>हिन्दू तो शायद मान भी लें, लेकिन सेकुलर-वामपंथी बुद्धिजीवी नहीं मानेंगे… Secular Intellectuals Allahabad Ayodhya Verdict

>अयोध्या पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बहुप्रतीक्षित निर्णय आखिरकार मीडिया की भारी-भरकम काँव-काँव के बाद आ ही गया। अभी निर्णय की स्याही सूखी भी नहीं थी कि सदभावना-भाईचारा-अदालती सम्मान के जो नारे सेकुलर गैंग द्वारा लगाये जा रहे थे, 12 घण्टों के भीतर ही पलटी खा गये। CNN-IBN जैसे सुपर-बिकाऊ चैनल ने अदालत का नतीजा आने के कुछ घंटों के भीतर ही फ़्लैश चमकाना शुरु कर दिया था कि “मन्दिर तोड़कर नहीं बनाई थी मस्जिद…” मानो तीनो जजों से भी अधिक बुद्धिमान हो ये चैनल। हालांकि कांग्रेस द्वारा सभी चैनलों और अखबारों को बाकायदा शरीफ़ाना शब्दों में “धमकाया” गया था कि फ़ैसला चाहे जो भी आये, उसे ऐसे पेश करना है कि मुसलमानों को दुख न पहुँचे, जितना हो सके कोर्ट के निर्णय को “हल्का-पतला” करके दिखाना है, ताकि सदभावना बनी रहे और उनकी दुकानदारी भी चलती रहे।

परन्तु क्या चैनल, क्या अखबार, क्या सेकुलर बुद्धिजीवी और क्या वामपंथी लेखक… किसी का पेट-दर्द 8-10 घण्टे भी छिपाये न छिप सका और धड़ाधड़ बयान, लेख और टिप्पणियाँ आने लगीं कि आखिर अदालत ने यह फ़ैसला दिया तो दिया कैसे? सबूतों और गवाहों के आधार पर जजों ने उस स्थान को राम जन्मभूमि मान लिया, जजों ने यह भी मान लिया कि मस्जिद के स्थान पर कोई विशाल हिन्दू धार्मिक ढाँचा था (भले ही मन्दिर न हो), जजों ने यह भी फ़ैसला दिया कि वह मस्जिद गैर-इस्लामिक थी…और उस समूचे भूभाग के तीन हिस्से कर दिये, जिसमें से दो हिस्से हिन्दुओं को और एक हिस्सा मुसलमानों को दिया गया। (पूरा फ़ैसला यहाँ क्लिक करके पढ़ें… http://rjbm.nic.in/)

हिन्दू-विरोध की रोटी खाने वालों के लिये तो यह आग में घी के समान था, जो बात हिन्दू और हिन्दू संगठन बरसों से कहते आ रहे थे उस पर कोर्ट ने मुहर लगा दी तो वे बिलबिला उठे। मुलायम सिंह जैसे नेता उत्तरप्रदेश में सत्ता में वापसी की आस लगाये वापस अपने पुराने “मौलाना मुलायम” के स्वरूप में हाजिर हो गये, वहीं लालू और कांग्रेस की निराशा-हताशा भी दबाये नहीं दब रही। फ़ैसले के बाद सबसे अधिक कुण्ठाग्रस्त हुए वामपंथी और सेकुलर लेखक।

रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों के कान के नीचे अदालत ने जो आवाज़ निकाली है उसकी गूंज काफ़ी दिनों तक सुनाई देती रहेगी। अब उनके लगुए-भगुए इस निर्णय की धज्जियाँ अपने-अपने तरीके से उड़ाने में लगे हैं, असल में उनका सबसे बड़ा दुःख यही है कि अदालत ने हिन्दुओं के पक्ष में फ़ैसला क्यों दिया? जबकि यही लोग काफ़ी पहले से न्यायालय का सम्मान, अदालत की गरिमा, लोकतन्त्र आदि की दुहाई दे रहे थे (हालांकि इनमें से एक ने भी अफ़ज़ल की फ़ाँसी में हो रही देरी पर कभी मुँह नहीं खोला है), और अब जबकि साबित हो गया कि वह जगह राम जन्मभूमि ही है तो अचानक इन्हें इतिहास-भूगोल-अर्थशास्त्र सब याद आने लगा है। जब भाजपा कहती थी कि “आस्था का मामला न्यायालय तय नहीं कर सकती” तो ये लोग जमकर कुकड़ूं-कूं किया करते थे, अब पलटी मारकर खुद ही कह रहे हैं कि “आस्था का मामला हाईकोर्ट ने कैसे तय किया? यही राम जन्मभूमि है, अदालत ने कैसे माना?”…

अब उन्हें कौन समझाये कि हिन्दुओं ने तो कभी नहीं पूछा कि यरुशलम में ईसा का जन्म हुआ था या नहीं? ईसाईयों ने कहा, हमने मान लिया… हिन्दुओं ने तो कभी नहीं पूछा कि कश्मीर की हजरत बल दरगाह में रखा हुआ “बाल का टुकड़ा” क्या सचमुच किसी पैगम्बर का है… मुस्लिमों ने कहा तो हमने मान लिया। अब जब करोड़ों हिन्दू मानते हैं कि यही राम जन्मभूमि है तो बाकी लोग क्यों नहीं मानते? इसलिये नहीं मानते, क्योंकि हिन्दुओं के बीच सेकुलर जयचन्दों और विभीषणों की भरमार है… इनमें से कोई वोट-बैंक के लिये, कोई खाड़ी से आने वाले पैसों के लिये तो कोई लाल रंग के विदेशियों की पुस्तकों से “प्रभावित”(?) होकर अपना काम करते हैं, इन लोगों को भारतीय संस्कृति, भारतीय आध्यात्मिक चरित्रों और परम्परागत मान्यताओं से न कोई लगाव है और न कोई लेना-देना।

अब आते हैं इस फ़ैसले पर – जो व्यक्ति कानून का जानकार नहीं है, वह भी कह रहा है कि “बड़ा अजीब फ़ैसला है”, एक आम आदमी भी समझ रहा है कि यह फ़ैसला नहीं है बल्कि बन्दरबाँट टाइप का समझौता है, क्योंकि जब यह मान लिया गया है कि वह स्थान राम जन्मभूमि है तो फ़िर ज़मीन का एक-तिहाई टुकड़ा मस्जिद बनाने के लिये देने की कोई तुक ही नहीं है। तर्क दिया जा रहा है कि वहाँ 300 साल तक मस्जिद थी और नमाज़ पढ़ी जा रही थी… इसलिये उस स्थान पर मुस्लिमों का हक है। यह तर्क इसलिये बोदा और नाकारा है क्योंकि वह मस्जिद ही अपने-आप में अवैध थी… अब वामपंथी बुद्धिजीवी पूछेंगे कि मस्जिद अवैध कैसे? इसका जवाब यह है कि बाबर तो अफ़गानिस्तान से आया हुआ एक लुटेरा था, उसने अपनी सेना के बल पर अयोध्या में जबरन कब्जा किया और वहाँ जो कुछ भी मन्दिरनुमा ढाँचा था, उसे तोड़कर मस्जिद बना ली… ऐसे में एक लुटेरे द्वारा जबरन कब्जा करके बनाई गई मस्जिद वैध कैसे हो सकती है? उसे वहाँ मस्जिद बनाने की अनुमति किसने दी?

कुछ तर्कशास्त्री कहते हैं कि वहाँ कोई मन्दिर नहीं था, चलो थोड़ी देर को मान लेते हैं कि मन्दिर नहीं था… लेकिन कुछ तो था… और कुछ नहीं तो खाली मैदान तो होगा ही… तब बाहर से आये हुए एक आक्रांता द्वारा अतिक्रमण करके स्थानीय राजा को जबरन मारपीटकर बनाई गई मस्जिद वैध कैसे हो गई? यानी जब शुरुआत ही गलत है तो वहाँ नमाज़ पढ़ने वाले किस आधार पर 300 साल नमाज पढ़ते रहे? अफ़गानिस्तान के गुंडों की फ़ौज द्वारा डकैती डाली हुई “खाली ज़मीन” (मान लो कि मन्दिर नहीं था) पर बनी मस्जिद में नमाज़ कैसे पढ़ी जा सकती है?

इसे दूसरे तरीके से एक काल्पनिक उदाहरण द्वारा समझते हैं – यदि अजमल कसाब ताज होटल पर हमला करता और किसी कारणवश या कमजोरीवश भारत के लोग अजमल कसाब को ताज होटल से हटा नहीं पाते, कसाब ताज होटल की छत पर चादर बिछाकर नमाज़ पढ़ने लगता, उसके दो-चार साथी भी वहाँ लगातार नमाज़ पढ़ते जाते… इस बीच 300 साल गुज़र जाते… तो क्या हमें ताज होटल का एक तिहाई हिस्सा मस्जिद बनाने के लिये दे देना चाहिये? सिर्फ़ इसलिये कि उस जगह पर कसाब और उसके वंशजों ने नमाज़ पढ़ी थी? मैं समझने को उत्सुक हूं कि आखिर बाबर और कसाब में क्या अन्तर है?

