>दो अति-महत्वपूर्ण सूचनाएं ब्लॉग संसद के सभी सदस्यों के लिए

>

 1.
शाहनवाज़ भाई ,सतीश सक्सेना जी और सुज्ञ जी ने अनुरोध किया है की इस ब्लॉग संसद पर बेनामी यानी की anonymous के रूप में कमेन्ट करने का आप्शन बंद किया जाए और उन्होंने इसकी पुख्ता वजहें भी दी हैं इस पोस्ट पर
http://blog-parliament.blogspot.com/2010/07/blog-post_31.html

मैंने खुद भी काफी समय से विभिन्न ब्लोग्स पर इन बेनामियों के कमेंट्स को observe किया है और उनमें से अधिकाँश को गाली-गलौच और अपशब्दों का प्रयोग  करते हुए ही पाया है ,सच में ये लोग सांप्रदायिक सौहार्द और अन्य सौहार्दपूर्ण वातवरण को बिगाड़ने का प्रयास करते हैं और सभ्य लोगों के लिए फिर उस ब्लॉग पर मौजूद रहना मुश्किल हो जाता है ,इनमें से ज़्यादातर का मुख्य मकसद पोस्ट की महत्वपूर्ण बातों की ओर से पाठकों का ध्यान हटाने और उसे गलत दिशा की ओर ले जाने में होता है और कई बार तो ऐसा देखा गया है की ये अपनी हरकतों में कामयाब भी हो जाते हैं
इसलिए अब से इस ब्लॉग पर बेनामी यानी anonymous के रूप में कमेंट्स करने का आप्शन बंद किया जाता है जिसे जो भी कहना है ,अगर उसे लगता है की वो सही है तो वो सामने आकर कहे लेकिन हाँ जैसा की सत्य गौतम वाले प्रकरण के दौरान में आप सबसे पहले ही वादा कर चूका हूँ की जातिवाद या मजहबवाद का ज़हर फैलाने के किसी भी प्रयास को कम से कम मैं इस ब्लॉग पर तो सफल नहीं होने दूंगा ,साथ ही मेरी ये भी कोशिश रहेगी की गाली या अपशब्द वाले कमेंट्स भी हम सबके  इस ब्लॉग संसद पर ना रह पाएं

2.
अब एक और महत्वपूर्ण बात है जिसकी ओर मैं आप सबका ध्यान चाहूँगा , इस ब्लॉग संसद का निर्माण हमारे देश की समस्याओं और महत्वपूर्ण मुद्दों का समाधान ढूँढने के लिए किया गया था ना की इस प्रकार की पोस्ट्स के लिए
http://blog-parliament.blogspot.com/2010/07/blog-post_24.html
http://blog-parliament.blogspot.com/2010/07/blog-post_9440.html

बताइये इस तरह की पोस्ट भी डाली गयी हैं यहाँ जबकि इनसे एक बहुत बेहतर पोस्ट एक महत्वपूर्ण समस्या की और ध्यान आकर्षित करती हुई जो की इस ब्लॉग पर राजेन्द्र जी ने सबसे पहले डाली थी, उसे मैंने डिलीट करवा दिया था राजेन्द्र जी के ही द्वारा सिर्फ इसलिए की उसमें उन्होंने उस समस्या का हल नहीं डाला था ( राजेन्द्र जी मुझे उसका अब भी अफसोस है )

देखिये ,please एक बात समझने की कोशिश कीजिये की इस तरह की पोस्ट्स हम सब अपने-२ ब्लोग्स पर डाल सकते हैं और डालते भी हैं लेकिन यहाँ पर पोस्ट के रूप में सवाल करना, समस्या डालना और उसकी आलोचना करने भर से हमारा काम पूरा नहीं हो जाता है ,हमें उसका एक ठोस हल भी प्रस्तुत करना है जिस पर की सदस्यों द्वारा बहस और मतदान किया जा सके और फिर उसे इस ब्लॉग संसद के द्वारा majority opinion के रूप में स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जा सके, अब तक ऐसा सिर्फ एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया है जो की उपरोक्त मापदंडो पर खरा उतरता है और वो प्रस्ताव था सुज्ञ जी का ,एक प्रस्ताव राजेन्द्र जी ने भी बाद में डाला था लेकिन वो थोड़ा incomplete form में था जिसे की complete form में जल्द ही आप सबके समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा
http://blog-parliament.blogspot.com/2010/07/blog-post_19.html
http://blog-parliament.blogspot.com/2010/07/blog-post_8039.html

मैं आप सबको ऐसी पोस्ट्स डालने से मना नहीं कर रहा हूँ जैसी की जय कुमार झा जी ने एक ईमानदार व्यक्ति ब्रह्मपाल जी और उनकी सहायता सम्बन्धी एक पोस्ट डाली थी या फिर शंकर फुलारा जी ने ब्लॉग संसद के उपर एक कविता प्रस्तुत की थी या फिर शाहनवाज़ भाई ने सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने के मकसद से अभी एक पोस्ट डाली ,
http://blog-parliament.blogspot.com/2010/07/blog-post_5207.html
http://blog-parliament.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html
http://blog-parliament.blogspot.com/2010/07/blog-post_31.html

इस तरह की पोस्ट्स का इस ब्लॉग पर हमेशा स्वागत है लेकिन जिन पोस्ट्स का जिक्र मैंने पहले किया है उस प्रकार की पोस्ट्स कृपया यहाँ ना डाली जाएँ


 

आशा है आप सब इस बात को समझेंगे और सहयोग करेंगे

धन्यवाद

महक

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>ओपन पत्रिका: क्यूँ ना ज्ञान का प्रकाश फैलाएं ?

