>क्या हक है आपको वैसा व्यवहार दूसरे प्राणी के साथ करने का जो आप अपने लिए नहीं चाहते ??

>सबसे पहले तो शाहनवाज़ भाई का बहुत-२ शुक्रिया अदा करना चाहूँगा मेरे अनुरोध को स्वीकार करके ब्लॉग संसद पर स्वंत्रता दिवस के सन्दर्भ में एक बहुत ही बेहतरीन पोस्ट डालने के लिए,दरअसल हुआ यूँ की मेरा इन्टरनेट कनेक्शन बंद हो गया था और सोमवार से पहले उसके खुलने की उम्मीद नहीं थी ,तो इसलिए मैंने शाहनवाज़ भाई से फोन पर अनुरोध किया की ब्लॉग संसद पर सभी पाठकों को स्वंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में बधाई देने स्वरुप आप एक पोस्ट लिखें जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया , मेरी तरफ से भी आप सबको स्वंत्रता दिवस की बहुत-२ बधाई एवं शुभकामनायें

अब इस पोस्ट पर आते हैं 


कल्पना कीजिये कि आप अपने घर पर आराम से बैठे हुए television देख रहें हैं ,आजकल इंसानों के रहस्मय ढंग से गायब होने का मुद्दा बहुत चर्चा में है , television पर खबर आ रही है कि intelligense agencies ने इसका कारण पता लगा लिया है ,इंसानों के गायब होने के पीछे दूसरे ग्रह के जीवों का हाथ है जिन्हें कि हम सब aliens यानी के परग्रही कहते हैं ,समाचारों में ये भी बताया जा रहा है कि वे परग्रही हर मामले में हमसे बहुत अधिक बुद्धिमान ,उन्नत और शक्तिशाली हैं और इंसानों और परग्रहियों के बीच इस घटना पर संपर्क और संवाद भी स्तापिथ हो चुका है और उस संवाद में परग्रहियों ने ये माना है कि हाँ इंसानों के गायब होने के पीछे हमारा ही हाथ है ,जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उनके ग्रह के वैज्ञानिकों ने ये खोज कि है कि इंसानी मांस खाने से उनके शरीर को बहुत से ज़रूरी तत्वों कि पूर्ती हो जाती है जो कि उनका पूर्ववर्ती भोजन नहीं कर पाता था ,साथ ही इंसान का मांस अत्यंत स्वादिष्ट और पौष्टिक भी है और इसके साथ-२ हमारे दांतों कि बनावट और पाचन-तंत्र भी ऐसा है कि ये इंसानी मांस को बेहद आसानी से पचा लेता है और हमें बेहद शक्ति और उर्जा प्रदान करता है





अब मैं आप सबसे पूछता हूँ कि अपने दिल पर हाथ रखकर बताइये कि आप में से कितने ऐसे लोग हैं जो कि उन परग्रहियों के तर्कों को जायज़ मान लेंगे और मान लेंगे कि हाँ क्योंकि वो हर मामले में हमसे सर्वश्रेष्ठ हैं ,हमसे अधिक बुद्धिमान और शक्तिशाली हैं तो उन्हें हमें मारकर खाने का अधिकार है और हमें तथा हमारे परिवारजनों को खुशी-२ अपने आपको उन्हें सौंप देना चाहिए

ये मैं इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि ज़्यादातर मांसाहारी समर्थक लोगों का सबसे बड़ा तर्क यही होता है कि क्योंकि इंसान सबसे सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान जीव है तो उसे जैसे मर्ज़ी हक है जीने का ,संसाधनों को प्रयोग करने का और ये सब उसी के लिए बने हैं

तो जनाब आपके संसाधनों को इस जैसे मर्ज़ी हक के मुताबिक प्रयोग करने के कारण ही आज पूरी दुनिया पर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा मंडरा रहा है और साथ ही मेरा आपसे एक सवाल है कि आज इंसान सबसे सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान जीव है ,अगर कल को इंसान से सर्वश्रेष्ट और बुद्धिमान जीव इस पृथ्वी पर आ जाएँ और वे भी यही तर्क दें कि हम सबसे सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान हैं तो इसलिए हमें तुम्हे मारकर खाने का हक है तो क्या उनकी इस दलील को आप मान लेंगे ?  हो जायेंगे आप तैयार अपने आप को और अपने बीवी बच्चों को उनके सुपुर्द करने के लिए ताकि वे आपको मारकर और पकाकर खा सकें ?

सच में मेरे मुताबिक तो इंसानियत के नाम पे धब्बा है ये मांसाहार और जीव-हत्या या फिर बलि आदि , हम खुद को एक सुई भी चुभायें तो दर्द होता है और बेजुबान और निरीह पशुओं को सिर्फ इसलिए क़त्ल कर दिया जाए कि वे खाने में बहुत स्वादिष्ट लगते हैं और हमारे शरीर को प्रोटीन आदि प्रदान करते हैं ,शर्मनाक है ये सब

मुझे तो लगता है कि इन सब तर्कों के बल पर एक दिन ऐसा आएगा जब हम इंसानी मांस को भी जायज़ ठहरा देंगे और इंसान इंसान को ही मारकर खाने लगेगा 




प्रतिदिन हज़ारों जानवरों को बूचड़खानों में बड़ी ही निर्ममता के साथ क़त्ल कर दिया जाता है ,जिस प्रकार हमें दर्द होता है उसी प्रकार प्रत्येक जीव को भी दर्द होता है ,सिर्फ अपनी जीभ के स्वाद के लिए किसी जीव को मारना कैसे जायज़ है ?  मुझे तो समझ नहीं आता कि मांसाहारियों कि आत्मा उन्हें इजाजत कैसे देती है किसी दूसरे प्राणी को खाने के लिए ?  ,क्या उनके अंदर एक बार भी आवाज़ नहीं आती कि इंसान होकर भी तुम ये राक्षसी कृत्य कर कैसे सकते हो ?

वैज्ञानिकों ने अपने शोधों के ज़रिये ये सिद्ध किया है कि ऐसा कोई विटामिन ,कोई प्रोटीन और कोई मिनरल नहीं है जो कि हमें शाकाहार से प्राप्त ना हो सकता हो ,और अगर एक बार के लिए हम मान भी लें कि चलिए साहब ऐसा कोई तत्व है भी जो कि हमें शाकाहार से प्राप्त ना होता हो तो भी उसके लिए बेचारे निरपराध जीवों कि हत्या को कैसे उचित माना जा सकता है ? ,क्या हम इसी आधार पर किसी और जीव को अपनी हत्या करने कि आजादी दे देंगे ?

WHO ( World Health Organisation ) कि रिपोर्ट ये बात कहती है कि मांसाहार से 159 तरह कि बीमारियाँ होने का खतरा है जिनमें से प्रमुख हैं हृदयरोग, उच्च रक्तचाप और किडनियों का खराब होना

कुछ समय पहले मैं एक चैनल पे एक debate देख रहा था इसी मुद्दे पे जिसमें कि एक महाशय द्वारा तर्क दिया गया कि अगर जीवों को मारकर नहीं खाया जाएगा तो उनकी संख्या बहुत अधिक बढ़ जायेगी और फिर ये धरती पूरी तरह से उनसे ही भर जायेगी और मनुष्य के अस्तित्व पर खतरा खड़ा हो जाएगा तो इसका बहुत ही बढ़िया और आत्मा को झकझोर देने वाला जवाब दिया उस debate में मौजूद साध्वी भगवती जी ने कि-मेरे भाई इसके लिए प्रकृति ने अपने आप ही व्यवस्था कि हुई है शेर ,बाघ,लकडबघा,गिद्ध, मगरमच्छ आदि जीवों को उत्पन करके और साथ ही एक बात बताओ ,जनसख्या तो आज मनुष्यों कि भी बहुत अधिक बढ़ गई है इस पृथ्वी पे और लगातार बढती जा रही है तो क्या इसका मतलब मनुष्यों को एक दूसरे को खाना शुरू कर देना चाहिए ? इस पर उन महाशय कि बोलती बंद हो गई

अब कुछ मांसाहार समर्थक इस तर्क को भी आगे ले आते हैं कि साहब हिंसा तो वनस्पति आहार अर्थात शाकाहार में भी है ही ,वैज्ञानिकों ने ये सिद्ध किया है कि पेड़-पौधों में भी जीवन है फिर हिंसा तो इसमें भी हुई

तो इसका सुज्ञ जी के द्वारा बहुत ही सुन्दर जवाब दिया गया कि- ” हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है ही, पर विवेक यह कहता है, जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। “

बड़े ही दुःख की बात है की आज भारत में भी पेट को कब्रिस्तान बनाने वाले ये कत्लखाने जगह-२ खुले हुए हैं ,बताइये ये तो वो देश है जिसमें छत्रपति शिवाजी ने जब एक कसाई को एक गाय को कष्ट पहुंचाते हुए देखा तो उसी समय अपनी तलवार से उसका सिर काट दिया था लेकिन आज उसी देश में ऐसे लोगों का सिर काटने कि बजाये हज़ारों गायों को प्रतिदिन काटा जा रहा है , मैं यहाँ पर किसी धर्मविशेष की भावना को प्रदर्शित नहीं कर रहा हूँ बल्कि मेरा तो मानना है कि जो लोग सिर्फ गौवध को बंद करवाने कि बात करते हैं उन्हें इसकी बजाये सभी जीव-जंतुओं कि हत्या पर रोक लगाने कि मांग करनी चाहिए चाहे वो आहार के लिए कि जाती हो या फिर बलि के नाम पर कामाख्या देवी के मंदिर में भैसों के सिर काटने कि कुप्रथा हो या कुर्बानी को आधार बनाकर हज़ारों बकरों को बकरीद के नाम पर मारा जाता हो ,हर प्रकार कि जीव-हत्या बंद कि जाए

इन बलि,कुर्बानी आदि कि प्रथा और परम्पाराओं के नाम पर अन्य प्राणियों कि जगह क्यों ना आपकी और आपके बच्चों कि बलि दी जाए ताकि आपको भी उस दर्द का अहसास हो जिससे कि इन बेजुबान ,लाचार ,निरीह और निर्दोष प्राणियों का गुजरना पड़ता है, जो व्यवहार आप अपने लिए नहीं चाहते क्या हक है आपको वैसा व्यवहार दूसरे प्राणी के साथ करने का ?