मूल सवाल यही है कि आखिर सन 1528 से पहले अयोध्या में उस जगह पर क्या था? क्या बाबर को अयोध्या के स्थानीय निवासियों ने आमंत्रण दिया था कि “आओ, हमें मारो-पीटो, एक मस्जिद बनाओ और हमें उपकृत करो…”? बाबर ने जो किया जबरन किया, किसी तत्कालीन राजा ने उसे मस्जिद बनाने के लिये ज़मीन आबंटित नहीं की थी, बाबर ने जो किया अवैध किया तो मस्जिद वैध कैसे मानी जाये? एक आक्रान्ता की निशानी को भारत के देशभक्त मुसलमान क्यों अपने सीने से चिपकाये घूम रहे हैं? हाईकोर्ट का निर्णय आने के बाद सबसे अधिक सदभावनापूर्ण बात तो यह होगी कि भारत के मुस्लिम खुद आगे आकर कहें कि हमें इस तथाकथित मस्जिद से कोई लगाव नहीं है और न ही हम ऐसी बलात कब्जाई हुई जगह पर नमाज़ पढ़ना चाहते हैं, अतः हिन्दुओं की भावनाओं की खातिर जो एक तिहाई हिस्सा कोर्ट ने दिया है हम उसका भी त्याग करते हैं और हिन्दू इस जगह पर भव्य राम मन्दिर का निर्माण करें, सभी मुस्लिम भाई इसमें सहयोग करेंगे… यह सबसे बेहतरीन हल है इस समस्या का, बशर्ते मुसलमानों को, सेकुलर और वामपंथी बुद्धिजीवी ऐसी कोई पहल करने दें और कोई ज़हर ना घोलें। ऐसी पहल शिया नेता कल्बे जव्वाद की शिया यूथ विंग “हुसैनी टाइगर” द्वारा की जा चुकी है, ज़ाहिर है कि कल्बे जव्वाद, “सेकुलर बुद्धिजीवियों” और “वामपंथी इतिहासकारों” के मुकाबले अधिक समझदार हैं… 

परन्तु ऐसा होगा नहीं, मुलायम-लालू-चिदम्बरम सहित बुरका दत्त, प्रणव रॉय, टाइम्स समूह जैसे तमाम सेकुलरिज़्म के पैरोकार अब मुसलमानों की भावनाओं को कभी सीधे, तो कभी अप्रत्यक्ष तौर पर भड़कायेंगे, इसकी शुरुआत भी फ़ैसले के अगले दिन से ही शुरु हो चुकी है। उधर पाकिस्तान में भी “मुस्लिम ब्रदरहुड” नामक अवधारणा(?) हिलोरें मारने लगी है (यहाँ देखें…) और उन्हें हमेशा की तरह इस निर्णय में भी “इस्लाम पर खतरा” नज़र आने लगा है, मतलब उधर से भी इस ठण्डी पड़ती आग में घी अवश्य डाला जायेगा… और डालें भी क्यों नहीं, जब इधर के मुसलमान भी “कश्मीर में मारे जा रहे मुसलमानों और उन पर हो रहे अत्याचारों”(?) के समर्थन में एक बैठक करने जा रहे हैं (यहाँ देखिये…)। क्या यह सिर्फ़ एक संयोग है कि भारत से अलग होने की माँग करने वाले अब्दुल गनी लोन ने भी उसी सुर में सुर मिलाते हुए कहा है कि “अयोघ्या का फ़ैसला मुसलमानों के साथ धोखा है…” (ठीक यही सुर मुलायम सिंह का भी है)… क्या इसका मतलब अलग से समझाना पड़ेगा?

अब चिदम्बरम जी कह रहे हैं कि बाबरी ढाँचा तोड़ना असंवैधानिक था और उसके दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा…। क्या हो गया है चिदम्बरम जी आपको? यदि कोई गुण्डा मेरे घर में घुस कर बरामदे में अपना पूजास्थल बना लेता है तो उसे तोड़ने का मुझे कोई हक नहीं है? चिदम्बरम जी के “कांग्रेसी तर्क” को अपना लिया जाये, तो क्यों न शक्ति स्थल के पास ही मुशर्रफ़ मस्जिद, याह्या खां मस्जिद बनाई जाये, या फ़िर नेहरु के शांतिवन के पास चाऊ-एन-लाई मेमोरियल बनाया जाये, ये लोग भी तो भारत पर चढ़ दौड़े थे, आक्रांता थे…

अब फ़ैसला तो वामपंथी और सेकुलरों को करना है कि वे किसके साथ हैं? भारत की संस्कृति के साथ या बाहर से आये हुए एक आक्रान्ता की “तथाकथित मस्जिद” के साथ?

अक्सर ऐसा होता है कि मीडिया जिस मुद्दे को लेकर भचर-भचर करता है उसमें हिन्दुत्व और हिन्दुओं का नुकसान ही होता है, क्योंकि उनकी मंशा ही ऐसी होती है… परन्तु इस बार इस मामले का सकारात्मक पक्ष यह रहा कि मीडिया द्वारा फ़ैलाये गये रायते, जबरन पैदा किये गये डर और मूर्खतापूर्ण हाइप की वजह से 1992 के बाद पैदा हुई नई पीढ़ी को इस मामले की पूरी जानकारी हो गई… हमें भी अपने नौनिहालों और टी-एजर्स को यह बताने में आसानी हुई कि बाबर कौन था? कहाँ से आया था? उसने क्या किया था? इतने साल से हिन्दू एक मन्दिर के लिये क्यों लड़ रहे हैं, जबकि कश्मीर में सैकड़ों मन्दिर इस दौरान तोड़े जा चुके हैं… आदि-आदि। ऐसे कई राजनैतिक-धार्मिक सवाल और कई मुद्दे जो हम अपने बच्चों को ठीक से समझा नहीं सकते थे, मीडिया और उसकी “कथित निष्पक्ष रिपोर्टिंग”(?) ने उन 17-18 साल के बच्चों को “समझा” दिये हैं। कश्मीरी पण्डितों की दुर्गति जानने के बाद, अब उन्हें अच्छी तरह से यह भी “समझ” में आ गया है कि भारत के मीडिया को कांग्रेस और मुस्लिमों का “दलाल” क्यों कहा जाता है। जैसे-जैसे आज की पीढ़ी इंटरनेट पर समय बिताएगी, ऑरकुट-फ़ेसबुक-मेल पर बतियाएगी और पढ़ेगी… खुद ही इन लोगों से सवाल करेगी कि आखिर इतने साल तक इस मुद्दे को किसने लटकाया? वे कौन से गिरे हुए बुद्धिजीवी हैं और किस प्रकार के घटिया इतिहासकार हैं, जो बाबर (या मीर बाकी) की बनाई हुई मस्जिद को “पवित्र” मानते रहे हैं…। नई पीढ़ी ये भी सवाल करेगी कि आखिर वे किस प्रकार के “धर्मनिरपेक्ष” अफ़सर और लेखक थे जिन्होंने राम और रामसेतु को काल्पनिक, तथा रामायण को एक नॉवेल बताया था…ये सभी लोग बामियान (अफ़गानिस्तान) में सादर आमंत्रित हैं…

अब देखना है कि भारत के मुसलमान इस अवैध मस्जिद को कब तक सीने से चिपकाये रखते हैं? पाकिस्तान, देवबन्द और उलेमा बोर्ड के भड़काने से कितने भड़कते हैं? अपने आपको सेकुलर कहने वाले मुलायम और वामपंथी लोगों के बहकावे में आते हैं या नहीं? दोहरी चालें चलने वाली कांग्रेस मामले को और लम्बा घसीटने के लिये कितने षडयन्त्र करती है? जो एक तिहाई हिस्सा उन्हें खामख्वाह मिल गया है क्या उसे सदभावना के तहत हिन्दुओं को सौंपते हैं? सब कुछ भविष्य के गर्भ में है… फ़िलहाल तो हिन्दू इस फ़ैसले से अंशतः नाखुश होते हुए भी इसे मानने को तैयार है… (भाजपा ने भी कहा कि विवादित परिसर से दूर एक विशाल मस्जिद बनाने में वह सहयोग कर सकती है), लेकिन कुछ “बुद्धिजीवी”(?) मुस्लिमों को भड़काने के अपने नापाक इरादों में लगे हुए हैं… अयोध्या फ़ैसले के बाद ये बुद्धिजीवी सदमे और सन्निपात की हालत में हैं और बड़बड़ा रहे हैं…। कहा नहीं जा सकता कि आगे क्या होगा, लेकिन अब गेंद मुसलमानों के पाले में है…। अभी समय है कि वे जमीन के उस एक-तिहाई हिस्से को हिन्दुओं को सौंप दें, ताकि मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सके…। कहीं ऐसा न हो कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद वह एक तिहाई हिस्सा भी उनके हाथ से निकल जाये…

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63 Comments

  1. October 4, 2010 at 6:58 am

    >रावण भाग्यशाली था जो एक ही विभिषण से पाला पड़ा. यहाँ तो हर दुसरा व्यक्ति विभिषण है. वास्तव में केसरिया ब्रिगेड पर जम कर बरसने को तैयार थे और मामला उल्टा पड़ा तो सकते में आ गए. और इससे निकलने में 10-12 घंटे लग गए.अब राम मन्दीर कोई नहीं रोक सकता. हाँ वहाँ जैन और बौद्ध मन्दीर होने का फचड़ा डालने की भी तैयीरी में है, नास्तिक इतिहासकार. सावधान! वहाँ जो भी रहा हो, अब भूमि राम की है.

  2. ZEAL said,

    October 4, 2010 at 7:02 am

    >.सुरेश जी,जब दो-तिहाई हिन्दुओं का खून ठंडा ही है तो , एक-तिहाई रोटी फेंकने पर वो राल टपकाते हुए दौड़ ही पड़ेंगे न ?.

  3. ZEAL said,

    October 4, 2010 at 7:03 am

    >.स्वामी विवेकानन्द समग्र साहित्य में ‘भारत का भविष्य‘ शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित एक लेख में स्वामीजी लिखते हैं:”विदेशी आक्रमणकारी एक के बाद एक मंदिर तोड़ता रहा; लेकिन जैसे ही वह वापस जाता, फिर से वहां उसी भव्य रुप में मंदिर खड़ा हो जाता। दक्षिण भारत के इन मंदिरों में से कुछ मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे अन्य मंदिर आपको भारतवर्ष के इतिहास के बारे में इतना कुछ बता सकते हैं, जो आपको पुस्तकों के भंडार से भी जानने को नहीं मिलेगा। सोचिए, इन मंदिरों पर विध्वंस औेर पुनर्निर्माण के सैकड़ों निशान मौजूद हैं-लगातार बार-बार टूटते रहे और ध्वंसाशेषों से ही फिर बार बार खड़े होते रहे, पहले से भी ज्यादा भव्यता के साथ! यही है राष्ट्रीय भावना, राष्ट्रीय जीवनधारा। इस धारा के साथ चलिए, यह आपको गौरव की ओर ले जाएगी।” .

