>मनमोहन सिंह जी का बयान न्याय को हतोत्साहित और भ्रष्टाचार को बढाने वाला है…?हमसब को इसका पुरजोड़ विरोध करना चाहिए !!!!!!!!!!!!!!!!!

>

इस  प्रधानमंत्री ने न्याय और संवेदनशीलता को एकदम भुला दिया है प्रधानमंत्री क़ी कुर्सी के अहं में ,अब तो इसने हद ही कर दी है …
शाबास सर्वोच्च न्यायालय, पूरे देश क़ी जनता आपके इस न्यायपूर्ण और इंसानियत भरे फैसले के साथ है और आपका आभारी है …
हमारा हमेशा से मानना रहा है क़ी कोई व्यक्ति किसी पद पर बैठकर महान नहीं बल्कि उस पद क़ी मर्यादा के अनुसार आचरण करने से होता है |
एक तरफ जहाँ सर्वोच्च न्यायालय के एक जज ने न्याय और इंसानियत को जिन्दा करने के लिए अभूतपूर्व निर्णय दिया और शरद पवार जैसे भ्रष्ट मंत्री क़ी वजह से सड़ चुकी व्यवस्था को आदेश दिया क़ी अनाज को सड़ाने से अच्छा है क़ी उसे गरीबों में मुफ्त बाँट दिया जाय | 
ऐसा आदेश सरकार को देकर सर्वोच्च न्यायालय के माननीय जज ने ना सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय के मर्यादा को बढाया बल्कि न्याय और इंसानियत का संतुलन कैसे होता है इसका अभूतपूर्व उदाहरण सरकार और इस देश क़ी जनता के सामने पेश किया | 
वहीँ दूसरी ओर हमारे देश के प्रधानमंत्री जो इस देश क़ी जनता के सेवा के लिए तनख्वाह पाते हैं ने ,इस आदेश के बाद सर्वोच्च न्यायालय को सरकार के नीतिगत मामलों से दूर रहने को कहा | ऐसा कहकर मनमोहन सिंह जी ने ना सिर्फ न्याय को हतोत्साहित करने का काम किया है बल्कि भ्रष्टाचार को बढाने तथा शरद पवार जैसे भ्रष्टाचारियों को सरकारी संरक्षण देने क़ी भी कोशिस क़ी है | मनमोहन सिंह जी ने ऐसा बयान देकर अपने मानसिक दिवालियापन और इस देश क़ी जनता के प्रति गंभीर असंवेदनशीलता का परिचय दिया है | अब वक्त आ गया है क़ी हमसब को मिलकर ऐसे निकम्मे प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री जैसे पद को छोड़ने के लिए मुहीम चलाने क़ी जरूरत है | शर्मनाक है मनमोहन सिंह जी का बयान और दिमागी दिवालियापन….?
हम ऐसे अन्याय और भ्रष्टाचार को पोषण देने वाले बयान देने वाले प्रधानमंत्री का पुरजोड़ विरोध करते हैं और हमें इस बात का बेहद दुःख है क़ी एक निकम्मा व्यक्ति हमारे देश के प्रधानमंत्री जैसे सम्माननीय पद पर बैठा है जिससे हमारा देश और समाज नरक बनता जा रहा है | आप सबसे भी आग्रह है क़ी आप लोग भी अपने स्वयं के अंतरात्मा के आवाज पर निड़र होकर इस प्रधानमंत्री के बारे में अपने विचार यहाँ रखें …

28 Comments

  1. September 6, 2010 at 2:19 pm

    >इन्हें ८.८ % विकास दर की चिंता है ! मांग और आपूर्ति का संतुलन बनाने का यह सबसे नायाब तरीका ढूढ़ निकाला है की जब उत्पाद लोगो की पहुँच( खरीदने की क्षमता ) से दूर होंगे तो अपने आप ही बाजार में विकास दर अच्छी दिखेगी ! Indian standard (style !!)

  2. September 6, 2010 at 3:40 pm

    >लंका में हरेक बावन गज का है या चोर चोर मौसेरे भाई या हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा ?आदि में से किसी भी एक या सारी कहावतों को इन नेताओं पर चस्पां किया जा सकता है . हल वही है जो ऋषियों – नबियों ने बताया है .सच्ची तौबा और अच्छा अमल .

