>कोई तो खाए कोई करे बचाने का नाटक वाह ….

>

किसी ने तो पशु खाया आप ने क्या किया ??
आज  दिल ने कहा की एक और सच बात आप सब  से सांझी की जाए |
मेरा  शहर उत्तरप्रदेश सीमा से लगता है|
यहाँ से पशुओं को ले जाया जाता है अर्थार्त पशु तस्करी का बोर्डर ,
मेरे  सीमावर्ती जिले में में एक बहुत बड़ा बूचड़खाना और अनेक छोटे – छोटे भी है वहाँ रोजाना हजारों पशु कटते है |  

जिनमे गाय,भैंस,कटड़ा ,बछड़ा ,बैल होते है |

कुछ मीट लोकल बिक  जाता है और बहुत बड़ी मात्रा में पैक/फ्रीज़ कर के अन्य शहरों राज्यों में भेजा जाता है | 
हड्डियां फैक्ट्री में जंतु चारकोल(दवा उद्योग में प्रयुक्त)
चमड़ा आगरा को,
चर्बी उद्योगों में घरेलू उत्पादों में,
खून नालो से होता हुआ नदी/नहर  में,
बदबू हवाओं में होती हुई सांसो ने ली,    
नाके पर से ये पशु निम्न तरीको से बोर्डर पार होते है|
१. ट्रको,कैंटरो,ट्रालो से 
२.सीमावरती गावों से झुंडो में 
३ .यमुना नदी के रास्ते कच्चे से 
पहले नम्बर वाला तरीका जयादा प्रचलित है |
दूसरा व तीसरा तरीका तब प्रयोग होता है जब माल पास से ही ख़रीदा गया हो या रोजाना वाले  छोटे व्यपारी (तस्कर)
अब  दूसरा पहलु :-
लोकल शहर में कई दल है जो दबाव गुटों की तरह सक्रिय रह कर इन पशुओं को छुडवाते है
और
नाम ,पुण्य कमाते है अख़बारों में नाम फोटो (मुक्त पशुओं व तस्करों के साथ) आती है | 
तस्कर अगले दिन कोर्ट में (कुल में से नाम नात्र ही )
पुण्य  आत्माए अपने अपने घरों को 
नाके पर सुरक्षाकर्मी अपने काम पर 
ट्रक थाने में(बतौर पार्किंग)
और पशु देखे जरा यहाँ

                                           मजबूर है कूड़ेदानो में मुँह मारने को 
पोलीथीन निगल कर पेट दर्द से तड़प-तड़प  कर मरने को |
 हजारों की संख्या में पशु खेतों में फसलों को खाते हुए खदेड़ कर फिर से  बार्डर पार या फिर मार दिए जाते है कीटनाशक दे कर |
 
 

पशु  भी घर घर जा कर भीख मांगने को मजबूर है |
ट्रेनों के नीचे आने को ,
सड़कों पर मरने को ,
दुत्कार खाने को ,
छोटे तस्करों के हाथो पैदल फिर वहीँ पहुचने को मजबूर है |
कहने को तो गोशालाएं  भी है पर वहाँ भी दुधारू पशुओं की ही जरूरत है मुफ्त में चारा खोरो की नहीं  |
अब बताओ इन के लिए क्या बदला 
अगर ये दूध देते तो पंजाब ,हरियाणा ,हिमाचल के पशुपालक इन को क्यूँ बेचते इनको मात्र २००-३०० रूपयों में 
और एक दर्दनाक बात :-
तस्कर इन का वजन बढ़ाने के लिए इनको पानी में कापर सल्फेट घोल के पिलाते है जो किडनी (गुर्दों) की कार्यप्रणाली को बाधित करती है जिस कारण शरीर में पानी की मात्रा बढ़ जाती है  जिस से वजन बढ़ जाता है कंयुकी वहाँ तो इन्होने तोल कर के ही बिकना है
कुछ  तो ट्रकों में ही मर जाते है 
लाशें भी काट कर बेच दी जाती है 
अंत में 

किसी का रोजगार चल रहा है,किसी की भूख मिट रही है ,कोई पुण्य कमा रहा है|

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>व्यर्थ वाद विवाद

>विचारधाराओं पर वर्तमान में उपस्थित वाद विवाद को समर्पित दोहांजली।

॥व्यर्थ वाद विवाद॥

बौधिक उलझे तर्क में, कर कर वाद विवाद।
धर्म तत्व जाने नहिं, करे समय बर्बाद॥1॥

सद्भाग्य को स्वश्रम कहे, दुर्भाग्य पर विवाद ।
कर्मफ़ल जाने नहिं, व्यर्थ तर्क सम्वाद ॥2॥

कल तक जो बोते रहे, काट रहे है लोग ।
कर्मों के अनुरूप ही, भुगत रहे हैं भोग ॥3॥

कर्मों के मत पुछ रे, कैसे कैसे योग ।
भ्रांति कि हम भोग रहे, पर हमें भोगते भोग ॥4॥

ज्ञान बिना सब विफ़ल है, तन मन वाणी योग।
ज्ञान सहित आराधना, अक्षय सुख संयोग॥5॥
===================================
सुज्ञ से पुनःप्रकाशित

>सर्वोच्च न्यायालय के कुछ भ्रष्ट जजों की संदिग्ध करतूतें… (भाग-1)…… Corruption in Indian Judiciary System (Part-1)

>न्याय और सार्वजनिक शुचिता का सामान्य सिद्धान्त है कि सबसे ऊँचे पदों पर बैठे व्यक्तियों को ईमानदार और साफ़ छवि वाला होना चाहिये, इस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से यह अपेक्षा होती है कि वे नैतिकता और ईमानदारी के उच्चतम मानदंड न सिर्फ़ स्थापित करेंगे, बल्कि स्वयं भी उस पर कायम रहेंगे। भारत में न्यायाधीशों को एक “विशेष रक्षा कवच” मिला हुआ है जिसे “न्यायालय की अवमानना” कहते हैं, इसके तहत जजों अथवा उनके निर्णयों के खिलाफ़ कोई आवाज़ नहीं उठती, सामान्य व्यक्ति अधिक से अधिक यह कर सकता है कि वह निचली अदालत के निर्णय को ऊपरी अदालत में चुनौती दे (यानी फ़िर से 10-20 साल बर्बाद), परन्तु यदि उच्चतम न्यायालय के जज के किसी निर्णय पर ही आपत्ति हो तो कोई क्या कर सकता है? कुछ नहीं…

लोकतन्त्र की इसी विडम्बना को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट के ही वरिष्ठ वकील श्री प्रशान्त भूषण ने इसके खिलाफ़ 20 साल तक लगातार लड़ाई लड़ी। इस विकट संघर्ष के चलते अन्ततः सितम्बर 2009 में सर्वोच्च न्यायालय ने जजों की सम्पत्ति की सार्वजनिक घोषणा करना अनिवार्य कर दिया, यह एक पहली बड़ी जीत थी। हालांकि इससे ऊपरी स्तर पर भ्रष्टाचार में कोई विशेष फ़र्क नहीं पड़ने वाला था, परन्तु फ़िर भी इसे “सफ़ाई” की दिशा में पहला कदम कहा जा सकता है। प्रशान्त भूषण जी ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायाधीशों की जिम्मेदारियाँ भी तय होनी चाहिये और न्यायिक व्यवस्था में ऐसा सिस्टम निर्माण होना चाहिये जिससे भ्रष्टाचार में कमी हो। (यहाँ देखें…)

हाल ही में श्री शांतिभूषण ने सर्वोच्च न्यायालय में एक शपथ-पत्र दायर करके यह दावा करके तहलका मचा दिया है कि “सुप्रीम कोर्ट के पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में से आधे भ्रष्ट हैं…”। भूषण ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता कायम रखने के लिये यह जरुरी है कि इनकी विस्तृत जाँच हो। शांतिभूषण जी को “न्यायालय की अवमानना” के बारे में नोटिस दिया गया है, जिसके जवाब में उन्होंने एक और एफ़िडेविट दाखिल करके कहा है कि “उच्च पदों पर आसीन जजों के खिलाफ़ कागजी सबूत एकत्रित करना बेहद कठिन काम है, क्योंकि उनके खिलाफ़ पुलिस जाँच की इजाज़त नहीं है, यहाँ तक कि उनके खिलाफ़ पुलिस में FIR दर्ज करने के लिये भी पहले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से पूर्व-अनुमति लेना पड़ती है, ऐसे में कोई व्यक्ति सबूत कैसे लाये…”। शान्तिभूषण ने लिखित में कहा है कि 16 में से 8 जजों का आचरण, उनके द्वारा दिये गये निर्णय और उनके परिजनों की सम्पत्ति को सरसरी तौर पर देखा जाये तो निश्चित रुप से जाँच का प्राथमिक मामला तो बनता ही है, और “…यदि फ़िर भी यदि मुझे “न्यायालय की अवमानना” का दोषी पाया जाये और जेल में डाल दिया जाये तब भी मुझे खुशी होगी कि कम से कम मैंने भारत की न्याय-व्यवस्था में शीर्ष पर सफ़ाई के लिये कोशिश तो की…”।

एक अन्य पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री वीआर कृष्णन अय्यर ने भी समर्थन में कहा है कि यह एक सुनहरा अवसर है जब हम सर्वोच्च स्तर पर फ़ैले भ्रष्टाचार और कदाचार को खत्म कर सकते हैं। इसमें सबसे पहला कदम यह होना चाहिये कि जनहित में सभी सूचनाएं सार्वजनिक की जायें, शक-शुबहा की ज़रा सी भी गुंजाइश हो तो उसे जनता के बीच जानकारी के रुप में प्रसारित किया जाये, शायद तब सरकार और मुख्य न्यायाधीश पर जनदबाव बने कि वे इन मामलों की जाँच के आदेश जारी करें…

अतः आम जनता के हित में शान्तिभूषण और प्रशान्त भूषण के शपथ-पत्र में उल्लिखित कुछ जजों के नाम एवं उनकी गतिविधियों के बारे में जानकारी यहाँ भी दी जा रही है…

1) जस्टिस रंगनाथ मिश्र (25.09.1990 – 24.11.1991)

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्र को 1984 के सिख दंगों की जाँच आयोग में रखा गया था। कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं के इन दंगों और सिखों की हत्या में शामिल होने के पक्के सबूत होने के बावजूद उन्होंने कईयों को लगातार “क्लीन चिट” दी। 1984 के सिख कत्लेआम की जाँच पूरी होने के बाद उन्हें कांग्रेस की तरफ़ से राज्यसभा की सीट तोहफ़े में दी गई। जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार और HKL भगत वे बचा न सके, क्योंकि इन लोगों के खिलाफ़ कुछ ज्यादा ही मजबूत सबूत और न बिक सकने वाले, न दबने वाले गवाह थे। सीबीआई द्वारा की गई जाँच में भी दिल्ली के कई कांग्रेसी नेताओं के इन दंगों में लिप्त होने के सबूत मिले, लेकिन उन्हें भी सफ़ाई से दबा दिया गया। रिटायरमेण्ट के तुरन्त बाद कांग्रेस की तरफ़ से राज्यसभा सीट स्वीकार करना भी भ्रष्टाचार और अनैतिकता की श्रेणी में ही आता है। (ठीक उसी प्रकार जैसे एमएस गिल द्वारा चुनाव आयुक्त पद से रिटायर होते ही तड़ से राज्यसभा में और फ़िर खेल मंत्रालय में… ऐसा क्या “विशेष काम” किया था गिल साहब ने?)

2) जस्टिस के एन सिंह (25.11.1991 – 12.12.1991)

सिर्फ़ 18 दिन (जी हाँ, सिर्फ़ 18 दिन) के लिये सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनने वाले केएन सिंह ने इतने कम समय में भी अपने गुल खिला दिये थे। रंगनाथ मिश्रा के नक्शेकदम पर चलते हुए इन्होंने तत्कालीन “जैन एक्सपोर्ट” और “जैन शुद्ध वनस्पति” नामक कम्पनी के पक्ष में धड़ाधड़-धड़ाधड़ फ़ैसले सुनाना शुरु कर दिया। ये साहब इतने “बड़े-वाले” निकले कि किसी दूसरे न्यायाधीश की बेंच पर सुनवाई हो रहे जैन वनस्पति मामले को जबरन सुप्रीम कोर्ट घसीट लाये और आदेश पारित कर दिये। अप्रैल 1991 और सिरम्बर 1991 में जस्टिस केएन सिंह ने जैन एक्सपोर्ट्स द्वारा कॉस्टिक सोडा के आयात मामले में दो फ़ैसले कम्पनी के पक्ष में दिये। 28 नवम्बर 1991 को जस्टिस सिंह ने केन्द्र सरकार बनाम जैन वनस्पति केस में सरकार के दावे को भी खारिज कर दिया। हालांकि इस निर्णय को बाद में 16 जुलाई 1993 को जस्टिस जेएस वर्मा और पीबी सावन्त की बेंच ने उलट दिया था, लेकिन सिंह साहब को जो “खेल” इस बीच करना था वे कर चुके थे। उन दिनों जैन वनस्पति एण्ड एक्सपोर्ट्स के पक्ष में ताबड़तोड़ दिये गये फ़ैसले चर्चा का विषय थे, परन्तु उंगली कौन उठाये? “न्यायालय की अवमानना” की ढाल जो मौजूद थी, “माननीय” के पास!!!

3) जस्टिस एएम अहमदी (25.10.1994 – 24.03.1997)

जस्टिस अहमदी ने जस्टिस वेंकटाचलैया से अपना कार्यभार ग्रहण किया था। भोपाल गैस काण्ड के मामले में अहमदी के दिये हुए फ़ैसले आज भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। गैस लीक मामले में आपराधिक धाराओं को कमजोर करने और अभियुक्तों को बरी करने में अहमदी साहब ने बड़ी तत्परता दिखाई थी। भोपाल गैस त्रासदी की लम्बी सुनवाई के दौरान कुल 7 (सात) बार जजों की बेंच बदली, लेकिन आश्चर्यजनक रुप से हर बार प्रत्येक बेंच में जस्टिस अहमदी जरुर शामिल रहे (क्या गजब का संयोग है)। अहमदी साहब ने यूनियन कार्बाइड के साथ सरकार की डील को भी आसान बनाया, इसी प्रकार यूनियन कार्बाइड को “भोपाल मेमोरियल अस्पताल” बनाने के लिये 187 करोड़ रुपये भी रिलीज़ करवाये। रिटायरमेण्ट के तत्काल बाद अहमदी साहब, भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट अस्पताल के “लाइफ़टाइम चेयरमैन” नियुक्त हो गये, यानी उसी कम्पनी के उसी अस्पताल में जिसकी सुनवाई उन्होंने चीफ़ जस्टिस रहते अपने कार्यकाल में बरसों तक की… (गजब का संयोग है, है ना?)

