सिर्फ़ विदेशी नहीं, बल्कि देशी कम्पनियाँ भी खनिज सम्पदा लूट रही हैं… (सन्दर्भ – उड़ीसा का खनन घोटाला)… Orissa Mining Scam, Aditya Birla and Vedanta

कर्नाटक के रेड्डी बन्धुओं द्वारा किये गये अरबों रुपये के खनन घोटाले के बारे में काफ़ी कुछ लिखा-पढ़ा जा चुका है, इसी प्रकार झारखण्ड के (भ्रष्टाचार में “यशस्वी”) मुख्यमंत्री मधु कौड़ा के बारे में भी हंगामा बरपा हुआ था और उनके रुपयों के लेनदेन और बैंक खातों के बारे में अखबार रंगे गये हैं। लगता है कि भारत की खनिज सम्पदा, कोयला, लौह अयस्क इत्यादि कई-कई अफ़सरों, नेताओं, ठेकेदारों (और अब नक्सलियों और माओवादियों) के लिये भी अनाप-शनाप कमाई का साधन बन चुकी है, जहाँ एक तरफ़ नेताओं और अफ़सरों की काली कमाई स्विस बैंकों और ज़मीनों-सोने-कम्पनियों को खरीदने में लगती है, वहीं दूसरी तरफ़ नक्सली खनन के इस काले पैसे से हथियार खरीदना, अन्दरूनी आदिवासी इलाकों में अपने पठ्ठे तैयार करने और अपना सूचना तंत्र मजबूत करने में लगाते हैं।

ट्रांसपेरेंसी इण्टरनेशनल के एक सक्रिय कार्यकर्ता श्री बिस्वजीत मोहन्ती द्वारा सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार आदित्य बिरला और एस्सेल समूह द्वारा लगभग 2000 करोड़ रुपये से अधिक का अवैध उत्खनन किया गया है। इस जानकारी के अनुसार उड़ीसा प्रदूषण नियंत्रण मण्डल और उड़ीसा वन विभाग के उच्च अधिकारियों की कार्यशैली और निर्णय भी गम्भीर आशंकाओं के साये में हैं। उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी कर्नाटक के येद्दियुरप्पा की तरह ईमानदार और साफ़ छवि के माने जाते हैं, लेकिन उनकी पीठ पीछे कम्पनियाँ और अधिकारी मिलकर जो खेल कर रहे हैं, वह अकल्पनीय है। ऐसा तो सम्भव ही नहीं है कि जिन नक्सलियों और माओवादियों का राज देश के एक-तिहाई हिस्से (जिसमें उड़ीसा का बड़ा इलाका शामिल है) में चलता हो और उन्हें इस अवैध उत्खनन के बारे में पता न हो।

असल में यह सारा खेल ठेकेदार-कम्पनियों और नक्सलियों का मिलाजुला होता है, सबका हिस्सा बँटा हुआ होता है, क्योंकि उस इलाके में सरकारों की तो कुछ चलती ही नहीं है। उदाहरण के तौर पर उड़ीसा के विजिलेंस विभाग ने 151 छोटी खदानों को पर्यावरण कानूनों और राजस्व के विभिन्न मामलों में केस दर्ज करके बन्द करवा दिया, लेकिन घने जंगलों में स्थित बड़ी कम्पनियों को लूट का खुला अवसर आज भी प्राप्त है। क्योंझर (डोलोमाइट), जिलिम्गोटा (लौह अयस्क) और कसिया (मैगनीज़) की एस्सेल और बिरला की खदानें 2001 से 2008 तक बेरोकटोक अवैध चलती रहीं हैं। इन कम्पनियों को सिर्फ़ 2,76,000 मीट्रिक टन का खनन करने की अनुमति थी, जबकि इन्होंने इस अवधि में 1,38,0391 मीट्रिक टन की खुदाई करके सरकार को सिर्फ़ 6 साल में 1178 करोड़ का चूना लगा दिया। संरक्षित वन क्षेत्र में अमूमन खुदाई की अनुमति नहीं दी जाती, लेकिन इधर वन विभाग भी मेहरबान है और उसने 127 हेक्टेयर के वन क्षेत्र में खदान बनाने की अनुमति दे डाली… और फ़िर भी अनुमति धरी रह गई अपनी जगह… क्योंकि जब वास्तविक स्थिति देखी गई तो “भाई” लोगों ने 127 की बजाय 242 हेक्टेयर वन क्षेत्र में खुदाई कर डाली। यदि पर्यावरण प्रेमी और सूचना के अधिकार वाले जागरुक लोग समय पर आवाज़ नहीं उठाते तो शायद ये कम्पनियाँ खुदाई करते-करते भुवनेश्वर तक पहुँच जातीं।

