जनगणना में “धर्म” शामिल करने की माँग साम्प्रदायिकता है क्या??…… Religion & Caste in India Census 2011

जब इन्फ़ोसिस के पूर्व सीईओ नन्दन नीलकेणि ने बहुप्रचारित और अनमोल टाइप की “यूनिक आईडेंटिफ़िकेशन नम्बर” योजना के प्रमुख के रूप में कार्यभार सम्भाला था, उस समय बहुत उम्मीद जागी थी, कि शायद अब कुछ ठोस काम होगा, लेकिन जिस तरह से भारत की सुस्त-मक्कार और भ्रष्ट सरकारी बाबू प्रणाली इस योजना को पलीता लगाने में लगी हुई है, उस कारण वह उम्मीद धीरे-धीरे मुरझाने लगी है। UID (Unique Identification Number) बनाने के पहले चरण में जनगणना की जानी है, जिसमें काफ़ी सारा डाटा एकत्रित किया जाना है। पहले चरण में ही तमाम राजनैतिक दलों, कथित प्रगतिशीलों और जातिवादियों ने जनगणना में “जाति” के कॉलम को शामिल करवाने के लिये एक मुहिम सी छेड़ दी है। चारों तरफ़ से हमले हो रहे हैं कि “जाति एक हकीकत है”, “जाति को शामिल करने से सही तस्वीर सामने आ सकेगी…” आदि-आदि। चारों ओर ऐसी हवा बनाई जा रही है, मानो जनगणना में “जाति” शामिल होने से और उसके नतीजों से (जिसका फ़ायदा सिर्फ़ नेता ही उठायेंगे) भारत में कोई क्रान्ति आने वाली हो।

इस सारे हंगामे में इस बात पर कोई चर्चा नहीं हो रही कि –

1) जनगणना फ़ॉर्म में “धर्म” वाला कॉलम क्यों नहीं है?


2) धर्म बड़ा है या जाति?


3) क्या देश में धर्म सम्बन्धी आँकड़ों की कोई अहमियत नहीं है?


4) क्या ऐसा किसी साजिश के तहत किया जा रहा है?

ऐसे कई सवाल हैं, लेकिन चूंकि मामला धर्म से जुड़ा है इसलिये इन प्रश्नों पर इक्का-दुक्का आवाज़ें उठ रही हैं। बात यह भी है कि मामला धर्म से जुड़ा है और ऐसे में वामपंथियों-सेकुलरों और प्रगतिशीलों द्वारा “साम्प्रदायिक” घोषित होने का खतरा रहता है, जबकि “जाति” की बात उठाने पर न तो वामपंथी और न ही सेकुलर… कोई भी कुछ नहीं बोलेगा… क्योंकि शायद यह प्रगतिशीलता की निशानी है।

सवाल मुँह बाये खड़े हैं कि आखिर नीलकेणि जी पर ऐसा कौन सा दबाव है कि उन्होंने जनगणना के इतने बड़े फ़ॉर्म में “सौ तरह के सवाल” पूछे हैं लेकिन “धर्म” का सवाल गायब कर दिया।

अर्थात देश को यह कभी नहीं पता चलेगा कि –

1) पिछले 10 साल में कितने धर्म परिवर्तन हुए? देश में हिन्दुओं की संख्या में कितनी कमी आई?

2) भारत जैसे “महान” देश में ईसाईयों का प्रतिशत किस राज्य में कितना बढ़ा

3) असम-पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मुस्लिमों की संख्या कितनी बढ़ी,

4) किस जिले में मुस्लिम अल्पसंख्यक से बहुसंख्यक बन गये

5) उड़ीसा और झारखण्ड के आदिवासी कहे जाने वाले वाकई में कितने आदिवासी हैं और उनमें से कितने अन्दर ही अन्दर ईसाई बन गये।

उल्लेखनीय है कि पिछले 10-15 साल में भारत में जहाँ एक ओर एवेंजेलिस्टों द्वारा धर्म परिवर्तन की मुहिम जोरशोर से चलाई गई है, वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश से घुसपैठ के जरिये असम और बंगाल के कई जिलों में मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात चिन्ताजनक तरीके बढ़ा है। ऐसे हालात में नीलकेणि जी को तो धर्म वाला कॉलम अति-आवश्यक श्रेणी में रखना चाहिये था। बल्कि मेरा सुझाव तो यह भी है कि “वर्तमान धर्म कब से” वाला एक और अतिरिक्त कॉलम जोड़ा जाना चाहिये, ताकि जवाब देने वाला नागरिक बता सके कि क्या वह जन्म से ही उस धर्म में है या “बाद” में आया, साथ जनगणना में पूछे जाने वाले सवालों को एक “शपथ-पत्र” समान माना जाये ताकि बाद में कोई उससे मुकर न सके।

मजे की बात यह है कि जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द ने भी “धर्म” का कॉलम जुड़वाने की माँग की है, हालांकि उनकी माँग की वजह दूसरी है। जमीयत का कहना है कि सरकार मुसलमानों की जनसंख्या को घटाकर दिखाना चाहती है, ताकि उन्हें उनके अधिकारों, सुविधाओं और योजनाओं से वंचित किया जा सके। (यहाँ पढ़ें…)

