>JANOKTI : जनोक्ति

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JANOKTI : जनोक्ति


हम किस पर गर्व करते हैं ?

Posted: 20 Oct 2010 03:10 AM PDT

“हमें गर्व है कि हम भारतीय हैं”, ‘क्यों भाई तुम्हें किस बात का गर्व है’ ? जरा हमें भी तो बताओ ।  हम भी जानें आपने अपना “गर्व” किस मापक से मापा है ? भारत के धर्म-संस्कृति, सभ्यता- संस्कार, भाषा-साहित्य,इतिहास व प्रतीक पुरुषों पर तुम्हें विश्वास नहीं है तो गर्व कैसे होगा   ?
क्षमा करना ये प्रश्न केवल उन लोगों से है जिन्हें भारत के धर्म-संस्कृति, सभ्यता- संस्कार, भाषा-साहित्य, कुछ भी श्रेष्ठ नहीं दीखता , फिर भी जोर-शोर से कहते हैं “हमें गर्व है कि हम भारतीय हैं”।
नेताओं जैसे बड़े-बड़े बुद्धिजीवी दावा करते थकते नहीं हैं। ” गर्व से कहो हम भारतीय हैं”।  इनसे कहो न की संसार के “सर्वश्रेष्ठ  ग्रन्थ वेद और सर्वश्रेष्ठ भाषा संस्कृत”, भारत के हैं तो इन्हें अच्छा नहीं लगता ।
तो सवाल बनता है  न ! “कि किस बात का गर्व है”?  इसलिए बताओ तो जरा ! किसी भी देश के नागरिक को उस देश का नागरिक होने पर किस लिए गर्व होता है ? भारतीयों के उपरोक्त मूल्यों पर अगर आस्था नहीं है तो आपकी देशभक्ति का दावा संदिग्ध है । चाहे आप किसी पूजा-पद्दति को अपनाते हैं पर अपने आध्यात्मिक-ऐतिहासिक-सांस्कृतिक-भाषा-साहित्य के मूल्यों पर आपको गर्व नहीं है तो भारत पर गर्व करने के लिए क्या है ।

आसमां के पार

Posted: 19 Oct 2010 06:44 PM PDT

आसमां के पार भी
एक जहां है
जहां नही है प्रेम पर
पहरेदारी
उन्मुक्त पवन है चलती
किसी ने नहीं किया है
प्रदूषित अपने
उत्पाद से
स्वच्छा नदियाँ हिलोरें
मारती, कलकल ध्वनि से
मुखरित सदा बहती
किसी ने बांधा नहीं
है बांधो से
परिंदों को मिला है
मुक्ताकाश उड़ने के लिए
पिंजरा बना नहीं अभी
उस जहां में
पेड़-पौधों को नहीं है डर
कट जाने का
क्योंकि वहाँ महामानव
नहीं अभी आदिमानव
है बसते
उनका सभ्य जगत
में पदार्पण होना

ये सियासत ही है

Posted: 19 Oct 2010 06:35 PM PDT

क्या यह वही आपत्तिकालीन समय है, जिसमें आपत्ति धर्म का अर्थ है-सामान्य सुख-सुविधाओं की बात ताक पर रख देना और वह करने में जुट जाना जिसके लिए मनुष्य की गरिमा भरी अंतरात्मा पुकारती है। आजकल बिहार मे चुनावी माहौल को देखते हुए तो ऐसा ही लग रहा है । हर एक नेता या फिर नेता बनने की भूख से पीडित हर एक सख्स आज अपनी अंतरात्मा की दुहाई देता लोगों से मिल रहा है । पहले चरण के लिए चुनाव प्रचार समाप्त हो चुका है, और प्रचार के दौरान हर वो प्रपंच देखने को मिला जिसमे ज्यादा से ज्यादा आम जनता को बेवकूफ बनाया जा सके ।

