>क्या पीड़ितों को न्याय मिलेगा

>भोपाल को लेकर कांग्रेस में घमासान मचा हुआ है। पच्चीस साल बाद एक निर्णय आने के बाद दोषी कौन की तर्ज पर बयानों का ढेर लग गया है। पच्चीस वर्षों से खामोश बैठे कई तथाकथित ईमानदार अधिकारियों में भी सहसा साहस का संचार हो गया। शायद सेवा निवृत्ति के बाद अब उन्हें किसी का डर नहीं रहा इसलिए अपने पुराने आकाओं के आदेश उन्हें याद आने लगे हैं। आज हर कोई एंडरसन को भारत से भगाने की सुनियोजित साजिश का सत्य देश के सामने रखने को उत्सुक नजर आ रहा है। कुछ पत्रकारों ने मिसेज एंडरसन को भी खोज निकाला है और उनसे भोपाल त्रासदी का हिसाब मांग रहे हैं।

लेकिन पच्चीस साल से ये लोग कहां थे। चंद लोगों को छोड़ कर किसी को भोपाल के लोगों की याद नहीं आई, बस उसके बारे में कतरनों में खबरें छपती रही और हम उन्हें पढ़कर रद्दी के ढेर में डालते रहे। आज एक निर्णय आता है दो साल की कैद और दो लाख का जुर्माना, फिर 25000 के मुचलके में रिहाई और देश में तूफान मच जाता है। फिर शुरू होता है भोपाल त्रासदी से संबंधित खबरों के आने का सिलसिला। एक के बाद एक सनसनीखेज खबरें। लगता ही नहीं कि आ रही खबरें इसी देश की है और पच्चीस साल से हम इन खबरों से महरूम थे। कोई भी न्यूज चैनल लगाइए भोपाल की खबर दे रहा है। कोई वारेन एंडरसन के आधे-अधूरे मुचलके की कापी दिखा रहा है…कोई बता रहा है कि वो धारा 304 में बुक था इसलिए उसे सेशन कोर्ट से ही जमानत मिल सकती थी। अर्जुनसिंह ने पैसा खाकर उन्हें अपने विशेष विमान से दिल्ली पहुँचा दिया ताकि वे आराम से भोपाल के झंझट से मुक्त होकर अमेरिका जा सकें। कलतक सभी कांग्रेसी एंडरसन के देश से भागने के मामले में अर्जुन सिंह पर अपना ठीकरा फोड़ रहे थे। तभी सीआईए की एक रिपोर्ट आ गई जिसके अनुसार राजीव गांधी ने एंडरसन को इसलिए देश से सुरक्षित निकलने दिया ताकि देश के औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए आने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आने में कोई बाधा न आए। इस खुलासे के बाद पूरी कांग्रेस पार्टी राजीव गांधी के बचाव में खड़ी हो गई सभी कह रहे हैं यह सही नहीं है!!! तो फिर सच क्या है? अर्जुनसिंह तो खामोश हैं, वे कुछ बोले तो शायद कुछ नए सच सामने आएं। बेटी कह रही है सही समय आने पर बोलेंगे, वो सही समय कब आएगा भगवान जाने या अर्जुनसिंह जाने।

पूरी स्थिति इतनी उलझी हुई है कि कुछ समझ नहीं आ रहा कि सच क्या है झूठ क्या। सहसा विपक्ष भी कांग्रेस पर हमला करने के लिए अपने अपने दड़बों से निकल आया है, अब इन नेताओं पर कौन और कैसे विश्वास करे क्योंकि पच्चीस साल तक छोटी-छोटी बात के लिए संसद में हंगामा करने वाले ये नेता इतने साल तक चुप क्यों रहे? क्या मजबूरी थी इनकी? कोई नहीं जानता। कांग्रेसी नेता सत्यव्रत का ये कहना और भी हास्यास्पद है कि यह राज्य का मामला था, पच्चीस हजार मौतें, छह लाख प्रभावित और मामला राज्य का, निर्णय राज्य के, केंद्र की कोई भूमिका ही नहीं। गोया भोपाल भारत का नहीं किसी और देश का हिस्सा हो, जहां पर हुई त्रासदी पर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर सब खामोश हो गए या अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लग गए?