इस ” ब्लॉग संसद “पर मैं हिन्दुस्तान में हर प्रकार के मांस पर चाहे वो गाय का मांस हो ,सूअर का मांस हो ,बकरे का मांस हो ,मुर्गे का मांस हो आदि आदि हर प्रकार के मांसाहार पर और जीव-हत्या पर चाहे वो पुरानी परम्पराओं का हवाला देके कि जाती हो बलि के नाम पर या फिर कुर्बानी के नाम पर , हिन्दुस्तान में हर प्रकार के मांसाहार और जीव-हत्या पर प्रन्तिबंध लगाने का प्रस्ताव रखता हूँ

और साथ ही जो भी ऐसा करता पकड़ा जाए फिर उसे भी मृत्युदंड दिया जाए ताकि उसे भी पता चले कि इस सृष्टि में सिर्फ उसे ही जीने का अधिकार नहीं बल्कि दूसरे जीवों को भी जीने का उतना ही अधिकार है और जब उस अधिकार पर चोट कि जाती है तो कैसा लगता है

अब ये प्रस्ताव आप सबके समक्ष इस संसद में बहस के लिए प्रस्तुत है , आप सब इस पर अपने विचार रखें और मतदान के रूप में अपनी सहमति अथवा असहमति दर्ज करवायें यही आप सबसे प्रार्थना है

धन्यवाद

महक

67 Comments

  1. August 16, 2010 at 4:55 pm

    >माफ करें !जब तक मैं खुद खाना नहीं छोड़ देता इस पर मत ,सहमती ,असहमति ,देने का हक मुझे नहीं नहीं बनता |मै विड्राल करता हूँ |

  2. August 16, 2010 at 6:25 pm

    >bahut achhe vichar hai aapke, nishchay hi swagat yogya hai, par ek bat main kahana chahata hoo ki aapke vichar ki adami adami ko nahi khata hai ye galat hai, nagaland, asam, dargling, tamilnadu ke kuch area aur bhi aise kai state hai aaj bhi insan ko khaya jata hai. lekin mai aapki is bat se purntah sahamat hoo ki pasudhan ki Hatya band honi chahiye, phir chahe wo kisi bhi pasu ho, pakshi ho ya koi bhi ho.mai nahi janta ki aap mere is vichar se sahamat hai ya nahi.

  3. August 16, 2010 at 6:46 pm

    >माननीय दर्शन जी जैसा कुछ मनोस्थिति मेरी भी है. जब तक मई पूर्णतयः शाकाहारी नहीं बन जाता ,,,,मुझे कुछ भी कहने का हक़ नहीं बनता. वैसे मैंने सबकुछ छोड़ दिया है लेकिन "फिश" नहीं बंद कर पाया.

  4. August 17, 2010 at 3:36 am

    >bahut hi umda prastutihttp://sanjaykuamr.blogspot.com/

  5. August 17, 2010 at 5:55 am

    >हर जगह पर केवल जीभ के स्वाद के लिये ही मांस नहीं खाया जाता। जहां शाकाहार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं है, वहां के रहवासी क्या खायेंगें।समुद्र किनारे बसे शहरों, गांवों का मुख्य भोजन समुद्री खाना (Sea Food) ही है और उनका आजीविका का मुख्य साधन भी यही है। इसी तरह जंगलों, पहाडों में रहने वाले लोगों का मांसाहार के बिना गुजारा मुश्किल होता है। जहां दूध और दालें वगैरा मुश्किल से उपलब्ध हैं, वहां शरीर के लिये आवश्यक तत्त्वों, प्रोटीन, विटामिन आदि की पूर्ति मांस से ही हो पाती है। जिस क्षेत्र में जिस भोजन की उपलब्धता प्रचुर है, यानी मांग के अनुसार पूर्ति है। वहां वही (शाकाहार या मांसाहार) ज्यादा खाया जाता है।मांसाहारी भोजन पर कानूनन प्रतिबन्ध लगाये जाने के प्रस्ताव से असहमति दर्ज करें। हाँ बलि, कुर्बानी आदि के बारे में कुछ नहीं कहूंगा, यहां आस्था का सवाल है। और आस्था में तो पता नहीं क्या-क्या होता है।प्रणाम स्वीकार करें

  6. August 17, 2010 at 6:53 am

    >आप सब से सहमत हूँ ।मैं तो निरा शाकाहारी हूँ और मॉंसाहार के नाम से भी मुझे नफरत है मगर इस बात पर सहमत हूँ कि वे क्षेत्र जहाँ माँसाहार ही उपलब्‍ध हैं वहाँ के लोग कैसे बंद कर पाएँगे ।किन्‍तु प्रिय अंतर सोहिल जी आप को ये बताना चाहूँगा कि महक जी का तात्‍पर्य केवल उन लोगों के लिये हैं जो खुद को पुष्‍ट रखने के लिये माँसाहार करते हैं !मेरी इस बात से तो आप जरूर सहमत होंगे कि अधिकतर लोग पर्याप्‍त मात्रा में शाकाहार के उपलब्‍ध होने पर भी माँसाहार करते हैं ।और हाँ माँसाहार शाकाहार से कहीं ज्‍यादा मंहगा भी है और आजकल तो लोगों का शौक बनता जा रहा है माँसाहार ।अब जरा सोचिये कि अपनी शौक के लिये कोई आपके या हमारे परिवार के किसी सदस्‍य की हत्‍या कर दे तो कैसा लगेगा ।बस ठीक यही बात कहना चाहते हैं प्रिय महक जी ।महक जी बहुत धन्‍यवाद इस उदात्‍त सोंच के लिये ।

  7. August 17, 2010 at 10:21 am

    >मैं अभिभुत हूँ,इमानदार प्रतिक्रिया देनेवाले श्री दर्शन जी,श्री प्रकाश गोविंद जी,श्री अन्तर सोहिल जी,कि जिस का पूर्णतः त्याग हम नहिं कर पाये हैं, प्रतिबंध का समर्थन किया जाय। आभार आपका।अहिंसा के प्रसार के रूप में आपका प्रस्ताव स्वागत योग्य है,और मैं उसका पूर्ण समर्थन करता हूं।पर यह मामला शाकाहार व अहिंसा दोनों के लिये बडा सम्वेदनशील है।अहिंसा पालन प्रतिबंधो (जबर्दस्ती)से सम्भव नहिं, प्रतिबंध दोषरहित उपाय नहिं है, इसका भी हश्र मद्य निषेध की तरह (जैसे चोरी से जहरीली शराब बिकने के मामले), ऐसा हुआ तो हिंसा के साथ चोरी भी जुड जायेगी और स्वास्थय भी दांव पर लग जायेगा।

  8. August 17, 2010 at 11:06 am

    >हिंसा तो सर्वथा अनुचित है और हर व्यक्ति को शाकाहारी बनने का प्रयास जरूर करना चाहिए क्योकि शाकाहार इंसानियत के ज्यादा अनुकूल है और मांसाहार इसके प्रतिकूल | लेकिन आजकल ऐसे-ऐसे शाकाहारी हैं जो किसी राक्षस से भी कम नहीं उदहारण के लिए शरद पवार इसने न जाने कितने गरीबों का खून चूसने और उसे भूखे मारने का काम किया है ,आज हम सब को ऐसे ड्रेकुला से देश और समाज को बचाने का प्रयास सबसे पहले करना होगा | ऐसे लोगों के वजह से देश और समाज हिंसक होता जा रहा है …

  9. August 17, 2010 at 12:17 pm

    >मैं मांसाहार नहीं करता क्यूंकि सूट नहीं करता , लेकिन मांसाहार को मानवता के लिए ज़रूरी मानता हूँ . वेद , रामायण , मनु स्मृति , बाइबिल कुरान और गुरु ग्रन्थ साहिब में भी मांसाहार की अनुमति है . विश्व की अधिसंख्या मांसाहारी है . हमारी फ़ौज मांसाहार करती है . आप चाहें तो भारत जी की सेना को भरद्वाज ऋषि जी के आश्रम में देख लीजिये की उन्होंने क्या खाया ? जो लोग न खाना चाहें न खाएं लेकिन दूसरों के खाने में मीन मेख निकलने का औचित्य न budhi से साबित है और न परम्परा से . आप चाहें तो बाद रमजान इस पर मुझ से तर्क मांग सकते हैं .मेरे गुरु जी श्री गजेन्द्र कुमार पंडा उड़ीसा के barahman हैं लेकिन मछली खाते हैं मगर मुर्गा नहीं खा सकते . सभी हिन्दू भी शाकाहारी नहीं हैं .

  10. August 17, 2010 at 12:18 pm

    >आप चाहें तो भरत जी की सेना को भरद्वाज ऋषि जी के आश्रम में देख लीजिये की उन्होंने क्या खाया ?

  11. soni garg said,

    August 17, 2010 at 12:23 pm

    >ये सही है की जीव हत्या करना गलत है अब चाहे वो पेट की लिए की गयी हो या फिर किसी आस्था के लिए ! लेकिन इस पर क़ानूनी प्रतिबन्ध लगाना एक बढ़ी बात है और ये संभव होती भी कम ही नज़र आती है ! दरअसल इस सबसे कुछ लोगो का रोज़गार जुड़ा हुआ है कई घरो की रोटी भी इस तरह के व्यापार से चलती है तो इसलिए अचानक इसे बंद नहीं किया जा सकता ! और वैसे भी मांसाहार छोड़ना या अपनाना किसी का खुद का फैसला है ठीक उस तरह जिस तरह की किसी भी तरह का नशा ! मांसाहार छोड़ने की लिए स्वेक्छा की ज़रूरत है और एक बार ऐसा हो गया तो धीरे धीरे करके ये मांसाहार अपने आप बंद हो जायेगा वैसे भी आजकल ज़यादातर लोग शाकाहार पर जोर देने लगे है ! और हाँ अगर मेरी राय की बात है तो मैं तो यही कहूँगी की जितनी जल्दी मांसाहार को बंद किया जा सके उतना ही अच्छा होगा ! वैसे भी खुले में लगे इनके स्टाल बीच बाज़ार हलाल होते जानवर देखना हमेशा परेशानी ही देते है !

  12. August 17, 2010 at 1:10 pm

    >मांसाहार पर प्रतिबन्ध उचित नहीं. हाँ जितना संभव हो मांसाहार कम से कम करना चाहिए.

  13. Shah Nawaz said,

    August 17, 2010 at 1:28 pm

    >मैं सुज्ञ जी की बात से पूर्णत: सहमत हूँ, जितना हिंसा से बचा जाए उतना ही बेहतर है. "हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है ही, पर विवेक यह कहता है, जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये।"और मैं स्वयं भी बहुत थोड़ी मात्र में ही इसका उपयोग करता हूँ. इसमें डॉ ने भी मदद की, मुझे रेड मीट मना करके.वैसे मेरा भी यह यह मानना है की आहार चाहे शाकाहार हो या मांसाहार, दोनों ही एक ही तरह के हैं. अर्थात दोनों में ही किसी जीव के जीवन का अंत होता है. हाँ फलाहार अथवा दालों के खाने की अलग बात है.और यह बात विज्ञान ही नहीं अपितु सभी धर्म ग्रंथो में है कि वनस्पति में भी जीवन होता है, वह भी महसूस करते हैं, सांस लेते हैं, भोजन करते हैं इत्यादि. अगर इस परिप्रेक्ष में सोचा जाए तो मांसाहार का विरोध करने से पहले इसका विकल्प खोजना आवश्यक है.