इससे लगता है कि मौलाना को विश्वास हो गया है कि पिछले 10 साल में भारत में मुस्लिमों की जनसंख्या 13 या 15% से बढ़कर अब 20% हो गई है? और इसीलिये वे चाहते हैं कि उचित प्रतिशत के आधार पर “उचित” प्रतिनिधित्व और “उचित” योजनाएं उन्हें दी जायें, जबकि हिन्दुओं द्वारा जनगणना में धर्म शामिल करवाने की माँग इस डर को लेकर है कि उनकी जनसंख्या और कुछ “खास” इलाकों में जनसंख्या सन्तुलन बेहद खतरनाक तरीके से बदल चुका है, लेकिन यह तभी पता चलेगा जब जनगणना फ़ॉर्म में “धर्म” पता चले। प्रधानमंत्री ने “जाति” की गणना करने सम्बन्धी माँग को प्रारम्भिक तौर पर मान लिया है, लेकिन “धर्म” सम्बन्धी आँकड़ों को जाहिर करवाने के लिये शायद उन्हें सोनिया से पूछना पड़ेगा, क्योंकि मैडम माइनो शायद इसे हरी झण्डी दिखाएं, क्योंकि ऐसा होने पर “ईसाई संगठनों” द्वारा आदिवासी इलाके में चलाये जा रहे धर्म परिवर्तन की पूरी पोल खुल जाने का डर है।

जमीयत के मौलाना के विचार महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक आयोग सदस्य और “क्रिश्चियन वॉइस” के अध्यक्ष अब्राहम मथाई से कितने मिलते-जुलते हैं, मुम्बई में अब्राहम मथाई ने भी ठीक वही कहा, जो मौलाना ने लखनऊ में कहा, कि “धर्म सम्बन्धी सही आँकड़े नहीं मिलने से अल्पसंख्यकों को नुकसान होगा, उन्हें सही “अनुपात” में योजनाएं, सुविधाएं और विभिन्न गैर-सरकारी संस्थाओं में उचित प्रतिनिधित्व नही मिलेगा… अर्थात हर कोई “अपना-अपना फ़ायदा” देख रहा है। (इधर देखें…)

जनगणना के पहले दौर में मकानों और रहवासियों के आँकड़े एकत्रित किये जायेंगे, जबकि दूसरे दौर से बायोमीट्रिक आँकड़े एकत्रित करने की शुरुआत की जायेगी। जनगणना के पहले ही दौर में सरकारी कर्मचारी इतनी गलतियाँ और मक्कारी कर रहे हैं कि पता नहीं अगला दौर शुरु होगा भी या नहीं। भारत पहले भी मतदाता पहचान पत्र की शेषन साहब की योजना को शानदार पलीता लगा चुका है और अब वे कार्ड किसी काम के नहीं रहे। 2011 की जनगणना पर लगभग 2200 करोड रुपया खर्च होगा, जबकि बायोमीट्रिक कार्ड के लिये 800 करोड रुपये का प्रावधान अलग से किया गया है।

हमारी नीलकेणि जी से सिर्फ़ इतनी गुज़ारिश है कि “जाति-जाति-जाति” के शोर में “धर्म” जैसे महत्वपूर्ण मसले को न भूल जायें। यदि गणना में जाति शामिल नहीं भी करते हैं तब भी “धर्म” तो अवश्य ही शामिल करें।

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अन्त में एक सवाल : क्या केन्द्रीय मंत्री अम्बिका सोनी पुनः हिन्दू बन गई हैं? या अब तक ईसाई ही हैं? और आखिर वह ईसाई बनीं कब थीं?… 2011 जनगणना फ़ॉर्म से “धर्म” को गायब करने की वजह से ही ऐसे सवाल मेरे “भोले मन में हिलोरें” ले रहे हैं क्योंकि नेट पर खोजने से एक वेबसाईट (यहाँ देखें…) उन्हें “हिन्दू” बताती है, जबकि एक वेबसाईट “ईसाई” (यहाँ देखें…)… हम जैसे “अकिंचन” लोगों को कैसे पता चले कि आखिर माननीया मंत्री महोदय किस धर्म को “फ़ॉलो” करती हैं…

प्रिय पाठकों, नीचे दी हुई लिंक पर देखिये, “भारत के माननीय ईसाईयों” की लिस्ट में आपको – विजय अमृतराज, अरुंधती रॉय, प्रणव रॉय, बॉबी जिन्दल, राजशेखर रेड्डी और जगनमोहन रेड्डी, टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति, अभिनेत्री नगमा, दक्षिण की सुपरस्टार नयनतारा, अम्बिका सोनी, अजीत जोगी, मन्दाकिनी, मलाईका अरोरा, अमृता अरोरा जैसे कई नाम मिलेंगे… जिन्होंने धर्म तो बदल लिया लेकिन भारत की जनता (यानी हिन्दुओं) को “*$*%%**” बनाने के लिये, अपना नाम नहीं बदला।

http://notableindianchristians.webs.com/apps/blog/

तो अब आप खुद ही बताईये नीलकेणि साहब, जब देश के बड़े शहरों में यह हाल हैं तो भारत के दूरदराज आदिवासी इलाकों में क्या हो रहा होगा, हमें कैसे पता चलेगा कि झाबुआ का “शान्तिलाल भूरिया” अभी भी आदिवासी ही है या ईसाई बन चुका? और जब बन ही चुका है, तो खुद को “पापी” क्यों महसूस करता है, नाम भी बदल लेता?

नन्दन जी, उठिये!!! अब क्या विचार है? जनगणना 2011 के फ़ॉर्म में – 1) “धर्म” और 2) “वर्तमान धर्म में कब से”, नामक दो कॉलम जोड़ रहे हैं क्या? या “किसी खास व्यक्ति” से पूछना पड़ेगा?

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>मुक्तिका मिट्टी मेरी… संजीव ‘सलिल’

> मुक्तिका
मिट्टी मेरी…
संजीव ‘सलिल’
*

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*
मोम बनकर थी पिघलती रही मिट्टी मेरी.
मौन रहकर भी सुलगती रही मिट्टी मेरी..

बाग़ के फूल से पूछो तो कहेगा वह भी –
कूकती, नाच-चहकती रही मिट्टी मेरी..

पैर से रौंदी गयी, सानी गयी, कूटी गयी-
चाक-चढ़कर भी, निखरती रही मिट्टी मेरी..