>एक ग़ज़ल : चलो छोड़ देंगे ….

>एक ग़ज़ल : चलो छोड़ देंगे……

चलो छोड़ देंगे क़राबत की बातें
मगर कैसे छूटेंगी उल्फ़त की बातें ?

ये तर्क-ए-मुहब्बत की बातें ,ख़ुदाया !
क़यामत से पहले क़यामत की बातें

कहाँ ज़िन्दगानी में मिलता है कोई
जो करता हो दिल से रफ़ाक़त की बातें

कभी आस्माँ से उतर आइए तो
करेंगे ज़मीनी हक़ीक़त की बातें

जिसे गुफ़्तगू का सलीक़ा नहीं है
वो ही कर रहा है ज़हानत की बातें

अजी !छोड़िए भी यह शिकवा शिकायत
कहीं बैठ करते है राहत की बातें

अरे! रिन्द “आनन” को क्या हो गया है!
कि ज़ाहिद से करता है जन्नत की बातें

-आनन्द
क़्रराबत =समीपता ,साथ-साथ उठना बैठना
तर्क-ए-मुहब्बत = मुहब्बत छोड़ना
रफ़ाकत =दोस्ती
रिन्द =मद्दप/शराबी

लोकतन्त्र खतरे में??? – वोटिंग मशीन, उसकी वैधता और हैकिंग से सम्बन्धित शानदार पुस्तक… EVM Hacking, Elections in India, Indian Democracy

गत लोकसभा चुनावों के बाद से ही कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी राजनैतिक दलों के मन में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों को लेकर एक संशय है। इस विषय पर काफ़ी कुछ लिखा भी जा चुका है और विद्वानों और सॉफ़्टवेयर इंजीनियरों ने समय-समय पर विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के मॉडलों पर प्रयोग करके यह साबित किया है कि वोटिंग मशीनों को आसानी से “हैक” किया जा सकता है, अर्थात इनके परिणामों से छेड़छाड़ और इनमें बदलाव किया जा सकता है (अब चुनाव आयोग भी मान गया है कि छेड़छाड़ सम्भव है)। आम जनता को इन मशीनों के बारे में, इनके उपयोग के बारे में, इनमें निहित खतरों के बारे में अधिक जानकारी नहीं है, इसलिये हाल ही में प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक, शोधक और राजनैतिक लेखक श्री जीवीएल नरसिम्हाराव ने इस बारे में विस्तार से एक पुस्तक लिखी है… “डेमोक्रेसी एट रिस्क…”। इस पुस्तक की प्रस्तावना श्री लालकृष्ण आडवाणी और चन्द्रबाबू नायडू ने लिखी है, तथा दूसरी प्रस्तावना स्टेनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डेविड डिल द्वारा लिखी गई है।

इस पुस्तक में 16 छोटे-छोटे अध्याय हैं जिसमें भारतीय इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के बारे में जानकारी दी गई है। शुरुआत में बताया गया है कि किस तरह इन मशीनों को अमेरिका और जर्मनी जैसे विकसित देशों में उपयोग में लाया गया, लेकिन लगातार आलोचनाओं और न्यूनतम सुरक्षा मानकों पर खरी न उतरने की वजह से उन्हें काबिल नहीं समझा गया। कई चुनावी विवादों में इन मशीनों की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठे, और अन्ततः लम्बी बहस के बाद अमेरिका, जर्मनी, हॉलैण्ड, आयरलैण्ड आदि देशों में यह तय किया गया कि प्रत्येक मतदाता द्वारा दिये गये वोट का भौतिक सत्यापन होना जरूरी है, इलेक्ट्रॉनिक सत्यापन भरोसेमन्द नहीं है। अमेरिका के 50 में से 32 राज्यों ने पुनः कागजी मतपत्र की व्यवस्था से ही चुनाव करवाना शुरु कर दिया।

इस विषय पर मैंने मई 2009 में ही दो विस्तृत पोस्ट लिखीं थी, जिन्हें यहाँ क्लिक करके… और यहाँ क्लिक करके… http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/06/evm-rigging-elections-and-voting-fraud.html पढ़ा जा सकता है, जिसमें EVM से छेड़खानी के बारे में विस्तार से बताया था…।

जबकि इधर भारत में, चुनाव आयोग सतत इस बात का प्रचार करता रहा कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें पूर्णतः सुरक्षित और पारदर्शी हैं तथा इनमें कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। कई पाठकों को यह पता नहीं होगा कि वोटिंग मशीनों की निर्माता कम्पनियों BEL (भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड) और ECIL (इलेक्ट्रॉनिक्स कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड) ने EVM के माइक्रोचिप में किये जाने वाले सीक्रेट सोर्स कोड (Secret Source Code) का काम विदेशी कम्पनियों को आउटसोर्स किया। लेखक ने सवाल उठाया है कि जब हमारे देश में ही योग्य और प्रतिभावान सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं तो यह महत्वपूर्ण काम आउटसोर्स क्यों किया गया?

