रेड्डी बन्धुओं से छुटकारे की चाहत और भाजपा के प्रति दोहरा मापदण्ड… (भाग-2)… Reddy Brothers Karnataka, Anti-Hindutva Media

भाग-1 में हमने रेड्डी बन्धुओं द्वारा किये जा रहे वीभत्स भ्रष्टाचार और जस्टिस हेगड़े के इस्तीफ़े के बारे में जाना… आईये अब देखते हैं कि यदि रेड्डी बन्धुओं पर नकेल कस दी जाये तो सभी राजनैतिक पार्टियों का क्या-क्या और कैसा फ़ायदा होगा – (साथ ही मीडिया द्वारा कांग्रेस और भाजपा के भ्रष्टाचारों पर रिपोर्टिंग में अपनाये जाने वाले दोहरे मापदण्डों पर भी संक्षिप्त चर्चा)…

1) रेड्डी बन्धुओं के जाने से भाजपा को यह फ़ायदा होगा कि येद्दियुरप्पा इन बन्धुओं के जबरिया दबाव और अवैध माँगों से मुक्त होकर अपना ध्यान राज्य के कामधाम में सही तरीके से लगा सकेंगे, अपनी इच्छानुसार अफ़सरों और मंत्रियों की नियुक्ति कर सकेंगे। येदियुरप्पा दिल से चाहते हैं कि रेड्डी बन्धुओं को लात मारकर बाहर किया जाये, लेकिन मजबूर हैं। वे फ़िलहाल सही मौके का इन्तज़ार कर रहे हैं…। कांग्रेस-भाजपा एक-दूसरे के पाले में गेंद डाल रहे हैं कि दोनों का रेड्डी बन्धुओं से बिगाड़ न हो। भाजपा सोच रही है कि केन्द्र सीबीआई को निर्देशित करे कि रेड्डियों के खिलाफ़ कार्रवाई करे या फ़िर हाईकोर्ट कोई फ़ैसला इनके खिलाफ़ सुना दे…या चुनाव आयोग इनकी गैर-आनुपातिक सम्पत्ति को लेकर कोई केस ठोक दे… तो इनसे छुटकारा मिले। जबकि कांग्रेस चाहती है कि रेड्डी बन्धु बाहर तो हों, लेकिन सरकार न गिरे, क्योंकि अभी कर्नाटक के चुनाव में उतरना कांग्रेस के लिये घातक सिद्ध होगा।

2) कांग्रेस भी इन दोनों से खार खाये बैठी है, क्योंकि आंध्रप्रदेश में जगनमोहन रेड्डी, जो सोनिया गाँधी को ठेंगा दिखाकर अपनी “ओदार्पु यात्रा” जारी रखे हुए हैं उसके पीछे कर्नाटक के रेड्डी बन्धुओं का “जोर” है। सेमुअल रेड्डी की मौत के बाद जगनमोहन की बंगलौर में इन दोनों भाईयों से मुलाकात हुई थी, जिसमें यह योजना बनी थी कि चूंकि सोनिया ने जगनमोहन को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया इसलिये पैसे के बल पर आंध्रप्रदेश की रोसैया सरकार गिराई जाये और इस पर गुपचुप अमल चल भी रहा है। रेड्डी बन्धु चाहते हैं कि जगनमोहन के रुप में उनकी कठपुतली हैदराबाद में बैठ जाये तो विशाखापत्तनम जैसे बड़े बन्दरगाहों से भी माल की तस्करी की जा सकेगी, जबकि कांग्रेस (यानी सोनिया) इन बन्धुओं को ठिकाने लगाकर जगनमोहन को उसकी औकात बताना चाहती है। जगनमोहन ये सोचकर “यात्रा” कर रहे हैं कि 6 साल पहले उनके पिता को भी ऐसी ही पदयात्रा से मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य मिला था। यदि रेड्डी बन्धु ना हों तो जगन की कोई औकात नहीं है।

3) देवेगौड़ा और कुमारस्वामी को प्रत्यक्ष रुप से कोई फ़ायदा नहीं है, सिवाय “बदला” लेने के, चूंकि रेड्डियों ने उनकी और भाजपा की संयुक्त सरकार गिराने में प्रमुख भूमिका निभाई थी, इसलिये गौड़ा बाप-बेटे चाहते हैं कि रेड्डी बन्धुओं को सबक सिखाया जाये।

