वोटिंग – कितने लोग मानते हैं कि यदि “गाँधी परिवार” देश पर काबिज न रहे तो यह देश टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा? (एक प्रश्नों भरी माइक्रो पोस्ट)…… Gandhi Family Inevitable for India?

मेरी पिछली पोस्ट “अपनी गिरेबान में झाँककर देखा है कभी…” काफ़ी विचारोत्तेजक बहस लेकर आई, जिस पर आगे भी चर्चा जारी रहेगी। अमूमन मैं किसी का नाम लेकर अथवा किसी खास टिप्पणी को अपनी पोस्ट का विषय नहीं बनाता, लेकिन भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार श्री वीरेन्द्र जैन साहब की टिप्पणी के कुछ अंश महत्वपूर्ण लगे और इस पर बहस करवाने की इच्छा हुई है। इसी पोस्ट में एक बेनामी साहब (“पिताजी” के नाम से कमेंट करने वाले) ने भी कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये हैं, उन पर भी एक अलग पोस्ट में बिन्दुवार चर्चा की जायेगी… लेकिन फ़िलहाल जैन साहब की टिप्पणी पर अपने विचार रखें…

जैन साहब ने अपनी टिप्पणी में निम्न बातें कही हैं –

1) कांग्रेस का नेहरू-गान्धी परिवार पर निर्भर हो जाना इस इकलौती राष्ट्रव्यापी पार्टी की विवशता है जिसके बिना यह पार्टी टुकड़ों टुकड़ों में बँट जायेगी और दूसरी किसी राष्ट्रव्यापी पार्टी के न होने से देश भी इसी दशा को पहुँचेगा।

सवाल है कि –

अ) गाँधी परिवार है भी तो क्या हमारा देश मजबूत और अखण्ड है?

ब) क्या कोई एक व्यक्ति या परिवार इतना “अपरिहार्य” हो सकता है? कि जिसके बिना काम ही न चले? मैंने तो सुना है कि किसी के मरने-जीने से किसी का काम नहीं रुकता, दुनिया तो चलती ही है।
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2) भाजपा भी इसी परिवार के चरणों में जूते चाटती है। सोनिया और राहुल की योग्यता और चरित्र की तुलना भाजपा के आराध्य मेनका और वरुण से कर के देखिये और सच्चे मन से निष्कर्ष बताइए।

सवाल है कि –

अ) सोनिया और राहुल ने अब तक वाकई में कितनी योग्यता दिखाई है? और उसे मापने का आधार क्या हो? मीडिया रिपोर्टें या सलाहकारों (इसे चमचों भी पढ़ा जा सकता है) द्वारा लिये-दिये गये मनमाने निर्णयों को, जिसकी वजह से महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी समस्याएं मुँह बाये खड़ी हैं।

ब) भाजपा ने मेनका और वरुण को पार्टी के भीतर “कितना” महत्वपूर्ण स्थान दिया है, जिसे “जूते चाटने” की संज्ञा दी जा सके?
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3) देश को लोकतांत्रिक होने में अभी वर्षों लगेंगे। भाजपा इसी कमजोरी को जानती है इसलिए उसके निशाने पर कांग्रेस नहीं केवल सोनिया और राहुल होते हैं क्योंकि कांग्रेस की जान उसी तोते में बसती है।

सवाल है कि –

अ) देश को लोकतांत्रिक होने में वर्षों लगेंगे, जब यही बात कोई गैर-कांग्रेसी कहता है तो उस पर “तानाशाह” और “फ़ासीवादी” होने का आरोप क्यों लगा दिया जाता है?

ब) क्या 100 साल पुरानी पार्टी इतनी निरीह और मजबूर हो गई है कि किसी एक परिवार में “ उसकी जान” बसती है? यदि ऐसा है तो इसका दोषी कौन है?
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जैन साहब के यह विचार महत्वपूर्ण हैं और बहस माँगते हैं, क्योंकि देश के कई “बुद्धिजीवी” ऐसा ही सोचते हैं…

कृपया अपने विचार “संयत भाषा” में और “मुद्दे से सम्बन्धित” ही रखें, किसी भी प्रकार की गालीगलौज व असभ्य भाषा तथा वीरेन्द्र जैन जी को सम्बोधित करके अशालीन शब्दों में की गई टिप्पणी को नहीं लिया जायेगा… इसलिये कृपया बहस को भटकाने के लिये मुद्दे से हटकर टिप्पणी न करें…

व्यस्तता की वजह से कम्प्यूटर से दूरी होने के कारण आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने में समय लग सकता है, थोड़ा संयम रखें। लेकिन चाहे मेरे प्रति कितनी भी आलोचनात्मक टिप्पणी हो (परन्तु भाषा सही हो) तो भी मैं उसे प्रकाशित अवश्य करूंगा…
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“पिताजी” नामक बेनामी के कमेंट से सम्बन्धित विषय (सार्वजनिक जीवन में अनुशासन, नैतिकता और भ्रष्टाचार), पर विस्तार से मेरे विचार और चर्चा शीघ्र ही…

53 Comments

  1. रचना said,

    June 16, 2010 at 9:52 am

    why should only one family rule us we are a democracy we need to find alternatives and i dont think if G family moves out india will be ruined rather on the contrary many better options can come but they have to be not just hindutuv as agenda

  2. June 16, 2010 at 10:02 am

    गाँधी परिवार के रहने या न रहने से देश में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. कांग्रेस पार्टी ने आजादी के बाद (या पहले भी) जो हिन्दू मुस्लिम (जात पांत) के विष बीज बोये थे आज उसके फल के रूप में हर पार्टी में बेईमान और देश की इज्जत लुटने वाले नेता हर कोने में व्याप्त है. कोई यादव कार्ड खेलता है, कोई दलित तो कोई मुस्लिम कार्ड. आज नेताओ का कोई भी गैरकानूनी काम रुकता नहीं (क़ानूनी काम वो करते नहीं) और आम आदमी का कोई क़ानूनी काम भी होता नहीं. अफ़सोस देश कि ये ही नियति है और दुर्भाग्य से देशवासी इसे भुगतने को अभिशप्त है.

  3. June 16, 2010 at 10:25 am

    अभी दो-चार दिन पहले डाक्टर दाराल साहब का एक लेख रेबीज पर पढ़ा था जिसमे उन्होंने बताया था की किसी इंसान को अगर रेबीज हो जाए तो उसका लक्षण है कि वह पानी से डरने लगता है,जिसका कोई इलाज नहीं ! Same way, there is no cure invented yet for the slave mentality also. If some one is considering Nehru-Gandhi Family as a dedicated and mesiahs of India,, then it’s absolutly naive and childish. These families have been running & ruining the nation in the disguise of democracy.

  4. June 16, 2010 at 10:30 am

    सुरेश जी सवाल वास्तव में सिर्फ वीरेंदर जी जैसे लोगों का नहीं है. ऐसे हजारो लोग जो ये मन कर बैठा चुके है कि कांग्रेस ही देश कि माई-बाप है उनको राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर ये लोकतंत्र के हित में सोचना होगा कि एक परिवार का शासन चाहिए या जनता का शासन? यदि एक परिवार भी सही हो सकता है तो कांग्रेस ने राष्ट्रीय एकता भारत की अखंडता और अपनी पुस्तैनी शासन को क्यों नहीं बचा पाई? क्यों सबसे ज्यादा कोंग्रेस का ही विभाजन हुआ? क्यों कांग्रेस खुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हुए 1984 जैसे दंगो के दोषी को अपनाये हुए है? उसी राजनीतिक परिवार के सबसे ज्यादा लोगो की हत्या क्यों हुई? क्यों ६० वर्षों में भी जम्मू-कश्मीर समस्या कांग्रेस के हाथों हाल नहीं हुआ? क्यों भारत को आपातकाल जैसी विभीषिका देखनी पड़ी? क्यों मनमोहन सिंघ जैसे बुद्धिजीवी को कठपुतली बना के रख दिया गया? इन सब सवालों से अपने को बुर्जुआ वर्ग कहलाने का गर्व रखने वाले लोग कतराते है. क्यों कि वास्तविकता ये है कि कांग्रेस ने पिछले सौ वर्षो से जनता को सच्चाई बताने का कोशिश ही नहीं किया. सच्चाई ये है कि कांग्रेस का वर्त्तमान स्वरुप एक छल मात्र है. कांग्रेस तो आजादी के लिए बनी थी…..गाँधी जी ने कहा इसे ख़तम कर देना चाहिए…नेहरु जी ने इसे अपनी जागीर समझ कर रख लिया अपने पास……..तबसे ये जागीर चुराए हुए गाँधी नाम के साथ आ रही है……!