  3. Suman said,

    September 6, 2010 at 4:35 pm

    >nice

  4. Mahak said,

    September 6, 2010 at 5:10 pm

    >बिलकुल सही बात है ,ऐसे व्यक्ति के प्रधानमन्त्री होने का देश को कोई लाभ नहीं आपसे सहमत हूँ जय कुमार जी महक

  5. Mahak said,

    September 6, 2010 at 5:15 pm

    >कृपया ध्यान दें इस ब्लॉग पर से अब comment moderation हटा लिया गया है

  6. September 6, 2010 at 6:09 pm

    >Mahak Ji, I agree with you!

  7. Mahak said,

    September 6, 2010 at 6:16 pm

    >जीशान भाई,सहमति के लिए शुक्रिया

  8. ZEAL said,

    September 6, 2010 at 7:29 pm

    >.बहुत सही मुद्दा उठाया , सहमत हूँ, आपकी बात से। .

  9. September 7, 2010 at 5:14 am

    >हमारे प्रधानमंत्री जी कुछ हों या ना हों पर एक सच्चे economist हैं और प्रधानमंत्री किसी economist को नहीं बल्कि किसी मानवतावादी राष्ट्रभक्त को ही होना चाहिए.

  10. September 7, 2010 at 5:24 am

    >अजी साहब ! इन प्रधान मंत्री को तो……….; मेरा वश चले तो इनके "राजनैतिक कुनबे" के साथ कान पकड़ कर सीधा अमेरिका छोड़ दिया जाये | पता नहीं भारत में क्यों जन्म ले लिया ? अच्छे कर्म ही होंगे जो भारत में जन्म लिया है पर अब अगले जन्म में क्या होगा भगवान् जाने ? इनका विरोध करने का, "ये "प्रस्ताव है तो मेरा समर्थन है |ब्लॉग संसद का "कोरम" पूरा नहीं होता इसके लिए सदस्यों को विचार करना चाहिए |

  11. Shah Nawaz said,

    September 7, 2010 at 5:25 am

    >बात तो सही है, लेकिन अनाज को मुफ्त में बांटने की सलाह भी अच्छी सलाह नहीं है. क्योंकि इससे लोगों की मुफ्तखोरी की आदत से परेशान हमारे देश की परेशानियां और भी बढेंगी. बल्कि सरकार को ज़िम्मेदारी के साथ सही बंदोबस्त करना चाहिए, और जो सरकार सही बंदोबस्त ना करे उस पर पेनल्टी लगनी चाहिए.

  12. Shah Nawaz said,

    September 7, 2010 at 5:27 am

    >और मेरे विचार से कुछ निर्णय अथवा सलाह से सहमति ना होने भर से किसी पर भी इस तरह ऊँगली उठाना भी सही नहीं है. वोह भी ऐसे समय में की सारी की सारी व्यवस्था ही भ्रष्ट हो चुकी है, ऐसे में अगर किसी में थोड़ी इमानदारी नज़र आती है, तो उसकी कद्र होनी चाहिए. चाहे अन्धो में काना राजा ही सही. मुझे तो लगता है की पुरे देश के जितने भी नेता हैं उनमे मनमोहन सिंह फिर भी कुछ ठीक हैं. वैसे अपनी-अपनी राय है जी.

  13. September 7, 2010 at 6:10 am

    >VICHAAR SHOONYA said…हमारे प्रधानमंत्री जी कुछ हों या ना हों पर एक सच्चे economist हैं और प्रधानमंत्री किसी economist को नहीं बल्कि किसी मानवतावादी राष्ट्रभक्त को ही होना चाहिए.====================================यदि गोदामो मे भरा अनाज बाजार मे बीकने आ गया या सस्ते मूल्य पर उपलब्ध हो गया या फिर गरिबो को मुफ्त मे उपलब्ध हो; ये तीनो उपाय भारतीय किसानो के लिए विनाश कारी होंगे !अनाज की बाजार मे उपलब्धी से उनकी किमत कम होगी, ये सीधा सीधा मांग और आपूर्ती का नियम है ! कोइ भी सामान्य अर्थसाश्त्र की जानकारी वाला यह समझा सकता है !अमरीका हरा साल लाखो टन अनाज समुद्र मे फेंक देता है , यदि वह अनाज खुले बाजार मे आ गया तो पूरी विश्व अर्थव्यवस्था चौपट !