अहमदी साहब की दास्तान यहीं खत्म नहीं होती… एक कारनामा और है जिसकी तरफ़ प्रशान्त भूषण जी ने अपने एफ़िडेविट में इशारा किया है। फ़रीदाबाद के बड़खल और सूरजकुण्ड झीलों के आसपास पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से मुख्य न्यायाधीश कुलदीप सिंह की खण्डपीठ ने 10 मई 1996 को झील के आसपास 5 किमी परिधि में सभी प्रकार के निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद झील के आसपास चल रहे “कान्त एन्कलेव” नामक बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कम्पनी के सभी निर्माण कार्य रोक दिये गये, क्योंकि सूरजकुण्ड झील के पास की भूमि पंजाब लैण्ड एक्ट के तहत वन्य क्षेत्र घोषित कर दी गई थी। अब सोचिये, यह तो हो नहीं सकता कि न्यायिक क्षेत्र में इतने उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को यह बात मालूम न हो, उन्हीं के एक सहयोगी द्वारा पर्यावरण चिंताओं के मद्देनज़र लगाये गये प्रतिबन्ध के बावजूद अहमदी साहब ने मुख्य न्यायाधीश रहते यहाँ प्लॉट खरीदे, न सिर्फ़ खरीदे, बल्कि उन पर अपने रहने के लिये मकान भी बना लिया। जैसे ही कुलदीप सिंह साहब रिटायर हुए और ये मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर काबिज हुए, इन्होंने सबसे पहले बड़खल/सूरजकुण्ड केस की पार्टी कान्त एनक्लेव की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए निर्माण पर रोक के निर्णय की समीक्षा के लिये एक बेंच का गठन कर दिया। 11 अक्टूबर 1996 को झील के आसपास 5 किलोमीटर परिधि में निर्माण पर प्रतिबन्ध की सीमा को घटाकर 1 किमी कर दिया गया (अंदाज़ा लगाईये कि 4 किमी की परिधि की अरबों-खरबों की ज़मीन में ठेकेदारों का कितना फ़ायदा हुआ होगा), अहमदी साहब यहीं नहीं रुके… 17 माच 1997 को कान्त एनक्लेव की एक और याचिका पर उन्होंने झील के इस क्षेत्र में निर्माण कार्य करने से पहले प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की मंजूरी लेने का प्रावधान भी खत्म कर दिया।

कुल मिलाकर साफ़ तथ्य यह है कि जस्टिस अहमदी का कान्त एनक्लेव में बना हुआ बंगला पूरी तरह से अवैध, पर्यावरण मानकों के खिलाफ़ और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन था… (आज तक, कान्त एनक्लेव कंसट्रक्शन कम्पनी और यूनियन कार्बाइड से अहमदी के विशेष प्रेम का खुलासा नहीं हो सका है)

4) जस्टिस एमएम पुंछी (18.01.1998 – 09.10.1998)

जस्टिस एमएम पुंछी का कार्यकाल भी सिर्फ़ दस महीने ही रहा। जस्टिस पुंछी के खिलाफ़ न्यायिक जवाबदेही समिति द्वारा महाभियोग चलाने के लिये प्रस्ताव तैयार किया गया था, लेकिन इस पर राज्यसभा के सिर्फ़ 25 सदस्यों के ही हस्ताक्षर हो सके, और संख्या कम होने की वजह से इन महोदय पर महाभियोग नहीं चलाया जा सका। महाभियोग चलाने की नौबत क्यों आई यह निम्न गम्भीर आरोपों से जाना जा सकता है-

अ) मुम्बई के एक व्यापारी केएन तापड़िया के धोखाधड़ी मामले में इन्होंने प्रावधान न होते हुए भी उसे जमानत दे दी, जबकि जिन धाराओं में केस लगा था उसमें तापड़िया को सम्बन्धित पार्टी से कोई सम्बन्ध या समझौता करने का अधिकार ही नहीं था।

ब) पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहते पुंछी साहब ने भजनलाल के खिलाफ़ रोहतक विवि के कुलपति डॉ रामगोपाल की याचिका बगैर किसी कारण के खारिज कर दी। याचिका में भजनलाल की दोनों बेटियों मधु और प्रिया को सरकारी कोटे से गुड़गाँव में करोड़ों के प्लॉट आबंटित करने के खिलाफ़ सुनवाई का आग्रह किया गया था।

भाग-2 में जारी रहेगा…

आम जनता की जानकारी हेतु जनहित में प्रस्तुत किया गया –

(डिस्क्लेमर – प्रस्तुत जानकारियाँ विभिन्न वेबसाईटों एवं प्रशान्त भूषण/शान्ति भूषण जी के एफ़िडेविट पर आधारित हैं, यदि इनसे किसी भी “माननीय” न्यायालय की अवमानना होती हो, तो “आधिकारिक आपत्ति” दर्ज करवायें… सामग्री हटा ली जायेगी…)

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>सपेरों का ब्लाग संसार

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फिरते कितने खेलबाज, यहां झोले रंगाकार लिए।

द्वेषों के है सांप छाब में, क्रोधों की फुफकार लिए।
हाथ उनके टिपण-पात्र है, सिक्कों की झनकार लिए।
परपीड़न का मनोरंजन है, बैचेनी बदकार लिए॥
महाभयंकर नागराज अब, मानव के अनुकूल हुए।
एक नई फुफकार के खातिर, दर्शक भी व्याकुल हुए।
सम्वेदना के फ़ूल ही क्या, भाव सभी बस शूल हुए।
क्या राही क्या दुकानदार सब, खेल में मशगूल हुए॥

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नोट:-प्रस्तूत रचनाएँ मेरे ‘सुज्ञ’ ब्लाग से पुनः प्रकाशित की जा रही है, इसिलिये कि अभी ब्लाग-संसद में कोई प्रस्ताव नहिं आ रहे, विद्वान सदस्य जो भी, जब भी चाहें प्रस्ताव पोस्ट डाल सकते है।

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>हो प्रबल संकल्प ऐसा, आपदाएँ सर झुकाएँ

>

॥लक्ष्य॥
लक्ष्य है उँचा हमारा, हम विजय के गीत गाएँ।
चीर कर कठिनाईयों को, दीप बन हम जगमगाएं॥
तेज सूरज सा लिए हम, ,शुभ्रता शशि सी लिए हम।
पवन सा गति वेग लेकर, चरण यह आगे बढाएँ॥
हम न रूकना जानते है, हम न झुकना जानते है।
हो प्रबल संकल्प ऐसा, आपदाएँ सर झुकाएँ॥
हम अभय निर्मल निरामय, हैं अटल जैसे हिमालय।
हर कठिन जीवन घडी में फ़ूल बन हम मुस्कराएँ॥
हे प्रभु पा धर्म तेरा, हो गया अब नव सवेरा।
प्राण का भी अर्ध्य देकर, मृत्यु से अमरत्व पाएँ॥
                                                   -रचनाकार: अज्ञात
                                                   -प्रस्तूतकर्ता: ‘सुज्ञ’

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>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


कश्मीर की कहानी

Posted: 25 Oct 2010 09:40 AM PDT

सालों से कश्मीर की धरती भारत माँ के सपूतों के खून से लाल होती आई है | लाशों की ढेर में ढँक गया है धरती का स्वर्ग | घाटी से करीबन 4 लाख कश्मीरी हिन्दू जिनमें पंडित -सिख-डोगरा आदि समुदाय शामिल हैं , मार-मार कर भगाए जा चुके हैं | अपनी ही जमीं से बेदखल ये भारतवासी अपने ही देश में विस्थापितों का जीवन जी रहे हैं | कभी जम्मू के केम्पों में जाकर देखिये आपकी रूह काँप उठेगी | किस तरह ये लोग किराये की कोठरियों में , सरकारी टीन की छतों वाले दरबों में कबूतरों की भांति जीवन बिता रहे हैं | आज जो कुछ टेलीविजन आप सभी देख रहे हैं वो ऐसे सिक्के का पहलु है जो सिक्का है हीं नहीं | कहने का मतलब है कि जिस प्रकार से मीडिया में कश्मीरी अलगावादियों की आवाज़ को दिखया जा रहा है मानों पूरे कश्मीर की आवाम यही चाहती हो , ये बिलकुल गलत है | कश्मीर घाटी , ” जम्मू और कश्मीर” प्रदेश का एक अत्यंत छोटा सा भाग है जिसकी जनसँख्या तक़रीबन 30 लाख के आस-पास है और उनमें से केवल २-३ लाख लोग हैं जो गिलानी जैसे नेताओं के बहकावे में आकर देश से गद्दारी कर रहे हैं |

आज जब कश्मीर के हालात फिर से सन 90 जैसे हो गये हैं | कश्मीर की घाटियों में आतंकियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि आम नागरिक को छोडिये भारतीय सेना के जवानों पर भी हमले-पर हमले हो रहे हैं | पाकिस्तान से बार-बार सीमा पर गोलीबारी के जरिये आतंकियों को कश्मीर भेजा जाता है ताकि कश्मीर में मौत का तांडव चलता रहे और उसे अमेरिका और अरब से उसको पैसों का पुलिंदा मिलता रहे |

ऐसे में कश्मीर की समस्या को महज आतंरिक मामला समझना भारी भूल होगी | इस समस्या को अच्छे से समझने के लिए और इसकी जद तक जाने के लिए पाकिस्तान के मंसूबों को और उसके इतिहास पर रौशनी डालना जरुरी है |

पाकिस्तान की पैदाइश सन 1947 में भारी खून-खराबे के बीच हुआ है | उस दौर में पाकिस्तानी नेताओं का एक भड़काऊ नारा बहुत मशहूर हुआ था – ” हंस कर लिए है पाकिस्तान , लड़ कर लेंगे हिन्दुस्तान ” | अब ये नारा समय के साथ बदल कर हो गया है – “कश्मीर को आज़ाद करो , भारत को बर्बाद करो “| पाकिस्तान के इस काले मनसूबे में अमेरिकी और खाड़ी देशों के धन और ख़ुफ़िया एजेंसियों ने भरपूर मदद की है | शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए अमेरिकी राजनयिक फिल्प एड्मंस ,स्टीवनसन्स और डॉ फ्रेंक ब्रुकमेन के साथ मिलकर षड्यंत्र किया और कश्मीर में परमिट सिस्टम ,कस्टम ,अलग प्रधान ,अलग निशान और अलग संविधान तथा धारा 370 लागू करवाया | तत्कालीन समय में ऐसे हालात पैदा हो गये कि भारत का एक और विभाजन होने का पाकिस्तानी ख्वाब पूरा होता दिखने लगा | लेकिन देशभक्तों ने कश्मीर में आंदोलन शुरू कर दिया | 5 हजार से अधिक देशभक्तों को अब्दुल्ला सरकार ने जेलों में बंद कर भयंकर यातनाएं दी | 22लोग तिरंगे की रक्षा करते हुए शहीद हो गये | परमिट कानून को तोड़ने का दृढ निश्चय कर जब शहीद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर की सीमा में प्रवेश किया तो उनको तुरंत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया | श्यामा प्रसाद मुखर्जी के भारत के पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेई भी थे जिनको गिरफ्तारी से पहले ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने वापस भेजते हुए कहा था – जाओ और दुनिया को जाकर बता दो कि मैंने परमिट कानून को तोड़ कर कश्मीर में प्रवेश कर लिया है | देश के दुर्भाग्य से परमिट कानून को तोड़ने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जेल में हीं साजिश के तहत मार दिया गया | इस घटना ने देश भर को झकझोर कर रख दिया तब कहीं जाकर नेहरु सरकार की नींद टूटी और सन ५३ में शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया गया | कश्मीर में नया सवेरा हुआ ,परमिट सिस्टम टूटा ,भारतीय संविधान लागू हुआ और जम्मू-कश्मीर में तिरंगा लहराने लगा | हालाँकि तब भी नेहरु सरकार ने मूर्खता करते हुए जम्मू-कश्मीर में दो संविधान ,दो निशान और धारा 370 जैसे प्रावधान को रहने दिया जो आज भारत के नाम का नासूर बन गया है |

इस घटना से मुंह की खाई पाकिस्तानी और कश्मीर के चंद अलगाववादी नेताओं ने अलग तरीके से साजिश की तैयारी शुरू कर दी | ३३ सालों की तैयारी के बाद कह्स्मिर की घाटी में एक बार फ़िर पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों ने इस्लाम के नाम पर कहर बरपाना शुरू कर दिया | घाटी में मंदिरों को तोड़ दिया गया ,हिन्दुओं के घर जलाए गये जिससे लोगों में आतंक का माहौल पैदा हो गया | और तभी से आतंकवाद की शुरुआत जम्मू-कश्मीर में हो गया | कश्मीर में इतना कुछ हो जाने पर भी जब केंद्र की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तब आतंकियों को यह लगने लगा कि अब कह्स्मिर में इस्लाम के नाम पर हिंसा फैला कर भारत को तोड़ा जा सकता है | पाकिस्तानी हुकूमत तो यहाँ तक सपने देखने लगी कि कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाकर अपनी सामरिक स्थिति मजबूत की जा सकती है और भारत की गर्दन पर चढ़ कर एक दिन भारत को गुलाम बनाया जा सकता है | सन 89 तक आते-आते कश्मीर घाटी से कश्मीरी हिन्दुओं को मार भगाया गया | कश्मीर में ना तो एक हिन्दू बचा और ना हीं कोई मंदिर | देशभर में इस घटना को लेकर राष्ट्रवादी तत्वों का दबाव सरकार पर बढ़ने लगा तब तत्कालीन राज्यपाल कृष्णराव को वापस बुला लिया गया और उनकी जगह जगमोहन को राज्यपाल बना कर भेजा गया | जगमोहन ने सख्ती से कश्मीर में चल रहे कुचक्र को कुचल दिया | हालाँकि अलगाववादियों ने यह सोचा था कि घाटी को हिन्दुविहीं कर इस्लाम के नाम पर सारे कश्मीरियों को पाकिस्तान में मिलने के लिए राजी कर लिया जायेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं | कश्मीर की बहुसंख्यक आवाम तब भी और आज भी भारत के साथ जीना और मरना चाहती है |

(सभी तथ्य कश्मीर पर मेरी मित्र मंडली की परिचर्चा पर आधारित हैं)

बेवफा

Posted: 25 Oct 2010 08:27 AM PDT

बेवफा

एकता, जो कल तक तक आकाश के साथ अक्सर दिखाई देती थी, आज वह बिल्कुल अकेली और उदास नज़र आती है. कारण भी तो बहुत ख़ास और दुखद है, कुछ दिनों पहले आकाश की  एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी… भरी जवानी में बेचारे की मौत का सदमा बर्दाश्त करना एकता के बस में ना था.. एकता और आकाश एक दूसरे को दिलो-जाँ से चाहते थे.. प्यार की हद तक दोनों ने एक दुसरे को चाहा, साथ जीने मरने की कसमें तक खाईं दोनों ने, पर होनी को कौन टाल सकता है…

वो चला गया मुझको यूँ तन्हा छोड़ कर

के क्या होगा अब मेरा बस उसके बगैर…

मेरी जिंदगी का हर लम्हा उसके प्यार में था जी रहा,

अब क्या क्या मिलेगा मुझे, यूँ तन्हा जी कर…

शायद कुछ ऐसा ही कह रही थी अब एकता की आँखें… आज एकता पूरी तरह से टूट चुकी थी, के जैसे किसी फूलदार डाली के सारे फूल हवा के किसी तेज झोंके ने बिखेर दिए (तोड़ दिए) हों..

कल तक एकता को अपने आकाश पर बहुत नाज़ था, और क्यों ना हो क्योंकि आकाश था भी इसका हकदार… अगर कोई लड़की एक आदर्श प्रेमी की चाहत करे तो आकाश का नाम सबसे ऊपर गिना जायेगा… और इसी कारण एकता – आकाश की जोड़ी भी आदर्श जोड़ी कही जाती थी पूरे कॉलेज में… पर ये समय न कभी किसी का हुआ है और न ही कभी किसी का होगा…”, – कुछ ऐसा ही फ़साना बयाँ कर रही थी आज अनीता की आँखें मयूर से.

मयूरअनीता का Best Friend है और अनीताएकता की Best Friend.. एकता एक 19 साल की सुन्दर लड़की थी… कमर तक आते उसके बाल, सुन्दर कद – काठी, देखते ही सब का मन मोह ले… इधर अनीता भी दिखने में बिल्कुल एकता की ही तरह, पर थोड़ी मोटी पर सुन्दर लड़की थी… और मयूर सीधा साधा, दुबला पतला, सांवला सा, पर उच्च विचारों वाला लड़का था…

आज अनीता और मयूर, एकता को जब भी देखते तो उनका मन भी उसके दुःख में रो पड़ते थे. मयूर, जो दिल ही दिल में एकता को पसंद करता था, से एकता का दर्द नहीं सहा जाता था… वो चाहता था की एकता की जिंदगी में फिर से रंग भरने चाहिए पर कैसे वो ये नहीं जानता था… वो ये बात उससे कहना चाहता था  पर कभी कह न सका, क्योंकि उसके मन में एक शंका थी कि “वो एक खुद्दार लड़का है, और ये बात एकता भी अच्छी तरह से जानती है, तो कहीं अगर उसने एकता या अनीता से इस बारे में बोला तो वो ये ना सोचे कि मयूर उस पर बस दया कर रहा है…” बस इसी शंका के कारण वो कभी एकता से अपने प्यार का इज़हार न कर सका.. मयूरएकता को किसी और की बाहों में तो देख सकता था, पर कभी उसे किसी गलत इंसान की बाहों में नहीं देख सकता था… और न ही वो उसे खुद को ठुकराते हुए देख सकता था, इसी कारण वो हमेशा ही चुप रहा… बस वो इतना चाहता था की एकता की जिंदगी फिर से रंगीन हो जाए और कोई आकाश की ही तरह का लड़का फिर उसकी जिंदगी में आ जाए, ताकि उसे आकाश की कमी कभी महसूस ही न हो…

बस इसी इंतज़ार में पूरा एक साल गुजर गया…

रंजीत जो कि दिखने में Handsome और Nature wise बहुत ही अच्छा लड़का था, पर उसमे बहुत सी खामियां भी थी, जैसे कि Cigarette, शराब इत्यादि, वो भी एकता को पसंद करता था… उसकी बुरी आदतों के बारे में एकता क्या सारे कॉलेज को पता था.  और एक दिन कॉलेज के 2nd year ख़त्म होने के कुछ दिन पहले, रंजीत ने एकता से अपने प्यार का इज़हार कर दिया…

ये वही दिन था जिस दिन “आकाश” की मौत को पूरा एक साल हो गया था… इससे भी बड़ी आश्चर्य की बात तो तब हुई जब एकता ने सब कुछ जानते हुए भी रंजीत को “हाँ” कह दिया… और उसी दिन एकता और रंजीत दोनों अपने प्यार का जश्न मनाने long drive पर गए…

ये बात तब मयूर को पता ही न थी, पर जब पता चला तो उसे बिल्कुल विश्वास भी ना हुआ.. यूँ ही कॉलेज का 2nd year भी गुजर गया… मयूरएकता का रंजीत को “हाँ” कहना सह ना सका, सारी गर्मी कि छुट्टियाँ उन्ही दोनों के बारे में सोचता रहा… आखिर गर्मी की छुट्टियाँ जब ख़त्म हुईं, तब सभी दोस्त एक बार फिर कॉलेज में मिले… तब एक दिन दोस्तों कि महफ़िल में मयूर के मुँह से निकल ही गया – “आखिर वही हुआ जो मैंने सुना था पर कभी विश्वास ही ना किया, कि लड़कियाँ कभी किसी का इंतज़ार नहीं करतीं औरएकता ने भी वही किया..”