  5. June 16, 2010 at 10:41 am

    वीरेंद्र साहब मानते है,"देश को लोकतांत्रिक होने में अभी वर्षों लगेंगे।" उसका खुल्ला तात्पर्य है कि तब तक वंशवाद ही चलेगा। अर्थार्त नेहरू-गान्धी परिवार का साम्राज्यवाद चलेगा।अब इस सोच पर क्या टिप्पणी दें,साम्राज्यवाद में राजाओं की स्तुति करने वालों को क्या कहा जाता था,लेकिन अफसोस कि वीरेंद्र जी के पीछे लगा जैननिर्थक असत्य पक्षी नहीं हो सकता।

  6. June 16, 2010 at 10:53 am

    अभी भी यह देश और इसकी जनता गुलामी के चंगुल से बाहर नहीं हुई है . प्रजातन्त्र एक कपोलकल्पना है .

  7. June 16, 2010 at 10:55 am

    क्या पत्रकारों को बुद्धिजीवि माना जाना चाहिए?**जैन सा'ब की टिप्पणी पढ़ी थी, फिर समयाभाव के चलते जवाब (करारा) दे नहीं पाया, सोचा पोस्ट लिखुंगा. अब आपकी पोस्ट आ गई है तो देखते हैं, लिखने की जरूरत है भी कि नहीं. **जैन साब के लिए गाँधी परिवार वैसा ही अनिवार्य है जैसा खास धर्मावलम्बी के लिए उसका धर्म व प्रवर्तक. और तो और उस पर कोई बहस की सम्भावना भी नहीं रहती. **नरसिम्हाराव के समय देश टूट कर बिखर गया था. नेहरू के समय कश्मीर व अरूणांचल में देश जूड़ा था. **कश्मीर, पंजाब में अलवादियों को किसने प्रोत्साहन दिया था? आज भी मिश्नरियों के पीछे किसका हाथ है?**गाँधी परिवार फेविकोल नहीं पनौती है.

  8. June 16, 2010 at 10:56 am

    वोटिंग का मोड्युल है शायद. उसे सच में लगाओ.

  9. June 16, 2010 at 11:20 am

    विषयेतर न होते हुए सीधे प्रश्नों से रुबरु होता हूं-उत्तर-1) अ) – अगर मजबूती और अखण्डता की परिभाषा "किसी राष्ट्रव्यापी पार्टी के न होने से देश भी इसी दशा को पहुंच जाएगा, अतः नेहरू-गान्धी परिवार पर निर्भरता आवश्यक है" यही है, तो ऐसी सोच वाली मानसिकता को ढेरो लानत-मलानत के साथ &*%^$%#%$*&**&&ब) – आपने सही सुना है कि किसी के मरने-जीने से किसी का काम नहीं रुकता, लेकिन तभी तक…. जब तक बात "सोनिया माइनो मादाम" से इतर लोगों की हो.——————————उत्तर-2) अ) – सवाल का उत्तर आपके प्रश्न में ही है कि यह बात एक गैर-कांग्रेसी कह रहा है….ब) – यह बात तो श्रीमान्‌ सोनियाभक्त खोजू पत्रकार महाशय को ज्यादे पता होगी.——————————उत्तर-3) अ) – प्रश्न 2) अ) का उत्तर यहां भी लागू होता है.ब) – हां जी, इस पार्टी में सभी कठपुतली ही हैं, और नचाने वाला एक परिवार-विशेष, जिसने यह भविष्य देखा कि भारत की शक्ल सुधारने के लिए विदेशी नस्ल की आवश्यकता महती है, और इसी महती आवश्यकता को पूरा करने के लिए कुछ समय बाद इटली से एक बहू का आयात किया गया.

  10. June 16, 2010 at 11:32 am

    ब्लॉग के महत्वपूर्ण पोस्टों पर चर्चा से कितने लाभ होते हैं, यह आज सामने है.# प्रथम बिंदु कांग्रेस पार्टी के लिए यक्ष प्रश्न है.सचाई यही है की गांधी-नेहरु परिवार पिछले ५० वर्षों से जनता की सहानुभूति प्राप्त करता आ रहा है. राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव और निरंतर गलत निर्णयों के बावजूद यह परिवार पार्टी में सर्वेसर्वा बना हुआ है और यही दुर्भाग्य है.असल में कांग्रेस के जितने भी अच्छे कर्मठ नेता है वे या तो पार्टी छोड़ चुके है या दूसरी पार्टी का गठन कर चुके है. शरद पवार, तारिक अनवर, पी.संगमा, नरसिम्हा राव (और कुछ अन्य) जैसे जमीन से जुड़े कांग्रेसी नेताओं को कभी इस परिवार ने सम्मान और उचित स्थान नही दिया. आज जितने भी शीर्ष कांग्रेसी नेता हैं वे योग्य होते हुए भी अपना दिमाग गिरवी रख चुके हैं (एक उदाहरण मनमोहन सिंह की लाचारी). असल में अधिकाँश कांग्रेसी नेताओं का चरित्र ऐसा है की वो अपने किसी दुसरे राज्य के कांग्रेसी को उच्च पद पर देखना पसंद नही करते. इनमे अलगाववाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद की गन्दी मानसिकता बहुत ज्यादा है. अतः ये लोग घूम फिर कर इसी सोनिया राहुल (गांधी परिवार) के चप्पल उठाकर चमचागिरी करते रहते हैं. बीच में कुछ कोशिश नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी पार्टी का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की कोशिश की परन्तु ये लोग भी घटिया राजनीति के शिकार हो गए. बाकी मनमोहन सिंह तो एक गुलाम से ज्यादा औकात नही रखते.त्रासदी यही है की आज कोई भी कांग्रेसी नेता कितना भी बड़ा राष्ट्रवादी, ज्ञानी और सेक्युलर क्यूँ न हो सत्ता की बागडौर इस राज परिवार (गांधी ब्रांडेड नेहरु परिवार) से अपने हाथ में नहीं ले सकता.# भाजपा भले ही आदर्श पार्टी न हो कम से कम अनुशासन और पार्टी मूल्यों का सम्मान करने के मामले में सबसे आगे है. इस पार्टी ने सदैव ज्ञानी, विचारक, चिन्तक, संतो और योद्धाओं का सम्मान किया है और उनकी गलतियों पर उसे निकाल बाहर भी किया है. गांधी परिवार(मेनका वरुण) की चमचागिरी इसके लिए कभी प्राथमिकता नही रही है.# कांग्रेस सर्वाधिक वर्षों तक सत्ता में रहकर भी भारत में लोकतंत्र को स्थापित नही कर पाए. फिर किस बिना पर लोग कहते हैं की देश को सिर्फ कांग्रेस चला सकती है. यही गुलामी का प्रतीक है. कांग्रेसी नेता स्वार्थपूर्ति में अव्वल है, तभी मुख्य कांग्रेस पार्टी को सुधारने के बजाय कांग्रेसी नेता अलग पार्टी बना लेते हैं (एक उदाहरण पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस). आज जब हालात ऐसे हो की एक परिवार स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझ रहा है तब क्यूँ नही वो मनमानी करेगा. यह परिवार खुलकर मनमानी कर रहा है और जनता लगातार भुगत रही है. कांग्रेस में नेता है ही कहाँ जो देश के बारे में सोचेंगे सब के सब इस एक परिवार के चमचे हैं. राहुल बाबा जिंदाबाद जिंदाबाद !! भ्रष्ट पत्रकार मीडिया जिंदाबाद जिंदाबाद. लोकतंत्र जाये भाड़ में.कौन कहता है की देश के टुकड़े हो जायेंगे. देश को एक मजबूत प्रधान मंत्री की जरुरत है इस परिवार की नही.

  11. man said,

    June 16, 2010 at 11:55 am

    किसी रास्ट्रीय पार्टी का एक परिवार पर निर्भर ही जाने का मतलब हे ,लोक तन्त्र के घमले में परवारिक तानाशाही की बेल ,वरिष्ठता ,योग्यता ,सेवा का घोर अपमान |इसकी नीव आजादी से पहले ही पड़ चूकी थी.जिसकी अर्द नंगाई जबरन नसबंदी ,और पूर्ण नंगाई emergency में देखने को मिली |लोगो ने तब भी भुगता हे और अभी भी भूगत रहे हे ,बूटा सिंह जेसे चरण वंदना करने वालो की पीढ़िय अभी निहाल हे |(२)भा.ज.पा जेसी पार्टी रास्ट्रवादी मुदो से से सता में आयी थी ,और कांग्रेस की परवारिक ताना शाही और रास्ट्रवादी रूख के कारन मेनका ने भा.ज.पा को अपनाया क्यों की वो हे तो एक हिन्दू भारतीय महिला ही न |कोई भी भाजपाई उनकी चप्पल जूतिया उठाये नहीं घुमते,जेसे की कांग्रेसी मिनो madem और राहुल बाबा ढीले के उठाये रहते हे ,विचार धारा के खिलाफ ये पार्टी अपने वरिष्ठ नेता को एक झटके में बहार निकलने की हिम्मत रखती हे (३)देश को लोकतान्त्रिक होने में वर्ष लगेंगे ,मतलब कांग्रेस पार्टी ही लोकतंत्र हे ,बाकि देश का कोई महत्व नहीं ,आप यू कह सकते हे की कांग्रेस को लोकतान्त्रिक होने वर्ष लगेंगे तो चलता |इसका जिमेदार आम और वरिष्ठ कांग्रेसी कार्यकर्त्ता हे ,हे जो इनाम और खेरात की आस में ,पुरी जिंदगी जाजम उठाने में बिता देता हे ,सता के खेल में केवल एक मोहरे से ज्यादा की हेसियत नहीं हे रहती हे उसकी ?

  12. Anonymous said,

    June 16, 2010 at 12:01 pm

    1) a) नहींb) यदि आज कांग्रेस इस हालत में है की एक ही परिवार पर निर्भर है तो इस स्थिति के लिए भी वो ही जिम्मेदार है | जो पार्टी इतने सालों में अपना अंदरूनी लोकतंत्र स्थापित नहीं कर सकी , वो लोकतान्त्रिक मूल्यों को कितनी एहमियत देती है ये समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है और इस पार्टी से देश के लोकतंत्र की रक्षा करने की उम्मीद बेकार है|आजादी के शुरू के सालों में ये इसलिए सत्ता में आई क्योकि उस समय कोई और पार्टी थी ही नहीं और कुछ अछे नेता भी इस पार्टी में थे, धीरे धीरे ये एक ही परिवार की बपौती बन गयी या बना दी गयी|2 a) कोई योग्यता नहीं | लेकिन ऐसे अयोग्य लोग हर पार्टी में है, क्योंकि system में ऐसे लोगों पर check नहीं है , और जो थोडे बहुत हैं भी वो धीरे धीरे ख़त्म हो रहे हैं|b) ये अतिश्योक्ति है |3) a) देश को लोकतंत्र हनी में वर्षों लगेंगे | क्या इस स्थिति के लिए कांग्रेस पार्टी और वो परिवार जिम्मेदार नहीं जिसने 60 साल देश पर राज किया | इतना वक़्त किसी को परखने के लिए बहुत होता है , अब नयी शुरुवात होनी चाहिए |b) इस स्थिति में ये परिवार ही पार्टी को लाया है , क्योंकि अधिकतम समय इस परिवार के लोग ही पार्टी के ऊँचे पदों पर रहे और इन्होने चापलूसों को ही आगे किया |.अंत में ..आजादी में इस पार्टी के कुछ नेताओं ने देश के लिए अछे काम किये ये सही है , पर इस वजह से देश इस पार्टी को हमेशा के लिए ढोता रहे ये गलत है , जनता को अब परिपक्व होकर निर्णय लेना चाहिए |इंग्लैंड में भी WW2 जीतने वाले Churchil को जनता ने अगले चुनाव में हरा दिया था | एक अचीय काम का ये मतलब नहीं की किसी को पेर्मनेंत्ली बने रहने का license मिल गया |

  13. June 16, 2010 at 12:48 pm

    First of all thank you very much to give a jolt to this unhealthy practice of criticising each other and abusing rather then having a constructive debate. I am sorry to say but look at the heated debate in previous blog, everyone is rather praising you for raising the issue or cursing the system but no one and i mean it no one has come up with a single solution for the problem. Every one was talking from their heart and not head. We have plenty of nationalist who can selflessly give their life to the motherland but that is not the requirement at this time.You asked the question whether we require to carry the burden of Gandhi dynasty for sake of democracy. We are quiet young democracy as far as the life of a nation is concerned. Take the example of old democracies like US. They are practicing it since past 200 years but the country till date is not dependent on one family. Is that not good enough to look into our own dan. Its US greatness that they count our democracy equivalent to theirs. But in practical we are still in the phase of "Rajshahi". We bow our head, touch the feets of our political leaders. Why? Is it not the symbolic representation of our 1000 year old slavary days? What kind of this democracy is?

  14. man said,

    June 16, 2010 at 12:58 pm

    (१) अ… गाँधी परिवार के कारन ही देश टूकड़ो में बंटने के लिए तैयार हे ,सता की रेवड़ी के लिए देशके तीन टूकडे नहरू गांधी परिवार पहले भी कर चूका हे |ब….कभी नहीं ये परिवार सता से बे दखल था तब भी देश ने शानदार उन्नती की वाजपेयी का १९९९ से २००३ तक का शासन इसका शानदार उदाहरन हे (२) अ …सोनिया की एकमात्र उपलब्धि अपनी सास इंदिरा के नक़्शे कदम पर चल कर भांड और चारणगिरी को बढ़ावा और इनाम देना हे ,मन मोहन इसके इस के शानदार उदाहरन हे ,युवराज राहुल की एक मात्र उपलब्धि अनुवांशिक मिलावट के साथ गाँधी परिवार का युवा सद्श्य होना और दलित झोंपड़ी में सोना हे |ब …..भा.ज.पा में कोई भी वरुण व् मेनका के तलवे नहीं चाट ता हे ,नहीं जूतिया चप्प्पल सर उठाये नहीं घूमता हे ,एक हिन्दू भारतीय स्त्री होने के नाते उसका रस्त्र्वाद की झुकाव होना स्वाभविक हे ,एक विदेशी गोरी चमड़ी के साये से तो काफी बेहतर |(३) अ….देश को नहीं यु कहिये कांग्रेस को लोकतान्त्रिक होने में वर्ष लगेंगे ,युवराज के भी तो युवराज होगा न ,ब …..इसके लिए जिमेदार हे आम कांग्रेसी कार्य करता और वरिष्ठ खडाऊ पूजक माइनो भक्त .,आम कार्य करता अपनी उमर जाजम उठाने में निकल देता हे ,परनव मुखर्जी जेसे घाघ भी ,तंदूरा बजाने में हे,आखी उमर ?

  15. man said,

    June 16, 2010 at 1:05 pm

    और इसके लिए जिमेदार हे निक्कमी और कामचोर पब्लिक ,जिसे नरेगा जेसी भर्स्ट योजनावो से १०० ५० रु. फ़ोकट में हाथ लग जाते हे ,और महंगाई के चोर दरवाजे से उल्लुवो से वापस भी छीन लिए जाते हे |

  16. June 16, 2010 at 2:00 pm

    सुरेश जी जैन साहब अकेले नही है, उनके जैसे सोच समझ रखने वाले 1947 से बहुमत मे रहे है तभी तो देश इस कागार पर खडा है ॥मै कई बार हर माध्यम से कह चुका हूँ कि इस देश की जनता के बडे वर्ग को सदियों से गुलाम बने रहने का अभ्यास हो गया है और ये बिना मालिक के जीवित ही नही रह सकते, इनके मान्यता अनुसार हिन्दू का हक मारना मतलब सेकुलर होना है पिताजी ने भले उन्हे हिन्दू पहचान दी हो। इनका स्वाभिमान पूरी तरह पतित हो चुका है, ये चाटुकारिता को ही अपने जीवन का मक्सद बना चुके है और सदा चरणो मे बैठते है तथा अपने बच्चों को भी ऐसे ही जीना सिखाते है। जब इन्के बच्चे कान्वेंट(जिसकी स्थापना अंग्रेज़ो ने अनाथों के लिये की थी) मे पढ कर अन्ग्रेज़ी बोलते है ये फ़ूले नही समाते, सोचते है बच्चे सर्वग्याता हो गये( यानि पक्के दास हो गये ) ।मैने शहरों मे आम तौर पर देखा है कि जैसे ही कोई फ़िरंग दिखता है,बहौतो के रगों मे बसा दासता का धात असर दिखाने लगता है और वे मदमस्त हो कर उनके आगे पीछे दुमहिलाते घूमने लगते है।इनकी मूर्खता की पराकाश्ठा देखिये ये मानते है कि देश मे सम्पन्नता पश्चिम देशो से आयेगी, उनसे जिन्होने लूट लूट कर नंगा कर दिया। भूल जाते है कि इन लुटेरों के आने से पहले भारत को सोनें की चिडिया कहा जाता था।ये मूर्ख अपने बच्चो को पढाते है कि "भारत को वास्कोडिगामा ने खोजा" कोई इन्हे सद्बुद्धी दे की हमारी सनातन संस्क्रिति धरती पर सबसे पुरानी है। इनसे बडा दया का पात्र कौन होगा भला जो खुद घुटनो पर चले है अब अपने बच्चों को वहीं सिखा रहे है।च्… च्… च्…

  17. Mahak said,

    June 16, 2010 at 2:30 pm

    जी मैं तो ऐसा हरगिज़ नहीं मानता की गांधी परिवार के देश पे काबिज़ ना रहने से हमारा देश टुकड़ों-२ में बंट जाएगा .@जैन जी से ये जानना चाहूंगा की हम एक democratic country हैं या फिर यहाँ पर राजशाही की व्यवस्था चलती है ?, जैन जी एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में यकीन रखते हैं या फिर राजतंत्र में जिसमें की एक ही परिवार का शासन रहता है देश पर भी और पार्टी पर भी ?और ये जो कांग्रेस की जान राहुल और सोनिया जी नामक तोतों में होने की बात उन्होंने कही है तो इसका मतलब क्या है की अगर कभी भगवान् ना करे लेकिन ये तोते नहीं रहे तो क्या कांग्रेस पार्टी ख़त्म हो जायेगी ?, क्या इनका फ़र्ज़ नहीं बनता की जाने से पहले पार्टी में ऐसी व्यवस्था काबिज़ की जाए जिससे की पार्टी इनके बगैर भी खड़ा होना सीखे जैसे की माता-पिता का फ़र्ज़ बनता है अपने जाने से पहले अपने संतान को अपने पैरों पे खड़ा करने का और अगर वो संतान को खुद के काबिल नहीं बनाते हैं और चाहते हैं की वो हमेशा उन पर ही निर्भर रहे तो माफ़ कीजियेगा वो ऐसा करके उसका भला नहीं बल्कि उसका भविष्य बर्बाद कर रहे हैं क्योंकि समय के चक्र का कुछ नहीं पता कब किस और घूम जाए , लेकिन ये (गाँधी परिवार )ऐसा क्यों करेंगे , क्योंकि इन्हें तो जी-हजूरी करवाने की आदत है ,इस पर जैन साहब का जवाब होगा की वो ऐसा कर रहें हैं लेकिन समय लगेगा परन्तु जनाब कितना समय चाहिए उन्हें , 60 साल हो गयें हैं देश को आज़ाद हुए लेकिन जब अभी तक उनकी तरफ से इसकी कोशिश नहीं की गयी है तो भूल जाईये की भविष्य में भी ऐसा कुछ होगा .और @सुरेश जी उस स्वयं भू पिताजी नामक बेनामी ने अपने कमेंट्स में सार्वजनिक जीवन में अनुशासन, नैतिकता और भ्रष्टाचार आदि जैसा एक भी मुद्दा नहीं उठाया है .ये मुद्दे तो आपने उठाये थे अपनी पिछली पोस्ट में . उसका कहना तो ये था (जो की मैं समझ रहा हूँ ) की सिर्फ ब्लॉग आदि पर लिखने से कुछ नहीं होगा ,इसकी बजाये कोई क्रांतिकारी type संगठन बनाया जाए .आप के इतने प्रशंसक हैं तो उन सबको एक जगहां पर इकठा करके एक political party type चीज़ बनायी जाए और इस system को change किया जाए .उसकी इन मांगों में कुछ भी गलत नहीं है और हम सब ऐसा करना भी अवश्य चाहेंगे लेकिन उस मूर्ख ने जिस प्रकार की भद्दी एवं बेहूदा भाषा का इस्तेमाल करके उसे रखा उसकी वजह से उसकी इतनी महत्वपूर्ण बात का महत्व उसने स्वयं ही नष्ट कर लिया .अगर वो शालीनता से इस प्रकार का प्रस्ताव रखता तो अवश्य ही उसकी बात पर गौर किया जा सकता था . मैं खुद आपसे चाहूंगा की उसके इस प्रस्ताव पर अवश्य गौर करें और इसके विषय में भी एक पोस्ट जरूर लिखें की क्या सच में ऐसा किया जा सकता है .जय हिंदमहक

  18. June 16, 2010 at 2:37 pm

    सुरेश जी; जैन साहब से एक सवाल, कि अतीत में आज से बड़ा भारत हुआ करता था, क्या उस समय कांग्रेस उस पर शासन करती थी ?कांग्रेस के विषय में तो सोच-सोच कर मेरे दिमाग में "छिनाल औरत" का अक्श बनता है | ,(ये मेरी नयी पोस्ट का नाम भी है) ये जितनी चालक है और इसने कैसे-कैसेहथकंडों से देश को मूर्ख बनाया और बना रखा है वह जैन साहब के रूप में देखने को मिल रहा है | इससे ज्यादा क्या लिखूं अगर जैन साहब को फुर्सत हो तो मेरा tensionpoin.blogspot .com में छिनाल औरत पढ़ लें |

  19. berojgar said,

    June 16, 2010 at 2:59 pm

    इम्पोर्टेड (आयातित) 'गाँधी' वर्तमान में कांग्रेस की अध्यक्ष है. कांग्रेस ने लगभग पचास साल देश पर शासन किया है. कश्मीर खो दिया. तिब्बत नेहरू जी ने गिफ्ट में दे दिया.लाखों वर्ग किलोमीटर पर चीन कब्ज़ा किये बैठा है. कश्मीर और पूर्वोत्तर के लोग देश से अलगाव की गतिविधियों में लिप्त है यही कांग्रेस की उपलब्धियां हैं. यही सिलसिला रहा तो देश विखंडन के किस स्टार तक जायेगा ,कल्पना की जा सकती है. कई लोग देश हित को तक पर रख कर स्वहित हेतु चापलूसी और गद्दारी के किसी भी स्टार पर जा सकते हैं.

  20. Divya said,

    June 16, 2010 at 3:56 pm

    Congress le doobegi ek din, sampurn bharat ko.

  21. June 16, 2010 at 4:29 pm

    सुरेश जी आपने वीरेंदर जैन का वास्तविक परिचय तो दिया ही नहीं | ये वही सक्स हैं जिन्होंने भाजपा के खिलाफ ३०० से भी ज्यादा आलेख लिखे हैं .. और कांग्रेस – गाँधी परिवार की प्रसंसा में भी शायद ३०० के आस-पास ही लेख लिखे होंगे | अब ऐसे लोगों को पत्राकार कहना वो भी वरिष्ट पत्राकार कहना उचित है क्या?बड़ा हास्यास्पद लगता है जब कांग्रेस के चमचे ये कहते हैं की " गाँधी परिवार के ना रहने से देश टूट जाएगा " | भाई ये तो वही बात हो गई की किसी CEO के ना रहने से पूरी industries ही टूट जायेगी | एक सच्चा स्वतंत्र भारतीय नागरिक ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकता … हाँ कांग्रेस के चमचों की बात ही कुछ और है, उनके लिए देश से बड़ा गाँधी परिवार है …. कांग्रेसी चमचे तो बस जैसे गाँधी परिवार के चमचागिरी के लिए जी रहे हैं |भारत वर्ष किसी एक परिवार का मोहताज नहीं …. हजारों – लाखों वर्षों से भारत देश है | हाँ वार्तामन समय का दुर्भाग्य है की ये गाँधी परिवार देश पे ६० वर्षों से राज कर रही है और देश को पतन की और ले जा रही है | मैं शर्तिया कह सकता हूँ – गाँधी परिवार ने देश पे और ३०-४० वर्ष राज किया तो देश को टुकड़ों में विभाजित होने से कोई नहीं रोक सकता |

  22. June 16, 2010 at 4:35 pm

    हमारे दिमाग से गुलामी की मानसिकता निकल ही नहीं सकती.पहले मुग़ल बादशाहों के सामने कहके, फिर गोरों के सामने, फिर नेहरु परिवार के सामने…..कोई ना कोई चाहिए, हम पे राज करने वाला…दिलों जान लुटाएँगे, हम तो उम्र भर…जूते खायेंगे उनसे जीवन भर…चरण उनके चाटेंगे हम तो जी भर…कदमों के नीचे रखेंगे हम तो सर….चाहे इटली की रानी हो, या खोखला राजा….कोई ना कोई चाहिए, हम पे राज करने वाला…भूल जाइए… कुछ नहीं होने वाला…हम गुलाम थेगुलाम हैंगुलाम रहेंगे!!!!जाय हिंद (भाड़ में)

  23. June 16, 2010 at 5:20 pm

    जिस पार्टी के अन्दर खुद लोकतन्त्र नहीं है उस पार्टी के समर्थकों से क्या उम्मीद की जा सकती है. मान की दूसरी टिप्पणी में थोड़ा सा संशोधन करना चाहता हूं कि निरक्षरता का अभिशाप भी इसमें शामिल है. और निरक्षर किसने रखा और क्यों रखा सबको पता है..

  24. June 16, 2010 at 5:35 pm

    अरे इतनी बड़ी गलती कैसे कर दी आपने? गांधी(असल में वो गंधी हैं गांधी क्यों लिखते हैं पाता नहीं) परिवार नहीं राजवंश है.. और हम सब गुलाम.. और उनका सौ प्रतिशत है कांग्रेस और देश के उच्च पदों पर..आपको क्या लगता है आप और हम मना करेंगे तो यहाँ भी फ्रांस की तरह क्रांति आ जायेगी…

  25. June 16, 2010 at 5:36 pm

    अरे इतनी बड़ी गलती कैसे कर दी आपने? गांधी(असल में वो गंधी हैं गांधी क्यों लिखते हैं पाता नहीं) परिवार नहीं राजवंश है.. और हम सब गुलाम.. और उनका सौ प्रतिशत आरक्षण है कांग्रेस और देश के उच्च पदों पर..आपको क्या लगता है आप और हम मना करेंगे तो यहाँ भी फ्रांस की तरह क्रांति आ जायेगी…

  26. June 16, 2010 at 5:55 pm

    यहाँ इन सवालों के या इनसे सम्बंधित किसी सवाल के जवाब नहीं देने हैं हमें…..बस एक लोककथा सुनकर सारी बात का सार रखना चाहते हैं….———————-एक रास्ते पर भरी दोपहरी में एक बैलगाड़ी चली जा रही थी. कहीं किसी जगह पर कुछ पल को रुकी तो वहां परेशान सा घूम रहा एक कुत्ता उस बैलगाड़ी के नीचे छाया में आकर खडा हो गया. तभी कुत्ते ने एक दो कदम आगे बढाए और उसी समय इत्तेफाक से बैल भी एक दो कदम आगे बढे….इसके बाद कुत्ता चलने लगा तो संयोग से बैलगाड़ी भी आगे अपनी मंजिल को चलने लगी.कुत्ते को लगा की उसके चलने से बैलगाड़ी चल रही है. सारे रास्ते में एक दो बार और ऐसा हुआ अब तो कुत्ते को यकीन हो गया कि उसके चलने और रुकने से ही बैलगाड़ी चल रही है. अब वह सोच कर गर्व से भर उठा कि वह चल रहा है तभी बैलगाड़ी चल रही है वर्ना बैलगाड़ी चले ही नहीं……..रास्ते में संयोग के साथ दुर्योग भी आया. बैलगाड़ी को एक जगह से मुड़ना भी था पर कुत्ते जी ………….बैलगाड़ी मुड़ गई और कुत्ते जी गर्व में, अकड़ में सीधे ही चलते रहे ………. बस आ गए पहिये के नीचे और अपनी रीढ़ की हड्डी तुडवा बैठे.हड्डी टूटने के बाद रास्ते में लाचार, खचुरते रहे तब कुत्ते जी को यकीन हुआ कि बैलगाड़ी वे नहीं चला रहे थे बल्कि वे खुद बैलगाड़ी के नीचे उसकी छाया में चल रहे थे.———————–जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

  27. June 16, 2010 at 6:00 pm

    कौंग्रेस एक ऐसा नासूर है…. जिसका कोई इलाज ही नहीं है…. महात्मा गाँधी ने कहा भी था…. कि अब आज़ादी मिल गई है….इसको भंग कर दो…. लेकिन नेहरु नहीं माना…. क्यूंकि इसी बैनर तले प्रधानमंत्री का रास्ता था….

  28. June 16, 2010 at 6:23 pm

    १)अ) गाँधी परिवार है भी तो क्या हमारा देश मजबूत और अखण्ड है? उत्तर- कैसा विरोधाभास भरा है यह प्रश्न. ऐसा है कि कोई यह पूछने लगे कि क्या आग जलाने के लिये उसमें पानी डालना चाहिए? गाँधी परिवार है तभी देश की इतनी दुर्गति हुई है और देश विखण्डित हुआ है और लगातार होने की राह पर अग्रसर है इसका प्रमाण उपरोक्त कुछ टिप्पणियों में भी है और प्रत्यक्ष है जो न देख सके वो मुर्ख और अंधा ही कहलावेगा. कांग्रेस राष्ट्रव्यापी पार्टी नहीं अत्यन्त घोर राष्ट्रविरोधी पार्टी है. इस पार्टी का जड़ से समाप्त होना ही आवश्यक है अन्यथा भारत राष्ट्र ही नहीं बचेगा ये सभी वास्तविक बुद्धिजीवी समझते हैं. ब) क्या कोई एक व्यक्ति या परिवार इतना “अपरिहार्य” हो सकता है? कि जिसके बिना काम ही न चले? मैंने तो सुना है कि किसी के मरने-जीने से किसी का काम नहीं रुकता, दुनिया तो चलती ही है। उत्तर –यह प्रश्न भी विरोधाभास से भरा है. जैसे कोई पूछे हत्या करने के बाद क्या अपराधी को दण्ड देना आवश्यक है क्योंकि उस अपराधी के मरने पर दुनिया और अपराध तो चलते ही रहेंगे.यह परिवार इस देश का सबसे बड़ा अपराधी है, हम देशवासियों को चाहिये इस परिवार को जड़ से ही मिटा दे क्योंकि इस परिवार ने देश को मिली नयी स्वतंत्रता का लाभ उठाकर देश के स्वाभिमान को ही छिन्न-भिन्न कर दिया और अपने चारो तरफ ऐसे पालतू कुत्ते पाले हैं कि उनकी ओलादें या उनके अनुसरणकर्ता भी इनके आज भी तलवे चाट रहें है. आरम्भ से ही नेता तो इन्होने अपनी पार्टी में रखे ही नहीं सिर्फ चमचों की जमात ही लगाईं हैं. २) अ) सोनिया और राहुल ने अब तक वाकई में कितनी योग्यता दिखाई है? और उसे मापने का आधार क्या हो? मीडिया रिपोर्टें या सलाहकारों (इसे चमचों भी पढ़ा जा सकता है) द्वारा लिये-दिये गये मनमाने निर्णयों को, जिसकी वजह से महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी समस्याएं मुँह बाये खड़ी हैं। उत्तर- सोनिया की योग्यता केवल इतनी है कि वो इटली के पोप के सपने को पूर्ण करने के लिये वचनबद्ध है, और राहुल की योग्यता बस इतनी है कि विदेशो में अयाशी करने के बाद वो चमचों का सरदार बना हुआ है और माँ का सपना यदि अधूरा रह गया तो बेटा कर्तव्य निभाते हुए साकार करने का अवश्य प्रयास करेगा. ब) भाजपा ने मेनका और वरुण को पार्टी के भीतर “कितना” महत्वपूर्ण स्थान दिया है, जिसे “जूते चाटने” की संज्ञा दी जा सके? उत्तर-भाजपा ने मेनका और वरुण के तलवे चाटने का प्रमाण तो अभी तक कोई दिया नहीं है. किन्तु भाजपा भी कांग्रेस बनने की राह पर अग्रसर है और इसी कारण इसकी दुर्गति हो रही है. इतने मुद्दे होने की बाद भी विपक्ष लगभग मौन ही है और इन्हें भी मुस्लिम वोटो की चिंता अधिक सताने लगी है इसीलिए ये अपने को सेकुलर घोषित करने का प्रयास कर रहे हैं.

  29. June 16, 2010 at 6:24 pm

    ३)अ) देश को लोकतांत्रिक होने में वर्षों लगेंगे, जब यही बात कोई गैर-कांग्रेसी कहता है तो उस पर “तानाशाह” और “फ़ासीवादी” होने का आरोप क्यों लगा दिया जाता है? उत्तर – इस देश में ही लोकतंत्र का जन्म हुआ है किन्तु आज समय ने ऐसी करवट ली है कि आपसी भेदभाव, छुआ-छूत आदि के जहर, मुगलों, फिर अंग्रेजों और फिर कांग्रेस शासन की बदोलत अब इसी देश के लोगो को यह कहना पड़ रहा है कि हमारे देश को लोकतांत्रिक होने में समय लगेगा. हाँ आज देश को वास्तव में आवश्यकता है एक सावरकर या सुभाष जैसे प्रखर राष्ट्रवादी तानाशाह की और चाणक्य जैसे महान विद्वान ब्राह्मण की जो इस देश को ऐसे नेता दे सकें और इस देश की बीमार हालत को दुरुस्त कर सकें और इन कांग्रेसी कीड़ों का सर्वनाश करदें. उसके पश्चात ही लोगो को मताधिकार मिलना चाहिए. कांग्रेस की जान उसके जिस तोते में बसती है काश जनता उस तोते की गर्दन को ही सबसे पहले मरोड़ देती तो कितना अच्छा होता. ब) क्या 100 साल पुरानी पार्टी इतनी निरीह और मजबूर हो गई है कि किसी एक परिवार में “ उसकी जान” बसती है? यदि ऐसा है तो इसका दोषी कौन है? उत्तर- १०० साल पुरानी अंग्रेजों के द्वारा खड़ी की जाने वाली पार्टी कोई राजनैतिक पार्टी है ही नहीं है दलालों और चमचों का झुण्ड है. और आज भी किसी सरकारी निर्णय या कार्यों में हमेशा दलाली ही ढूँढ़ते हैं जैसा कि अभी ६०००० करोड़ की दलाली की थी. अनाज, पेट्रोल आदि या कोई भी समान आयात करते हैं तो उसमें दलाली के जुगाड़ का सबसे अधिक ख्याल रखा जाता है. परिवार में जान क्यों बसती है –उसका उत्तर मैंने पहले ही कहा है यह पार्टी चमचों और दलालों का झुण्ड है.जिस देश का शासन भारतीय कांग्रेस जैसी पार्टी संभालेगी उस देश का विनाश निश्चित ही है ये सब लोग समझ लो और ना समझ सको तो आने वाले समय में विनाश देखने के लिये तैयार रहो. किसी कवि ने सच ही कहा है विनाशकाले विपरीतबुद्धि !

  30. June 17, 2010 at 1:51 am

    मैं इतिहास या राजनीती शास्त्र का विद्यार्थी नहीं रहा, इसलिए तथ्यगत गलतियों को माफ़ किया जाए.प्रश्नों के उत्तर. भविष्य हम में से किसी ने नहीं देखा और सुरेश जी के सारे प्रश्न भविष्यकाल के नाम पर ही हैं. मैं यहाँ केवल संभावनाएं व्यक्त करूंगा जो आज की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हैं. १ अ. दश की अखंडता गाँधी परिवार पर निर्भर नहीं करती, हाँ वीरेंद्र जी के तर्क अपनी जगह सही है. एक संभावना जो उन्होंने जताई है, वो पूरी तरह गलत भी नहीं है. राजीव गाँधी के देहावसान के बाद यदि आप इतिहास उठा के देखें, तो सीताराम केसरी जी पार्टी अध्यक्ष बने और नरसिम्हा राव जी प्रधान मंत्री. कांग्रेस के इतिहास में ९१ के बाद का समय जब नेतृत्व इन लोगों के हाथ में था, मेरे हिसाब से पराभव का काल था. दिशाहीन नेता, दिशाहीन नेतृत्व. उस दौर में भी सोनिया गाँधी को सक्रिय राजनीति में लाने का आग्रह हर छोटा बड़ा कांग्रेसी करता रहा था. उस बुरे दौर के बाद कांग्रेस २००४ में ही सत्ता में वापस लौट पायी, (शायद) सोनिया गाँधी के प्रयासों से.याद कीजिये उसी दौर की उपज हैं NCP और TMC. इनका गठन सोनिया गाँधी के विरोध के नाम पर हुआ (या शायद अपनी महत्वकान्छओं के कारण). इस बात की कोई गारंटी नहीं की यदि कांग्रेस में केंद्रीय नेतृत्व (पढ़ें सोनिया गाँधी) न हो तो ये व्यक्तिगत महत्वकंचायें कांग्रेस के कितने टुकड़े करा दें. वीरेंद्र जी की बाद से सहमत हूँ यहाँ. १ बी. बात परिवार या व्यक्ति की नहीं है. अगर जैन साहब की बात को सही सन्दर्भ में देखें तो अगर यह परिवार अपरिहार्य नहीं तो महत्त्वपूर्ण तो है ही (कांग्रेस की गलत नीतियों और प्रवृत्तियों की वजह से).२ ब. वीरेंद्र जी की बात से असहमत. BJP ने गाँधी परिवार को कभी VIP ट्रीटमेंट नहीं दिया. वरुण अभी हाल फिलहाल में अपने बयानों की वजह से चर्चा में हैं. उस से पहले मेनका जी अपने पशु पक्षी प्रेम की वजह से ही जानी जाती रही हैं.२ अ. सोनिया गाँधी की योग्यता नापने के लिए मैं बहोत ही अयोग्य हूम. हाँ राहुल की योग्यता, मेरे हिसाब से कुछ भी नहीं, सब कुछ राजनीतिक स्टंट है, जो भी वोह करते हैं. (हाँ, इस देश के प्रधान मंत्री उनके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हैं, इसे अगर आप उनकी योंग्यता मानें, आपकी मर्ज़ी.)३. इस प्रश्न को मैं अनुत्तरित रहने देना पसंद करूंगा. इति.

  31. June 17, 2010 at 4:06 am

    देश के टुकड़े तो गांधी और नेहरू के कारण ही हुए थे।ऐसे प्रश्नों का उठना ही हमारी कुशिक्षा का द्योतक है।

  32. June 17, 2010 at 4:22 am

    mai to kewal ek baat kahna chahunga ki gandhi pariwaar ne desh ko itna barbaad kar diya hai ki or koi isse neeche nahi le ja sakta .

  33. June 17, 2010 at 4:44 am

    Suresh Ji, Does the Congress party is the only problem for Indian political system and other problems. Surely NO. This is one of the problems. Why you and other blog members get struck to only one issue of opposing Congrerss. How is it possible that 2/3 of the India (opposing Congress) is not able to displace 1/3 of Congress and its supporters. The epicenter of the problem is not the congress but the our mentality of slavary. We want some one to rule us. Do you think that if BJP or RSS backed partiescomes to the power everything will be alright. We have seen what happened during those 6 years of BJP rule. If i take the orgument for discussion that during BJP regim Inida was shining then what is the reason to loose the power. Does Indian does not want to be happy and prosporous. What happened to that so called the "disciplined" party its not the secret now any more. Take one more subject to the discussion minus Congress & BJP what is condition of India. I would say pathatic. Beleive me we are partisioned too badly, our creative and constructive thoughts has been taken over by our useless emotional attitude, which is not good for the country. If we honestly want to understand and correct the thing we will be required first to get unbised and raise above then only criticising Congress. If BJP and RSS backed parties are good for the country then why they are not able to make understand Indians and win their favor. Problem is that we are not one country since its inception. We may be emmotionally locked to each other but our interests was and way different. We may looks alike but our hearts does not beats on same frequency.

  34. June 17, 2010 at 5:05 am

    भाई हम तो एक बात पर और गौर फरमाने के लिए कहेंगे सभी को, विशेषकर जैन साहब को कि; इतिहास से लेकर आज तक हमारे देश के जो विभाजन हुए हैं या टुकड़े हुए हैं वह सब कांग्रेस के कार्यकाल में हुए हैं | या टुकड़े करने कि मांग भी हुयी तो कांग्रेस उसमे एक कारण बनी | जहाँ तक इनकी शहादतों का सवाल है वह अपने कर्मों का फल है |उन शहादतों से देश को कोई लाभ नहीं हुआ , हाँ; कांग्रेस को और इस परिवार को अवश्य लाभ हुआ | इसीलिए इन हत्याओं की निष्पक्ष जाँच हो तो कहीं ऐसे सच सामने न आ जाएँ कि इतिहास ही बदलना पड़ जाये |

  35. June 17, 2010 at 5:08 am

    Avadhiya Ji and other's, when you say that this country got disintegrated or split into two countries, do you think before that we were one coutry. Just remember when this so called one country came in existance. The answer is when "The East India Company" and then "British" got the said part of land into one rule practically since then it became one country. Look at the History even before Moghul era we where not one country but splitted in many small princly states and each one of them had there enimy not outside of so called the India but their next neighbour, who is always an Indian.

  36. June 17, 2010 at 5:20 am

    Believe me or not, but if you look at the history unbised way you will find that before and after Chandragupt Mourya dynasty this piece of land was never one country until "British" brought it in one rule. Suddenly "British" became the common enimy for the residents of this piece of land and thus the present India came in picture. Even Chandragupta Maurya could not make this land of piece as one country. He was limited upto Kalinga only. In whole the history the south was never part of North Indian political state. Please note that whenever we talk about India in yester years its only based on North Indian political presence. And hence it has got dominance in present political state of India. If Panipat war would not have happened or Maratha's would have won the battle, the history of India would have entirely different.I can have a debate with any one who call it one country but should be ready to debate with open mind and should not get over emmotioal on the subject. Put up facts and do not get support of myths.

  37. June 17, 2010 at 7:15 am

    The subject of the debate is that whether Gandhi family is responsible for unity of this country, even though my answer is NO, still in my opinion we can not ignore presence. We must look at the subject in totality and not with the heart full of hatred. Its a question of country and not of individual's choice. Certainly we can not ruled out the contribution of Gandhi's but at the same time they are not the only family who has done good for India. I would like to take your attention to one mistake you commit in your thought process and i.e. The Congress and the Gandhi family are not synonymous words. These are two different entities. I believe that during the period 1947 RSS might not have been the right choice to design the country.

  38. June 17, 2010 at 9:23 am

    suresh ji namste!is dogale charitra ke parivar ke karan hi desh itani samsyaon ka samana kar raha hai! ek bar desh isi parivar ne bata tha aur aage bhi lagata hai inhi ke karan yah desh batega!Amit

  39. June 17, 2010 at 9:48 am

    Brothers & Sisters, We have got independence in 1947 and since then its Democratic Republic of India. Why we are portraiting Congress or Gandhi family as dictator? Problem is not the congress or Gandhi pariwar but we the Indians. In 60 years of independence if we could not find out a worthy alternate to Congress or Gandhi pariwar its our problem. We can not save our face. Be honest and tell me if we are still enjoying many things in life. And then we say that most of time Congress has ruled this country. Dont you think this makes a relation. It could have been better its different topic of discussion. My dear brothers and sisters make your own identity and thoughts dont carry the luggage of thoughts/frustation of your previous generation and fill your precious mind space with grief, hatred and disappointment. Its just 60 years of independence not much time for any country. Dont lay down your hope, nothing wrong has happened to that level. Stand up and make your own choice, raise your voice. Dont think that every thing will change next day. It will take one or two generations to change. That's how the nation or country build up. Its important to start at the earliest. Our previous generation has done nothing more than sitting in panchayat and abusing to each and everything and system. First of all we need to understand and accept that not everything has lost, we need to understand that each and everything around us is not good but not bad as well, we can make use of the good to get back to our lost glory. It is possible. Work for to give better future to next generation.

  40. Mired Mirage said,

    June 17, 2010 at 10:51 am

    यदि किसी परिवार को माई बाप मानने से ही सुरक्षा मिलती है तो मैं असुरक्षित, छिन्न भिन्न देश की नागरिक ही बेहतर । नहीं चाहिए किसी परिवार का शासन। लोकतंत्र माँगा था न कि किसी परिवार के राज के लिए लोगों ने प्राण गंवाए थे। वैसे न जाने उन सबकी कुर्बानियाँ एक परिवार की झोली में किस ने डाल दीं?यदि परिवार का शासन ही चाहिए तो यह लोकतंत्र का ढोंग क्यों? सीधे से महारानी/युवराज या राजकुमारी को मुकुट क्यों नहीं पहना देते?उनका होना यही सिद्ध करता है कि हम लोकतंत्र के लायक अभी तक नहीं हैं।वैसे तो भाई लोग भी अपने गली मोहल्ले का शासन सुचारू रूप से चलाते हैं। और उनके जाने पर सबकुछ छिन्न भिन्न हो जाता है।खैर, हमें वे ही शासक मिलते हैं हम जिनके योग्य हों। यदि गुलामी हमारी मानसिकता है तो ये ही मिलेंगे।घुघूती बासूती

  41. June 17, 2010 at 11:00 am

    Dear Bloggers and Suresh Ji, for the sake of discussion lets assume that Congress/Gandhi family and our previous generation has done massive mistakes and country is suffering from it (though i do not agree completely but agree in parts). Consider a hypothatical situation that congress/Gandhi family is out or power and their importance is reduced to negligible. What would you think about India then? Please keep in mind the situation of 3 instanses 1)Immediately after the Emergency there was anti-congress wave and opposition was having full majority. What happened after that? How much progress we made during that period?2)After poor performance by congress in 1987 election opposition came to power. What happened after that.3) BJP led colition governement formed in center in 2003. First non-congress government completed its full term. The country and media was singing tune of "India Shining". The charasmatic leader of BJP Shri Atal Bihari Vajpayee and Shri Lal Krishn Advani was in spirit and confident. What happened after that?Dont be childish to put forward excuse that everything was rigged by congress, mind it that BJP led coalition government was in power.Plesae analyse and then answer to that hypothetical question.

  42. June 17, 2010 at 11:12 am

    @शंकर फुलारा जी की बात विचारणीय है…।वैसे भी छोटी लाईन को मिटाए बिना जब तक विपक्ष के रूप में कोई बड़ी लाईन नही खीचीं जाएगी…तब तक यह नेहरू परिवार का सम्मोहन जनता मे बना रहेगा।….वैसे इस खानदान ने देश की हालत क्या कर दी है.सबको पता है….कुत्ता जब सूखी हड्डी को चबाता है तो उस की जीभ छिल जाती है और लहू बहने लगता है….लेकिन कुत्ता अपने लहू को ही समझता है हड्डी मे से रस निकल रहा है….यही हालत देश की जनता कि हो चुकी है…शायद इसी लिए यह सम्मोहन नही टूट रहा…वैसे इस परिवार को राजनिति से किनारे कर देनें से अंतत; देश का ही भला होगा….बहू आयामी विकल्प खुल जाएगें..देश के हित में…..

  43. June 17, 2010 at 12:01 pm

    प्रिय मित्रो, पता नही हम कब दूसरे की ज़िम्मेदारियाँ तय करना छोड़कर अपनी ज़िम्मेदारियाँ उठाने के लायक हो जाएँगे.

  44. Anonymous said,

    June 17, 2010 at 2:07 pm

    सबसे पहली बात तो यह कि वीरेन्द्र जैन जैसे कँग्रेस के अंध चमचे और एक निहायत ही मूर्ख इन्सान को इतना सीरीयसली लेते ही क्यों है कि एक पोस्ट के लिए इतना महत्वपूर्ण समय जाया करना पड़े!!!!देश को खतरा पाकिस्तान और चीन से बाद में इन जैसी घटिया मानसिकता वाले लोगों और वामपंथियों से पहले है।

  45. rohit said,

    June 17, 2010 at 4:37 pm

    बंधू ऊपर मेरे अपने विचार है किसी को कोई कष्ट हो तो खेद है

  46. rohit said,

    June 17, 2010 at 4:37 pm

    बंधू ऊपर मेरे अपने विचार है किसी को कोई कष्ट हो तो खेद है

  47. June 17, 2010 at 6:47 pm

    प्रिय सुरेश भाई पिछली बाहसों के विपरीत एक अपेक्षाकृत स्वस्थ और सार्थक बहस प्रारम्भ करने के लिए बधाई! काश इसमें कुछ और अधिक बुद्धिजीवियों ने हिस्सेदारी की होती। एक सज्जन जो बहस को कुछ ठीक ठाक दिशा में खींच रहे हैं वे न जाने क्यों हिन्दी के ब्लाग में अंग्रेजी में लिख रहे हैं और अपना परिचय भी गुप्त रख के सन्देह पैदा कर रहे हैं। खेद है कि बहुत सारे कांग्रेस, सोनिया, राहुल विरोधियों ने ठीक ढंग से ना तो पोस्ट को पढा और ना ही उस पर उठाये गये प्रश्नों के मर्म तक ही पहुँचे। मैं फिर स्पष्ट कर दूं कि सम्बन्धित टिप्पणी में ना तो कांग्रेस की पक्षधरता है और ना ही सोनिया और राहुल की। मैंने केवल कांग्रेस और देश की दुर्दशा और विवशता की बात की है। मेरा कहना यह है कि- 1- कांग्रेस अब एक राजनीतिक दल नहीं बचा और वह इक्के दुक्के अपवादों को छोड़ कर सत्ता से स्वार्थ हल करने वालों का गिरोह होकर रह गया है। किंतु लोकतांत्रिक राजनीतिक चेतना के अभाव में ऐताहिसिक कारणों से वह अभी भी इकलौता राष्ट्रव्यापी दल है। 2- सोनिया और राहुल के नेतृत्व की “विवशता” कांग्रेस में नेतृत्वहीनता का प्रमाण है, पर इस अन्ध आस्था के कारण ही कांग्रेस क्षेत्रवादी दलों में टूट कर बिखरने से बची हुयी है। दूसरा कोई राष्ट्रव्यापी दल न होने के कारण कांग्रेस के बिखरने का परिणाम देश की एकता के लिए खतरनाक हो सकता है। 3- राजीव गान्धी के असामायिक निधन के बाद से सामने आयी गठबन्धन सरकारें और क्षेत्रीय दलों का उभार इसका प्रमाण हैं। 4- मैंने यह कहीं नहीं कहा कि इस कारण मनमोहन सिंह, सोनिया,राहुल के नेतृत्व को झेलते रहना चाहिए अपितु देश की एकता अखंडता की रक्षा को ध्यान में रखते हुए सार्थक धनात्मक परिवर्तन लाया जाना चाहिए। क्रमशः

  48. June 17, 2010 at 6:49 pm

    5- सिवाय नेहरू गान्धी परिवार के वंशज होने के मनेका और वरुण में ऐसा कोई विशेष गुण मुझे तो नज़र नहीं आया कि उन्हें पुराने भाजपाइयों पर वरीयता दी जाती। इनके पक्षधरों को सोनिया राहुल की आलोचना करने का नैतिक अधिकार तो नहीं ही बनता। 6- क्षमा करें हम जिस लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटते हैं उसमें 124 पूर्व राज परिवारों के सदस्य, हैं। हेमा मालिनियाँ जयप्रदायें, जया बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खना, गोबिन्दा, प्रिया दत्त, दीपिका चिखलिया, अर्विन्द त्रिवेदी, दारा सिंह, सिद्धू, चेतन चौहान, बाबाओं का रूप धारण किये बहुरूपिये, आदि आदि आदि से बनती है हमारी संसद जिसमें तीन सौ करोड़पति होते हैं और सभी प्रमुख पार्टियों के विधायकों को रंडियों की तरह खरीद कर उद्योगपति शान से राज्य सभा में पहुँच रहे हैं। 7- फिर भी जो लोग लोकतंत्र और बहुमत की दुहाई देते हैं वे यह क्यों भूल जाते हैं कि सोनिया को प्रधानमंत्री भी इसी तरह चुना गया था तो फिर क्यों भाजपा की प्रमुख महिला नेत्रियों ने हिन्दू विधवाओं जैसे भेष और आचरण करने की धमकी दी थी। सोनिया गान्धी तो राजीव के निधन के दस साल तक राजनीति से दूर रहीं थी और उन्हें इस स्तिथि तक पहुँचाने वाले भे बहुमत वाले लोग थे। मैंने अलग अलग नाम उल्लेख करके टिप्पणी नहीं की है अतः जिस पर जो लागू होती हो उसे उसी तरह ग्रहण करें।