  4. October 4, 2010 at 7:19 am

    >@ इस मामले का सकारात्मक पक्ष यह रहा कि मीडिया द्वारा फ़ैलाये गये रायते, जबरन पैदा किये गये डर और मूर्खतापूर्ण हाइप की वजह से 1992 के बाद पैदा हुई नई पीढ़ी को इस मामले की पूरी जानकारी हो गई… …… मीडिया और उसकी "कथित निष्पक्ष रिपोर्टिंग"(?) ने उन 17-18 साल के बच्चों को "समझा" दिये हैं। कश्मीरी पण्डितों की दुर्गति जानने के बाद, अब उन्हें अच्छी तरह से यह भी "समझ" में आ गया है कि भारत के मीडिया को कांग्रेस और मुस्लिमों का "दलाल" क्यों कहा जाता है।…………. जैसे-जैसे आज की पीढ़ी इंटरनेट पर समय बिताएगी, ऑरकुट-फ़ेसबुक-मेल पर बतियाएगी और पढ़ेगी… खुद ही इन लोगों से सवाल करेगी कि आखिर इतने साल तक इस मुद्दे को किसने लटकाया? वे कौन से गिरे हुए बुद्धिजीवी हैं और किस प्रकार के घटिया इतिहासकार हैं, जो बाबर (या मीर बाकी) की बनाई हुई मस्जिद को "पवित्र" मानते रहे हैं…। बहुत सही….एकदम सटीक बात कही सुरेश जी।

  5. October 4, 2010 at 9:05 am

    >अत्यंत विचारवान लेख लगा | सूरेश जी आपने इस मुद्दे को जिस तरह से प्रस्तुत किया है तथा युक्ति के उपयोग से जो तथ्यों के तानेबाने का परोक्ष सत्य उजागर किया है उससे अनायास ही चेहरे पे मुस्कान आ गयी | बहुत विचारवान और सटीक लेख लिखा है | भारत , मलेशिया , बंगलादेश आदि में हिंदूं पे ना जाने कितने अत्याचार होते आये हैं , दरअसल हिंदू होते ही अत्यंत निरीह हैं | आज भी कितने ही लोग बाबा वाबा की माजर पे चले जाते हैं और हाथ जोड़ आते हैं , हिन्दू धर्म जब तक होता तब तक भले ही इसका अस्तित्व बना रहे परन्तु इसके मानने वालों पर अत्याचार बढते रहेंगे| आपका ब्लॉग लोगों बहुत क्रन्तिकारी है || जय राम , जय हनुमान |

  6. October 4, 2010 at 11:23 am

    >good article and very good example of Kasab in Taj.Keep it up.http://parshuram27.blogspot.com/2010/10/blog-post.html

  7. October 4, 2010 at 11:43 am

    >तथ्यपूर्ण वस्तुस्थिति का निरूपणशानदार प्रस्तूतिकरणआपके प्रयासों को नमन्।

  8. October 4, 2010 at 12:04 pm

    >आपके लेख को पडने से पहले एनडीटीवी के रविश कुमार का लेख पढ़ा "लीजिये राम लीगल हो गये" जिसे पढकर जी खराब हो गया, पता नहीं कैसे कैसे लोग इस "परसुएशन इंडस्ट्री" ने प्लांट करे हुये हैं! यह अलख जगाये रखों आप! शुभकामनायें!

  9. October 4, 2010 at 1:36 pm

    >आपके लेख से पूर्णतया सहमत.बाबर के वंशज देश के लिये कोढ़ के समान है और ऊपर से सेकुलर नेता" कोढ़ मे खाज" हैअब इस भयंकर कोढ़ को भयंकर खतरनाक तेजाब डालकर नष्ट करना होगा

  10. October 4, 2010 at 2:45 pm

    >ऊपर वाले सभी बन्धुओं के विचार में (अर्थात आठ तक) अपना भी स्वर मिलाता हूं.

  11. Mahak said,

    October 4, 2010 at 3:45 pm

    >कभी मुलायम सिंह के दो जिस्म एक जान रहे अमर सिंह ने अभी हाल ही में एक सभा में कहा था की -<" इस वतन में अमन ओर चैन के लिए मुल्क के मुलायमों का मरना ज़रूरी है "चलो देर से ही सही पर अमर सिंह ने एक सही बात तो कही महक

  12. Yash said,

    October 4, 2010 at 3:56 pm

    >आज से थोड़े दिन पहले जब एक जूलिया रॉबर्ट ने कहा ( फिल्म के प्रचार का हथकंडा )की वह हिन्दू बन गई है तो हमारे यहाँ पर के गिद्ध मिडियाई कुत्ते लग गए उनके तलवे चाटने मे और हिन्दू धर्म के नई नई लेख लिखने मे ऐसा लगता है जैसे कोई नया अध्याय जुड़ गया हो हिन्दू धर्म मे, टाइम्स ऑफ इंडिया मे लिखा की हिन्दू का मतलब "हिंसा से दूर" इस बात से मुझे इतनी हसी आई, शायद उन्होने वामपंथी या कोंग्रेसी इतिहास के अलावा भारतीय इतिहास नहीं पढ़ा जिसमे अहिंसा की बात कम ही सुनाई देती है, असल मे इस शब्द (अहिंसा ) ने हमें अधिक नपुसक और कमजोर बनाया है ये शब्द तो बना ही था इसलिए की हम मांस ना खाये, मुगल आतंककारियों जैसे हरकते ना करें, क्या महराना प्रताप अहिंसा का मतलब समझते थे ? या उन्होने सुना था ? या फिर शिवाजी महाराज ने ? या फिर रामजी ने चरखा काता था रावण को देने के लिए ? बस हिन्दू इसलिए ही कायर हो गए है अहिंसा को अपनी ढाल बनाया है इन्हे बस बहाने चाहिए ! वैसे भी अहिंसा से उस पाखंडी ने कौनसी आजादी दिलाई ! लाखो लीटर खून बहा है हमारे भारतीयो का ! हो गए 20 लाख लोग मौत पर सवार ।।साबरमती के कंस तूने कर दिया उन्हे हलाल ।।

  13. October 4, 2010 at 4:57 pm

    >एक विचारवान और तर्कपूर्ण लेख के लिए साधुवाद.यह फैसला ऊपर से भले ही हिन्दुओं के पक्ष में नजर आता है लेकिन हकीकत में नहीं है. जब पुरातात्विक सबूत चीख-चीख कर कह रहे हैं की यहाँ मंदिर था. जब भारतीय आस्था, आध्यात्म और विश्वास कहता है की प्रभू रामजी यही जन्मे थे. ऐसे में १/३ हिस्सा मुस्लिमो को देकर कोर्ट ने भी अपना 'सेकुलर-मजहब' निभाया प्रतीत होता है! सावधान: राजनीति, मीडिया, मानवतावाद और एनजीओ-सेवा के बाद अब हमारे बुद्धीजीवी (?) न्यायपालिका की 'सुन्नत' करके उसे भी हिन्दू विरोधी यानी 'सेकुलर' बनाने के लिए दबाव डाल रहे है.एक और अहम् बात, अयोध्या फैसला आने के बाद चैनल पर सेकुलर पत्रकारों के चहरे देखने लायक थे. बेचारों को इस बार खाड़ी देशो से खैरात नहीं मिलेगी. क्योंकि सचाई को दबाकर मुस्लिम-परस्ती दिखाने की बावजूद, लाख माहौल बनाने के बावजूद इस बार फैसला मुस्लिमो की मर्जी के मुताबिक़ नहीं रहा.इन सबसे ऊपर अहम् बात है, कि अब गेंद मुस्लिमो के पाले में है. वह चाहे तो एक तिहाई हिस्से को राममंदिर के लिए देकर अपनी महानता दिखा सकते है. और हिन्दू उनके लिए अयोध्या से बाहर मस्जिद बनाकर मिसाल कायम कर सकते है. लेकिन इसके लिए मुस्लिमो को सेकुलर बिरादरी की कुटील कैद से बाहर निकल कर सोचना होगा. उनके लिए बाबर जैसा आक्रान्ता और औरंगजेब जैसा पितृहन्ता आदर्श है या मर्यादा पुरुषोत्तम राम? बाबर, औरंगजेब जैसे लोग सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से ही मुसलमानों की कौम के प्रतिनिधी नहीं हो जाते है. इस्लाम के असली प्रतिनिधी तो अजमेर में बैठे गरीब नवाज है. जिनके आगे कई मुल्को के मालिक-मंत्री बादशाह भी सर झुकाते हैं. भाई जान रावण भी हिन्दू था लेकिन वह सिर्फ हिन्दू था इस कारण हिन्दुओं का आराध्य नहीं बन सकता. आज जरूरत है कि राष्ट्रनायक प्रभू श्रीराम के भव्य निर्माण में मुस्लिम भी हाथबढाए.बाकी तो रामजी की माया है, सत्यमेव -जयते.

  14. impact said,

    October 4, 2010 at 5:31 pm

    >क्यों ज़बरदस्ती काओं काओं कर रहे हो. न्यायालय यह तो सिद्ध नहीं कर सका की यह मस्जिद बाबर ने बनवाई थी. इसका मतलब साफ़ है की मस्जिद ज़बरदस्ती नहीं बनी थी. फिर नाजायेज़ तरीके से उसमे १९४९ में मूर्तियाँ रखकर उसपर कब्ज़ा कर लिया गया ठीक उसी तरह जैसे सड़क के किनारे जहां पीपल का पेड़ दिखा पहले मूर्ति रखी फिर कब्जियाय लिया.चलो मान भी लिया की बाबर ने ही मस्जिद बनवाई थी तो मुझे बताओ उस समय अयोध्या पर किसका शासन था? क्या उस समय देश की सीमा निर्धारित थी? अगर नहीं तो उस समय के सारे राजा आक्रमणकारी हुए क्योंकि सब अपना राज्य बढाने के लिए दूसरे पर आक्रमण करते रहते थे. बाबर ने हमला किया तो कौन सा कुसूर किया? राम ने भी बाली का वध करके अपना राज्य बढ़ाया था.न्यायालय ने यकीनन इन्साफ का गला घोंटा है. आँखों देखी मस्जिद को झुठला दिया गया और जिस राम के जन्म का वर्ष भी किसी को नहीं पता उसके बारे में श्योर शाट लगा दिया की उसी गुंबद के नीचे पैदा हुए. मानो माननीय न्यायाधेश महोदय ने पूर्व जन्म में राजा दशरथ की दाई का काम अंजाम दिया था.एक सवाल, अगर फैसला मुसलमानों के फेवर में आ जाता क्या तब तुम इतने ही शांत रहते जितने की अभी हम मुसलमान हैं?

