वामपंथी अखबारों और समर्थकों के लिये उन्हीं के राज्यों से "धर्मनिरपेक्षता से लबालब" भरे दो समाचार…… Secularism in Communist Kerala-Bengal

पाठकों ने अक्सर विभिन्न ब्लॉग्स और फ़ोरमों पर वामपंथी समर्थकों को अपने सिद्धान्त और नैतिकता या सेकुलरिज़्म सम्बन्धी लेक्चर झाड़ते सुना ही होगा। वामपंथियों को इस बात का मुगालता हमेशा रहा है कि इस देश में सेकुलरिज़्म यदि जिन्दा है तो सिर्फ़ उन्हीं की वजह से, क्योंकि कांग्रेस और भाजपा को वे लोग एक ही सिक्के के दो पहलू मानते आये हैं। हालांकि उनके इन “सिद्धान्तों”(?) की पोल कई बार खुल चुकी है, फ़िर भी वे खुद को “धर्मनिरपेक्षता का असली योद्धा”(?) समझने से बाज नहीं आते…। जैसा कि सभी जानते हैं, केरल और पश्चिम बंगाल में ऐसे ही महान वामपंथियों का कई वर्षों तक सत्ता पर कब्जा रहा है… इन्हीं दो राज्यों से “धर्मनिरपेक्षता से लबालब भरे” दो समाचार आये हैं…

1) तृणमूल कांग्रेस स्टूडेण्ट यूनियन ने महिला शिक्षिका को बुरका पहनने पर मजबूर किया (वामपंथियों ने मौन समर्थन किया) –

कोलकाता की आलिया यूनिवर्सिटी में तृणमूल कांग्रेस स्टूडेंट यूनियन के हसन-उज-जमाँ नामक छात्र नेता ने वहाँ की एक बंगाली शिक्षिका श्रीमती शिरीन मिद्या को बुरका पहनकर कॉलेज आने के लिये धमकाया। जब श्रीमती मिद्या ने बुरका पहनने से मना कर दिया और वाइस चांसलर शम्सुल आलम और रजिस्ट्रार डॉ अनवर हुसैन से शिकायत की तो उन्होंने उस छात्रनेता पर कोई कार्रवाई करने से इंकार कर दिया। उलटे वाइस चांसलर ने उन्हें यूनिवर्सिटी न जाने की सलाह दे डाली। हिम्मती महिला श्रीमती मिद्या ने पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक मंत्री अब्दुल सत्तार से शिकायत की, तो उन्होंने बदले में श्रीमती मिद्या का तबादला यूनिवर्सिटी से साल्ट लेक कैम्पस स्थित लाइब्रेरी में कर दिया। जब इस मामले में पत्रकारों ने रजिस्ट्रार से सम्पर्क किया तो उन्होंने कहा कि “वैसे तो आलिया यूनिवर्सिटी में कोई ड्रेस-कोड नहीं है, लेकिन चूंकि यह मदरसा सिस्टम पर आधारित है, इसलिये महिला शिक्षिकाओं को “शालीन परिधान” पहनना ही चाहिये…” (यानी रजिस्ट्रार “अनवर हुसैन” महोदय मानते हैं कि सिर्फ़ “बुरका” ही शालीन परिधान है…)। क्या आपने किसी महिला संगठन, महिला आयोग या किसी महिला नेत्री को एक महिला शिक्षिका पर हुई इस “ज्यादती” का विरोध करते सुना है? विरोध करने वाली महिला का तबादला किये जाने से यूनिवर्सिटी की बाकी महिलाओं को बुरका पहनाना आसान हो गया है, क्योंकि सभी में श्रीमती मिद्या जैसी हिम्मत नहीं होती। गिरिजा व्यास जी सुन रही हैं क्या?