ढाई आखर न पढ़े, पोथियाँ रट लीं, लिख दीं.
रही अनपढ़ ही, सिसकती रही मिट्टी मेरी..

कभी चंदा, कभी तारों से लड़ायी आखें.
कभी सूरज सी दमकती रही मिट्टी मेरी..

खता लम्हों की, सजा पाती रही सदियों से.
पाक-नापाक चटकती रही मिट्टी मेरी..

खेत-खलिहान में, पनघट में, रसोई में भी.
मैंने देखा है, खनकती रही मिट्टी मेरी..

गोद में खेल, खिलाया है सबको गोदी में.
फिर भी बाज़ार में बिकती रही मिट्टी मेरी..

राह चुप देखती है और समय आने पर-
सूरमाओं को पटकती रही मिट्टी मेरी..

कभी थमती नहीं, रुकती नहीं, न झुकती है.
नर्मदा नेह की, बहती रही मिट्टी मेरी..

******************Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com

>कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों… —संजीव ‘सलिल’

>

कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों… —संजीव ‘सलिल’

कथा-गीत:
मैं बूढा बरगद हूँ यारों…
संजीव ‘सलिल’
*

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*
मैं बूढा बरगद हूँ यारों…

है याद कभी मैं अंकुर था.
दो पल्लव लिए लजाता था.
ऊँचे वृक्षों को देख-देख-
मैं खुद पर ही शर्माता था.

धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ.
शाखें फैलीं, पंछी आये.
कुछ जल्दी छोड़ गए मुझको-
कुछ बना घोंसला रह पाये.

मेरे कोटर में साँप एक
आ बसा हुआ मैं बहुत दुखी.
चिड़ियों के अंडे खाता था-
ले गया सपेरा, किया सुखी.

वानर आ करते कूद-फांद.
झकझोर डालियाँ मस्ताते.
बच्चे आकर झूला झूलें-
सावन में कजरी थे गाते.

रातों को लगती पंचायत.
उसमें आते थे बड़े-बड़े.
लेकिन वे मन के छोटे थे-
झगड़े ही करते सदा खड़े.

कोमल कंठी ललनाएँ आ
बन्ना-बन्नी गाया करतीं.
मागरमाटी पर कर प्रणाम-
माटी लेकर जाया करतीं.

मैं सबको देता आशीषें.
सबको दुलराया करता था.
सबके सुख-दुःख का साथी था-
सबके सँग जीता-मरता था.

है काल बली, सब बदल गया.
कुछ गाँव छोड़कर शहर गए.
कुछ राजनीति में डूब गए-
घोलते फिजां में ज़हर गए.

जंगल काटे, पर्वत खोदे.
सब ताल-तलैयाँ पूर दिए.
मेरे भी दुर्दिन आये हैं-
मानव मस्ती में चूर हुए.

अब टूट-गिर रहीं शाखाएँ.
गर्मी, जाड़ा, बरसातें भी.
जाने क्यों खुशी नहीं देते?
नव मौसम आते-जाते भी.

बीती यादों के साथ-साथ.
अब भी हँसकर जी लेता हूँ.
हर राही को छाया देता-
गुपचुप आँसू पी लेता हूँ.

भूले रस्ता तो रखो याद
मैं इसकी सरहद हूँ प्यारों.
दम-ख़म अब भी कुछ बाकी है-
मैं बूढा बरगद हूँ यारों..
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वोटिंग – कितने लोग मानते हैं कि यदि “गाँधी परिवार” देश पर काबिज न रहे तो यह देश टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा? (एक प्रश्नों भरी माइक्रो पोस्ट)…… Gandhi Family Inevitable for India?

मेरी पिछली पोस्ट “अपनी गिरेबान में झाँककर देखा है कभी…” काफ़ी विचारोत्तेजक बहस लेकर आई, जिस पर आगे भी चर्चा जारी रहेगी। अमूमन मैं किसी का नाम लेकर अथवा किसी खास टिप्पणी को अपनी पोस्ट का विषय नहीं बनाता, लेकिन भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार श्री वीरेन्द्र जैन साहब की टिप्पणी के कुछ अंश महत्वपूर्ण लगे और इस पर बहस करवाने की इच्छा हुई है। इसी पोस्ट में एक बेनामी साहब (“पिताजी” के नाम से कमेंट करने वाले) ने भी कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये हैं, उन पर भी एक अलग पोस्ट में बिन्दुवार चर्चा की जायेगी… लेकिन फ़िलहाल जैन साहब की टिप्पणी पर अपने विचार रखें…

जैन साहब ने अपनी टिप्पणी में निम्न बातें कही हैं –

1) कांग्रेस का नेहरू-गान्धी परिवार पर निर्भर हो जाना इस इकलौती राष्ट्रव्यापी पार्टी की विवशता है जिसके बिना यह पार्टी टुकड़ों टुकड़ों में बँट जायेगी और दूसरी किसी राष्ट्रव्यापी पार्टी के न होने से देश भी इसी दशा को पहुँचेगा।

सवाल है कि –

अ) गाँधी परिवार है भी तो क्या हमारा देश मजबूत और अखण्ड है?