  14. September 7, 2010 at 6:27 am

    >अंधेर नगरी चौपट राजा !! मेरे व्यक्तिगत विचार से कोर्ट और प्रधानमंत्री दोनों ही गलत है. आज यहाँ पर अधिकतर लोग प्रधानमंत्री को गलत और न्यायालय को सही बताने की कोशिश कर रहे है. ज्ञातव्य रहे, ये वो ही माननीय न्यायालय है जिसने भोपाल गैस त्रासदी में न्याय के नाम पर देश की जनता का मखौल उड़ा कर रख दिया है. मैं शाहनवाज जी से सहमत हूँ कि मुफ्त के माल की, कही भी और कभी भी कोई कद्र नहीं होती. उदहारण के तौर पर देश में गरीबो के नाम लोगो को मुफ्त बिजली दी जाती है. हाल ये है, कि बिजली का बिल भरने वालो को दिन में दस दस घंटे बिजली नहीं मिलती. बिजलीघर के दशको पुराने उपकरण आजादी से पहले से अब तक केवल चल रहे है. बिजलीघरो की अपनी व्यवस्था चरमराई हुई है.दरअसल कोर्ट को आदेश ये देना चाहिए था कि सरकार ये सुनिश्चित करे की अन्न भण्डारण के पर्याप्त उपाय हो और देश में अन्न नहीं सडे. ये कार्य अगर सरकार नहीं कर सकती तो भण्डारण का कार्य किसी कंपनी को दे देना चाहिए जो अनाज को अच्छे से रख सके ताकि उस अन्न का उपयोग सही तरीके से हो.

  15. arvind said,

    September 7, 2010 at 6:56 am

    >aapki baat se puri tarah sahamt…..desh kaa durbhaagya hai….kyaa kahen.

  16. ashish said,

    September 7, 2010 at 7:34 am

    >देश कोरी भावनावो से नहीं चलता , आशीष श्रीवास्तव से सहमत. पूर्व सोवियत संघ का उदहारण सर्व विदित है. आज माननीय उच्चतम न्यायलय ने भी कहा है की सरकार जो भी कर रही है वो एकदम उचितहै

  17. September 7, 2010 at 8:19 am

    >आप सबको धन्यवाद जिन्होंने सहमती जताई या असहमति जताई ..!लेकिन आप लोगों को एक बात जरूर सोचना चाहिए की इस प्रधानमंत्री ने पूरे देश को एक सरकार के नियंत्रण के बजाय दलालों के नियंत्रण में करने का शर्मनाक काम किया है | आज किसी भी चीज पर कोई भी मूल्य नियंत्रण नहीं है जो दबा दो साल पहले 10 रूपये में मिलती थी उसकी कीमत 45 रूपये हो गयी है | 9 रूपये की चीनी 30 रूपये हो गयी है ये तो सबको पता है | हवा के नीलामी यानि 3 G स्पेक्ट्रम के नीलामी से 70 .000 करोड़ रुपया आता है ,लेकिन हमारे देश का हर ग्राम पंचायत में एक अदद हाई स्कूल नहीं है जबकि मनमोहन सिंह और उनके रिश्तेदारों के पास अडबों की संपत्ति है ,ये अलग बात है की जाँच कौन करे और सबूत कैसे इकठ्ठा हो …? शरद पवार जैसे लोग अप्रत्यक्ष रूप से इस देश के महाराजा बन चुके हैं जिनके सामने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे पदों पर बैठा व्यक्ति भी बौना साबित हो रहा है ,सर्वोच्च न्यायलय के एक इमानदार जज का फैसला जब इस मंत्री को परेशान करता है तो प्रधानमंत्री अपने पद की मर्यादा भूल कर उनके बचाव में सर्वोच्च न्यायलय को नीतिगत मामलों की दुहाई देकर दूर रहने को कहते हैं , दरअसल ये नीतिगत मामलों का मुद्दा नहीं बल्कि भ्रष्टाचार और अपने कुर्सी की रक्षा का मुद्दा है |

  18. September 7, 2010 at 8:32 am

    >सर्वोच्च नयायालय प्रधानमंत्री तक को निर्देश देने के लिए संवैधानिक रूप से स्वतंत्र है यही नहीं सर्वोच्च नयायालय प्रधानमंत्री को सजा देने तक के लिए संवेधानिक रूप से बाध्य है और इस देश के जनता के अधिकारों की रक्षा की संवैधानिक जिम्मेवारी में बंधी हुयी है | क्योकि कानून से बड़ा न तो सरकार है और ना ही प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद पर बैठा व्यक्ति ..सर्वोच्च नयायालय इंसानियत के नाते सरकार को आदेश दे सकती है और जिसे मानने के लिए सरकार हर-हाल में बाध्य है | ये अलग बात है की सरकार बेशर्मी की हद पर कर जाय और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए सत्य बोलने वाले को ही जेल में बंद कर दे ,चुप रहने के लिए मजबूर कर दे जैसा की राजीव गाँधी की सरकार ने भोपाल गैस कांड के समय सर्वोच्च न्यायालय के एक जज पर अपने सत्ता के प्रभाव से किया था तो इसका इलाज तो इस देश की जनता ही कर सकती है | लेकिन जनता को भूखे मारकर उसके सोचने समझने की वैचारिक शक्ति को कमजोड करने की गंभीर साजिश भी जोड़ों पर है …