ये सियासत ही है जिसमें निकृष्ट चिंतन एवं घृणित कर्तृत्व हमारी गौरव गरिमा को बढाते है। यहां हम किसी को कुछ भी कह सकते और फिर अपने कहे पर अडिग रह्ने के लिए और भी कुछ कहने को प्रेरित रहते है । क्या प्रधानमंत्री और क्या मुख्यमंत्री या फिर क्या और बडे नेता सभी एक ही पानी से धुले हुए दिखते है । इस चुनाव प्रचार मे गरीबों के मसीहा बनने का दावा करने वाले कुछ नेताओं या फिर ये भी कह ले कि ज्यादातर नेताओं के प्रचार करने का तरीका बडा ही भव्य दिखा । हो भी क्यूं नही आखिर वे गरीबी, बेकारी, लाचारी जैसे विध्वंसक मापदंडो से आम जनता को आजादी दिलवाने का जो प्रयास कर रहे हैं ।

चुनाव का बिगुल बजते ही नेतागण अपने पूरे शबाब मे नजर आने लगे और एक दूसरे पर थूका-थाकी की झडी लगा दी । और ऐसा हो भी क्यूं न ! चुनाव मे अपनी पूरी ताकत झोंकने का ये सबसे शानदार तरीका जो है । सभी बडी पार्टीयां अपने स्टार प्रचारकों के जरिये बिहार का अपने-अपने तरीके बखान करवाने मे आगे दिख रही हैं । कभी कोई फिल्म स्टार आता है, तो कभी कोई क्रिकेटर से नेता बने प्रचारक आते हैं । ये सभी उस जनता के बीच जाकर अपनी डफली बजाना शुरू करते है जिनके किसी भी सुख-दुख से न तो उनका पहले कोई लेना-देना था और न भविष्य मे कभी कोई मतलब रहेगा ।

मगर आज जो सबसे अहम बात है वो ये है कि हम जनता अपना मूल्य समझे और विश्वास करें कि हम संसार के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है और हमारा महत्वपूर्ण वोट उस योग्य उम्मीदवार को मिले जो हमारी योग्यता को निखार सके । इस पांच साल से पहले के जो पंद्र्ह साल थे वो बिहार के लिये क्या थे, ये कोई आज उस बिहारी से जा कर पूछे जिसकी उम्र के वो पंद्र्ह महत्वपूर्ण वर्ष बेकार मे निकल गये । आज बहुत से बडे नेता ये चिल्लाते फिर रहे हैं कि बिहार मे विकास के नाम पर कुछ भी नही हुआ है , चलिये कुछ न भी हुआ तो पांच साल मे ही न ….पहले के पंद्रह वर्ष और उसके पहले के बाकी वर्षों मे क्या बिहार की कायापलट हो चुकी थी ?

आज कोई परिवर्तन के लिए वोट मांग रहा है तो कोई नया बिहार बनाने की बात कर रहा है । कुल मिलाकर सपनो का बाजार गर्म है, पर आम जनता को वहां भी महंगाई के मार के अलावा और कुछ नही दिख रहा है । ये पब्लिक है और ये सब जानती है कि कैसे चौदह रूपये किलो बिकने वाली चीनी आज मजे से तीस रूपये मे बिक कर गरीबों का मुंह फिका कर चुकी है । आम आदमी के हाथ को मजबूत करने की चाह रखने वाली पार्टियां आज आम आदमी के हाथों को तोड उसपर प्लास्टर चढा कर उसे कांक्रिट जितना मजबूत बनाने को प्रयासरत है । तो गरीबों के हाकिम बनने वाली पार्टियां अपने चुनाव मे अरबों फूंकने को बेताब है । हेलिकाप्टर से उतरा ही नही जाता है , क्या करे अभी गरीबों से नही मिले तो महाप्रलय न आ जाये इस संसार मे ..।

ध्यान दे अभी कुछ ही समय पहले महिला आरक्षण के विरोध मे संसद बडी-बडी बातों को कहने वाले भद्रजनों की पार्टियां कितने महिलाओं को आगे ला रही है ? आम जनता आज हर उस बयानबाजी को समझ रही है जिसे शायद उसे देने वाले नही समझ रहे हैं । सत्ता की लोलुपता इस कदर इनके मन-मंदिर को श्मशान बनाने पर तुली हुई है कि सत्प्रयत्न की इच्छा अब इन नेताओं मे कही से भी बची हुई नही दिख रही है । अभी कुछ ही दिनो पहले हमारे बिहार विधानसभा को अखाडा बना दिया गया था । क्या इन बातों को बिहार की जनता इतनी जल्दी भूला देगी ? शायद नही …. लेकिन अगर बिहार की जनता इसे भुलाने की भूल करगी तो फिर आने वाले पांच साल उन्हे इसके गंभीर परिणाम के लिए भी तैयार रहना होगा ।

शराबी युवा कैसे देंगे चीन और अमेरिका को टक्कर ?