  14. August 17, 2010 at 1:37 pm

    >महक जी,वास्तव में तो प्रतिबंध से पहले जाग्रति लाना आवश्यक है।मांसाहार की उपयोगिता व आवश्यकता का भ्रमजाल हटाना आवश्यक है।आहार बेशक व्यक्तिगत स्वतंत्र पसंद है, पर उनकी पसंद को सुंदर सौमय सात्विक आधार दिया जा सकता है। ताकि वे सही चुने।शाकाहार को प्रचार की आवश्यकता ही नहिं है। क्यों कि मांसाहारियो के आहार में भी अधिकांश हिस्सा शाकाहार का ही होता है।जरूरत है कुतर्कों द्वारा मांसाहार के भ्रमित प्रचार का, तर्कबद्ध प्रतिकार किया जाय।मांसाहार का विरोध धर्मिक दृष्टिकोण से नहिं, बल्कि अहिंसा के दृष्टिकोण से लिया जाय। क्योंकि सभी धर्म 'अहिंसा'को प्रकट य अप्रकट रूप से मुख्य सिद्धांत मानते है।सोनी जी नें सही कहा…वैसे भी मांसाहार छोड़ना या अपनाना किसी का खुद का फैसला है ठीक उस तरह जिस तरह की किसी भी तरह का नशा ! इससे ऐसे ही संघर्ष व जागरण करना होगा जैसे नशे से।

  15. August 17, 2010 at 2:10 pm

    >आदरणीय सभी बंधुओं के विचारों से एक बात निकल कर आती है जिसे मैं पहले ही मानता हूँ; कि प्रकृति ने अपने सञ्चालन के लिए दो शक्तियां बनायीं हैं एक नकारात्मक और एक सकारात्मक | इसे बुरा न मानते हुए इस तरह भी समझ सकते हैं कि एक बुरी शक्ति और एक अच्छी शक्ति या एक आसुरी शक्ति और एक दैवीय शक्ति या एक तामसी शक्ति और एक सात्विक शक्ति | जब जिसका प्राबल्य होगा तब वाही प्रचलित होगा | लेकिन प्रकृति ने यह भी व्यवस्था बनायीं है कि सात्विक शक्ति का प्राबल्य अधिक रहे तो प्रकृति और प्राणी सभी सुखी और प्रसन्न रहते है | जब आसुरी शक्ति का प्राबल्य बढ़ता है तभी मांसाहार और अन्य कुकर्मों कि और लोगों कि प्रवृत्ति होती है इसके परिणाम स्वरूप सभी दुखी और असंतुष्ट रहते हैं तथा प्रकृति भी दुखी और असंतुष्ट होती है | जिसे हम प्राकृतिक प्रकोप के रूप में देखते हैं | ये बात केवल मांसाहार पर ही लागु नहीं होती वरन सभी क्रियाकलापों में देखने को मिल जाती है | अतः मैं मांसाहार का विरोध कर के सात्विक शक्तियों को आसुरी शक्तियों से प्रबल देखना चाहता हूँ |

  16. August 17, 2010 at 2:59 pm

    >पिछले साल ट्रेन में यात्रा के दौरान मैंने अपने लिए शाकाहारी भोजन मंगाया. मेरे सामने बैठे नकचढ़े यात्री ने बड़ी बेशर्मी से यह कहते हुए शाकाहारी भोजन मंगाया की 'वेज भी कोई खाने की चीज़ है!'यह बात और है की जनाब ने कुल जमा मुर्गे की एक टांग के साथ चार रोटी और एक कटोरा चावल दही सलाद के साथ खाया. इसका मतलब यह है कि लोग जिसे मूलतः मांसाहारी भोजन बताकर शाकाहारी भोजन को दोयम दर्जे का बताते हैं वे भी अपने आहार का लगभग ७५% भाग शाकाहार से ही प्राप्त करते हैं.

  17. August 17, 2010 at 3:25 pm

    >आज कल रोजा शुरू हो गए है ,तो समझो बकरों ,मुर्गो की शामत आ गयी है ..वसे मेरा विरोध स्रिफ रोजा को लेकर मासहार के प्रति विरोध नही है .मै साल भर होने वाले मॉसह़ार को लेकर है ,वह चाहे हिन्दू हो, मुस्लिम हो ,या को भी अपने स्वाद के लिये किसी जानवर की जान लेना कहाँ तक सही है ….वो भी धर्म के नाम पर .शरम है उस धर्म या इंसान परये सही है कि पेड़ पोधो में जान होती है वो भी सांस लेते है उनमे भी तंत्रिया तंत्र होता है पर वो एक समय के बाद समाप्त हो जाती है .जैसे जब सभी पक जाती है वो मार जाति है..फल पेड़ का तजने कि तीज होती है फल उसकी उपयोग कि चीज नही होती ….दाल ,घेहू ,जितना भी अनाज सब पेड़ पोधे कि तजने कि चीज होती है .घास यदि बढ जाये तो पक कर सड कर मार जाती है ..उसको रोज कटना उसकी भलाई में होता है..गाय का दूध अगर ना निकाला जाये तो तो गाय को कैंसर होने का खतरा होता हैआप अस्पताल जाओ और देखो जयादा तर बीमार आदमी मुस्लिम ही होते है क्योकि वो मॉस खाता है..कोई भी डोक्टर मॉस खाने को नही कहता .सब मना करते है (मुस्लिम को छोड़ कर )मॉस को पचाने वाली nas भी अब गायब हो चुकी है कभी जब बकरों को काटा मारा जा रहा हो तब उनके फट्फाते तडपने को देखिये …..यही हाल किसी भी जानवर का होता है यदि जानवर हमारी बोल नही सकते ,वो हमारी तरह से अपनी भावनाए नही व्यक्त कर सकते तो क्या हम उन्हें मार कर खा जाये जैसे हमारा घर होता है .हमारे माँ बाप होते है .बीवी बच्चे होते है .घर में अन्य सदस्य होते है …क्या यदि कोई हमारे परिवार के किसी सदस्य को नुक्सान पहुचाये .तो हमें कैसा फील होता है .बुरा ना फिर ये तो परमात्मा का परिवार है ये पूरा संसार उसका परिवार है .हम आप और ये जानवर ,फूल पोधे भी जब आप उन्हें मारते है तो क्या उसको बुरा नही लगता होगा .जब हमारे घर में किसी कि अकस्मात मौत हो जाती है तब हमें क्यों बुरा लगता है इस तरह के लोगो के घर में ही भगवान् किसी को मार कर खा जाते है ….जैसे आप जानवर को मार कर खा जाते है

  18. August 17, 2010 at 5:23 pm

    >आलोक मोहन जी आपके कहने का शायद यह मतलब है कि भेड़-बकरियां क्योंकि कटते समय बहुत दुःख झेलती है और हमें वह नज़र आता है इसलिए उनको काटना गलत है? और क्योंकि पेड़ सब्जियां को काटते समय उनका रोना चिल्लाना हमें नज़र नहीं आता इसलिए उनको काटना सही है?यह तर्क गलत ही नहीं बल्कि बेहद शर्मनाक है, क्या कोई अपने ऐसे बेटे को मार सकता है जो बोल नहीं सकता हो, चल नहीं सकता हो, देख नहीं सकता हो? मेरे ख्याल से तो उसके लिए ज्यादा दया भाव होना चाहिए. क्या मैं गलत कह रहा हूँ? शाहनवाज़ जी थोडा ही सही, लेकिन ठीक कह रहे हैं. मीट हो या सब्जी दोनों ही खाने की चीज़ हैं, दोनों को खाना ही हिंसा कहलाएगा. फिर आखिर क्यों दोनों को बिना किसी तर्क के अलग-अलग निगाह से देखा जा रहा है? तो क्या इंसान इनके सिवा भी कुछ खा सकता है? शाहनवाज़ जी, थोड़ी सी तारीफ के लिए सच कहने से क्यों बच रहे हो?

  19. August 17, 2010 at 5:58 pm

    >@शहरयार कुछ अकल भी लगा लिया करो फ़ल उनके पेडो की त्याग की चीज होती है ,वह वैसे भी गिरा देते है यही हाल सब्जी का होता है .उनमे कोई भी जान या सम्वेदना नही होती ,वो स्रिफ़ रेशा होता है यकीन ना हो तो किसी जीव वैज्ञानिक से पता कर लोइनको खाना कतई हिन्सा नही होती

  20. August 17, 2010 at 6:07 pm

    >वैसे भी मै मुस्लिम से अपील नही कर रहा …मै हिन्दू हू और उनसे ही अपील कर रहा हु .आज जो मुस्लमान धर्म के नाम पर कर रहे है उसका नतीजा भी भुगत रहे है

  21. August 17, 2010 at 6:10 pm

    >@महक जी आप भी किसको समझा रहे है .अपनो को तो block कर दिया आपने

  22. ajit gupta said,

    August 18, 2010 at 3:30 am

    >बहुत अच्‍छी पोस्‍ट, आप सभी को बधाई।

  23. August 18, 2010 at 3:33 am

    >एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

  24. Shah Nawaz said,

    August 18, 2010 at 3:48 am

    >भाई शहरयारमैं कभी भी किसी तारीफ इत्यादि के लालच में सच को झूट नहीं अथवा झूट को सच नहीं कहता हूँ. आपने ऐसा कहाँ देख लिया? अगर आपको लगता है की ऐसा हो तो मेरे भी संज्ञान में लाएं. शहरयार जी मैं बहुत ही उसूल परस्त हूँ, और ऊपर भी जो लिखा है वही लिखा है जो कि मैं सोचता हूँ. हालाँकि मैं मांसाहार और शाकाहार में अधिक फर्क नहीं समझता हूँ, लेकिन यह भी मानता हूँ की जितना हो सके मांसाहार से बचना चाहिए. और फिर मेरे धर्म में इसकी कोई पाबन्दी नहीं है. क्या आपके मुताबिक है? मेरे घर में सभी मुस्लिम हैं और अधिकतर शाकाहारी हैं. तो इसे आप क्या कहेंगे? मांसाहार को किसी भी धर्म विशेष से जोड़ना क्या सही है?

  25. August 18, 2010 at 6:00 am

    >Yes… ….killing of innocent animals should be banned. We should also avoid LEATHER MADE ITEMS because we kill animals mercilessly to get leather.

  26. August 18, 2010 at 6:15 am

    >शुक्रिया, शाह नवाज़ भाई,एक दम सही बात कह दी।मांसाहार को किसी भी धर्म विशेष से जोड़ना क्या सही है? लोग नहिं समझ रहे,मांसाहार का ठप्पा इस्लाम पर मंडित कर,उसे हिंसक साबित करने का प्रयास लोग कर रहे है, और नासमझ मुसलमान भी शाकाहार पर तीव्र प्रतिक्रिया देकर,यह जताने का प्रयास कर रहे हैं जैसे मांसाहार की रक्षा ही इस्लाम की रक्षा है।यह घोर विडम्बना है कि जो इस्लाम को बदनाम करने के लिये उसे क्रूरता, हिंसा,जेहाद व आंतक से जोड देना चाहते है,और उसके लिये मांसाहार की क्रुरता को आगे करते है। मुसलमान उन्ही का सहयोग क्या भरपूर सहयोग करते नज़र आते है। आश्चर्य है!!!