  15. Yash said,

    October 4, 2010 at 5:38 pm

    >सुरेश जी ! अगर गूगल मे सेकुलर शब्द की संख्या ढूँढी जाए तो शायद आपका ही ब्लॉग होगा जिसमे सेकुलर शब्द सबसे ज्यादा होगा ! आपकी हर पोस्ट मन को छु जाती है ! वैसे आप जैसे हजारो को जरूरत है इस मुर्दे और लूले, लंगड़े,बोलीवुडिया, पॉर्न-वाद से ग्रस्त "इंडिया" मे ! ना जाने क्यो हर एक पौराणिक भारत को चाहने वाले को, राणा प्रताप को , शिवाजी को चाहने वाले को यही लगता है की उसकी और आपकी मानसिकता एक जैसे ही है क्योकि आप सच (दर्द के साथ) लिखते है ! वैसे हम भी लोगो को जागृत करने का ही कार्य कर रहे है फेसबुक, ट्विटर आदि के द्वारा, इन काले और सेकुलर अंग्रेज़ो को, इस बिकी हुई भ्रष्ट मीडिया के प्रति, और यहिकमना है की सभी हिन्दू एक हो जाए बस ! बस बहुत हो चुका अब हिन्दू मार नहीं खाएगा इसी के साथ आभार !

  16. Raj100008 said,

    October 4, 2010 at 8:18 pm

    >Jhakkaass.Scholarly and thought provoking article. Keep it up.(Sorry for using English.)

  17. abhishek1502 said,

    October 4, 2010 at 9:08 pm

    >वर्तमान स्तिथि का यथार्थ चित्रण आखिर इस निरंकुश और हिन्दू विरोधी मिडिया को ठीक करने का कुछ तो तरीका होगा ???????????

  18. October 5, 2010 at 2:39 am

    >कार्ल मार्क्स के अनुयायी आज कल साम्प्रदायिकता के मामले मे ममता बनर्जी को बहुत तगडी चुनौती दे रहे है……धर्म अफीम है का फलसफा पुराना पड गया है या कहे कि कम्युनिस्ट अब आखिरी सान्से ले रहे है… अब इनका क्या करे? जलाये या दफनाये, बेहतर होगा कि इनकी लाशे चील कौवे खा जाये…..====भारत माता की जय

  19. kaverpal said,

    October 5, 2010 at 4:04 am

    >dear suresh ji aap ne yeh nahi socha ki najayaj aulad aur jawani ki bhool ko hamesha bhugatna padega. yeh bhi kuchh aise hi hain . is faislo ko sab man rahe hain lakin maulana mulayam ko khujli ki bimari hai ya mansikta ka farm no 10 bhara hua jo shanti ke watawaran me bhi jahar gholne ki tarkeeb dundh rahe hain.is tarah ke aap ko bahut milenge jinhe yeh faisla pasand nahin aayega. is ke liye unki kujli ki dawa lao aur desh ke baare me socho

  20. October 5, 2010 at 4:13 am

    >आपने जो कुछ कहा सही कहा है….आप हमेशा सही कहते है….बाबरी मस्ज़िद को हज़ारों हिन्दुओं ने तोड दिया और उसके हज़ारो मासुमों की जान ली…..अगर आपके उदाहरण के हिसाब से देखा जाये तो हिन्दुओं और बाबर में क्या फ़र्क रह गया..इस्लाम में आस्था, मान्यता और मिथ्य के लिये कोई जगह नही हैं…..और सनातन धर्म में मान्यता ही मान्यतायें है… एक बात बताये भगवान श्रीराम(?) के जन्मस्थान(?) की लोकेशन हमारे देश के हिन्दुओं और हाईकोर्ट के जजों को शायद भगवान श्री राम(?) ने ही बताई है(?????) कि मेरा जन्म इस मस्ज़िद के बडे गुम्बद के बीच में हुआ था(????) जो 22-23 दिसम्बर 1949 को मूर्तियां चोरी छिपे वहां रखी गयी जबकि काफ़ी वक्त से राम चबुतरे पर पुजा हो रही थीजन्मस्थान और जन्मभूमि में फ़र्क क्या है??बाबरी मस्ज़िद केस की 23 फ़ाइलें जो गायब है उनमें कौन से सबुत थे???रही बात आपकी सलाह की तो आप बेफ़िक्र रहिये उसपर काम शुरु हो गया है…..बहुत जल्द आपको पता लग जायेगा=============="हमारा हिन्दुस्तान""इस्लाम और कुरआन"Simply CodesAttitude | A Way To Success

  21. October 5, 2010 at 4:19 am

    >बहुत सही कह रहे है…(?)९२ में हज़ारों हिन्दुओं ने साजिश के साथ मस्ज़िद को तोडा और फ़िर हज़ारों बेगुनाहो की मौत की वजह तैयार की…..उनमें, आप में और बाबर में क्क्या फ़र्क रह गया।एक बात समझ नही आयी कि बरसों से राम चबुतरे पर पुजा हो रही थी फ़िर अचानक हमारे देश के हि भगवान श्रीराम(?) के जन्मस्थान(?) की लोकेशन हमारे देश के हिन्दुओं और हाईकोर्ट के जजों को शायद भगवान श्री राम(?) ने ही बताई है(?????) कि मेरा जन्म इस मस्ज़िद के बडे गुम्बद के बीच में हुआ था(????) जो वहां मुर्तियां रख दी गयी???=============="हमारा हिन्दुस्तान""इस्लाम और कुरआन"Simply CodesAttitude | A Way To Success

  22. October 5, 2010 at 4:33 am

    >यहां पर फ़ैसले में कहा गया कि ए.एस.आई. की रिपोर्ट को मुख्य साक्ष्य माना गया है लेकिन उस मुख्य साक्ष्य में बहुत सारे किन्तु-परन्तु है…मैने पढी है वो रिपोर्ट "हो सकता है" "ऐसा लगता है" "शायद" इसके अलावा कुछ भी नही है वहां पर…रही बात आपकी सलाह की तो उस पर काम शुरु हो चुका है बहुत जल्द आपको पता लग जायेगा..==============="हमारा हिन्दुस्तान""इस्लाम और कुरआन"Simply CodesAttitude | A Way To Success================

  23. October 5, 2010 at 5:32 am

    >@ सुरेशजी हिंदुस्तान का हिन्दू तो सहिष्णु है, हर बार वो अपने देश में शान्ति के लिए अपनी बड़ी-बड़ी खुशियों का त्याग करता आया है. पर इस बार मुद्दा सिर्फ मंदिर का नहीं बल्कि देश के गौरव आस्था और विश्वास का था, और हिन्दू जीत गया.लेकिन सुरेश जी, आप वामपंथियों की बात करते है वो तो ऐसा करेंगे ही लेकिन हमारे ब्लॉग जगत में भी कई सेक्युलरों को इस फैसले से खुजली होने लगी, ये जार जार इस बात पर रो रहे है ही ये फैसला हिन्दुओं के पक्ष में कैसे गया जिनमे कुछ महान(?) ब्लॉगर है सलीम खान, नीरेंद्र नगर, काशिफ अली आदि– आदि– मैंने इसी मुद्दे पर एक पोस्ट लिखी है कृपया अपनी राय जरूर दे..http://hinduraaj.blogspot.com/2010/10/ayodhya-judgment-neglect-by-bloggers.html

  24. Deepesh said,

    October 5, 2010 at 5:40 am

    >काशिफ महोदय, हिन्दुओ नें केवल अपने घर की गंदगी साफ की है ।

  25. ZEAL said,

    October 5, 2010 at 5:44 am

    >.वो रक्त जिसमें उबाल न आता हो…उसे सहिष्णुता का नाम मत दीजिये। .

  26. October 5, 2010 at 5:56 am

    >सुरेश जी , कृपया शीर्षक ठीक कर ले ; सेकुलर वामपंथी (निर्बुद्धि)जीवी

  27. October 5, 2010 at 5:58 am

    >दुर्बुद्धि शब्द भी चलेगा

  28. October 5, 2010 at 6:00 am

    >कासिफ आरिफ साहब , बहुत सारे किन्तु- परन्तु तो पवित्र कुरआन में भी है, तो क्या…..

  29. October 5, 2010 at 6:55 am

    >मियां काशिफ, क्या आप अपने परदादा या फिर उनके परदादा का नाम जानते हैं? क्या आप यकीनन कह सकते हैं कि वे मुस्लमान ही थे? शायद नहीं, क्योंकि भारत के ९९ प्रतिशत मुसल्मानों ने धर्मपरिवर्तन करके इस्लाम को अपनाया है. ऐसे में आपकी रगों में दौड़ रहा रक्त हिन्दुओं का ही है लेकिन आप मुसलमान हैं क्योंकि आपकी आस्था इस्लाम में है. संविधान भी "आस्था" को मूलाधिकार के रूप में मान्यता देता है. अगर आपको लगता है की इस्लाम में आस्था, मान्यता और मिथ्य के लिए कोई जगह नहीं है तो फिर आपका मुसलमान होना ही गलत साबित होता है क्योंकि आस्था से ही आप मुसलमान हैं वर्ना anthropologically आप हिन्दू हैं. वैसे यह आपका भ्रम है कि इस्लाम में आस्था, मान्यता और मिथ्य के लिए कोई जगह नहीं है. कृपया अपनी उस पवित्र पुस्तक को फिर पलटिये; आस्था, मान्यता और मिथकीय आख्यानों से वह भरा पड़ा है, जिनमे से अधिकांश वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एकदम उलटे ही पड़ते हैं. काशिफ जी, धर्म का दूसरा नाम ही आस्था है. आप उसे मानते हैं तो आस्था से, नहीं मानते तो भी आस्था के विलोप से ही!!! एक बात और, बाबर आक्रमणकारी ही था और क्या पता आपके पूर्वजों ने अपना धर्मपरिवर्तन उसी की तलवार के नीचे किया हो………….

