>विदेशी पैसों पर पल रहे सेकुलर-वामपंथी बुद्धिजीवियों का एक और प्रपंच :- "कारवाँ टू फ़िलीस्तीन"… Gaza, Israel, Indian Secularism, Kashmir

>जैसा कि अब सभी जान चुके हैं, भारत में सेकुलरों और मानवाधिकारवादियों की एक विशिष्ट जमात है, जिन्हें मुस्लिमों का विरोध करने वाला व्यक्ति अथवा देश हमेशा से “साम्प्रदायिक” और “फ़ासीवादी” नज़र आते हैं, जबकि इन्हीं सेकुलरों को सभी आतंकवादी “मानवता के मसीहा” और “मासूमियत के पुतले नज़र आते हैं। कुछ ऐसे ही ढोंगी और नकली सेकुलरों द्वारा इज़राइल की गाज़ा पट्टी नीतियों के खिलाफ़ भारत से फ़िलीस्तीन तक रैली निकालने की योजना है। 17 एशियाई देशों के “जमूरे” दिसम्बर 2010 में फ़िलीस्तीन की गाज़ा पट्टी  में एकत्रित होंगे।

इज़राइल के ज़ुल्मों(?) से त्रस्त और अमेरिका के पक्षपात(?) से ग्रस्त “मासूम” फ़िलीस्तीनियों के साथ एकजुटता दिखाने के लिये इस कारवां का आयोजन रखा गया है। गाज़ा पट्टी में इज़राइल ने जो नाकेबन्दी कर रखी है, उसके विरोध में यह लोग 2 दिसम्बर से 26 दिसम्बर तक भारत, पाकिस्तान, ईरान, जोर्डन, सीरिया, लेबनान और तुर्की होते हुए गाज़ा पट्टी पहुँचेंगे और इज़राइल का विरोध करेंगे। इस दौरान ये सभी लोग प्रेस कांफ़्रेंस करेंगे, विभिन्न राजनैतिक व्यक्तित्वों से मिलेंगे, रोड शो करेंगे और भी तमाम नौटंकियाँ करेंगे…

इस “कारवाँ टू फ़िलीस्तीन” कार्यक्रम को अब तक भारत से 51 संगठनों और कुछ “छँटे हुए” सेकुलरों का समर्थन हासिल हो चुका है जो इनके साथ जायेंगे। इनकी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि ये लोग सताये हुए फ़िलीस्तीनियों के लिये नैतिक समर्थन के साथ-साथ, आर्थिक, कूटनीतिक और “सैनिक”(?) समर्थन के लिये प्रयास करेंगे। हालांकि फ़िलहाल इन्होंने अपने कारवां के अन्तिम चरण की घोषणा नहीं की है कि ये किस बन्दरगाह से गाज़ा की ओर कूच करेंगे, क्योंकि इन्हें आशंका है कि इज़राइल उन्हें वहीं पर जबरन रोक सकता है। इज़राइल ने फ़िलीस्तीन में जिस प्रकार का “जातीय सफ़ाया अभियान” चला रखा है उसे देखते हुए स्थिति बहुत नाज़ुक है… (“जातीय सफ़ाया”, यह शब्द सेकुलरों को बहुत प्रिय है, लेकिन सिर्फ़ मासूम मुस्लिमों के लिये, यह शब्द कश्मीर, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि में हिन्दुओं के लिये उपयोग करना वर्जित है)। एक अन्य सेकुलर गौतम मोदी कहते हैं कि “इस अभियान के लिये पैसों का प्रबन्ध कोई बड़ी समस्या नहीं है…” (होगी भी कैसे, जब खाड़ी से और मानवाधिकार संगठनों से भारी पैसा मिला हो)। आगे कहते हैं, “इस गाज़ा कारवां  में प्रति व्यक्ति 40,000 रुपये खर्च आयेगा” और जो विभिन्न संगठन इस कारवां को “प्रायोजित” कर रहे हैं वे यह खर्च उठायेंगे… (सेकुलरिज़्म की तरह का एक और सफ़ेद झूठ… लगभग एक माह का समय और 5-6 देशों से गुज़रने वाले कारवां में प्रति व्यक्ति खर्च सिर्फ़ 40,000 ???)। कुछ ऐसे ही “अज्ञात विदेशी प्रायोजक” अरुंधती रॉय  और गिलानी जैसे देशद्रोहियों की प्रेस कांफ़्रेंस दिल्ली में करवाते हैं, और “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता”(?) के नाम पर भारत जैसे पिलपिले नेताओं से भरे देश में सरेआम केन्द्र सरकार को चाँटे मारकर चलते बनते हैं। वामपंथ और कट्टर इस्लाम हाथ में हाथ मिलाकर चल रहे हैं यह बात अब तेजी से उजागर होती जा रही है। वह तो भला हो कुछ वीर पुरुषों का, जो कभी संसद हमले के आरोपी जिलानी के मुँह पर थूकते हैं और कभी गिलानी पर जूता फ़ेंकते हैं, वरना अधिसंख्य हिन्दू तो कब के “गाँधीवादी नपुंसकता” के शिकार हो चुके हैं।