  27. August 18, 2010 at 8:42 am

    >यहां कुछ लिंक दे रहा हूं, जिन्हें देखकर आप कई तर्कों के समाधान पा सकते है।शाकाहार : उत्तम आहार -रामनिवास लखोटियाhttp://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2004/shakahar.htmमांसाहार नहीं, शाकाहार स्वास्थ्यकर है। सुशान्त सिंहलhttp://yaadonkaaaina.blogspot.com/2009/03/blog-post_9101.htmlशाकाहार – कुछ तर्क कुतर्क – अनुराग शर्माhttp://pittpat.blogspot.com/2008/09/blog-post_06.html

  28. August 18, 2010 at 9:12 am

    >महक जी, माफ करेंगे लेकिन मैं आपसे सहमत नहीं हूँ, आप मांसाहार को गलत बता रहे हैं, तर्क है हमें यह अधिकार नहीं है कि हम किसी जीव की हत्या करें| आपका तर्क सही ज़रूर है लेकिन व्यवहार में इसे लाना संभव नहीं है| भारत जैसे देश में, ऐसा कहते हुए आप उनलोगों को भूल गए जिनकी जिंदगी ही मांसाहार पर निर्भर है| जो लोग बंजारों की तरह रहते हैं, जिनका कोई ठिकाना नहीं है, जो घूम घूमकर अपनी जिंदगी बताते हैं वो लोग अगर आपके तर्क को मान कर चले तो क्या भूखे नहीं मर जायेंगे? आपने हर तर्कों का ज़वाब दिया लेकिन ये आपसे छूट गया| बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ शाकाहारी चीजों से ज्यादा सस्ता मांसाहार है तो वो इस तर्क को कैसे मान सकते हैं| आपने WHO की रिपोर्ट का हवाला दिया है, लेकिन आजकल ढूध में भी जहर मिल रहा है, सब्जियों में भी जहर की बात सामने आई है तो आखिर एक आम आदमी क्या करेगा? इसलिए सिर्फ मांसाहार को न खाने की बात की जाये तो यह अधूरा है, आपके पोस्ट में ठोस हल की कमी नज़र आ रही है| इसलिए संभव हो तो ठोस और तर्कों पर आधारित, वर्तमान भारतीय सामाजिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए आप एक हल दें|आपके पोस्ट में चिंता कम, अध्यात्म ज्यादा है|

  29. August 18, 2010 at 12:13 pm

    >यह टिप्पणी मैं उन लोगों के लिए लिख रहा हूँ जो मांस के लिए कटने वाले पशु और सब्जी के लिए कटने वाले किसी पौधे या वृक्ष के फल या पत्तों को एक समान ही मानते हैं | जो कि गलत है ;ये बात सच है कि वनस्पति किसी भी प्राणी की तरह जीवित रहने के लिए प्राणवायु (ऑक्सीजन) और धूप पर आधारित होते हैं; पर फिर भी उनमें और प्रत्यक्ष जीवित प्राणियों में कुछ अंतर होते हैं | और एक बात और, कि प्रकृति ने प्रत्येक प्राणी का खाद्य निर्धारित किया है जिसके अनुसार ही उसके पाचन संस्थान को बनाया गया है, दांतों और जीभ को बनाया गया है |अब मैं उनमें कुछ अंतर बताता हूँ कृपया ध्यान दें ; वनस्पतियों में प्राणियों की तरह हाथ-पांव, आँख-नाक-कान,मुहं-दांत-जीभ ,पेट,दिल- जिगर, हड्डी-खून-मांस इत्यादि नहीं होते | इस सबसे बड़ी बात ये कि उन्हें काटते समय उनमें उस तरह के हार्मोन्स का स्राव नहीं होता जैसा मांस वाले प्राणियों में पीड़ा के कारण वैज्ञानिकों ने बताया है | मांसाहारी प्राणी ( जिन्हें प्रकृति ने इसके लिए ही बनाया है ) केवल मांस ही खाते हैं वह वनस्पति नहीं खाते | इसी तरह शाकाहारी प्राणी केवल वनस्पति ही खाते हैं मांस नहीं | हाँ; कोई पागल हो जाये तो ये अलग बात है |

  30. Mahak said,

    August 18, 2010 at 4:44 pm

    >आप सबके द्वारा इस प्रस्ताव के समर्थन अथवा विरोध में अपने विचार रखने के लिए बहुत-२ धन्यवाद , कुछ बातें हैं जिनसे मैं सहमत नहीं हूँ और जिनका की जवाब देना चाहूँगा अगर आप सब बुरा ना मानें तो

  31. Mahak said,

    August 18, 2010 at 4:47 pm

    >@अन्तर सोहिल जी मेरा भी प्रणाम स्वीकार करें , आपने मांसाहार पर प्रतिबन्ध पर अपनी असहमति व्यक्त की है और मांसाहार के समर्थन में कुछ तर्क भी प्रस्तुत किये हैं , किसी भी प्रस्ताव से सहमत अथवा असहमत होने का आपको पूरा अधिकार है लेकिन इसके समर्थन में जो तर्क आपने प्रस्तुत किये हैं उनका क्रमानुसार जवाब तर्कपूर्वक ही देना चाहूँगा हर जगह पर केवल जीभ के स्वाद के लिये ही मांस नहीं खाया जाता। जहां शाकाहार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं है, वहां के रहवासी क्या खायेंगें।क्या आपका मतलब ये है की जहाँ पर जिस चीज़ की कमी है फिर वहाँ पर वो कमी हमेशा ही रहने दी जाए ? ,जब श्रीमती इंदिरा गाँधी जी ने देश की कमान संभाली थी उस समय हमारा देश में खाद्यान्न प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं थे और एक गहरा खाद्यन्न संकट हमारे सामने था और हमें अमेरिका से उसका आयात करना पड़ता था , अब इंदिरा जी भी अगर यही सोचती की देश में खाद्यान्न प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं तो हमें हमेशा ही अमेरिका के खाद्यान्न पर निर्भर रहना चाहिए तो क्या वे देश में हरित क्रांति ला पाती जिसके बाद हमारा देश खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हुआ , आज भी हमारे देश में कई गाँव ऐसे हैं जहाँ पर बिजली नहीं पहुँच पाई है और अगर आती भी है तो क्षण भर के लिए और उनके बच्चों को लैम्प की रौशनी में पढ़ना पड़ता है , तो क्या हमारी सरकार को ये सोच लेना चाहिए की क्योंकि वहाँ पर बिजली प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं है तो उन्हें अँधेरे में ही रहने दिया जाए , अरे भाई ! वहाँ पर बिजली प्रचुर मात्रा में नहीं है तो उपलब्ध करवाइए , जहाँ शाकाहार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं है वहाँ पर वैज्ञानिक और अन्य तरीकों से शाकाहार के प्रचुर उत्पादन की व्यवस्था कीजिये समुद्र किनारे बसे शहरों, गांवों का मुख्य भोजन समुद्री खाना (Sea Food) ही है और उनका आजीविका का मुख्य साधन भी यही है। इसी तरह जंगलों, पहाडों में रहने वाले लोगों का मांसाहार के बिना गुजारा मुश्किल होता है। जहां दूध और दालें वगैरा मुश्किल से उपलब्ध हैं, वहां शरीर के लिये आवश्यक तत्त्वों, प्रोटीन, विटामिन आदि की पूर्ति मांस से ही हो पाती है।क्या एक यही तरीका बचा है आजीविका कमाने का ? , समुद्र में नमक प्रचुर मात्रा में पाया जाता है क्या उसे इकठ्ठा करके और बेच के आजीविका नहीं कमाई जा सकती ? हमें अपने पेट के लिए दूसरे जीव के पेट को काटने का अधिकार कैसे मिल गया भई ? ऐसे ही दूसरे जीव भी हमारी हत्या करें अपने पेट की भूख मिटाने को और अपने तत्वों की पूर्ती करने के लिए तो आपके मुताबिक तो हमें उन्हें भी अपने आप को खुशी -२ सौंप देना चाहिए की लो भाई हमें मारकर खा लो और अपने तत्वों की पूर्ती कर लो

  32. Mahak said,

    August 18, 2010 at 4:49 pm

    >@voice of youths जी , ऊपर वाला यही जवाब आपको भी है , कृपया ध्यान दें

  33. Mahak said,

    August 18, 2010 at 4:53 pm

    >@आदरणीय एवं प्रिय अनवर जमाल जी आपकी बातों का भी क्रमानुसार ही जवाब देना चाहूँगा आपने कहा की क्योंकि वेद , रामायण , मनु स्मृति , बाइबिल कुरान और गुरु ग्रन्थ साहिब में भी मांसाहार की अनुमति है तो इसलिए वह सही है, पर आपने खुद ही अपने ब्लॉग वेद-कुरआन की एक पोस्ट में निम्नलिखित विचार प्रकट किये थे –महाजाल ब्लॉग स्वामी के इस कथन से मैं सहमत हूं कि वेद पुराण में बहुत सी बातें अप्रासंगिक और बकवास हैं । यही बात इसलाम की व्याख्या करने वाली बहुत सी किताबों के बारे में भी सही है ।हम सब बुद्धिजीवी हैं और यह मंच विचार और चर्चा के लिए ही है । अतार्किक लोगों को हरेक जगह झांकने से परहेज़ करना चाहिये । प्रिय प्रवीण जी और महक जी के कथन से सहमत हूं । सभी धार्मिक नियमों और परम्पराओं की समीक्षा को अब और टालना आत्मघाती क़दम है जिसका नुक्सान हमारे साथ हमारी आने वाली नस्लें भी उठाएंगी ।http://vedquran.blogspot.com/2010/04/reformation.htmlअब यही बात मैं भी कह रहा हूँ की सभी धार्मिक नियमों और परम्पराओं की समीक्षा को अगर अब ताला गया तो ये आत्मघाती कदम होगा और इसका नुक्सान हमारी आने वाली पीढियां भी उठाएंगी हमारी फ़ौज मांसाहार करती है . आप चाहें तो भारत जी की सेना को भरद्वाज ऋषि जी के आश्रम में देख लीजिये की उन्होंने क्या खाया ? शायद आपने पोस्ट को ठीक से पढ़ा नहीं या फिर पूरा नहीं पढ़ा , आप कृपया एक बार फिर से ध्यान दें -मैंने कहा है की चाहे हमारी फ़ौज हो या कोई भी हो मैं हमारे इस देश हिन्दुस्तान में हर प्रकार के मांस पर चाहे वो गाय का मांस हो ,सूअर का मांस हो ,बकरे का मांस हो ,मुर्गे का मांस हो आदि आदि हर प्रकार के मांसाहार पर और जीव-हत्या पर चाहे वो पुरानी परम्पराओं का हवाला देके कि जाती हो बलि के नाम पर या फिर कुर्बानी के नाम पर , हिन्दुस्तान में हर प्रकार के मांसाहार और जीव-हत्या पर प्रन्तिबंध लगाने का प्रस्ताव रखता हूँऔर जहाँ तक बात है भरत जी की सेना के द्वारा ऋषि के आश्रम में मांसाहार ग्रहण करने का तो क्या इसका ये मतलब है की अगर उन्होंने गलत किया तो हम भी गलत करें ? , उन्होंने अपने पेट की आग को शांत करने के लिए जीवों की हत्या की तो हम भी वैसा ही करें ?सभी हिन्दू भी शाकाहारी नहीं हैं . जनाब मैंने कब कहा की सभी हिंदू शाकाहारी हैं या सभी मुसलमान मांसाहारी हैं ? मैं तो सिर्फ इतना कह रहा हूँ की मांसाहार चाहे किसी भी इंसान के द्वारा किया जाए लेकिन अपने पेट के लिए किसी जीव की हत्या को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता , जब आप और मैं किसी जीव के द्वारा उसकी भूख मिटाने के लिए हमारी हत्या की इजाजत नहीं दे सकते तो हम खुद किसी जीव की हत्या कैसे कर सकते हैं ??