मजे की बात तो यह है कि इन कम्पनियों को पर्यावरण मंत्रालय और राज्य के खनन विभागों की अनुमति भी बड़ी जल्दी मिल जाती है… क्योंकि इन विभागों के उच्च अधिकारियों से लेकर वन-रक्षक के हाथ “रिश्वत के ग्रीज़” से चिकने बना दिये जाते हैं। सूचना के अधिकार कानून से भी क्या होने वाला है, क्योंकि सरकार ने अपने लिखित जवाब में बता दिया कि “आपकी शिकायत सही पाई गई है और उक्त खदान में खनन कार्य बन्द किया जा चुका है…” जबकि उस स्थान पर जाकर देखा जाये तो वह खदानें बाकायदा उसी गति से चल रही हैं, अब उखाड़ लो, जो उखाड़ सकते हो…।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित एक विशेष पैनल ने अपनी सनसनीखेज़ रिपोर्ट में पाया है कि उड़ीसा में 215 खदानें ऐसी हैं, जिनके खनन लाइसेंस 20 साल पहले ही खत्म हो चुका है। पैनल ने कहा है कि घने जंगलों में ऐसी कई खदाने हैं जो अवैध रुप से चल रही हैं जिन्होंने न तो किसी प्रकार का पर्यावरण NOC लिया है न ही उनके लाइसेंस हैं (कोई बच्चा भी बता सकता है कि इस प्रकार की खदानों से किसकी कमाई होती होगी… पता नहीं नक्सलवादी नेता ऊँचे-ऊँचे आदर्शों की बातें क्यों करते हैं?)। इस लूट में कोल इंडिया लिमिटेड के उच्चाधिकारियों की मिलीभगत से महानदी कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड भी दोनों हाथों से अवैध खनन कर रही है। यह खेल “खनिज सम्पदा छूट कानून 1960” के नियम 24A(6) के तहत किया जा रहा है, जबकि इस कानून को इसलिये बनाया गया था ताकि कोई खदान सरकारी स्वीकृति मिलने की देरी होने पर भी चालू हालत में रखी जा सके। इस नियम के तहत जब तक लाइसेंस नवीनीकरण नहीं होता तब तक उसी खदान को अस्थायी तौर पर शुरु रखने की अनुमति दी जाती है। उड़ीसा में इन सैकड़ों मामलों में खदानों के लाइसेंस पूरे हुए 10, 15 या 20 साल तक हो चुके हैं, न तो नवीनीकरण का आवेदन किया गया, न ही खदान बन्द की गई…।

राष्ट्रीय वन्य जीव क्षेत्र (नेशनल पार्क) के आसपास कम से कम 2 किमी तक कोई खदान नहीं होनी चाहिये, लेकिन इस नियम की धज्जियाँ भी सरेआम उड़ीसा में उड़ती नज़र आ जाती हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने इन खदान मालिकों को आज के वर्तमान बाजार भाव के हिसाब से लीज़ का पैसा चुकाने को कहा है, और पिछली लूट को यदि छोड़ भी दें तब भी सरकार के खजाने में इस कदम से करोड़ों रुपये आयेंगे। उल्लेखनीय है कि जब खनन करने वाली कम्पनी को 5000 रुपये का फ़ायदा होता है तब सरकार के खाते में सिर्फ़ 27 रुपये आते हैं (रॉयल्टी के रुप में), लेकिन ये बड़ी कम्पनियाँ और इनके मालिक इतने टुच्चे और नीच हैं कि ये 27 रुपये भी सरकारी खजाने में जमा नहीं करना चाहते, इसलिये अवैध खनन के जरिये अफ़सरों, ठेकेदारों और नक्सलियों-माओवादियों की मिलीभगत से सरकार को (यानी प्रकारांतर से हमें भी) चूना लगता रहता है। आदित्य बिरला की कम्पनी पर आरोप है कि उसने लगभग 2000 करोड़ रुपये का अवैध खनन सिर्फ़ उड़ीसा में किया है। यदि सूचना का अधिकार न होता तो विश्वजीत मोहन्ती जैसे कार्यकर्ताओं की मेहनत से हमें यह सब कभी पता नहीं चलता…। वेदान्ता और पोस्को द्वारा की जा रही लूट के बारे में काफ़ी शोरगुल और हंगामा होता रहता है, लेकिन भारतीय कम्पनियों द्वारा खनन में तथा माओवादियों द्वारा जंगलों में अवैध वसूली और लकड़ी/लौह अयस्क तस्करी के बारे में काफ़ी कम बात की जाती है, जबकि सारे के सारे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं (कुछ झोलेवालों को यह मुगालता है कि नक्सलवादी या माओवादी किसी परम पवित्र उद्देश्य की लड़ाई लड़ रहे हैं…)। उधर रेड्डी बन्धुओं ने तो आंध्रप्रदेश और कर्नाटक की सीमा के चिन्ह भी मिटा डाले हैं ताकि जब जाँच हो, या कोई ईमानदार अधिकारी उधर देखने जाये तो उसे, कभी कर्नाटक तो कभी आंध्रप्रदेश की सीमा का मामला बताकर केस उलझा दिया जाये…