कुल मिलाकर यह, कि सोनिया गाँधी से लेकर आडवाणी तक, सभी चाहते हैं कि ये दोनों भ्रष्ट भाई और जगनमोहन रेड्डी पूरे परिदृश्य से गायब हो जायें, लेकिन “साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे” की तर्ज पर। चूंकि भाजपा, दक्षिण में बड़े संघर्ष के बाद बनी पहली कर्नाटक सरकार को इन की वजह से गँवाना नहीं चाहती…… जबकि कांग्रेस, सेमुअल की मौत के बाद आंध्रप्रदेश सरकार को अस्थिर करना नहीं चाहती…और दोनों पार्टियाँ जानती हैं कि उन्हें कभी भविष्य में रेड्डी भाईयों की “मदद”(?) की जरुरत पड़ सकती है… है ना भारत का दमदार लोकतन्त्र और न्याय व्यवस्था?

कल्पना कीजिये, कि यदि आज रेड्डी बन्धु भाजपा का साथ छोड़कर अपने तमाम समर्थक विधायकों सहित कांग्रेस में शामिल हो जायें… तो क्या होगा… ज़ाहिर है कि तब न तो CBI जाँच की माँग होगी, न ही विधानसभा में धरना होगा…। हमारा देशभक्त इलेक्ट्रानिक मीडिया(?) भी एकदम चुप बैठ जायेगा, क्योंकि न तो आज तक कभी एसएम कृष्णा सरकार को बर्खास्त करने की माँग हुई, न ही धर्मसिंह सरकार को… हमेशा सारा दोष भाजपा का और सारे नैतिक मानदण्ड संघ के लिये रिज़र्व हैं।

चलिये कल्पना के लिये मान लें कि नैतिकता के आधार पर येदियुरप्पा इस्तीफ़ा दे दें, तो विरोधियों का आरोप पहले से तय किया हुआ है कि, “भाजपा को शासन करना नहीं आता…” और यदि कांग्रेस की तरह बेशर्मी से सत्ता टिकाकर रखें तो भाई लोग महंगाई-आतंकवाद-नक्सलवाद-भ्रष्टाचार जैसे महामुद्दों पर मनमोहन का इस्तीफ़ा माँगने के बजाय, येदियुरप्पा के पीछे लग जायेंगे, मोदी को “साम्प्रदायिकता”(?) के आधार पर गरियाएंगे, शिवराज को विकास की दौड़ में पीछे रहने के लिये कोसेंगे (भले ही सबसे ज्यादा किसान महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में ही आत्महत्याएं कर रहे हों)… कहने का मतलब ये है कि ऐसे हो या वैसे, भाजपा की सरकारों को अस्थिर करना, आलोचना करना ही मीडिया और देश को भुखमरी की हालत तक ले जाने वाली कांग्रेस के समर्थकों(?) का एकमात्र एजेण्डा है।

मैं तो दावा कर सकता हूं कि यदि रेड्डी बन्धु कांग्रेस में शामिल हो जायें तो न सिर्फ़ उन पर चल रहे सीबीआई के केस रफ़ा-दफ़ा हो जायेंगे, बल्कि जगनमोहन रेड्डी भी आंध्रप्रदेश सरकार को परेशान नहीं करेंगे, कोई न कोई “सौदा” जरूर पट जायेगा। लेकिन येदियुरप्पा सरकार से इस्तीफ़ा देने की माँग करने वाले कभी भी ये दावा नहीं कर सकते कि भाजपा सरकार के चले जाने भर से कर्नाटक में अवैध खनन एकदम रुक जायेगा, रेड्डी बन्धु साधु बन जायेंगे, जगनमोहन रेड्डी सन्यास ले लेंगे, देवेगौड़ा कीर्तनकार बन जायेंगे, कृष्णा-धर्मसिंह तीर्थयात्रा पर चले जायेंगे। फ़िर भाजपा के भ्रष्टाचार को लेकर इतनी बेचैनी और दोहरा मापदण्ड क्यों? यदि रेड्डी बन्धु कांग्रेस में शामिल हो जायें… तो भाजपा के भ्रष्टाचार और नैतिकता पर जो कमेण्ट, बहस और विरोध हो रहा है, सब “हवा” हो जायेंगे।