  34. Mahak said,

    August 18, 2010 at 4:56 pm

    >@सोनी गर्ग जी दरअसल इस सबसे कुछ लोगो का रोज़गार जुड़ा हुआ है कई घरो की रोटी भी इस तरह के व्यापार से चलती है तो इसलिए अचानक इसे बंद नहीं किया जा सकता !मैं एक बात जानना चाहता हूँ , जो लोग या फिर बहुत से होटल आदि शाकाहार का व्यापार और रोजगार करते हैं तो क्या उनके घरों की रोटी नहीं चलती ? ,क्या ये मांसाहार का व्यापार और रोजगार करने वाले शाकाहार का व्यापार और रोज़गार नहीं कर सकते ?? अगर उन्हें मांसाहार का व्यापार और रोज़गार छोड़ के शाकाहार का व्यापार और रोज़गार करने ,एँ किसी भी प्रकार की दिक्कत आती है और इसके लिए इन्हें किसी भी प्रकार की मदद चाहिए तो इस प्रस्ताव में मैं उन्हें सरकार के द्वारा हरसंभव मदद उपलब्ध करवाने का प्रस्ताव भी जोड़ता हूँ और वैसे भी मांसाहार छोड़ना या अपनाना किसी का खुद का फैसला है ठीक उस तरह जिस तरह की किसी भी तरह का नशा !सोनी जी मांसाहार छोड़ना या अपनाना किसी का खुद का फैसला तो है लेकिन इससे मनुष्य के द्वारा एक जीव की जान ली जा रही है , अब वो बेचारे निरीह और बेजुबान जानवर हमारी आपकी तरह बोल नहीं सकते की प्लीज़ हमें मत मारो ,हमें मत खाओ , हमें ही इंसान और इंसानियत के नाते उनकी आवाज़ बनना होगा और उन्हें इस नरक से मुक्ति दिलानी होगी , स्पेन जैसा देश ही अब जाग रहा है जहाँ हर साल बिना कारण ही हज़ारों बैलों की हत्या कर दी जाती है सिर्फ अपने मनोरंजन के लिए लेकिन अब वहाँ के भी एक प्रांत में इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है और शीघ्र ही स्पेन के अन्य प्रांत भी इसे लागू करेंगे ऐसी उम्मीद है

  35. Mahak said,

    August 18, 2010 at 4:56 pm

    >@आदरणीय सुज्ञ जीआपने अनवर जी के ब्लॉग की एक पोस्ट पर और कुतर्कों के स्वामी सलीम मियाँ की पोस्ट्स पर जागृति लाने की कोशिश की लेकिन क्या आ पाई जागृति ? मांसाहार और शाकाहार ,साथ ही और भी बहुत से विषयों पर गतिरोध तो हमेशा बना ही रहेगा लेकिन यही समय है ब्लॉग जगत में बिना हिचके या किसी के दबाव में आये bold subjects को उठाने का

  36. Mahak said,

    August 18, 2010 at 4:58 pm

    >@ Mr.शहरयार आपकी बात एकदम गलत है , किसी जीव का मांस खाने का मतलब है उसकी हत्या कर देना क्योंकि बिना जीव की हत्या करे, उसे पीड़ा पहुंचाए उसका मांस खाना संभव नहीं है लेकिन शाकाहार में ऐसा नहीं है ,हम जिस पेड़ से शाकाहार ग्रहण करते हैं वो बरसों जीवित रहता है , मेरे खुद के घर के बाग में अमरुद का वृक्ष लगा हुआ है जो हर साल हमें बहुत मीठे अमरुद देता है तो इसका मतलब मैंने उसकी हत्या नहीं कर दी, वो आज भी वैसा ही है जैसा छह साल पहले था बल्कि दिन ब दिन और बड़ा और हरयाली से परिपूर्ण होता गया ,हम उसे रोजाना पानी आदि देते हैं और समय-२ पर माली आदि से उसकी देखभाल भी करवाते हैं ना की उसे किसी प्रकार का कष्ट देते हैं साथ ही आलोक मोहन जी ने भी आपकी बात का बिलकुल माकूल जवाब दिया है की- फ़ल उनके पेडो की त्याग की चीज होती है ,वह वैसे भी गिरा देते है यही हाल सब्जी का होता है .उनमे कोई भी जान या सम्वेदना नही होती ,वो स्रिफ़ रेशा होता है यकीन ना हो तो किसी जीव वैज्ञानिक से पता कर लोहर बात को पहले अपने ऊपर लागू करके देखना चाहिए ,जब जब आप और मैं किसी जीव के द्वारा उसका निवाला बनने के लिए अपनी हत्या की इजाजत नहीं दे सकते तो हम खुद किसी जीव की हत्या कैसे कर सकते हैं ??

  37. Mahak said,

    August 18, 2010 at 5:00 pm

    >@आलोक मोहन जी वैसे भी मै मुस्लिम से अपील नही कर रहा …मै हिन्दू हू और उनसे ही अपील कर रहा हु .आज जो मुस्लमान धर्म के नाम पर कर रहे है उसका नतीजा भी भुगत रहे है@महक जी आप भी किसको समझा रहे है .अपनो को तो block कर दिया आपनेआप हर बात में हिंदू-मुस्लिम और दलित-सवर्ण आदि ले आते हैं ,इसी कारण आपको ब्लाक किया गया था , इस प्रकार के मजहबी या जातिगत कमेंट्स से बचें क्योंकि इस ब्लॉग पर मजहबी या जातिवादिता का ज़हर ना फैलने देने के लिए मैं कृतसंकल्प हूँ , मैं आपको अनब्लोक कर रहा हूँ लेकिन आइन्दा इस बात का खैयाल रखें और एक बात बताएं की ब्लाक होने के बावजूद आपने कमेन्ट कैसे किये ??

  38. Mahak said,

    August 18, 2010 at 5:03 pm

    >उपरोक्त सभी मेरे निजी विचार हैं , आपको मेरे विचार या प्रस्ताव से सहमत या असहमत होने का पूरा हक है पर क्योंकि ये संसद है तो इसलिए मैं बहस को आगे बढ़ाना चाहता हूँ ,बाकी आपकी मर्ज़ी अगर उपर कही गई मेरी किसी भी बात से आपमें से किसी को भी कोई दुःख पहुंचा हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ धन्यवाद महक

  39. August 18, 2010 at 5:44 pm

    >"आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम न समाचरेत"महाभारत में भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं:"वत्स! यदि कोई मांसाहार करता है, और वो आज ही मांसाहार का त्याग कर दे तो उसे उन लोगो से ज्यादा लाभ होगा जिन्होंने कभी मांसाहार नही किया है."

  40. August 18, 2010 at 8:26 pm

    >नम्‍बर 1 सबसे सस्‍ता भोजन, दो चार बोटी में चाहे जितना पानी डालो खालो, पाहवना भ्‍ाी खुश हम भी खुश नम्‍बर 2 धर्म की मानो उसी में हमारा कल्‍याण हैपूर्वज भी मांस का भोज करते थे वाल्मीकि रामायण अयोध्या कांड ५३|२२ में पृष्टं क्या कह रहे हैं ,,मर्ग का मांस ला कर हम अपनी कुटी में हवन करेंगे , क्योकि दीर्घायु चाहने वालों को ऐसा करना आवश्यक है ,हे लक्ष्मण शीघ्र ही मर्ग मार कर लाओ, ,,वाल्मीकि रामायण अवोध्य कांड १६| १-२ में हे ,,रामचन्द्र जी पर्वत कि छोटी पर बैठे और सीता को मांस से प्रसन्न करते हुए कहने लगे कि यह भुत पवित्र हे ,ओर यह अत्यंत स्वादिष्ट हे ,यह आग में भुना हुआ हे ,यजुर्वेद १३ \५१ में भी सही ,और हिरणों को मरने कि आज्ञा दी गयी हे ,,,तात्पर्य यह है कि हमारे पूर्वज मांस खाते थे ,,और आज भी हम हिन्दू ही अधिक मांस खाते हैं ,,कसी भी नगर नें नज़र दौडाएँ अधिक मासहारी होटेल हमारे हें ,,,

  41. August 18, 2010 at 8:29 pm

    >जानवर को कष्ट नहीं होताग्रीवा की नाड़ियाँ तेज़ी से काटने के कारण दिमाग़ को जाने वाली धमनियों तक ख़ून का प्रवाह रुक जाता है, जो पीड़ा का आभास उत्पन्न करती हैं। अतः जानवर को पीड़ा का आभास नहीं होता। याद रखिए कि हलाल किये जाते समय मरता हुआ कोई जानवर झटके नहीं लेता बल्कि उसमें तड़पने, फड़कने और थरथराने की स्थिति इसलिए होती है कि उसके पुट्ठों में ख़ून की कमी हो चुकी होती है और उनमें तनाव बहुत अधिक बढ़ता या घटता है।

  42. August 18, 2010 at 8:38 pm

    >कोई सब्जी ऐसी नहीं जो बिना जीव हत्या के उचित मात्र में मनुष्य को प्राप्त हो जाए ,,,अब देखये न ,एक टमाटर को प्राप्त करने के लिए कम से कम आठ परकार की सुंडियां और कीड़े मकोड़ों को मारना पड़ता है ,,ऐसे ही गोभी के लिए चौबीस परकार के ,आम के लिए नौ परकार के ,खीरा ,ककड़ी ,लौकी ,आदि के लिए सात परकार के जीवों की हत्या करनी ही होती है ,,और अगर ऐसा न किया जाए ,,तो फिर यह वस्तुएं मनुष्य को न मिल कर कीड़े माकोंडों की धरोहर बनकर ही रह जाती हें ,,,प्रश्न यह हे कि अपने पेट की आग को बुझाने के लिए किसी की जन क्यों ली जाए ,,उत्तर यह है की यह पर्कारती का नियम है ,और हम उस नियम को बदल नहीं सकते ,,जेसे और बहुत से नियमों से हमें समझोता करना पड़ता है ऐसे ही यहाँ भी करना ही होगा ,,,,,, अगला प्रश्न यह है कि जीव हत्या करने में उस जीव को पीड़ा होती है जो किसी भी परकार उचित नहीं ठहराया जासकता ,,परन्तु ,,मीरा उत्तर होगा कि पीड़ा,,,,,पीड़ा,,,, सब बराबर ,,जब आप टमाटर ,गोभी ,लोकी ,आदि प्राप्त करने के लिए कीड़ों ,सुंडियों ,को पीड़ा देने में संकोच नहीं करते तो ,,???,,,,अंतर यही तो है कि वहां तो छोटी पीड़ा है

  43. August 19, 2010 at 4:02 am

    >@महक जी वैसे भी मै मुस्लिम से अपील नही कर रहा …ये बात मैने इसलिये कही "जिस आदमी का धर्म,सस्कार्,परिवार उसे मास खाने की इजाजत देते हो वो आखिर किसे आप के एक आलेख से मासाहार छोड सकता है "वो हिन्दू ही है जो किसी भय से (धर्म,पाप,या गुरु या अन्य कारणो से मासाहार छोड देता है )हमको बताया जाता है जीवो पर दया करो जैसे परमात्मा तुम पर करता है मै कोई मुस्लिम दलित विरोधी नही हू.भारत सबका है