असल में तृणमूल कांग्रेस ने फ़िलहाल वामपंथियों के “पिछवाड़े में हड़कम्प” मचा रखा है, इसलिये तृणमूल कांग्रेस के एक छात्रनेता को “धार्मिक” मामले (इसे मुस्लिम मामले पढ़ें) में हाथ लगाने की हिम्मत बंगाल के वामपंथी मंत्री की नहीं थी, ऊपर से विधानसभा चुनाव सिर पर आन खड़े हैं सो “धर्मनिरपेक्षता” बरकरार रखने की खातिर एक टीचर का ट्रांसफ़र कर भी दिया तो क्या? लेकिन क्या श्रीमती मिद्या का तबादला करके एक तरह से वामपंथियों ने “अघोषित फ़तवे” का समर्थन नहीं किया है? मुस्लिम वोटों की खातिर सदा हर जगह “लेटने” वाले वामपंथी उस समय सैद्धान्तिक रुप से बुरी तरह उखड़ जाते हैं जब “हिन्दुत्व” या “हिन्दू वोटों” की बात की जाती है…। यहाँ एक और बात नोट करने लायक है कि पश्चिम बंगाल के अधिकतर मुस्लिम बहुल शिक्षा संस्थानों में “गैर-मुस्लिम” शिक्षकों को स्वीकार नहीं किया जा रहा है, भले ही उनके पास आधिकारिक नियुक्ति पत्र (Appointment Letter) हो 

2) दूसरी खबर वामपंथियों के एक और लाड़ले प्रदेश, जहाँ वे बारी-बारी से कांग्रेस के साथ अदला-बदली करके कुण्डली मारते हैं, उस केरल प्रदेश से –

चूंकि केरल में वामपंथी और कांग्रेसी अदल-बदल कर कुंडली मारते हैं इसलिये यह प्रदेश “धर्मनिरपेक्षता की सुनामी” से हमेशा ही ग्रस्त रहा है। देश में कहीं भी धर्म-परिवर्तन का मामला सामने आये, उसमें केरल का कोई न कोई व्यक्ति शामिल मिलेगा, कश्मीर से लेकर असम तक हुए बम विस्फ़ोटो में भी केरल का कोई न कोई लिंक जरूर मिलता है। केरल से ही प्रेरणा लेकर अन्य कई राज्यों ने “अल्पसंख्यकों” (यानी सिर्फ़ मुस्लिम) के कल्याण(?) की कई योजनाएं चलाई हैं, केरल की ही तरह मुस्लिमों को OBC से छीनकर आरक्षण भी दिया है, हिन्दू मन्दिरों की सम्पत्ति पर कब्जा करने के लिये सरकारी ट्रस्टों और चमचों को छुट्टे सांड की तरह चरने के लिये छोड़ दिया है… आदि-आदि। यानी कि तात्पर्य यह कि “धर्मनिरपेक्षता” की गंगा केरल में ही सर्वाधिक बहती है और यहीं से इसकी प्रेरणा अन्य राज्यों को मिलती है।

अब केरल की सरकार के अजा-जजा/पिछड़ा वर्ग समाज कल्याण मंत्री एके बालन ने घोषणा की है कि धर्म परिवर्तन करने (यानी ईसाई बन जाने वालों) के ॠण माफ़ कर दिये जायेंगे। इस सरकारी योजना के तहत जिन लोगों ने 25,000 रुपये तक का ॠण लिया है, और उन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है तो उनके ॠण माफ़ कर दिये जायेंगे। इस तरह से केरल सरकार पर सिर्फ़(?) 159 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा (यह कीमत वामपंथी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों के सामने कुछ भी नहीं है)।

संदेश स्पष्ट और साफ़ है कि “धर्म परिवर्तन करके ईसाई बन जाओ और मौज करो…, अपने धर्म से गद्दारी करने का जो ईनाम वामपंथी सरकार तुम्हें दे रही है, उसका शुक्रिया मनाओ…”।

http://beta.thehindu.com/news/states/kerala/article451983.ece

अब तक तो आप समझ ही गये होंगे कि “असली धर्मनिरपेक्षता” किसे कहते हैं? तो भविष्य में जब भी कोई “वामपंथी दोमुँहा” आपके सामने बड़े-बड़े सिद्धान्तों का उपदेश देता दिखाई दे, तब उसके फ़टे हुए मुँह पर यह लिंक मारिये। ठीक उसी तरह, जिस तरह नरेन्द्र मोदी ने “मौत का सौदागर” वाले बयान को सोनिया के मुँह पर गैस काण्ड के हत्यारों को बचाने और सिखों के नरसंहार के मामले को लेकर मारा है।

