>संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या

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प्रिय बन्‍धु

संस्‍कृत प्रशिक्षणकक्ष्‍या का पंचम संस्‍करण प्रस्‍तुत कर रहा हूँ ।
आशा है आप अवश्‍य लाभान्वित होंगे ।

संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या – पंचम: अभ्‍यास:

सहयोग के लिये धन्‍यवाद

भवदीय: – आनन्‍द:

स्विस बैंक से 180 देशों के हजारों खातों की जानकारी चोरी… "ईमानदार" प्रधानमंत्री जी, कुछ कीजिये… Swiss Bank Client list hacked

भारत के करोड़ों ईमानदार टैक्सदाताओं और नागरिकों के लिये यह एक खुशखबरी है कि फ़्रांस के HSBC बैंक के दो कर्मचारियों हर्व फ़ेल्सियानी और जॉर्जीना मिखाइल ने दावा किया है कि उनके पास स्विस बैंकों में से एक बैंक में स्थित 180 देशों के कर चोरों की पूरी डीटेल्स मौजूद हैं। 2 साल से इन्होंने लगातार यूरोपीय देशों की सरकारों को ईमेल भेजकर “टैक्स चोरों” को पकड़वाने में मदद की पेशकश की है। जर्मनी की गुप्तचर सेवा को भेजे अपने ईमेल में इन्होंने कहा कि ये लोग स्विटज़रलैण्ड स्थित एक निजी बैंक के महत्वपूर्ण डाटा और उस कम्प्यूटर तक पुलिस की पहुँच बना सकते हैं। इसी प्रकार के ईमेल ब्रिटेन, फ़्रांस और स्पेन की सरकारों, विदेश मंत्रालयों और पुलिस को भेजे गये हैं (यहाँ देखें…)। यूरोप के देशों में इस बात पर बहस छिड़ी है कि एक “हैकर” या बैंक के कर्मचारी द्वारा चोरी किये गये डाटा पर भरोसा करना ठीक है और क्या ऐसा करना नैतिक रुप से सही है? लेकिन फ़ेल्सियानी जो कि HSBC बैंक के पूर्व कर्मचारी हैं, पर फ़िलहाल फ़्रांस और जर्मनी तो भरोसा कर रहे हैं, जबकि स्विस सरकार लाल-पीली हो रही है। HSBC के वरिष्ट अधिकारियों ने माना है कि फ़ेल्सियानी ने बैंक के मुख्यालय और इसकी एक स्विस सहयोगी बैंक से महत्वपूर्ण डाटा को अपने PC में कॉपी कर लिया है और उसने बैंक की गोपनीयता सम्बन्धी सेवा शर्तों का उल्लंघन किया है।

फ़ेल्सियानी ने स्वीकार किया है कि उनके पास 180 देशों के विभिन्न “ग्राहकों” का डाटा है, लेकिन उन्होंने किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि इस डाटा से उनका उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, बल्कि स्विस बैंक द्वारा अपनाई जा रही “गोपनीयता बैंकिंग प्रणाली” पर सवालिया निशान लगाना भर है। बहरहाल, फ़्रांस सरकार फ़ेल्सियानी से प्राप्त जानकारियों के आधार पर टैक्स चोरों के खिलाफ़ अभियान छेड़ चुकी है। स्विस पुलिस ने फ़ेल्सियानी के निवास पर छापा मारकर उसका कम्प्यूटर और अन्य महत्वपूर्ण हार्डवेयर जब्त कर लिया है लेकिन फ़ेल्सियानी का दावा है कि उसका डाटा सुरक्षित है और वह किसी “दूरस्थ सर्वर” पर अपलोड किया जा चुका है। इधर फ़्रांस सरकार का कहना है कि उन्हें इसमें किसी कानूनी उल्लंघन की बात नज़र नहीं आती, और वे टैक्स चोरों के खिलाफ़ अभियान जारी रखेंगे। फ़्रांस सरकार ने इटली की सरकार को 7000 अकाउंट नम्बर दिये, जिसमें लगभग 7 अरब डालर की अवैध सम्पत्ति जमा थी। स्पेन के टैक्स विभाग ने भी इस डाटा का उपयोग करते हुए इनकी जाँच शुरु कर दी है।

फ़ेल्सियानी ने सन् 2000 मे HSBC बैंक की नौकरी शुरु की थी, वह कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग में स्नातक और बैंक के सुरक्षा सॉफ़्टवेयर के कोड लिखता है। बैंक में उसका कई बार प्रमोशन हो चुका है और 2006 में उसे जिनेवा स्थित HSBC के मुख्यालय में ग्राहक डाटाबेस की सुरक्षा बढ़ाने के लिये तैनात किया गया था। इसलिये फ़ेल्सियानी की बातों और उसके दावों पर शक करने की कोई वजह नहीं बनती। फ़ेल्सियानी का कहना है कि बैंक का डाटा वह एक रिमोट सर्वर पर बैक-अप के रुप में सुरक्षित करके रखता था, जो कि एक निर्धारित प्रक्रिया थी, और मेरा इरादा इस डाटा से पैसा कमाना नहीं है।

जून 2008 से अगस्त 2009 के बीच अमेरिका के कर अधिकारियों ने स्विस बैंक UBS के “नट-बोल्ट टाइट” किये तब उसने अमेरिका के 4450 कर चोरों के बैंक डीटेल्स उन्हें दे दिये। कहने का मतलब यह है कि स्विटज़रलैण्ड की एक बैंक (जी हाँ फ़िलहाल सिर्फ़ एक बैंक) के 180 देशों के हजारों ग्राहकों (यानी डाकुओं) के खातों की पूरी जानकारी फ़ेल्सियानी नामक शख्स के पास है… अब हमारे “ईमानदार” बाबू के ज़मीर और हिम्मत पर यह निर्भर करता है कि वे यह देखना सुनिश्चित करें कि फ़ेल्सियानी के पास उपलब्ध आँकड़ों में से क्या भारत के कुछ हरामखोरों के आँकड़े भी हैं? भले ही इस डाटा को हासिल करने के लिये हमें फ़ेल्सियानी को लाखों डालर क्यों न चुकाने पड़ें, लेकिन जब फ़्रांस, जर्मनी, स्पेन और अमेरिका जैसे देश फ़ेल्सियानी के इन आँकड़ों पर न सिर्फ़ भरोसा कर रहे हैं, बल्कि छापेमारी भी कर रहे हैं… तो हमें “संकोच” नहीं करना चाहिये।