  30. October 5, 2010 at 6:56 am

    >अदालत का फैसला अपनी जगह है लेकिन इस बार असली खुशी ये देख कर हुई कि देश पिछले 18-19 साल में देश काफी समझदार हो गया है. जाने इस तरह के कितने अनगिनत मुद्दों ने धर्म की आड में कितने ही घर जला दिए. कितनो के परिवारों को हाशिए पर या सड़क पर ला कर खड़ा कर दिया. कोई व्यक्ति मरा तो नुकसान उस व्यक्ति के परिवार को हुआ. किसी समाज, धर्म या नेता का नहीं. लल्लू, मुल्लू, माया और वाम सरीखे के नेता जो आज भी आग में घी डालने का काम कर रहे है, इनमे से किसी ने भी किसी भी मरने वाले व्यक्ति या उसके परिवार को अपना मतलब निकलने तक ही याद रखा है ?खुशी हुई ये देख कर की इस बार धर्म की अफीम, आम आदमी के दो जून की रोटी पर भारी नहीं पड़ी.

  31. DEEPAK BABA said,

    October 5, 2010 at 7:25 am

    >दद्दा राम राम,मेरे गाँव में कहावत है : "रांड तो रंडापा काट लेगी जिब रंडवे काटन दें."मुसलमान तो जी लेंगे और अपना रास्ता खुद तय कर लेंगे अगर ये हिंदू धर्मनिरपेक्ष उनको जीने दें तो.

  32. October 5, 2010 at 7:41 am

    >इन मुसलामानों को कितना ही तर्क देलो ये रहेंगे मुर्ख के मुर्ख ही, इन्हें कितना ही आदर्शवाद का पाठ पढ़ालो ये रहेंगे बाबर और लादेन के समर्थक ही क्योंकि इनकी जड़ ही सड़ी हुई है. इनकी जड़ ही जब तक तेज़ाब से गला नहीं दी जायेगी ना इस दुनिया का उद्धार होगा और ना ही इनका. मैं भी लेख और सभी की टिप्पणियों से सहमत होता हूँ केवल २ इस्लामिक बीमारी के कीड़ों को छोड़ कर. जब तक हिन्दू यह नहीं समझेगा एकाद को छोड़कर इन सभी मुसलामानों की सोच impact और काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif की ही तरह होती है और इनको तर्क और ज्ञान की भाषा कभी समझ नहीं आती है इसलिये इनकी खोपड़ी धड़ से अलग करके जब तक नंगी तलवार पर नहीं टांग दी जायेगी तब तक इस देश का भला होने वाला नहीं है.यह बात अच्छी तरह समझ लो क्योंकि यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो ये तुम्हे भी अपने साथ इस्लामिक नर्क की आग में झोंक देंगे जिसको ये दिन-रात कहते भी हैं और प्रयासरत भी हैं.

  33. October 5, 2010 at 10:28 am

    >सौरभ आत्रेय बाबू,जानना चाहते हो ये impact महोदय कौन है.चलो मैं बताता हूँ,,,, ये हमारे ब्लॉग जगत के सम्मानित सदस्य श्री SORRY मुल्ला "अनवर ज़माल" है. ये भी क्या करे बेचारे मुखौटा तो शरीफ का लगा लिया पर बिचारे अपनी "कुंठा" को निकालने के लिए IMPACT का मुखौटा पहने हुए है…

  34. October 5, 2010 at 10:57 am

    >सुन्दर , तर्कपूर्ण और देशप्रेम से लबरेज़ पोस्ट के लिए साधुवाद !बने रहिये , लिखतेरहिये !

  35. ePandit said,

    October 5, 2010 at 11:07 am

    >खुद न्यायाधीश खान ने माना है कि मस्जित अवैध थी क्योंकि:-"कुरान के मुताबिक किसी अन्य धर्म के प्रार्थनागृह को तोड़कर जबरन बनाई गई मस्जिद में पढ़ी गई नमाज को अल्लाह कुबूल नहीं करता।"लेकिन जैसा कि एक मित्र ने मेरी उपर्युक्त ट्वीट पर उत्तर दिया कि लगता है इस्लाम के थ्योरी और प्रैक्टिस में बहुत अन्तर है। जब कुरान में मन्दिर तोड़कर बनाई गई मस्जिद को स्पष्ट रुप से अवैध बताया गया है तो मुस्लिमों को खुद चाहिये कि वे ऐसी मस्जिद का दावा छोड़ दें।मैं लाख टके की एक बात कहता हूँ कि अगर वह स्थान भगवान श्रीराम का जन्मस्थान न होता तो हिन्दू कबके वहाँ का दावा छोड़ चुके होते। अगर मुसलमान वहाँ से दूर कही मस्जिद बनाने को तैयार हों तो हिन्दू खुद मस्जिद बनाने के लिये कारसेवा को तैयार हैं। भाई हमारे तो श्रीराम का जन्मस्थान है वहाँ मुस्लिमों का क्या रखा है, क्या वह स्थान मुहम्मद साहब या किसी और इस्लामिक फरिश्ते का जन्मस्थान है या उनसे किसी प्रकार से जुड़ा है? यदि नहीं तो आखिर मुस्लिमों को वहीं पर मस्जिद बनाने की जिद क्यों है?जैसे बौद्धों का गया, सिखों के अमृतसर, ननकाना साहिब आदि हैं, मुस्लिमों के मक्का-मदीना, इसाइयों का यरुशलम आदि है वैसे ही हिन्दुओं के लिये वह स्थान महत्वपूर्ण है। लेकिन मुस्लिमों के लिये उस स्थान का आखिर क्या महत्व है? क्या बाबर कोई फरिश्ता, धर्मगुरु, मौलवी या सूफी-सन्त आदि था? या फिर कहीं मुस्लिम बाबर जैसों को ही अपना आदर्श मानते हों तो बात अलग है।

  36. rkg said,

    October 5, 2010 at 11:31 am

    >पता नहीं इन तथाकथित सेकुलर लोगो को क्या गया है ये लोग फिर से आग लगाने कि कोशिश कर रहे है |इन लोगो को बाबरी मस्जिद दिख रही है वहां पर मंदिर नहीं दिख रहा है | अब जब कि हिन्दू पक्ष शांत है तो ये लोग मुस्लिमो को भड़काने की कोशिश कर रहे है | इन तथाकथित सेकुलर लोगो को वहां पर ऐतिहासिक मस्जिद दिखती है मंदिर नहीं … अब कोई उनसे ये पूछे कि जब बाबर भारत वर्ष मैं आया था तो उस समय क्या था उसका यहाँ पर ? वो सिर्फ एक आक्रमण कारी था उसके बाद जब तथाकथित महान अकबर ने हिन्दू राजा विक्रमादित्य हेमू को पराजित करने के बाद बादशाही संभाली उस समय इस देश का वाणिज्य पूरे विश्व की अर्थव्यस्था का एक तिहाई था और साथ में एक लम्बा विस्तृत भूभाग भी| ऐसे में इस तरह की ऐश और ताकत भला कहाँ और थी, सो ये लोग यही टिक गए और इन्होने हमारे आराधना और आस्था के केन्द्रों पर हमला करना शुरू कर दिया हमारे मंदिरों को तोड़ कर वहां मस्जिदे बनवाई| हमारा धर्म और आस्तित्व इन लोगो के पहले का था, ये लोग बाद में आये थे ये जगजाहिर बात है | ऐसे में भी ये लोग ये कह रहे हो कि वहां बाबरी मस्जिद थी, ये तो सरासर बेवकूफी वाली बात है एक तो जोर जबरदस्ती से किसी के सामान और सम्मान पर बलात अधिकार जमा लो और फिर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग कहे कि ये जगह हमारी (हिन्दुओ की) नहीं है | ये तो वही बात हो गयी की किसी के घर में जबरन घुस जाओ और कहो कि ये जगह हमारी है आखिर में कुछ न कुछ तो हाथ लगेगा ही | और यही हुआ हम लोगो के साथ – हमारे ही स्थान का एक हिस्सा इन्हें दे दिया गया और इतने में भी लोग स्यापा कर रहे हो कि बेचारो के साथ अन्याय हुआ| इनको हमारी आस्था से, हमारे सम्मान से कोई लेना देना नहीं |कोई इन सेकुलरो से पूछे क्या क्षमता है इनकी – ये लोग क्यों नहीं समझाते है मुस्लिमो को कि ये आस्था का विषय है जो जिनका है उनका दे दो ये बाबरी मस्जिद इनके बाप ले के आये थे यहाँ पर| इन लोगो ने हिन्दुओ के धर्मं स्थलों को चुन चुन कर निशाना बनाया और उन्हें तोड़ कर या फिर उनके बगल में मस्जिदे खड़ी कर के एक अनावश्यक विवाद को पैदा किया और अब समय है इस विवाद को खत्म करने का ….तो फिर ढेरो की संख्या में रुदाली आ जाते है यहाँ स्यापा करने को ……….धिक्कार है ऐसी मानसिकता पर |

  37. October 5, 2010 at 12:19 pm

    >सुरेश जी आप सच लिखते हे कभी-२ सोचता हु की हमे मुस्लीम लुटेरो के साथ-साथ अग्रेजो ने भी लुटा अगर अग्रेज नही आते तो हम आज भी मुस्लिम लुटेरे बाबर के वशज जफ़र के ही गुलाम होते ओर बाबरी मस्जिद कभी ना टुटती जय भारत

