>अचानक सभी को "न्यायालय के सम्मान"(?) की चिंता क्यों सताने लगी है?… Ram Janmabhoomi Court Verdict, Ayodhya Secularism

>पिछले एक-दो महीने से सभी लोगों ने तमाम चैनलों के एंकरों को गला फ़ाड़ते, पैनलिस्ट बने बैठे फ़र्जी बुद्धिजीवियों को बकबकाते और अखबारों के पन्ने रंगे देखे होंगे कि अयोध्या के मामले में फ़ैसला आने वाला है हमें “न्यायालय के निर्णय का सम्मान”(?) करना चाहिये। चारों तरफ़ भारी शोर है, शान्ति बनाये रखो… गंगा-जमनी संस्कृति… अमन के लिये उठे हाथ… सुरक्षा व्यवस्था मजबूत… भौं-भौं-भौं-भौं-भौं-भौं… ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला… आदि-आदि। निश्चित ही सभी के कान पक चुके होंगे अयोध्या-अयोध्या सुनकर, मीडिया और सेकुलरों ने सफ़लतापूर्वक एक जबरदस्त भय और आशंका का माहौल रच दिया है कि (पहले 24 सितम्बर) अब 30 सितम्बर को पता नहीं क्या होगा? आम आदमी जो पहले ही महंगाई से परेशान है, उसने कमर टूटने के बावजूद अपने घर पर खाने-पीने के आईटमों को स्टॉक कर लिया।

प्रधानमंत्री की तरफ़ से पूरे-पूरे पेज के विज्ञापन छपवाये जा रहे हैं कि “यह अन्तिम निर्णय नहीं है…”, “न्यायालय के निर्णय का पालन करना हमारा संवैधानिक और नैतिक कर्तव्य है”… “उच्चतम न्यायालय के रास्ते सभी के लिये खुले हैं…” आदि टाइप की बड़ी आदर्शवादी लफ़्फ़ाजियाँ हाँकी जा रही हैं, मानो न्यायालय न हुआ, पवित्रता भरी गौमूर्ति हो गई और देश के इतिहास में न्यायालय से सभी निर्णयों-निर्देशों का पालन हुआ ही हो…

प्रणब मुखर्जी और दिग्विजय सिंह जैसे अनुभवी नेता से लेकर “बुरी तरह के अनुभवहीन” मनीष तिवारी तक सभी हमें समझाने में लगे हुए हैं कि राम मन्दिर मामले के सिर्फ़ दो ही हल हैं, पहला – दोनों पक्ष आपस में बैठकर समझौता कर लें, दूसरा – सभी पक्ष न्यायालय के निर्णय का सम्मान करें, तीसरा रास्ता कोई नहीं है। यानी संसद जो देश की सर्वोच्च शक्तिशाली संस्था है वह “बेकार” है, संसद कुछ नहीं कर सकती, वहाँ बैठे 540 सांसद इस संवेदनशील मामले को हल करने के लिये कुछ नहीं कर सकते। यह सारी कवायद हिन्दुओं को समझा-बुझाकर मूर्ख बनाने और मामले को अगले और 50 साल तक लटकाने की भौण्डी साजिश है। क्योंकि शाहबानो के मामले में हम देख चुके हैं कि किस तरह संसद ने उच्चतम न्यायालय को लतियाया था, और वह कदम न तो पहला था और न ही आखिरी…।

अरुण शौरी जी ने 1992 में एक लेख लिखा था और उसमें बताया था कि किस तरह से देश की न्यायपालिका को अपने फ़ायदे के लिये नेताओं और सेकुलरों द्वारा जब-तब लताड़ा जा चुका है – गिनना शुरु कीजिये…