भारत के पिछले लोकसभा चुनावों में स्विस बैंकों से भारत के बड़े-बड़े मगरमच्छों द्वारा वहाँ जमा किये गये धन को भारत वापस लाने के बारे में काफ़ी हो-हल्ला मचाया गया था। भाजपा की तरफ़ से कहा गया था कि सत्ता में आने पर वे स्विस सरकार से आग्रह करेंगे कि भारत के तमाम खातों की जानकारी प्रदान करे। भाजपा की देखादेखी कांग्रेस ने भी उसमें सुर मिलाया था, लेकिन चुनाव निपटकर एक साल बीत चुका है, और हमेशा की तरह कांग्रेस ने अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है।

एक व्यक्ति के रुप में, प्रधानमंत्री की ईमानदार छवि पर मुझे पूरा यकीन है, लेकिन क्या वे इस मौके का उपयोग देशहित में करेंगे…? यदि फ़ेल्सियानी की लिस्ट से भारत के 8-10 “मगरमच्छ” भी फ़ँसते हैं, तो मनमोहन सिंह भारत में इतिहास-पुरुष बन जायेंगे…। परन्तु जिस प्रकार की “आत्माओं” से वे घिरे हुए हैं, उस माहौल में क्या ऐसा करने की हिम्मत जुटा पायेंगे? उम्मीद तो कम ही है, क्योंकि दूरसंचार मंत्री ए राजा के खिलाफ़ पक्के सबूत, मीडिया में छपने के बावजूद वे उन पर कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं, तो फ़ेल्सियानी की स्विस बैंक लिस्ट में से पता नहीं कौन सा “भयानक भूत” निकल आये और उनकी सरकार को हवा में उड़ा ले जाये…।

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रेड्डी बन्धुओं से छुटकारे की चाहत और भाजपा के प्रति दोहरा मापदण्ड… (भाग-2)… Reddy Brothers Karnataka, Anti-Hindutva Media

भाग-1 में हमने रेड्डी बन्धुओं द्वारा किये जा रहे वीभत्स भ्रष्टाचार और जस्टिस हेगड़े के इस्तीफ़े के बारे में जाना… आईये अब देखते हैं कि यदि रेड्डी बन्धुओं पर नकेल कस दी जाये तो सभी राजनैतिक पार्टियों का क्या-क्या और कैसा फ़ायदा होगा – (साथ ही मीडिया द्वारा कांग्रेस और भाजपा के भ्रष्टाचारों पर रिपोर्टिंग में अपनाये जाने वाले दोहरे मापदण्डों पर भी संक्षिप्त चर्चा)…

1) रेड्डी बन्धुओं के जाने से भाजपा को यह फ़ायदा होगा कि येद्दियुरप्पा इन बन्धुओं के जबरिया दबाव और अवैध माँगों से मुक्त होकर अपना ध्यान राज्य के कामधाम में सही तरीके से लगा सकेंगे, अपनी इच्छानुसार अफ़सरों और मंत्रियों की नियुक्ति कर सकेंगे। येदियुरप्पा दिल से चाहते हैं कि रेड्डी बन्धुओं को लात मारकर बाहर किया जाये, लेकिन मजबूर हैं। वे फ़िलहाल सही मौके का इन्तज़ार कर रहे हैं…। कांग्रेस-भाजपा एक-दूसरे के पाले में गेंद डाल रहे हैं कि दोनों का रेड्डी बन्धुओं से बिगाड़ न हो। भाजपा सोच रही है कि केन्द्र सीबीआई को निर्देशित करे कि रेड्डियों के खिलाफ़ कार्रवाई करे या फ़िर हाईकोर्ट कोई फ़ैसला इनके खिलाफ़ सुना दे…या चुनाव आयोग इनकी गैर-आनुपातिक सम्पत्ति को लेकर कोई केस ठोक दे… तो इनसे छुटकारा मिले। जबकि कांग्रेस चाहती है कि रेड्डी बन्धु बाहर तो हों, लेकिन सरकार न गिरे, क्योंकि अभी कर्नाटक के चुनाव में उतरना कांग्रेस के लिये घातक सिद्ध होगा।

2) कांग्रेस भी इन दोनों से खार खाये बैठी है, क्योंकि आंध्रप्रदेश में जगनमोहन रेड्डी, जो सोनिया गाँधी को ठेंगा दिखाकर अपनी “ओदार्पु यात्रा” जारी रखे हुए हैं उसके पीछे कर्नाटक के रेड्डी बन्धुओं का “जोर” है। सेमुअल रेड्डी की मौत के बाद जगनमोहन की बंगलौर में इन दोनों भाईयों से मुलाकात हुई थी, जिसमें यह योजना बनी थी कि चूंकि सोनिया ने जगनमोहन को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया इसलिये पैसे के बल पर आंध्रप्रदेश की रोसैया सरकार गिराई जाये और इस पर गुपचुप अमल चल भी रहा है। रेड्डी बन्धु चाहते हैं कि जगनमोहन के रुप में उनकी कठपुतली हैदराबाद में बैठ जाये तो विशाखापत्तनम जैसे बड़े बन्दरगाहों से भी माल की तस्करी की जा सकेगी, जबकि कांग्रेस (यानी सोनिया) इन बन्धुओं को ठिकाने लगाकर जगनमोहन को उसकी औकात बताना चाहती है। जगनमोहन ये सोचकर “यात्रा” कर रहे हैं कि 6 साल पहले उनके पिता को भी ऐसी ही पदयात्रा से मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य मिला था। यदि रेड्डी बन्धु ना हों तो जगन की कोई औकात नहीं है।

3) देवेगौड़ा और कुमारस्वामी को प्रत्यक्ष रुप से कोई फ़ायदा नहीं है, सिवाय “बदला” लेने के, चूंकि रेड्डियों ने उनकी और भाजपा की संयुक्त सरकार गिराने में प्रमुख भूमिका निभाई थी, इसलिये गौड़ा बाप-बेटे चाहते हैं कि रेड्डी बन्धुओं को सबक सिखाया जाये।

कुल मिलाकर यह, कि सोनिया गाँधी से लेकर आडवाणी तक, सभी चाहते हैं कि ये दोनों भ्रष्ट भाई और जगनमोहन रेड्डी पूरे परिदृश्य से गायब हो जायें, लेकिन “साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे” की तर्ज पर। चूंकि भाजपा, दक्षिण में बड़े संघर्ष के बाद बनी पहली कर्नाटक सरकार को इन की वजह से गँवाना नहीं चाहती…… जबकि कांग्रेस, सेमुअल की मौत के बाद आंध्रप्रदेश सरकार को अस्थिर करना नहीं चाहती…और दोनों पार्टियाँ जानती हैं कि उन्हें कभी भविष्य में रेड्डी भाईयों की “मदद”(?) की जरुरत पड़ सकती है… है ना भारत का दमदार लोकतन्त्र और न्याय व्यवस्था?