रही मीडिया की बात, तो आप लोग “भाण्ड-मिरासियों” से यह उम्मीद न करें कि वे “धर्मनिरपेक्षता” के इस नंगे खेल को उजागर करेंगे… ये हमें ही करना पड़ेगा, क्योंकि अब भाजपा भी बेशर्मी से इसी राह पर चल पड़ी है…। नरेन्द्र मोदी नाम का “मर्द” ही भाजपाईयों में कोई “संचार” फ़ूंके तो फ़ूंके, वरना इस देश को कांग्रेसी और वामपंथी मिलकर “धीमी मौत की नींद” सुलाकर ही मानेंगे…

बुद्धिजीवी(?) इसे धर्मनिरपेक्षता कहते हैं, मैं इसे “शर्मनिरपेक्षता” कहता हूं… और इसके जिम्मेदार भी हम हिन्दू ही हैं, जो कि “सहनशीलता, उदारता, सर्वधर्म समभाव…” जैसे नपुंसक बनाने वाले इंजेक्शन लेकर पैदा होते हैं।
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चित्र साभार – आउटलुक

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22 Comments

  1. June 22, 2010 at 7:58 am

    धर्मनिरपेक्षता के नाम पर यह जो कुछ भी किया जा रहा है यह निंदनीय है एवं हमको विनाश के गर्त में ले जा रहा है.हर हिन्दुस्तानी के लिये एक-समान कानून व्यवस्था होना जरूरी है. धर्म के नाम पर किसी को किसी तरह का फायदा नहीं मिलना चाहिये.सस्नेह — शास्त्रीहिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती हैhttp://www.IndianCoins.Org

  2. SHIVLOK said,

    June 22, 2010 at 7:59 am

    बुद्धिजीवी(?) इसे धर्मनिरपेक्षता कहते हैं, मैं इसे "शर्मनिरपेक्षता" कहता हूं… और इसके जिम्मेदार भी हम हिन्दू ही हैं, जो कि "सहनशीलता, उदारता, सर्वधर्म समभाव…" जैसे नपुंसक बनाने वाले इंजेक्शन लेकर पैदा होते हैं। इन्हें बुद्धिजीवी मत कहो, बेईमान ,मक्कार, कमिने, वोटों के लालची कहो.Shiv Ratan Gupta

  3. SHIVLOK said,

    June 22, 2010 at 8:05 am

    सभी राजनीतिक दल मुसलमानों का तुष्टिकरण करने में लगे हैं क्योंकि सारे राजनीतिक दल जानते हैं की तुष्टिकरण किसका किया जा सकता है तुष्टिकरण की आवश्यक शर्त है "लोभी – लालची – अशिक्षित होना"Shiv Ratan Gupta

  4. June 22, 2010 at 8:15 am

    केरल में ईसाई धर्म अपनाने वाले लोगों को लोन में मिलने वाली छूट की खबर हमने तरकश पर छापी थी और आगे भी "शर्मनिरपेक्षता" वाली सारी खबरें हम तरकश पर प्रमुखता से छापते रहेंगे. इन सेकुलरियों के चेहरे बेनकाब होने चाहिए. यह एक जहर है जो धीरे धीरे फैल रहा है, इसका आभास नहीं होता परंतु परिणाम घातक ही होता है.