लेकिन सूचना के इस अधिकार से हमें सिर्फ़ घोटाले की जानकारी ही हुई है… न तो कम्पनियों का कुछ बिगड़ा, न ही अधिकारियों-ठेकेदारों का बाल भी बाँका हुआ, न ही मुख्यमंत्री या किसी अन्य मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया … सूचना हासिल करके क्या उखाड़ लोगे? सजा दिलाने के लिये रास्ता तो थाना-कोर्ट-कचहरी-विधानसभा-लोकसभा के जरिये ही है, जहाँ इन बड़ी-बड़ी कम्पनियों के दलाल और शुभचिन्तक बैठे हैं। मध्यप्रदेश और राजस्थान के जिन IAS अधिकारियों के घरों से छापे में करोड़ों रुपये निकल रहे हैं, उन्हें सड़क पर घसीटकर जूतों से मारने की बजाय उन्हें उच्च पदस्थापनाएं मिल जाती हैं तो कैसा और क्या सिस्टम बदलेंगे हम और आप?

भई… जब देश की राजधानी में ऐन प्रधानमंत्री की नाक के नीचे कॉमनवेल्थ खेलों के नाम पर करोड़ों रुपये दिनदहाड़े लूट लिये जाते हों तो उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ के दूरदराज के घने जंगलों में देखने वाला कौन है… यह देश पूरी तरह लुटेरों की गिरफ़्त में है…कोई दिल्ली में लूट रहा है तो कोई क्योंझर या मदुरै या जैसलमेर में…

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17 Comments

  1. August 20, 2010 at 11:58 am

    देश के संसाधन है खदाने और इन पर कब्जा करने के लिए नक्सलवादी "प्रजाहित" में हथियार उठाये हुए है. ढाल बेशक आदिवासी है और यह भी एक तरह का शोषण है.

  2. August 20, 2010 at 12:21 pm

    सुरेश जी,सारी कंपनियाँ लूट के लिए ही बनती हैं। इस का रहस्य कंपनी कानून में छिपा है। कंपनी में किसी का कोई व्यक्तिगत वित्तीय दायित्व नहीं होता। इस तरह वहाँ किसी के लिए कोई नुकसान का सौदा नहीं होता। अधिक से अधिक लगाई गई पूंजी जाती है। नफा अपना और नुकसान पब्लिक का। इसी कारण से कंपनियाँ लूट का अच्छा जरिया हैं। अब तो इस के साथ लिमिटेड लाएबिलिटी पार्टनरशिप फर्म के लिए कानून बन गया है और बड़ी संख्या मे ऐसी फर्में पंजीकृत हो रही हैं। वे छोटे और मध्यम पैमाने की लूट का जरिया बनेंगी।

  3. August 20, 2010 at 12:31 pm

    जब देशी लोग राज कर रहे हैं तो देशी कंपनियों से कैसा बैर :)और फिर वे कम से कम कुछ आड़-पर्दा तो रख रहे हैं, घने जंगलों में लूट रहे हैं…असली डकैतियां तो विधानसभाओं और संसद में बैठकर डाली जा रही हैं…दिल्‍ली में जब तक डकैतियां नहीं रुकेंगी…तब तक ये घटनाएं कहां रुकनी हैं