कल्पना कीजिये, कि यदि आज रेड्डी बन्धु भाजपा का साथ छोड़कर अपने तमाम समर्थक विधायकों सहित कांग्रेस में शामिल हो जायें… तो क्या होगा… ज़ाहिर है कि तब न तो CBI जाँच की माँग होगी, न ही विधानसभा में धरना होगा…। हमारा देशभक्त इलेक्ट्रानिक मीडिया(?) भी एकदम चुप बैठ जायेगा, क्योंकि न तो आज तक कभी एसएम कृष्णा सरकार को बर्खास्त करने की माँग हुई, न ही धर्मसिंह सरकार को… हमेशा सारा दोष भाजपा का और सारे नैतिक मानदण्ड संघ के लिये रिज़र्व हैं।

चलिये कल्पना के लिये मान लें कि नैतिकता के आधार पर येदियुरप्पा इस्तीफ़ा दे दें, तो विरोधियों का आरोप पहले से तय किया हुआ है कि, “भाजपा को शासन करना नहीं आता…” और यदि कांग्रेस की तरह बेशर्मी से सत्ता टिकाकर रखें तो भाई लोग महंगाई-आतंकवाद-नक्सलवाद-भ्रष्टाचार जैसे महामुद्दों पर मनमोहन का इस्तीफ़ा माँगने के बजाय, येदियुरप्पा के पीछे लग जायेंगे, मोदी को “साम्प्रदायिकता”(?) के आधार पर गरियाएंगे, शिवराज को विकास की दौड़ में पीछे रहने के लिये कोसेंगे (भले ही सबसे ज्यादा किसान महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में ही आत्महत्याएं कर रहे हों)… कहने का मतलब ये है कि ऐसे हो या वैसे, भाजपा की सरकारों को अस्थिर करना, आलोचना करना ही मीडिया और देश को भुखमरी की हालत तक ले जाने वाली कांग्रेस के समर्थकों(?) का एकमात्र एजेण्डा है।

मैं तो दावा कर सकता हूं कि यदि रेड्डी बन्धु कांग्रेस में शामिल हो जायें तो न सिर्फ़ उन पर चल रहे सीबीआई के केस रफ़ा-दफ़ा हो जायेंगे, बल्कि जगनमोहन रेड्डी भी आंध्रप्रदेश सरकार को परेशान नहीं करेंगे, कोई न कोई “सौदा” जरूर पट जायेगा। लेकिन येदियुरप्पा सरकार से इस्तीफ़ा देने की माँग करने वाले कभी भी ये दावा नहीं कर सकते कि भाजपा सरकार के चले जाने भर से कर्नाटक में अवैध खनन एकदम रुक जायेगा, रेड्डी बन्धु साधु बन जायेंगे, जगनमोहन रेड्डी सन्यास ले लेंगे, देवेगौड़ा कीर्तनकार बन जायेंगे, कृष्णा-धर्मसिंह तीर्थयात्रा पर चले जायेंगे। फ़िर भाजपा के भ्रष्टाचार को लेकर इतनी बेचैनी और दोहरा मापदण्ड क्यों? यदि रेड्डी बन्धु कांग्रेस में शामिल हो जायें… तो भाजपा के भ्रष्टाचार और नैतिकता पर जो कमेण्ट, बहस और विरोध हो रहा है, सब “हवा” हो जायेंगे।

शिकायत इस बात से है कि भाजपा का भ्रष्टाचार तो तुरन्त दिखाई दे जाता है, उसे तुरन्त नैतिकता और सदाचार के उपदेश पिला दिये जाते हैं, तो फ़िर 1952 के जीप घोटाले से नेहरु ने देश में जो “रायता फ़ैलाने” की शुरुआत की थी, उस इतिहास पर चुप्पी क्यों साध लेते हो? मीडिया के इसी दोहरे मापदण्डों के कारण उसकी साख बुरी तरह से गिरी है, और कांग्रेस का “वर्तमान” ही कौन सा बहुत उजला है?  आज राजनीति और सत्ता के खेल में टिकने सम्बन्धी जो भी “धतकरम” हैं भाजपा ने कांग्रेस को देख-देखकर ही सीखे(?) हैं (हालांकि अभी भी बहुत पीछे है कांग्रेस से)।  मीडिया को कांग्रेस-भाजपा के बीच संतुलन साधना सीखना होगा, लेकिन वैसा अभी नहीं हो रहा है। अभी तो मीडिया स्पष्ट रुप से भाजपा विरोधी (प्रकारांतर से हिन्दुत्व विरोधी) दिखाई दे रहा है। चन्द रोज पहले जब “आज तक” के दफ़्तर में संघ कार्यकर्ताओं ने चैनल का “सार्वजनिक अभिनंदन समारोह” किया था, तब उन्होंने “निष्पक्षता”(?) के बारे में चिल्ला-चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा लिया था… आईये देखते हैं कि इन चैनलों की “निष्पक्षता” कैसी होती है… –

1) कर्नाटक पुलिस ने पिछले एक साल में अवैध रुप से लौह अयस्क ले जा रहे करीब 200 ट्रकों को पकड़ा था जो कि “फ़र्जी परमिट” पर चल रहे थे, और ये फ़र्जी परमिट आंध्रप्रदेश सरकार के सील-सिक्कों से लैस थे… अब बोलो? किस चैनल ने इसे प्रमुखता से दिखाया?

2) येदियुरप्पा विरोधियों को तमाचा जड़ता एक और तथ्य – खनन के लिये लाइसेंस लेने हेतु कम्पनियाँ पहले राज्य सरकारों को आवेदन देती हैं और राज्य सरकार उस प्रस्ताव को मंजूरी के लिये केन्द्र को भेजती है उसके बाद ही खनन का लाइसेंस जारी किया जाता है, अब जरा ध्यान से पढ़ें – जिस समय कर्नाटक में धर्मसिंह की कांग्रेस सरकार थी उस समय केन्द्र को लाइसेंस के 43 प्रस्ताव भेजे गये जिसमें से 33 स्वीकृत हुए। जब “देवेगौड़ा के सपूत” की सरकार थी उस समय केन्द्र को 47 लाइसेंस प्रस्ताव भेजे गये और 22 स्वीकृत हुए, इस बीच राष्ट्रपति शासन (यानी कांग्रेस का शासन) लगा उस बीच में 22 लाइसेंस आवेदन केन्द्र को भेजे जिसमें से 14 पर स्वीकृति की मोहर लग गई… अब पिछले दो साल में भाजपा सरकार ने लाइसेंस के 22 प्रस्ताव केन्द्र को भेजे हैं जिसमें से सिर्फ़ 2 स्वीकृत हुए… कौन से चैनल ने गला फ़ाड़-फ़ाड़कर इसका विरोध किया?