शिकायत इस बात से है कि भाजपा का भ्रष्टाचार तो तुरन्त दिखाई दे जाता है, उसे तुरन्त नैतिकता और सदाचार के उपदेश पिला दिये जाते हैं, तो फ़िर 1952 के जीप घोटाले से नेहरु ने देश में जो “रायता फ़ैलाने” की शुरुआत की थी, उस इतिहास पर चुप्पी क्यों साध लेते हो? मीडिया के इसी दोहरे मापदण्डों के कारण उसकी साख बुरी तरह से गिरी है, और कांग्रेस का “वर्तमान” ही कौन सा बहुत उजला है?  आज राजनीति और सत्ता के खेल में टिकने सम्बन्धी जो भी “धतकरम” हैं भाजपा ने कांग्रेस को देख-देखकर ही सीखे(?) हैं (हालांकि अभी भी बहुत पीछे है कांग्रेस से)।  मीडिया को कांग्रेस-भाजपा के बीच संतुलन साधना सीखना होगा, लेकिन वैसा अभी नहीं हो रहा है। अभी तो मीडिया स्पष्ट रुप से भाजपा विरोधी (प्रकारांतर से हिन्दुत्व विरोधी) दिखाई दे रहा है। चन्द रोज पहले जब “आज तक” के दफ़्तर में संघ कार्यकर्ताओं ने चैनल का “सार्वजनिक अभिनंदन समारोह” किया था, तब उन्होंने “निष्पक्षता”(?) के बारे में चिल्ला-चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा लिया था… आईये देखते हैं कि इन चैनलों की “निष्पक्षता” कैसी होती है… –

1) कर्नाटक पुलिस ने पिछले एक साल में अवैध रुप से लौह अयस्क ले जा रहे करीब 200 ट्रकों को पकड़ा था जो कि “फ़र्जी परमिट” पर चल रहे थे, और ये फ़र्जी परमिट आंध्रप्रदेश सरकार के सील-सिक्कों से लैस थे… अब बोलो? किस चैनल ने इसे प्रमुखता से दिखाया?

2) येदियुरप्पा विरोधियों को तमाचा जड़ता एक और तथ्य – खनन के लिये लाइसेंस लेने हेतु कम्पनियाँ पहले राज्य सरकारों को आवेदन देती हैं और राज्य सरकार उस प्रस्ताव को मंजूरी के लिये केन्द्र को भेजती है उसके बाद ही खनन का लाइसेंस जारी किया जाता है, अब जरा ध्यान से पढ़ें – जिस समय कर्नाटक में धर्मसिंह की कांग्रेस सरकार थी उस समय केन्द्र को लाइसेंस के 43 प्रस्ताव भेजे गये जिसमें से 33 स्वीकृत हुए। जब “देवेगौड़ा के सपूत” की सरकार थी उस समय केन्द्र को 47 लाइसेंस प्रस्ताव भेजे गये और 22 स्वीकृत हुए, इस बीच राष्ट्रपति शासन (यानी कांग्रेस का शासन) लगा उस बीच में 22 लाइसेंस आवेदन केन्द्र को भेजे जिसमें से 14 पर स्वीकृति की मोहर लग गई… अब पिछले दो साल में भाजपा सरकार ने लाइसेंस के 22 प्रस्ताव केन्द्र को भेजे हैं जिसमें से सिर्फ़ 2 स्वीकृत हुए… कौन से चैनल ने गला फ़ाड़-फ़ाड़कर इसका विरोध किया?

इन आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि,  धर्म सिंह, कुमारस्वामी और उसके बाद राष्ट्रपति शासन के दौरान कितना अवैध खनन हुआ होगा, और किस पार्टी ने अरबों रुपये का चूना देश को लगाया होगा। क्या कभी मीडिया में इस बारे में सुना है? नहीं सुना होगा… इसलिये जब हम मीडिया पर कांग्रेस का “पालतू कुत्ता” होने का आरोप लगाते हैं तो उसके पीछे यही बातें होती हैं, भाजपा विरोधियों का “माइण्डफ़्रेम” भी इसी मीडियाई चालबाजी से फ़िक्स किया जाता है।