  4. August 20, 2010 at 1:47 pm

    अब ये भ्रष्टाचारी देश भ्रष्टाचार की इतनी हदे पार कर चुका है कि अब भ्रष्टाचार को भी शरम आ रही होगी.भारत और किसी चीज मे नंबर 1 बने न बनेलेकिन आने वाले सालो मे भ्रष्टाचार और जनसंख्या मे जरुर नंबर 1 होगा.और तब हमारे चोर नेता गर्व से कहेँगे देखिये हमने भारत को नंबर 1 पर पहुचा दिया है.और तब हमारी पब्लिक ताली भी बजायेगी. हा हा हा हा हा हा हाहा हा हा हा हा हा हा

  5. August 20, 2010 at 1:58 pm

    जागरूक करने का उतम प्रयास।

  6. August 20, 2010 at 4:08 pm

    मध्य वर्ग और इससे ऊपर के लोगों खासकर नई पीढ़ी को भारत से कोई भावनात्मक लगाव नहीं रह गया है, इसीलिए इन सब समस्याओं के विरोध में कोई नहीं आता. भारत जब रहने लायक नहीं रह जाएगा तब सभी अमेरिका और यूरोप सैटल हो जाएंगे. जो नहीं हो पाएंगे उनकी वो जानें. बाकी नेता और कंपनियों के मालिक तो पहले ही साल के ग्यारह महीने विदेशों में गुजारते हैं. पैसों के आगे पर्यावरण की बात ही व्यर्थ है.

  7. August 20, 2010 at 8:33 pm

    राम जी की चिड़िया राम जी का खेत | अपने देश के संसाधनों पे आमिर, विभिन्न कंपनियों और नक्सलियों का ही तो आधिकार और मौज है …. आम जन तो मूक दर्शक हैं | इन मूक दर्शकों में से भी कभी एक्का-दुक्का लोग मुह मार कर अपना घर भर लेते हैं | आम गरीब आदमी रोजी-रोटी के जुगाड़ में ही मस्त है, अफसर-नेता-कंपनी-नक्सली लुटने में मस्त हैं, आतंकवादी लोगों को मारने में मस्त है, थोड़े पढ़े लिखे लोग मॉडर्न बन कर विदेशी विचार-माल में मस्त है | सब मस्त हैं सिवाय 'रास्तरावादियों' के |

  8. August 21, 2010 at 3:03 am

    एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

  9. August 21, 2010 at 6:02 am

    देश की सम्पदा की खुली लूट बड़े मज़े से चल रही है, बिलकुल औपनिवेशिक माहौल है इस समय देश का. आपका ब्लोग तो हमारे लिये सुबह का अखबार या टेलिविज़न चैनल से भी बड़्कर हो गया है. वरना खबरों का जो हाल आज के मीडिया ने किया है वो कूड़ा-कचरा भर है. सुरेश जी, फिल्म "पीपली लाइव" की समीक्षा करता आपकी अगली ब्लोग पोस्ट का बेताबी से इंतज़ार रहेगा, यह फिल्म बहुत से सवाल उठाती है और आज के मीडिया पर करारा व्यंग भी है. हाँ, इस बीच हम कुछ ब्लोग मित्रों ने एक समीक्षा कर डाली है पीपली लाएव की! आमंत्रित हैं सभी !पीपली [लाइव]: मीडिया का स्टिंग ऑपरेशनhttp://samvedanakeswar.blogspot.com/

  10. Shah Nawaz said,

    August 21, 2010 at 11:51 am

    बहुत ही महतवपूर्ण एवं विस्तृत रिपोर्ट…. बर्बादे गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है,हर शाख पर उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?

  11. August 21, 2010 at 1:13 pm

    देश को लूट कर विदेशों में बसने की तैयारी तो ये आका लोग पहले ही कर चुके हैं, अब इनकी आपस में प्रतियोगिता चल रही है "कौन किस से कितना आगे लूट में "

  12. yash said,

    August 21, 2010 at 1:24 pm

    ye kafi shandar vebsaait hai, sarahniya kadam , jay hind, yashshreshthbharat.in

  13. August 22, 2010 at 6:44 am

    आपका ब्लॉग इस देश की भयावय स्तिथि का यथार्थ दर्पण है, जिसमें अपनेआप को देख कर शर्मिन्दगी महसूस होती है. यह सब पढ़ कर शरीर में बिजली सी कौंधती है और सोचने पर मजबूर कर देती है क्या ऐसे ही बर्बादी होती रहेगी इस राष्ट्र की.