इस पर अनीता ने गुस्से में मयूर से कहा, “तो क्या हुआ मयूर ? आखिर कब तक वो उसका इंतज़ार करती जो कभी लौट के आ ही नहीं सकता ?”                   तब मयूर ने कहा, “मैंने कब कहा कि वो इंतज़ार करे, पर जो भी करे कम से कम सही तो करे, मैं ये नहीं कहता कि उसने कुछ गलत किया, पर कुछ सही भी नहीं किया उसने…”

अनीता – “तो तुम्हारी नज़र में क्या सही है ?”

मयूर – “उसने कुछ गलत नहीं किया, पर उसका चुनाव गलत था.”

अनीता – “OK मयूर, तो तुमको क्या लगता है कि वो तुमको चुनती ?”

मयूर (हँसते हुए) – “अपनी ऐसी किस्मत कहाँ ? अरे हम तो बस वो हैं जिसे किसी ने देखा ही नहीं और जिसने देखा उसने पहचाना ही नहीं…”

इस पर सारे दोस्त हंस पड़े.

थोड़ी देर बाद अनीता ने फिर मयूर से कहा, “देखो मयूर, लड़कियाँ ऐसी ही होती हैं. कोई किसी का इंतज़ार नहीं करती… क्योंकि तुमको भी पता है कि एकता को सहारे कि जरूरत थी, अब जब रंजीत ने आगे बढ़कर उसे सहारा दिया तो तुम एकता को गलत क्यों कह रहे हो ?”

तब मयूर ने कुछ न कहा, और चुपचाप सुनता रहा… तभी Claas room में कोई Teacher आ गए, और उनकी महफ़िल यूँ ही ख़त्म हो गई… पर उस दिन घर जाने से पहले अनीता ने मयूर से फिर पुछा, “तुमने कोई जवाब क्यों नहीं दिया ?”, तब मयूर बोला, “इसका जवाब मैं कॉलेज के last में दूँगा, I mean आखिरी exam के दिन…” ये कह कर वो वहाँ से चल दिया…

यूँ ही कॉलेज का ये साल भी गुजर गया पर मयूर ने आखिरी exam के दिन भी अनीता से कुछ न कहा… उसे याद था पर वो कह न सका… उसने अनीता के पूछने पर बस इतना ही कहा, “अनीता, मेरी ये बात हमेशा याद रखना कि मैं नहीं जानता कि एकता कैसी लड़की है, पर मैं बस इतना जनता हूँ कि जो आकाश की ना हो सकी वो किसी की नहीं हो सकती”. ये बात पहले तो अनीता की समझ में न आई और वो सोचती रही की मयूर उससे क्या कह गया.. और उसने वो मयूर से इस पर कुछ बोलना चाहा तो उसने देखा कि मयूर वहाँ से जा चूका है…

अब कॉलेज बंद हो चुके थे… करीब एक महीने बाद, रंजीत ने, जो कि एकता के प्यार में पूरी तरह से सुधर चूका था और अपनी सारी बुरी आदतें छोड़ चूका था, अनीता को call किया और उसे बताया कि एकता ने उसे किसी दुसरे लड़के के लिए छोड़ दिया… शुरू में तो अनीता को भी विश्वास न हुआ, पर बाद में जब उसे सच्चाई पता चली तो उसे मयूर की वही बात याद आई जो उसने उससे कॉलेज के आखिरी दिन कही थी… और मयूर के द्वारा कही गयी एक कविता भी याद आई उसे, जिसके बोल थे –

मैंने तुमको क्या समझा और क्या निकले तुम ?

दुनिया ने माँगी थी तुमसे वफ़ा, पर बेवफा निकले तुम…

किसी ने प्यार में दे दी तुम्हारे जाँ,

और उससे सच्चा प्यार भी ना कर सके तुम…

किसी ने बदल के खुद को हो गया तुम पर कुर्बान,

और किसी पे एतबार भी ना कर सके तुम…

मैंने तुमको क्या समझा, और क्या निकले तुम ?

जिसने की तुमसे वफ़ा, बस उसी के लिए बेवफा निकले तुम…

बदलाव

Posted: 25 Oct 2010 08:22 AM PDT

सदियों से चला आ रहा चलन अब चाल बदल रहा है. औरत और मर्द जो घर की गाड़ी खींचने वाले दो पहिये है, जहां मर्द की जिम्मेवारी बाहर जाकर कमा कर लाना और औरत घर के अंदर अपने परिवार की देखरेख में लगी रहती है, यह सिर्फ किस्सों की हकीकत बनता जा रहा है. अब वक्त ने चाल बदली है और पासे भी पलट रहे हैं. घर की गैरत अब चौखट के बाहर अपना पांव फैलाकर अपने अस्तित्व की पहचान पा रही है.

पश्चिम देशों में आम चलन है, सभी औरतें मर्दों जैसे कपड़े पहने, सुबह सवेरे घर से निकल कर काम पर चली जाती है और कइयों के मर्द जो रात की ड्यूटी से घर लौटते हैं दिन तमाम घर की चारदीवारी में बस जाते हैं. ज़माना बदला है और साथ उसके बदले हैं रँग, ढंग और सोच भी. जो औरत एक ज़माने में घूँघट ओढ़े मर्द के पीछे पीछे पर्दा पोश होकर चलती थी, वही आज कंधे से कंधा मिलाकर चल पड़ी है, अक्सर ऐसा भी भी होता है कि वह अपनी रफ्तार बढ़ाकर आगे निकल जाती है.

काम करना, अपने व्यक्तित्व को उजगार करना, इसमें कोई बुराई नहीं है. बुराई तब उपजती है जब औरत हो या मर्द अपनी मर्यादा को लाँघकर दायरों को पार कर जाते है, जिनके कारण रिश्तों के बँधन ढीले हो जाते है. विश्वास अविश्वास में बदलने लगता है, तो लर्जिश घरों तक महसूस होती है.

रिश्ते तो विश्वास में पलते हैं दौलत से नहीं

किसलिये दिल टूटते, क्यों टूटती फिर शादियां.

यहां मैं घर को बांधने में, उसको बनाये रखने में, उसे एक आदर्श मुकाम पर लाने की जिम्मेदारी एक औरत पर होनी चाहिये ऐसा मानती हूं. यह असान काम नहीं और न ही किसी अग्नी‍‍..परीक्षा से कम. सहयोग मर्द का बहुत जरूरी भी है और लाज़िमी भी. पर जिम्मेदारी का बोझ औरत के ममतामयी काँधों पर होता है और होना भी चाहिये. औरत एक माँ भी है, बहन, बीवी, सख़ा सहेली भी. हर रिश्ते को बखूबी निभा पाती है वह, हर रूप में सर्व शक्तीमान है और सबल भी, यही अहसास इस शेर में व्यक्त हुए हैं.

ये है पहचान एक औरत की

मां, बहन, बीवी, बेटी या देवी.

इस बदलते हुए ज़माने में बदलाव को आना है, आये, तब्दीलियों आती हैं आयें, दुश्वारियां बढ़ती है, बेशक बढ़े, पर हौसलों को कमज़ोर न पढ़ने दें, और उन्हीं मज़बूत इरादों से दुश्वारियों की चट्टानों को चीरकर, आसानियों की राह पर कदम रखें, बदलाव को आलिंगन में भरकर अपने जीवन का हिस्सा बनालें.  इमारत का स्वरूप बदले कोई ग़म नहीं, रँग रौगन से उसे सुंदर जामा पहनायें कुछ गलत नहीं, पर उस इमारत की नींव की जड़ों के साथ छेड़ा खानी न करें.  निस्वार्थ सच से उन्हें सींचते रहें.फिर देखिये हरी भरी नन्हीं पत्तियों के अंकुर फिज़ाओं में कैसे ताज़गी फैलायेंगे, अंधेरों को चीरकर उजाले की नई किरण जीवन को एक नया मतलब अता करेगी. यही बदलाव है.

देवी नागरानी, १५ जून २००9

शायद डर गए हैं राहुल गाँधी ?

Posted: 25 Oct 2010 08:12 AM PDT

आखिर राहुल- महिमामंडन में कांग्रेस पार्टी इस प्रकार क्यूँ जुटी है ?  क्या कांग्रेस को यह डर हो गया है कि राहुल कि लोकप्रियता में जबरदस्त कमी आयी है | मिशन 2014  कि तैयारी  को लेकर कांग्रेस के लिए इसे एक गहरा झटका माना जा सकता है|  जिस राहुल को देश के अगले भविष्य के रूप में कांग्रेस पार्टी प्रचारित कर रही है, उसके लिए यह एक सदमे वाली बात हो सकती है| दिल्ली विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविदयालय और हिमाचल विश्वविदालय के चुनाव में मिली हर से कांग्रेस पार्टी तिलमिला उठी| जिस राहुल को युवाओं के सम्राट के तौर पे मीडिया और कांग्रेस पार्टी खुद आगे दिखा रही थी उसके लिए ये हार एक तमाचे कि तरह थी| राहुल कि स्थिति सिर्फ भीड़ खीचने तक ही सीमित रहने लगी युवाओं का भी मोहभंग उनसे होता जा रहा है | युवा कांग्रेस में किस प्रकार भ्रष्टाचार हो रहा है यह किसी से छुपा नहीं है| अब कांग्रेस के ही एक प्रवक्ता ने राहुल कि तुलना जयप्रकाश नारायण से कर दी और कह डाला कि राहुल में वह सारे गुण हैं जो जेपी में थे | अजीब ही हास्यास्पद बात है कि एक ऐसे व्यक्ति से साथ ऐसे कि तुलना कि जा रही है जिसमे कोई तालमेल ही नहीं है| जेपी तो देश कि जनता के नब्ज़ को पहचानते  थे , जमीन से जुड़े हुए लोग थे, जन-जन के नायक थे वे| क्या राहुल को यह सारे सम्मान प्राप्त हैं, क्या राहुल को देश कि आम जनता से सरोकार है, क्या राहुल जनता के नब्ज़ को पहचानते हैं| यह राहुल को शायद ही प्राप्त हो, जेपी ने अपने लिए नहीं बल्कि आम लोगों के लिए संघर्ष  किया था , लेकिन राहुल तो खुद का रास्ता तलाशने कि कोशिश कर रहे हैं| आखिर ऐसे किसी से तुलना करने के पहले सोचने कि एक अदब जरूरत है| राहुल गाँधी को प्रचारित और प्रसारित करने का एक ही पहलु मुझे नजर आता है कि कांग्रेस अपने युवराज को लेकर चिंतित है| गुजरातमें डर से ही राहुल कि सभा नहीं कराई जाती कि हार का ठीका किसके सर फोड़ेंगे, क्यूंकि जनता वहां कि समझदार है और कांग्रेस को मौका ही नहीं दे रही, विकास  को मौका दे रही है| मुझे राहुल गाँधी से कोई चिड नहीं है लेकिन मुझे उनके दो तरह के चेहरे से नफरत है | वो छात्रों को राजनीति में आने  को कह रहे हैं, लेकिन क्या वे उनकी रोजी रोटी कि भी कोई बात करते हैं| इस मुद्ददे पे वे गौण हो जाते हैं, जब उनसे देश में व्याप्त स्थिति पे प्रश्न किया जाता है तो वो अपनी सरकार का बखूबी बचाव करते हैं लेकिन अपनी चोरी को नहीं छिपा पाते| सिर्फ गोल  मटोल  जवाब देने से और आह्वाहन करने से जनता कि समस्या नहीं दूर हो सकती| लेकिन अब कौन समझाए ऐसे लोगों को जिनको अपनी महिमंदन ही प्रिय है| शायद राहुल को आभाष हो गया है कि मेरी बात अब सिर्फ मीडिया में जगह पाती है जनता तो कभी गौर से सुनती ही नहीं थी| राहुल को लगे हाथ एक बात कहना चाहूँगा कि दो मुह वाली सांप कि तरह व्यवाहंर न करें और सही भारत को पहचाने|

पूर्ण-विलय के उपरांत जनमत संग्रह का औचित्य

Posted: 25 Oct 2010 07:31 AM PDT

जम्मू-कश्मीर में आत्मनिर्णय या जनमत संग्रह कराने की मांग का कहीं कोई औचित्य नहीं है। ये मांगें किसी भी प्रकार से न तो संवैधानिक हैं और न ही मानवाधिकार की परिधि में ही कहे जाएंगे। अलगाववादियों द्वारा इस विषय को मानवाधिकार से जोड़ना केवल एक नाटक भर है। क्योंकि इससे विश्व बिरादरी का ध्यान ज्यादा आसानी से आकृष्ट किया जा सकेगा। यह सारा वितंडावाद विशुद्ध रूप से कश्मीर को हड़पने के लिए पाकिस्तानी नीति का ही एक हिस्सा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत आगमन से पूर्व पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गतिविधियों में यकायक बढ़ोतरी हुई है। यहाँ तक कि कश्मीर घाटी के अलगाववादी संगठन और उसके नेता भी ज्यादा सक्रिय दिखने लगे हैं। अलगाववादी हुर्रियत नेता गिलानी का नई दिल्ली में “आजादी ही एक मात्र रास्ता” विषयक सेमीनार में शिरकत करना विश्व बिरादरी का ध्यान आकृष्ट कराने के अभियान का ही एक हिस्सा है। सेमीनार की खास बात यह रही कि इसमें कश्मीरी अलगाववाद के समर्थक कई जाने-माने बुद्धिजीवी भी भारत के खिलाफ जहर उगलने के लिए उपस्थित थे। सेमीनार में गिलानी के बोलने से पहले ही उनके सामने कुछ राष्ट्रवादी युवकों ने जूता उछाल दिया। इससे भारी शोर-शराबा हुआ, जिसको देखते हुए सेमीनार बीच में ही रोकना पड़ा। इस कारण से अलगाववादियों की सारी सोची-समझी रणनीति धरी की धरी रह गई।

ओबामा की भारत यात्रा के मद्देनजर पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी रणनीतिक दृष्टि से अमेरिका में थे। यहां पर कुरैशी ने अमेरिका से कश्मीर मसले के समाधान के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच दखल देने का अनुरोध किया। लेकिन अमेरिका ने पाकिस्तान के अनुरोध को सुनने से ही इन्कार कर दिया। अमेरिका का कहना है कि कश्मीर मसला दो देशों के बीच का मामला है। इसलिए दोनों देशों के बीच में दखल देना या मध्यस्थता करना उसके लिए संभव नहीं है। इस तरह से अमेरिका ने कश्मीर मसले पर भारत के रुख का ही समर्थन किया है।

जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों की मांगे विशुद्ध रूप से भारत के एक और विभाजन की पक्षधर हैं। आत्मनिर्णय के अधिकार या जनमत संग्रह और मानवाधिकार की बड़ी-बड़ी बातें तो अलगाववादियों का महज मुखौटा भर है। क्योंकि जम्मू-कश्मीर का “सशर्त विलय” नहीं बल्कि “पूर्ण विलय” हुआ है। जम्मू-कश्मीर रियासत के तत्कालीन महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को एक विलय पत्र पर हस्ताक्षर करके उसे भारत सरकार के पास भेज दिया था। 27 अक्टूबर 1947 को भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन द्वारा इस विलय पत्र को उसी रूप में तुरन्त स्वीकार कर लिया गया था। यहाँ इस बात का विशेष महत्व है कि महाराजा हरिसिंह का यह विलय पत्र भारत की शेष 560 रियासतों से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं था और इसमें कोई पूर्व शर्त भी नहीं रखी गई थी।