सूचना के अधिकार के तहत श्री वीवी राव को सरकार द्वारा दी गई जानकारी के पृष्ठ क्रमांक 33 के अनुसार “देश की 13.78 लाख वोटिंग मशीनों में से 9.30 मशीनें पुरानी हैं, जबकि 4.48 लाख मशीनें नई हैं। पुरानी मशीनों में हेराफ़ेरी की अधिक सम्भावनाओं को देखते हुए याचिकाकर्ता ने जानना चाहा कि इन मशीनों को किन-किन राज्यों की कौन-कौन सी लोकसभा सीटों पर उपयोग किया गया, लेकिन आज तक उन्हें इसका जवाब नहीं मिला। यहाँ तक कि चुनाव आयोग ने उन्हीं के द्वारा गठित समिति की सिफ़ारिशों को दरकिनार करते हुए लोकसभा चुनावों में इन मशीनों को उपयोग करने का फ़ैसला कर लिया। जब 16 मई 2009 को लोकसभा के नतीजे आये तो सभी विपक्षी राजनैतिक दल स्तब्ध रह गये थे और उसी समय से इन मशीनों पर प्रश्न चिन्ह लगने शुरु हो गये थे।

पुस्तक के अध्याय 4 में लेखक ने EVM की कई असामान्य गतिविधियों के बारे में बताया है। अध्याय 5 में बताया गया है कि कुछ राजनैतिक पार्टियों से “इलेक्ट्रॉनिक फ़िक्सरों” ने उनके पक्ष में फ़िक्सिंग हेतु भारी राशि की माँग की। बाद में लेखक ने विभिन्न उदाहरण देकर बताया है कि किस तरह चुनाव आयोग ने भारतीय आईटी विशेषज्ञों द्वारा मशीनों में हेराफ़ेरी सिद्ध करने के लिये किये जाने वाले प्रयोगों में अडंगे लगाने की कोशिशें की। इन मशीनों की वैधता, पारदर्शिता और भारतीय परिवेश और “भारतीय चुनावी वातावरण” में उपयोग को लेकर मामला न्यायालय में चल रहा है। पाठकों की जानकारी के लिये उन्हें इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिये, यह पुस्तक अपने-आप में इकलौती है, क्योंकि ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर सारी सामग्री एक साथ एक ही जगह पढ़ने को मिलती है। पुस्तक के प्रिण्ट फ़ॉर्मेट को मंगवाने के लिये निम्न पते पर सम्पर्क करें…

Veta Books,
B4/137,Safdarjung Enclave,
New Delhi 110 029
India
Email: veta@indianevm.com
Phone: +91 91 9873300800 (Sagar Baria)
Price: Rs. 295 -/-

जबकि इस पुस्तक को सीधे मुफ़्त में http://indianevm.com से डाउनलोड किया जा सकता है…(सिर्फ़ 1.38 MB)। इसी वेबसाइट पर आपको EVM से सम्बन्धित सभी आँकड़े, तथ्य और नेताओं और विशेषज्ञों के बयान आदि पढ़ने को मिल जायेंगे।

कांग्रेस समर्थकों, भाजपा विरोधियों और तटस्थों सभी से अपील है कि इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें, ताकि दिमाग के जाले साफ़ हो सकें, और साथ ही इन प्रश्नों के उत्तर अवश्य खोजकर रखियेगा –

1) इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में वोट देने के बाद क्या आप दावे से कह सकते हैं कि आपका वोट उसी पार्टी के खाते में गया जिसे आपने वोट दिया था? यदि आपको विश्वास है, तो इसका सबूत क्या है?

2) कागजी मतपत्र पर तो आप अपने हाथ से अपनी आँखों के सामने मतपत्र पर सील लगाते हैं, जबकि EVM में क्या सिर्फ़ पंजे या कमल पर बटन दबाने और “पीं” की आवाज़ से ही आपने कैसे मान लिया कि आपका वोट दिया जा चुका है? जबकि हैकर्स इस बात को सिद्ध कर चुके हैं कि मशीन को इस प्रकार प्रोग्राम किया जा सकता है, कि “हर तीसरा या चौथा वोट” “किसी एक खास पार्टी” के खाते में ही जाये, ताकि कोई गड़बड़ी का आरोप भी न लगा सके।

3) वोट देने के सिर्फ़ 1-2 माह बाद यदि किसी कारणवश यह पता करना हो कि किस मतदाता ने किस पार्टी को वोट दिया था, तो यह कैसे होगा? जबकि आपके वोट का कोई प्रिण्ट रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है।

4) अमेरिका, जर्मनी, हॉलैण्ड जैसे तकनीकी रुप से समृद्ध और विकसित देश इन मशीनों को चुनाव सिस्टम से बाहर क्यों कर चुके हैं?