  44. August 19, 2010 at 4:21 am

    >स ब्लॉग पर मजहबी या जातिवादिता का ज़हर ना फैलने देने के लिए मैं कृतसंकल्प हूँ ,@महक ji यदि येसा है तो बहुत अच्छा है पर ये Tarkeshwar Giri ya DR. ANWER JAMAL जैसे लोग आप के ब्लोग मे क्यो जुडे है इनके लेख नफ़रत का जहर फ़ैलाते है हिन्दू इतना उग्र क्यों होता जा रहा है ? -तारकेश्वर गिरी.चाँद पे मस्जिद बनवायेंगे- सलीम खान जी – तारकेश्वर गिरी .आखिर धर्म परिवर्तन जरुरी क्यों है ? – तारकेश्वर गिरी.२७ हिन्दू और जैन मंदिरों को तोड़ कर बनाई गई है कुव्वत – उल इस्लाम मस्जिद – तारकेश्वर गिरी.माँ को भी नमन नहीं कर सकते है, सिवाय अल्लाह के – तारकेश्वर गिरी. तारकेश्वर जी, दिखावे के लिए क्यों गंवाना चाहते हैं "वन्दे मातरम"?मुसलमान भाई अगर वन्देमातरम गा देंगे तो क्या फर्क पड़ जायेगा ?- तारकेश्वर गिरीIs it fair ? जो लोग कहते हैं कि हिन्दू आस्थाओं पर प्रहार क़तई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वे भी आराम से बर्दाश्त कर लेते हैं बल्कि नास्तिकों से भी बढ़कर खुद हिन्दू धर्मग्रंथों पर प्रहार करते हैं। – Anwer Jamal like Ramchandra ji श्री रामचन्द्र जी के प्रति मेरा अनुराग और चिंतन – Anwer JamalAt the time of marriage ‘सीता जी की आयु 6 वर्ष थी‘, जो लोग बाल्मीकि रामायण को प्रमाण मानते हैं वे इस तथ्य को झुठला नहीं सकते।-Anwer JamalTagore said- वन्देमातरम् वास्तव में दुर्गा देवी की वन्दना है। यह सत्य इतना स्पष्ट है कि इस पर बहस नहीं की जा सकती।etc etc etcफ़िर जानिये कैसे नफ़रत फैलायी जाती हकीकत के आईने को आप को जय्दा जरुरत है मुझे कम

  45. August 19, 2010 at 8:59 am

    >आपने बंजारों के बारे में कुछ नहीं कहा| आप किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुँच पा रहे हैं|सिर्फ इसलिए हम मांसाहार को गलत नहीं ठहरा सकते|

  46. August 19, 2010 at 9:21 am

    >विश्व गौरव,"टमाटर को प्राप्त करने के लिए कम से कम आठ परकार की सुंडियां और कीड़े मकोड़ों को मारना पड़ता है……………"हो सकता है इसिलिये सभी किटनाशक दवाओं का प्रयोग टालते है।जीव की मांस के लिये जब हत्या की जाती है,तो जान निकलते ही मक्खियां करोडों अंडे उस मुर्दे पर दे जाती है,पता नहीं जान निकलनें का एक क्षण में मक्खिओं को कैसे आभास हो जाता है,उसी क्षण से वह मांस मक्खिओं के लार्वा का भोजन बनता है,जिंदा जीव के मुर्दे में परिवर्तित होते ही उसके मांस में 563 तरह सुक्ष्म जीव उसमें पैदा हो जाते है।कहो, किसमें जीव हिंसा ज्यादा है।,मुर्दाखोरी में या अनाज में?

  47. August 19, 2010 at 10:26 am

    >विश्व विदूषक,वनस्पति जीवों के करूणाभाषी, यदि इतनी ही दया आ रही है तो पहले दोनो हिंसाजन्य आहार का परहेज करके दिखाओ, और न हो सके तो किसी एक का सम्पूर्ण त्याग कर दिखाओ।

  48. August 19, 2010 at 10:41 am

    >महक जी,यह सच है,कि वहां में जाग्रति ला नहिं पाया, अब मैं अपने ब्लोग के माध्यम से यह प्रयास जारी रखुगां।उस लेख को मैने सुज्ञ पर प्रकाशित कर दिया है। आप सभी वहां देख सकते हैः http://shrut-sugya.blogspot.comआप जीव हिंसा पर प्रतिबंध में सफ़ल रहें, इसी तरह साहसी कदम उठाएं इसी भावना के साथ मेरा मत प्रस्ताव के पक्ष में माना जाय।

  49. August 19, 2010 at 4:23 pm

    >कुछ पहलू अभी चर्चा में छूट रहे है. १. जैसे की मेडिकल साइंस. बहुत सी दवाएं जानवरों से मिलती हैं. किसी नई दवा का इस्तेमाल पहले जानवरों पर होता है और इसका प्रभाव देखने के लिए उन्हें ज़बरदस्ती बीमार भी किया जाता है और मारा भी जाता है. इस बारे में आप लोगों का क्या विचार है?२. देखा गया है की जो जानवर मनुष्य के काम के नहीं हैं वह तेज़ी से विलुप्त हो रहे है. जबकि उन जानवरों की संख्या बढाने में मनुष्य खुद रुचि ले रहा है जो उसके काम आते हैं. अगर मांसाहार पर रोक लगा दी जाए तो शायद ये पशु भी तेज़ी से विलुप्त होना शुरू हो जाएँ जैसे की शेर और बाघ.या फिर इनकी संख्या इतनी ज्यादा बढ़ जाए की खेती को ही चौपट करना शुरू कर दें. जैसे की नीलगाये. जबसे इनके शिकार पर प्रतिबन्ध लगा है इनकी संख्या इतनी बढ़ चुकी है की पूरे देश का किसान परेशान है.

  50. Mahak said,

    August 19, 2010 at 6:43 pm

    >मेरे भाई @विश्व गौरव लगता है तुमने अनवर जमाल जी को मेरे द्वारा कमेंट्स के रूप में दिए जवाब को पढ़ा नहीं ,उन्होंने भी कुछ तुम्हारे जैसी ही बातें कही थी मांसाहार के पक्ष में की वेद , रामायण , मनु स्मृति , बाइबिल कुरान और गुरु ग्रन्थ साहिब में भी मांसाहार की अनुमति है तो इसलिए वह सही है और भरत जी की सेना को भरद्वाज ऋषि जी के आश्रम में देख लीजिये की उन्होंने क्या खाया ? तो इनका जवाब मैं दे चुका हूँ ऊपर के कमेन्ट में , अगर उसमें कोई आपत्ति हो तो फिर मुझे बताएं कुछ एक नई बातें हैं जिनका की जवाब देना चाहूँगा आज भी हम हिन्दू ही अधिक मांस खाते हैं ,,कसी भी नगर नें नज़र दौडाएँ अधिक मासहारी होटेल हमारे हें ,,, तो क्या ये अच्छी बात है या इस पर हमें गर्व होना चाहिए की सबसे ज्यादा जीवन हम खत्म करते हैं , मेरे मुताबिक तो ये बेहद अफसोसजनक बात है , हमारा चरित्र तो ऐसा होना चाहिए की दूसरा कोई मीन-मेख निकालना चाहे तो भी ना निकाल सके और उसके लिए हम प्रेरणा बनें , और वैसे भी मैंने एक बार भी ऐसा कहीं भी कहा ही नहीं है की हिंदू अधिक मांस खाते हैं या मुसलमान , मेरा तो कहना है की जो भी इंसान मांस खाता है उसे पहले एक सवाल खुद से पूछना चाहिए की अगर उसे भी इसी तरह से काटकर ,मारकर किसी की प्लेट में भोजन के रूप में परोसा जाए तो उसे कैसा लगेगा ?? जानवर को कष्ट नहीं होताग्रीवा की नाड़ियाँ तेज़ी से काटने के कारण दिमाग़ को जाने वालीधमनियों तक ख़ून का प्रवाह रुक जाता है, जो पीड़ा का आभास उत्पन्न करती हैं। अतः जानवर को पीड़ा का आभास नहीं होता। ये बात गलत है की उन्हें कष्ट नहीं होता लेकिन चलिए एक बार के लिए आपकी बात मान लेते हैं की क्योंकि आप उनकी कुछ विशेष नाड़ियाँ काट देते हैं तो उसके कारण उन्हें पीड़ा का आभास नहीं होता लेकिन मेरे भाई एक जीवन का अंत तो होता ही है अब ज़रा यही बात खुद पर लागू करकर सोचो, तुम्हारे और मेरे अंदर cranial nerves हैं जो की directly हमारे ब्रेन से जुडी हुई हैं और जिनके कारण हमें दर्द का अहसास होता है , अब अगर मैं तुमसे कहूँ की- " विश्व गौरव भाई, मेरा मन कर रहा है इंसानी मांस को खाने का और देखने का की इंसानी फेफड़े ,जिगर , ह्रदय और आंतडियों का स्वाद कैसा होता है तो इसके लिए मुझे तुम्हे मारना पड़ेगा और तुम्हे इसके लिए अपनी सहमति भी बेहिचक दे देनी चाहिए क्योंकि तुम्हे इससे होने वाली पीड़ा का बिलकुल भी अहसास नहीं होगा , मैं तुम्हारी cranial nerves को बहुत तेजी से काटूँगा जिससे तुम्हारे दिमाग को जाने वाली धमनियों तक खून का प्रवाह रुक जाए और तुम्हे पीड़ा का अहसास ना हो क्या दे दोगे तुम अपनी सहमति ?? हमें हर बात को दूसरों से पहले खुद पर लागू करके देखना और सोचना चाहिए की अगर हमारे साथ भी ऐसा ही किया जाए तो हमें कैसा लगेगा क्या हक है आपको वैसा व्यवहार दूसरे प्राणी के साथ करने का जो आप अपने लिए नहीं चाहते ??प्रश्न यह हे कि अपने पेट की आग को बुझाने के लिए किसी की जन क्यों ली जाए ,,उत्तर यह है की यह पर्कारती का नियम है ,और हम उस नियम को बदल नहीं सकते प्रकर्ति के इस नियम को निभाने के लिए प्रकृति ने खुद ही ऐसी व्यवस्था कि हुई है शेर ,बाघ,लकडबघा,गिद्ध, मगरमच्छ आदि जीवों को उत्पन करके, जो की इस नियम का बखूबी और बेहतरीन ढंग से पालन करते हैं लेकिन हम तुम इंसान हैं , अगर हम तुम भी यही करने लगें तो उन जानवरों और हममें फर्क क्या रह गया ?? अगला प्रश्न यह है कि जीव हत्या करने में उस जीव को पीड़ा होती है जो किसी भी परकार उचित नहीं ठहराया जासकता ,,परन्तु ,,मीरा उत्तर होगा कि पीड़ा,,,,,पीड़ा,,,, सब बराबर ,,जब आप टमाटर ,गोभी ,लोकी ,आदि प्राप्त करने के लिए कीड़ों ,सुंडियों ,को पीड़ा देने में संकोच नहीं करते तो ,,???,,,,अंतर यही तो है कि वहां तो छोटी पीड़ा है इन कमेंट्स से ये एक बार फिर साबित होता है की तुमने पोस्ट और उस पर आये हुए कमेंट्स को ध्यान से नहीं पढ़ा है , इसका जवाब सुज्ञ जी के द्वारा बहुत पहले ही दे दिया गया था की – " हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है ही, पर विवेक यह कहता है, जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। "