एक- यदि हम अधिक पीछे न जायें तो जून 1975 में इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ने श्रीमती गांधी को चुनाव में भ्रष्‍ट आचरण का दोषी पाकर छह सालों के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्‍य ठहरा दिया था। न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ “प्रायोजित प्रदर्शन” करवाये गये। जज का पुतला जलाया गया। श्रीमती गांधी ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय में फैसले के खिलाफ अपील की। उनके वकील ने न्‍यायालय से कहा, ‘’सारा देश उनके (श्रीमती गांधी के) साथ है। उच्‍च न्‍यायालय के निर्णय पर ‘स्‍टे’ नहीं दिया गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।” सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने सशर्त ‘स्‍टे’ दिया। देश में आपात स्थिति लागू कर दी गई, हजारों लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया। चुनाव-कानूनों में इस प्रकार परिवर्तन किया गया कि जिन मुद्दों पर श्रीमती गांधी को भ्रष्‍ट-आचरण का दोषी पाया गया था वे आपत्तिजनक नहीं माने गये, वह भी पूर्व-प्रभाव के साथ। कहा गया कि तकनीकी कारणों से जनादेश का उल्‍लंघन नहीं किया जा सकता। “तथाकथित प्रगतिशील” लोगों ने इसकी जय-जयकार की, उस समय किसी को न्यायपालिका के सम्मान की याद नहीं आई थी।

दो- कई वर्षों की मुकदमेबाजी तथा नीचे के न्‍यायालयों के कई आदेशों के बाद आखिरकार 1983 में सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने आदेश दिया कि वाराणसी में शिया-कब्रगाह में सुन्नियों की दो कब्रें हटा दी जायें। उत्तर प्रदेश के सुन्नियों ने इस निर्णय पर बवाल खड़ा कर दिया (जैसा कि वे हमेशा से करते आये हैं)। उत्तर प्रदेश की सरकार ने कहा कि न्यायालय का आदेश लागू करवाने पर राज्य की शांति, व्यवस्था को खतरा पैदा हो जायेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही आदेश के कार्यान्वयन पर दस साल की रोक लगा दी। लेकिन संविधान के किसी “हिमायती”(?) ने जबान नहीं खोली।

तीन- 1986 में सर्वोच्च न्यायालय ने घोषित किया कि, जिस मुस्लिम पति ने चालीस साल के बाद अपनी लाचार और बूढ़ी पत्नी को छोड़ दिया है, उसे पत्नी को गुजारा भत्ता देना चाहिये। इसके खिलाफ भावनाएँ भड़काई गईं। सरकार ने डर कर संविधान इस प्रकार बदल दिया कि न्यायालय का फैसला प्रभावहीन हो गया। राजीव भक्तों ने कहा कि यदि “ऐसा नहीं करते तो मुसलमान हथियार उठा लेते”। उस समय सभी सेकुलरवादियों ने वाह-वाह की, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को जूते लगाने का यह सबसे प्रसिद्ध मामला है।

चार-अक्तूबर 1990 में जब वी.पी.सिंह ने मण्डल को उछाला तो उनसे पूछा गया कि यदि न्यायालयों ने आरक्षण-वृद्धि पर रोक लगा दी तो क्या होगा? उन्होंने घोषणा की- हम इस बाधा को हटा देंगे, यानी संसद और विधानसभाओं में बहुमत के आधार पर न्यायालय के निर्णय को धक्का देकर गिरा देंगे, “प्रगतिशील”(?) लोगों ने उनकी पीठ ठोकी… न्यायालय के सम्मान की कविताएं गाने वाले दुबककर बैठे रहे…

पांच- 1991 में सर्वोच्च न्यायालय ने कावेरी जल विवाद पर अपना फैसला सुनाया-
“न्यायाधिकरण के आदेश मानने जरूरी हैं” परन्तु सरकार ने आदेश लागू नहीं करवाये। कभी कहा गया कर्नाटक जल उठेगा तो कभी कहा गया तमिलनाडु में आग लग जायेगी… न्यायपालिका के सम्मान की बात तो कभी किसी ने नहीं की?

छह- राज्यसभा में पूछे गये एक सवाल- कि रेल विभाग की कितनी जमीन पर लोगों ने अवैध कब्जा जमाया हुआ है? रेल राज्य मंत्री ने लिखित उत्तर में स्वीकार किया कि रेल्वे की 17 हजार एकड़ भूमि पर अवैध कब्जा है तथा न्यायालयों के विभिन्न आदेशों के बावजूद यह जमीन छुड़ाई नहीं जा सकी है क्योंकि गैरकानूनी ढंग से हड़पी गई जमीन को खाली कराने से “शांति भंग होने का खतरा”(?) उत्पन्न हो जायेगा… किसी सेकुलर ने, किसी वामपंथी ने, कभी नहीं पूछा कि “न्यायालय का सम्मान” किस चिड़िया का नाम है, और जो हरामखोर सरकारी ज़मीन दबाये बैठे हैं उन्हें कब हटाया जायेगा?

सात अफ़ज़ल गुरु को सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ाँसी की सजा कब की सुना दी है, उसके बाद दिल्ली की सरकार (ज़ाहिर है कांग्रेसी) चार साल तक अफ़ज़ल गुरु की फ़ाइल दबाये बैठी रही, अब प्रतिभा पाटिल दबाये बैठी हैं… सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय और सम्मान(?) गया तेल लेने।

आठ – लाखों टन अनाज सरकारी गोदामों में सड़ रहा है, शरद पवार बयानों से महंगाई बढ़ाये जा रहे हैं, कृषि की बजाय क्रिकेट पर अधिक ध्यान है। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि अनाज गरीबों में बाँट दो, लेकिन IMF और विश्व बैंक के “प्रवक्ता” मनमोहन सिंह ने कहा कि “…नहीं बाँट सकते, जो उखाड़ना हो उखाड़ लो… हमारे मामले में दखल मत दो”। कोई बतायेगा किस गोदाम में बन्द है न्यायपालिका का सम्मान?

ऐसी अनेक घटनाएं हैं, जिनमें सरेआम निचले न्यायालय से लेकर, विभिन्न अभिकरणों, न्यायाधिकरणों और सर्वोच्च न्यायालय तक के आदेशों, निर्देशों और निर्णयों को ठेंगा दिखाया गया है, इनमें जयपुर के ऐतिहासिक बाजारों में अवैध निर्माण को हटाने के न्यायालय के आदेशों से लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा एक “अवैध मस्जिद” को नष्ट करने के आदेशों तक की लम्बी श्रृंखला है, जिनकी अनुपालना “शांति भंग होने की आशंका”(?) से नहीं की गई, इसके उलट बंगाल की अवैध मस्जिद को तो नियमित ही कर दिया गया।

इनका पहला सबक है, कि सरकार और कानून एक खोखला मायाजाल है। जब शासक वर्ग श्रीमती गाँधी की तरह अपने स्वार्थों के लिये कानून को बदल देता है, जब न्यायालय आपात-स्थिति में दिए गये निर्णयों की तरह शासकों के भय से खुद कानून की हत्या कर देते हैं, जब सरकार शाहबानों मामले की तरह “एक वर्ग के भय”(?) से घुटने टेक देती है, जब सरकार आतंकवादियों की चुनौती का सामना करने में कमजोर साबित होती है तो दूसरे भी यह नतीजा निकालते हैं, कि सरकार को झुकाया जा सकता है- झुकाया जाना चाहिये, कि न्याय और कानून भी ताकतवर के कहे अनुसार चलते हैं, परन्तु राम मन्दिर के मामले में हिन्दुओं को लगातार नसीहतें, भाषण, सबक, सहिष्णुता के पाठ, नैतिकता की गोलियाँ, गंगा-जमनी संस्कृति के वास्ते-हवाले सभी कुछ दिया जा रहा है। कारण साफ़ है कि यह उस समुदाय से जुड़ा हुआ मामला है जो कभी वोट बैंक नहीं रहा, हजारों जातियों में टुकड़े-टुकड़े बँटा हुआ है, जिसका न तो कोई सांस्कृतिक स्वाभिमान है, और न ही जिसे इस्लामिक वहाबी जेहाद के खतरे तथा चर्च और क्रॉस की “मीठी गोलीनुमा” छुरी का अंदाज़ा है।

सेकुलरिज़्म के पैरोकार और वामपंथ के भोंपू जिसे ‘हिन्दू कट्टरपंथी’ कहते हैं वह रातोंरात पैदा नहीं हो गया है, उन्होंने देखा है कि सामान्य निवेदनों पर जो न्यायालय और सरकार कान तक नहीं देते वे “संगठित समुदाय के एक धक्के” से दो सप्ताह में ही ध्यान से बात सुनने को तैयार हो जाते हैं। यह सबक अच्छा तो नहीं है, पर कांग्रेसी सरकारों और कछुआ न्यायालयों ने ही यह सबक उन्हें सिखाया है। कांग्रेस का छद्म सेकुलरिज़्म, वामपंथ का मुस्लिम प्रेम और हिन्दू विरोध, हुसैन और तसलीमा टाइप का सेकुलरिज़्म और कछुआ न्यायालय ये चारों ही हिन्दू कट्टरपंथ को जन्म देने वाले मुख्य कारक हैं…

रही मीडिया की बात, तो उसे विज्ञापन की हड्डी डालकर, ज़मीन के टुकड़े देकर, आसानी से खरीदा जा सकता है, खरीदा जा चुका है…। जहाँ मुस्लिम और सिख साम्प्रदायिकता ने लगातार सरकार से मनमानी करवाई है, हमारे समाचार-पत्रों और चैनलों ने दोहरे-मापदण्ड, और कुछ मामलों में तो “दोगलेपन” का सहारा लिया है। जम्मू के डेढ़ लाख शरणार्थियों की अनदेखी इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। क्योंकि यदि वे मुसलमान होते, तो क्या समाचार-पत्र और मानवाधिकार संगठन उनको इस तरह कभी नजर अन्दाज नहीं करते। मीडिया ने पिछले कुछ दिनों से जानबूझकर भय और आशंका का माहौल बना दिया है, ताकि आमतौर पर सहिष्णु और शान्त रहने वाला हिन्दू इस मामले से या तो घबरा जाये या फ़िर उकता जाये।

अयोध्या मामले में भी अखबारों और बिकाऊ चैनलों का यही रुख है। किसी अखबार ने यह नहीं लिखा, कि मध्य-पूर्व के देशों में सड़कें चौड़ी करने जैसे मामूली कारणों से सैंकड़ों मस्जिदें गिरा दी गई हैं। किसी अखबार ने नहीं लिखा कि सऊदी अरब की सरकार ने सामान्‍य नहीं, बल्कि पैगम्‍बर के साथियों की कब्रों और मकबरों तक को ध्‍वस्‍त किया है। जब यह दिखने लगा कि वि.हि.प. द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य वजनी हैं तो उनको अनदेखा किया गया, पुरातात्विक साक्ष्यों को मानने से इंकार कर दिया गया, फ़र्जी इतिहासकारों के जरिये तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। इस दोगलेपन ने भी हिन्दुओं का गुस्सा उतना ही भड़काया है, जितना सरकार के मुस्लिम साम्प्रदायिकता के सामने घुटने टेकने ने। हिन्दुओं का यह वर्षों से दबा हुआ गुस्सा, बाबरी ढाँचे के विध्वंस या गुजरात दंगों के रुप में कभीकभार फ़ूटता है।

बकौल अरुण शौरी… “…इस दोगलेपन तथा वहाबी साम्प्रदायिकता और आतंकवाद के सामने घुटने-टेकू सरकारी नीति के कारण हिन्दू भावनाएँ जितनी उग्र हो गई है उनको कम समझना जबर्दस्त भूल होगी…”। संदेश साफ है, ”यदि आप शाहबानों के मामले में सरकार से समर्पण करा सकते हैं तो हम अयोध्या के मामले में ऐसा करेंगे। यदि आप 10 फीसदी का वोट बैंक बना रहे हैं, तो हम 80 प्रतिशत लोगों का वोट-बैंक बनायेंगे, चाहे उसके लिये कोई भी तरीका अपनाना पड़े”। न्यायालय का सम्मान तो हम-आप, सभी करते हैं, लेकिन उसे अमल में भी तो लाकर दिखाओ… सिर्फ़ हिन्दुओं को नसीहत का डोज़ पिलाने से कोई हल नहीं निकलेगा। शाहबानो और अफ़ज़ल गुरु के मामलों में उच्चतम न्यायालय की दुर्गति से सभी परिचित हो चुके हैं, “न्यायालय के सम्मान” के नाम पर हिन्दुओं को अब और बेवकूफ़ मत बनाईये… प्लीज़।

अयोध्या का राम मन्दिर आन्दोलन सात सौ साल पहले हुए एक “दुष्कर्म” का विरोध भर नहीं है, यह तो गत सत्तर सालों की नेहरुवादी-मार्क्सवादी राजनीति के विरोध का प्रतीक है, विशेष कर पिछले दस-बीस सालों की तुष्टीकरण, दलाली, दोमुंहेपन और वोट बैंक की राजनीति का, इसलिये अयोध्या विवाद का हल किसी ‘फारमूले’ में नहीं है। मानो यदि किसी हल पर सहमति हो भी जाती है लेकिन सेकुलर-वामपंथी राजनीति का घृणित स्वरूप ऐसा ही बना रहता है तो अयोध्या से भी बड़ा तथा उग्र आन्दोलन उठ खड़ा होगा।

फ़िर मामले का हल क्या हो??? सीधी बात है, न्यायालय की “टाइम-पास लॉलीपाप” मुँह में मत ठूंसो, संसद में आम सहमति(?) से प्रस्ताव लाकर, कानून बनाकर राम मन्दिर की भूमि का अधिग्रहण करके उस पर भव्य राम मन्दिर बनाने की पहल की जाये, सिर्फ़ और सिर्फ़ यही एक अन्तिम रास्ता है इस मसले के हल का… वरना अगले 60 साल तक भी ये ऐसे ही चलता रहेगा…

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>भारत-भारती वैभवम्

>

प्रिय बन्‍धु

आपके संस्‍कृतब्‍लाग संस्‍कृतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर अमित जी  ने बडी सुन्‍दर पंक्तियाँ राष्‍ट्र के बारे में प्रस्‍तुत की हैं 

"भारत-भारती-वैभवं

अपने विचार ब्‍यक्‍त करके उत्‍साह वर्धन करें ।
संस्‍कृतलेखनप्रशिक्षणकक्ष्‍या का वर्तमान काल प्रकरण प्रस्‍तुत किया जा चुका है ।
पढें और लाभान्वित हों ।।



भवदीय: – आनन्‍द:

>कश्मीर के हिंसक हालात

>
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कश्मीर के हिंसक हालात
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>सपेरों का देश

>
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भारत को पश्चिमी देशों में सपेरों का देश कहा जाता रहा है | सपेरों के इस देश को देखिये |
[endtext]

>भारत में खेती

>

>मुक्तिका: फिर ज़मीं पर….. संजीव ‘सलिल’

>मुक्तिका:

फिर ज़मीं पर…..

संजीव ‘सलिल’
*
फिर ज़मीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नाफ़िर कहीं नादिर क्यों है?
*
फिर ज़मीं पर कहीं बे-घर कहीं बा-घर क्यों है?
फिर ज़मीं पर कहीं नासिख कहीं नाशिर क्यों है?
*
चाहते हम भी तुम्हें चाहते हो तुम भी हमें.
फिर ज़मीं पर कहीं नाज़िल कहीं नाज़िर क्यों है?
*
कौन किसका है सगा और किसे गैर कहें?
फिर ज़मीं पर कहीं ताइर कहीं ताहिर क्यों है?
*
धूप है, छाँव है, सुख-दुःख है सभी का यक सा.
फिर ज़मीं पर कहीं तालिब कहीं ताजिर क्यों है?
*
ज़र्रे -ज़र्रे में बसा वो न ‘सलिल’ दिखता है.
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं  मंदिर क्यों है?
*
पानी जन आँख में बाकी न ‘सलिल’ सूख गया.
फिर ज़मीं पर कहीं सलिला कहीं सागर क्यों है?
*
— दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

कुछ शब्दों के अर्थ : काफ़िर = नास्तिक, धर्मद्वेषी, क़ादिर = समर्थ, ईश्वर, नाफ़िर = घृणा करनेवाला, नादिर = श्रेष्ठ, अद्भुत, बे-घर = आवासहीन, बा-घर = घर वाला, जिसके पास घर हो, नासिख = लिखनेवाला,  नाशिर = प्रकाशित करनेवाला, नाज़िल = मुसीबत, नाज़िर = देखनेवाला, ताइर = उड़नेवाला, पक्षी, ताहिर = पवित्र, यक सा = एक जैसा, तालिब =  इच्छुक, ताजिर = व्यापारी, ज़र्रे – तिनके, सलिला = नदी, बहता पानी,  सागर = समुद्र, ठहरा पानी.

>संस्‍कतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर अमित जी का स्‍वागत करें ।।

>
प्रिय बन्‍धु 

आपके अपने संस्‍कृत ब्‍लाग , संस्‍कृतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर अमित जी ने अपना पहला लेख भारत माता की वंदना के रूप में प्रस्‍तुत किया है ।

पुण्यमयी मम भारतमाता

टिप्‍पणियों से स्‍वागत करें ।
शारदा जी ने मेघदूत के श्‍लोकों की प्रस्‍तुति आरम्‍भ की है ा


भवदीय: – आनन्‍द:

>जरुर देखिये

>


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>देशसेवा करते शहीद होना अच्छा है या जहरीली दारु पीकर मरना…?…… Major Unnikrishnan, CPM Kerala, Achyutanandan

>यह प्रश्न सुनने में अजीब लगता है और सामान्यतः जवाब यही होगा कि देशसेवा के लिये शहीद होना निश्चित रुप से अच्छा है। लेकिन केरल के माननीय(?) मुख्यमंत्री वामपंथी श्री अच्युतानन्दन ऐसा नहीं सोचते, उनकी निगाह में जहरीली दारु पीकर मरने वाले की औकात, देश के एक जांबाज़ सैनिक से कहीं अधिक है… क्या कहा विश्वास नहीं होता? लेकिन ऐसा ही है साहब…। आपको तो याद ही होगा, पिछले साल जब ताज होटल के आतंकवादी हमले में शहीद हुए युवा कमाण्डो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के घर पर जब अच्युतानन्दन जी उनके पिता के पास संवेदना व्यक्त करने (?) गए थे, उस समय मेजर के घर की चेकिंग खोजी कुत्तों द्वारा करवाई गई थी, जिस कारण बुरी तरह से भड़के हुए शोक-संतप्त पिता ने मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन को दुत्कार कर अपने घर से भगा दिया था…। धिक्कारे जाने के बावजूद अच्युतानन्दन का बयान था कि “यदि वह घर संदीप का नहीं होता तो उधर कोई कुत्ता भी झाँकने न जाता…”। बाद में माकपा ने मामले की सफ़ाई से लीपापोती कर दी थी और मुख्यमंत्री ने शहादत का सम्मान(?) करते हुए, मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के परिजनों को केरल सरकार की तरफ़ से 3 लाख रुपए देने की घोषणा की थी (जो अब तक मिले या नहीं, पता नहीं चल सका है)।

अभी कुछ दिनों पहले केरल के मलप्पुरम जिले में जहरीली ताड़ी पीने से अब तक 26 लोगों की मौत हो चुकी है, और कुछ अंधे भी हुए हैं। वही राज्य, वही मुख्यमंत्री… लेकिन जहरीली शराब पीकर मरने वालों को “माननीय” ने 5 लाख रुपये प्रति व्यक्ति के मुआवज़े की घोषणा की है, जबकि अंधे होने वालों को 4 लाख रुपये एवं अन्य को एक लाख रुपये का मुआवज़ा देने की घोषणा की है। इसी के साथ सभी प्रभावितों का इलाज़ केरल सरकार के खर्च पर होगा।

अब आप ही सोचिये कि देशसेवा करते हुए शहीद होना ज्यादा फ़ायदे का सौदा है या जहरीली शराब पीकर मरना? यदि देशसेवा करते शहीद हुए, तो बूढ़े माता-पिता को सरकारी बाबुओं के धक्के खाने पड़ेंगे, मानो किसी मक्कार किस्म के मंत्री ने पेट्रोल पम्प देने की घोषणा कर भी दी तो वह इतनी आसानी से मिलने वाला नहीं है, जबकि पेंशन लेने के लिये भी दिल्ली के 10-15 चक्कर खाने पड़ेंगे सो अलग (हाल ही में खबर मिली है कि एक वीरता पदक प्राप्त सैनिक की विधवा को 70 रुपये… जी हाँ 70 रुपये मासिक, की पेंशन मिल रही है… सिर्फ़ 5 साल के लिये संसद में हल्ला मचाने के एवज़ में हजारों की पेंशन और सुविधाएं लेने वाले बतायें कि क्या 70 रुपये में वह विधवा एक किलो दाल भी खरीद सकेगी?)। इसकी बजाय परिवार के दो सदस्य जहरीली शराब पीकर मरें, तो दस लाख लो और मजे करो…

अब अच्युतानन्दन जी की इस “विलक्षण” सोच के पीछे की वजहों को समझने की कोशिश करते हैं। मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के माता-पिता को 3 लाख रुपये देने की घोषणा शायद इसलिये की होगी, कि उनका धकियाकर घर से बाहर किया जाना मीडिया की सुर्खियाँ बन चुका था, वरना शायद 3 लाख भी न देते, जबकि जहरीली शराब पीने वाले लोग पिछड़ी जातियों के “वोट बैंक” हैं इसलिये उन्हें 5 लाख दे दिये, वैसे भी उनकी जेब से क्या जाता है?