इन आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि,  धर्म सिंह, कुमारस्वामी और उसके बाद राष्ट्रपति शासन के दौरान कितना अवैध खनन हुआ होगा, और किस पार्टी ने अरबों रुपये का चूना देश को लगाया होगा। क्या कभी मीडिया में इस बारे में सुना है? नहीं सुना होगा… इसलिये जब हम मीडिया पर कांग्रेस का “पालतू कुत्ता” होने का आरोप लगाते हैं तो उसके पीछे यही बातें होती हैं, भाजपा विरोधियों का “माइण्डफ़्रेम” भी इसी मीडियाई चालबाजी से फ़िक्स किया जाता है।

3) लेख को ज्यादा लम्बा नहीं खींचता, फ़िर भी एक और अन्तिम उदाहरण – लोकायुक्त ने दिसम्बर 2008 में कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल को रिपोर्ट सौंपी जिसमें अवैध खनन और गलत लाइसेंस देने के लिये मुख्यमंत्री धर्मसिंह से 23 करोड़ रुपये वसूलने का अनुरोध किया गया…। राज्यपाल ने क्या किया – लोकायुक्त कानून की धारा 12/4 के तहत अपनी शक्तियों(?) का “सदुपयोग” करते हुए सरकार को मामला खारिज करने की सिफ़ारिश कर दी… इस बारे में कभी मीडिया में पढ़ा? “राज्यपालों” पर केन्द्र (यानी कांग्रेस) का दलाल होने का आरोप जब लगाया जाता है, उसके पीछे यही बातें होती हैं, लेकिन मीडिया कभी भी ऐसी बातों को कवरेज नहीं देता। यदि कभी देता भी है तो “हड्डी के कुछ टुकड़े” पाकर खामोश हो जाता है। लेकिन जब बात भाजपा की आती है, तब इस मीडिया के रंग देखिये, सेकुलरों के ढंग देखिये, वामपंथियों के दाँव देखिये, हिन्दुत्व विरोधियों का चरित्र देखिये… सब के सब एक सुर में गाने लगते हैं कि भाजपा भ्रष्ट है, मुख्यमंत्री कुर्सी छोड़ो…। आडवाणी ने हवाला डायरी में नाम आते ही पद छोड़ दिया और कहा कि जब तक मामला सुलझ नहीं जाता संसद का चुनाव नहीं लड़ेंगे… मीडिया ने उन्हें क्या दिया? मीडिया की छोड़ो, क्या जनता ने उन्हें प्रधानमंत्री बनवाया? अटल जी की ईमानदारी पर कोई शक नहीं कर सकता… नदियों को जोड़ने, सड़कों के स्वर्णिम चतुर्भुज बनाने, जैसी कई बेहतरीन योजनाएं उन्होंने शुरु कीं… नतीजा क्या हुआ? जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया।

असली लड़ाई “विचारधारा” की है, यदि विचारधारा को आगे बढ़ाना है तो कुछ बातों को नज़रअंदाज़ करना मजबूरी है। उदाहरण के तौर पर “नक्सलवाद” के समर्थक भी उसे एक विचारधारा कहते हैं, लेकिन वे लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़कर सत्ता हासिल करना और बदलाव करना नहीं चाहते, वे बन्दूक के बल पर सत्ता चाहते हैं। सोचिये जब आज की तारीख में नक्सलवादी, जंगलों से अवैध खनन, चौथ वसूली और ठेकेदारों-अफ़सरों से रंगदारी वसूल कर रहे हैं, यदि सत्ता में आ गये तो कितना लूटेंगे? येदियुरप्पा की दुविधा यही है कि रेड्डी बन्धुओं के कारनामों को फ़िलहाल नज़रअंदाज़ करें, या उनसे पंगा लेकर सरकार को कुर्बान कर दें। नैतिकता तो यही कहती है कि सरकार कुर्बान करो, लेकिन उससे परिस्थितियाँ तो सुधरने वाली नहीं… फ़िर वही देवेगौड़ा, फ़िर वही धर्म सिंह, फ़िर वही कांग्रेस… तो बेहतर विकल्प यही है कि, “सही मौके” का इंतज़ार किया जाये और दाँव लगते ही रेड्डी बन्धुओं को ठिकाने लगाया जाये। जरा सोचिये, शंकरसिंह वाघेला और नरेन्द्र मोदी की लड़ाई में यदि मोदी का दाँव “गर्मागर्मी” में गलत लग जाता, तो क्या आज नरेन्द्र मोदी गुजरात के निर्विवाद नेता बन पाते? निश्चित रुप से येदियुरप्पा भी “ठण्डा करके खाने” की फ़िराक में होंगे, तब तक इन भाईयों को झेलना ही पड़ेगा, जो कि देवेगौड़ा अथवा कांग्रेस को झेलने के मुकाबले अच्छा विकल्प है।

लोग कहते हैं अंग्रेजों ने भारत को जमकर लूटा था, यह अर्धसत्य है। मधु कौड़ा, शरद पवार, जयललिता और रेड्डी बन्धुओं को देखकर तो लगता है कि अंग्रेज नादान ही थे, जो भारत छोड़कर चले गये। यह तो एक राज्य के एक इलाके के अयस्क खनन का घोटाला है, पूरे भारत में ऐसे न जाने कितने अरबों-खरबों के घोटाले रोज हो रहे होंगे, यह कल्पनाशक्ति से बाहर की बात है। स्विस बैंक, स्विट्ज़रलैण्ड, यूरोप और अमेरिका यूं ही धनी नहीं बन गये हैं… भारत जैसे “मूर्खों से भरे” देशों को लूट-लूटकर बने हैं। कौन कहता है कि भारत गरीब है, बिलकुल गलत… भारत में सम्पदा भरी पड़ी है, लेकिन 50 साल तक शासन करने के बावजूद कांग्रेस, उद्योगपतियों और IAS अफ़सरों ने जानबूझकर देश को गरीब और अशिक्षित बनाकर रखा हुआ है, ताकि इनकी लूट-खसोट चलती रहे। उद्योगपति तो कम से कम कुछ लोगों को रोज़गार दे रहा है, काफ़ी सारा टैक्स चोरी करने बावजूद कुछ टैक्स भी दे रहा है, ज़मीने कौड़ी के दाम हथियाने के बावजूद देश के आर्थिक संसाधनों में अपना कुछ तो हाथ बँटा रहा है, लेकिन “नेता” और “IAS” ये दो कौमें ऐसी हैं, जो हर जिम्मेदारी से मुक्त हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि हमें लालूप्रसाद, जयललिता, ए राजा, प्रकाश सिंह बादल, शरद पवार जैसे लोग मिलते हैं… प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रुप से “ईमानदार” हैं तो देश को क्या फ़र्क पड़ता है? उनमें दम-गुर्दे हैं तो इन भ्रष्ट नेताओं(?) का कुछ बिगाड़कर दिखायें? लेकिन लुटी-पिटी हुई जनता भी बार-बार इन्हें ही चुन-चुनकर अपना नुमाइन्दा बनाती रहती है, क्योंकि उसके पास और कोई विकल्प नहीं है, उसे तो साँप या नाग में से एक को चुनना ही है। इसी को कुछ लोग “लोकतन्त्र” कहते हैं, जहाँ 10 चोट्टों की “सामूहिक राय”(?) एक समझदार व्यक्ति की सही सलाह पर भारी पड़ती है।