कारवाँ-ए-फ़िलीस्तीन के समर्थक, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना अब्दुल वहाब खिलजी कहते हैं कि “भारत के लोग फ़िलीस्तीन की आज़ादी के पक्ष में हैं और उनके संघर्ष के साथ हैं…” (इन मौलाना साहब की हिम्मत नहीं है कि कश्मीर जाकर अब्दुल गनी लोन और यासीन मलिक से कह सकें कि पंडितों को ससम्मान वापस बुलाओ और उनका जो माल लूटा है उसे वापस करो, अलगाववादी राग अलापना बन्द करो)। फ़िलीस्तीन जा रहे पाखण्डी कारवां में से एक की भी हिम्मत नहीं है कि पाकिस्तान के कबीलाई इलाके में जाकर वहाँ दर-दर की ठोकरें खा रहे प्रताड़ित हिन्दुओं के पक्ष में बोलें। सिमी के शाहनवाज़ अली रेहान और “सामाजिक कार्यकर्ता”(?) संदीप पाण्डे ने इस कारवां को अपना नैतिक समर्थन दिया है, ये दोनों ही बांग्लादेश और मलेशिया जाकर यह कहने का जिगर नहीं रखते कि “वहाँ हिन्दुओं पर जो अत्याचार हो रहा है उसे बन्द करो…”।

“गाज़ा कारवां” चलाने वाले फ़र्जी लोग इस बात से परेशान हैं कि रक्षा क्षेत्र में भारत की इज़राइल से नज़दीकियाँ क्यों बढ़ रही हैं (क्या ये चाहते हैं कि हम चीन पर निर्भर हों? या फ़िर सऊदी अरब जैसे देशों से मित्रता बढ़ायें जो खुद अपनी रक्षा अमेरिकी सेनाओं से करवाता है?)। 26/11 हमले के बाद ताज समूह ने अपने सुरक्षाकर्मियों को प्रशिक्षण के लिये इज़राइल भेजा, तो सेकुलर्स दुखी हो जाते हैं, भारत ने इज़राइल से आधुनिक विमान खरीद लिये, तो सेकुलर्स कपड़े फ़ाड़ने लगते हैं। मुस्लिम पोलिटिकल काउंसिल के डॉ तसलीम रहमानी ने कहा – “हमें फ़िलीस्तीनियों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करना चाहिये और उनके साथ खड़े होना चाहिये…” (यानी भारत की तमाम समस्याएं खत्म हो चुकी हैं… चलो विदेश में टाँग अड़ाई जाये?)।

गाज़ा कारवां के “झुण्ड” मे कई सेकुलर हस्तियाँ और संगठन शामिल हैं जिनमें से कुछ नाम बड़े दिलचस्प हैं जैसे –

“अमन भारत”

“आशा फ़ाउण्डेशन”

“अयोध्या की आवाज़”(इनका फ़िलीस्तीन में क्या काम?)