अब एक आश्चर्यजनक तथ्य भी जान लीजिये, जैसा कि सभी जानते हैं केरल देश का सर्वाधिक साक्षर प्रदेश है (साक्षरता दर लगभग 93% है), यही सबसे साक्षर प्रदेश आज की तारीख में सबसे बड़ा “बेवड़ा प्रदेश” बन चुका है। केरल में प्रति व्यक्ति शराब की खपत 8.3 लीटर हो चुकी है, अर्थात अमेरिका के बराबर और पोलैण्ड (8.1 लीटर) और इटली (8.0 लीटर) से भी अधिक (जबकि पंजाब का नम्बर दूसरा है – प्रति व्यक्ति खपत 7.9 लीटर)। पिछले साल केरल सरकार ने शराब पर टैक्स से 5040 करोड़ रुपये कमाए हैं, और यदि इस साल की पहली तिमाही के आँकड़ों को देखा जाये तो इस वर्ष लगभग 6500 करोड़ रुपये शराब से केरल सरकार को मिलने की सम्भावना है। यदि कोई व्यक्ति 100 रुपये की शराब खरीदता है तो लगभग 80 रुपये केरल सरकार की जेब में जाते हैं, 18 रुपये शराब निर्माता को और बाकी के 2 रुपये अन्य खर्चों के, यानी औसतन केरल का प्रत्येक व्यक्ति साल भर में 1340 रुपये की शराब पी जाता है… (कौन कहता है कि साक्षरता अच्छी बात होती है…?)।

लेकिन असली पेंच यहीं पर है… सोचिये कि जब आधिकारिक रुप से प्रतिवर्ष केरल सरकार को 5000 करोड़ रुपये मिल रहे हैं तो अनाधिकृत तरीके से नकली, जहरीली और अवैध शराब बेचने पर गिरोहबाजों को कितना मिलता होगा। मिथाइल अल्कोहल मिली हुई नकली और जहरीली शराब के रैकेट पर माकपा और कांग्रेस के कैडर का पूरा कब्जा है। अवैध शराब और ताड़ी की बिक्री से मिलने वाला करोड़ों रुपया जो शराब निर्माता की जेब में जाता है (राज्य सरकार को प्रति 100 रुपये की बिक्री पर मिलने वाले 80 रुपये), उसमें से एक मोटा टुकड़ा माकपा कैडर और नेताओं के पास पहुँचता है। कांग्रेस और वामपंथी दोनों पार्टियाँ मिलीभगत से अपना बँटवारा करती हैं, क्योंकि यही दोनों अदला-बदली करके केरल में सत्ता में आती रही हैं। कई बार, कई मौकों पर जहरीली शराब दुर्घटनाओं के बाद जाँच आयोग वगैरह की नौटंकी होती है, परन्तु फ़िर मामला ठण्डा पड़ जाता है। दारुकुट्टे और उनके परिजन मुआवज़ा लेकर चुप बैठ जाते हैं…

ऐसे में इस बार जहरीली शराब पीकर मरे हुए 26 लोगों के परिवार को 5 लाख रुपये देकर उनका मुँह बन्द करने की कोशिश की गई है, ताकि वे ज्यादा हल्ला न मचायें। (उल्लेखनीय है कि दुर्घटना के पहले दिन मुआवज़ा 1 लाख ही घोषित किया गया था, लेकिन जैसे ही हल्ला-गुल्ला अधिक बढ़ा, जाँच आयोग वगैरह की माँग होने लगी… तो अच्युतानन्दन ने इसे बढ़ाकर सीधे 5 लाख कर दिया…)

तात्पर्य यह कि शहीद संदीप उन्नीकृष्णन को 3 लाख रुपये का मुआवज़ा भले ही मजबूरी में दिया गया हो, लेकिन शराब से हुई इन 26 मौतों को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देना बहुत जरूरी था…वरना पोल खुलने का खतरा था। अब भले ही शहीद का मान और देश का सम्मान वगैरह जाये भाड़ में…
(सन्दर्भ : http://www.hindu.com/2010/09/09/stories/2010090958070400.htm)