  49. June 18, 2010 at 8:53 am

    वीरेन्द्र जैन साहब – आपकी टिप्पणी का ही इन्तज़ार था, अब मैं अपनी अन्तिम टिप्पणी देकर इसका पटाक्षेप करता हूं… 1) इस बात पर लगभग सभी की सहमति है कि "गाँधी" परिवार इस देश पर एक बोझ बन चुका है, लेकिन विकल्प के अभाव में लोग इन्हें "झेल" रहे हैं, त्याग-बलिदान वगैरह की बात निहायत बकवास के अलावा कुछ भी नहीं है। 2) भाजपा में भी कांग्रेस की लगभग सारी बुराईयाँ प्रवेश कर चुकी हैं, वंशवाद भी धीरे-धीरे आ रहा है, लेकिन फ़िलहाल वंशवाद पार्टी में उच्च स्तर पर नहीं पैर जमा सका है, वरना आडवाणी या राजनाथ सिंह के बेटे-बेटी पार्टी अध्यक्ष बन जाते। 3) आज की तारीख में राजस्थान, दिल्ली, आंध्रप्रदेश के अलावा कांग्रेस कहीं भी अकेले दम पर सत्ता में नहीं है, लेकिन "सेकुलरिज़्म" नामक तथाकथित गोंद की वजह से करुणानिधि (राजा) और लालू जैसे लोग उनसे चिपके हुए हैं। 4) बहस को स्वस्थ दिशा में मोड़ने के सन्दर्भ में जिन सज्जन का आपने उल्लेख किया है, उन्हें हिन्दी में अपनी बात लिखने में तकनीकी परेशानी है, वे बेनामी नहीं हैं, मेरे मित्र हैं, और चाहते हैं कि कांग्रेस-भाजपा को कोसने की बजाय हमें पहले एक नागरिक और एक व्यक्ति के रूप में खुद में बदलाव लाना चाहिये, दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा, क्योंकि हमारी मानसिकता "किसी के द्वारा शासित किये जाने" अथवा "अवतारवाद" की हो चुकी है। हम लोग सिर ढूंढते हैं, ठीकरा फ़ोड़ने के लिये, खुद के सिर के भीतर क्या है ये नहीं देखते। फ़िर भी मेरा मानना है कि समस्या का हल मिले न मिले, कम से कम "दोषी" की पहचान तो होनी ही चाहिये, जो कि निर्विवाद रूप से कांग्रेस और गाँधी परिवार हैं ही। 5) मैं इस बात पर अभी भी कायम हूं कि किसी एक परिवार या करिश्माई व्यक्ति के न रहने से देश की सेहत पर कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि जब वैसा वक्त आयेगा तब जनता कोई न कोई विकल्प ढूंढ ही लेगी। 6) "लोकतन्त्र" के बारे में मेरा "व्यक्तिगत मत" यह है कि "अभी भारत के लोग इस लायक ही नहीं हैं" कि उन्हें लोकतन्त्र दिया जाये। एक उदाहरण कई बार दे चुका हूं, फ़िर से देता हूं – एक पेशाबघर का निर्माण किया गया, और जनता से अनुरोध किया गया कि वे उसी में जाकर पेशाब करें, बाहर-इधर-उधर न करें। लेकिन अच्छे खासे पढ़े-लिखे से लेकर एक अनपढ़ ठेला चालक भी दो कदम आगे जाकर उस पेशाबघर की मुफ़्त सुविधा नहीं लेता था, बाहर ही गंदा करता था, कई बार समझाया गया, कई बार पेम्फ़लेट चिपकाकर आग्रह किया गया… लोग नहीं माने। अन्ततः हारकर बदबू से परेशान आसपास के लोगों ने वहीं के "लठैतनुमा" दो चार व्यक्तियों को मासिक हफ़्ता देकर उनसे "आग्रह" किया कि वे पेशाबघर में आने वाले लोगों को "समझायें"। नतीजा आश्चर्यजनक रूप से अपेक्षित रहा, शुरुआती दिनों में बाहर मूतने वाले 2-4 लोगों को "समझाया"(?) गया, फ़िर भी न मानने वालों की ठुकाई हुई और आज की तारीख में सभी लोग "ईमानदारी" से पेशाबघर के अन्दर जाकर ही निवृत्त होते हैं (यह उदाहरण आँखो देखा हुआ है)। तात्पर्य यह है कि हमारे "जीन्स" मे ही है कि हम किसी भी शिक्षा, किसी भी समझाइश से नहीं मानेंगे… और "ईमानदारी" उसी समय दिखायेंगे जब पिछवाड़े पर डण्डा पड़ने की सम्भावना मजबूत हो… वरना ट्रेफ़िक लाइट का उल्लंघन, बिजली-पानी की चोरी से लेकर पड़ोसी की जमीन दबा लेने तक सभी काम पढ़े-लिखे लोग भी करते हैं। 7) आपके प्रति की गई कुछ टिप्पणियों में चन्द अनावश्यक शब्दों को दिल पर न लें… जबकि मैं कई टिप्पणियों को मॉडरेट भी कर चुका हूं, जिसमें विशुद्ध गालीगलौज की गई थी… 8) स्वस्थ बहस होना चाहिये मैं भी इसका पक्षधर हूं…

  50. man said,

    June 18, 2010 at 8:53 am

    जैन सर, सरदार वल्लभ भाई की बात मानकर पूर्व महाराजावो ने लोकतंत्र की धाराके विरूद्ध ,जाने का साहस तो नहीं किया ,और मुख्य धारा में shamil हो गए ,एक आम भारतीय नागरिक की तरह उन्हें निर्वाचीत होने का हक़ हे ,न वो निर्वाचित हो कर समांतर सरकार खड़ा करने की कोशिश करते हे ?लकिन एक नियती उधर भी dekhiye इसी देश के हिसे जम्मू कशमीर को आजादी की अलसभोर में रोमांटिक सपने देखने के आदि रंडीबाज नेहरु ने एक विवादित और मुख्य धारा से अलग थलग कर दिया ,ये किनकी नीतियों का पर्निनाम था ,जबकि सरदार पटेल ने इसका ,इसका अंतर रास्ट्रीय करण का विरोध किया था ,अब इसे आप कितना लोकतान्त्रिक और किनकी नीतियों का परिणाम मानोगे ,नेहरु या कांग्रेस ,क्योकि आप ने ही कहा था की कांग्रेस के बिना भारत के टूकड़े हो जायेंगे ?

  51. June 18, 2010 at 11:04 am

    koi ek parivar desh ki disha nirdharit nahi kar sakta ye to baccho vali baat hui ki ek parivar ke ना रहने से हमारा देश टुकड़ों-२ में बंट जाएगा .

  52. June 21, 2010 at 4:48 pm

    मज़ा आ गया। संयोग से पिछले हफ्तेभर में कई पुरानी किताबें और पच्चीस तीस साल पुराने अखबारों की कतरने गूगल पर ढूंढकर पढ़ रहा था। वजह थी राहुल गांधी का जन्मदिन और संजय का देहवसान. विदेशी अखबारों की कुछ कतरने देखने के बाद समझ आया कि संजय गांधी और इंदिरा गांधी क्या चीज़ थे। वीरेंद जैन को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने बिंदुवार सवाल रखे और जवाब भी उन्हें मिल गए। इस तरह की बहस आनलाइन होनी चाहिए।

  53. sunil patel said,

    June 23, 2010 at 6:14 pm

    सुरेश जी ने हमेशा की तरह बहुत अच्छा विषेय उठाया है. अंग्रजो की २०० सालो की गुलामी ने हमें अगले ५०० सालो तक के लिए गुलाम बने लिया है. १९४७ में भले ही हम आजाद हो गए हो किन्तु हमारी सोच अभी भी गुलाम है. कारण हमारी शिक्षा व्यवस्था जो हमें हमारा सच्चा इतिहास नहीं बताती. उच्च शिक्षा प्राप्त और उच्च पदों पर आसीन लोग भी जब केवल एक ही विशेष परिवार का गुडगान / चरण वंदन करते है तो बड़ी दया और हसी आती है.


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