ब) क्या कोई एक व्यक्ति या परिवार इतना “अपरिहार्य” हो सकता है? कि जिसके बिना काम ही न चले? मैंने तो सुना है कि किसी के मरने-जीने से किसी का काम नहीं रुकता, दुनिया तो चलती ही है।
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2) भाजपा भी इसी परिवार के चरणों में जूते चाटती है। सोनिया और राहुल की योग्यता और चरित्र की तुलना भाजपा के आराध्य मेनका और वरुण से कर के देखिये और सच्चे मन से निष्कर्ष बताइए।

सवाल है कि –

अ) सोनिया और राहुल ने अब तक वाकई में कितनी योग्यता दिखाई है? और उसे मापने का आधार क्या हो? मीडिया रिपोर्टें या सलाहकारों (इसे चमचों भी पढ़ा जा सकता है) द्वारा लिये-दिये गये मनमाने निर्णयों को, जिसकी वजह से महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी समस्याएं मुँह बाये खड़ी हैं।

ब) भाजपा ने मेनका और वरुण को पार्टी के भीतर “कितना” महत्वपूर्ण स्थान दिया है, जिसे “जूते चाटने” की संज्ञा दी जा सके?
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3) देश को लोकतांत्रिक होने में अभी वर्षों लगेंगे। भाजपा इसी कमजोरी को जानती है इसलिए उसके निशाने पर कांग्रेस नहीं केवल सोनिया और राहुल होते हैं क्योंकि कांग्रेस की जान उसी तोते में बसती है।

सवाल है कि –

अ) देश को लोकतांत्रिक होने में वर्षों लगेंगे, जब यही बात कोई गैर-कांग्रेसी कहता है तो उस पर “तानाशाह” और “फ़ासीवादी” होने का आरोप क्यों लगा दिया जाता है?

ब) क्या 100 साल पुरानी पार्टी इतनी निरीह और मजबूर हो गई है कि किसी एक परिवार में “ उसकी जान” बसती है? यदि ऐसा है तो इसका दोषी कौन है?
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जैन साहब के यह विचार महत्वपूर्ण हैं और बहस माँगते हैं, क्योंकि देश के कई “बुद्धिजीवी” ऐसा ही सोचते हैं…

कृपया अपने विचार “संयत भाषा” में और “मुद्दे से सम्बन्धित” ही रखें, किसी भी प्रकार की गालीगलौज व असभ्य भाषा तथा वीरेन्द्र जैन जी को सम्बोधित करके अशालीन शब्दों में की गई टिप्पणी को नहीं लिया जायेगा… इसलिये कृपया बहस को भटकाने के लिये मुद्दे से हटकर टिप्पणी न करें…

व्यस्तता की वजह से कम्प्यूटर से दूरी होने के कारण आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने में समय लग सकता है, थोड़ा संयम रखें। लेकिन चाहे मेरे प्रति कितनी भी आलोचनात्मक टिप्पणी हो (परन्तु भाषा सही हो) तो भी मैं उसे प्रकाशित अवश्य करूंगा…
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“पिताजी” नामक बेनामी के कमेंट से सम्बन्धित विषय (सार्वजनिक जीवन में अनुशासन, नैतिकता और भ्रष्टाचार), पर विस्तार से मेरे विचार और चर्चा शीघ्र ही…

1 रुपये व 5 रुपये के सिक्के पर संत अल्फ़ोन्सा कि तसवीर क्यो ?

यहा पर मे आप को इन्डोनेशीया कि सरकार का नोट दिखा रहा हु। जहा पर इन्डोनेशीया कि सरकार के द्वारा अपने यहा के सरकारी नोट पर गणेशजी महाराज का चित्र छापा गया हे । क्योकि वहा के लोगो के जिवन यापन के तरिके मे व हम हिन्दुस्थान के वासियो के रहने के तरिके मे कई प्रकार कि समानता हे।


अब मे आप को इस देश कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष वादी सरकार का एक धर्मनिर्पेक्ष चेहरा दिखा रहा हु………………R.B.I. ने केन्द्र कि इस तथाकथित धर्मनिरपेक्ष वादी सरकार के कहने से 1 रुपये 5 रुपये के सिक्के के उपर संत अल्फ़ोन्सा के जन्म के 100 साल पुरे होने पर उनकि तसवीर छापी हे । यह सब कुछ केवल हिन्दुस्थान मे हि हो सकता हे । क्या आप कभी कल्पना कर सकते हे कि कभि वेटिकन या इटली कि सरकार हमारे किसी देवी देवता की या हमारे यहा पेदा हुए शुरविरो मे से किसि एक का भी चित्र अपने यहा के सरकारी नोट मे छापेगि । यह हमारे लिये बहुत ही शर्म कि बात हे उससे भि बडे शर्म कि बात तो यह हे कि हमारे यहा कि सरकार को इस बात का कोइ दुख नही हे।
अत: मे विवेक साखलाँ आप सभी हिन्दुस्थान के वासियो से प्रार्थना करता हु कि इस प्रकार कि षड्यंत्रकारि राष्ट्र विरोधि योजनाओ का विरोध पुरी ताकत से करे ।

बन्द करो भोपाल-भोपाल-भोपाल की चिल्लाचोट? कभी खुद के गिरेबान में झाँककर देखा है?…… Bhopal Gas Tragedy, Bhopal Judgement, Congress

“आज तक” पर देर रात एक बहस में देख रहा था कि किस तरह से गाँधी परिवार के “वफ़ादार” श्री आरके धवन, राजीव गाँधी का बचाव कर रहे थे। जैसे ही दिग्विजय सिंह ने केन्द्र का नाम लिया, मानो आग सी लग गई। कांग्रेसियों में होड़ लगने लगी कि, मैडम की नज़रों में चढ़ने के लिये कौन, कितना अधिक जोर से बोल सकता है। सत्यव्रत चतुर्वेदी आये और अर्जुन सिंह पर बरसे (क्योंकि उन्हें उनसे पुराना हिसाब-किताब चुकता करना है), वसन्त साठे (जो खुद केन्द्रीय मंत्री थे) ने भी अर्जुन सिंह पर सवाल उठाये, सारे चैनल और अधिकतर अखबार भी “बलिदानी परिवार” का नाम सीधे तौर पर लेने से बच रहे हैं, कि कहीं उधर से मिलने वाला “पैसा” बन्द हो जाये