Posted: 19 Oct 2010 03:19 PM PDT

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,

आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,

आजकल के युवा, महाकवि हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला की इन पंक्तियों को मूर्त रूप देने में जुटे हुए हैं ये बात हम नहीं बल्कि एसोचैम द्वारा किए गए के सर्वे से साफ हुई है.

यूथ कल पर कुछ नहीं छोड़ना चाहता सब कुछ आज ही कर लेना चाहता है. मेट्रो शहरों के बारहवीं में पढ़ने वाले 45 पर्सेंट बच्चे महीने में कम से कम पांच से छह बार शराब पीते हैं. और तो और रहे पिछले 10 साल में टीनेजर्स के बीच शराब की खपत दोगुनी हो गई है.

टीनेजर्स में शराब का चलन सबसे ज्यादा दिल्ली और एनसीआर में है. इसके बाद मुंबई का नंबर है. एक स्टूडेंट साढ़े तीन से चार हजार रुपए शराब पर खर्च करता है. जबकि इतनी रकम वे सॉफ्ट ड्रिंक , चाय , दूध , जूस , कॉफी , मूवी टिकट और किताबों पर नहीं खर्च करते. 70 पर्सेंट टीनेजर्स फेयरवेल , न्यू ईयर , क्रिसमस , वैलंटाइन डे , बर्थडे और दूसरे अवसरों पर शराब पीते हैं। सर्वे के मुताबिक , एक तिहाई टीनेजर्स ने कॉलेज पहुंचने से पहले शराब पी ली थी , जबकि 16 पर्सेंट टीनेजर्स ने 15 साल से पहले ही हाला यानी शराब से दोस्ती कर ली थी.

ज्यादातर टीनेजर्स ने पहली बार शराब दोस्तों के साथ पी थी. इस मामले में लड़कियां भी पीछे नहीं हैं वो भी लड़कों को पूरी टक्कर दे रही हैं. लड़कियों में 40 पर्सेंट ने 15 साल से 17 साल की उम्र में पहली बार शराब पी थी. जिन लड़कियों को अल्कोहल का स्वाद पसंद नहीं , वे फ्रूट फ्लेवर्ड शराब पीती हैं.

आपने फीचर फिल्म कुली में आशा भोसले और शब्बीर कुमार को गाते हुए सुना होगा ….मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूं गम भूलाने को.. ये फ़िल्मी गाना है लेकिन आजकल की युवा पीड़ी इसे सच साबित करने में दिन रात जुटी हुई है मजेदार बात है ज्यादातर टीनेजर शराब को टेंशन खत्म करने के लिए पीते हैं.

पर सवाल यह है कि क्या शराब हकीकत में टेंशन दूर भगाती है? आखिर युवा पीढ़ी में इतना दबाव क्यों है जो वो ऐसे रास्ते खोज रही है? इसके लिए कौन से बदलाव जिम्मेदार हैं? क्या हम युवा पीढ़ी को चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार नहीं कर पाए हैं? अगर नहीं तो उसे इसके लिए कैसे तैयार किया जाए? क्या युवा पीढ़ी सही दिशा में बढ रही है? या उन्हें सही दिशा में लाने के प्रयास होने चाहिए.

ये वो सवाल हैं जिनका जवाब समय रहते खोजना ज़रूरी है नहीं तो समाज के मूलभूत ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है. जिस यूथ के दम पर हम अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों से टक्कर लेने का सुंदर सपना सजा रहे हैं अगर हमारा वही यूथ नशे में डूबा होगा तो हम उनसे कैसे मुकाबला करेंगे.

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