जनता बुरी तरह त्रस्त तो है ही, जिस दिन “हिटलर” टाइप का कोई आदमी सत्ता पर कब्जा करता हुआ और रोज़ाना 15-20 भ्रष्ट नेताओं-अफ़सरों को गोली से उड़ाता दिखाई देगा, तुरन्त उसके पीछे हो लेगी…। इसे चेतावनी समझें या मेरे जैसे पागल का काल्पनिक प्रलाप, लेकिन देश में स्थितियाँ जिस प्रकार बद से बदतर होती जा रही हैं, अमीरी-गरीबी के बीच फ़ासला बढ़ता जा रहा है, मेरे विरोधी भी दिल ही दिल में इस सम्भावना से इंकार नहीं कर सकते… बशर्ते उन्हें हिन्दुत्व-संघ-भाजपा-मोदी का विरोध करने से फ़ुर्सत मिले और वे “आँखें खोलकर इतिहास में निष्पक्ष रुप से” झाँक सकें…

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चलते-चलते : भारत में “गायब” होने की “परम्परा और तकनीक” काफ़ी पुरानी है, पहले एण्डरसन गायब हुआ, फ़िर क्वात्रोची गायब हुआ, और अब सूचना मिली है कि 7 दिसम्बर 1984 को एण्डरसन को भोपाल से दिल्ली लाने वाले मध्यप्रदेश के सरकारी विमान की “लॉग-बुक” भी गायब हो गई है, क्योंकि केन्द्र सरकार का कहना है कि वह पुराना विमान एक अमेरिकी कम्पनी को बेच दिया गया था उसी के साथ उसके सारे रिकॉर्ड्स भी अमेरिका चले गये… तो अब आप इन्तज़ार करते रहिये कि अर्जुनसिंह कब अपनी आत्मकथा लिखते हैं, तब तक कोई भी मैडम सोनिया गाँधी (उर्फ़ एंटोनिया माइनो) से यह पूछने की हिम्मत नहीं कर सकता कि आखिर “मौत का असली सौदागर” कौन है या कौन था? क्या यह सवाल पूछने की औकात किसी “निष्पक्ष” (हा हा हा हा) चैनल की है?

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Reference : TVR Shenoy Article on Rediff

>मध्यप्रदेश में राजनीतिक गहमागहमी

>आजकल मध्यप्रदेश राजनीती में चर्चा में है | देश की दोनों बड़ी पार्टिओं को लेकर यह चर्चा में है | पहला सबसे बड़ा मुद्दा कांग्रेस के ताकतवर महासचिव और इस प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और बीजेपी की वाकयुद्ध के कारण है | शायद लोगों को भी यह खूब पसंद आ रहा है तभी तो नेता लोग भी इसे चालू रखे हुए हैं | और मीडिया को तो ऐसी चीजें हमेशा से ही अच्छी लगती है कुछ नया तो मिलता है अपने ग्राहकों के लिए उन्हें | यह तो राजनीती की स्थिति को बयां करता है जब अपशब्द राजनीती की भाषा खुलेआम होती जा रही है | अब तो गर्मी भी ख़त्म हो गयी और बरसात का मौसम आ गया पर इसकी उमस अभी बरकरार है | कभी बीजेपी की राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी की जुबान फिसलती है तो कभी दिग्विजय उसके प्रतिउत्तर में अपनी जुबान पर लगाम नहीं रख पाते हैं | वैसे भी दिग्विजय की जुबान कभी संभली भी नहीं थी तो अब संभलेगी | इस युद्ध में बीजेपी के प्रदेश भर के आला नेता भी अपनी भड़ास निकल रहे हैं | मौका अच्छा है कुछ कर लिया जाए ऐसे उनको पता है तो वो इसके अनुसार कम कर रहे हैं | खैर अगर ज्यादा इसपर बात नहीं चाहता हूँ और दूसरे मुद्दे पर आता हूँ | यह मुद्दा है एक साध्वी की घर वापसी की | उमा को लेकर को उठापटक सबसे बड़ी बात है | बीजेपी के प्रदेश से लेकर देश भर के नेता इसमें रूचि ले रहें है | ले भी किस कारण से अनहि उमा उमा जो है | साक्षात रूप है उसमे भीड़ खीचने की | वैसे भी आजकल बीजेपी नेतओं के सभा में भीड़ कम ही दिख रही है | उमा शायद कुछ भीड़ खिंच लाये ऐसी तम्मना है लोगों की | खासकर यूपी में तो ऐसा हो ही सकता है और लगे हाथ बिहार में भी उनको थोड़ा सहयोग तो उमा से मिल ही सकता है | लेकिन सबसे बड़ी समस्या है उनकी वापसी में लगे रोड़े को हटाना जो बहुत ही खतरनाक हैं | खैर आज हो कल हो वापसी की उम्मीद तो है ही | उमा के जोशीले भाषणों को जनता भी सुनना चाह रही है ऐसा भी लग रहा है | दोनों मुद्दे ऐसे हैं जिसमे हर कोई रोटी सकना चाहता है अब देखना है की किसकी रोटी अच्छी बनती है और किसकी जल जाति है | तीसरा मुद्दा भी है और वो है प्रदेश के ही भीतर का मंत्रियों की क्लास लगनी किसी तरह शुरू हुई है | अनूप मिश्रा तो घायल हो ही गएँ है अब देखना है घायल होने वाली की अगली लिस्ट में किसका स्थान है|