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देशहित को अनदेखा करते हुए इस विलय को राज्य की जनता के निर्णय के साथ जोड़ने की घोषणा करके अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की। इस हेतु 26 नवंबर 1949 को संविधानसभा में अनुच्छेद-370 का प्रावधान रखा गया, जिसके कारण इस राज्य को विशेष दर्जा प्राप्त हुआ। विशेष बात यह है कि राज्य को अपना संविधान रखने की अनुमति दी गई। भारतीय संसद के कानून लागू करने वाले अधिकारों को इस राज्य के प्रति सीमित किया गया, जिसके अनुसार, भारतीय संसद द्वारा पारित कोई भी कानून राज्य की विधानसभा की पुष्टि के बिना यहां लागू नहीं किया जा सकता। इन्हीं सब कारणों से उस दौर के केंद्रीय विधि मंत्री डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने इस अनुच्छेद को देशहित में न मानते हुए इसके प्रति अपनी असहमति जताई थी। संविधान सभा के कई वरिष्ठ सदस्यों के विरोध के बावजूद नेहरू जी ने हस्तक्षेप कर इसे अस्थाई बताते हुए और शीघ्र समाप्त करने का आश्वासन देकर पारित करा लिया।

हम सब जानते हैं कि भारत का संविधान केवल एक नागरिकता को मान्यता प्रदान करता है लेकिन जम्मू-कश्मीर के नागरिकों की नागरिकता दोहरी है। वे भारत के नागरिक हैं और जम्मू-कश्मीर के भी। इस देश में दो विधान व दो निशान होने का प्रमुख कारण यह कथित अनुच्छेद है। सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि 17 नवबंर 1956 को जम्मू-कश्मीर की जनता द्वारा विधिवत चुनी गई संविधान सभा ने इस विलय की पुष्टि कर दी। इसके बावजूद भी यह विवाद आज तक समाप्त नहीं हो सका है।

तत्कालीन कांग्रेस नेताओं की अदूरदर्शिता का परिणाम आज हमारे सामने है कि महाराजा द्वारा किए गए बिना किसी पूर्व शर्त के विलय को भी शेख की हठधर्मिता के आगे झुकते हुए केन्द्र सरकार द्वारा ‘जनमत संग्रह’ या ‘आत्मनिर्णय’ जैसे उपक्रमों की घोषणा से महाराजा के विलय पत्र का अपमान तो किया ही साथ-साथ स्वतंत्रता अधिनियम का भी खुलकर उल्लघंन हुआ है। इस स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसार, राज्यों की जनता को आत्मनिर्णय का अधिकार न देते हुए केवल राज्यों के राजाओं को ही विलय के अधिकार दिए गए थे।

ये बातें एकदम सिद्ध हो चुकी हैं कि 63 वर्षों बाद भी यदि जम्मू-कश्मीर राज्य की समस्या का समाधान नहीं हो सका है तो इसके जिम्मेदार कांग्रेसी राजनेता हैं। नेहरू का कश्मीर से विशेष लगाव होना, शेख अब्दुल्ला के प्रति अत्यधिक प्रेम और महाराजा हरिसिंह के प्रति द्वेषपूर्ण व्यवहार ही ऐसे बिंदु थे, जिसके कारण कश्मीर समस्या एक नासूर बनकर समय-समय पर अत्यधिक पीड़ा देती रही है, उसी तरह समस्या के समाधान में अनुच्छेद-370 भी जनाक्रोश का विषय बनती रही है।

इस विघटनकारी अनुच्छेद को समाप्त करने की मांग देश के बुद्धिजीवियों और राष्ट्रवादियों द्वारा बराबर की जाती रही है। दूसरी ओर पंथनिरपेक्षता की आड़ में मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले इसे हटाए जाने का विरोध करते रहे हैं। अस्थाई रूप से जोड़ा गया यह अनुच्छेद-370 गत 61 वर्षों में अपनी जड़ें गहरी जमा चुकी है। इसे समाप्त करना ही देशहित में होगा, नहीं तो देश का एक और विभाजन तय है।

अलगाववाद को शह दे रही है कांग्रेस

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में अलगाववाद का समर्थन करते हुए जो बयान दिया था, वास्तव में उस बयान के बाद उनको मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का कोई लोकतांत्रिक और नैतिक अधिकार नहीं रह गया है। उमर ने कहा था- “जम्मू-कश्मीर का पूर्ण विलय नहीं बल्कि सशर्त विलय हुआ है। इसलिए इस क्षेत्र को भारत का अविभाज्य अंग कहना उचित नहीं है। यह मसला बिना पाकिस्तान के हल नहीं किया जा सकता है।”

उमर के इस प्रकार के बयान से वहां की सरकार और अलगाववादियों में कोई अंतर नहीं रह गया है। जो मांगे अलगाववादी कर रहे हैं, उन्हीं मांगों को राज्य सरकार के मुखिया उमर भी दुहरा रहे हैं। आखिर, सैयद अली शाह गिलानी व मीरवाइज उमर फारूख सहित अन्य अलगाववादी नेताओं और राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला में क्या फर्क बचा है ?

यदि उमर अब्दुल्ला अलगाववादी भाषा बोलने के बाद भी राज्य के मुख्यमंत्री बने हुए हैं, तो इसकी प्रत्यक्ष जिम्मेदार कांग्रेस है। क्योंकि कांग्रेस के समर्थन से ही अब्दुल्ला सरकार टिकी हुई है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि जम्मू-कश्मीर मसले पर बातचीत के लिए केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त वार्ताकार भी उमर अब्दुल्ला की ही तरह अलगाववादी भाषा बोल रहे हैं। यानी उमर अब्दुल्ला, कांग्रेस, वार्ताकारों और राज्य के अलगाववादियों के विचार एक हैं। चारो अलगाववाद के समर्थन में हैं।

कांग्रेस भी अलगाववादियों के सुर में सुर मिला रही है। यह चिन्तनीय है। अब यह प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस भी पंडित नेहरू के ही नक्शे-कदम पर चल पड़ी है ? सभी जानते हैं कि स्वतंत्रता के तत्काल बाद कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी आक्रमण के दौरान कश्मीर की जीती हुई लड़ाई को संयुक्त राष्ट्र में ले जाकर पंडित नेहरू ने ऐतिहासिक भूल की थी। ठीक उसी प्रकार की भूल कांग्रेस भी कर रही है। इतिहास गवाह है कि यदि पंडित नेहरू कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में नहीं ले गए होते तो आज अपने पूरे जम्मू-कश्मीर पर भारत का ध्वज फहराता और ‘पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर’ का कहीं कोई नामोनिशान नहीं होता।

कौन हूँ मैं!

Posted: 24 Oct 2010 09:44 PM PDT

कोकिल जितना घायल होता

उतनी मधुर कुहुक देता है

जितना धुंधवाता है चंदन

उतनी अधिक महक देता है

मैने खुद को ना जाना था,ना पहचाना था,

कौन हूँ ,क्या हूँ कैसी हूँ ,कहाँ हूँ ………

प़र तेरे प्रेम ने बताया कौन हूँ मैं!

तूने ही तो तराशे अंग-प्रत्यंग

तूने ही सुनी मेरी मधुर धुन

जगाया मेरा सौन्दर्य अपार

साधारण नार से एक दैवीय अप्सरा

पांवों की थिरकन में भर दिया जादू

नैनो कि चितवन जो कर दे बेकाबू

मैं तो केवल तन ही तन थी

जब तक ना मन को जाना था

मैं तो केवल बांस ही रहती

जो होठो से तेरे बंसी बन ना लगती

मैं तो बस एक तरु ही होती ,

जो तू चन्दन सा ना महकाता

डॉ.शालिनिअगम

मैं तो केवल तन ही तन था मुझमें जागे मन के पहले

जैसे सिर्फ बांस का टुकड़ा है बंसी-वादन के पहले

>महिलाओं को पुरोहिताई ट्रेनिंग एवं बाढ़पीड़ितों को मकान :- दो उत्साहवर्धक खबरें…… Hindu Female Priest, VHP-RSS Social Work

>इस समय पूरे देश में हिन्दुत्व के खिलाफ़ एक जोरदार षडयन्त्र चल रहा है, और केन्द्र सरकार समेत सभी मुस्लिम वोट सौदागर सिमी जैसे देशद्रोही और रा स्व संघ को एक तराजू पर रखने की पुरज़ोर कोशिशें कर रहे हैं। हिन्दुत्व और विकास के “आइकॉन” नरेन्द्र मोदी को जिस तरह मीडिया का उपयोग करके बदनाम करने और “अछूत” बनाने की कोशिशें चल रही हैं, इससे सम्बन्धित देशद्रोही सेकुलरों और गद्दार वामपंथियों द्वारा इस्लामिक उग्रवाद की अनदेखी की पोल खोलने की खबरें पाठक लगातार पढ़ते रहते हैं। केरल, पश्चिम बंगाल, कश्मीर, असम, नागालैण्ड में जिस तरह की देश विरोधी गतिविधियाँ चल रही हैं और दिल्ली में बैठकर जिस प्रकार मीडिया के बिकाऊ भाण्डों के जरिये हिन्दुत्व की छवि मलिन करने का प्रयास किया जा रहा है उसके बारे में पाठकों को सतत जानकारी प्रदान की जाती रही है, और यह आगे भी जारी रहेगा…

फ़िलहाल आज दो उत्साहवर्धक खबरें लाया हूं, जिसे 6M (मार्क्स, मुल्ला, मिशनरी, मैकाले, मार्केट, माइनो) के हाथों “बिका हुआ मीडिया” कभी हाइलाईट नहीं करेगा…

1) पहली खबर है नागपुर से –

कुछ “तथाकथित प्रगतिशील” लोग भले ही पुरोहिताई और कर्मकाण्ड को पिछड़ेपन की निशानी(?) मानते हों, लेकिन यह समाज की हकीकत और मानसिक/आध्यात्मिक शान्ति की जरुरत है, कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक कई-कई बार वेदपाठी, मंत्रोच्चार से ज्ञानी पंडितों-पुरोहितों की आवश्यकता पड़ती ही है। (यहाँ तक कि “घोषित रुप से नास्तिक” लेकिन हकीकत में पाखण्डी वामपंथी भी अपने घरों में पूजा-पाठ करवाते ही हैं)। आज के दौर में अपने आसपास निगाह दौड़ाईये तो आप पायेंगे कि यदि आपको किसी पुरोहित से छोटी सी सत्यनारायण की पूजा ही क्यों न करवानी हो, “पण्डित जी बहुत भाव खाते हैं”। पुरोहितों को भी पता है कि “डिमाण्ड-सप्लाई” में भारी अन्तर है और उनके बिना यजमान का काम चलने वाला नहीं है, साथ ही एक बात और भी है कि जिस तरह से धार्मिकता और कर्मकाण्ड की प्रथा बढ़ रही है, अच्छा और सही पुरोहित कर्म करने वालों की भारी कमी महसूस की जा रही है।

इसी को ध्यान में रखते हुए, विश्व हिन्दू परिषद ने महिलाओं को पुरोहिताई के क्षेत्र में उतारने और उन्हें प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम चलाया है। सन 2000 से चल रहे इस प्रोजेक्ट में अकेले विदर्भ क्षेत्र में 101 पूर्ण प्रशिक्षित महिला पुरोहित बनाई जा चुकी हैं तथा 1001 महिलाएं अभी सीख रही हैं। महिला पुरोहितों का एक विशाल सम्मेलन हाल ही में नागपुर में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा रखा गया जिसकी अध्यक्षता श्रीमती जयश्री जिचकर (पूर्व कांग्रेसी नेता श्रीकान्त जिचकर की पत्नी) द्वारा की गई। इस अवसर पर विदर्भ क्षेत्र की सभी महिला पुरोहितों की एक डायरेक्ट्री का विमोचन भी किया गया ताकि आम आदमी को (यदि पुरुष पुरोहित ज्यादा भाव खायें) तो कर्मकाण्ड के लिये महिला पुरोहित उपलब्ध हो सकें।

ऐसा नहीं है कि अपने “क्षेत्राधिकार में अतिक्रमण”(?) को लेकर पुरुष पुरोहित चुप बैठे हों, ज़ाहिर सी बात है उनमें खलबली मची। अधिकतर पुरुष पुरोहितों ने बुलावे के बावजूद सम्मेलन से दूरी बनाकर रखी, संख्या में कम होने के कारण उनमें “एकता” दिखाई दी और किसी न किसी बहाने से उन्होंने महिला पुरोहित सम्मेलन से कन्नी काट ली। कुछ पुरोहितों को दूसरे पुरोहितों ने “अप्रत्यक्ष रुप से धमकाया” भी, फ़िर भी नागपुर के वरिष्ठ पुरोहित पण्डित श्रीकृष्ण शास्त्री बापट ने सम्मेलन में न सिर्फ़ भाग लिया, बल्कि पौरोहित्य सीख रही युवतियों और महिलाओं को आशीर्वचन भी दिये। बच्चे के जन्म, जन्मदिन, गृहप्रवेश, सत्यनारायण कथा, किसी उपक्रम की आधारशिला रखने, लघुरुद्र-महारुद्र का वाचन, शादी-ब्याह, अन्तिम संस्कार जैसे कई काम हैं जिसमें आये-दिन पुरोहितों की आवश्यकता पड़ती रहती है। हाल ही में पूर्व सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी की उपस्थिति में 1001 महिला पुरोहितों ने विशाल “जलाभिषेक” का सफ़लतापूर्वक संचालन किया था। महिलाओं को इस “उनके द्वारा अब तक अछूते क्षेत्र” में प्रवेश करवाने के लिये विश्व हिन्दू परिषद ने काफ़ी काम किया है, महिला पुरोहितों को ट्रेनिंग देने के लिये अकोला में भी एक केन्द्र बनाया गया है।

कुछ वर्ष पूर्व महाराष्ट्र के पुणे में महिलाओं द्वारा अन्तिम संस्कार और “तीसरे से लेकर तेरहवीं” तक के सभी कर्मकाण्ड सम्पन्न करवाने की शुरुआत की जा चुकी है, और निश्चित रुप से इस कार्य के लिये महिलाओं का उत्साहवर्धन किया जाना चाहिये। आजकल युवाओं में अच्छी नौकरी पाने की चाह, भारतीय संस्कृति से कटाव और अंग्रेजी शिक्षा के “मैकाले इफ़ेक्ट” की वजह से पुरोहिताई के क्षेत्र में अच्छी खासी “जॉब मार्केट” उपलब्ध है, यदि वाकई कोई गम्भीरता से इसे “करियर” (आजीविका) के रुप में स्वीकार करे तो यह काम काफ़ी संतोषजनक और पैसा कमाकर देने वाला है।

दूसरी बात “क्वालिटी” की भी है, समय की पाबन्दी, मंत्रों का सही और साफ़ आवाज़ में उच्चारण, उचित दक्षिणा जैसे सामान्य “बिजनेस एथिक्स” हैं जिन्हें महिलाएं ईमानदारी से अपनाती हैं, स्वाभाविक रुप से कर्मकाण्ड करवाने वाला यजमान यह भी नोटिस करेगा ही। अब चूंकि युवा इसमें आगे नहीं आ रहे तो महिलाओं के लिये यह क्षेत्र भी एक शानदार “अवसर” लेकर आया है। विश्व हिन्दू परिषद के कई अन्य प्रकल्पों की तरह यह प्रकल्प भी महिलाओं में काफ़ी लोकप्रिय और सफ़ल हो रहा है। कर्मकाण्ड और हिन्दू धर्म को लेकर लोग भले ही नाक-भौं सिकोड़ते रहें, पिछड़ापन बताते रहें, तमाम वैज्ञानिक तर्क-कुतर्क करते रहें, लेकिन यह तो चलेगा और खूब चलेगा, बल्कि बढ़ेगा भी, क्योंकि जैसे-जैसे लोगों के पास “पैसा” आ रहा है, उसी अनुपात में उनमें धार्मिक दिखने और कर्मकाण्डों पर जमकर खर्च करने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। इसे एक सीमित सामाजिक बुराई कहा जा सकता है, परन्तु “पौरोहित्य कर्म” जहाँ एक ओर घरेलू महिलाओं के लिये एक “अच्छा करियर ऑप्शन” लाता है, वहीं भारतीय संस्कृति-वेदों-मंत्रपाठ के संरक्षण और हिन्दुत्व को बढ़ावा देने के काम भी आता है, यदि विहिप का यह काम सेकुलरों-प्रगतिशीलों और वैज्ञानिकों की तिकड़ी को बुरा लगता है तो उसके लिये कुछ नहीं किया जा सकता।