  38. awyaleek said,

    October 5, 2010 at 2:06 pm

    >सच में अगर मुसलमानों को पूरा ब्रह्माण्ड भी दे दिया जाय तो भी वो खुश नहीं होंगे..आखिर कब खुश होगे तुमलोग यार…जीवन भर रोते ही रहोगे क्या..?भारत के लाखों वीशाल मंदीर तोड़े मुसलमानों ने, उस समय भारत इतना अमीर था ki मंदीर हीरे-मोतियों और सोने-चंदियों से भरा रहता था,उसे लूटा तुमलोगों ने..इनसब के बारे में तो हिन्दुओं ने कभी हीसाब नहीं माँगा एक अयोध्या मंदीर जिस पर हमारा अधिकार है वो भी तुमलोगों से नहीं छोड़ा जा रहा… कितने छोटे दिल वाले हो यार तुमलोग ..!भारत में हिन्दू तुम्हे एक क्या हजारों मस्जिद बनाने के लिए जमीन दे देंगे पर जिस जगह पर लाखों-करोड़ों हिन्दुओं की आस्था टिकी हुई है उसके लिए तो झगडा मत करो..हिन्दुओं ने तो हमेशा त्याग क्या है तुमलोगों के लिए जिस तरह से कोई पीता अपने पुत्र के लिए करता है उसे बच्चा और नासमझ समझकर..पर तुमलोगों ने कब त्याग किया है हिन्दुओं के लिए..?इतने सालों के इतिहास में अगर कोई झूठी कहानी भी हो तो उदाहरण दो…..याद रखना हिन्दुओं के इतने कर्ज हैं तुमलोगों पर कि तुम्हारी आने वाली सौ पीढी भी वो कर्ज उतार नहीं सकती…. तुम्हारा भारत में सबसे बड़ा मस्जिद जामा मस्जिद भी हिन्दुओं का वध करके हथियाया गया मंदीर है…भारत के अनगिनत मस्जिद पौराणिक हिन्दू मंदीर हैं उनसब के लिए तो कभी किसी हिन्दू ने आवाज नहीं उठाई…..कभी सोचा है तुम लोगों ने…..

  39. October 5, 2010 at 5:19 pm

    >सुरेश जी भारतीय मिडिया बिदेशी व भारत बिरोधी हो गयी है चितंबरम,मनमोहन,मुलायम,लालू,रामबिलास से हिन्दुओ और देश को कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए ये सेकुलर क़े नाम पर देश द्रोह कर रहे है ,सार्थक लेख क़े लिए धन्यवाद.

  40. sudhir said,

    October 5, 2010 at 7:34 pm

    >अगर देखा जाये तो जन्म से हर व्यकित हिँदू जैसा ही होता अन्य धर्म के लोग अपनी धार्मिक संस्कारो के कारण मुसलमान, सिख आदि बनते हैँ। पर हिँदू जन्म से लेकर अंत तक वैसा ही रहता है जैसा पैदा हुआ।

  41. abhishek1502 said,

    October 5, 2010 at 8:11 pm

    >@awyaleek जी ,इन के यहाँ जिसने सही सोचने का कार्य किया उस की तो गर्दन ही उड़ा दी गयी. बेचारी तसलीमा नसरीन को ही ले लीजिये भारत तक में उस का रहना हराम कर दिया . वही भारत माता और देवियों को अपमानित करने की कोशिश करने वाला मकबूल फ़िदा हुसैन बड़े शान से मुस्लिम देश की नागरिकता लेता है और यह की सरकार उस की लल्लो चप्पो कर रही है की आप वापस आ कर जो काम अपमानित करने का अधुरा है पूरा करे .

  42. vivek said,

    October 6, 2010 at 6:04 am

    >भाई साहब शायद मुस्लिमो से गलती हो गयी उन्हें न्याय के लिए न्यायालय न जाकर पत्रकारों के पास जाना चाहिए था इस देश में केवल पत्रकार ही न्यायप्रिय और सेकुलर है न्यायाधीश तो आस्था के पुजारी है न्यायधिशो पर अब पत्रकारों की अदालत में मुकदमा चलना चाहिए और तीनो न्यायधिशो को फांसी दे देनी चाहिए और सारे हिन्दू समाज पर जजिया लगाकर देश के हरेक शहर में एक या दो बाबरी मस्जिद बना देनी चाहिए ४०० या ५०० साल बाद वो भी एतिहासिक हो जाएँगी किसी भी देश में रहने के लिए वहा के कानून संस्कृति और सामाजिक रीतियों को मानना पड़ता है यह एक सर्वभोमिक सत्य है पागल पत्रकार के कारन ही देश में दो तरह के कानून चल रहे है और मुस्लिम तो देश की संपत्ति में से अपना अधिकार उसी दिन खो बैठे थे जिस दिन देश का बटवारा हुआ था अब तो वो केवल अनधिकृत रूप से देश के संसाधनों पर बोझ बने बैठे है

  43. Anonymous said,

    October 6, 2010 at 6:33 am

    >taaj mahal ko bhi hathiaya gaya tha muslimon ne. p.n.oak sahab ki kitab padhen jo http://www.apnihindi.com par uplabdh hai. is kitaab ko ban kar diya gaya tha.

  44. October 6, 2010 at 7:39 am

    >चाहे कुछ भी हो ये सब है तो इसी हिंदुस्तान के …. जितने भी चोर उचक्के, डकैत है वो भी इंसान है कोई अपनी मार्गी से जुर्म का रास्ता नहीं चुनता ….

  45. Anonymous said,

    October 6, 2010 at 11:47 am

    >ये तो हिन्दुओं के लिए थोड़ी सी राहत देने वाली बात है कि अभी भी भारत में वो मुसलमान से ज्यादा हैं नहीं तो तीन न्यायधीशों में अगर एक की बजाय दो मुसलमान होते तो निर्णय बिल्कुल ही विपरीत होता..यानि एक तिहाई बाहरी भाग हिन्दुओं को मिलता और दो तिहाई मुसलमानों को..या शायद वो एक तिहाई भी ना मिलता..दो हिन्दु न्यायाधीशों में एक ने तो उदारवादी बनने की थोडी कोशिश की थी और एस. यू.खान जी तो पुरी तरह हिन्दु के विरुद्ध थे ही वो तो भला हो सुधीर जी का जिन्होंने हिम्मत दिखाई…

  46. October 6, 2010 at 2:32 pm

    >ऊपर "Anonymous" जी की टिप्पणी से मेरी पूरी सहमति है. इसके साथ अधिसंख्य टिप्पणियों यथा- बेंगाणी जी, गोदियाल जी, निशाचर आदि से भी पूरी सहमति है.

  47. October 6, 2010 at 3:34 pm

    >musalmano se jyada to chinta in mulayam singh jaise atnkvadion ko hai…inhe to masjid chahiye hi

  48. Anonymous said,

    October 6, 2010 at 3:50 pm

    >rightly said: आखिर बाबर और कसाब में क्या अन्तर है?

  49. My said,

    October 6, 2010 at 11:39 pm

    >काशिफ़ आरिफ़जी "इस्लाम और कुरआन" की चंद लाइने पढ़ने के बाद मैं जानना चाहूंगा के ये कैसा खुदा जो हुक्म पंहुचाने के वास्ते अपने किसी का इस्तेमाल करता है. मुझे बताये क्या उसे अपने बन्दों से सीधे बात करते डर लगता है या आराम तलबी का शिकार हो गया है और उसे बिचोलिये की जरुरत आन पड़ी !!! 😦

  50. My said,

    October 6, 2010 at 11:58 pm

    >काशिफ़ आरिफ़जी "इस्लाम और कुरआन" के सवाल न. २६ के जवाब के हिसाब से वो ऊपर वाला भी तो गैंब (छुपी हुई चीज़) ही हुआ न.!!!!

  51. October 7, 2010 at 7:00 am

    >अभी समय है कि वे जमीन के उस एक-तिहाई हिस्से को हिन्दुओं को सौंप दें, ताकि मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सके…। कहीं ऐसा न हो कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद वह एक तिहाई हिस्सा भी उनके हाथ से निकल जाये… देखिये आगे क्या-क्या होता है…