>एक आवश्‍यक निर्देश और आग्रह

>प्रिय मित्रों

पिछले कुछ दिनों से संस्‍कृत की लेखन कला विकास हेतु जो कक्ष्‍याएँ अब तक सम्‍पादित हुई हैं, उनमें आप लोगों की रूचि और उत्‍साह देखकर अति आनन्‍द प्राप्‍त हुआ । किन्‍तु अभी कुछ अधिक सफलता नहीं दिख रही है ।
मेरे कहने का तात्‍पर्य है कि आप में से कुछ मान्‍यों का प्रयास तो उत्‍तम रहा है किन्‍तु अन्‍यों का प्राय: समय के अभाव के कारण अधिक अभ्‍यास नहीं हो पा रहा है ।
इस के समाधान के लिये हमने एक उत्‍तम नीति सोंची है ।
बस आप लोगों का सहयोग मिले तो कुछ ही दिनों में चिट्ठा जगत पर संस्‍कृत के लेखकों की कतार खडी हो जाएगी ।

प्रस्‍ताव यह है कि आप में से जो लोग भी थोडा- बहुत भी संस्‍कृत में लिखना जानते हैं वो मेरे इस ब्‍लाग पर लेखन प्रारम्‍भ करें ।
आपको अधिक नहीं बस सप्‍ताह या दो सप्‍ताह में कोई एक छोटी सी लघुकथा या लेख लिखना है मुझे ईमेल करना है, मैं उन लेखों में जो छोटी मोटी गलतियॉं होगी उन्‍हे सही करके पुन: आपको मेल कर दूँगा और आप उसे मेरे इस ब्‍लाग पर अपने नाम से प्रकाशित करेंगे ।

इससे दो लाभ हैं
एक तो आपको नये शब्‍दों और नये वाक्‍यों के लिखने का तरीका पता चलेगा
और दूसरी बात कि जो लोग अभी नये हैं या जिन्‍हे थोडा कम आता है उनमें बडी ही शीघ्रता से पूर्णता आएगी ।

आशा है आपको मेरी बात पसन्‍द आयी होगी
तो शीघ्रता से अपने मेल मुझे भेजें ताकि मैं आपको ब्‍लाग लेखन आमन्‍त्रण भेज सकूँ ।
बस इस बात का ध्‍यान रखना है कि इस ब्‍लाग पर केवल संस्‍कृत के लेख ही प्रकाशित ।

आपके इस प्रयास से संस्‍कृत में लोगों की रूचि और बढेगी और लोगों को यह भी पता लगेगा कि ब्‍लाग जगत पर संस्‍कृत लिखने वालों की भी कमी नहीं है ।

इस प्रस्‍ताव को चाहे मेरा अनुरोध, आग्रह या फिर संस्‍कृतहिताय प्रार्थना समझ लीजिये पर अगर आप यह निमन्‍त्रण स्‍वीकार करेंगे तो आपके साथ सम्‍पूर्ण भारतीय संस्‍कृति का गौरव बढेगा ।
और हाँ आप बहाना नहीं कर सकते कि हमें संस्‍कृत लिखनी नहीं आती, हम जानते हैं ब्‍लाग जगत पर एक से एक संस्‍कृत के धुरन्‍धर विद्वान हैं जो केवल अनभ्‍यास के कारण ही लिखना छोड चुके हैं ।
और उनका पुन: अभ्‍यास कराने ही तो आपका आनन्‍द आपके मध्‍य उपस्थित हुआ है ।

आपके प्रत्‍युत्‍तर की प्रतीक्षा रहेगी

भवदीय – आनन्‍द

>एक ग़ज़ल : तुम को खुदा कहा है ….

>तुमको ख़ुदा कहा है किसने ? पता नहीं है
दिल ने न कह दिया हो ! हमने कहा नहीं है

दर पर तिरे न आऊँ ,सर भी नहीं झुकाऊँ !
दुनिया में आशिक़ी की ऐसी सजा नहीं है

पुरतिश्नगी ये मेरी ,जल्वा नुमाई तेरी
मेरी ख़ता भले हो , तेरी ख़ता नहीं है

कब ये जुबाँ खुली है तेरी सितमगरी से
ऐसा कभी न होगा ,ऐसा हुआ नहीं है

वो इश्क़ के सफ़र में ,राही नया नया है
आह-ओ-फ़ुगाँ ,जुनूँ की हद जानता नहीं है

ऐसा नहीं है कोई जो इश्क़ का न मारा
जिसकी न आँख नम हो जो ग़मजदा नहीं है

उल्फ़त का यह सफ़र भी कैसा अजब सफ़र है!
जो एक बार जाता वो लौटता नहीं है

किसके ख़याल में तुम, यूँ गुमशुदा हो ’आनन’?
उल्फ़त की मंज़िलों का तुमको पता नहीं है

-आनन्द

रेड्डी बन्धुओं का वीभत्स खनन भ्रष्टाचार – मजबूर येद्दियुरप्पा, बेबस मनमोहन सिंह… …Reddy Brothers Karnataka, Mining Scam

पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक में खनन माफ़िया और अरबों के लौह अयस्क घोटाले को लेकर घमासान मचा हुआ है। कर्मठ और ईमानदार छवि वाले जस्टिस संतोष हेगड़े ने लोक-आयुक्त के पद से इस्तीफ़ा भी दे दिया था, जो उन्होंने आडवाणी की मनुहार के बाद वापस ले लिया, मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा भी इस सारे झमेले से काफ़ी परेशान हैं लेकिन कुछ नहीं कर पा रहे हैं। पूरे मामले के पीछे सदा की तरह “बेल्लारी के कुख्यात” रेड्डी बन्धु हैं, जिन्हें भाजपा सहित सभी पार्टियाँ निपटाना चाहती हैं, लेकिन उनकी ताकत से सभी भयभीत और आशंकित भी हैं।

आईये देखते हैं कि आखिर मामला क्या है और रेड्डी बन्धु इतने ताकतवर कैसे हैं कि कोई उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पा रहा है – कर्नाटक के लोकायुक्त श्री संतोष हेगड़े ने पिछले कुछ माह से इन दोनों भाईयों के खिलाफ़ जाँच की है और पाया कि बिलिकेरे बन्दरगाह से 35 लाख टन का लौह अयस्क “गायब” कर दिया गया है। आप भी पढ़कर भौंचक हुए होंगे कि 35 लाख टन का लौह अयस्क कैसे गायब हो सकता है? लेकिन ऐसा हुआ है और भारत जैसे महाभ्रष्ट देश में कुछ भी सम्भव है। आपको याद होगा कि जादूगर पीसी सरकार ने एक बार ताजमहल “गायब” कर दिया था, लेकिन रेड्डी बन्धु उनसे भी बहुत बड़े जादूगर हैं, इन्होंने 35 लाख टन का अयस्क गायब कर दिया।