“बांग्ला मानवाधिकार मंच” (पश्चिम बंगाल में मानवाधिकार हनन नहीं होता क्या? जो फ़िलीस्तीन जा रहे हो…)

“छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा” (नक्सली समस्या खत्म हो गई क्या?)

“इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन” (मजदूरों के लिये लड़ने वाले फ़िलीस्तीन में काहे टाँग फ़ँसा रहे हैं?)

“जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द” (हाँ… ये तो जायेंगे ही)

“तीसरा स्वाधीनता आंदोलन” (फ़िलीस्तीन में जाकर?)

“ऑल इंडिया मजलिस-ए-मुशवारत” (हाँ… ये भी जरुर जायेंगे)

अब कुछ “छँटे हुए” लोगों के नाम भी देख लीजिये जो इस कारवां में शामिल हैं –

आनन्द पटवर्धन, एहतिशाम अंसारी, जावेद नकवी, सन्दीप पाण्डे (इनमें से कोई भी सज्जन गोधरा ट्रेन हादसे के बाद कारवां लेकर गुजरात नहीं गया)

सईदा हमीद, थॉमस मैथ्यू (जब ईसाई प्रोफ़ेसर का हाथ कट्टर मुस्लिमों द्वारा काटा गया, तब ये सज्जन कारवां लेकर केरल नहीं गये)

शबनम हाशमी, शाहिद सिद्दीकी (धर्मान्तरण के विरुद्ध जंगलों में काम कर रहे वयोवृद्ध स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या होने पर भी ये साहब लोग कारवाँ लेकर उड़ीसा नहीं गये)… कश्मीर तो खैर इनमें से कोई भी जाने वाला नहीं है… लेकिन ये सभी फ़िलीस्तीन जरुर जायेंगे।

तात्पर्य यह है कि अपने “असली मालिकों” को खुश करने के लिये सेकुलरों की यह गैंग, जिसने कभी भी विश्व भर में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार और जातीय सफ़ाये के खिलाफ़ कभी आवाज़ नहीं उठाई… अब फ़िलीस्तीन के प्रति भाईचारा दिखाने को बेताब हो उठा है। इन्हीं के “भाईबन्द” दिल्ली-लाहौर के बीच “अमन की आशा” जैसा फ़ूहड़ कार्यक्रम चलाते हैं जबकि पाकिस्तान के सत्ता संस्थान और आतंकवादियों के बीच खुल्लमखुल्ला साँठगाँठ चलती है…। कश्मीर समस्या पर बात करने के लिये पहले मंत्रिमण्डल का समूह गिलानी के सामने गिड़गिड़ाकर आया था परन्तु उससे मन नहीं भरा, तो अब तीन विशेषज्ञों(?) को बात करने(?) भेज रहे हैं, लेकिन पिलपिले हो चुके किसी भी नेता में दो टूक पूछने / कहने की हिम्मत नहीं है कि “भारत के साथ नहीं रहना हो तो भाड़ में जाओ… कश्मीर तो हमारा ही रहेगा चाहे जो कर लो…”।

(सिर्फ़ हिन्दुओं को) उपदेश बघारने में सेकुलर लोग हमेशा आगे-आगे रहे हैं, खुद की फ़टी हुई चड्डी सिलने की बजाय, दूसरे की धोने में सेकुलरों को ज्यादा मजा आता है…और इसे वे अपनी शान भी समझते हैं। कारवाँ-ए-फ़िलीस्तीन भी कुछ-कुछ ऐसी ही “फ़ोकटिया कवायद” है, इस कारवाँ के जरिये कुछ लोग अपनी औकात बढ़ा-चढ़ाकर बताने लगेंगे, कुछ लोग सरकार और मुस्लिमों की “गुड-बुक” में आने की कोशिश करेंगे, तो कुछ लोग एकाध अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार की जुगाड़ में लग जायेंगे… न तो फ़िलीस्तीन में कुछ बदलेगा, न ही कश्मीर में…। ये फ़र्जी कारवाँ वाले, इज़राइल का तो कुछ उखाड़ ही नहीं पायेंगे, जबकि गिलानी-मलिक-शब्बीर-लोन को समझाने कभी जायेंगे नहीं… मतलब “फ़ोकटिया-फ़ुरसती” ही हुए ना?