हालांकि वर्तमान मामला “शहीद” और “बेवड़ों” के बीच मुआवज़े की तुलना का है, लेकिन कांग्रेसियों और वामपंथियों द्वारा मृतकों को मुआवज़े बाँटने में भी “सेकुलरिज़्म” का ध्यान रखा जाता है इसके दो उदाहरण हम पहले भी देख चुके हैं… यदि भूल गये हों तो याद ताज़ा कर लीजिये –

1) 17 अक्टूबर 2009 को कासरगौड़ जिले की ईरुथुंकादवु नदी में डुब जाने से चार बच्चों की मौत हो गई, जिनके नाम थे अजीत(12), अजीश(15), रतन कुमार(15) और अभिलाष(17), जो कि नीरचल के माहजन स्कूल के छात्र थे।

2) 3 नवम्बर 2009 को त्रिवेन्द्रम के अम्बूरी स्थित नेय्यर नदी में एक छात्र की डूब जाने की वजह से मौत हुई, जिसका नाम था साजो थॉमस(10)।

3) 4 नवम्बर 2009 को मलप्पुरम के अरीकोड में चेलियार नदी में आठ बच्चों की डूबने से मौत हुई, नाम हैं सिराजुद्दीन, तौफ़ीक, शमीम, सुहैल, शहाबुद्दीन, मोहम्मद मुश्ताक, तोइबा और शाहिद।

अर्थात केरल में एक माह के अन्तराल में 13 बच्चों की मौत एक जैसी वजह से हुई, ज़ाहिर सी बात है कि राज्य सरकार द्वारा मुआवज़े की घोषणा की गई, लेकिन त्रिवेन्द्रम और मलप्पुरम के हादसे में मारे गये बच्चों के परिजनों को 5-5 लाख का मुआवज़ा दिया गया, जबकि कासरगौड़ जिले के बच्चों के परिजनों को 1-1 लाख का… ऐसा क्यों हुआ, यह समझने के लिये अधिक दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है… (यहाँ पढ़ें…

इससे पहले भी पिछले साल एक पोस्ट में ऐसी ही ओछी और घटिया “सेकुलर” राजनीति पर एक माइक्रो पोस्ट लिखी थी (यहाँ देखें…) जिसमें बताया गया था कि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक पाकिस्तानी नागरिक को दस-दस लाख रुपये दिये गये (सम्मानित-प्यारे-छोटे भाई टाइप के पड़ोसी हैं… इसलिये), जबकि इधर मालेगाँव बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक मुसलमान को पाँच-पाँच लाख रुपये दिये गये, लेकिन अमरावती के दंगों में लगभग 75 करोड़ के नुकसान के लिये 137 हिन्दुओं को दिये गये कुल 20 लाख। धर्मनिरपेक्षता ऐसी ही होती है भैया…जो मौत-मौत में भी फ़र्क कर लेती है।

इसी प्रकार की धर्मनिरपेक्षता का घण्टा गले में लटकाये कई बुद्धिजीवी देश में घूमते रहते हैं… कभी नरेन्द्र मोदी को भाषण पिलाते हैं तो कभी हिन्दुत्ववादियों को नसीहतें झाड़ते हैं… लेकिन कभी खुद का वीभत्स चेहरा आईने में नहीं देखते…। काश, शहीद मेजर संदीप की एकाध गोली, कसाब के सीने को भी चीर जाती तो कम से कम हमारे टैक्स के करोड़ों रुपये बच गये होते… जो उसे पालने-पोसने में खर्च हो रहे हैं। टैक्स के इन्हीं पैसों को अपने “पूज्य पिता” का माल समझकर, नेता लोग इधर-उधर मुआवज़े बाँटते फ़िरते हैं… जबकि शहीद सैनिकों के बूढ़े माँ-बाप, विधवा और बच्चे धक्के खाते रहते हैं…

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>राशि ज्ञान

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प्रिय बन्‍धु

आपके संस्‍कृत जालपृष्‍ठसंग्राहक संस्‍कृतम्-भारतस्‍य जीवनम् पर आदरणीय ज्‍योतिषाचार्य जी ने
प्रारम्भिक राशिज्ञान सम्‍बन्धित लेख प्रकाशित किया है ।

जाल ज्योतिषं राशि ज्ञानं

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श्री प्रतुल जी ने हितकरी विद्या के बारे में एक श्‍लोक प्रस्‍तुत किया है
इसे आप यहॉं 

एषा विद्या हितकरी ।

पर आघात करके पढ सकते हैं ।।
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धन्‍यवाद



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