदतु संस्‍कृतम्, जयतु भारतम् । जयतु जयतु संस्कृत भाषा, वदतु वदतु संस्‍कृतभाषा । ग्रामे ग्रामे नगरे नगरे संस्कृत भाषा इति उद्घोषात् सम्‍पूर्ण विश्‍व जनु गुंजायमान: आसीत् ।

 शिविरायोजनस्‍य दशमे दिने प्रात: 3वादने भारतमातु:  मानचित्रे सर्वे छात्रा: शिक्षका: च पुष्‍पार्पणं कृतवन्‍त: । भारतमातु: मानचित्रं  दीपै: सज्जितं कृतम् ।  भवन्‍त: अस्मिन्  चित्रे भारतमातु: पवित्रविग्रह: द्रष्‍टुं शक्‍नुवन्ति ।

सार्धं भोजनं कुर्वन्‍त: छात्रा:।

अनेन प्रकारेण एतत् 10 दिवसस्‍य संस्‍कृतप्रशिक्षणशिविरं सुन्‍दरतया सफलतया च समाप्‍तम् अभवत् । अस्‍य शिविरस्‍य प्रथमे दिवसे यत्र कस्‍यचित् अपि मुखात् सम्‍यकतया संस्‍कृतस्‍य एक: शब्‍द: अपि न आगच्‍छत् आसीत तत्रैव समापनकार्यक्रमे प्राय: सर्वे प्रशिक्षार्थिन: संस्‍कृते एव स्‍वविचारान् प्रकटितवन्‍त: । अनेन प्रकारेण शिविरायोजनं सर्वथा सफलं आसीत् , अस्‍य प्रमाणस्‍वरूपं ते प्रशिक्षार्थिन: सन्ति ये अत्र प्राँगणे विभिन्‍नप्रकारेण सोत्‍साहं संस्‍कृताभ्‍यास कुर्वन्‍त: सन्ति । 

अत्र केचन जालपुटसंकेतान् दीयते यत्र  बलाघातं कृत्‍वा भवन्‍त: तानि चलचित्राणि  द्रष्‍टुं शक्‍नुवन्ति येषु संस्‍कृताभ्‍यासे रता: सन्ति प्रशिक्षार्थिन:। 

।। अभ्‍यासं कुर्वन्‍त: प्रशिक्षार्थिन: ।।

।। उच्‍चै: स्‍वरै: संस्‍कृतयात्रायां उद्घोषं कुर्वन्‍त: विद्यार्थिन: ।।

।। कार्यक्रमस्‍य समापनं भारतमातु: चरणयो: पुष्‍पार्चनं च ।।


भवतां विचाराणां स्‍वागतमस्ति अत्र, मम उत्‍साहवर्धनाय ।।

http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/

>एक ग़ज़ल : जहाँ पे तुम्हारे सितम….

>ग़ज़ल : जहाँ पर तुम्हारे सितम …..

जहाँ पर तुम्हारे सितम बोलते हैं
वहीं पर हमारे क़लम बोलते हैं

जहाँ बोलने की इजाज़त नहीं है
निगाहों से रंज-ओ-अलम बोलते हैं

ज़माने को ठोकर में रखने की चाहत
ये मन के तुम्हारे भरम बोलते हैं

किसी बेजुबाँ की जुबाँ बन के देखो
शब-ओ-रोज़ क्या अश्क-ए-नम बोलते हैं

जहाँ सर झुकाया ,वहीं काबा ,काशी
मुहब्बत में दैर-ओ-हरम बोलते हैं

बड़ी देर से है अजब हाल “आनन”
न वो बोलते हैं ,न हम बोलते हैं

-आनन्द

>

एकं इतोपि ददातु कलह: जायमान: अस्ति ।


एकदा एक: युवक: एकस्मिन् विपणीं (दुकान में) गत: ।


स: क्रेतां (दुकानदार) प्रति एकचसक (ग्‍लास) सूप: (जूस) दातुम् उक्‍तवान्

यदा क्रेता तं एकचसक सूप: दत्‍तवान् तदा स: सूपं पीत्‍वा 'एकं इतोपि ददातु कलह: जायमान: (झगडा होने वाला) अस्ति' इति उक्‍तवान ।
एकं इतोपि पीत्‍वा स: तथैव पुन: उक्‍तवान यत् एकं इतोपि ददातु कलह: जायमान: अस्ति
एतत् श्रुत्‍वा क्रोधेन क्रेता उक्‍तवान यत् कदा केन वा सह कलह: जायमान: अस्ति
स: उत्‍तरं दत्‍तवान यत् भवता सह भविष्‍यति यदा भवान धनस्‍य कृते वदिष्‍यति तर्हि ।

हाहा हाहा

>एहि हसाम: ।।


एकदा चत्वार: जना: कुत्रचित् एकं लघुआयोजनं (पार्टी) कर्तुं गतवन्‍त: । 

ते आपणत: (दुकान) चत्वार: त्रिकोणपिष्‍टकं (समोसा) स्‍वीकृतवन्‍त: । 

यदा ते आनन्‍दायोजनं कर्तुम् उद्युक्‍ता: आसन् तेषां स्‍मरणम् आगतम् यत् ते इदानीं पर्यन्‍तं शीतपेयं (पेप्‍सी इत्‍यादि) न स्‍वीकृतवन्‍त: ।

ते विचारितवन्‍त: यत् तेषु कश्चित् पुन: विपणीं (बाजार) गत्‍वा शीतलपेयं स्‍वीकुर्यात् ।


तेषु एक: गन्‍तुं स्‍वीकृति: दत्तवान  । 

किन्‍तु यदा पर्यन्‍तम् अहं न आगच्‍छानि तदा पर्यन्‍तं कोपि एकमपि पिष्‍टकं न भुंजेत (खाये) इति स: अवदत् ।

सर्वे अंगीकृतवन्‍त: (स्‍वीकार किया)

स: गत: । 

एक: दिवस: गत:, स: न आगतवान । 

द्वितीय: दिवस: गत:,   पुनरपि स: न आगतवान ।

सर्वे विचारितवन्‍त: यत् सम्‍भवत:  स: विस्‍मृतवान शीतलपेयं आनेतुम् अत: इदानीं वयं स्‍व-स्‍व पिष्‍टकं भुंजेयम  (खायें) ।

अत: तृतीये दिवसे ते पिष्‍टकं भोक्‍तुम्  उद्यता: अभवन । 

यदैव जैसे ही ते पिष्‍टकं हस्‍ते स्‍वीकृतवन्‍त: चतुर्थ: वृक्षस्‍य पृष्‍ठत: (पेड के पीछे से) बहि: आगत: उक्‍त: च 

यदि भवन्‍त: पिष्‍टकं खादिस्‍यन्ति चेत् अहं शीतलपेयं आनेतुं न गच्‍छामि ।।


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