“अपने” लोगों को लतियाकर, दूसरे के घर पोंछा लगाने जाने वालों की साइट का पता यह है : http://www.asiatogaza.net/

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35 Comments

  1. October 22, 2010 at 9:36 am

    >समस्त सेक्यूलर मत पंथ सम्प्रदायों के मूलभूत विचारों की एक Basic Template है जिसका नाम है – "पापी पेट का सवाल है" |मानो या न मानो – आपकी मर्जी – लेकिन यही और केवल यही सच है कि "पापी पेट का सवाल है" एकमात्र ऐसी टेम्प्लेट है जो यह तय करती है कि क्या सोचना है – क्या बोलना है – क्या करना है |सारा का सारा सोचना – बोलना और करना इसी टेम्प्लेट से हो कर गुजरता है – और जो इस टेम्प्लेट पर सही बैठता है – वही होता है |सेक्यूलर किस्म के लोगों के ९९.९९% कर्म – अर्थात १०,००० में से १ को छोड़ कर ९,९९९ लोग अपने जीवन में इसी "पापी पेट का सवाल है" की टेम्प्लेट को सामने रख कर अपना जीवन जीते हैं |काश्मीरी पंडितों के जातीय सफाए की बात करने से तो एक भी पैसा मिलने से रहा – इसलिए वो मुद्दा या उसी तरह के अन्य मुद्दे "पापी पेट का सवाल है" की टेम्प्लेट से गुजरते हुए फेल हो जाते हैं | लेकिन यहाँ रह कर फिलिस्तीनियों या उसी तरह के मुद्दों पर कुछ बोलने या करने के पैसे मिलेंगे इसलिए वह मुद्दा "पापी पेट का सवाल है" की टेम्प्लेट से गुजरते हुए पास हो जाता हैं |बस इतनी सी बात है – जानम समझा करो |

  2. October 22, 2010 at 9:53 am

    >भांडों और उनके के समूहों की पूरी सूची अभी अभी पढ़ी । आपको पता नहीं है सुरेश जी, ये लोग और इनके संगठन वहां फिलीस्तीन इस लिए जा रहे हैं कि चूंकि इजरायलियों ने तो उनकी ऐसी की तैसी कर ही रखी है, हम जाकर इन्हें अपनी बहन-बेटी दे आएं ताकि ये बेचारे लादेन के फिलीस्तीनी वंशज थोड़े ऐशो-आराम की जिन्दगी गुजार लें । वैसे तो इजरायलियों ने उनका पिछवाड़ा सेंक के रखा ही हैं, आगे कहीं इन asiatogaza वाले "मां के साकीनाका हरामी के पिल्लों" का भी पिछवाड़ा न गोदा जाए…

  3. abhishek1502 said,

    October 22, 2010 at 9:54 am

    >very nice post

  4. abhishek1502 said,

    October 22, 2010 at 10:02 am

    >देश की समस्याए नही दिखती ????????इसे कहते है मुर्खता की पराकाष्ठ वहा से मार मार कर भगाए जायेगे और यह पर शान से मार खा कर आयेगे .

  5. awyaleek said,

    October 22, 2010 at 10:52 am

    >जाने दो अभिषेक..मैं तो खुश हूँ..कम से कम इस बहाने ये लोग अपनी उर्जा और धन बर्बाद तो करेंगे ना….. नहीं तो ये सब भारत की बर्बादी में ही खर्च होगा…

  6. sanjay said,

    October 22, 2010 at 11:16 am

    >is lekh ko salamlikhne wale ko pranam.

  7. October 22, 2010 at 11:23 am

    >ये कुत्ते भारत से जाए तो ज़रूर पर लौटने नहीं चाहिए ! शबाना को मीरा नायर के लिए सलवार उतारते पूरी दुनिया ने देखा है, रुपये के लिए ये सारे कुछ भी करते है !