कुछ टीवी चैनल और अखबार तो “पेशाब में आये झाग” की तरह एक दिन का उबाल खाने के बाद वापस कैटरीना-करीना-सलमान की खबरें, नरेन्द्र मोदी, विश्व कप फ़ुटबॉल दिखाने में व्यस्त हो गये हैं। तात्पर्य यही है कि जल्दी ही एक “बलि का बकरा” खोजा जायेगा, जो कि या तो अर्जुन सिंह होंगे अथवा उस समय का कोई तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री या गृह मंत्रालय का बड़ा अफ़सर (अधिक सुविधाजनक तो यही होगा कि, ऐसे आदमी का नाम सामने कर दिया जाये, जो मर चुका हो… लेकिन “त्यागमयी परिवार” के दुर्भाग्य से 25 साल बाद भी अधिकतर लोग जीवित ही हैं), प्रणब मुखर्जी भी अर्जुन के माथे ठीकरा फ़ोड़ने के मूड में हैं, उधर नरेन्द्र मोदी ने सोनिया गाँधी का नाम लिया तो मुँह में मिर्ची भरे जयन्ती नटराजन, आनन्द शर्मा, राजीव शुक्ला, मनीष तिवारी सहित सारे चमचे-काँटे-छुरी-कड़छे-कटोरी सब अपने खोल से बाहर आ गये। अब मंत्रियों का समूह गठित किया गया है जो ये पता लगायेगा कि असली दोषी कौन है? यानी कि कोशिश पूरी है कि देश के सबसे पवित्र, सबसे महान, सबसे त्यागवान, सबसे बलिदानी “परिवार” पर कोई आँच न आने पाये…

खैर कांग्रेस जो करना था कर चुकी, अब आगे जो करना है वही करेगी… उन्हें देखकर घिन आती हो तो आती रहे…।

अपन तो अब अपनी बात करें…

भोपाल का फ़ैसला वही आया जो कि कानून के मुताबिक अदालत के सामने रखा गया था, यह फ़ैसला आने के बाद से चारों तरफ़ भोपाल-भोपाल-भोपाल की रट लगी हुई है, लोगबाग धड़ाधड़ लेख लिख रहे हैं, सरकारों को कोस रहे हैं, व्यवस्था को गालियाँ दे रहे हैं… लेकिन खुद अपने भीतर झाँककर नहीं देखेंगे कि –

– हम खुद कितने भ्रष्ट हैं?

(सोचकर देखना आज तक कितनी रिश्वत ली है, या कितनी दी है?)

– हम खुद कितने अनुशासनहीन हैं?

(सोचना कि कितने बच्चे पैदा किये, कितने पेड़ काटे, कितनी बार ट्रेफ़िक नियम तोड़े, कितना पानी बेकार बहाया, कितनी नदियाँ प्रदूषित कीं… आदि)

– हम खुद कितने अनैतिक हैं?

(सोचना कि कितनी महिलाओं को बुरी नज़र से देखा, कितनी लड़कियों को गलत तरीके से अपने बस में करने की कोशिश की, कितनी बार लड़कियों को छेड़ा जाता देखकर, पतली गली से कट लिये…)

– हम खुद कितने नालायक हैं?

(सोचना कि औकात न होते हुए भी किस नौकरी पर काबिज हो, किस-किस का हक मारकर कौन सी कुर्सी पर कुण्डली मारे बैठे हो?)

– हम पढ़े-लिखे होने के बावजूद कितनी बार वोट देने गये हैं?

(सोचना कि कितनी बार ईमानदारी से वोटिंग लिस्ट में नाम जुड़वाया? संसद-विधानसभा-नगर निगम के चुनावों में कितनी बार वोट देने गये?)

– हम खुद कितनी बार किसी सामाजिक-राजनैतिक बहस या आन्दोलन में सक्रिय रहे या परदे के पीछे से समर्थन किया है?

(सोचना कि जब कोई राजनैतिक आंदोलन हो रहा था, तब कितनी बार बीवी की साड़ी के पीछे छिपे बैठे थे कि “मुझे क्या करना है?”)

– सारी जिन्दगी सिर्फ़ “हाय पैसा-हाय पैसा” करते-करते ही मर गये, अब व्यवस्था को दोष क्यों देते हो?

(सारे गलत-सलत धंधे करके ढेर सा पैसा कमा लिया, भर लिया अपने पिछवाड़े में, देश जाये भाड़ में… तो अब क्यों चिल्ला रहा है बे?)

– जिस “परिवार” और जिस पार्टी को सालोंसाल बगैर सोचे-समझे वोट देते आये हो, तो अब उसे भुगतने में नानी क्यों मर रही है?

(सोचना कि किस तरह से “परिवार” की चमचागिरी करके, तेल लगा-लगा कर अपनी पसन्द के काम करवा लिये, ट्रांसफ़र रुकवा लिये, ठेके हथिया लिये?)

देश के नागरिकों का “चरित्र” ऐसे ही तैयार नहीं होता, इसके लिये देशभक्ति और राष्ट्रवाद की लौ दिल में होना चाहिये…। जो पाखण्डी भीड़ कंधार विमान अपहरण के समय वाजपेयी के घर के सामने छाती पीट-पीटकर “आतंकवादियों को छोड़ दो, हमारे परिजन हमें लौटा दो…” की रुदालियाँ गा रही थी… वही देश का असली चेहरा है…नपुंसक और डरपोक।  कोई अफ़सर या नेता हमें झुकने के लिये कहता है तो हम लेट जाते हैं

– आज कई खोजी पत्रकार घूम रहे हैं, सब उस समय कहाँ मर गये थे, जब केस को कमजोर किया जा रहा था? क्या पूरे 25 साल में कभी भी अर्जुनसिंह या राजीव गाँधी से कभी पूछा, कि एण्डरसन देश से बाहर निकला कैसे?

– जो कलेक्टर और एसपी आज टीवी पर बाईट्स दे रहे हैं, उस समय शर्म के मारे मर क्यों नहीं गये थे या नौकरी क्यों नहीं छोड़ गये?