  19. September 7, 2010 at 8:32 am

    >अब सवाल उठता है की किसानों का भला होना चाहिए ,मैं इस बात से सहमत हूँ की जरूर होना चाहिए अगर इस महंगाई से किसानों का भला हुआ हो तो मैं इस महंगाई का समर्थन करूंगा | किसानों को महंगाई से नहीं बल्कि संतुलित प्रशासन और न्याय की समुचित व्यवस्था से खुशहाल किया जा सकता है | आज पूरा देश चोरी,बेईमानी करके पेट भरने को मजबूर है ,बच्चों को उनके जिले में समुचित शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने से महानगरों की ओर अपनी शिक्षा के लिए आना परता है और महानगर की महंगाई में उनकी नैतिकता कहीं खो जाती है और इस बेशर्म प्रधानमंत्री की बेशर्म भ्रष्ट व्यवस्था की वजह से उनको होटलों में नौकरी कर या देह व्यापार कर अपनी शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरत को पूरा करना पड़ता है | महानगरों के आस पास के किसानों ओर दलालों को छोड़ दे तो किसानो को इस महंगाई ओर मनमोहन सिंह के कागजी विकाश ने मौत के मुहं में धकेलने का काम किया है | अपने घर में बैठकर नहीं बल्कि गांवों में जाकर इस बात की सच्चाई का पता लगाइए ,मैं गांवों में जाने के बाद ऐसा कह रहा हूँ …इस प्रधानमंत्री ने भोपाल गैस कांड जैसे मुद्दों पर तो एकबार भी मुंह नहीं खोला ,क्योकि इससे उनके कुर्सी और मुफ्त की सुख सुविधा पर आंच आ सकता था | कोमनवेल्थ गेम का भ्रष्टाचार में एक भी अपराधी व्यक्ति को सजा नहीं होगी क्योकि इस प्रधानमंत्री के नजदीकी भी इस गेम के भ्रष्टाचार में शामिल हैं और उसका फायदा किसी न किसी रूप में इस प्रधानमंत्री को भी पहुँच रहा है |सौ बात की एक बात अगर देश का प्रधानमंत्री जनता की भलाई के वजाय पूंजीपतियों के लिए पूरी सरकार को दलाल के रूप में स्थापित कर दे और भ्रष्ट मंत्रियों की रक्षा सिर्फ इसलिए करे की जिससे उसकी प्रधानमंत्री की कुर्सी बची रहे तो इस देश को नरक बनने से कोई नहीं रोक सकता और सर्वोच्च न्यायालय के कुछ बचे खुचे जज भी इस प्रधानमंत्री की वजह से सत्य बोलना छोड़ देंगे | इसलिए इस मुद्दे को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर देखिये और मिडिया तो कुछ बोल नहीं रही कम से कम ब्लोगर तो इस दिशा में सत्य,न्याय और इंसानियत का साथ दें और भारत सरकार को दलाल बनाने वालों के खिलाप आवाज को बुलंद करें …देश सही में भावना से नहीं चलता लेकिन कोई भी देश इंसानियत ओर न्याय को मारकर जिन्दा ही नहीं रह सकता …?आशा है आप लोग मेरी भावना को जनहित में समझेंगे …

  20. September 7, 2010 at 9:53 am

    >sachi baat :)http://liberalflorence.blogspot.com/

  21. September 7, 2010 at 10:36 am

    >हज़रत अली ने कहा था की अनाज का सड़ना भी अल्लाह की रहमत है, वरना बादशाह और बड़े लोग सोने चांदी की तरह इसे भी दबाकर बैठ जाते, और गरीब भूखों मर जाता. जब इंसान ही जिंदा नहीं रहेगा तो अर्थव्यवस्था अच्छी होने का क्या मतलब? इसे गरीबों में बांटने से ज्यादा से ज्यादा यही होगा की टैक्स का कुछ पैसा खजाने से कम हो जाएगा. लेकिन वैसे भी खजाने का पैसा तो नेताओं और भ्रष्ट नौकरशाहों की जेब ही में जा रहा है. इससे गरीब का कुछ भला हो जाए तो बुराई क्या.