पहले आप यह जान लीजिये कि 35 लाख टन लौह अयस्क के मायने क्या हैं – न्यूयॉर्क की प्रसिद्ध एम्पायर स्टेट बिल्डिंग का वज़न अंदाजन साढ़े तीन लाख टन होगा, दूसरे शब्दों में कहें तो रेड्डी बन्धुओं ने लगभग दस एम्पायर स्टेट बिल्डिंग को हवा में “गायब” कर दिया है, कहाँ लगते हैं पीसी सरकार? मोटे तौर पर इसकी कीमत का अंदाज़ा भी लगा लेते हैं – आज की तारीख में लौह अयस्क की अंतर्राष्ट्रीय कीमत लगभग 145 डालर प्रति टन है, यदि इसे हम 130 डालर भी मान लें और इसमें से 30 डालर प्रति टन ट्रांसपोर्टेशन और अन्य खर्चों के तौर पर घटा भी दें तब भी 35 लाख टन के 100 डालर प्रति टन के हिसाब से कितना हुआ? चकरा गया दिमाग…? अभी रुकिये, अभी और चक्कर आयेंगे जब आपको मालूम पड़ेगा कि विधानसभा में मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा ने लिखित में स्वीकार किया है कि सन् 2007 में (जब भाजपा सत्ता में नहीं थी) 47 लाख टन लौह अयस्क का अवैध खनन और तस्करी हो चुकी है। है ना मेरा भारत महान…? तो ये है रेड्डी बन्धुओं की “असली ताकत”, मधु कौड़ा तो इनके सामने बच्चे हैं। “अथाह और अकूत पैसा” ही सारे फ़साद की जड़ है, रेड्डी बन्धुओं की जेब में कई विधायक हैं जो जब चाहे सरकार गिरा देंगे, ठीक उसी तरह जैसे कि विजय माल्या और अम्बानी की जेब में कई सांसद हैं, जो उनके एक इशारे पर केन्द्र सरकार को हिला देंगे, सो इन लोगों का कभी कुछ बिगड़ने वाला नहीं है चाहे कई सौ की संख्या में ईमानदार येदियुरप्पा, मनमोहन सिंह, शेषन, खैरनार, किरण बेदी आ जायें। बहरहाल, वापस आते हैं इस केस पर…

मामले की शुरुआत तब हुई, जब एक और ईमानदार फ़ॉरेस्ट अफ़सर आर गोकुल ने कर्नाटक के बिलिकेरे बन्दरगाह पर 8 लाख टन का लौह अयस्क अवैध रुप से पड़ा हुआ देखा, उन्होंने तत्काल विभिन्न कम्पनियों और रेड्डी बन्धुओं पर केस दर्ज कर दिया। नतीजा – जैसे 35 लाख टन लौह अयस्क गायब हुआ, आर गोकुल को भी दफ़्तर से गायब कर दिया गया, उन्हें गायब किया रेड्डी बन्धुओं के खास व्यक्ति यानी “पर्यावरण मंत्री” जे कृष्णा पालेमर ने, जिन्होंने अपने मालिकों की शान में गुस्ताखी करने वाले भारत सरकार के नौकर को निलम्बित कर दिया। लोकायुक्त श्री हेगड़े जो कि अपने ईमानदार अफ़सरों का हमेशा पक्ष लेते रहे हैं, उन्होंने मामले में दखल दिया, और कर्नाटक सरकार को रेड्डी बन्धुओं पर नकेल कसने को कहा। अब भला येद्दियुरप्पा की क्या हिम्मत, कि वे रेड्डी बन्धुओं के खिलाफ़ कुछ कर सकें, उन्होंने मामले को लटकाना शुरु कर दिया। खुद येद्दियुरप्पा भले ही कितने भी ईमानदार हों, रेड्डी बन्धुओं के दबाव में उन्हें उनके मनचाहे मंत्री और अफ़सर रखने/हटाने पड़ते हैं, पिछली बार हुए विवाद में येद्दियुरप्पा सार्वजनिक रुप से आँसू भी बहा चुके हैं, लेकिन यह बात उन्हें भी पता है कि जिस दिन रेड्डी बन्धुओं का बाल भी बाँका हुआ, उसी दिन कर्नाटक सरकार गिर जायेगी, जैसे पिछली कुमारस्वामी सरकार गिरी थी, जब उन्होंने रेड्डी बन्धुओं से पंगा लिया था।

खैर, बार-बार आग्रह करने के बावजूद जब कर्नाटक सरकार ने हेगड़े की बातों और सुझावों पर अमल नहीं किया तो हताश और निराश हेगड़े साहब ने गुस्से में इस्तीफ़ा दे दिया, और भूचाल आ गया। कांग्रेस-जद(एस) को मुद्दा मिल गया और उन्होंने विधानसभा में धरना दे दिया, मानो वे सारे के सारे दूध के धुले हुए हों और भाजपा सरकार के दो साल के कार्यकाल में ही सारा का सारा लौह अयस्क गायब हुआ हो, इस नौटंकी में देवेगौड़ा और उनके सुपुत्र से लेकर कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री धर्मसिंह और एस एम कृष्णा जैसे दिग्गज भी परदे के पीछे से खेल कर रहे हैं, जबकि इन सभी ने रेड्डी बन्धुओं की कृपा से करोड़ों का माल बनाया है, मीडिया भी इसे इतनी हवा इसीलिये दे रहा है क्योंकि यह भाजपा से जुड़ा मामला है, वरना मीडिया ने कभी भी सेमुअल रेड्डी के खनन घोटालों पर कोई रिपोर्ट पेश नहीं की। खैर जाने दीजिये… हम तो इस बात को जानते ही हैं कि मीडिया किसके “पंजे” में है और किसके हाथों बिका हुआ है। जस्टिस हेगड़े ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि चूंकि गोआ, विशाखापत्तनम और रामेश्वरम बन्दरगाह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते, इसलिये वहाँ की जाँच का जिम्मा सम्बन्धित राज्य सरकारों का है (और इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है), परन्तु मीडिया ने सिर्फ़ कर्नाटक की सरकार को अस्थिर करने की योजना बना रखी है।