– पीसी अलेक्जेण्डर आज बुढ़ापे में बयान दाग रहे हैं, 25 साल पहले मीडिया में यह बताने क्यों नहीं आये? क्यों कुर्सी से चिपके रहे?

– मोईली न्याय व्यवस्था को दोष दे रहे हैं… कानून मंत्री बनकर कौन से झण्डे गाड़े हैं, ये तो बतायें जरा?

इसलिये बन्द करो ये भोपाल-भोपाल-भोपाल की नौटंकी… कुल मिलाकर यह है कि, हम सभी ढोंगी हैं, पाखण्डी हैं, कामचोर हैं, निकम्मे हैं, स्वार्थी हैं, निठल्ले हैं, हरामखोर हैं, भ्रष्ट हैं, नीच हैं, कमीने हैं… और भी बहुत कुछ हैं… लेकिन फ़िर भी भोपाल-भोपाल चिल्ला रहे हैं…। हम पर राज करने वाली “महारानी” और “भोंदू युवराज” अपने महल में आराम फ़रमा रहे हैं, उनकी तरफ़ से कोई बयान नहीं, कोई चिन्ता नहीं… क्योंकि उनके महल के बाहर उनके कई “वफ़ादार कुत्ते” खुलेआम घूम रहे हैं…। कोई ये बताने को तैयार नहीं है कि यदि अर्जुन सिंह ने एण्डरसन को भोपाल से दिल्ली पहुँचाया, लेकिन दिल्ली से अमेरिका किसने पहुँचाया?

वारेन एण्डरसन तो विदेशी था, कितने पाठकों को विश्वास है कि यदि मुकेश अम्बानी की किसी भारतीय कम्पनी में ऐसा ही हादसा हो जाये तो हम उसका भी कुछ बिगाड़ पायेंगे…? जब ऊपर से नीचे तक सब कुछ सड़ चुका हो, हर व्यक्ति सिर्फ़ पैसों के पीछे भाग रहा हो, राष्ट्र और राष्ट्रवाद नाम की चीज़ सिर्फ़ जुगाली करने के लिये बची हों, तब और क्या होगा…। “कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए एण्डरसन को भगाया गया…” इतना बकवास और घटिया बयान देने में प्रणब मुखर्जी साहब को बुढ़ापे में भी शर्म नहीं आ रही, और ये स्वाभाविक भी है, क्योंकि कानून-व्यवस्था की स्थिति न बिगड़ने पाये, शायद इसीलिये तो अफ़ज़ल को जिन्दा रखा है अब तक…।

जनता के लिये संदेश साफ़ है – अगर “एकजुट, समझदार, देशभक्त और ईमानदार” नहीं हो, तब तो जूते खाने लायक ही हो…। किसी जमाने में मुगलों ने मारे, फ़िर अंग्रेजों ने मारे और अब 60 साल से एक “परिवार” मार रहा है, क्या उखाड़ लोगे… बताओ तो जरा? पहले खुद तो सुधरो, फ़िर बोलना…। सच तो यही है कि, हम लोगों के सिर पर एक “हिटलर” ही चाहिये, जो शीशम की छड़ी लेकर सोते-जागते-उठते-बैठते “पिछवाड़ा” गरम करता रहे… तभी सुधरेंगे हम…… लोकतन्त्र वगैरह की औकात ही नहीं है हमारी… 
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अपने मित्रों को इस लेख की लिंक भेजें…क्योंकि हम “चाबुक” खाने और बावजूद उसके न जागने के आदी हो चुके हैं… फ़िर भी एक चाबुक लगाने में कोई हर्ज नहीं है…

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>क्या पीड़ितों को न्याय मिलेगा

>भोपाल को लेकर कांग्रेस में घमासान मचा हुआ है। पच्चीस साल बाद एक निर्णय आने के बाद दोषी कौन की तर्ज पर बयानों का ढेर लग गया है। पच्चीस वर्षों से खामोश बैठे कई तथाकथित ईमानदार अधिकारियों में भी सहसा साहस का संचार हो गया। शायद सेवा निवृत्ति के बाद अब उन्हें किसी का डर नहीं रहा इसलिए अपने पुराने आकाओं के आदेश उन्हें याद आने लगे हैं। आज हर कोई एंडरसन को भारत से भगाने की सुनियोजित साजिश का सत्य देश के सामने रखने को उत्सुक नजर आ रहा है। कुछ पत्रकारों ने मिसेज एंडरसन को भी खोज निकाला है और उनसे भोपाल त्रासदी का हिसाब मांग रहे हैं।

लेकिन पच्चीस साल से ये लोग कहां थे। चंद लोगों को छोड़ कर किसी को भोपाल के लोगों की याद नहीं आई, बस उसके बारे में कतरनों में खबरें छपती रही और हम उन्हें पढ़कर रद्दी के ढेर में डालते रहे। आज एक निर्णय आता है दो साल की कैद और दो लाख का जुर्माना, फिर 25000 के मुचलके में रिहाई और देश में तूफान मच जाता है। फिर शुरू होता है भोपाल त्रासदी से संबंधित खबरों के आने का सिलसिला। एक के बाद एक सनसनीखेज खबरें। लगता ही नहीं कि आ रही खबरें इसी देश की है और पच्चीस साल से हम इन खबरों से महरूम थे। कोई भी न्यूज चैनल लगाइए भोपाल की खबर दे रहा है। कोई वारेन एंडरसन के आधे-अधूरे मुचलके की कापी दिखा रहा है…कोई बता रहा है कि वो धारा 304 में बुक था इसलिए उसे सेशन कोर्ट से ही जमानत मिल सकती थी। अर्जुनसिंह ने पैसा खाकर उन्हें अपने विशेष विमान से दिल्ली पहुँचा दिया ताकि वे आराम से भोपाल के झंझट से मुक्त होकर अमेरिका जा सकें। कलतक सभी कांग्रेसी एंडरसन के देश से भागने के मामले में अर्जुन सिंह पर अपना ठीकरा फोड़ रहे थे। तभी सीआईए की एक रिपोर्ट आ गई जिसके अनुसार राजीव गांधी ने एंडरसन को इसलिए देश से सुरक्षित निकलने दिया ताकि देश के औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए आने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आने में कोई बाधा न आए। इस खुलासे के बाद पूरी कांग्रेस पार्टी राजीव गांधी के बचाव में खड़ी हो गई सभी कह रहे हैं यह सही नहीं है!!! तो फिर सच क्या है? अर्जुनसिंह तो खामोश हैं, वे कुछ बोले तो शायद कुछ नए सच सामने आएं। बेटी कह रही है सही समय आने पर बोलेंगे, वो सही समय कब आएगा भगवान जाने या अर्जुनसिंह जाने।