  51. Mahak said,

    August 19, 2010 at 6:48 pm

    >@आलोक मोहन जी लगता है आपको हकीकत के आईने के साथ-२ आँखों के चश्मे की भी ज्यादा ज़रूरत है , आपको दिए गए अपने सन्देश में मैंने कहा था की-मैं इस ब्लॉग पर ( यानी के " ब्लॉग संसद " पर ) मजहबी या जातिवादिता का ज़हर ना फैलने देने के लिए कृतसंकल्प हूँ , अब अपने-२ ब्लोग्स पर वे क्या कहते और लिखते हैं ये आप और मैं नहीं decide कर सकते , हम उन्हें समझा सकते हैं या फिर उनकी पोस्ट्स पर अपना विरोध या समर्थन जता सकते हैं लेकिन वो भी शालीन और सभ्य तरीके से होना चाहिए , वो जिस भाषा का प्रयोग करें उसी भाषा में उन्हें जवाब देना चाहिए ना की पहले गन्दी और असभ्य भाषा का प्रयोग करा जाए , अगर वो पहले ऐसा करें तो ये आपके ऊपर है की आप उन्हें किस तरीके से जवाब देना चाहें गिरी जी के ब्लॉग पर मेरा आना जाना बहुत कम रहा है और अनवर जी के ब्लॉग की तो एक-२ पोस्ट गवाह है जिसमें मुझे उनकी जो भी बात गलत लगी उसका मैंने विरोध किया और जो भी सही उस पर उनका भरपूर समर्थन किया , यकीन ना हो तो अप्रैल 2010 के बाद की उनके ब्लॉग वेद-कुरआन की पोस्ट्स उठाकर देखिये और उस पर आये हुए मेरे कमेंट्स को चेक करिये

  52. Mahak said,

    August 19, 2010 at 6:53 pm

    >@जीशान जी अनछुए पहलुओं को छूने के लिए शुक्रिया १. जैसे की मेडिकल साइंस. बहुत सी दवाएं जानवरों से मिलती हैं. किसी नई दवा का इस्तेमाल पहले जानवरों पर होता है और इसका प्रभाव देखने के लिए उन्हें ज़बरदस्ती बीमार भी किया जाता है और मारा भी जाता है. इस बारे में आप लोगों का क्या विचार है?आपकी ये बात बिलकुल ठीक है की मेडिकल साइंस यानी के एलोपैथिक दवाओं में ऐसा होता है , इस पर मेरा विचार ये है की ऐसा करना सही नहीं है , अपने स्वार्थ के लिए निर्दोष जीवों के शरीर को प्रयोगशाला बनाना बिलकुल भी उचित नहीं है , जब हम अपने शरीर पर ऐसा कुछ जानलेवा प्रयोग नहीं करना चाहते फिर हमें उनके शरीरों पर ऐसे प्रयोग करने का अधिकार कैसे मिल गया ?, हर जीव को जीने का समान अधिकार है इसके लिए हमें आयुर्वेद का प्रयोग करना चाहिए जो की पेड़ पौधों से प्राप्त होने वाली प्राकर्तिक जड़ी -बूटियों पर आधारित है ,आयुर्वेद के द्वारा हर रोग का इलाज संभव है , मैं खुद इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हूँ , करीब डेढ़ साल पहले मुझे पीलिया हो गया था जो की बढ़कर Hepatitis-B में convert हो गया , सभी डाक्टरों ने साफ़ हाथ खड़े कर दिए थे मेरे माता-पिता के समक्ष की अब आपका बेटा नहीं बच सकता , ऐसे में मेरी माता जी मुझे स्वामी रामदेव जी के चिकित्सालय में लेकर गयीं और वहां से मिली आयुर्वेदिक दवाइयों और उनके बताये हुए दिशा -निर्देशों का मैंने पालन किया और लगभग दो महीनों में ही मैं ठीक हो गया .आज मुझे देखकर वो डोक्टोर्स भी हैरान होते हैं की ऐसा कैसे हुआ .लेकिन हाँ कोई injury या फिर accidental case में तो हमें medical science का ही सहारा लेना पड़ेगा क्योंकि आयुर्वेद में इससे सम्बंधित शल्य-चिकित्सा के नाम से शामिल विधि का उतना अधिक विकास और उस पर शोध नहीं हो सका है जितना की किया होना चाहिए था २. देखा गया है की जो जानवर मनुष्य के काम के नहीं हैं वह तेज़ी से विलुप्त हो रहे है. जबकि उन जानवरों की संख्या बढाने में मनुष्य खुद रुचि ले रहा है जो उसके काम आते हैं. अगर मांसाहार पर रोक लगा दी जाए तो शायद ये पशु भी तेज़ी से विलुप्त होना शुरू हो जाएँ जैसे की शेर और बाघ.या फिर इनकी संख्या इतनी ज्यादा बढ़ जाए की खेती को ही चौपट करना शुरू कर दें. जैसे की नीलगाये. जबसे इनके शिकार पर प्रतिबन्ध लगा है इनकी संख्या इतनी बढ़ चुकी है की पूरे देश का किसान परेशान है.जीशान भाई , ये बात भी आपकी बिलकुल सही है लेकिन इसका जवाब मैं पोस्ट में ही दे चुका हूँ की प्रकृति ने अपने आप ही ऐसी व्यवस्था की हुई है शेर ,बाघ,लकडबघा,गिद्ध, मगरमच्छ आदि जीवों को उत्पन करके जिससे की इनकी संख्या नियंत्रित रहें और बहुत अधिक और बेकाबू ना हो जाए , ज़रूरत है तो इस बात की कि शेर और बाघ आदि का जो शिकार किया जाता है शिकारियों के द्वारा उनकी खाल को बेचने के लिए उस पर कड़ाई से अंकुश लगाया जाए और इन्हें सरंक्षण प्रदान किया जाए , खुशी की बात ये है की सरकारें और अन्य संगठन कुछ हद तक इस दिशा में कार्य कर भी रहें हैं " save the tigers " और अन्य campaighns चलाकर और उसके कुछ सकरात्मक नतीजे भी प्राप्त हुए हैं लेकिन अभी भी काफी कुछ किया जाना बाकी है

  53. August 20, 2010 at 5:46 am

    >महक भाई, १. दवा चाहे आयुर्वेदिक हो या एलोपैथिक, उसका पहला ट्राएल जानवरों पर ही होता है. कोई भी दवा सीधे मनुष्य पर नहीं आजमाई जाती. अगर आप इसके खिलाफ कानून बनायेंगे तो नई दवाएं बनना बंद हो जायेंगी. जबकि अभी एड्स और कैंसर जैसी बहुत सी बीमारियाँ लाइलाज हैं.२. जिस प्रकृति ने संतुलन बनाए रखने के लिए हर तरह के जीव पैदा किये हैं, उसी ने इस संतुलन को बनाए रखने के लिए हमें कुछ जीवों के मांसाहार की अनुमति प्रदान की है. अगर दुनिया में सभी लोग शाकाहारी हो जाएँ तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा. और शायद एक बड़ी आबादी भूखों मरने के कगार पर पहुँच जाए. एक पल को मान लिया जाए की मनुष्य मांसाहार छोड़ दे और संतुलन बनाए रखने के लिए बाघ इत्यादि का संरक्षण करे. तब भी हम जीव हत्या के दोषी होंगे क्योंकि हम उन दरिंदों को संरक्षण दे रहे हैं जो उन जीवों की हत्या कर रहे हैं. ये हुआ गुनाह बेलज्ज़त. दूसरी बात एक दरिन्दे की एक दिन की खुराक एक जानवर से ज्यादा नहीं होती. ऐसे में संतुलन के लिए बहुत ज्यादा दरिन्दे और उनके लिए विशालकाए जंगल चाहिए. फिर वे आपकी बस्तियों पर हमला करेंगे. आप उन्हें मारेंगे तो जेल मिलेगी और नहीं मारेंगे तो आपके बच्चे उनका निवाला बन जायेंगे.मनुष्य फिर जानवरों को पालना छोड़ देगा. पहले बैल जब खेतों को जोतते थे तो हम उन्हें प्यार से रखते थे. आज जब ट्रैक्टरों का ज़माना है तो यही बैल छुट्टा और आवारा सांड कहलाने लगे हैं. बंदरों और कुत्तों की नसबंदी के लिए आये दिन प्लानिंग हो रही है क्योंकि ये हमारे लिए अनुपयोगी हैं. हो सकता है आगे चलकर ये जीव विलुप्ति की कगार पर पहुँच जाएँ. फिर कितने जीवों को संरक्षित करियेगा?३. अब तुलना की बात करते हैं मनुष्य के क़त्ल की मांसाहार से. तो यह प्रकृति के विरुद्ध है. कोई भी जानवर अपनी ही जाति के जानवर का मांसाहार नहीं करता. यहाँ तक की मिलती जुलती जाति का भी मांसाहार नहीं करता. शेर कभी बिल्ली को नहीं खाता. लेकिन अगर कोई और जाति मनुष्य को खा रही है तो यह मनुष्य का भी फ़र्ज़ होगा की वह उसपर संतोष करे. और वह ऐसा करता भी है. हमारा कोई भाई किसी बीमारी या एक्सीडेंट में अगर मर जाए तो वक़्त के साथ हमें सब्र आ जाता है. यही प्रकृति का नियम है. और मौत तो सभी को आनी है, क्या मनुष्य और क्या जानवर.