  5. aarya said,

    June 22, 2010 at 8:39 am

    सादर वन्दे !इन कृत्यों से देश के दलालों (वामपंथियों और कांग्रेसियों) का वीभत्स चेहरा तो उजागर होता ही है साथ ही साथ भाजपा कि नपुंसकता भी उजागर होती है | रही बात मिडिया कि तो इस दलाल कौम ने तो और संडास फैला रखा है इनसे अच्छी तो कोठे पर जिस्म बेचने वाली वैश्याएँ हैं |हम ये कह सकते हैं कि देश के चार दलालकांग्रेस – सेकुलर – मिडिया और झंडा लाल |रत्नेश त्रिपाठी

  6. June 22, 2010 at 1:01 pm

    वाह रे धर्मनिरपेक्षता !इस देश में क़ानून का एकीकरण कब होगा… सभी पार्टियाँ सिर्फ धार्मिक कार्ड खेलते रहेंगे क्या?इनके करतूतों को उजागर करना ही होगा.

  7. June 22, 2010 at 1:29 pm

    धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदारों को यह सब नहीं दिखेगा, सुरेश जी। उन्हें तो तिलक, नारियल, मंगलाचरण से आपत्ति है। उन्हें उनकी खोल से बाहर निकालना कठिन ही नहीं नामुमकिन है।

  8. June 22, 2010 at 1:40 pm

    बामपंथी तो एक झूठ को हज़ार बार बोलकर सत्य साबित करना ही नियत है ये तो मानवता बिरोधी है ही कांग्रेस धर्म निरपेक्षता क़े नाम पर देश द्रोह कर रही है ममता तो उन्ही सेकुलर फोर्सो में से एक है ये सभी तुष्टिकरण से धीरे -धीरे देश को बिभाजन कि तरफ ले जा रहे है ,देश भक्त हिन्दुओ को ही बिचार करना होगा भारत -भारत रहेगा या नहीं या कुछ और

  9. June 22, 2010 at 1:41 pm

    सुरेश जी, ऐसे प्रयास निश्चित रूप से आपत्तिजनक है. हम RTI के मार्फत इन कुकृत्यो की अधिकारिक जानकारी ले सकते है. और अगर तथ्य एकत्र कर सके और कोई एड्वोकेट यह ज़िम्मेदारी ले सके तो निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट मैं PIL दायर की जानी चाहिए. यदि इस दिशा मैं कोई निश्चित और सार्थक प्रयास होता है तो बताएँ. यह देखने वाली बात होगी की किस की कितनी दिल से तैयारी है या फिर केवल ब्लॉग्गिंग पर फोकट मे भादस निकालने मिल जाता है इसलिए टाइम-पास कर रहे है. निश्चित रूप से सभी अपनी परिवारिक व्यस्तताओ व ज़िम्मेदारियो को पहले प्राथमिकता देंगे और देनी भी चाहिए, पर एसके बाद क्या वे इस अभियान मैं जुड़ सकेंगे. देखने वाली बात होगी. शायद यही वो बात है जो तथाकथित “बेनामी” कहना चाहते है. देखे की क्या वो आगे आते है? एक बात तो साफ हो गई है की सभी हिंदूवादी पार्टियाँ और संस्थाएँ अपना आत्मविश्वास, जनाधार , उद्डयेश और दूरदर्शिता खो चुकी है. अन्यथा अभी तक तो इस देश मैं आंदोलनो का भूचाल आ जाना चाहिए था.

  10. June 22, 2010 at 1:48 pm

    ये मुसलमान नाम की बीमारी इस देश को ले डूबेगी . जब तक अल्पसंख्यको को वोटिँग का अधिकार न देने का बिल नही पास होगा तब तक इस देश का विकास संभव नही है

  11. June 22, 2010 at 2:02 pm

    इनके करतूतों को उजागर करना ही होगा

  12. June 22, 2010 at 2:29 pm

    सिर्फ एक काम ठीक कर देगा. हिन्दुओं को अपने वोट की कीमत मुस्लिमों की तरह ही वसूलनी चाहिये. और सारी चीजें बाद में धर्म पहले….