पूरी स्थिति इतनी उलझी हुई है कि कुछ समझ नहीं आ रहा कि सच क्या है झूठ क्या। सहसा विपक्ष भी कांग्रेस पर हमला करने के लिए अपने अपने दड़बों से निकल आया है, अब इन नेताओं पर कौन और कैसे विश्वास करे क्योंकि पच्चीस साल तक छोटी-छोटी बात के लिए संसद में हंगामा करने वाले ये नेता इतने साल तक चुप क्यों रहे? क्या मजबूरी थी इनकी? कोई नहीं जानता। कांग्रेसी नेता सत्यव्रत का ये कहना और भी हास्यास्पद है कि यह राज्य का मामला था, पच्चीस हजार मौतें, छह लाख प्रभावित और मामला राज्य का, निर्णय राज्य के, केंद्र की कोई भूमिका ही नहीं। गोया भोपाल भारत का नहीं किसी और देश का हिस्सा हो, जहां पर हुई त्रासदी पर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर सब खामोश हो गए या अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लग गए?

जिस तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत आ रही है और केंद्र सरकार अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि दुर्घटना होने की स्थिति में उत्तरदायित्व किस पर आएगा। उल्टे समाचार तो ये आ रहे हैं कि यूनियन कार्बाइड के प्लांट को खरीदने वाले Dow Chemicals के अध्यक्ष को इस सरकार ने 2006 में ही यह आश्वासन दे दिया था कि भोपाल दुर्घटना के लिए उनकी कोई liability नहीं होगी। यहां तक की वो गैस लीक होने वाले स्थल पर फैले कचरे को साफ करने के लिए आवश्यक रु.100 करोड़ तक देने को भी राजी नहीं है। और इस विषय पर पक्ष-विपक्ष एक है। भाजपा के अरुण जेटली इस कंपनी के वकील हैं और भाजपा के रविशंकर उनका बचाव कर रहे हैं कि वे जो कुछ कर रहे हैं वो सही है राजनीति और व्यवसाय को जोड़ा नहीं जा सकता। यही बात सलमान खुर्शीद भी कह रहे है, मतलब इस मुद्दे पर नेताओं में मतभेद नहीं है।

आज सीबीआई अपनी गलती मान रही है कि इस केस में उससे गलती हुई और वो इसे सुधारेगी, पर विडम्बना देखिए कि सुप्रीम कोर्ट के जिस चीफ जस्टिस अहमदी ने यूनियन कार्बाइड पर गैर इरादतन हत्या के आरोप को हटा कर क्रिमिनल नेगलिजेन्स का आरोप कर दिया था जिसके तहत अधिकतम दो वर्ष की सजा ही हो सकती थी, आज यूनियन कार्बाइड द्वारा मिले फंड से बने भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट के प्रमुख हैं। क्या यह मात्र संयोग है या सोची-समझी नीति!!!!

हमारे देश के नेताओं ने भोपाल पीड़ितों के पक्ष में कभी आवाज नहीं उठाई, उल्टे मुआवजे को कम करते हुए कोर्ट के बाहर ही समझौता कर लिया और दुर्भाग्यपूर्ण बात तो ये हैं कि ये पैसा अभी तक पीड़ितों को नहीं मिल पाया है, एक बड़ी राशि अभी तक बैक में पड़ी है। जितनी दोषी यूनियन कार्बाइड है उससे ज्यादा दोषी कांग्रेस है जिसने पूरे मामले कमजोर बनाने अपनी कोशिश लगा दी।

भारत एक राजनीति प्रधान देश है। यहां हर चीज में राजनीति होती है। नेताओं में दृढ़ता का नितांत अभाव है। वे सुपर पावर बनने ख्वाब तो देखते हैं, पर दृढता से अपनी बात कहना नहीं जानते और कही अमेरिका जैसा देश इनके सामने हो तो इनकी तो बोलती ही बंद हो जाती है। ये घरेलू जोड़-तोड़ की कला में तो माहिर हैं, पर ओबामा की तरह कड़क कर अपने नागरिकों के पक्ष में बात नहीं कर सकते। ये नहीं कह सकते कि पांच सौ डॉलर की राशि गैस पीड़ितों के लिए कम है, हमें यूनियन कार्बाइड से उचित मुआवजा मिलना चाहिए।

इस केस में किसी एक व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हमारा सिस्टम ही दोषपूर्ण है। जिसे प्रत्येक राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए तोड़ता मरोड़ता है। जरूरत सिस्टम बदलने की है। किसी की मौत की कीमत अदा नहीं की जा सकती, पर उसके परिवार को भविष्य का सहारा तो दिया ही जा सकता है। कहां है वो नैतिकता, भारतीय संस्कृति जिसकी हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। ये कैसी संस्कृति है जिसमें सब कुछ होता है, बस पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता।

प्रतिभा.