  8. October 22, 2010 at 11:23 am

    >मैं तो मना रहा हूँ कि इज़रायल हमारी इस समस्या (देशद्रोही नौटंकीबाजों और पदयात्रिओं)को विशुद्ध अपने स्टाइल में हमेशा के लिए समाप्त कर दे.

  9. 'उदय' said,

    October 22, 2010 at 11:40 am

    >suresh bhaai … aapke blog par jo garmaa-garmee dekhane-padhane miltee hai vah poore blogjagat men aur kaheen nahee hai …. prabhaavashaalee post !!!

  10. October 22, 2010 at 12:10 pm

    >पश्चिम बंगाल चुनाव में फायदा मिल जाए शायद इसका !

  11. October 22, 2010 at 12:12 pm

    >very pathetic indeed ! Shame..shame …Shame on pseudos , they are traitors !!

  12. October 22, 2010 at 2:25 pm

    >इस तरह के सेकुलरों के लिए ही ये कहावत है "आप मियां फजीहत, दूसरों को नसीहत". इन बैठेठालों कुछ न कुछ रोज़गार चाहिए होता है. मिडिया मे बने रहने के लिए कुछ न कुछ करना पडता है. अब हिंदुओं के साथ खड़े होने से कौन इन्हें खबर बनाएगा तो चलो इसराइल को ही लतियाया जाये. आपने जो सवाल उठाये हैं वो अपनी जगह सही हैं, पर इनका जवाब इन सेकुलरों के पास नहीं है. इनका ज़वाब हमें ही ढूँढना है.

  13. October 22, 2010 at 3:20 pm

    >सुरेश भाई आप एक और सनसनीखेज खुलासे के साथ आज हमारे सामने हैं| आपके लेख तो हम सभी को बहुत ही पसदं हैं किन्तु पढ़ कर देश की हालत पर दुःख ज्यादा होता है| सच कहते हैं आप इन सालों से अपना देश तो संभल नहीं रहा अब दूसरे के फटे में टांग अडाने चल दिए|बहुत ही महत्वपूर्ण सूचना आपके इस लिख के द्वारा हमें मिली| बहुत बहुत धन्यवाद|

  14. October 22, 2010 at 8:03 pm

    >इज्रायल तो क्या जा पायेंगे ये सब. अभी ईरान के एक मिसाइल संयंत्र में लगातार तीन धमाके हुये और उस संयंत्र को काफी नुकसान पहुंचा. वैसे तो इन सबको ही इज्रायल जाना चाहिये. औकात तो पता चलेगी..

  15. October 23, 2010 at 2:09 am

    >क्या कहें इन देश के छद्म धर्मनिरपेक्ष विदेशी दलाल गद्दारों के बारे में !! इनको तो गाली देने के लिए शब्द ही कम पड़ जाते है !!

  16. RAJENDRA said,

    October 23, 2010 at 4:36 am

    >दुष्टों की कोशिश बिना सज्जनों के सहयोग के सफल नहीं होती राहुल सोनिया जी मनमोहन जी ऐसे ही सज्जन हैं उन्हें इस नेक काम में ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाने का वक्त आ गया है क्यों कि इनसे बड़ा सेकुलर भारत में दिखाई ही नहीं देता

  17. October 23, 2010 at 5:09 am

    >@ सुरेशजी,गीदड़ की मौत आती है तो वो शहर की तरफ भागता है.. ठीक वैसे ये "गीदड़" फिलिस्तीन जा रहे है..कुछ दिन बाद में वहां से जब बदहाल लौटेंगे तो देखने यही रुदालिया गायेंगे.. सा-ले सब के सब देश-द्रोही..-बड़े बे-आबरू होके तेरे कूंचे से हम निकले,,,, कभी हम………

  18. Meenu Khare said,

    October 23, 2010 at 6:04 am

    >अपनी समस्याएं खत्म हो गयी क्या जो दूसरों के लिए लड़ने निकल पड़े? फिर कहेंगे हम पिछड़े है,हम पर कोई ध्यान नहीं देता.