2) दूसरी खबर कर्नाटक के बागलकोट से –

संघ परिवार की ही एक और संस्था “सेवा भारती” द्वारा कर्नाटक के बाढ़ पीड़ित गरीब दलितों के लिये 77 मकानों का निर्माण किया गया है और उनका कब्जा सौंपा गया। सेवा भारती द्वारा बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित 13 गाँवों को गोद लेकर मकानों का निर्माण शुरु किया गया था। 18 अक्टूबर 2010 को श्री सुदर्शन जी एवं अन्य संतों की उपस्थिति में पहले गाँव के 77 मकानों का कब्जा सौंपा गया। 12 अन्य गाँवों में भी निर्माण कार्य तेजी से प्रगति पर है, इस प्रकल्प में अनूठी बात यह रही कि मकान बनाते समय बाढ़ पीड़ितों को ही मजदूरी पर रखकर उन्हें नियमित भुगतान भी किया गया, और जैसे ही मकान पूरा हुआ उसी व्यक्ति को सौंप दिया गया, जिसने उसके निर्माण में अपना पसीना बहाया।

इन सभी 77 परिवारों के लिये एक सामुदायिक भवन और स्कूल भी बनवाया गया है, जहाँ सेवा भारती से सम्बद्ध शिक्षक अपनी सेवाएं मुफ़्त देंगे। सभी मकानों को जोड़ने वाली मुख्य सड़क का नामकरण “वीर सावरकर मार्ग” किया गया है (सेकुलरों को मिर्ची लगाने के लिये यह नाम ही काफ़ी है)। जल्दी ही अन्य 12 गाँवों के मकानों को भी गरीबों को सौंप दिया जायेगा। (“बिना किसी सरकारी मदद” के बने इन मकानों को किसी इन्दिरा-फ़िन्दिरा आवास योजना का नाम नहीं दिया गया है, यह मिर्ची लगने का एक और कारक बन सकता है)।

इस प्रकार के कई प्रकल्प संघ परिवार द्वारा हिन्दुत्व रक्षण के लिये चलाये जाते रहे हैं और आगे भी जारी रहेंगे। चूंकि संघ से जुड़े लोग बिना किसी प्रचार के अपना काम चुपचाप करते हैं, “मीडियाई गिद्धों” को अनुचित टुकड़े नहीं डालते, इसलिये यह बातें कभी जोरशोर से सामने नहीं आ पातीं…। वरना “एक परिवार के मानसिक गुलाम बन चुके” इस देश में 450 से अधिक प्रमुख योजनाएं उसी परिवार के सदस्यों के नाम पर हों और मीडिया फ़िर भी ही-ही-ही-ही-ही करके न सिर्फ़ देखता रहे, बल्कि हिन्दुत्व को गरियाता भी रहे… ऐसा सिर्फ़ भारत में ही हो सकता है।

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>उठ जाग रे मुसाफ़िर, गंतव्य दूर तेरा॥

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॥गंतव्य दूर तेरा॥
उठ जाग रे मुसाफ़िर, अब हो गया सवेरा।
पल पलक खोल प्यारे, अब मिट गया अंधेरा॥ उठ जाग……
प्राची में पो फ़टी है, पर फ़डफ़डाए पंखी।
चह चहचहा रहे है, निशि भर यहाँ बसेरा॥ उठ जाग……
लाली लिए खडी है, उषा तुझे जगाने।
सृष्टी सज़ी क्षणिक सी, अब उठने को है डेरा॥ उठ जाग……
वे उड चले विहंग गण, निज लक्ष साधना से।
आंखों में क्यूं ये तेरी, देती है नींद घेरा॥ उठ जाग……
साथी चले गये है, तूं सो रहा अभी भी।
झट चेत चेत चेतन, प्रमाद बना लूटेरा॥ उठ जाग……
सूरज चढा है साधक, प्रतिबोध दे रहा है।
पाथेय बांध संबल, गंतव्य दूर तेरा॥ उठ जाग……
                               रचनाकार: अज्ञात
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>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


बिहार चुनाव के दूसरे चरण में 53 फीसदी मतदान

Posted: 24 Oct 2010 09:49 AM PDT

बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे दौर में 45 सीटों पर लगभग 53 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया | रविवार 24अक्तूबर को दूसरे चरण में बिहार के छह जिले दरभंगा(10 सीटें), सीतामढी (आठ सीटें), समस्तीपुर(10 सीटें), मुज़फ़्फ़रपुर(आठ सीटें), पूर्वी चंपारण(आठ सीटें) और शिवहर(एक सीट) की कुल ४५ विधानसभा क्षेत्रों के लिए जनता ने अपना मत मशीन में बंद कर दिया है | बिहार चुनाव में इस बार भी मतदाताओं की संख्या और मतदान का प्रतिशत आशाजनक है | कहा जाता है कि बिहार राजनीति की सबसे उर्वर जमीन है और इस बात का सबूत यहाँ के मतदान केन्द्रों पर लगी लम्बी कतारों से मिलता है | दूसरे चरण के मतदान में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों सीतामढ़ी और शिवहर में भी मतदाताओं की लंबी क़तारें देखी गईं | एक बात आप सोच रहे होंगे कि जब इतना उत्साह रहता है तो फ़िर मतदान प्रतिशत और अधिक होना चाहिए तो इसका उत्तर पाने के लिए बिहार में रहने वाले मतदाताओं और बिहार से बाहर मतदाताओं के आंकड़ों को समझना होगा | दरअसल बिहार की मतदाता सूची में शामिल प्रवासी बिहारियों में से एक दो प्रतिशत ही मतदान के दौरान वहां जा पाते हैं |

दूसरे चरण में कुल मिलाकर 623 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसलाहोना है जिनमें से केवल 46 महिला उम्मीदवार हैं | जद (यू) ने 28, भाजपा ने 17, राजद ने 34, लोजपा ने 11 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं. वामदलों के कुल मिलाकर 28 उम्मीदवार मैदान में हैं| इस चरण में कई बड़े नेताओं के भाग्य का फ़ैसला हो रहा है | राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता और बिहार प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीक़ी अलीनगर विधानसभा क्षेत्र से, जनता दल (यू) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी सरायरंजन विधानसभा सीट से, जद (यू) के मंत्री रामनाथ ठाकुर समस्तीपुर से और शाहिद अली ख़ान सुरसंड से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं | गौरतलब है कि प्रथम चरण में 47 सीटों पर हुए मतदान में लगभग 55 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया था। राज्य के 243 सीटों के लिए छह चरणों में 21, 24 और 28 अक्टूबर तथा 1, 9 और 20 नवंबर को मतदान होना है ।

कश्मीर समस्या के लिए मनमोहन और अब्दुल्ला दोषी

Posted: 24 Oct 2010 08:50 AM PDT

कश्मीर की थर्राने वाली सर्दी आ गयी है लेकिन इस बार कश्मीरियों के बदन पर न तो अमृतसरी टवीड के फिरन और न ही ब्लेजर के बने कोट दिखाई दे रहे हैं। क्योंकि पिछले कई महीनों से कश्मीर के हालात जो रहे हैं वैसे में पंजाब क्या देश के किसी कोने से किसी भी तरह का माल अन्दर नहीं आ सका है | समस्या इतनी गहरा गयी है कि अब माल को बनाने वाली ज्यादातर मशीनों की आवाज बंद हो चुकी है और इस वजह से कई बड़े घराने आर्थिक तंगी का शिकार बनते जा रहे हैं।

हर वर्ष करोड़ों रुपए के ट्वीड और बेल्जर के माल पंजाब से कश्मीर की वादी में उतारा जाता रहा है। और हर सितम्बर माह तक माल तैयार कर सप्लाई शुरू हो जाती है, लेकिन तीन महीने से बंद दुकानों के शटरों ने कारोबारियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।

कश्मीर की पाकिस्तान प्रायोजित पत्थरबाजी में 255 टैंकर तोड़े गए, पेट्रोल पम्प तोड़े गए, ड्राईवरों को पीटा गया और इस अफरातफरी में करीब 200 करोड़ रूपए से अधिक का नुक़सान हुआ है.

कश्मीर में कारोबार का ठप हो जाना यूँ हीं नहीं है | दरअसल पाकिस्तान के इशारों पर दहशतगर्दी का जाल बुनने वाले अलगाववादियों ने यह सब एक मनसूबे के तहत किया है | पत्थरबाजी और हिंसक हड़तालों के जरिये महीनों तक दुकाने बंद रहने से कारोबार बंद है | कश्मीर में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है और आवाम असुविधा के आलम में जी रही है | इस तरह के अराजक माहौल में देश तोड़क तत्वों के बहकावे में कश्मीरी नौजवानों के गुमराह होने का खतरा और बढ़ गया है | हालाँकि सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल के कश्मीर दौरे के बाद से हीं मीडिया में यह दिखाया जा रहा था कि अब सब कुछ शांत हो चला है | लेकिन ऐसा नहीं है सैयद शाह गिलानी के जगह-जगह भाषणों से माहौल एक बार फ़िर ख़राब होने लगा है | कश्मीर के युवाओं को हाथों में कलम या औजार थमाया जाए ताकि जो एकाध-लाख गुमराह नौजवान-बच्चे पैसों की लालच में पत्थर फेंकने पर अमादा हो गये हैं वो भारतवर्ष के काम आ सकें | लेकिन अफ़सोस तो ये है कि अलगाववादियों से अधिक कश्मीर की समस्या को वर्तमान में केंद्र और उमर अब्दुल्ला सरकार ने बढाया है | विकास और शिक्षा की बात ना तो अब्दुल्ला कर रहा है और ना हीं केंद्र का मध्यस्थ बना दलालों का प्रतिनिधिमंडल | एक ओर अब्दुल्ला जहाँ कश्मीर-विलय के मुद्दे को कुरेद कर अपनी नाकामियों को छिपाना चाहता है तो वहीँ भारत सरकार की ओर से मध्यस्तता करने गया दिलीप पडगाँवकर ये कह रहा है कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान साथ लेना जरुरी है | ऐसे पकिस्तान्परस्त लोग यदि मध्यस्त बनेंगे तो हो गया फैसले का समाधान ! केंद्र की सोनिया सरकार कश्मीर को पाकिस्तान और ओबामा के बीच का मुद्दा बनाकर फ़िर वही गलती दुहराने जा रही है जो उनके नाना नेहरु ने दशकों पूर्व कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र में ले जाकर किया था | कश्मीर की समस्या अंतर्राष्ट्रीय नहीं है बल्कि विकास के ना होने से उपजी निराशा का विषय है |

क्यों लौट आये अनवांटेड लोग दिल्ली में ?

Posted: 24 Oct 2010 06:19 AM PDT

कॉमनवेल्थ गेम्स खत्म हो गये हैं। दुनिया ने भारत की ताकत को जान लिया है। उन लोगों के मुंह पर ताले लग गये जो भारत को पिछड़ा या कमजोर देश मानते हैं। देश ने भारत की तरक्की के बारे में जान लिया है

ऐसे सैकड़ों नहीं हजारों की तादाद में समाचार पत्रों के हैडिंग्स आपकी निगाहों से गुजरें होंगे। देश के तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी खबरों की आंधी चल रही है। इसके बाद इसकी जांच की खबरों पर भी लोगों की निगाहें टिकी हुई है। लेकिन तथाकथित नेशनल मीडिया की हाल की दो खबरों पढ़ने के बाद लगा कि देश को लेकर आम आदमी और तथाकथित मीडिया के बीच किस तरह की खाई उभर आई है।

देश के सबसे ज्यादा बिकने का दावा करने वाले इन अखबारों में खबरें छपीं कि दिल्ली के अनवांटेड़ लोग लौट आएं हैं। अनवांटेड़ की श्रेणी में शामिल किये गये दिल्ली की सड़कों पर भीख मांगने वाले लाखों की तादाद में ट्रैफिक लाईटों पर सामान बेचकर अपना घर चलाने वाले या फिर ठेली और रोजमर्रा के काम करने वाले मजदूर। इन नेशनल अखबारों ने तो इस बारे में पुलिस को कोसते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस अब इन लोगों के आने पर न रोक लगा रही है न उन पर सख्ती दिखा रही है। दोनों खबरों को अलग-अलग अखबारों ने छापा साथ में रिपोर्टर के नाम भी छापे गये। कॉमनवेल्थ खेल के दौरान कई सौ करोड़ के विज्ञापन भी तथाकथित नेशनल मीडिया को मिले।

ऐसे में तथाकथित नेशनल मीडिया ने बाकी देश से आंखें बंद कर ली। और मीडिया से सच जानने के आदी हो चुके आम आदमी को इस बात का जरा भी अंदेशा नहीं हुआ कि कैसे मीडिया उसको खबरों की दुनिया से अलग कर रहा है। एनसीआर के शहरों में डेंगू के मरीजों के चलते अस्पतालों में भारी भीड़ जमा थी। लेकिन दिल्ली में भी काफी मंहगें प्राईवेट हास्पीटल्स में बेड दिलवाने के लिये सिफारिशों की जरूरत पड़ रही थी। दिल्ली में हर अस्पताल में डेंगू बुखार से पीड़ित मरीजों की भीड़ दिखाईं पड़ रही थीं। लेकिन देश के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे मीडिया को इससे कोई लेना-देना नहीं था। और जहां मीडिया की नजर नहीं है वहां सत्ता में बैठे लोगों की नजर क्यूं कर जाएं। मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद और नौएड़ा के सरकारी अस्पतालों की तो दूर प्राईवेट वार्डस में जाकर देखियें किस तरह से डेंगू एक महामारी में तब्दील हो चुका है। आंकड़ों पर नजर रखने वाले चाहे तो चैक कर सकते है कि कैसे अलग-अलग प्राईवेट अस्पताल ने करोड़ रूपये कमायें। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की निगाहों में रतौंधी उतर आई थी। और तथाकथित नेशनल मीडिया एडवर्टाईजमेंट की मलाई काट रहा था लिहाजा इस खबर को ही खा गया। मुजफ्फरनगर में कुछ अखबारों में विज्ञापनों पर निगाह पड़ी तो हैरानी हुई कि बाकायदा डॉक्टरों ने एड दिया है कि मरीज अपने फोल्डिंग्स लेकर आएं। डाक्टरों ने मरीजों की भर्ती के लिए धर्मशाला ही बुक करा लीं। हर मरीज से बीस-बीस हजार रूपये पहले ही एडवांस के तौर पर जमा करा लिए गये। लेकिन किसी नेशनल चैनल और अखबार को दिल्ली में ये खबर नजर नहीं आई। कॉमनवेल्थ की विरूदावली गाने के बाद दिल्ली के अखबारों को खबर नजर कि किस तरह से भिखारी और दिहाड़ी मजदूर दिल्ली वापस आ रहे है।

किसी संपादक को ये नहीं लगा कि क्या ये लोग हिंदुस्तानी नहीं है। अगर ये लोग दिल्ली में अनवांटे़ड है तो लखनऊ, जयपुर या फिर इलाहाबाद में कैसे वांटे़ड़ हो सकते है। यदि इन लोगों को रोटी नहीं मिल पा रही है तो इसमें किसका दोष है। कौन सी व्यवस्था है जो लगातार अमीरों को अमीर बना रही है और ज्यादा से ज्यादा आबादी को भूखमरी और अकाल मौत की ओर धकेल रही है। लेकिन तथाकथित नेशनल मीडिया ने छाप दिया कि ये वापस लौट रहे है। क्या अखबार और उनके रिपोर्टर ये इशारा कर रहे है कि इन लोगों को पागलखाने या फिर गैस चैंबरों में भेज दिया जाएं। यदि अखबार और मीडिया ये कर रहा है तो मुझे और कुछ नहीं एक दूसरी चीज याद आ रही है।

बीसवी शताब्दी का नायक कौन है इस बारे में दुनिया सैकड़ों नाम नहीं तो दर्जनों नाम तो ले सकती है। लेकिन शताब्दी का खलनायक कौन है इस बारे में एक ही नाम सामने आयेगा। एडोल्फ हिटलर। जर्मनी के इस तानाशाह से भी दुनिया की नफरत की वजह युद्ध छेड़ना नहीं बल्कि दुनिया से यहूदियों की कौम का नामों-निशान मिटा देने की कोशिश के चलते ज्यादा है। साठ लाख के करीब यहूदियों को नये बने गैस चैंबरों से लेकर फायरिंग स्क्वाड जैसे पारंपरिक तरीकों से मौत के घाट उतार दिया गया। ये बातें इतिहास का हिस्सा हैं। लेकिन जिस बात पर जर्मनी या फिर यूरोप के बाहर की आम जनता ने ध्यान नहीं दिया था वो बात थीं किस तरह से हिटलर इतना ताकतवर हो गया कि एक पूरी कौम या फिर पूरा राष्ट्र उसके पीछे आंखें मूंद कर चलने लगा था। अगर आप लोग उस वक्त के जर्मनी के तथाकथित नेशनल मीडिया को देंखें तो वो जर्मन कौम के अहम को मजबूत करने में लगे थे। हिटलर के कदमों का विरोध करने वालों के गायब होने की खबरें भी मीडिया से गायब हो चुकी थीं।