>कवीन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर की एक रचना का भावानुवाद: —संजीव ‘सलिल’

>कवीन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर की एक रचना का भावानुवाद:
संजीव ‘सलिल’
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रुद्ध अगर पाओ कभी, प्रभु! तोड़ो हृद -द्वार.
कभी लौटना तुम नहीं, विनय करो स्वीकार..
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मन-वीणा-झंकार में, अगर न हो तव नाम.
कभी लौटना हरि! नहीं, लेना वीणा थाम..
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सुन न सकूँ आवाज़ तव, गर मैं निद्रा-ग्रस्त.
कभी लौटना प्रभु! नहीं, रहे शीश पर हस्त..
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हृद-आसन पर गर मिले, अन्य कभी आसीन.
कभी लौटना प्रिय! नहीं, करना निज-आधीन..

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

>क्या ये जनद्रोही नहीं हैं ??????????

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सभी चित्र दैनिक भास्कर से साभार

घड़ियाली आँसू

कौन लेकर रहेगा इंसाफ ?26 साल पहले ये सब कहाँ थे जब भोपाल के चंद कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, समाजसेवियों ने गैस पीड़ितों के कंधे से कंधा मिलाकर उनके लिए संघर्ष किया, पुलिस प्रशासन का अत्याचार सहा, लाठियाँ खाई, जेल तक गए। तब ये सारे घड़ियाली आँसू बहाने वाले लोग कहाँ थे ?
मध्यप्रदेश की सत्ताधारी पार्टी और उसके सांसद विधायक तत्कालीन कांग्रसी नेताओं को कटघरे में खड़ा कर उनके मज़े ले रहे हैं। सच्चाई यह है कि उनके दामन भी उतने ही दागदार हैं जितने कांग्रसियों के। इन 26 सालों में केन्द्र में और मध्यप्रदेश में भी भाजपा की सरकार लम्बे समय तक रहीं, उन्होंने इस मुदृदे पर क्या किया यह भी जगजाहिर है।  हर बार चुनाव आने पर उन्होंने पूरे भोपाल को मुवावज़ा बटवाने का सपना दिखाकर वोट हासिल किए।
अब जब कि सारी बातों का खुलासा हो गया है क्या शिवराज सरकार में नैतिक साहस है कि वे सरकारी मशीनरी के उन तमाम  अफसरों और राजनीतिज्ञो के ऊपर शिकंजा कसे जिन्होने भोपाल की जनता के साध विश्वासघात किया ?
 
 और भी ना जाने कौन कौन ? 

क्या ये जनद्रोही नहीं हैं ??????????
इन सब को सज़ा कौन देगा ???

>ये हैं नाइन्साफी के जवाबदेह

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भोपाल के गैस पीड़ितों ने उनके साथ हुई नाइन्साफी के लिए इन लोगों को जिम्मेदार ठहराया है
(फोटो दैनिक भास्कर से साभार)
क्या क्या हुआः-
-घनी आबादी के बीच में अमानक स्तर का कारखाना चलाने देने, और खतरनाक, पाबंदी वाले उत्पादनों का कारोबार बेराकटोक चलते रहने देने के लिए आज तक किसी को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास राज्य और केन्द्र सरकार की तरफ से नहीं हुआ।जबकि इस मामले में दोषी औ?ोगिक इन्सपेक्टर से लेकर तत्काली मुख्यमंत्री तक सबको कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।
-हादसे के बाद गैस पीड़ितों की किसी भी प्रकार की कानूनी लड़ाई को लड़ने का अधिकार अपने हाथ में लेकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने गैस पीड़ितों के हाथ काट दिए।

– गैस त्रासदी  की विभिषिका को वास्तविकता से बेहद कम आंका जाकर अदालत के सामने प्रस्तुत किया गया।ताकि यूनीयन कार्बाइड सस्ते में छूटे।

-मरने वालों और प्रभावितों की संख्या को काफी कम दिखाया गया।ताकि यूनीयन कार्बाइड को कम से कम आर्थिक नुकसान हो।

-गैस के ज़रिए फैले ज़हर के बारे में जानकारियाँ छुपा कर रखी गई, कारण गैसपीड़ितों के शरीर पर पडने वाले दूरगामी परिणामों संबंधी समस्त शोधों को छुपाकर रखा गया ताकि यूनीयन कार्बाइड को लाभ पहुँचे।

-हादसे के बाद दोषियों को बचाने की भरपूर कोशिश की गई।जिसमें एंडरसन को बचाने का अपराध तो जगजाहिर हो गया है।
भोपाल की आम जनता को मुआवज़ा और राहत के जंजाल में फंसाकर वास्तविक समस्याओं से उनका ध्यान हटाया गया और इसमें दलाल किस्म के संगठनों ने विदेशी पैसों के दम पर अपनी  भूमिका निभाई।
-अब भी जब बेहद कम सज़ा पाने के कारण देश-दुनिया में नाराज़गी है चारों ओर घड़ियाली आँसू बहाए जा रहे है, समितियाँ बन रहीं है।इसमें मीड़िया और प्रेस भी शामिल है जिसने 26 सालों तक इस मामलें को जनता की स्मृति से धोने का काम किया।
-आगे और लम्बे समय तक एक और मुकदमें में मामले को ले जाने के कोशिशें हो रहीं हैं, ताकि तब तक तमाम दोषी मर-खप जाएँ और मामला शांत हो जाए।
यह सब कुछ नहीं होता अगर गैस पीड़ितों को एक सशक्त आंदोलन अस्तित्व में होता। भोपाल की गैस पीड़ित आम जनता को यदि सही तरह से संगठित किया जाता तो ना गैस पीड़ितों में दलाल संगठन पनप पाते, ना राजनैतिक दलों द्वारा मामले को दबाने के प्रयास हो पाते, ना सरकारी मशीनरी को मनमानी करने की छूट मिल पाती और ना ही शासन-प्रशासन के स्तर पर देशदोह श्रेणी का अपराध करने की हिम्मत होती।

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