3) लेख को ज्यादा लम्बा नहीं खींचता, फ़िर भी एक और अन्तिम उदाहरण – लोकायुक्त ने दिसम्बर 2008 में कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल को रिपोर्ट सौंपी जिसमें अवैध खनन और गलत लाइसेंस देने के लिये मुख्यमंत्री धर्मसिंह से 23 करोड़ रुपये वसूलने का अनुरोध किया गया…। राज्यपाल ने क्या किया – लोकायुक्त कानून की धारा 12/4 के तहत अपनी शक्तियों(?) का “सदुपयोग” करते हुए सरकार को मामला खारिज करने की सिफ़ारिश कर दी… इस बारे में कभी मीडिया में पढ़ा? “राज्यपालों” पर केन्द्र (यानी कांग्रेस) का दलाल होने का आरोप जब लगाया जाता है, उसके पीछे यही बातें होती हैं, लेकिन मीडिया कभी भी ऐसी बातों को कवरेज नहीं देता। यदि कभी देता भी है तो “हड्डी के कुछ टुकड़े” पाकर खामोश हो जाता है। लेकिन जब बात भाजपा की आती है, तब इस मीडिया के रंग देखिये, सेकुलरों के ढंग देखिये, वामपंथियों के दाँव देखिये, हिन्दुत्व विरोधियों का चरित्र देखिये… सब के सब एक सुर में गाने लगते हैं कि भाजपा भ्रष्ट है, मुख्यमंत्री कुर्सी छोड़ो…। आडवाणी ने हवाला डायरी में नाम आते ही पद छोड़ दिया और कहा कि जब तक मामला सुलझ नहीं जाता संसद का चुनाव नहीं लड़ेंगे… मीडिया ने उन्हें क्या दिया? मीडिया की छोड़ो, क्या जनता ने उन्हें प्रधानमंत्री बनवाया? अटल जी की ईमानदारी पर कोई शक नहीं कर सकता… नदियों को जोड़ने, सड़कों के स्वर्णिम चतुर्भुज बनाने, जैसी कई बेहतरीन योजनाएं उन्होंने शुरु कीं… नतीजा क्या हुआ? जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया।

असली लड़ाई “विचारधारा” की है, यदि विचारधारा को आगे बढ़ाना है तो कुछ बातों को नज़रअंदाज़ करना मजबूरी है। उदाहरण के तौर पर “नक्सलवाद” के समर्थक भी उसे एक विचारधारा कहते हैं, लेकिन वे लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़कर सत्ता हासिल करना और बदलाव करना नहीं चाहते, वे बन्दूक के बल पर सत्ता चाहते हैं। सोचिये जब आज की तारीख में नक्सलवादी, जंगलों से अवैध खनन, चौथ वसूली और ठेकेदारों-अफ़सरों से रंगदारी वसूल कर रहे हैं, यदि सत्ता में आ गये तो कितना लूटेंगे? येदियुरप्पा की दुविधा यही है कि रेड्डी बन्धुओं के कारनामों को फ़िलहाल नज़रअंदाज़ करें, या उनसे पंगा लेकर सरकार को कुर्बान कर दें। नैतिकता तो यही कहती है कि सरकार कुर्बान करो, लेकिन उससे परिस्थितियाँ तो सुधरने वाली नहीं… फ़िर वही देवेगौड़ा, फ़िर वही धर्म सिंह, फ़िर वही कांग्रेस… तो बेहतर विकल्प यही है कि, “सही मौके” का इंतज़ार किया जाये और दाँव लगते ही रेड्डी बन्धुओं को ठिकाने लगाया जाये। जरा सोचिये, शंकरसिंह वाघेला और नरेन्द्र मोदी की लड़ाई में यदि मोदी का दाँव “गर्मागर्मी” में गलत लग जाता, तो क्या आज नरेन्द्र मोदी गुजरात के निर्विवाद नेता बन पाते? निश्चित रुप से येदियुरप्पा भी “ठण्डा करके खाने” की फ़िराक में होंगे, तब तक इन भाईयों को झेलना ही पड़ेगा, जो कि देवेगौड़ा अथवा कांग्रेस को झेलने के मुकाबले अच्छा विकल्प है।