अब के हालात में ये ही कह सकते है कि हिंदुस्तान में अभी कोई हिटलर तो नहीं है लेकिन उसके चाहने वालों की कमी नहीं है। देश का तथाकथित मीडिया उसके निर्माण में जुट गया है। देश के मौजूदा हालात को देखकर कोई भी सिर्फ यहीं कह सकता है कि ईश्वर ने इस देश को छोड़ दिया है

हाय रे! मनमोहन सरकार दिल्ली में दिया अलगाववादियों को अधिकार

Posted: 24 Oct 2010 04:20 AM PDT

पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों का मनोबल दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है। एक तरह जहां कई महिनों या कहे तो सालों से खुबसुरत कश्मीर की फिजा में जहर घोलने का काम करने वाले ये अलगाववादी नेताओं ने आज सारे हदों को पार करते हुए भारत की राजधानी दिल्ली में मौजूद होकर एक कार्यक्रम में न सिर्फ काश्मीर को भारत से अलग करने की बात कही साथ ही भारत मुर्दाबाद के नारे लगाए। और तो और देशहीत को सर्वोपरी बताने वाली दिल्ली पुलिस उनकी हौसला अफजाई करने में काफी मदद पंहुचा रही थी. साथ ही उनकी सुरक्षा में काफी मुस्तैदी से तैनात थी। हालांकि सुरक्षा में सेंध लग ही गया। कुछ काश्मीरी पंडीतों के बेटों को जब यह पता चला कि उन्हें विस्थापित करने वाले और निर्वास पर मजबूर करने वाले अलगाववादी तत्व दिल्ली की राजधानी में पहुंच चुके हैं। उन्होंने अपना जत्था बनाकर कार्यक्रम में पहले से मौजूद हो गए। कार्यक्रम शुरू हुआ। शैयद अली शाह गिलानी ने काश्मीर को भारत से अलगे करने की बात कही और मौजूद उनके अलगाववादी समर्थक और वामपंथी भारत मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे। फिर क्या था काश्मीरी युवाओं का सब्र का बांध टूट गया उन्होंने फौरन अपना चप्पल जूता निकाला और गिलानी पर फेकने लगे। देखते-देखते दोनों पक्षों में झड़प शुरू हो गई। फिर तो मौजूद शिला और मनमोहन के सिपाही फौरन अंदर आ गए और काश्मीरी युवाओं को घसीट कर बाहर करने लगे। तब एक युवा ने पुलिस वाले से कहां कि कुछ तो शर्म करों तुम सब एक तरफ तुम्हारे भाई जो काश्मीर में इन अलगाववादियों के कारण मारे जा रहे है। उन्हें पत्थरों और सुसाइड बाॅमों का इस्तेमाल कर लहुलुहान किया जा रहा हैं। वही तुम सब हमें इन देश के गद्दरों जो भारत मुर्दाबाद के नारे लगा रहे है को जब हम रोकने आए है तो हमें पीट रहे हो और यहां से घसीट कर बाहर ले जा रहे हो।

कुछ पुलिसवालों ने इसके लिए अपनी लाचारी और केन्द्र सरकार का दबाव बताया। जिससे यही साबित होता है कि यह कठपुतली मनमोहन सरकार किस कदर अलगाववादियों को शह दे रही है। एक तरफ जहां पाकिस्तान, चीन और अरब मुल्क इन्हें फंड और हथियार मुहैया करा रहे है वही दूसरी तरफ मौजूदों हिजड़ों की सरकार इन अलगाववादियों को दिल्ली में भारत का बहिष्कार करने के लिए सुरक्षा प्रदान कर रही है। जबकि मौजूदा सरकार ने कभी ये कोशिश नहीं कि की काश्मीरी पंडितों को वापस काश्मीर कैसे भेजा जाए। साथ ही अमन चैन का माहौल उन्हें प्रदान किया जाए। सरकार को तो इजाजत ही नहीं देनी चाहिए थी उन्हें ऐसे कार्यक्रम आयोजन करने के लिए खासतौर से दिल्ली में। जिससे देश का अपमान करने की बात हो। लेकिन वोट-नोट और मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाले कांग्रेसियों को तो लगता है कि अब देश प्रेम का अर्थ केवल काॅमनवेल्थ कराने मात्र से है। जिसे देश की इज्जत का सवाल बताकर करोड़ो, अरबो की सम्पत्ति बनाई जाती है। वहीं दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली में महत्वपूर्ण स्थान मण्डी हाउस को अलगाववादियों के लिए खुला छोड़ दिया गया जहां वो भारत मुर्दाबाद का नारा लगा सके।

अब ऐसे में सवाल उठता है कि इस झुलसती कश्मीर का क्या होगा। जिस प्रकार सरकार अलगाववादियों को खुली निमंत्रण दे रही है भारत के खिलाफ नारे लगाने के लिए हो सकता है आने वाले कुछ वर्षों में ये मनमोहन सरकार अलगाववादियों से वोट और नोट के लिए अलग कश्मीर देने की मांग स्वीकार कर ले। लेकिन ये सरकार अलगाववादियों को उनके इस जवाब का हिसाब देना ही नहीं चाहती। अगर देना चाहती तो नमूने के तौर पर अफजल-कसाब को कब का लटका दिया होता। कोई हल भी ढूंढने का प्रयास करती नहीं दिखाई देती। अगर चाहती तो कुछ न कुछ ऐसा अनोखा नूसखा निकालती जिससे अलगाववादी भी भाग खड़े होते और काश्मीर समस्या का हल भी सदा के लिए निकल आता। तब पाकिस्तान और चीन को करारा झटका लगता।

जहां तक काश्मीर समस्या का हल की बात करे तो धारा 370 इसमें एक बड़ी रूकावट साबित हो रही है। जिसे जल्द-से-जल्द हटाने का प्रयास किया जाना चाहिए। अगर यह संभव न हो तो केवल बिहार और यूपी के लोगों के लिए धारा 370 हटा दिया जाए। क्योंकि लोहा लोहे को काटता है। और बिहार और यूपी से बड़ा हल आज और कोई नहीं है। एक बार जहां बिहार और यूपी के बाहुबलियों ने काश्मीर में पैठ बनाना शुरू किया। इन अलगाववादी ही क्या पाकिस्तान भी दुम दबाकर भागता फिरता दिखाई देगा। चीन की तो ऐसी बीन बजेगी कि उसके हर घर से एक बिहारी-यूपी का जीन निकलता दिखाई देगा।

>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


कश्मीरियत के नाम पर कश्मीर आंदोलन की वास्तविकता

Posted: 23 Oct 2010 09:29 AM PDT

शीतल राजपूत

क्या है कश्मीरियत जिसके नाम पर कश्मीर के अलगावादी आंदोलन चला रहे हैं ? क्या कश्मीरियत वास्तव में कश्मीरी आज़ादी आंदोलन के लिए है ?

किसी आंदोलन का आधार क्या है? पहचान की एक संयुक्त बुनियाद, सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषायी या पारंपरिक समता की नींव। लेकिन, अगर कोई जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के बीच इन्हीं आधारों पर (जैसा अलगाववादी कहते हैं-कश्मीर आंदोलन) समानता की बात करता हैं,तो लोगों को बहुत सी गलत सूचनाएं मिलेंगी। दरअसल, ‘कश्मीर’ में अलगाववादी (कश्मीर का मतलब सिर्फ कश्मीर,जिसमें जम्मू,लद्दाख का हिस्सा शामिल नहीं होता) कश्मीरियत की बात करते हैं,और इसे ही अपने आजादी के आंदोलन का आधार बताते हैं।

लेकिन,इस मसले पर आगे बात करने से पहले यह जानना जरुरी है कि कश्मीरियत का मतलब क्या है? दरअसल, महाराष्ट्रवाद,पंजाबवाद और तमिलवाद की तरह कश्मीरियत भी एक छोटे से हिस्से के लोगों की साझी सामाजिक जागरुकता और साझा सांस्कृतिक मूल्य है। अलगाववादियों और कश्मीर के स्वंयभू रक्षकों के मुताबिक कश्मीर घाटी में रहने वाले हिन्दू और मुसलमानों की यह साझा विरासत है। लेकिन, सचाई ये है कि जम्मू,लद्दाख और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के पूरे हिस्से और घाटी के बीच कोई सांस्कृतिक समानता नहीं है। तर्क के आधार पर फिर यह कश्मीरियत से मेल नहीं खाता। दरअसल, सचाई ये है कि जम्मू और कश्मीर की संस्कृति में कई भाषाओं और पंरपराओं को मेल है, और कश्मीरियत इसकी विशाल सांस्कृतिक धरोहर का छोटा सा हिस्सा है।

अक्सर, खासकर हाल के वक्त में, अलगाववादी नेता या महबूबा मुफ्ती को हमने कई बार मुजफ्फराबाद, दूसरे शब्दों में सीमा पार के कश्मीर, की तरफ मार्च का आह्वान करते सुना है। लेकिन, हकीकत ये है कि इस पार और उस पार के कश्मीर में कोई सांस्कृतिक, भाषायी और पारंपरिक समानता नहीं है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में रहने वाले मुस्लिम समुदाय का बड़ा तबका रिवाज और संस्कृति के हिसाब से उत्तरी पंजाब और जम्मू के लोगों के ज्यादा निकट है। जिनमें अब्बासी, मलिक, अंसारी, मुगल, गुज्जर, जाट, राजपूत, कुरैशी और पश्तून जैसी जातियां शामिल हैं। संयोगवश में इनमें से कई जातियां पीओके में भी हैं। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के अधिकृत भाषा उर्दु है, लेकिन ये केवल कुछ लोग ही बोलते हैं। वहां ज्यादातर लोग पहाड़ी बोलते हैं,जिसका कश्मीर से वास्ता नहीं है। पहाड़ी वास्तव में डोगरी से काफी मिलती जुलती है। पहाड़ी और डोगरी भाषाएं जम्मू के कई हिस्से में बोली जाती है।

हकीकत में, दोनों तरफ के कश्मीर में सिर्फ एक समानता है। वो है धर्म की। दोनों तरफ बड़ी तादाद में मुस्लिम रहते हैं। तो क्या यह पूरी कवायद, पूरा उबाल धार्मिक वजह से है? इसका मतलब कश्मीरियत की आवाज,जो अक्सर कश्मीर की आज़ादी का नारा बुलंद करने वाले लगाते हैं,वो महज एक सांप्रदायिक आंदोलन का छद्म आवरण यानी ढकने के लिए है। और अगर ये सांप्रदायिक नहीं है, तो क्यों कश्मीरियत की साझा विरासत का अहम हिस्सा पांच लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडित इस विचार के साथ नहीं हैं, और दर दर की ठोकर खा रहे हैं। विडंबना ये है कि भाषा,रहन-सहन-खान पान और सांस्कृतिक नज़रिए से कश्मीरियत की विचारधारा में जो लोग साझा रुप में भागीदार हैं,वो कश्मीरी पंडित ही अब घाटी से दूर हैं।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर हैं )

कश्मीर की आवाज , मादरे-वतन हिन्दुस्तान जिंदाबाद ! जिंदाबाद !

Posted: 23 Oct 2010 08:33 AM PDT

कश्मीर समस्या पर जब कहीं भी चर्चा होती है तो आम तौर पर कुछ देशद्रोही तत्व इसे इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानों यह इस्लाम से जुडा हुआ मुद्दा है और देश के मुसलमान कश्मीर को एक पृथक राज्य के रूप में देखना चाहते हैं | यही नहीं ऐसे लोग खुलेआम अपनी बातों में कश्मीर को एक अलग देश के रूप में पेश करते हैं | हालिया महीनों में कश्मीर की धरती पर जो अराजकता और देशद्रोही गतिविधियाँ चल रही हैं वहां के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की गैर -जिम्मेदाराना बयान से अलगाववादियों की ताकत और बढ़ गयी है | बावजूद इसके कि इन मुट्ठीभर लोगों को पाकिस्तान -चीन समेत भारतवर्ष के अंदरूनी गद्दारों का समर्थन हासिल है , कश्मीर में लाखों लोग इनकी मुखालफत को तैयार हैं | देश भर के तमाम मुस्लिम संगठनों का राष्ट्रहित में बयान आ रहा है | हल ही में भारत के सबसे प्रभावशाली इस्लामिक संगठन दारुल उलूम ने कश्मीर को देश का अभिन्न अंग बताया था | प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान अब्दुल रहीम बस्तावी ने कहा ” भारत एक फूलों का गुलदस्ता है और हम अपने गुलदस्ते में से एक भी फूल को अलग करने का सोच भी नहीं सकते हैं ” इसी कड़ी को आगे बढाते हुए अनेक मुस्लिम संगठनों की ओर से देश भर में कश्मीर की सही आवाज़ पहुंचाने का काम किया जा रहा है ताकि बाजारू मीडिया के द्वारा फैलाए गये भ्रम का सच आम जनता तक पहुँच सके |

शुक्रवार 22 अक्तूबर को दिल्ली के मालवंकर हॉल में ” कश्मीर की आवाज ” नाम से एक परिचर्चा का आयोजन फोरम फॉर नेशनल सिक्युरिटी , मुस्लिम राष्ट्रीय मंच , जम्मू कश्मीर पीपल्स फोरम ,जम्मू-कश्मीर विचार मंच ,भारतीय ग्रामीण परिषद् ,दिल्ली स्टडी ग्रुप और हिमालयन बुद्धिस्ट कल्चरल एसोसिएसन ने मिलकर किया | कश्मीर की आवाज़ देश के हुक्मरानों तक पहुँचाने के लिए कश्मीर से सैकड़ों युवाओं को साथ लेकर दर्जन भर कश्मीरी नेता , बुद्धिजीवी और पत्रकार आये हुए थे |

सभा को सबसे पहले संबोधित करते हुए जम्मू -कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने कहा ” मैं पूछता हूँ कि यदि जम्मू-कश्मीर में सुप्रीम कोर्ट का न्याय नहीं रहेगा तो वहां के आवाम को ज्यादा अच्छा इन्साफ मिलेगा या बुरा इन्साफ ? अगर चुनाव आयोग वहां नहीं होगा तो क्या आप अपने मत से अपनी सरकार चुन पाएंगे ? “

गुर्जर यूनाईटेड काउन्सिल के अध्यक्ष चौधरी कमर रब्बानी ने कहा कि ” कश्मीर में भाईचारा पसंद लोग रहते हैं और इसका उदाहरण है पिछले लोकसभा चुनाव में दौसा से मुझे तीन लाख वोट मिलना जबकि वहां 90 प्रतिशत गैर-मुस्लिम आबादी हैं | लेकिन संसार के स्वर्ग को चंद पाकिस्तानी टुकड़ों पर पलने वाले लोग इस्लाम के नाम पर ,मुसलमान के नाम पर , जहन्नुम बनाया जा रहा है | कश्मीर में गुर्जरों की आबादी पैंतीस लाख है , ये गुर्जर हिन्दू भी हैं ,सिख भी हैं , और मुसलमान भी अगर ये एक हो गये तो कश्मीर में लाख दो लाख देशद्रोहियों की साजिश कुचल दी जाएगी | मेरे भाई ने देश की राह में अपने जान की क़ुरबानी दी है और हम भी मरते दम तक मादरेवतन हिन्दुस्तान के लिए लड़ेंगे | अमर अब्दुल्ला का बयान बेहद गैरजिम्मेदाराना है | हम मर जायेंगे मिट जायेंगे , भारत के साथ जिए हैं और भारत के साथ मरेंगे | “