अतः अब समय आ गया है कि इन मशीनों के उपयोग पर पुनर्विचार किया जाये तथा 2009 के लोकसभा चुनावों को तत्काल प्रभाव से दोबारा करवाया जाये…

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>संस्कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या – षष्‍ठअध्‍याय:

>

प्रिय बन्धु

संस्‍कृतप्रशिक्षण कक्ष्‍या का षष्‍ठ अभ्‍यास प्रस्‍तुत कर रहा हूँ ।

संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या -षष्‍ठ अभ्‍यास:

आप लोगों को ये बता देना जरूरी समझता हूँ कि पॉंचवें अभ्‍यास से अब जो पाठ्यक्रम मैने प्रारम्‍भ किया है इसपर आपलोग पूरा ध्‍यान केन्द्रित करें व इसका ठीक से अभ्‍यास करें । यह पाठ्यक्रम मैने बहुत मेहनत से बनाया है और मेरा दावा है, पाँचवें अभ्‍यास से अगले 10 अभ्‍यास तक के पाठ्यक्रम का ठीक से अध्‍ययन करने पर आप अच्‍छी संस्‍कृत लिखना, व बोलना शुरू कर देंगे ।

धन्‍यवाद

भवदीय: – आनन्‍द:

>मुक्तिका: जब दिल में अँधेरा हो… संजीव ‘सलिल’

>मुक्तिका:

जब दिल में अँधेरा हो…

संजीव  ‘सलिल’
*

*

जब दिल में अँधेरा हो, क्या होगा मशालों से
मिलते हों गले काँटे, जब पाँव के छालों से?

चाबी की करे चिंता, कोई क्यों बताओ तो?
हों हाथ मिलाये जब, चोरों ने ही तालों से..

कुर्सी पे मैं बैठूँगा, बीबी को बिठाऊँगा.
फिर राज चलाऊँगा, साली से औ’ सालों से..
 
इतिहास भी लिक्खेगा, ‘मुझसा नहीं दूजा है,
है काबलियत मेरी, घपलों में-घुटालों में..

सडकों पे तुम्हें गड्ढे, दिखते तो दोष किसका?
चिकनी मुझे लगती हैं, हेमा जी के गालों से..

नंगों की तुम्हें चिंता, मुझको है फ़िक्र खुद की.
लज्जा को ढाँक दूँगा, बातों के दुशालों से..

क्यों तुमको खलिश होती, है कल की कहो चिंता.
सौदा है ‘सलिल’ का जब सूरज से उजालों से..

**********************************************

   

ट्रेजरी मुद्दे पर मीडिया का दोगलापन और नीतीश की चुस्त कार्यप्रणाली… … Bihar Assembly Lalu Yadav and Congress

कुछ दिनों पहले बिहार की विधानसभा में जो कुछ हुआ उसने लोकतन्त्र को शर्मिन्दा तो किया ही है, लेकिन लोकतन्त्र भी अब ऐसी शर्मिन्दगी बार-बार झेलने को अभिशप्त है, और हम सब इसके आदी हो चुके हैं। बिहार विधानसभा में लालूप्रसाद और कांग्रेस ने जो हंगामा और तोड़फ़ोड़ की उसके पीछे कारण यह दिया गया कि महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि सन् 2002 से 2007 के बीच शासकीय कोषालय से करोड़ों रुपये निकाले गये और उनका बिल प्रस्तुत नहीं किया गया।

सिर पर खड़े आगामी विधानसभा चुनावों में मुद्दों के लिए तरस रहे लालू और कांग्रेस को इसमें “भ्रष्टाचार” की बू आ गई और उन्होंने बिना सोचे-समझे और मामले की तह में गये बिना हंगामा मचा दिया। बिहार विधानसभा के चुनावों में नीतीश अपनी साफ़-सुथरी छवि और बिहार में किये गये अपने काम के सहारे जाना चाहते हैं, जो लालू को कैसे सहन हो सकता है? और कांग्रेस, जो कि बिहार में कहीं गिनती में ही नहीं है वह भी ऐसे कूदने लगी, जैसे नीतीश के खिलाफ़ उसे कोई बड़ा मुद्दा हाथ लग गया हो और विधानसभा चुनाव में वे राहुल बाबा की मदद से कोई तीर मार लेंगे। विधानसभा में मेजें उलटी गईं, माइक तोड़े गये, गालीगलौज-मारपीट हुई, एक “वीरांगना” ने बाहर आकर गमले उठा-उठाकर पटके… यानी कुल मिलाकर जोरदार नाटक-नौटंकी की गई। मीडिया तो नीतीश और भाजपा के खिलाफ़ मौका ढूंढ ही रहा था, सारे चैनलों ने इस मामले को ऐसे दिखाया मानो यह करोड़ों का घोटाला हो। मीडिया के प्यारे-दुलारे लालू के “जोकरनुमा” बयान लिये गये, मनीष तिवारी इत्यादि ने भी जमकर भड़ास निकाली।