  52. rkg said,

    October 7, 2010 at 9:40 am

    >क्या आपने कभी यह समाचार पढ़ा कि किसी मुस्लिम राष्ट्र का कोई प्रधानमंत्री या बड़ा नेता तोकियो की यात्रा पर गया हो?क्या आपने कभी किसी अखबार में यह भी पढ़ा कि ईरान अथवा सऊदी अरब के राजा ने जापान की यात्रा की हो?कारण· जापान में अब किसी भी मुसलमान को स्थायी रूप से रहने की इजाजत नहीं दी जाती है।· जापान में इस्लाम के प्रचार-प्रसार पर कड़ा प्रतिबंध है।· जापान के विश्वविद्यालयों में अरबी या अन्य इस्लामी राष्ट्रों की भाषाएं नहीं पढ़ायी जातीं।· जापान में अरबी भाषा में प्रकाशित कुरान आयात नहीं की जा सकती है। इस्लाम से दूरी· सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जापान में केवल दो लाख मुसलमान हैं।और ये भी वही हैं जिन्हें जापान सरकार ने नागरिकता प्रदान की है।· सभी मुस्लिम नागरिक जापानी बोलते हैं और जापानी भाषा में ही अपने सभी मजहबी व्यवहार करते हैं।· जापान विश्व का ऐसा देश है जहां मुस्लिम देशों के दूतावास न के बराबर हैं।· जापानी इस्लाम के प्रति कोई रुचि नहीं रखते हैं।· आज वहां जितने भी मुसलमान हैं वे ज्यादातर विदेशी कम्पनियों के कर्मचारी ही हैं।· परन्तु आज कोई बाहरी कम्पनी अपने यहां से मुसलमान डाक्टर, इंजीनियर या प्रबंधक आदि को वहां भेजती है तो जापान सरकार उन्हें जापान में प्रवेश की अनुमति नहीं देती है।अधिकतर जापानी कम्पनियों ने अपने नियमों में यह स्पष्ट लिख दिया है कि कोई भी मुसलमान उनके यहां नौकरी के लिए आवेदन न करे।·जापान सरकार यह मानती है कि मुसलमान कट्टरवाद के पर्याय हैं इसलिए आज के इस वैश्विक दौर में भी वे अपने पुराने नियम नहीं बदलना चाहते हैं।·जापान में किराए पर किसी मुस्लिम को घर मिलेगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है।यदि किसी जापानी को उसके पड़ोस के मकान में अमुक मुस्लिम के किराये पर रहने की खबर मिले तो सारा मोहल्ला सतर्क हो जाता है।· जापान में कोई इस्लामी या अरबी मदरसा नहीं खोल सकता है। मतांतरण पर रोक· जापान में मतान्तरण पर सख्त पाबंदी है।· किसी जापानी ने अपना पंथ किसी कारणवश बदल लिया है तो उसे और साथ ही मतान्तरण कराने वाले को सख्त सजा दी जाती है।· यदि किसी विदेशी ने यह हरकत की होती है उसे सरकार कुछ ही घंटों में जापान छोड़कर चले जाने का सख्त आदेश देती है।· यहां तक कि जिन ईसाई मिशनरियों का हर जगह असर है, वे जापान में दिखाई नहीं देतीं।वेटिकन के पोप को दो बातों का बड़ा अफसोस होता है। एक तो यह कि वे 20वीं शताब्दी समाप्त होने के बावजूद भारत को यूनान की तरह ईसाई देश नहीं बना सके।दूसरा यह कि जापान में ईसाइयों की संख्या में वृध्दि नहीं हो सकी।·जापानी चंद सिक्कों के लालच में अपने पंथ का सौदा नहीं करते। बड़ी से बड़ी सुविधा का लालच दिया जाए तब भी वे अपने पंथ के साथ धोखा नहीं करते हैं जापान में 'पर्सनल ला' जैसा कोई शगूफा नहीं है। यदि कोई जापानी महिला किसी मुस्लिम से विवाह कर लेती है तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है।जापानियों को इसकी तनिक भी चिंता नहीं है कि कोई उनके बारे में क्या सोचता है।तोकियो विश्वविद्यालय के विदेशी अध्ययन विभाग के अध्यक्ष कोमिको यागी के अनुसार, इस्लाम के प्रति जापान में हमेशा यही मान्यता रही है कि वह एक संकीर्ण सोच का मजहब है।उसमें समन्वय की गुंजाइश नहीं है।स्वतंत्र पत्रकार मोहम्मद जुबेर ने 9/11 की घटना के पश्चात अनेक देशों की यात्रा की थी। वह जापान भी गए, लेकिन वहां जाकर उन्होंने देखा कि जापानियों को इस बात पर पूरा भरोसा है कि कोई आतंकवादी उनके यहां पर भी नहीं मार सकता। सन्दर्भ· जापान सम्बंधी इस चौंका देने वाली जानकारी के स्रोत हैं शरणार्थी मामले देखने वाली संस्था 'सॉलीडेरिटी नेटवर्क' के महासचिव जनरल मनामी यातु।मुजफ्फर हुसैन द्वारा लिखित लेख के कुछ मुख्य बिन्दु जो कि पांचजन्य, के 30 मई, 2010 के अंक से लिए गए हैं।

  53. October 7, 2010 at 9:58 am

    >अरे काहे का धर्म जिसमे जानवर ही जानवर हो भगवन के नाम पर ऐसे सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे धर्म नहीं रहने का तरीका बताया है , ऐसे इतिहास पढता हूँ तो बड़ा अफोसो है इनके बाप दादाओं पर बेचारे कितने मजबूर थे कमज़ोर थे अपना मंदिर टूटते हुए देखते रहे अकबर इनकी बेटी से शादी किया ये बेचारे ख़ुशी ख़ुशी देखते रहे जिस बाबर ने इनके मंदिरों को तोडा इनके काहे अनुसार उसी के पोते को अपनी बहन दिया इनाम में भाई इसे रख लो पर हमें न मारों वो आते रहे ये मरवाते रहे इनका खून कितने सालों तक पानी बना रहा जिसे किसी ने न पूजा उसे इन्होने सबसे बड़ा भगवान बना दिया लिंग को लगे पूजने क्यों ? नहीं पूजते ?जब पाकिस्तान बन ने के बाद इन्हों ने देखा अब तो ये थोड़े से है मारों इनको अपने बाप दादा का बदला लो तब से यही हो रहा है ऐसे कहानी बनाने में ये तो बहुत ही माहिर है यकीं नहीं तो रामायण महाभारत देख लो ये तो उन्ही की संतान है उस से दस कदम आगे ही रहेगी dabirnews.blogspot.com

  54. awyaleek said,

    October 7, 2010 at 2:24 pm

    >इस तरह हताशा-निराशा और डरी हुई बातें ना करो तौसीफ़ भाई…कौन मार रहा है तुमलोगों को…अभी भी तुम्हीं लोगों की चल रही है ना कि हमलोगों की..अभी भी हमलोगों के मंदिर के चढावे का एक बहुत बड़ा हिस्सा तुमलोगों पर ही खर्च होता है..एक अयोध्या का विवाद छोड़ दो तो और ऐसा कौन सा मस्जिद है जिसे तोड़ा गया है…बड़ा-बड़ा मस्जिद- मकबरा यहाँ तक कि ताजमहल भी हिन्दुओं का ही है उसे तो तुमलोगों से नहीं छीना गया है..यहाँ तक कि भारत की बर्बादी और पाकिस्तान की आबादी में तुमलोगों को जश्न मनाने की आजादी है इस देश में.. तुमलोगों को मारना होता तो उसी समय नहीं मार दिया गया होता जिस समय पाकिस्तान अलग हुआ था और मुसलमान लाखों निर्दोष नर हिन्दुओं को काट रहे थे और उनकी बहन-बेटियों को अपने हवस का शिकार बना रहे थे..अरे हिन्दु तो वो वीर है जो गौरी जैसे दुश्मन को भी १६ बार जीवन दान दे सकता है.भारत वो देश है जहाँ साँप को भी दूध पिलाया जाता है और उसकी पूजा की जाती है.. फ़िर तुमलोगों को कोई हिन्दु क्यों मारेगा…?तुमलोगों पर तो दया की जाती है क्योंकि तुमलोग हमारे वही हिन्दु भाई हो जिस पर विदेशियों ने अनगिणत जुल्म ढाए और मुसलमान बनने के लिए मजबूर कर दिया नहीं तो हिन्दु जैसे प्यारे धर्म को छोड़कर कोई भी डरावना धर्म इस्लाम को नहीं अपनाता है…रही बात लिंग पूजा करने की, तो पूजा-पाठ करना हिंदु धर्म नहीं है….और वैसे भी भगवान का ना कोई आकार होता है ना कोई रूप..वो तो अनन्त हैं ब्रह्माण्ड के कण-कण में व्याप्त हैं फ़िर कहीं भी किसी भी जगह उसे कोई भी आकार देकर किसी भी रूप में उन्हें अपना श्रद्धा-सुमन अर्पित कर दो क्या फ़र्क पड़ता है….. अपने सोच को थोड़ा फ़ैलाओ दोस्त……

  55. jyaniap said,

    October 8, 2010 at 5:55 am

    >SIR, i am very thankfull to you for providing us the link for high court judgment. all the persons should spare some hours to read the high court judgment before commenting on this issue. high court judgment may or may not be liked by some people but they have done a good job to collect all the relevant matter at one place. there cannot be any judgment better then this. a true Muslim who obeys Allah's words cannot perform namaz at that place. i pray all the Muslims to be wise and must accept the years old dispute between two communities and release their claim over the birth place or disputed site. but i donot think that the vested interest will ever happen this.may Ram and Rahim help both the communities to find some solution.

  56. October 8, 2010 at 7:26 am

    >जब कोई रूप नहीं तो ये जो पूरे हिंदुस्तान में नौटंकी फैला रखा है मूर्ति बना के वोह क्या है और तुम लोगो ने मेरे एक सवाल का जवाब नहीं दिया बस अपनी बके जा रहे हो जहाँ देखो गली मोहल्ले कूड़े पर भी तुम्हारा मंदिर यहाँ भगवन ऐसे मिलते हैं जैसे दिल्ली में भिखारी

  57. October 8, 2010 at 7:28 am

    >http://satishchandgupta.blogspot.com/ये ब्लॉग पढ़ लेना सारी गलत फहमी दूर हो जाएगी

  58. Yogesh said,

    October 10, 2010 at 10:55 am

    >सबसे पहले कोई ये साबित करे की विवादित स्थान पे जो इमारत (ढांचा) है वो किसी भी सूरत मे मशीद जैसे लगती हैं या नहीं. वैदिक स्थापत्य शास्त्र के अनुसार तीन घुमट वाली कोई भी इमारत मंदिर या मंदिरनुमा महल हो सकती है और कुछ नही.भारत के सभी पुराने इमारतों का अगर निरिक्षण किया जाये तो पता चलेगा क़ि ये सब तो मंदिर या तो मंदिर नुमा महल ही हैं जो हिन्दुओने ही बनाये हैं. बादमे इस्लाम आक्रामको ने उन्हें जबरन हासिल करके मशीद या कबरोमे परवर्तित किया. ऐसे करते वक़्त उन्होंने मूल ढांचा वैसे ही रख के बाहर से दिखाऊ तौर पर हच बदलाव किये. ये लोग आक्रमण करके भारत को लूटने आये थे. कोई भव्य मशीद जैसी इमारत बाँधने नहीं आये थे. ना ही उनमे इतनी योग्यता थी क़ि वोह ऐसी इमारतोंका निर्माण करे. ऐसी इमारतों का निर्माण करने के लिए स्थापत्य शास्त्र, वास्तुशास्त्र, कला ,गणित आदि का ज्ञान होना बहुत जरूरी हैं. जब क़ि ये सब लोग आक्रामक, बर्बर, लूटेरु थे. जो अरबिया और अफगानिस्थान जैसे प्रदेशोंसे आये थे. इन लोगोने ऐसी इमरतोंका जबरन कब्ज़ा किया (अवैध). तो यह हमारा मुलभूत हक़ बनता है क़ि हम हमारी वास्तु वापस ले. हिन्दुओ का ये कह बनता है और यही गीता में भी लिखा हैं.

