>एक ग़ज़ल : न पर्दा उठेगा ….

>एक ग़ज़ल ; न पर्दा उठेगा ….

न पर्दा उठेगा , न दीदार होगा
तो सज्दा तिरे दर पे सौ बार होगा

तिरे अंजुमन में हमीं जब न होंगे
तो फिर कौन हम-सा तलबगार होगा

बहुत दिन हुए हैं कि हिचकी न आई
यक़ीनन मिरा यार बेजार होगा

मुहब्बत है कोई तमाशा नहीं है
सरेआम मुझसे न इजहार होगा

दिल-ए-नातवाँ क्यों तू घबरा रहा है ?
मसीहा है ख़ुद वो न बीमार होगा

जो पर्दा उठेगा तो दुनिया कहेगी
ज़माने में ऐसा कहाँ यार होगा !

वो जिस दिन मिरे हम सफ़र होंगे ’आनन’
सफ़र ज़िन्दगी का न दुश्वार होगा

-आनन्द

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