हालांकि पूरा मामला “खोदा पहाड़ निकली चुहिया” टाइप का है, लेकिन लालू, कांग्रेस और मीडिया को कौन समझाए। महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ़ इतना कहा है कि 2002 से 2007 के बीच कोषालय (Treasury) से जो पैसा निकला है उसका बिल प्रस्तुत नहीं हुआ है। अब भला इसमें घोटाले वाली बात कहाँ से आ गई? हालांकि यह गलत परम्परा तो है, लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि राज्य शासन के अधिकारी और विभिन्न विभाग अपनी आवश्यकतानुसार धन निकालते हैं और उसे खर्च करते हैं। विभागीय मंत्री को तो इन पैसों के उपयोग (या दुरुपयोग) से कोई मतलब होता नहीं, तो बिल और हिसाब-किताब की चिन्ता क्यों होने लगी। सम्बन्धित कलेक्टर और कमिश्नर की यह जिम्मेदारी है, लेकिन जब उन पर किसी का जोर या दबाव ही नहीं है तो वे क्यों अपनी तरफ़ से सारे शासकीय कामों के बिल शासन को देने लगे? ऐसा लगभग सभी राज्यों में होता है और बिहार भी कोई अपवाद नहीं है, हमारी “मक्कार कार्यसंस्कृति” में आलस और ढिलाई तो भरी पड़ी है ही, भ्रष्टाचार इसमें उर्वरक की भूमिका निभाता है। तात्पर्य यह कि 2002 से 2007 के बीच करोड़ों रुपये निकाले गये और खर्च हो गये कोई हिसाब-किताब और बिल नहीं पहुँचा, परन्तु विधानसभा में हंगामा करने वाले राजद और कांग्रेस सदस्यों ने इस बात पर दिमाग ही नहीं लगाया कि जिस CAG की रिपोर्ट के कालखण्ड पर वे हंगामा कर रहे हैं, उसमें से 2002 के बाद 42 माह तक लालू की ही सरकार थी, उसके बाद 11 माह तक राष्ट्रपति शासन था, जिसके सर्वेसर्वा एक और “महा-ईमानदार” बूटा सिंह थे, उसके बाद के 2 साल नीतीश सरकार के हैं, लेकिन गमले तोड़ने वाली उस वीरांगना से माथाफ़ोड़ी करे कौन? उन्हें तो बस हंगामा करने का बहाना चाहिये।

अब आते हैं हमारे “नेशनल”(?), “सबसे तेज़”(?) और “निष्पक्ष”(?) चैनलों के दोगलेपन और भाजपा विरोधी घृणित मानसिकता पर… जो लालू खुद ही करोड़ों रुपये के चारा घोटाले में न सिर्फ़ नामज़द आरोपी हैं, बल्कि न्यायालय उन्हें सजा भी सुना चुका… उसी लालू को पहले मीडिया ने रेल्वे मंत्री रहते हुए “मैनेजमेण्ट गुरु” के रुप में प्रचारित किया, जब ममता दीदी ने बाकायदा श्वेत-पत्र जारी करके लालू के मैनेजमेण्ट की पोल खोली तब वह फ़ुग्गा फ़ूटा, लेकिन फ़िर भी मीडिया को न तो अक्ल आनी थी, न आई। विधानसभा के हंगामे के बाद चैनलों ने लालू के बाइट्स और फ़ुटेज लगातार दिखाये, जबकि सुशील मोदी की बात तक नहीं सुनी गई। असल में मीडिया (और जनता) के लिये लालू एक “हँसोड़ कलाकार” से ज्यादा कुछ नहीं हैं, वह उनके मुँह से कुछ ऊटपटांग किस्म के बयान दिलवाकर मनोरंजन करवाता रहता है, लेकिन विधानसभा में जो हुआ वह मजाक नहीं था। ज़रा इन आँकड़ों पर निगाह डालिये –

– झारखण्ड सरकार के 6009 करोड़ और जम्मू-कश्मीर सरकार के 2725 करोड़ रुपये के खर्च का बरसों से अभी तक कोई हिसाब प्रस्तुत नहीं किया गया है।

– महाराष्ट्र सरकार का 3113 करोड़ रुपये के खर्च का बिल नहीं आया है।

– पश्चिम बंगाल सरकार ने 2001-02 में 7140 करोड़ रुपये खर्च किये थे, उसका हिसाब अब तक प्रस्तुत नहीं किया गया है।

– यहाँ तक कि केन्द्र सरकार के परिवार कल्याण मंत्रालय ने 1983 से लेकर अब तक 9000 करोड़ रुपये के खर्च का बिल नहीं जमा करवाया है।