लोग कहते हैं अंग्रेजों ने भारत को जमकर लूटा था, यह अर्धसत्य है। मधु कौड़ा, शरद पवार, जयललिता और रेड्डी बन्धुओं को देखकर तो लगता है कि अंग्रेज नादान ही थे, जो भारत छोड़कर चले गये। यह तो एक राज्य के एक इलाके के अयस्क खनन का घोटाला है, पूरे भारत में ऐसे न जाने कितने अरबों-खरबों के घोटाले रोज हो रहे होंगे, यह कल्पनाशक्ति से बाहर की बात है। स्विस बैंक, स्विट्ज़रलैण्ड, यूरोप और अमेरिका यूं ही धनी नहीं बन गये हैं… भारत जैसे “मूर्खों से भरे” देशों को लूट-लूटकर बने हैं। कौन कहता है कि भारत गरीब है, बिलकुल गलत… भारत में सम्पदा भरी पड़ी है, लेकिन 50 साल तक शासन करने के बावजूद कांग्रेस, उद्योगपतियों और IAS अफ़सरों ने जानबूझकर देश को गरीब और अशिक्षित बनाकर रखा हुआ है, ताकि इनकी लूट-खसोट चलती रहे। उद्योगपति तो कम से कम कुछ लोगों को रोज़गार दे रहा है, काफ़ी सारा टैक्स चोरी करने बावजूद कुछ टैक्स भी दे रहा है, ज़मीने कौड़ी के दाम हथियाने के बावजूद देश के आर्थिक संसाधनों में अपना कुछ तो हाथ बँटा रहा है, लेकिन “नेता” और “IAS” ये दो कौमें ऐसी हैं, जो हर जिम्मेदारी से मुक्त हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि हमें लालूप्रसाद, जयललिता, ए राजा, प्रकाश सिंह बादल, शरद पवार जैसे लोग मिलते हैं… प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रुप से “ईमानदार” हैं तो देश को क्या फ़र्क पड़ता है? उनमें दम-गुर्दे हैं तो इन भ्रष्ट नेताओं(?) का कुछ बिगाड़कर दिखायें? लेकिन लुटी-पिटी हुई जनता भी बार-बार इन्हें ही चुन-चुनकर अपना नुमाइन्दा बनाती रहती है, क्योंकि उसके पास और कोई विकल्प नहीं है, उसे तो साँप या नाग में से एक को चुनना ही है। इसी को कुछ लोग “लोकतन्त्र” कहते हैं, जहाँ 10 चोट्टों की “सामूहिक राय”(?) एक समझदार व्यक्ति की सही सलाह पर भारी पड़ती है।

जनता बुरी तरह त्रस्त तो है ही, जिस दिन “हिटलर” टाइप का कोई आदमी सत्ता पर कब्जा करता हुआ और रोज़ाना 15-20 भ्रष्ट नेताओं-अफ़सरों को गोली से उड़ाता दिखाई देगा, तुरन्त उसके पीछे हो लेगी…। इसे चेतावनी समझें या मेरे जैसे पागल का काल्पनिक प्रलाप, लेकिन देश में स्थितियाँ जिस प्रकार बद से बदतर होती जा रही हैं, अमीरी-गरीबी के बीच फ़ासला बढ़ता जा रहा है, मेरे विरोधी भी दिल ही दिल में इस सम्भावना से इंकार नहीं कर सकते… बशर्ते उन्हें हिन्दुत्व-संघ-भाजपा-मोदी का विरोध करने से फ़ुर्सत मिले और वे “आँखें खोलकर इतिहास में निष्पक्ष रुप से” झाँक सकें…

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चलते-चलते : भारत में “गायब” होने की “परम्परा और तकनीक” काफ़ी पुरानी है, पहले एण्डरसन गायब हुआ, फ़िर क्वात्रोची गायब हुआ, और अब सूचना मिली है कि 7 दिसम्बर 1984 को एण्डरसन को भोपाल से दिल्ली लाने वाले मध्यप्रदेश के सरकारी विमान की “लॉग-बुक” भी गायब हो गई है, क्योंकि केन्द्र सरकार का कहना है कि वह पुराना विमान एक अमेरिकी कम्पनी को बेच दिया गया था उसी के साथ उसके सारे रिकॉर्ड्स भी अमेरिका चले गये… तो अब आप इन्तज़ार करते रहिये कि अर्जुनसिंह कब अपनी आत्मकथा लिखते हैं, तब तक कोई भी मैडम सोनिया गाँधी (उर्फ़ एंटोनिया माइनो) से यह पूछने की हिम्मत नहीं कर सकता कि आखिर “मौत का असली सौदागर” कौन है या कौन था? क्या यह सवाल पूछने की औकात किसी “निष्पक्ष” (हा हा हा हा) चैनल की है?

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Reference : TVR Shenoy Article on Rediff

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20 Comments

  1. July 19, 2010 at 10:07 am

    मैने बहुत पहले लिखा था कि हालात ऐसे बनते जा रहे है कि भारत में हिटलर पैदा होगा. लगता है ऐसा हो कर रहेगा.

  2. July 19, 2010 at 11:09 am

    कांग्रेसियो को बहुत सही जबाब दिया आपने.येदुरप्पा के इस्तीफे से आखिर होगा भी क्या.जो विकास उन्होने कर्नाटक का किया है.उनके इस्तीफे से वो विकास धीरे धीरे बर्बादी मे तब्दील हो जायेगाऔर रही बात रेडडी बन्धुओ की तो उनके काले कारनामे तो तब भी जारी रहेँगे बस मीडिया उसको उजागर करना बंद कर देगा.और वैसे भी अगर कीचड़ को साफ करना है तो कीचड़ मे उतरकर हाथ तो गन्दे करने ही पड़ेँगेइसलिये येदुरप्पा को भी इस कीचड़ को साफ करने के लिये इसमे बने रहना जरुरी है

  3. rahul said,

    July 19, 2010 at 11:58 am

    बहुत सही विश्लेशण किया है आपने.

  4. Anonymous said,

    July 19, 2010 at 1:17 pm

    kya baat hai… shaandaar

  5. July 19, 2010 at 1:39 pm

    आलोचनाओं के जवाबों को शब्द देने में लगा परिश्रम स्पष्ट झलक रहा है. पर अंधे सेकुलरों के लिए तर्क बेकार है.

  6. July 19, 2010 at 2:15 pm

    मान गए सुरेश जी , हमेशा की तरह ये लेख भी कमाल का है . अपनी बात करूँ तो मुझे तो लगता है की पिछले कई महीनो से मै ये सोच सोच के परेशान हूँ की अब हमारे देश का कोई शुभचिंतक या चिन्तक रह ही नहीं गया है . पता नही अब क्या होगा ? सरकार तो बॉस लूटने में लगी है , नायकों को खलनायक बनाने में और सब तरफ से भ्रष्टाचार में लिप्त हो रखी है . पाप का घड़ा भी कभी ना कभी फूट ही जाता है मगर पता नहीं इन पापियों का घड़ा कब फूटेगा ? कुछ अच्छा तो हो नहीं रहा है , बल्कि दिन बा दिन ऐसे हालात बनते जा रहे है की शायद बहुत जल्द मार काट की नौबत आ जाएगी . सरकार को कोई लेना देना नहीं , उसे देश के लोगों की और दिल्ली के लोगों की अमीरी दिखाए दे रही है . चंद मुठ्ठी भर लोग है जो ये सब सोचते भी हैं , बाकी लोगो की मानसिकता तो अब ऐसी बन रही है की "हमें क्या लेना देना " ख़ास कर नौजवानों की . उनके पास अपने कपड़ों और जूतों और शोशल नेट्वोर्किंग साइटों पे चुहल बाजी करने से फुर्सत नहीं है . अज की तारीख में बहुत से ऐसे लोग है जिन्हें ये नहीं पता हिन्दुस्तान क्या है , वो इंडिया जानते है . चाहे आतंकवादी घुसे , या चीन पिछवाड़े पे लात मारे ( पकिस्तान तो मरता ही रहता है ) , फिर भी हम शांति वार्ता करने को मारे जाते हैं . भोपाल गैस काण्ड हो या माधुरी गुप्ता जैसी स्टार गद्दार , हमे कोई फर्क नहीं पड़ता . मिडिया से लेकर सरकार तक , सरकारी विभागों तक सब सड़ चुका है . और तो और लोगों जायदातर लोग ये बातें जानना भी नहीं चाहते . इस अन्धकार में मेरे मन की बातों को अपने शब्दों से रौशनी देने वाले आपके लेख , जो की कड़ी म्हणत और बहादुरी से लिखे जाते है , मन को प्रफुल्लित कर जाते हैं . सैनिक सिर्फ वो नहीं होते जो सीमा पे लड़ते है , आप जैसे भी लोग हैं जो अपने कलम का हथियार लेकर लड़ रहे है .हम तक ऐसी जानकारियाँ पहुचाने के लिए धन्यवाद , हम और हमारा देश आपका आभारी रहेगा .कोई माने या ना मने , जाने या जानना ना चाहे हम हमेशा आपकी निष्पक्ष भावनाओं का सम्मान करेंगे जय हिंद