  19. sanjay said,

    October 23, 2010 at 8:09 am

    >o rudaliyan gate rahen……hum sankhnad karte rahenge..jai hind.pranam

  20. October 23, 2010 at 1:44 pm

    >बढ़िया। जय हिंद।

  21. October 23, 2010 at 2:49 pm

    >बहुत बढिया , आप की लेखनी में बड़ी जानदार धार है , हमेशा इस को इसी तरह तेज रखिये

  22. man said,

    October 23, 2010 at 5:09 pm

    >जय श्री राम सर ,इन मंगते सेकुलर "'' अंगो के बालो"' को अब सेकुर्लतादिखाने के लिए फिलिस्तीन जाना पड़ेगा जंहा ….इजराएल इनकी पोली करने के तेयार बेठा हे |वो इन सफ़ेद खून के शवानो की नसबंदी के लिए चोबीसो घंटो "''ओजार पानडे "'तेयार रखता हे ,साथ में में इन अतीवादियो को ७२ नर्सो के साथ जन्नत भेजता हे ?साले अवेध ओलादो की तरह रास्ट्र के "''मूह पे उग आये मूहासो "''की तरह फर्जी एन .जी. ओ. ने मंगतो को भी मात दे दी हे ??, नकली शर्म निपेक्स्ता का शोर उठाये अब ये फिलस्तीन में हुव्वा हुवा ,,,कांव कांव.,करेंगे ,israyle इनकी माँ बहन करके वापस भेजेगा ?बढ़िया रिपोर्ट सर ,

  23. October 23, 2010 at 5:12 pm

    >kya in bharat ke dushmano ko bharat desh ki samshya nahi dikhti hai kya kya kabhi kashmiri pandito ke liye inke pas samay nahi hai lagta hai ye sare dushre desh ke hatho bik chuke hai……….

  24. October 24, 2010 at 7:24 am

    >आदरणीय सुरेश चिपलूनकर जी,धन्यवाद आपका,इसलिये नहीं कि आपने हमारी ओर से स्पष्टीकरण दिया बल्कि इसलिये कि अपने शोधपरक लेखों का उद्धरण दिया. आपके आलेख को कोई व्हिसल ब्लोवर माने न माने आई ओपेनर तो हैं ही वे आलेख.

  25. man said,

    October 24, 2010 at 11:10 am

    >नकली इंडियन सेकुलर "" कान बकरियों "" का गिरहो फिलिस्तीनी राग गायेगा और फिलिस्तीनी इन्हें """"हमास के राखी डोरा बंध्वायेंगे """ ये हे इन हराम के जनों का मानवाधिकार ,एक आतंकारी संघटन को सपोर्ट करेंगी ये ""कान बकरिया (थन तो होते हे पर ढूध नहीं देती हे )पर सैनिक समर्थन कंहा से करेंगे ये हिंजड़े ?भारत इजरायल की आर्मी नजदीकियों से भारत के सेकुलर और वामपंथी भडवे चिंतीत हे ,उन्हें डर हे की उनके ऐसा ना करने से उन्हें वभिन्न अज्ञात स्रोतों से मिलने वाली खेरात राशी बंद हो जाएगी ,और """"चमड़े की जहाज चलानी पड़ जाएगी """चलाते भी होंगे तो क्या पता ?इनके किरियाकलाप देख तो संदेह गहरा हो जाता हे ?की भूखे पेट तो ये कांव कांव नहीं कर सकते ,जरूओर मोटी राशी जमा होती हे इनके अकाउंट में ? रही बात इजरायल की तो वो अपने गोंड फादर अमेरिका की नहीं मानता हे तो इन """कांन बकरियों"" से उसकी सेहत पर क्या असर पड़ेगा |वो एक सच्चा स्वाभिमानी रास्ट्र हे ,वंहा श्रेष्ठ नागरिक पनपते हे ,ना की भारत की पवित्र भूमी होने पर भी नकली सेकुल्र्ता जेसे गंदगी के कीटाणु और उनके वाहक अमन भारत ,आशा foundetion ,बंगला मानवाधिकार मंच जेसे """pissoo """पैदा होते हे ?