कभी मीडिया में इस बारे में सुना है? नहीं सुना होगा, क्योंकि मीडिया सिर्फ़ वही दिखाता/सुनाता है जिसमें या तो महारानी (और युवराज) का स्तुति-गान होता है या फ़िर भाजपा-संघ-हिन्दूवादी संगठनों का विरोध होता है। क्या झारखण्ड, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के इन प्रकरणों को घोटाला माना जा सकता है? यदि “हाँ”, तो कथित रुप से सबसे तेज मीडिया अब तक सो रहा था क्या? कई-कई बार बाकायदा उदाहरण देकर साबित किया जा चुका है कि भारत का वर्तमान मीडिया पूरी तरह से “अज्ञात शक्तियों” के नियन्त्रण में है, जो “निष्पक्ष” तो कतई नहीं है। ट्रेजरी से सम्बन्धित जिस तकनीकी गलती को “घोटाला” कहकर प्रचारित किया गया, यदि सभी राज्यों के हाइकोर्ट, सभी राज्यों के खर्चों का हिसाब-किताब देखने लगें तो सारे के सारे मुख्यमंत्री ही कठघरे में खड़े नज़र आयेंगे।

इस बीच 26 जुलाई को पटना उच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई के लिये नीतीश ने विपक्ष के विरोध को भोथरा करने के लिये ताबड़तोड़ काम करने के निर्देश जारी कर दिये हैं। सभी जिला कलेक्टरों को दिशानिर्देश जारी करके 2002 से 2008 तक के सभी खर्चों के बिल पेश करने को कह दिया गया है, लगभग सभी जिलों में बड़े उच्चाधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं और वे रात-रात भर दफ़्तरों में बैठकर पिछले सारे रिकॉर्ड खंगालकर बिल तैयार कर रहे हैं। सीवान, बक्सर, समस्तीपुर, गया, जहानाबाद, सासाराम और छपरा में विशेष कैम्प लगाकर सारे पिछले पेण्डिंग बिल तैयार करवाये जा रहे हैं, तात्पर्य यह है कि विपक्ष की हवा निकालने और खुद की छवि उजली बनाये रखने के लिये नीतीश ने कमर कस ली है… फ़िर भी इस बीच मीडिया को जो “खेल” खेलना था, वह खेल चुका, अब चुनिंदा अखबारों, वेबसाईटों और ब्लॉग पर पड़े-पड़े लेख लिखते रहिये, कौन सुनेगा?  वैसे, बिहार के आगामी चुनावों को देखते हुए “मुसलमान-मुसलमान” का खेल शुरु हो चुका है, नीतीश भी नरेन्द्र मोदी को छूत की बीमारी की तरह दूर रखने लगे हैं और कांग्रेस भी मुस्लिमों को “आरक्षण” का झुनझुना बजाकर रिझा रही है… और वैसे भी चैनलों द्वारा “साम्प्रदायिकता” शब्द का उपयोग उसी समय किया जाता है, जब “हिन्दू” की बात की जाती है…
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चलते-चलते : उधर पूर्वोत्तर में ऑल असम माइनोरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (AAMSU) ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के विरोध में बन्द का आयोजन किया, जिसमें जिला कलेक्टर के कार्यालय पर हमला किया गया और पुलिस फ़ायरिंग में चार लोग मारे गये। बांग्लादेशी शरणार्थियों (बल्कि हरामखोरों शब्द अधिक उचित है) द्वारा अब वहाँ की जनसंख्या में इतना फ़ेरबदल किया जा चुका है, कि असम में कम से कम 10 विधायक इन बाहरी लोगों की पसन्द के बन सकते हैं। इतने हंगामे के बाद NRC (National Register for Citizens) को स्थगित करते हुए मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं कि “बातचीत” से मामला सुलझा लिया जायेगा। क्या आपने यह खबर किसी तथाकथित “निष्पक्ष” और सबसे तेज़ चैनल पर सुनी है? नहीं सुनी होगी, क्योंकि मीडिया को संत शिरोमणि श्रीश्री सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर और अमित शाह की खबर अधिक महत्वपूर्ण लगती है…

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>गुरु पूर्णिमा पर : दोहे गुरु वंदना के… —संजीव ‘सलिल’

>गुरु पूर्णिमा पर :