  7. July 19, 2010 at 3:23 pm

    बारीक और सटीक विश्लेषण. येदुरप्पा को रेड्डी बंधुओं पर तत्काल कारवाही नहीं कर कुछ समय और इन्तजार करना चाहिए, राजनीति तो यही कहती है.कांग्रेस और देवगौड़ा चाहते हैं की अवैध खनन मामले की जांच CBI द्वारा ही ताकि Congress Bureau of Investigation (CBI) रेड्डी बंधू और भाजापा पे ही सारा दोष मढ़ कर अन्य लोगों को बचा लिया जाय. सुना है विपक्ष इमानदार लोकायुक्त हेगड़े की जांच को भी राजी नहीं हो रहे हैं.लेकिन ये सारी महत्वपूर्ण बातें मीडिया में जोर-शोर से नहीं आती. जो कोई मीडिया चेनल, अखबार ऐसा करने की जुर्रत करेगा उसका कांग्रेस सरकार हुक्का-पानी बंद करने पूरा जुगाड़ कर बैठी है.बहरहाल बीके हुए मीडिया से ज्यादा चिंताजनक बात है आम लोगों के सोच की निष्क्रियता…..वैसे भी बाजारवाद ने लोगों की सोच की इस कदर कुंद कर रखा है की अब लोगों में क्रांति और वास्तविक परिवर्तन की कोई चाह नहीं.

  8. man said,

    July 19, 2010 at 3:30 pm

    सादर वन्दे सर ,बहुत उम्दा और विचारोताज्जक लेख ,इस देश के विकट हालत को देखते हुवे कोई कठोर और मजबूत इरादों वाला व्यक्ति ही इस शाशन और रास्ट्र को संभाल सकता हे |बी जे पि अभी संकर्मन काल से गुजर रही ,और विपरीत हालातो में कठोर फेसले लेने से डर रही हे ,इस रास्ट्र वादी पार्टी में कांग्रेस के कई नेगेटिव वायरस घुस चुके हे ,लेकिन ये वायरस भी स्केन कर के क्लीन कर दिए जायेंगे ,ऐसा मुझे ऐसा लगता हे और विश्वास भी हे |मिडिया बी. जे.पी का पक्ष क्यों लेगा ,वो कांग्रेस वाली बारात का""" नाइ """हे ,उसको टका वंही से ही मिलता हे| रेड्डी बंधुवो जेसे कई प्रेसर लोबियो की हवा निकल जाये यदि चाइना जेसा शाशन हो जाये तो ,यंहा की परिस्थीती में और वंहा की परेस्थीती में कोई अंतर नहीं ,नागरिक चरित्र भी समान हे लेकिन वंहा ''बेक साइड""" लाल करने के लिए वयवस्था हे ,और ज्यादा जरूरत पड़े तो हँगिंग मोड भी ऑन रह्ता हे ?यंहा ऐसी ही व्यवस्था की सख्त जरूरत हे ,कांग्रेस की इंदिरा थी ऐसी लेकिन जबरन नसबंदी का वर्ल्ड वाइड धमाका कर और आपात काल से अपने को बदनाम कर लिया ,उसके बाद में लिजलिजे पिलपिले ,संक्रमित अनुवांशिकता के वंशवादी लोगो ने राज किया ,अभी भी कर रहे हे गेले गूंगे राज ये सभी इस तताकथित लोकतंत्र में ही संम्भव हे ,और युवराज की बरात का नाई बावला होता जा रह हे की अगला शासक ये ढीला ढाला सा वय्क्ति बनेगा? लेकिन बी.जे. पी में ऐसे रास्ट्रवादीलोगो की कमी नहीं हे ,बहुत मिल जायेंगे जो रास्ट्र के पर्ती सम्प्र्पित हे ,और आशा हे भगवान वो दिन जल्द ही लाये जब रास्ट्र के परती समिर्पित लोग शासन की बागडोर संभाले ?जय श्री राम |

  9. man said,

    July 19, 2010 at 3:56 pm

    चाइना में जेसे""" मेड कलरफुल बेक साइड सर्विस स्टेशन """ हे ,वेसे उम्दा सर्विस स्टेशनों की यंहा भी जरूरत हे ,जो अच्छे संचालक की देख रेख में संचालित हो|तब ही कुछ संभव हे |

  10. NISHU JI said,

    July 19, 2010 at 4:52 pm

    You are totaly right.i agree ur views. nd i also agree bhagat singh comment.