  59. awyaleek said,

    October 11, 2010 at 2:27 pm

    >पता नहीं हिंदु मुसलमान को मिलाना क्यों नहीं चाहते हैं,उसे अछूत क्यों मानते हैं..! जब कभी भी मुसलमानों ने या ईसाइयों ने हिंदु बनना चाहा तो हिंदुओं ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया..आज लाखों कश्मीरी पंडित अपने पूर्वजों की गलती की सजा भुगत रहे हैं..देश स्वतंत्र होने के बाद जब कश्मीर के लोग जो जबरन मुसलमान बनाए गए थे वापस हिंदु बनकर अपने पूर्वजों के साथ मिलना चाह रहे थे तो राजा हरि सिंह ने बहुत बड़े यज्य का आयोजन करवाया ताकि एक साथ सब यज्य में आहुति देकर हिंदु बन सकें लेकिन काशी के पंडितों ने इसके विरोध में झेलम नदी में जाकर आत्म-हत्या कर ली..विवश होकर हरि सिंह को वह सामूहिक अनुष्ठान रोकना पड़ा और वहाँ के मुसलमान हिंदु नहीं बन पाए,जिसका परिणाम ये निकला कि कुछ दिनों बाद जब कश्मीर में दंगा हुआ तो वहाँ के मुसलमानों ने इतनी संख्या में हिंदुओं को काटा जिसका सँख्या से अनुमान लगाना भी कठिन है..उनलोगों के जनेऊ को जब इकट्ठा किया गया तो उसका वजन करीब तीन मन से भी ज्यादा था..वही मुसलमान जो कभी हिंदु बनना चाह रहे थे सब-कुछ भूल कर इस तरह से हिन्दुओं का खून बहाया…सतीश गुप्ता भी कुछ उसी तरह के लोगों में से हैं जो नहीं चाहते कि कभी मुसलमान हिंदु धर्म को अपनाए…सत्यार्थ-प्रकाश की समीक्षा के नाम पर सिर्फ़ मुसलमान और कुराण की बड़ाई तथा हिंदु मान्यताओं की बुराई ही की है उन्होंने..उनके तर्क को पढ़कर कोई भी आसानी से समझ सकता है कि या तो ये व्यक्ति अल्प-बुद्धि वाला है या फ़िर मुसलमानों को खुश करने के लिए इस तरह के तर्क दे रहे हैं…ये ठीक उसी तरह से है जैसे कोई धनी व्यक्ति गरीब व्यक्ति को गरीबी की झूठी-मूठी बड़ाई करके तथा अमीरी की बुराई करके उसे तसल्ली दे देता है ताकि वो गरीब व्यक्ति उस अमीर व्यक्ति से धन की माँग ना कर ले या वो कभी धनी बनने के बारे में सोचे भी…धनी हमेशा यही सोचते हैं कि सिर्फ़ वो ही धनी बना रहे बाँकि सब गरीब ताकि अमीर का महत्त्व बना रहे घटे नहीं पर वो ये नहीं सोचते कि यही गरीब व्यक्ति चोर-लूटेरा बन कर उसे लूट भी सकता है…यही स्थिति तो अभी भी है..अगर ऐसे ही हिंदुओं का बर्त्ताव रहा तो मुसलमान हिंदु बन नहीं पाएँगे और हिंदुओं को बिना किसी कारण के मारते-काटते रहेंगे….इन्होंने हिंदु धर्म की बुराई भी की है तो सत्यार्थ-प्रकाश के बल पर जिस सत्यार्थ-प्रकाश को ना तो कोई हिंदु पढ़ता-समझता है ना ही इसे उतना महत्त्व ही देता है बल्कि आजादी के पहले तो हिंदुओं और आर्य-समाजियों के बीच दंगे भी हो चुके हैं….

  60. October 12, 2010 at 7:00 am

    >यहाँ बे सर पैर की टिपण्णी देने वाले IMPACT और काशिफ आरिफ सरीख फर्जी मुसलमानों के नाम सन्देश !)) إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَالَّذِينَ هَادُوا وَالنَّصَارَى وَالصَّابِئِينَ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ وَعَمِلَ صَالِحاً فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَلا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلا هُمْ يَحْزَنُونَ ) (( البقرة: 62("निसन्देह जो मुसलमान हो, यहूदी हो, ईसाई हो या साबी हो,आग के पुजारी और मूर्तिपूजक, जो कोई भी अन्तिम दिन पर ईमान लायेगा और अच्छे काम करेगा, उसका बदला उसके पालनहार के पास है, और उन को न कोई डर है और न कोई गम होगा।" (सूरतुल बक़रा : 62)मुसलमान का मतलब होता है मुकम्मल ईमान वाला होना ! सिर्फ कुरआन का पाठ कर लेने से कोई मुसलमान नहीं बन जाता, और कुरआन को पढ़ कर भी उसे न मानने वाला काफिर है और बस वही काफिर है न की दूसरे दीन को मानने वाला ! इस हिसाब से देखे तो इस देश के ज़्यादातर मुल्ले काफिर ही है, और इस्लाम के नाम पर सिर्फ भ्रम फैलाते है !!बाबर के बनाए को मज्जिद कहने वाला काफिर है उसकी सोच हराम है उसे क़यामत के दिन दोज़ख की आग नसीब होगी क्युकी उसका ईमान ही मुकम्मल नहीं है !एक बात और है -तुमने कहा था मुसलमान हिन्दू के साथ नहीं रह सकते ,और तुमने पाकिस्तान बना लिया , तो अब किस मूह से और कौन सा हक मांगते हो??? जाओ पहले पाकिस्तान वापस ले आओ !!!

  61. awyaleek said,

    October 12, 2010 at 2:42 pm

    >ये बात तो है कि १५% मुसलमानों को ३३% भूमि दी गई..यानि जरुरत से ज्यादा उसके बाद हिंदुओं को भी सारा हिस्सा मार लेना चाहते हैं..भारत में हिंदु से ज्यादा अधिकार और सुविधाएँ इन्हें दी जाती है भले ही वो वोट की राजनीति के लिए हो पर हिंदु अपना आधा से ज्यादा हिस्सा इन्हें देते हैं फ़िर भी इनका मन नहीं भरता..ये तो पूरा हड़पना चाहते हैं…मुसलमानों को विकास करने के लिए पाकिस्तान बनाया गया..इसके अलावे मुसलमान धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए तथा उसके फ़लने-फ़ूलने के लिए अरब,इरान,इराक,मलेशिया जैसे कई देश हैं पर हिंदुओं के लिए…..!!हिंदुओं के लिए तो सिर्फ़ ये भारत ही ना….और भारत में भी हिंदु धर्म पर इस तरह प्रहार कर रहे हैं ये लोग…अगर में भी हिंदुओं का अद्वितीय एतिहासिक धार्मिक मंदिर इस तरह से तोड़कर मंदिर बनाया जाएगा तो कहाँ जाएँगे हिंदु…..!!! अंत में एक ही बात कहूँगा कि हिरण झुण्ड में रहना पसन्द करती है अपनी रक्षा के लिए परंतु शेर को किसी झुण्ड की आवश्यकता नहीं होती..वो तो अकेला ही हजारों की संख्या वाले जानवरों के झुण्ड के लिए काफ़ी है इसलिए तो जंगल में अकेला रहना पसंद करता है…..और सबसे उपर कही बात के लिए एक उदाहरण देना चाहूँगा – गुजरात के बाद सबसे ज्यादा विकास की राह पर अग्रसर राज्य बिहार,यहाँ की स्थिति ऐसी है कि अगर सरकारी योजना के अन्तर्गत १०० घर गरीबों के लिए आते हैं तो उसमें ९० घर अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित होते हैं…यानि गरीबों में भी भेद-भाव…ये भाव तो नीतिश जी ही जानें….सत्ता में आते ही उन्होंने २० साल पुराना दंगा वाला केस खोला और ५ हिंदुओं को फ़ाँसी की सजा सुनाई..कोई बात नहीं,यहाँ तक तो सब ठीक है हो सकता है वो पाँचों वास्तव में दोषी हों पर उसके बाद जो उन्होंने मृतकों में भेदभाव किया वो मेरी समझ में नहीं आया…मुसलमान पीड़ितों को लाखों रुपए की स्संत्त्वना राशि पर हिंदुओं को कुछ भी नहीं….शायद हिंदुओं को दर्द नहीं होता है….सबसे बड़ी बात ये कि वो दंगा मुसलमानों के द्वारा ही भड़काई गयी थी…..इनसबके बावजूद मुसलमानों का रोना देख लिजिए…………………..

  62. Anonymous said,

    October 13, 2010 at 7:55 pm

    >सुरेश भाऊसिर्फ़ एक जानकारी दे दूँ कि चार- पाँच दिन पहले आपका यह लेख जे.एन. यू. के मेस में पर्चों की शक्ल में बाँटा गया। पर्चे जिन छात्रों के नाम से थे उन्होनें कहीं भी लेखक के तौर पर आपका नाम नही दिया, बल्कि लेख्क के तौर पर उनके नाम थे। और हाँ आपके ब्लाग का भी लिंक नही था।

  63. January 7, 2011 at 11:58 am

    >agar yahan par sabhi vibhishan hai to kya hum "raavan " hai aur agar hum " raavan hai to phir is kalyug me "RAM" kaun hai …….shayad hindu apna swabhimaan bhool chuke hai……unhe yaad dilana hoga ki sher chahe kitna hi "bhedo " jhund me rahle " WO AKHIR SHER HI HOTA HAI"…………SURYAPRATAP


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