दोहे गुरु वंदना के…

संजीव ‘सलिल’
*
aum.bmp

गुरु को नित वंदन करो, हर पल है गुरूवार.
गुरु ही देता शिष्य को, निज आचार-विचार..
*
विधि-हरि-हर, परब्रम्ह भी, गुरु-सम्मुख लघुकाय.
अगम अमित है गुरु कृपा, कोई नहीं पर्याय..
*
गुरु है गंगा ज्ञान की, करे पाप का नाश.
ब्रम्हा-विष्णु-महेश सम, काटे भाव का पाश..
*
गुरु भास्कर अज्ञान तम्, ज्ञान सुमंगल भोर.
शिष्य पखेरू कर्म कर, गहे सफलता कोर..
*
गुरु-चरणों में बैठकर, गुर जीवन के जान.
ज्ञान गहे एकाग्र मन, चंचल चित अज्ञान..
*
गुरुता जिसमें वह गुरु, शत-शत नम्र प्रणाम.
कंकर से शंकर गढ़े, कर्म करे निष्काम..
*
गुरु पल में ले शिष्य के, गुण-अवगुण पहचान.
दोष मिटा कर बना दे, आदम से इंसान..
*
गुरु-चरणों में स्वर्ग है, गुरु-सेवा में मुक्ति.
भव सागर-उद्धार की, गुरु-पूजन ही युक्ति..
*
माटी शिष्य कुम्हार गुरु, करे न कुछ संकोच.
कूटे-साने रात-दिन, तब पैदा हो लोच..
*
कथनी-करनी एक हो, गुरु उसको ही मान.
चिन्तन चरखा पठन रुई, सूत आचरण जान..
*
शिष्यों के गुरु एक है, गुरु को शिष्य अनेक.
भक्तों को हरि एक ज्यों, हरि को भक्त अनेक..
*
गुरु तो गिरिवर उच्च हो, शिष्य ‘सलिल’ सम दीन.
गुरु-पद-रज बिन विकल हो, जैसे जल बिन मीन..
*
ज्ञान-ज्योति गुरु दीप ही, तम् का करे विनाश.
लगन-परिश्रम दीप-घृत, श्रृद्धा प्रखर प्रकाश..
*
गुरु दुनिया में कम मिलें, मिलते गुरु-घंटाल.
पाठ पढ़ाकर त्याग का, स्वयं उड़ाते माल..
*
गुरु-गरिमा-गायन करे, पाप-ताप का नाश.
गुरु-अनुकम्पा काटती, महाकाल का पाश..
*
विश्वामित्र-वशिष्ठ बिन, शिष्य न होता राम.
गुरु गुण दे, अवगुण हरे, अनथक आठों याम..
*
गुरु खुद गुड़ रह शिष्य को, शक्कर सदृश निखार.
माटी से मूरत गढ़े, पूजे सब संसार..
*
गुरु की महिमा है अगम, गाकर तरता शिष्य.
गुरु कल का अनुमान कर, गढ़ता आज भविष्य..
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मुँह देखी कहता नहीं, गुरु बतलाता दोष.
कमियाँ दूर किये बिना, गुरु न करे संतोष..
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शिष्य बिना गुरु अधूरा, गुरु बिन शिष्य अपूर्ण.
सिन्धु-बिंदु, रवि-किरण सम, गुरु गिरि चेला चूर्ण..
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गुरु अनुकम्पा नर्मदा,रुके न नेह-निनाद.
अविचल श्रृद्धा रहे तो, भंग न हो संवाद..
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गुरु की जय-जयकार कर, रसना होती धन्य.
गुरु पग-रज पाकर तरें, कामी क्रोधी वन्य..
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गुरुवर जिस पर सदय हों, उसके जागें भाग्य.
लोभ-मोह से मुक्ति पा, शिष्य वरे वैराग्य..
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गुरु को पारस जानिए, करे लौह को स्वर्ण.
शिष्य और गुरु जगत में, केवल दो ही वर्ण..
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संस्कार की सान पर, गुरु धरता है धार.
नीर-क्षीर सम शिष्य के, कर आचार-विचार..
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माटी से मूरत गढ़े, सद्गुरु फूंके प्राण.
कर अपूर्ण को पूर्ण गुरु, भव से देता त्राण..
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गुरु से भेद न मानिये, गुरु से रहें न दूर.
गुरु बिन ‘सलिल’ मनुष्य है, आँखें रहते सूर.
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टीचर-प्रीचर गुरु नहीं, ना मास्टर-उस्ताद.
गुरु-पूजा ही प्रथम कर, प्रभु की पूजा बाद..
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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

>कांग्रेस का दोहरा चरित्र !