  22. September 7, 2010 at 11:20 am

    >क्या आपने हिंदी ब्लॉग संकलक हमारीवाणी" का क्लिक कोड अपने ब्लॉग पर लगाया हैं? हमारीवाणी एक निश्चित समय के अंतराल पर ब्लाग की फीड के द्वारा पुरानी पोस्ट का नवीनीकरण तथा नई पोस्ट प्रदर्शित करता रहता है. परन्तु इस प्रक्रिया में कुछ समय लग सकता है. हमारीवाणी में आपका ब्लाग शामिल है तो आप स्वयं हमारीवाणी पर अपनी ब्लागपोस्ट तुरन्त प्रदर्शित कर सकते हैं.कोड के लिए यहाँ क्लिक करें

  23. September 7, 2010 at 5:25 pm

    >अनाज मुफ्त ,कर्जा माफ ,बिजली के बिल माफ ,आगे और क्या क्या माफ राजा महाराजाओं का अंत नहीं हुआ भारत से बस रूप बदला है राजे अज्ज वी राजे हन गरीब अज्ज वी गरीब हनभूखे दी मिटी ना भुक्ख अजे मनमोहन वरगे किन्ने ही रज्जे अपनी बाकी बच्ची जिंदगी विच्च जे एह शरद अपने नोटा नू गिन देवे ता मन जाईये इस कुज्झ कित्ता है नहीं ता बस इस ने लहू ही पित्ता है राजे अज्ज वी राजे हन गरीब अज्ज वी गरीब हन |

  24. Anwar Ahmad said,

    September 8, 2010 at 8:22 am

    >please come to my blog to read सही और ग़लत की तमीज़ वही देता है जो जीवन देता है ,http://sunehribaten.blogspot.com/2010/09/1.html#comments

  25. September 8, 2010 at 8:47 am

    >Nice comment Zeashan Ali .

  26. Babli said,

    September 8, 2010 at 10:18 am

    >आपने सही मुद्दे को लेकर बहुत बढ़िया और सठिक लिखा है! उम्दा प्रस्तुती !

  27. September 8, 2010 at 12:54 pm

    >जितने भी राजनेता हैँ छुटभैये से लेकर बड़भैये तक सबके पास अकूत संपत्ति का जमावड़ा है। इनके साथ-साथ चपरासी से लेकर उच्चाधिकारियों ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिया। वे भी मालामाल है।अगर किसी को कम इनपुट में ज्यादा आउटपुट का तजुर्बा करना है तो भारत से अच्छा उदाहरण कहीं नहीं मिलेगा। 5000 रुपए की तनखा पाने वाला 50,000 खर्च करने की ताकत रखता है। यहीं पर आकर सारे गणित के सिद्धांत फ़ेल हो जाते हैं।25 हजार लोगों के पास 2 करोड़ रुपए कीमत की गाड़ी है। देश के सारे सांसदों की कुल संपत्ति 25 हजार करोड़ है,जो इन्होने हलफ़नामें में बताई है।अब बताईए कि कैसे इन्हे भूख और गरीबी का दर्द पता चले। मैने लोगों को एक-एक दाना चुगते देखा है।देश की जनता के पैसे पर खुले आम डाका डाला जा रहा है,भ्रष्टाचार सीमाएं लांघ चुका है। प्रजातंत्र की देह में नासूर जैसे पल रहा है।देश की जनता ही इस नासूर को चीरा लगा कर लोकतंत्र को स्वस्थ बना सकती है।सेठ मठ और राजनेता का गठजोड़ देश के धन को दोनों हाथों से लूट रहें हैं।सारगर्भित पोस्ट के लिए जयकुमार जीआभार

  28. September 8, 2010 at 3:29 pm

    >ये प्रधानमन्त्री नाकारा है…और आम इंसान बेचारा है ….इससे कुछ उम्मीद रखी,बस ये दोष हमारा है ?न तो अनाज़ को सुरक्षित रखते हैंऔर न ही भूखों को बाटते हैं .सुप्रीम कोर्ट ने सही बात कही ,तो उसको भी डाटते हैं.टनों अनाज़ सड़ गया,यहाँ लोग भूखे सोते हैं.नाकारा न कहे तो कोई बताए , ऐसे प्रधानमंत्री को क्या कहते हैं ?


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