>एक ग़ज़ल : जहाँ पे तुम्हारे सितम….

>ग़ज़ल : जहाँ पर तुम्हारे सितम …..

जहाँ पर तुम्हारे सितम बोलते हैं
वहीं पर हमारे क़लम बोलते हैं

जहाँ बोलने की इजाज़त नहीं है
निगाहों से रंज-ओ-अलम बोलते हैं

ज़माने को ठोकर में रखने की चाहत
ये मन के तुम्हारे भरम बोलते हैं

किसी बेजुबाँ की जुबाँ बन के देखो
शब-ओ-रोज़ क्या अश्क-ए-नम बोलते हैं

जहाँ सर झुकाया ,वहीं काबा ,काशी
मुहब्बत में दैर-ओ-हरम बोलते हैं

बड़ी देर से है अजब हाल “आनन”
न वो बोलते हैं ,न हम बोलते हैं

-आनन्द

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