जिस तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत आ रही है और केंद्र सरकार अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि दुर्घटना होने की स्थिति में उत्तरदायित्व किस पर आएगा। उल्टे समाचार तो ये आ रहे हैं कि यूनियन कार्बाइड के प्लांट को खरीदने वाले Dow Chemicals के अध्यक्ष को इस सरकार ने 2006 में ही यह आश्वासन दे दिया था कि भोपाल दुर्घटना के लिए उनकी कोई liability नहीं होगी। यहां तक की वो गैस लीक होने वाले स्थल पर फैले कचरे को साफ करने के लिए आवश्यक रु.100 करोड़ तक देने को भी राजी नहीं है। और इस विषय पर पक्ष-विपक्ष एक है। भाजपा के अरुण जेटली इस कंपनी के वकील हैं और भाजपा के रविशंकर उनका बचाव कर रहे हैं कि वे जो कुछ कर रहे हैं वो सही है राजनीति और व्यवसाय को जोड़ा नहीं जा सकता। यही बात सलमान खुर्शीद भी कह रहे है, मतलब इस मुद्दे पर नेताओं में मतभेद नहीं है।

आज सीबीआई अपनी गलती मान रही है कि इस केस में उससे गलती हुई और वो इसे सुधारेगी, पर विडम्बना देखिए कि सुप्रीम कोर्ट के जिस चीफ जस्टिस अहमदी ने यूनियन कार्बाइड पर गैर इरादतन हत्या के आरोप को हटा कर क्रिमिनल नेगलिजेन्स का आरोप कर दिया था जिसके तहत अधिकतम दो वर्ष की सजा ही हो सकती थी, आज यूनियन कार्बाइड द्वारा मिले फंड से बने भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट के प्रमुख हैं। क्या यह मात्र संयोग है या सोची-समझी नीति!!!!

हमारे देश के नेताओं ने भोपाल पीड़ितों के पक्ष में कभी आवाज नहीं उठाई, उल्टे मुआवजे को कम करते हुए कोर्ट के बाहर ही समझौता कर लिया और दुर्भाग्यपूर्ण बात तो ये हैं कि ये पैसा अभी तक पीड़ितों को नहीं मिल पाया है, एक बड़ी राशि अभी तक बैक में पड़ी है। जितनी दोषी यूनियन कार्बाइड है उससे ज्यादा दोषी कांग्रेस है जिसने पूरे मामले कमजोर बनाने अपनी कोशिश लगा दी।

भारत एक राजनीति प्रधान देश है। यहां हर चीज में राजनीति होती है। नेताओं में दृढ़ता का नितांत अभाव है। वे सुपर पावर बनने ख्वाब तो देखते हैं, पर दृढता से अपनी बात कहना नहीं जानते और कही अमेरिका जैसा देश इनके सामने हो तो इनकी तो बोलती ही बंद हो जाती है। ये घरेलू जोड़-तोड़ की कला में तो माहिर हैं, पर ओबामा की तरह कड़क कर अपने नागरिकों के पक्ष में बात नहीं कर सकते। ये नहीं कह सकते कि पांच सौ डॉलर की राशि गैस पीड़ितों के लिए कम है, हमें यूनियन कार्बाइड से उचित मुआवजा मिलना चाहिए।

इस केस में किसी एक व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हमारा सिस्टम ही दोषपूर्ण है। जिसे प्रत्येक राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए तोड़ता मरोड़ता है। जरूरत सिस्टम बदलने की है। किसी की मौत की कीमत अदा नहीं की जा सकती, पर उसके परिवार को भविष्य का सहारा तो दिया ही जा सकता है। कहां है वो नैतिकता, भारतीय संस्कृति जिसकी हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। ये कैसी संस्कृति है जिसमें सब कुछ होता है, बस पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता।

प्रतिभा.

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