>आज कांग्रेस की दोहरी नीति की कुछ व्याख्या करने का मन बना रहा हूँ | यह व्याख्या कांग्रेस के महासचिव और देश की राजनीती को अपराधियों से मुक्त बनाए की बात करने वाली राहुल गाँधी के दोहरे चरित्र को लेकर है | एक तरफ राहुल कहते फिर रहें हैं की कांग्रेस में अपराधियों को जगह नहीं मिलने वाली है वहीं दूसरी तरफ आने वाले उत्तरप्रदेश और सामने खड़े बिहार विधानसभा चुनाव के लिया लगातार पार्टी में दागदार लोगों का स्वागत हो रहा है | अब बात की शुरुआत उत्तरप्रदेश से करतें है जहाँ राहुल गाँधी खूब यात्रा कर रहे हैं | कभी किसी विदेशी मेहमान को लेकर चर्चा बतोरतें हैं तो कभी किसी और को लेकर | लेकिन वास्तविकता है की वो सारे कुछ अमेठी और रायबरेली तक ही कर पाते हैं | इससे आगे लगता है उनका ध्यान जा ही नहीं पा रहा है | देश को समझने के लिए तो खूब बातें करतें है लेकिन आज ता कितना समझ पायें है यह एक यक्ष प्रश्न है | राहुल जब उत्तरप्रदेश का दौरा कर रहे थे तो कहते थे अपराधी किस्म के लोगों को कांग्रेस में जगह मुश्किल है , मुश्किल क्या नहीं ही मिलने वाली है | लेकिन सच ही कहा गया है सत्ता में बने रहने के लिए और सत्ता को प्राप्त करने के लिए हर चीज़ सही है | हर कथनी को समय के साथ भुलाना पड़ता है | अब बिहार की ही बात करें तो कांग्रेस में दागदार लोगों की जमात लगातार बढती जा रही है | यही नहीं चुनाव को धयान में रखते हुआ आलाकमान भी इन लोगों को पड़ देकर पार्टी में बनाया रखना चाह रहे हैं | अभी इसका ताज़ा उद्धारण साधू यादव को पद से सुशोभित करना है | ठीक इसी तरह कुख्यात पप्पू यादव की पत्नी को भी पद दिया गया है | यह पत्नी क्या पप्पू को ही खुश करने की बात है | यह तो नामी गिनामी बात है , और भी कई लोग ओहें जिनके उपर संगीन आरोप हैं पर उनकी शरंस्थाली अब कांग्रेस बन चूकी है | अब उतरप्रदेश की और आते हैं | एक तरफ कांग्रेस मायावती को कहते फिरती है की वो अपराधियों को पार्टी में शरण देती है जितने के लिए लेकिन कांग्रेस तो उत्तरप्रदेश की सत्ता की इतनी लालायित है की संगीनों का तहेदिल से पार्टी में स्वागत कर रही है | यह है राहुल गाँधी का दोहरा चरित्र | अब आपको लगता होगा मैं तो खोकली बात कर रहा हूँ लेकिन नहीं मैं आपको साक्ष्य भी दे रहा हूँ | सबसे पहले अजय राइ जिनपर कई आपराधिक आरोप है को कांग्रेस ने प्रदेश विधानमंडल से संबद्ध कर लिया है | और इसकी खुशियाँ मानते फिर रही अहि | अगर बात इतने तक ही रहती तो कोई बात नहीं | तुलसी सिंह जिनपर 2004 में महाराष्ट्र सरकार जिसमे कांग्रेस भी भागीदार ने मकोका लगाया था | तुलसी सिंह पर दर्जनों आरोप हैं जो संगीन किस्म का हैं | लेकिन आज वो कांग्रेस में हैं | इसी तरह एक और नाम राधाकृष्ण किंकर का है | किंकर पर 2 दर्जन से ज्यादा अपराधिक मामले हैं | लेकिन कांग्रेस ने इनको प्रदेश मुख्यालय में बड़े ताम झाम के साथ पार्टी में शामिल किया | लिस्ट यहीं ख़त्म हो जाती कुछ रहत था लेकिन और भी बहुत से लोग हैं जिनको पार्टी अपने में शामिल करती जा रही है | कुछ और नाम जिन पर संगीन आरोप हैं और वे कांग्रेस में शामिल किया गए हैं में केडी शुक्ल उर्फ़ भगोले महाराज , गुलाब चन्द्र, अर्जुन और रामलखन पासी भी इस जमात में शामिल है | तो पार्टी का यह कौन सा चरित्र है | एक तरफ राहुल गाँधी युवाओ को स्वच्छ राजनीत की बात करतें है वहीं दूसरे तरफ संगीनों और अपराधियों की पार्टी में बड़े स्तर पर नियुक्ति हो रही है तो ये क्या है | मैं यहाँ किसी दूसरे दल की बात नहीं कर रहा हूँ न ही करना चाहता हूँ | कांग्रेस यह लबादा किस कारण से धारण कर रही है और किस मुह से आपराधियों के राजनीती के खात्मे की बात करती है | जबाव तो खुद पार्टी भी नहीं दे पा रही है | यहाँ तो स्पष्ट है की पार्टी की स्थिति उत्तरप्रदेश में किस हालात में है | आप ही बतायिया क्या यह पार्टी का दोहरा चरित्र नहीं है |

>नव गीत: हम खुद को…. संजीव ‘सलिल’

>नव गीत:
हम खुद को….
संजीव ‘सलिल’
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हम खुद को खुद ही डंसते हैं…
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जब औरों के दोष गिनाये.
हमने अपने ऐब छिपाए.
विहँस दिया औरों को धोखा-
ठगे गए तो अश्रु बहाये.

चलते चाल चतुर कह खुद को-
बनते मूर्ख स्वयं फंसते हैं…
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लिये सुमिरनी माला फेरें.
मन से प्रभु को कभी न टेरें.
जब-जब आपद-विपदा घेरें-
होकर विकल ईश-पथ हेरें.

मोह-वासना के दलदल में
संयम रथ पहिये फंसते हैं….
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लगा अल्पना चौक रंगोली,
फैलाई आशा की झोली.
त्योहारों पर हँसी-ठिठोली-
करे मनौती निष्ठां भोली.

पाखंडों के शूल फूल की
क्यारी में पाये ठंसते हैं…..
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पुरवैया को पछुआ घेरे.
दीप सूर्य पर आँख तरेरे.
तड़ित करे जब-तब चकफेरे
नभ पर छाये मेघ घनेरे.

आशा-निष्ठां का सम्बल ले
हम निर्भय पग रख हँसते हैं…..
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Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com

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