  11. July 19, 2010 at 7:56 pm

    आपकी विद्वता के अनुकूल लेख नही हुआ ये

  12. Anonymous said,

    July 19, 2010 at 9:01 pm

    सुरेश जी मुझे नहीं लगता कि कुछ होगा। कर्नाटक ही नहीं आयरन ओर से अन्य प्रदेशों का भी यही हाल है। गोवा में तो कहते हैं कि मुख्यमंत्री को एक करोड़ रुपया प्रतिदिन मिल रहा है।

  13. July 20, 2010 at 1:40 am

    मन खुश करने वाला आलेख

  14. nitin tyagi said,

    July 20, 2010 at 4:32 am

    Ram Bharose hi chal raha hai ye desh

  15. achin said,

    July 20, 2010 at 6:01 am

    आप इतने समय से अपने लेखो के द्धारा छुपी हुयी घटनाओ को हम लोगो के सामने ला रहे .इसके लिये आपका आभार.आप जो भी लेख लिखते है वो किसी किसी को कड़वा लग सकता है लेकिन वो एक सत्य होता है. उसको नजरअंदाज नही किया जा सकता.

  16. Anonymous said,

    July 20, 2010 at 9:32 am

    yedurappa bechara? majbur aur apna shivraj itna dara huwa ki uski kursi ko khtra hai, kaise sarkar chalate ho bhai, khanij mafiya aur bhu-mafiya par ab control nahi ho raha hai, chunav to unhi ke paise se jite the, aur shivraj ka kehna ke mujhe hatane ke liye chanda ikathha kiya ja raha hai. iska kya matlab hai? yeh chanda kisko diya jaayega jisse shivraj ki kursi chali jaayegi? kya shivraj ne bhi babulal gour ko hatane ke liye chanda dilwaya tha ? aur CM itna bebas hai ki unpar koi karywahi nahi kar pata hai, kya khak aam aadmi ke haq ki hifazat kar payega ? kya ABVP aur Sangh ki shakha me shivraj aur yedurappa ne yahi sikha hai ki kisi bhi tarha kursi se chipke rehna hai, janta jaaye bhad me, kissuresh ji aapne okhli me apna sir de diya hai is mudde par likh kar, daily aapke imaandar? rashtrabhat? bhagwa CMs ki pol khulti jaa rahi hai

  17. vikas mehta said,

    July 20, 2010 at 10:07 am

    bas itna kahunga .aap jaise likhne walo ki jarurat hai is desh ko

  18. July 20, 2010 at 1:29 pm

    Annonymous जी भाजपा के कट्टर आलोचकों मे से एक हैं, लेकिन मैं इनकी किसी बात का बुरा नहीं मानता, बल्कि अधिकतर कमेंट्स पब्लिश ही किये हैं। मैंने इस लेख में भाजपा के भ्रष्टाचार की तरफ़दारी नहीं की, यदि इन्हें ऐसा लगता है तो मैं कुछ नहीं कर सकता। ये साहब चाहते हैं कि भाजपा एकदम साफ़-सुथरी, ईमानदार, नैतिक और त्यागमयी पार्टी बन जाये… – और चुनाव हारती रहे… 🙂 🙂 (जिससे कि कांग्रेस को चरने के लिये खुला मैदान हो जाये)हम भी चाहते हैं कि भाजपा और अधिक ईमानदार दिखे… लेकिन मेरे, आपके और इनके चाहने से क्या होगा। फ़िर भी, जब तक भाजपा में आडवाणी, नरेन्द्र मोदी, येदियुरप्पा, तरुण विजय, अरुण शौरी जैसे कई लोग हैं, मुझे फ़िलहाल कांग्रेस के मुकाबले इसमें कहीं अधिक उम्मीद नज़र आती है।

  19. Divya said,

    July 21, 2010 at 5:46 am

    .बेहद शर्मनाक। लेकिन अपनी शर्म को बेच चुके लोग इसे समझेंगे क्या ? किसी भी चैनल में यह हिम्मत नहीं है। हिम्मत दिखाएँगे भी कैसे ? पावर / ताकत तो महानुभावों के पास है , जो अपनी आत्मा बेच चुके हैं। .

  20. July 21, 2010 at 9:22 am

    आप के लेखों को पढकर टिप्पणी करनें का मन नही करता वरन् कुछ कारगर कर बैठने का मन करता है। कई भ्रष्टाचारियों को अबतक जूते से मार चुका हूँ , गोली वाली बात अबतक सोची नही थी ॥


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