  14. August 22, 2010 at 12:33 pm

    अच्छा लेख है और यह और भी अच्छा हो गया होता अगर येदुरप्पा के पक्ष में सफाई देने की चिंता से मुक्त होता। कितना अच्छा रहा होता अगर शोभाहीन होने की जगह येदुरप्पा ने सुषमा स्वराज के कृपा पात्र रेड्डियों को मंत्रिमण्डल से हटाये जाने के सवाल पर् त्याग पत्र दे दिया होता।

  15. August 22, 2010 at 12:49 pm

    आदरणीय वीरेन्द्र जैन साहब – हालांकि मैंने अपने लेख में कहीं भी येदियुरप्पा का नाम नहीं लिखा है और न ही उन्हें सही बताया है, फ़िर भी यदि आपको ऐसा लगता है, तो मैं असहाय हूं…। फ़िलहाल मैं मीडिया के दोगले चरित्र, दोगली रिपोर्टिंग, खबरों के बिकाऊ होने और पत्रकारों-चैनलों के पक्षपात की तरफ़ ध्यान केन्द्रित करने की कोशिश कर रहा हूं… शायद इसलिये आपको ऐसा आभास हुआ होगा…। जब तक मीडिया में कांग्रेस सहित अन्य कुकुरमुत्ता दलों के पक्ष एवं भाजपा-संघ-हिन्दुत्व के प्रति विरोध का पक्षपात जारी रहेगा… तब तक यह तुलना करना मेरी मजबूरी है, क्योंकि जब लगभग समूचा मीडिया तन्त्र भाजपा-संघ-हिन्दुत्व को चारों ओर से घेरकर मारने की ताक मे है, मेरे जैसा अदना सा लेखक इस मीडिया के चेहरे से नकाब उतारने की चींटी बराबर कोशिश तो करेगा ही… इस लेख का उद्देश्य भी सिर्फ़ इतना ही था कि जैसे ही नवीन पटनायक सेकुलर हुए (भाजपा-शिवसेना का साथ छोड़ते ही व्यक्ति सेकुलर हो जाता है) वैसे ही उनके खिलाफ़ खबरों को प्रमुखता मिलना बन्द हो गईं…

  16. Dhananjay said,

    August 23, 2010 at 4:22 am

    @ Suresh Chiplunkarआपकी टिप्पणी पर. इससे मेरे पागल मन में यह विचार आता है कि अगर नरेंद्र मोदी भा ज पा छोड़कर अपनी पार्टी बना लें और कांग्रेस से गठजोड़ कर लें तो सीबीआई जो अभी ओवर टाइम कर रही है, खड़े पैर बेरोजगार हो जायेगी और मीडिया का क्या होगा जिसकी दूकान ही मोदी विरोध पर चल रही है? वैसे मोदी पर मुझे पूरा भरोसा है कि वे ऐसा काम नहीं करेंगे कि इन लोगों के पेट पर लात पड़े.रही बात लूट कि तो भैया शाह नवाज़ साहब ने तो फरमा ही दिया है कि क्या हो रहा है. अब तो यही इंतज़ार है कि कब १७८९ फ़्रांस क्रांति जैसी कोई क्रांति इस देश में होती है. वैसे आज के युवा भी सिर्फ टेक पढाई कर के किसी मल्टी नॅशनल में मोटी तनखा पर नौकरी करने के पीछे पागल हैं. ये क्रांति-फ्रान्ति के पीछे कौन पड़े.

  17. August 23, 2010 at 11:12 pm

    @ प्रिय सुरेशजीक्या केवल नाम देने न देने से ही असली मंतव्य का पता चलता है! भोले लोगों को भूल भुल्लैया देते देते आप सब को एक ही तरह से मत हाँकिये। रही मीडिया की बात सो वह कितना बिकाउ है यह आमिरखान ने पीपली लाइव में बेहतर ढंग से दिखाया है पर इसमें भी दो बातें हैं पहली तो यह है कि बिकाऊ मीडिया पैसे और सुविधाओं के लिए बिकता है उसे हिन्दू, मुस्लिम, भाजपा, कांग्रेस विरोधी या समर्थक नहीं माना जा सकता इसलिए उस पर दोनों तरह के आरोप नहीं लगाये जा सकते। दूसरे सब जानते हैं, और आप मध्य प्रदेश के मीडिया कर्मी हैं सो बहुत अच्छी तरह से जानते होंगे कि किसने मीडिया को खरीदने के लिए बकायदा मीडिया सैल बनाया हुआ है और किसके पास कितना अवैध धन है। अतः जब मीडिया अपनों वालों का साथ दे तो सही और न दे तो बिका हुआ मानने की नीति संशोधन माँगती है।


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