जस्टिस हेगड़े ने मुख्यतः इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करवाया कि समुद्र तट से मीलों दूर अवैध खदानों में अवैध खनन हो रहा है। खदान से बन्दरगाह तक पहुँचने के बीच कम से कम 7 जगह प्रमुख चेक पोस्ट आती हैं, लेकिन किसी भी चेक पोस्ट पर लौह अयस्क ले जा रहे एक भी ट्रक की एण्ट्री नहीं है, ऐसा तभी सम्भव है जब पूरी की पूरी मशीनरी भ्रष्टाचार में सनी हुई हो, और भारत जैसे देश में यह आसानी से सम्भव है। जस्टिस हेगड़े ने अपने बयान में कहा है कि 35 लाख टन अयस्क की तस्करी रातोंरात होना सम्भव ही नहीं है, यह पिछले कई वर्षों से जारी है। मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा कह रहे हैं कि वे पिछले दस साल में हुई लौह अयस्क की खुदाई और तस्करी की पूरी जाँच करवायेंगे, लेकिन जब पिछले कुछ माह में सात-सात चेक पोस्टों से गुज़रकर बन्दरगाह तक माल पहुँचाने वाले ट्रकों की ही पहचान स्थापित नहीं हो पा रही तो दस साल की जाँच कैसे करवायेंगे? कौन सी एजेंसी यह कर पायेगी? राज्य की भ्रष्ट मशीनरी, जिसे रेड्डी बन्धुओं ने पैसा खिला-खिलाकर “चिकना घड़ा” बना दिया है, वह किसी लोकायुक्त, सीबीआई या पुलिस को सहयोग क्यों करने लगी? येद्दियुरप्पा कितने भी ईमानदार हों, जब पूरा सिस्टम ही सड़ा हुआ हो तो अकेले क्या उखाड़ लेंगे? बेल्लारी आंध्रप्रदेश की सीमा से लगा हुआ है, यहाँ से सोनिया गाँधी (और पहले भी कांग्रेस ही) जीतती रही है, और रेड्डी बन्धुओं के सेमुअल रेड्डी और जगनमोहन रेड्डी से “मधुर सम्बन्ध” सभी जानते हैं।

कर्नाटक सहित भारत के सभी राज्यों में लोकायुक्त को सिर्फ़ “बिजूके” की तरह नियुक्त किया गया है, उन्हें कोई शक्तियाँ नहीं दी गईं, जबकि 1984 से ही इसकी माँग की जा रही है, न तो एस एम कृष्णा और न ही धर्मसिंह, किसी ने इस पर ध्यान दिया, क्योंकि उनकी भी पोल खुल सकती थी। उधर कांग्रेस के “दल्ले” राज्यपालों की परम्परा को निभाते हुए हंसराज भारद्वाज ने अपनी “चादर से बाहर पैर निकालकर” येदियुरप्पा को मंत्रियों पर कार्रवाई करने की सलाह दी है, जो कि राज्यपाल का कार्यक्षेत्र ही नहीं है। लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि देश को गहरे नीचे गिराने में कांग्रेस ने तो 1952 से ही महारत हासिल कर ली थी, तो उसकी संस्कृति में पले हुए भारद्वाज भी बूटा सिंह, रोमेश भण्डारी, सिब्ते रजी जैसी हरकत नहीं करेंगे, तो कौन करेगा? ये बात अलग है कि भारद्वाज साहब में हिम्मत नहीं है कि वे मनमोहन सिंह से शरद पवार, ए राजा और कमलनाथ को मंत्रिमण्डल से बाहर करने को कह सकें, क्योंकि आज जैसे येदियुरप्पा मजबूर हैं, वैसे ही मनमोहन सिंह भी बेबस हैं… यही इस देश की शोकांतिका है।

(भाग-2 में जारी रहेगा……)

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>रौशनी

>

दूर कही से आती हुई एक किरण दिखती हे
अनजाने टेड़े मेड़े रास्तो पे मंजिल दिखती हे
वो जहान दिखता हे जहाँ  खुशिया मिलती हे
वो  बाग़ दिखता हे जहाँ कलिया खिलती हे

रौशनी ही रौशनी हे
आँखें भी हँसती हे
तूफ़ान आ सकता हे
पर ये नहीं डरती हे

तारे भी गाते हे साथ साथ
और पंछी भी करने लगे हे बात
हवां भी बहती हे साथ साथ
और राहे बन रही अपने आप

रौशनी ही रौशनी हे
और एक  खुशी की हँसी हे
कुछ हल्का डर सा भी हे
पर ये ना रुकी हे

http://twitter.com/arpitgoliya

>दोहा सलिला: संजीव ‘सलिल’

>दोहा सलिला:

संजीव ‘सलिल’
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दिव्या भव्य बन सकें, हम मन में हो चाह.
‘सलिल’ नयी मंजिल चुनें, भले कठिन हो राह..
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प्रेम परिश्रम ज्ञान के, तीन वेद का पाठ.
करे ‘सलिल’ पंकज बने, तभी सही हो ठाठ..
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कथनी-करनी में नहीं, ‘सलिल’ रहा जब भेद.
तब जग हमको दोष दे, क्यों? इसका है खेद..
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मन में कुछ रख जुबां पर, जो रखते कुछ और.
सफल वही हैं आजकल, ‘सलिल’ यही है दौर..
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हिन्दी के शत रूप हैं, क्यों उनमें टकराव?
कमल पंखुड़ियों सम सजें, ‘सलिल’ न हो बिखराव..
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जगवाणी हिन्दी हुई, ऊँचा करिए माथ.
जय हिन्दी, जय हिंद कह, ‘सलिल’ मिलाकर हाथ..
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छंद शर्करा-नमक है, कविता में रस घोल.
देता नित आनंद नव, कहे अबोले बोल..
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कर्ता कारक क्रिया का, करिए सही चुनाव.
सहज भाव अभिव्यक्ति हो, तजिए कठिन घुमाव..
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बिम्ब-प्रतीकों से ‘सलिल’, अधिक उभरता भाव.
पाठक समझे कथ्य को, मन में लेकर चाव..
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अलंकार से निखरता, है भाषा का रूप.
बिन आभूषण भिखारी, जैसा लगता भूप..
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रस शब्दों में घुल-मिले, करे सारा-सम्प्राण.
नीरसता से हो ‘सलिल’, जग-जीवन निष्प्राण..
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>संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या – तृतीय: अभ्‍यास:

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   प्रिय बन्‍धु

संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या का  तीसरा अभ्‍यास आज प्रकाशित किया है
इसका लिंक नीचे दे रहा हूँ ।

संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या – तृतीय: अभ्‍यास:


आपलोगों की संस्‍कृत में श्रद्धा यूँ ही बनी रहे इसी आशा के साथ ।।

भवदीय: – आनन्‍द:

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