सभा में बीच-बीच में मादरे वतन हिन्दुस्तान जिंदाबाद के नारे लगते रहे | सभा को कश्मीर की आवाज़सुनते हुए डोडा विचार मंच के अध्यक्ष और युवा नेता इश्तियाक अहमद वानी ने अपने भाषण का आरम्भ करते हुए कहा कि मैं फक्र महसूस करता हूँ कि मैं मजबूत हिन्दुस्तान का बाशिंदा हूँ | वो जमाना भी आया था जब कश्मीर में नारे लगे थे और हमने सुना था – पाकिस्तान से रिश्ता क्या है ला इलाही लिल्लाह | मैं उन लोगों से पूछता हूँ कि मजबूत भारत में नहीं तो क्या नागे मुलुक पाकिस्तान में रहोगे ? जहाँ कल तक मस्जिदों में कुरआन लेकर जाते थे आज बम लेकर जाते हैं | सारे संसार को यह बताना चाहता हूँ कि अगर सबसे ज्यादा अमन-चैन से मुसलमान कहीं जी रहा है तो हमारे मुल्क हिन्दुस्तान में | अगर दुनिया में सबसे ज्यादा मस्जिद है तो वो हमारे मुल्क हिन्दुस्तान में | अगर सबसे ज्यादा अमन पसंद लोग मिलेंगे तो वो हमारे हिन्दू भाई हैं फ़िर क्यों जाना पाकिस्तान ? उमर अब्दुल्ला जब ये कहता है कि साहब कश्मीर अभी तक हिन्दुस्तान का नहीं है तो मैं पूछता हूँ तुम्हारी तीन पीढियां गुजर गयी देश बेच कर खाते -खाते | पूरे देश से सैकड़ों जवानों की शहादत इस कश्मीर को बचाने में हुई है | और अब कह रहे हो कि कश्मीर भारत का नहीं है ! आज भी पूरा खानदान भारत सरकार के पैसों पर ऐश कर रहा है | और ये सैयद शाह गिलानी हमारे बुजुर्ग हैं लेकिन इनकी कारिस्तानी कौन नहीं जानता ? इन्हें आज़ादी चाहिए , इनको पाकिस्तान जाना है , लेकिन आज तलक भारत सरकार के पेंशन से जी रहे हैं | गौरतलब है कि ये पेंशन इनको जम्मू-कश्मीर विधानसभा के सदस्य रहने के आवाज में दिया जा रहा हैं |

सभा में कई वक्ताओं ने कश्मीर और कश्मीरियत की सही तस्वीर देश के सामने रखी और उम्मीद जताई कि ये आवाज़ देश के हुक्मरानों तलक एक दिन सांसद में भी गूंजेगी | कश्मीर घाटी से लेकर जम्मू , लेह-लद्दाख तक फैले अनेक जाति-पंथ-भाषा के दर्जनों भारतीय बुद्धिजीवी और नेता जम्मू कश्मीर का प्रतिनधि स्वर ” कश्मीर भारत का था है और रहेगा ” सभा के अंत में गूंजा |

सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्षा दरख्शां आन्द्राबी ने कश्मीर के हालात के लिए केंद्र की सरकार को आड़े हाथों लिया |  आन्द्राबी ने कहा कि जब केंद्र से प्रतिनिधिमंडल भेजा गया तो वो भी उन ह्गिलानी जैसे देशद्रोहियों और नेताओं के तलवे चाटने गये | कोई भी कश्मीर की आम आवाम से मिलने क्यों नहीं गया ? किसने कश्मीर की जनता का प्रतिनिधि इन गिलानी जैसे लोगों को बनाया इसी केंद्र सरकार ने जो इनको आज दिल्ली में खुलेआम सभा करने की अनुमति देती है और उस सभा में भारत विरोधी नारे लगाये जाते हैं | आज कश्मीर का बेटा बेकार ,बेरोजगार हैं उन्हें काम चाहिए , उन्हें रोटी चाहिए | ये केंद्र और अब्दुल्ला सरकार की नाकामी है कि चंद पाकिस्तान्परस्त मुसलमानों के बहकावे में कश्मीर के कुछ गुमराह नौजवान पत्थरबाजी को तैयार हैं |

इस कार्यक्रम में जम्मू – कश्मीर गुज्जर बकरवाल सोसाइटी के अध्यक्ष श्री खालिद भट्टी, नेशनल एसटी डेवलपमेंट कोंसिल के श्री गुलाम अली, शिया सो. ऑफ कश्मीर के अध्यक्ष मकबूल अहमद मलिक, अरुण कुमार खोचर, वरिष्ट पत्रकार श्री सतीश विमल, के अलावा श्रीमती दरखशा आन्द्रबी, जस्टिस विनोद कुमार गुप्ता, श्री जगमोहन जी, चौ. कमर रब्बानी अली, श्री सईद मक़सूद पत्रकार, श्रीमती खालिदा बेगम, हाजी सरदार मो. खटाना, श्री इश्तियाक अहमद वाणी, श्री फैयज अहमद भट्ट, श्री नजीर अहमद मीर, श्रीमती नजमा हेपतुल्ला, श्री आरिफ मोहम्मद खां, के अलावा कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे.

क्‍या हुकूमत ए हिंदुस्‍तान संजीदा है कश्‍मीर पर

Posted: 22 Oct 2010 11:21 PM PDT

सर्वविदित है कि कश्‍मीर के सियासी और सामाजिक हालात विगत कुछ महीनों से बेहद खराब बने रहे। हॉंलाकि अब वादी ए कश्‍मीर में स्‍कूल-कॉलिज खुल चुके हैं और दहकती हुई कश्‍मीर घाटी में सर्द शीतल हवा के पुरसुकून झोंके बहने लगे हैं। ये स्थिति केवल ऐसे कश्‍मीरी आवाम की पहल पर कायम हो सकी है, जिनके बच्‍चों के स्‍कूल कालिजों की पढाई लिखाई महीनों से तबाह बरबाद होती रही। कश्‍मीर में बेहतर स्थिति के निमार्ण के लिए उमर अब्‍दुल्‍ला हुकूमत का प्रयास किंचित भी कामयाब नहीं हो सका। ऐसी नाका़रा जालिम हुकूमत जो युवाओं की पथ्‍थरबाजी का जवाब महीनों तक गोली बारी से देती रही। और कश्‍मीर की हुकूमत में साझीदार और केंद्रीय हुकूमत में विराजमान कॉंग्रेस पार्टी उमर अब्‍दुल्‍ला की नौजवानों से निपटने की बर्बर वहशियाना रणनीति की हिमायत करती रही। जेहादी आतंकवादियों के समकक्ष वतनपरस्‍त किंतु सत्‍ता व्‍यस्‍था से नाराज युवाओं को रखने की समझ को वहशियाना बर्बरता नहीं तो और फिर क्‍या कहा जाए। गोली का जवाब यकी़नन गोली ही है किंतु गुस्‍से में फेंके गए पथ्‍‍थरों का समुचित शासकीय उत्‍तर ऑंसू गैस, लाठी चार्ज और हवाई फायरिंग होता है न कि किसी नौजवानों के सीने में गोली ठोंक देना। तकरीबन 110 नौजवान सुरक्षा बलों की फा‍यरिंग में हलाक़ कर दिए गए। कश्‍मीर बेहद क्रोधित हो उठा है। यह शांति तूफान आने से पहले की शांति प्रतीत होती है। तमाम घटना क्रम को देखते हुए यही प्रतीत होता है कि केंद्रीय सरकार का कश्‍मीर के प्रश्‍न को हल करने के कतई गंभीर नहीं है।
कश्‍मीर के प्रश्‍न को हल करने की खातिर हुकूमत ए हिंदुस्‍तान ने एक वार्ताकारों के दल के गठन किया गया। कश्‍मीर वार्ताकारों का यह दल एक वर्ष त‍क कश्‍मीर के विभिन्‍न संगठनों के साथ बातचीत करके कश्‍मीर समस्‍या कोई सर्वमान्‍य हल निकालने का कोशिश करेगा। इस दल में प्रख्‍यात पत्रकार दिलीप पंडगांवकर, जामिया मीलिया की प्रोफेसर मैडम राधा कुमार एवं सूचना आयुक्‍त एम एम अंसारी को शामिल किया गया है । इस प्रकार एक पत्रकार, एक प्राफेसर और एक ब्‍यूरोक्रेट की वार्ताकार त्रिमूर्ति तशकील की गई। ऐतिहासिक तौर पर नज़र डाले तो पं0 जवाहरलाल नेहरू ने कश्‍मीर के लिए वार्ताकार के रूप में लाल बहादुर शास्‍त्री जैसे शख्‍स का इंतखाब किया। नरसिम्‍मा राव ने राजेश पायलट और जार्ज फर्नाडीज़ सरीखे असरदार राजनेताओं को कश्‍मीर मसअले के हल के लिए वार्ताकार मुकर्रर किया। कश्‍मीर के सवाल पर फौरी तौर पर सकारात्‍मक हल निकाले गए। अब जो वार्ताकार चुने गए गए है वे राजनीतिक तौर पर ताकतवर नहीं है उनको लेकर कश्‍मीर के लोग संजीदा नहीं है।
इससे पहले भी सन् 2007 कश्‍मीर में ऑटानामी के प्रश्‍न पर एक प्राइम मिनिस्‍टर कोर कमेटी का गठन किया गया, जिसकी सदारत जस्टिस सगीर अहमद को दी गई थी। इस कमेटी में कश्‍मीर में विद्यमान प्राय: सभी दलों के प्रतिनिधियों को शा‍मिल किया गया। कश्‍मीर ऑटोनामी के प्रश्‍न पर पीएम कोर कमेटी का जो हश्र हुआ यह तथ्‍य तो अब जग जाहिर हो चुका है। पीएम कोर कमेटी की केवल तीन बैठक आयेजित की गई और कमेटी किसी आम रॉय पर पॅहुचने में नाकाम रही। आखिर में जस्टिस सगीर अहमद ने मनमाने तौर पर कमेटी सदस्‍यों के दस्‍तख़त के बिना ही अपनी रिर्पोट प्रधानमंत्री महोदय को सौंपने के स्‍थान पर वजीर ए आला कश्‍मीर जनाब उमर अब्‍दुल्‍ला को सौंप दी।
जस्टिस सगीर अहमद की ऑटानोमी रिर्पोट पर क्‍या कार्यवाही अंजाम दी गई, सरकारी तौर कुछ अभी तक बताया नहीं गया। जहॉ तक अनुमान है इसे भी सरकारी कमीशनों की रिर्पोट्स की तर्ज पर सरकार के ठंडे बस्‍ते में डाल दिया गया।
कश्‍मीर के प्रश्‍न पर अब एक नई सरकारी वार्ताकार कमेटी अस्‍तीत्‍व में आ गई, जिसे हुकूमत ए हिंदुस्‍तान के गृहमंत्री महोदय ने तशकील किया। सभी जानते हैं कि एक सासंदों का एक सर्वदलीय दल कश्‍मीर के दौरे पर गया था जिसने अपनी रिर्पोट्स सरकार को पेश कर दी। हॉंलाकि यह कोई सर्वसम्‍मत रिर्पोट नहीं हो सकती थी, क्‍योंकि विभिन्‍न दलों की कश्‍मीर मसअले पर मुखतलिफ राय रही है। अत: वही सब अंतरविरोध सांसदों की रिर्पोट्स में भी प्रतिबिंबित हुए। कश्‍मीर के प्रश्‍न पर रणनीतिक तौर पर देश के सभी दलों में विभिन्‍न विचार रहे, किंतु सभी राष्‍ट्रीय दल इस बात पर पूर्णत: सहमत हैं कि संपूर्ण कश्‍मीर भारत का अटूट अंग है। कश्‍मीर को लेकर वर्तमान केंद्रीय सरकार कितनी कम संजीदा है, यह तो इस कटु तथ्‍य से साबित हो जाता है कि वजीर ए आला उमर अब्‍दुल्‍ला के खतरनाक भटके हुए बयान के बावजूद कि जम्‍मू-कश्‍मीर का भारत में मर्जर नहीं एक्‍सैशन हुआ है, केंद्रीय सरकार ने उसे कंडम नहीं किया, वरन् बहुत बेशर्मी के साथ उसके नेता बचाव में उतर आए। कश्‍मीर में सेना से स्‍पेशल पावर छीनने के प्रश्‍न पर भी केंद्र सरकार उहापोह में प्रतीत होती है। जबकि केंद्र सरकार के बडे़ ओहदेदार इस तथ्‍य से भली भॉंति परिचित हैं कि कश्‍मीर को जेहादी आतंकवाद से निजा़त दिलाने का दुरूह कार्य भारतीय सेना के अफसरों और जवानों के असीम बलिदानों से ही मुमकिन हुआ है। कश्‍मीर में कथित जे़हाद अपनी आखिरी सॉंसें ले रहा है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ सेना के कारण ही। कश्‍मीर के गद्दार पृथकतावादी तत्‍व पेट्रोडालर के बलबूते पर अफरातफरी के हालत को तशकील करने की जोरदार कोशिश अंजाम दे रहे हैं। ऐसे सभी तत्‍वों पर लगाम कसने के विषय पर नेशनल कॉंफ्रेंस और नेशनल कॉंग्रेस की संविद सरकार दृढ़प्रतिज्ञ नहीं रही, वरन् इन तत्‍वों को कश्‍मीर के नौजवानों को बरगलाने और पथ्‍थर बाजी के लिए उत्‍तेजित करने का भरपूर अवसर प्रदान किया। इस तमाम निरंतर बिगड़ते हुए हालत पर केंद्र सरकार महज़ तमाशबीन बनी रही। विगत चार माह से कश्‍मीर में अकसर कर्फ्यू नाफ़ीज़ रहा । कश्‍मीर घाटी में ऐसा नजा़रा विगत दस वर्षो से कभी नहीं दिखाई दिया। गुलामनबी सरकार के अमरनाथ श्राइन को जमीन प्रदान करने के विरूद्ध हुए आंदोलन में कदाचित ऐसे बदतर हालात पेश नहीं आए। केंद्र सरकार का निकम्‍मापन हर कदम पर जाहिर होता रहा है। कश्‍मीर ऐसा राज्‍य कदाचित नहीं है कि केंद्र सरकार कानून व्‍यवस्‍था का सारा मामला राज्‍य सरकार के जिम्‍मे छोड़कर निश्चिंत हो जाए। जैसा रवैया मनमोहन सरकार ने कश्‍मीर पर अपनाया है वह देश की अखंडता और एकता के लिए अत्‍यंत दुर्भाग्‍यपूर्ण है। इसे तत्‍काल बदला जाना चाहिए।
केंद्र सरकार का पाकिस्‍तान के हुकमरानों की नीयत पर अधिक भरोसा करके चलना कश्‍मीर के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है। उच्‍चस्‍थ खुफि़या सूत्रों के अनुसार पाक अधिकृत कश्‍मीर में जेहादी आतंकादी प्रशिक्षण शिवरों को बाकायदा आईएसआई संचालित कर रही है। अमेरिका की कूटनीति भारत के लिए छलावा सिद्ध हो सकती है। अफ़ग़ान युद्ध के कारण अमेरिका के पास पाकिस्‍तान पर भरोसा करने और उसको सहयोगी बनाने के अतिरिक्‍त कोई चारा नहीं है, अत: वह पाकि़स्‍तान की हिमायत के लिए विवश है। जे़हादी आतंकवादियों ने अभी कश्‍मीर में पराजय स्‍वीकार नहीं की है, वे एक और बडे़ आक्रमण की जोरदार तैयारियों में जुटे हैं। केंद्रीय सरकार को अपने कश्‍मीर को संभालना है और संवारना है। संपूर्ण जम्‍मू-कश्‍मीर की तरक्‍की में, कश्‍मीरी नौजवानों के रोजगार में और कश्‍मीरी दस्‍तकारों की खुशहाली में तथा सरकारी अमले की ईमानदारी में ही जेहादी आतंकवाद की मुकम्‍मल शिकस्‍त निहित है। भारतीय सुरक्षा बलों को अपनी गोलियां जे‍हादियों पर बरसानी हैं। केंद्रीय हुकूमत में यदि जरा सी संजीदगी शेष है तो युवाओं पर गोली बारी का प्रहार करने वाली गद्दाराना बयानबाजी करने वाले वजीर ए आला उमर सरकार को तुरंत बर्खास्‍त करके, वह अपनी सदाशयता का परिचय दे, अन्‍यथा केंद्रीय हुकूमत द्वारा चाहे जितनी भी सरकारी कमेटियां क्‍यों ना बना दी जाएं, वे सभी नाका़म बेकार साबित होगीं।
प्रभात कुमार रॉय
पूर्व प्रशासनिक अधिकारी

”कविता का दौर खत्म हुआ लेकिन आज भी कविता सबसे अधिक लिखी जा रही है ”-युवा उपन्यासकार अशोक जमनानी