  26. October 24, 2010 at 5:02 pm

    >सुरेश जी,ये तथाकथित सेकुलर वामपंथी क्यों नहीं कश्मीर से प्रताड़ित कर भगाए गए कश्मीरी पंडितों के पक्ष में दिल्ली से कश्मीर तक रैली निकालकर उनके घावों पर मरहम लगाने का काम करते .ये लोग कभी भी हिन्दुओं पर हो रहे अत्याच्रों के खिलाफ अपना मुह भी नहीं खोलते.जयचंद है सारे..

  27. ZEAL said,

    October 24, 2010 at 5:36 pm

    >.कुछ ऐसे ही ढोंगी और नकली सेकुलरों द्वारा इज़राइल की गाज़ा पट्टी नीतियों के खिलाफ़ भारत से फ़िलीस्तीन तक रैली निकालने की योजना है। 17 एशियाई देशों के "जमूरे" दिसम्बर 2010 में फ़िलीस्तीन की गाज़ा पट्टी में एकत्रित होंगे….Honestly speaking , it's a brilliant post Suresh ji. We cannot expect much from these so called – " maanavta ke thekedaar ". Every coward behind this facade will soon be unveiled. I am truly loving the term you coined — "Jamoore ".

  28. Amit said,

    October 25, 2010 at 3:40 am

    >Respected Sir,Main to kya kahun? Pehle to main apne email padhne se pehle aapke blog padhta tha ab to morning main news paper se pehle padhta hoon. Kya karun, ek bar aapka blog padh liya tha tab se poore jor shor se aapka pracharak hoon. Ye sab ja kar Isriel ka kuch nahin ukhad sakte. Aap enko jane dijiye. Main to kehta hoon enke jaise aur log enke sath jaye aur Isriel enka ship jane se pehle hi destroy kar de. Videshi paisa to enko jaroor mil raha hai, nahin to aapko kya lagta hai Hindu ye sab nahin kar sakte. Lekin hum aam log hain aur apne parivar ke liye roti ka jugad karne se hi fursat nahin hoti. Jis din Hinduon ne apne time ka 10% bhi desh ke liye dena suru kiya usi din se ye log simatne suru ho jayenge. Aapse prarthana hai ki aap aise hi likhte rahen.

  29. October 25, 2010 at 6:49 am

    >"भारत के लोग" फ़िलीस्तीन की आज़ादी के पक्ष में हैं और उनके संघर्ष के साथ हैं…अधिसंख्यक भारतीयों को "च" जमात में शामिल करने का अधिकार किसने दिया इस कम्बख्तों को. भारत को खिलाफत के भी पक्ष में नहीं था. मूर्ख नहीं समझे तो (ना)पाक पैदा हुआ. और किसने कहा, देशद्रोही गुजरात नहीं जाते. जाते है और खूब जाते है. दुकाने बन्द करनी है क्या अपनी इन्हे. बस अलग काम से जाते है. कुछ लोग अंडे-टमाटर के डर से नहीं भी जाते…. 🙂

  30. October 25, 2010 at 6:51 am

    >बांग्ला मानवाधिकार मंच ? ? ?क्या कमिनिस्ट शासन में भी मानवाधिकारों का हनन होता है, जो ऐसा बांग्ला मंच बनाना पड़ा?

  31. October 27, 2010 at 5:15 am

    >एक जगह अयोध्या संबंधी पोस्ट पे आपकी ३ स्माईलीज़ देखीं ,अच्छा लगा :):):)

  32. October 29, 2010 at 9:31 am

    >आखिर पापी पेट का जो सवाल है, यह सब नौटंकी नहीं करेंगे तो मुफ्त का पैसा कौन देगा???

  33. October 29, 2010 at 10:18 am

    >हमेशा की तरह सजग व्याख्या!!अपनी कलुषित दुर्भावनाओं की पूर्ति के लिये सदैव ये पेट को ही आगे करते है। क्षोभजनक!!!

  34. Bittu said,

    October 29, 2010 at 11:37 am

    >Sahi h Suresh ji Ye sa-le Vapas Nahi aane chaiye Zinda…!! Sab vahi khatm ho jane chaiye…!


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