  13. man said,

    June 22, 2010 at 2:36 pm

    वन्देमातरम सर, दोनों खबरे सेकुलर कुतो की नसबंदी केलिए काफी हे ,लेकिन नसबंदी करने वाले मिडिया को तो पहले ही पूँछ काट के पालतू शवान बना लिया गया हे ,साला नरेन्द्र मोदी पर गूर्र्राता हे ,तोगड़िया जी को काटने दोड़ता हे ,बी.जे. पी को आँखे दिखाता हे |जब वामपंथी और सोनिया गाँधी कहती हे ""मिडिया"",,, चूं चूं करके पेरो में लोटने लगते हे ,पूंछतो हिला नहीं सकताहे ? अभी भांड पन देखिये न्यूज़ २४ का ,राहुल गाँधी के चालीसवे जनम दिन पर ""राहुल गाथा ''" नाम का कार्य कर्म पेश किया ,अब आप ही सोचो की राहुल गाँधी ने झोंपड़े में सोने के आलावा कोनसा तीर मार दिया जो उसकी गाथा बन गयी ,मतलब उस चैनल ने राहुल गाँधी को भी शहीद कर के उसकी गाथा भी बना दी ,जय हो ?

  14. June 22, 2010 at 3:59 pm

    भारतीय नागरिक की बात से सहमतअगर अगले चुनावो मे सारे हिन्दू एकमत होकर ये फैसला करे और अपनी मांग रखे कि इस चुनाव मे उसी पार्टी को वोट दिया जायेगा जो (1)अल्पसंख्यको को वोटिँग न देने वाला बिल लायेगी.(2) "कश्मीर मे दूसरे राज्यो के लोग जमीन नही खरीद सकते". इस कानून को रद्द करेगीजब हिँदू जनता एकजुट होकर ये मांग रखेगी और इस मांग को पूरा करने का वादा करने वाले को वोट देगी.उसी दिन से भारत का असली विकास शुरु होगा.लेकिन इसके लिये हर हाल मे हिँदुओ को एकजुट होकर वोट बैँक बनना पड़ेगा.अगर ये मुसलमान एकजुट होकर इतनी ताकत जुटा सकते है कि आज सब नेता इनके वोटो के लिये मरे जा रहे हैतो हिँदुओ को एकजुट होकर वोट बैँक बनने की बात दिमाग मे क्यो नही घुसती.जब हिँदु वोट बैँक बन जायेगा. तब देखेँगे कौन साला अल्पसंख्यको की बात करता है.

  15. June 22, 2010 at 4:27 pm

    हम तो पहले ही कह चुके हैं कि हिन्दूविरोध-भारत विरोध का ही दूसरा नाम घर्मनिर्पेक्षता है।इसका समूलनाश ही हम सबके हित में है आओ मिलकर प्रयास करें जी।

  16. Mahak said,

    June 22, 2010 at 11:48 pm

    धर्मनिरपेक्षता के नाम पर यह जो कुछ भी किया जा रहा है यह निंदनीय है एवं हमको विनाश के गर्त में ले जा रहा है.हर हिन्दुस्तानी के लिये एक-समान कानून व्यवस्था होना जरूरी है. धर्म के नाम पर किसी को किसी तरह का फायदा नहीं मिलना चाहिये.

  17. June 23, 2010 at 4:44 am

    …हर हिन्दुस्तानी के लिये एक-समान कानून व्यवस्था होना जरूरी है. धर्म के नाम पर किसी को किसी तरह का फायदा या किसी को किसी तरह का नुकसान नहीं मिलना चाहिये !आपसे सहमत, आलेख में वर्णित घटनायें देश के हितों के विरूद्ध हैं…विरोध होना चाहिये इनका…हर सही सोच रखने वाले भारतीय की ओर से!आभार!…

  18. June 23, 2010 at 2:30 pm

    सुरेशजी नमस्कार,बहुत अच्छे और सच्चे उदाहरण आपने दिए है..पर आप कुछ खबरों पर भी नज़र डालिए जनाब..1) "मार्क्स चूतियों" का गढ़ कहे जाने वाले कोलकाता मे दिन दहाड़े एक महिला और उसके 3 मासूम बच्चों को इसलिए पीटा गया , घसीटा गया क्यूंकी उस महिला के पति ने "तृणमूल कांग्रेस्स" की चुनाव रैली मे कार्यकर्ता बनाकर काम किया था. "मार्क्स चूतिए" अपनी हार से बौखलाकार "तृणमूल कॉंग्रेस" के समर्थकों को दिन दहाड़े हड़काया गया..2) "कोलकाता मे ही एक मस्जिद के इमाम ने एक मुस्लिम महिला के साथ अवैध संबंध बनाने चाहे, लेकिन महिला ने विरोध किया तो "इमाम के चम्चो और "इस्लाम के पहरेदारो" ने उसे उल्टा लटकाकर मारा..-+- सुरेशजी, ऐसी बातें हमारे "भक्त" मीडीया मे अक्सर नही आती है फिर भी कुछ ऐसे लोग भी मीडीया मे है जिन्होने अपना ज़मीर "तुरिन सरकार, कठमुल्लों, और सेक्युलर चूतियों" को बेचा नही है…इसलिए ग़लती से ये खबर सामने आ जाती है..

  19. June 23, 2010 at 2:30 pm

    सुरेशजी नमस्कार,बहुत अच्छे और सच्चे उदाहरण आपने दिए है..पर आप कुछ खबरों पर भी नज़र डालिए जनाब..1) "मार्क्स चूतियों" का गढ़ कहे जाने वाले कोलकाता मे दिन दहाड़े एक महिला और उसके 3 मासूम बच्चों को इसलिए पीटा गया , घसीटा गया क्यूंकी उस महिला के पति ने "तृणमूल कांग्रेस्स" की चुनाव रैली मे कार्यकर्ता बनाकर काम किया था. "मार्क्स चूतिए" अपनी हार से बौखलाकार "तृणमूल कॉंग्रेस" के समर्थकों को दिन दहाड़े हड़काया गया..2) "कोलकाता मे ही एक मस्जिद के इमाम ने एक मुस्लिम महिला के साथ अवैध संबंध बनाने चाहे, लेकिन महिला ने विरोध किया तो "इमाम के चम्चो और "इस्लाम के पहरेदारो" ने उसे उल्टा लटकाकर मारा..-+- सुरेशजी, ऐसी बातें हमारे "भक्त" मीडीया मे अक्सर नही आती है फिर भी कुछ ऐसे लोग भी मीडीया मे है जिन्होने अपना ज़मीर "तुरिन सरकार, कठमुल्लों, और सेक्युलर चूतियों" को बेचा नही है…इसलिए ग़लती से ये खबर सामने आ जाती है..

  20. Avadh said,

    March 18, 2011 at 3:21 pm

    >इस दुनिया मे धर्मनिर्पेक्ष तो कोई हो ही नही सकता! धर्म से हीन तो सिर्फ़ जानवर हो सकते है पर ये वामपंथी तो ऐसे जानवर है जो अपने पंथ के भी नही! ये सिर्फ़ और सिर्फ़ लूटने और खसोटने वाले जानवर है!! बहुत सुन्दर लेख और पर्दाफ़ाश इस तथाकथित शर्मनिर्पेक्षता का!!

  21. ASHISH NAGAR said,

    March 19, 2011 at 11:27 am

    >जिसने भी ये लिखा है में उसके विचारो से सहमत हूँ …………..में आपका धन्यबाद करता हूँ ……की आपने ये लेख मेरी आई .डी . पर भेजा .

  22. ASHISH NAGAR said,

    March 19, 2011 at 11:28 am

    >जिसने भी ये लिखा है में उसके विचारो से सहमत हूँ …………..में आपका धन्यबाद करता हूँ ……की आपने ये लेख मेरी आई .डी . पर भेजा .


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