Posted: 22 Oct 2010 09:22 PM PDT

लोग कहते हैं कविता का दौर  खत्म  हो गया है,कथा की तूती बोलती है,उपन्यास गढ़ने और पढ़ने का वक्त कम ही मिलता है.आप क्या कहेंगे?
अशोक
आपने एक प्रश्न में कई प्रश्न पूछ लिए चलिए सबसे पहले बात करते हैं कविता की। मेरे विचार से कविता का दौर खत्म हुआ ये कहना ठीक नहीं होगा। अच्छी कविता  आयेगी तो वो पढ़ी भी जायेगी और सराही भी जायेगी। एक  बात यह भी है कि हम कहते तो हैं कि कविता का दौर खत्म  हुआ लेकिन आज भी कविता सबसे अधिक लिखी जा रही है  और वो लोग भी लिख रहे हैं जो साहित्य की दूसरी विधाओं  से जुड़े हुए हैं। मेरी छवि उपन्यासकार की है पर मैं भी कविता लिखने से स्वयं को रोक नहीं पाता। दूसरी बात है कथा की तूती बोलने की तो मेरा मानना यह है कि अब भी कहानियां  कविताओं से कम ही लिखी जा रही हैं। हां! ये बात ज़रूर है  कि कहानियां साहित्यिक बिरादरी और एक हद तक पाठकों  का ध्यान आकर्षित करने में अधिक सफल रही हैं। फिर आपने पूछा है उपन्यास के बारे में। जहां तक उपन्यास पढ़े जाने की बात है तो मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूँ कि उपन्यास आज भी पढ़े जा रहे हैं। मेरे पहले उपन्यास ‘को अहम्’ के चार संस्करण आ चुके हैं। बात वही है चाहे कविता हो या उपन्यास यदि वे कुछ दे सकते हैं तो स्वीकार किए जाएंगे अन्यथा तो जो हश्र हो रहा है वो आपके सामने ही है। रही बात उपन्यास गढ़ने की तो यह बात पूर्णतया सत्य है कि उपन्यास लेखन बहुत अधिक समर्पण की मांग करता है और उपन्यास लेखन में समर्पण की कमी कृति को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाती हैं।

साहित्य संस्कृति के क्षेत्र में राजनीति और धड़ेबाजी को लेकर आपके विचार
आपका यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। पहले बात राजनीति की। बहुचर्चित व्यंग्यकार स्व. हरिशंकर परसाई ने कहा कि वो राजनीति पर इतना अधिक इसलिए लिखते हैं क्योंकि राजनीति अब हर क्षेत्र में निर्णायक ताकत हो गयी है। आप ही देखिए अब इस बात तक का निर्धारण राजनीति कर रही है कि हमारी चाय में शक्कर होगी भी या नहीं ऐसी स्थिति में यह कहना कि साहित्य और संस्कृति राजनीति से अछूते रह जाएंगे शायद अपने आप को धोखा देने वाली बात होगी। जब तक राजनीति हर क्षेत्र की निर्णायक ताकत है तब तक वो साहित्य और संस्कृति को भी प्रभावित करती ही रहेगी। और विसंगति भी तो यही है कि कहने को जनतंत्र है पर निर्णायक शक्ति आज भी जन के पास न होकर राजनीति के पास है। दूसरी बात है धड़ेबाजी की यह भी एक विसंगति ही है कि हमने एक ऐसी व्यवस्था विकसित की है जो व्यक्ति से अधिक समूह को स्वीकृत करती है। एक व्यक्ति अपना ज़ायज काम लेकर व्यवस्था से जुड़े किसी व्यक्ति के पास जाये तो उसकी बात षायद न सुनी जाये लेकिन वही बात जब समूह लेकर जाता है तो व्यवस्था सक्रिय हो जाती है। इसीलिए समाज के हर वर्ग ने अपने समूह बना रक्खे हैं। साहित्य में भी कई समूह या धड़े हैं जो अपने विचारों और हितों को लेकर टकराते रहते हैं। वैसे मैं समूहों का विरोधी नहीं हूँ पर जब समूह गिरोह बन जाते हैं तो खतरनाक हो जाते हैं।

समाज  में आज भी साहित्य बदलाव लाने का बड़ा साधन बन सकता है,मध्य प्रदेश के परिदृश्य में ये कितना सही लगता है?
जो स्थिति पूरे देश की है थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ वही स्थिति मध्य प्रदेश की भी है। साहित्य बदलाव के लिए प्रेरक शक्ति बन सकता है पर क्या समाज भी वो बदलाव चाहता है? हकीकत तो यह है कि आप जिस बदलाव की बात कर रहे हैं वो समाज को ऊंचा उठाने वाला होगा परंतु हमारा समाज तो अपने हित के लिए ऊपर नहीं वरन् नीचे देख रहा है।

साहित्य को लेकर पाठकीयता के ग्राफ पर आप क्या सोचते हैं?,वैसे अभी तक आपके भी तीन उपन्यास व्यास गादी ,बूढ़ी डायरी और को अहम् बाजार में आये,क्या अनुभव रहा ?
यदि हम पुराने दौर से तुलना करेंगे जब टी.वी. जैसे साधन नहीं थे तो हमें लगेगा कि पाठक बहुत कम हो गए हैं। लेकिन आज भी कृति की सामर्थ्य ही पाठक संख्या का निर्धारण करती है। मैं आपको बता ही चुका हूं कि मेरी कृतियों को बहुत पाठक मिले और मेरे पहले ही उपन्यास के चार संस्करण आ चुके हैं।

साहित्य-संस्कृति के झमेले में अपनी शुरुआत से आज तक के सफर पर कुछ कहना चाहेंगे ?
आप साहित्य और संस्कृति को झमेला कह सकते हैं। पर अब तो यह झमेला ही मुझे वो ऊर्जा प्रदान करता है जो न केवल मेरी रचनात्मकता के लिए आवश्यक है बल्कि जीवन के शेष संघर्ष के लिए भी बहुत ज़रूरी है।

देशभर में छपने छपाने का दौर है,पढ़ने की आदत बुढ़ा रही है,मगर लोगों का लेखन जवान हो रहा है,बहुत  ज्यादा और अपरिपक्व ……..क्या लगता है ?
आपने प्रश्न में उत्तर मिला दिये। अपरिपक्व और अधिक लेखन शायद रचनाधर्मिता में बाधक हो सकता है। स्पिक मैके के संस्थापक डॉ. किरण सेठ से एक बार मैंने कहा था कि आप नए कलाकारों को कम अवसर क्यों देते हैं। तब उन्होंने कहा था कि हमें नयी पीढ़ी को शास्त्रीय संगीत से जोड़ना है। यदि हमने उनके सामने कच्चे फल परोस दिए तो शास्त्रीय संगीत से जुड़ने के स्थान पर वो उससे और अधिक दूर हो जायेंगे। हमें तो ऐसे फल परोसने हैं जिनमें अधिकतम रस हो और वो रस अपने श्रोताओं को देने की सामर्थ्य भी हो। यदि नए कलाकारों में यह सामर्थ्य है तो उन्हें अवश्य अवसर मिलना चाहिए। यही बात साहित्य पर भी लागू होती है अपरिपक्व लेखन कई बार पाठकों को साहित्य से दूर भी कर देता है। वैसे मैं चाहता हूं कि युवा लेखक सामने आयें पर यह भी चाहता हूं कि वे अपना निष्पक्ष मूल्यांकन भी करें।

मीडिया के बढ़ते हुए  मनमानीकरण और ठीक ठाक स्तर पर आ जाने से लघु पत्रिकाओं और ब्लॉगिंग जगत से क्या आस लगाई जा सकती  हैं ?
मीडिया की मनमानी मीडिया की साख को बहुत नीचे गिरा ही चुकी है। कहां तो लगता था कि मीडिया के कारण बहुत बड़ा बदलाव आयेगा और कहां यह स्थिति जिसमें ऐसी ताकत की तलाश है जो मीडिया की कमियों को दूर कर सके। लघु पत्रिकाएं और ब्लागिंग तेजी से बढ़ तो रही हैं पर अब भी इनकी पहुंच सीमित है। मुझे लगता है कि इनका प्रसार भी बढे़गा और निश्चित रूप से ये उनकी भी बात करेंगी जो मीडिया की टी. आर. पी. से भिन्न हैं।

सत्य,भावना,आदर्श,ईमानदारी,सादगी अहिंसा और स्वाभिमान जैसे गुणों की बात अब बेमानी लगती है….गहराते उपभोक्तावादी दृष्टिकोण पर क्या अनुभव करते हैं ?
ये हमारे शाश्वत् मूल्य हैं ये कभी बेमानी नहीं होंगे। वैसे कई ताकतें हैं जो चाहतीं हैं कि ये सब कुछ बेमानी हो जाये तो मनुष्य के मनुष्य बने रहने की संभावना भी समाप्त हो जाये।
दूसरी बात है उपभोक्तावाद की। ये बहुत बड़ी बीमारी है और सारी ताकतों को इस बीमारी को और बड़ा करने में ही अपनी सार्थकता नजर आ रही है। क्या हमने सोचा है कि हम कहां पहुंचना चाहते हैं। एक अमेरिकी चौदह भारतीय लोगों के बराबर उपभोग करता है अर्थात जब हम पांच सौ करोड़ की आबादी पर पहुंचेंगे तब जितना उपभोग हम करेंगे उतना उपभोग आज के मात्र पैंतीस करोड़ अमेरिकी कर रहे हैं। क्या हमने सोचा है कि उस स्तर का क्या मूल्य हमें और हमारी प्रकृति को चुकाना पड़ेगा।
उपभोक्तावादी अपसंस्कृति ने हमें बहुत नुकसान पहुंचाया है। भारतीय समाज का सदियों से स्थापित प्रकृति से रिश्ता तो टूट ही रहा है मनुष्य के मनुष्य से  रिश्ते का आधार भी स्वार्थ होता जा रहा है।
पं. माखनलाल चतुर्वेदी की बात याद आती है उन्होंने कहा था- ”कितने संकट के दिन हैं ये। व्यक्ति ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां भूख की बाजार दर बढ़ गयी है, पायी हुई स्वतंत्रता की बाजार दर घट गयी है। पेट के ऊपर हृदय और सिर रखकर चलने वाला भारतीय मानव मानो हृदय और सिर के ऊपर पेट रखकर चल रहा है। खाद्य पदार्थों की बाजार दर बढ़ी हुई है और चरित्र की बाजार दर गिर गयी है।”

आपकी कौनसी रचनाएँ पाठकों के लिए आने वाली हैं ?
मेरा नया उपन्यास छपाक-छपाक संभवतः अगले महीने प्रकाशित हो जायेगा।

कोई ऐसी बात जो छूट गई हो और आप उस पर कुछ कहना चाहते हों.
माणिक काफी कुछ कह चुका हूँ बस एक बात कहना चाहता हूं । सकारात्मक ताकतों की यह ज़िम्मेदारी होती है कि वो नकारात्मक ताकतों को परास्त करें , परंतु अभी तो नकारात्मक ताकतें निश्चिंत हैं क्योंकि वो जानती हैं कि उन्हें परास्त करने वाली सकारात्मक ताकतें आजकल अपनी स्वार्थ सिद्धि और आपसी सिर फुटौवल में मशगूल हैं। मेरा एक शेर है-

अब रहता नहीं है परेशान वो मेरे वज़ूद से
वो जानता है खुद को हूँ मैं कत्ल कर रहा

पता:-अशोकजमनानी,होटलहजूरी होशंगाबाद,मध्यप्रदेश,मो.09425310588

(होशंगाबाद,मध्यप्रदेश के युवा उपन्यासकार अशोक जमनानी जो पिछले सालों अपने तीन उपन्यासों के जरिये साहित्य जगत में चर्चित रहे, से हाल ही में की गई बातचीत )

आपन डफली आपन राग (बिहार विधानसभा चुनाव)

Posted: 22 Oct 2010 06:28 AM PDT

बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार में सभी पार्टियों के नेता अपने-अपने तरीके से अपने पार्टी की बाते जनता के सामने रखी है। आरजेडी सुप्रीमो श्री लालू प्रसाद…. जनता कि सरकार जनता के लिए बनाने कि बात करते है तथा पिछले पंद्रह सालों में जो विकास का काम बिहार में नहीं किये थे वो चुनाव में जितने के बाद विकास करने की बात करते है इसीलिए अपने भाषण में यह बार-बार कह रहे है …. जैसे मैंने भारतीय रेल को चमकाया और दुनियाँ देखती रह गई उसी तरह मै बिहार को चमकाउंगा। शायद लालू जी अपने पिछली गलतियों से तौबा कर लिए है इसीलिए बिहार में विकाश कि बात करते है। “अब पछताना क्या जब चिड़ियाँ चुंग गई खेत” ।

लोजपा सुप्रीमो श्री रामविलास पासवान …. ये भी बिहार में विकाश करने कि बात कहते है साथ ही जनता के बीच अपने दिए गए भाषणों में बहुत सारी उम्मीदे दे रहे है जैसे – पच्चास हजार रुपया हर गरीब व्यक्ति को दिया जायेगा जिसका सूद नहीं लगेगा, हर गरीब व्यक्ति को घर बनाने के लिए आधा डिसमिल जमीन मुफ्त में दिया जायेगा तथा बी ए तक कि पढाई और पुस्तक मुफ्त में दिया जायेगा। इनके भाषण में केवल आश्वाशन ही आश्वाशन है।

जनता दल यू के श्री नितीश कुमार (वर्तमान मुख्यमंत्री बिहार) …. ये केवल बिहार के विकाश कि बात कर रहे है। जनता के बीच अपने दिए भाषणों में पांच साल तक अपने द्वारा किये हुए कामो का मजदूरी (वोट) मांग रहे है। हाँ यह सही है कि ये मजदूरी (वोट) पाने के हकदार है, क्यों कि पूरी तरह बर्बाद बिहार को इन्हों ने आबाद किया है, विकाश कि गाड़ी को पटरी पर ला दिए है अब इसका दौड़ने का समय है और वह अगला पांच साल होगा जिसमे विकाश कि गाड़ी दौड़ेगी। इसलिए अगर विकाश कि गाड़ी को दौड़ना है तो नितीश कुमार को मजदूरी (वोट) देनी ही होगी।

भाजपा के श्री सुशिल कुमार मोदी (वर्तमान उप-मुख्यमंत्री बिहार) ……. ये भी बिहार में विकाश कि बात कर रहे है या भजपा के जितने भी नेता बिहार आ रहे है वो जनता के बीच अपने भाषण में केवल विकाश कि बात कहते है, क्यों कि जे डी यू और बीजेपी ने मिल कर इस विकाश कि गाड़ी को आगे बढाया है। इसलिए बीजेपी और जे डी यू ये दोनों पार्टियाँ मजदूरी (वोट) पाने का हक रखती है। इसलिए विकाश कि गाड़ी को दौड़ाने के लिए इनको मजदूरी (वोट) देना ही पड़ेगा।

कांग्रेस पार्टी (वर्तमान में केंद्र कि सत्ता पर आशिन) ….. यह पार्टी भारत कि सबसे पुरानी राजनितिक पार्टी है भारत के बहुत से राज्यों में इसकी सरकार है तथा केंद्र में भी इसी पार्टी का शासन है। इस पार्टी के बड़े से बड़ा नेता अपने भाषणों में विकाश कि कोई बात नहीं कर रहे है ना ही जनता के बीच कोई आश्वाशन दे रहे है ना ही यह बता रहे है कि बिहार कि सत्ता में आने के बाद वह बिहार को किस रास्ते पर ले जायेंगा , चाहे वो कांग्रेस अध्यच्छ श्री मति सोनिया गाँधी हो या उनके पुत्र राहुल गाँधी, प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह या दिल्ली कि मुख्यमंत्री शिला दीक्षित, सचिन पायलट, जायसवाल साहब ये सभी राजनेता मुद्दा विहीन भाषण दे रहे है, अगर इनके पास कोई मुद्दा है तो बस एक मुद्दा है ….. केंद्र के पैसे से बिहार का विकाश हुआ, केंद्र के पैसे को नितीश कुमार अपना पैसा बता रहे है।

लगता है केंद्र अलग है और बिहार अलग है या बिहार भारत का अंग नहीं है। या बिहार का पैसा टैक्स के रूप में केंद्र को नहीं जाता है जो हाय तौबा ये लोग मचाये है। कही यह तो नहीं ….. केंद्र द्वारा दिए हुए पैसे को कांग्रेस अपना पैसा तो नहीं समझ रही है जो कांग्रेस के हर नेता अपने भाषण में पैसे का ही जिक्र कर रहा है।

खैर कुछ भी हो बिहार में विकास तो हुआ है चाहे वह बिहार के पैसे से हुआ हो या केंद्र के पैसे से हुआ हो, क्यों कि आज हर पार्टी के नेता यह स्वीकार कर लिए है कि बिहार में विकास हुआ है। तो क्यों नहीं सभी पार्टियाँ एक साथ मिल कर बिहार में विकास की गाड़ी को और तेज रफ़्तार देने में मदद करे। एक दुसरे का टांग खीचने से राज्य का या देश का विकास नहीं हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है तो उसे और बढ़ावा देना चाहिए ताकि वो और अच्छा काम करे।

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