  54. Mahak said,

    August 20, 2010 at 6:19 am

    >@जीशान भाई एक पल को मान लिया जाए की मनुष्य मांसाहार छोड़ दे और संतुलन बनाए रखने के लिए बाघ इत्यादि का संरक्षण करे. तब भी हम जीव हत्या के दोषी होंगे क्योंकि हम उन दरिंदों को संरक्षण दे रहे हैं जो उन जीवों की हत्या कर रहे हैं.इसमें जीव हत्या के दोषी हम कैसे हो गए भई , क्या हमने बनाया है बाघ इत्यादि का ऐसा स्वभाव की वे मांसहार करें ? आपने कारण दिया की क्योंकि हम उन्हें संरक्षण प्रदान कर रहें हैं जो उन जीवों की हत्या कर रहें हैं तो मित्र मैं आपको बताना चाहूँगा की इनका सरंक्षण करने की हमें कोई ज़रूरत ना पड़ती अगर मनुष्य जाती इन बाघ इत्यादि का इनकी खाल और अपने मनोरंजन के लिए शिकार ना करती , इनकी संख्या तो अपने आप में ही इस प्रकार से प्राकर्तिक रूप से नियंत्रित थी लेकिन हमने ही शिकारियों के रूप में अपने स्वार्थ और झूठी शान की खातिर इन बाघ आदि जीवों को भी अपनी गोली का शिकार बनाया और इनकी खाल को बेचना शुरू किया , ये सब कुछ एक बहुत बड़े पैमाने पर होना शुरू हो गया जिसकी वजह से आज ये जीव जो की प्रकर्ति को संतुलित रखने में अपना सहयोग देते थे ,वे आज विलुप्ति के कगार पर पहुँच गए हैं , तो इसलिए इन्हें संरक्षण देने की आज ज़रूरत महसूस हो रही है वरना इस संरक्षण प्रदान करने की कोई आवश्यकता नहीं थी लेकिन क्योंकि इनकी इस इतनी ज्यादा हुई कमी का कारण भी हम ही हैं तो इसलिए ये हमारा ही फ़र्ज़ बनता है की हमारी भूल और स्वार्थ के कारण आज जो इनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है और प्रक्रति का बनाया हुआ असुंतलन बिगड रहा है तो हम अपनी भूल को स्वीकार करें और उसे सुधारें लेकिन अगर कोई और जाति मनुष्य को खा रही है तो यह मनुष्य का भी फ़र्ज़ होगा की वह उसपर संतोष करे. और वह ऐसा करता भी है. हमारा कोई भाई किसी बीमारी या एक्सीडेंट में अगर मर जाए तो वक़्त के साथ हमें सब्र आ जाता है. यही प्रकृति का नियम है. और मौत तो सभी को आनी है, क्या मनुष्य और क्या जानवर.ये बात तो बिलकुल ही गलत है , किसी बीमारी या एक्सीडेंट से मरना एक बात है और किसी के स्वाद या फिर पेट की भूख के लिए अपने अमूल्य जीवन को उसे सौंप देना बिलकुल अलग बात, ये तो बिलकुल आत्महत्या की ही तरह हुआ की कोई तीसरा जीव हमें कह रहा है की भाई मुझे भूख लगी है और तुम्हे खाकर मुझे अपने तत्वों की पूर्ती करनी है तो इसलिए बिना लड़े या विरोध किये मुझे तुम्हे खाने दो मुझे नहीं लगता की कोई भी मनुष्य किसी के स्वाद या फिर भूख की खातिर इस तर्क को मान लेगा और अपना जीवन खत्म करने के लिए तैयार हो जाएगा

  55. August 20, 2010 at 6:56 am

    >महक जी, मान लेते हैं कि सबने मांस खाना छोड़ दिया| जीवों की हत्या रुक गई, लेकिन इसमें भी एक चीज़ तो छूट ही जाती है न कि हमारे देश के कई ऐसे भाग हैं जहाँ देवी देवताओं को बलि चढ़ाई जाती है, इस आस्था और विश्वास को अगर तोड़ने कि कोशिश की जाये तो शायद मनुष्य ही मनुष्य का दुश्मन बन जायेगा| इसे तो रोक नहीं सकते|

  56. August 20, 2010 at 8:02 am

    >@ महक जी ,मैं देख रहा हूँ कि मांसाहार न छोड़ने के लिए या जायज ठहराने के लिए लोग केवल कुतर्क ही नहीं कर रहे वरन कीचड़ में गिरने की हद तक नीचे गिर रहे हैं | लेकिन फिर भी यह बात निकल कर आती है कि शाकाहार का पक्ष ज्यादा प्रबल है |नीचे गिरने कि हद इससे अधिक क्या होगी कि किसी हिन्दू ग्रन्थ का उल्लेख कर दिया जाये और उसमे श्लोक का अर्थ का अनर्थ बना लिख दिया जाये | उपरोक्त टिप्पणीकार विश्व्गौरव जी ने जिस ग्रन्थ का उल्लेख कर और उसमे श्लोकों का वर्णन किया है उस ग्रन्थ में उन जगहों पर उनकी लिखी बातें गलत पायीं गयीं | इस बात के लिए इन्हें क्षमा मंगनी चाहिए | और किसी भी पुस्तक से उद्धरण देते समय उसका भली प्रकार से अध्यन और मनन करके ही उस का जिक्र करना चाहिए | वाल्मीकि रामायण में कुछ जगहों पर मानलो सुरा -मांसादी का प्रयोग हुआ भी है तो उस श्लोक का दिया हुआ अर्थ भी देखें; इनमे सुरा का अर्थ मधु और मांस का अर्थ फलों के गूदे को कहा गया है, और मैंने अपने विद्वान् मित्र से जाना कि अमृत का एक प्रयायवाची सुरा भी होता है तथा फलों के गूदे को भी तो फल का मांस ही कहेंगे |कृपया गलत को सही ठहराने के लिए इतना नीचे न गिरें कि नीचा ही समझा जाने लगे |

  57. impact said,

    August 20, 2010 at 8:15 am

    >@शंकरभगवान् श्रीराम ने हिरन का शिकार क्यों किया था?

  58. August 20, 2010 at 11:18 am

    >शंकर जी,आपका अर्थ 100% सही है, पुराने शास्त्रों में फ़लों के गूदे के लिये मांस शब्द प्रयुक्त होता था। एक एक शब्द के कंई अर्थ होते है, सही परिपेक्ष में अध्यन होना चाहिए।विश्व विदूषक को तथ्यपूर्ण जवाब के लिये बधाई!

  59. August 20, 2010 at 11:23 am

    >इम्पैक्ट,हिरन के शिकार के समय तक श्री राम नबी थे, वो तो रावण को मारने के बाद क्षमा प्रयश्चित करके भगवान बने। हा॥हा॥

  60. Mahak said,

    August 20, 2010 at 4:14 pm

    >@voice of youths जी शायद आपने भी पोस्ट को पूरा नहीं पढ़ा , मैंने हिन्दुस्तान में मांसाहार पर पर्तिबंध के साथ-२ इस बलिप्रथा और कुर्बानी नामक कुप्रथाओं को भी प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव रखा है , जनाब ये आस्था और विश्वास नहीं बल्कि अंधविश्वास है , जो लोग देवी-देवताओं को बलि चढाने के नाम पर निर्दोष और बेजुबान निरीह पशु-प्राणियों की हत्या करते हैं तो ऐसी आस्था को तो बिलकुल भी उचित नहीं ठहराया जा सकता , क्यों नहीं ये लोग अपनी खुद की बलि चढाते , मैंने ऐसे कई केस देखे हैं जिसमें की इन तांत्रिकों आदि के बहकावे में आकार लोग अपने बेटा-बेटियों और पति-पत्नी तक की बलि के नाम पर हत्या कर देते हैं और अपना परिवार तबाह कर बैठते हैं , आस्था के नाम पर किसी को किसी की हत्या करने का License नहीं दिया जा सकता , ईश्वर इन इंसानियत के नाम पर धब्बा और घटिया हरकतों से नहीं हमारे अच्छे कर्मों से प्रसन्न होता है

  61. Mahak said,

    August 20, 2010 at 4:16 pm

    >@शंकर जी कुतर्क का प्रमाण के ज़रिये जवाब देने के लिए सच में आप बधाई के पात्र हैं , Mr. विश्व गौरव को निश्चित ही माफ़ी मांगनी चाहिए किसी ग्रन्थ का गलत और आधा अधूरा reference देने के लिए वैसे इस विषय पर मेरा कुछ यूँ मानना है की जो भी पहले हुआ है या लिखा गया है उसे शत-पर्तिशत सही या गलत मानकर अपना वर्तमान और भविष्य नहीं खराब किया जा सकता , हर धार्मिक ग्रन्थ से जो भी अच्छी या बुरी बात बात मिले उसे पहले तर्क की कसौटी पर परखें फिर उसका ग्रहण या त्याग करें दरसल होता क्या है की कुछ मूर्ख लोग लेख का पूरा अंश ना लेकर वेदों और कुरआन आदि से अपने मतलब की सिर्फ एक- २ लाइन ले लेते हैं और फिर उन ग्रंथों को बदनाम करते हैं , बल्कि एक बार तो ऐसी मूर्खता स्वयं मुझसे भी हो गई थी लेकिन सिर्फ एक जिज्ञासु के रूप में और उसका समाधान भाई आनंद पाण्डेय ने मुझे उनका वास्तविक अर्थ समझाकर की थी और इसी कारण मैंने उनसे क्षमां भी मांगी थी तो भाई विश्व गौरव को भी क्षमां मांगने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए मेरी तरफ से भी आपको आभार

  62. Mahak said,

    August 20, 2010 at 4:19 pm

    >@आदरणीय सुज्ञ जी आपका भी बहुत-२ आभार है इस इंसानियत के नाम पर कलंक को मिटाने के प्रयास को अपना समय ,बल , सामर्थ्य ,गति और सशक्तता प्रदान करने के लिए

  63. August 21, 2010 at 7:00 am

    >बलिप्रथा और कुर्बानी दोनो ही कुप्रथाएं है, हम सभ्य हो चुके लोग इन कुप्रथाओं को क्यों ढोएं,अगर भोजनदान का उद्देश्य है तो जिंदा दुधारू पशु दान कर दिजिये।

  64. August 21, 2010 at 7:02 am

    >आप सभी की बहुमूल्य टिप्पणीयां यहां भी चाहिए;http://shrut-sugya.blogspot.com/2010/08/blog-post_20.html

  65. August 21, 2010 at 7:39 am

    >जो लोग जीवो पर प्रयोग करने से मारे जाने की बात करते है उन्हे ये भी पता होना चाहिये कि एक जीव की मौत लाखो मनुस्यो और जीवो के जीवन की प्राणो की बचाता है मासाहार मे ये नही होता है

  66. August 21, 2010 at 12:51 pm

    >महक जी,विषयों के चक्र में शब्दों का जाल बुनकर किसी भी बहस को लंबा खिंचा जा सकता है, और लंबा ही नहीं अंतहीन निष्कर्ष की ओर भी जाया जा सकता है| इस पोस्ट और कमेंट्स तथा आपके ज़वाब को पढ़ने के बाद मुझे यही लग रहा है| आपने बेशक उन तमाम तर्कों का ज़वाब, अकाट्य तर्कों से दिया| लेकिन इस बात पर सहमति नहीं बनायीं जा सकी| क्योंकि शाकाहारी और मांसाहारी दोनों अपनी-अपनी जगह पर सही हैं| आपने उन तमाम तर्क रखा जो रखना चाहिए| लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन? मेरे द्वारा उपयोग किये गए शब्दों या विचारों से अगर आपको बुरा लगा हो तो उसके लिए मैं माफी चाहूँगा क्योंकि ये विचार मेरे आपने हैं, इससे कोई सहमत हो भी सकता है नहीं भी| धन्यवाद!गिरिजेश कुमार, पटना(बिहार)

  67. Mahak said,

    August 21, 2010 at 3:55 pm

    >Voice of youths उर्फ गिरिजेश कुमार जी मुझे बुरा सिर्फ उन्ही लोगों की बातों का लगता है जो अपनी बात को असभ्य तरीके ,ताना मारकर और अपशब्दों का प्रयोग करके कहते हैं , आपने ऐसा कुछ भी नहीं किया है ,इसलिए आपको माफ़ी मांगने की बिलकुल भी ज़रूरत नहीं है हर व्यक्ति को दूसरे से सहमत या असहमत होने का अधिकार है आपने सभ्यता और शालीनतापूर्वक अपनी बातें रखीं जिसके लिए आपका और ऐसा ही करने वाले सभी टिप्पणीकर्ताओं का शुक्रगुजार हूँ महक


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