>आखिर लगभग सफल हो गया – तारकेश्वर गिरी.

>आखिर लगभग सफल हो ही गया कॉमन वेल्थ गेम। और हो भी क्यों नहीं, दिल्ली और आस-पास कि जनता ने पूरा सहयोग जो किया हैं।

वैसे हमारी दिल्ली के नेता और अधिकारीयों ने अपने बच्चो कि सात पीढ़ी कि पूरा इंतजाम भी कर लिया हैं। लेकिन ये मेरा भारत देश हैं तो महान

आने वाली पीढ़ी घुस खोर बने या न बने मगर खिलाडी जरुर बनेगी क्योंकि हमारे देश के वर्तमान खिलाडियों ने पुरे देश कि आने वाली पीढ़ी को ये दिखा दिया हैं कि हम भी किसी से कम नहीं हैं।

6 Comments

  1. October 11, 2010 at 7:07 am

    >@ गिरिजी,बहुत बल्लियाँ उछल रहे हो…?? आने वाली पीड़ी "खिलाडी" क्या ख़ाक बनेगी जब उन्हें "हेल्थ सप्लीमेंट" ही नहीं मिलेगा.. "80000 करोड़ खर्च होंगाये इन खेलों में, भारत जैसे तथाकथित विकासशील देश में जहाँ आंकड़ों की बाजीगरी के द्वारा विकास किया जाता है वहां राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन की बात सोचना ही एक क्रूर मजाक करने के समान है, क्योंकि आज भी भारत के 60 फीसदी लोग प्रतिदिन दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए संघर्ष करने पर भी आधे पेट पानी पीकर सोकर मजबूर हैं। शुतुरमुर्ग की तरह रेत के ढेर में मुँह छिपाने से क्या सच को हम बदल सकते हैं? भारत के क्या हालत हैं, क्या यह दुनिया से छुपा है? ये तो कुछ भी नहीं आगे आने 10 सालों तक भारतीय नागरिकों को ऐसे – ऐसे टैक्स चुकाने पड़ेंगे की पूछिये मत " खाने का टैक्स, मू@ने का टैक्स, बीमारी का टैक्स..और भी है..==चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोय..दो पाटन (महंगाई और टैक्स) के बीच में साबुत बचा न कोय..!!— दो दिन की चांदी फिर अँधेरी काली रात…

  2. October 11, 2010 at 7:08 am

    >@ गिरिजी,बहुत बल्लियाँ उछल रहे हो…?? आने वाली पीड़ी "खिलाडी" क्या ख़ाक बनेगी जब उन्हें "हेल्थ सप्लीमेंट" ही नहीं मिलेगा.. "80000 करोड़ खर्च होंगाये इन खेलों में, भारत जैसे तथाकथित विकासशील देश में जहाँ आंकड़ों की बाजीगरी के द्वारा विकास किया जाता है वहां राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन की बात सोचना ही एक क्रूर मजाक करने के समान है, क्योंकि आज भी भारत के 60 फीसदी लोग प्रतिदिन दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए संघर्ष करने पर भी आधे पेट पानी पीकर सोकर मजबूर हैं। शुतुरमुर्ग की तरह रेत के ढेर में मुँह छिपाने से क्या सच को हम बदल सकते हैं? भारत के क्या हालत हैं, क्या यह दुनिया से छुपा है? ये तो कुछ भी नहीं आगे आने 10 सालों तक भारतीय नागरिकों को ऐसे – ऐसे टैक्स चुकाने पड़ेंगे की पूछिये मत " खाने का टैक्स, मू@ने का टैक्स, बीमारी का टैक्स..और भी है..==चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोय..दो पाटन (महंगाई और टैक्स) के बीच में साबुत बचा न कोय..!!— दो दिन की चांदी फिर अँधेरी काली रात…

  3. October 11, 2010 at 7:10 am

    >Are Sriman Hindutwa ji itna gussa kyon dikha rahen hain,

  4. October 11, 2010 at 7:14 am

    >@ गिरिजी, गुस्सा तो यहाँ भी है.. देख लीजिये,,http://taarkeshwargiri.blogspot.com/2010/10/blog-post.html

  5. Mahak said,

    October 11, 2010 at 3:43 pm

    >80000 करोड़ खर्च होंगाये इन खेलों में, भारत जैसे तथाकथित विकासशील देश में जहाँ आंकड़ों की बाजीगरी के द्वारा विकास किया जाता है वहां राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन की बात सोचना ही एक क्रूर मजाक करने के समान है, क्योंकि आज भी भारत के 60 फीसदी लोग प्रतिदिन दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए संघर्ष करने पर भी आधे पेट पानी पीकर सोकर मजबूर हैं। शुतुरमुर्ग की तरह रेत के ढेर में मुँह छिपाने से क्या सच को हम बदल सकते हैं? भारत के क्या हालत हैं, क्या यह दुनिया से छुपा है? राजेन्द्र जी की इन बातों से असहमत नहीं हुआ जा सकता ,हमें पहले अपने देश के 60 फीसदी लोगों को उपर उठाना चाहिए ,उसके बाद ही इन खेलों पर इतना भारी-भरकम राशि खर्च की जाए महक

  6. October 12, 2010 at 12:10 pm

    >main bhi sahmat hun Rajendr ji ki baaton se …


Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: